इसको कहते हैं इंतज़ार का फल मीठा!
क्या बढ़िया और लम्बा अपडेट लिखा है दादा आपने! साधु! साधु! इस फ़ोरम पर पढ़ने योग्य बेहद कम कहानियाँ बची हैं। मेरे लिए आपकी कहानी सबसे ऊपर है उनमें से।
हा हा हा हा
शुक्रिया भाई शुक्रिया
मेरे बेटे का एक स्टेज फर्फर्मांस में थोड़ा बिजी था
मेरे कहानी को इतना इज़्ज़त देने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया
वीर और पिनाक का संवाद क्या बढ़िया लिखा है भ्राता आपने! आनंद आ गया। एक बूढ़े अहंकारी का अहंकार इसी तरह से तोड़ना चाहिए।
एक वाक़या सुनाता हूँ आपको - एक बार एयरपोर्ट में मैं सिक्योरिटी की लाइन में खड़ा था। एक बुड्ढा (लाचार नहीं), जो मुझसे लाइन में कोई पाँच छः स्थान पीछे था, आ कर मेरे बगल में खड़ा हो कर यूँ नाटक करने लगा कि जैसे वो लाइन की टोह ले रहा हो। लेकिन वो दरअसल लाइन काटने की फ़िराक़ में था। मैंने यह बात देख ली, और उसको लाइन में वापस जाने को कहा। इस पर वो मुझ से उलझ गया। बोला आज कल के ‘लौण्डे’ न जाने क्या समझते हैं। मैंने कहा, बुढ़ऊ, लौण्डे जो समझें, न समझें, लेकिन आज कल के बुड्ढे सोचते हैं कि सबके सर के ऊपर मूतेंगे और कोई कुछ कहेगा नहीं। सरेआम बेइज़्ज़ती हुई, तो बुड्ढा वापस लाइन में जा कर खड़ा हो गया।
सभी को समझ आना चाहिए कि इज़्ज़त पाने के लिए इज़्ज़त देनी पड़ती है। इतनी मुश्किल बात नहीं है यह!
हाँ यह बात आपने सौ फीसद सच कहा
मेरे साथ भी ऐसा ही वाक्या हुआ था पर ट्रेन में
मैं अपने पिता माता के साथ आ रहा था l मेरे पास दो ही लोअर बर्थ थी जिस पर मेरे माता पिता बैठे थे l उस बुढ़े आदमी के पास एक लोअर बर्थ थी जिस पर उसने अपनी गर्भवती बेटी को बिठाया था l अपने लिए वह मुझसे या मेरे माता पिता से एक लोअर बर्थ की उम्मीद कर अनुरोध किया l मैंने खारिज कर दी l उसके बाद बहुत भाषण दिया अपने पुलिस में होने की बात भी बताई l उम्र में मेरे पिताजी से भी कम था और नौकरी सुदा था l मैंने अपने पिता का एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी के रुप में परिचय दिया और बोला जो उखाड़ना है उखाड़ लो l
क्या करें ऐसे नमूने कभी कभी टकराते हैं l
इस बार के अपडेट में बहुत से पात्र वापस आए। लगता है कि कुछ अब केवल फुटनोट के जैसे ही आएँगे वापस - जैसे छठी गैंग। वैसे भी वाहियात पात्र थे वो। अच्छा ही है, कि जल्दी ही पटाक्षेप हो जाए उन पर। दूसरे जो वापस आये वो थे सेनापति दम्पत्ति! उनका तो रोल अहम है, इसलिए वो आते ही रहेंगे। प्रतिभा जी ने क्यों विश्व के लिए गिड़गिड़ाया वो भी साफ़ हुआ। मैं भी सोच रहा था कि अपना हीरो ऐसा लल्लू तो नहीं; कुछ न कुछ कर के विक्रम का पार पा ही लेता। लेकिन अब समझा।
जी धन्यबाद
खेत्रपाल को घेरने की रणनीति इंटरेस्टिंग है - कितना काम करेगी, वो देखने वाली बात है। हर अपडेट में रोणा का अंत निकट आता दिख रहा है। नीच का अंत देखना सुनना बहुत अच्छा लगता है। इसलिए रोणा का अंत जानने को मैं उत्सुक हूँ।
हाँ जरूर
आगे इसके उपर भी धीरे धीरे सबको ज्ञात होगा
शुभ्रा भी वापस आई। उसके थ्रू विक्रम को अपनी ‘जीत’ के कारण का पता चला और विश्व की पहचान के बारे में भी। अच्छी बात यह दिखी कि उसमें अपने से श्रेष्ठ को श्रेष्ठ मानने का साहस है। शुभ्रा का प्रश्न बहुत ही वाजिब है। उसका उत्तर विक्रम को स्वयं को ही देना है।
हाँ विक्रम इस बात पर ईमानदार जरूर है
और वास्तव में विक्रम ने अपनी तैयारी करी भी थी खुद को विश्व के बराबर खड़ा करने के लिए
और अंत में विश्व ने अपने मित्र वीर की एक और मुश्किल आसान कर दी। यह आवश्यक था। वीर सर उठा कर चलने वाला लड़का है - उसमें अब घमंड नहीं है, आत्म-गौरव है, जो प्रेम में निहित है। उस प्रेम को पालने के लिए वो मज़दूरी कर लेगा, लेकिन हाथ नहीं फैलाएगा। जो रही सही कसर थी, सब निकल गई है। वो अब पूरी तरह से खेत्रपाली पापों से दूर है। पुराने पापों का कोई दंड होगा या नहीं, लेकिन फिलहाल के लिए अनु और वो सेट होते दिख रहे हैं।
हाँ फिलहाल
अंततः, आप कैसे हैं? आशा है सब अच्छा है। स्वास्थ्य अच्छा है? शीघ्र ही विंटर वेकेशन शुरू हो जाएँगे। कहीं घूम आईयेगा सपरिवार।
मिलते हैं वापस - शीघ्र ही!
बढ़िया हूँ
आपके सुझाव के लिए तह दिल से आभार
हाँ इसबार एक प्लान है मेरी बेटी ने बनाया है
इसबार हम पहले छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के तीरथगड फिर चित्रकोट जाएंगे l उसके बाद रायपुर मेरी मौसी के यहाँ होते हुए सम्बलपुर हीराकुद जाएंगे l उसके बाद अंगुल जा कर टिकरपाड़ा मगरमच्छ सैंचुरी l
फिर अपने घर वापस
आपकी शुभ कामना के लिए फिर से धन्यबाद