भारत की धरती इतनी उर्वर है कि यूँ ही कहीं आम का बीज फेंक दें, तो कुछ वर्षों में वह एक फलदायक वृक्ष बन जाएगा। शब्दशः तो नहीं, लेकिन इसी से मिलती जुलती बात ब्रिटिश इतिहासकार ‘माइकल वुड’ (Michael Wood) ने अपनी डाक्यूमेंट्री, ‘द स्टोरी ऑफ़ इंडिया’ (The Story of India) में कही थी। आज जब मैं यह कहानी लिखने बैठा हूँ, तो अनायास ही यह बात याद आ गई।
आम तो नहीं, लेकिन अमरूद की एक झाड़ी ज़रूर ही हमारे घर के सामने खुद ही उग आई थी।
न केवल उग आई थी, बल्कि बहुत ही अप्रत्याशित तरीक़े से बढ़ भी रही थी। अप्रत्याशित इसलिए कि उसे बढ़ने में हमारे घर से कोई सहयोग नहीं मिला था। अमरूद का वह बीज हमारे घर के सामने कैसे पहुँचा, कैसे उगा और कैसे बढ़ा, यह हमारे लिए रहस्य ही रहा। लेकिन इतना तय है कि अपने पनपने से ले कर बड़ा होने तक की प्रक्रिया में वह झाड़ी पूरी तरह से प्रकृति के रहम-ओ-करम पर ही निर्भर रही। सड़क पर आवारा घूमते मवेशियों की बुरी नज़र उस पर अभी तक क्यों नहीं पड़ी, यह रहस्य भी मेरी समझ से परे है। बाबूजी ने बाड़ बाँध कर, बड़े सहेज कर, घर के सामने वाले बगीचे में आधे दर्जन गुलाब लगाए थे। पूरे मनोयोग से वो उनकी देखभाल करते थे। उनकी खाद पानी और देखभाल में न जाने कितना समय और धन का व्यय हो रहा था। तिस पर भी गुलाब के पौधे बड़ी मुश्किल से साल के दस बारह फूल ही दे पाते थे। ‘करेला नीम चढ़ा’ वाली कहावत एक बार चरितार्थ हो गई। एक दिन दो बकरियों ने कोई जुगाड़ ढूंढ कर, बाड़ लाँघ कर बाबूजी के लगाए गुलाब के चार पौधों की नरम नरम पंखुड़ियों को ऐसा चबाया, कि पूरे साल भर उसमें एक भी फूल नहीं आया। ऐसे में उस अमरूद के पेड़ का बढ़ना, मुझे चमत्कार जैसा ही लग रहा था।
मैं उस समय ग्रैजुएशन की पढ़ाई पूरी कर रहा था और बैंक पीओ की तैयारी भी कर रहा था। बैंक पीओ के एक्साम्स की तैयारी करते समय उस पेड़ को देख कर बड़ा सम्बल मिलता मुझे। मन में उसी की ही तरह जीवट बनने की प्रेरणा मिलती। एक तरह का जुड़ाव हो गया था मुझे उस झाड़ी से! मन में यह विचार अक्सर ही उठने लगता था कि अगर ये बेचारा केवल अपने दम पर इतना बढ़ सकता है, तो मैं इतनी कोचिंग करने, और परिवार के पूरे सहयोग के बाद क्यों सफल नहीं हो सकता! जो प्रेरणा दे, वो मित्र बन जाता है। अमरूद का वह छोटा सा वृक्ष भी मेरा मित्र बन गया था। शायद मन के किसी कोने में पौधों के प्रति लगाव रहा होगा मेरे! इसलिए मैंने अपने मन में ठान लिया कि इसको यूँ अकेला नहीं छोड़ सकता।
पिछले साल से अपने कॉलेज की बॉटनी की टीचर से पूछ कर मैंने इस पेड़ को खाद पानी देना शुरू कर दिया था। अपने जन्म से ले कर तरुणाई तक हमारे परिवार से उदासीनता और लापरवाही झेलने के बाद अनायास ही उस अनाथ को हमारे घर में एक साथी मिल गया था। उस साथ का प्रभाव अमरूद की झाड़ी पर बड़ा सकारात्मक हुआ। उसमें अचानक ही कई शाखाएँ निकल आईं, उसका तना मोटा और स्वस्थ लगने लगा, और उसके पत्ते बड़े बड़े, और हरे हरे लगने लगे। एक कृशकाय सी झाड़ी अचानक से ही एक स्वस्थ पेड़ में बदलने लगी। हमारे घर के सामने वाला हिस्सा अचानक से हरा भरा लगने लगा। मेरे दिन का कुछ समय अब उसके संग ही बीतता। वो अब लगभग आठ फुट ऊँचा एक पेड़ बन गया था। अक्सर ही उसकी छाँव में मैं चादर बिछा कर कॉम्पिटिशन की पुस्तक पढ़ता।
मेरी छोटी बहन गिल्लू (गीताली) भी अब मेरे साथ में हो लेती। जी हाँ - बाबूजी और अम्मा ने महादेवी वर्मा जी के ‘गिल्लू गिलहरी’ के नाम पर ही अपनी बेटी का ‘प्यार वाला नाम’ रख दिया था। गिल्लू हमारे परिवार में सबसे छोटी थी, बाबूजी और अम्मा की एकलौती बेटी थी, अम्मा को उनके चालीस के पार जाने पर मिली थी, और जन्म के समय बहुत नन्ही सी भी थी। गिल्लू मुझसे पूरे दस साल छोटी थी, लेकिन उसके अंदर प्रकृति को लेकर संवेदनशीलता मुझसे पहले आ गई थी। वो कभी कोई पिल्ला घर ले आती, तो कभी कोई चिड़िया का अनाथ सा चूज़ा। और ये सभी उसके साथ बड़े सहज भी रहते। मैंने स्वयं देखा था कि नन्ही गौरैया, गिल्लू की हथेली पर से दाना चुगती थीं। बाबूजी के गुलाबों के साथ भी उसको बड़ा प्रेम था - वो केवल उनको सूँघती थी; कभी तोड़ती नहीं थी। मुझको उस अमरूद के पेड़ में रूचि लेते देख कर गिल्लू भी मेरे साथ उसकी सेवा करने लगी थी।
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हम दोनों भाई बहन की सेवा से जहाँ अमरूद का पेड़ तेजी से अपनी युवावस्था की तरफ़ बढ़ रहा था, वहीं कुछ दुष्ट लोगों की कुदृष्टि उस पर पड़ने लगी थी। हमसे कोई आठ घर छोड़ कर हरिश्चन्दर बाबू की बुढ़िया पत्नी ने एक दिन अम्मा को टोंका और बोली,
“दुलहिन, तोहरे घरा कै मुहाना त पच्छिम क ओर बा... अइसे मा ई समनवै अमरूद कै पेड़वा बहुतै अपसगुनी माना जात है सुने हन!”
हरिश्चन्दर बाबू को बाबूजी के ही महकमे से रिटायर हुए लगभग बारह साल बीत गए थे। वो और उनकी पत्नी का समय आज कल धार्मिक कार्यों में अधिक बीतता था। गिल्लू और मुझे यह औरत कत्तई पसंद नहीं थी। और इस नापसंदगी का एक बहुत ही प्रमुख कारण था - यह औरत गाहे बगाहे हमारे घर में पौधों पर लगे फूलों को तोड़ ले जाती थी, भगवान पर चढ़ाने के लिए। कई बार तो चोरी छुपे - मानों चोरी के पुष्प ईश्वर के चरणों में चढ़ाने से उसकी कोई इच्छा-पूर्ति हो जाएगी! उसको शायद बाबूजी के गुलाब मोह के बारे में पता था, इसलिए पूरी बगिया में केवल गुलाब उसके कुकर्म से बचे रहते थे। अन्य फूल, जैसे गेंदे, गुलदाउदी, दोपहरिया, चमेली के फूल वो यूँ तोड़ लेती, जैसे कि उसी ने लगाए हों!
बुढ़िया की बात सुन कर गिल्लू बहुत नाराज़ हुई थी, लेकिन अम्मा ने हँसते हुए उस बात को टाल दिया। उसको समझाते हुए अम्मा ने कहा था, “मेरी प्यारी गिल्लू, ऐसे अंधविश्वासों में हम कहाँ मानते हैं?”
अम्मा की यह बात सुन कर गिल्लू जहाँ शांत हुई, वहाँ मुझे भी तसल्ली हुई। ऐसे अंधविश्वासों का निर्वाह हमारे घर में हो पाना असंभव था। अम्मा कोई गँवई स्त्री नहीं थीं। स्टूडेंट लाइफ में वो जेल की सैर भी कर चुकी थीं - इमरजेंसी के दौरान कॉलेज के छात्र-संगठन में वो बहुत सक्रिय थीं, और लोकतंत्र का दमन करने वाली नीति के विरुद्ध वो सगर्व खड़ी हुई थीं। बाद में उन्होंने स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी करी और पच्चीस की उम्र में बाबूजी से विवाह किया। बाबूजी स्वयं भी इमरजेंसी के दौरान ‘जेपी’ के साथ कई आंदोलनों में हिस्सा ले चुके थे, और समाजवाद के गहरे विचारक भी थे। मेरे सबसे बड़े भैया ने पढ़ाई पूरी करते करते एक अन्य धर्म को मानने वाली लड़की से शादी कर ली थी और इस समय उन दोनों का एक ढाई साल का बालक भी था। मँझले भैया का एक अंतर्जातीय लड़की के साथ प्रेम-प्रसंग चल रहा था, जिसका पता घर में सभी को था। ऐसे उदार, और आधुनिक विचारधारा वाले घर में हरिश्चन्दर बाबू की पत्नी की बातें बेहद हास्यास्पद लगीं।
गिल्लू के पैदा होने के बाद अम्मा ने अपनी नौकरी छोड़ दी थी। तीन किशोरवय लड़कों और अब एक नवजात शिशु की देखभाल करना अब बहुत भारी पड़ने लगा था अम्मा को। दादी अम्मा की मृत्यु दो वर्षों पहले हो गई थी, और अब अम्मा के पास किसी का सहयोग उपलब्ध नहीं था। अच्छी बात यह थी कि बाबूजी का गिल्लू के जन्म के समय ही प्रमोशन हुआ था और अब वो अपने डिवीज़न के मुख्य अधिकारी हो गए थे। अम्मा ने मान लिया कि अब उनको नौकरी करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि उनके परिवार को उनकी आवश्यकता है। गिल्लू के होने के बाद सब कुछ अच्छा ही अच्छा हुआ था। उसके होने के अगले दो ही वर्षों में बाबूजी ने इस दो-मंज़िला मकान का निर्माण कराया। घर के हर सदस्य के लिए उसका अपना कमरा था, जो उस समय बहुत आगे की सोच थी। इन बातों को गिल्लू का शुभ चिन्ह माना गया और उसको सभी से और भी विशेष प्रेम मिलने लगा।
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अगर अमरूद की अच्छी देखभाल करी जाए, तो तीन चार साल में उनमें फल आने लगते हैं। अपना पेड़ भी कोई अपवाद नहीं था। वो अब लगभग साढ़े तीन साल का होने को आया था। हालाँकि उसकी ऊँचाई बहुत नहीं बढ़ी थी - बमुश्किल दस फूट ऊँचा ही हो पाया था अभी तक। इस बार मानसून ही अच्छा हो रहा था। दो दिनों पहले मेरा बैंक पीओ का रिजल्ट आया था - मेरा चयन हो गया था और ट्रेनिंग के लिए लखनऊ जाना था। उसके बाद लखनऊ में ही किसी ब्राँच में नियुक्ति की आशा थी। बाबूजी और अम्मा बहुत प्रसन्न थे। मुझे बुआजी ने एक दिन गोपनीयता की अनेक कसम रसम खिला कर बताया था बड़े भैया और भाभी मेरे सिलेक्शन से कम और इस बात से अधिक खुश थे कि अब मैं यहाँ से बाहर रहूँगा और मेरा कमरा अब ‘गोलू’ (भैया और भाभी का बालक) को मिल जाएगा। मुझे इस बात से कोई दुःख नहीं था - मैं वैसे भी आधुनिक विचारों वाला आदमी था। मेरा मानना था कि एक समय के बाद संतानों को अपने माता-पिता का घर छोड़ देना चाहिए... ठीक वैसे ही जैसे प्रकृति में अन्य जंतु करते हैं।
मेरे लखनऊ जाने की तैयारी चल रही थी। एक दिन बाहर बरसात में भीगती हुई गिल्लू पूरे आनंद से भाग कर अंदर आई, और सभी को दौड़-दौड़ कर बताने लगी कि अमरूद में तीन फूल आ गए हैं! गिल्लू बढ़ रही थी - उस नन्ही सी बच्ची का शरीर जो बस दो ही सालों पहले उस अमरूद की झाड़ी जैसा कृशकाय था, वो अब भरने लगा था। उसके बचपन के नटखटपने पर सौम्यता का एक आवरण चढ़ने लगा था। वो भी अमरूद के पेड़ को लेकर मेरी ही तरह उत्साहित रहती थी और उसके संग भावनात्मक रूप से जुड़ गई थी। बहुत संभव है कि अमरूद के पेड़ के बढ़ने में शायद उसको भी अपने स्वयं के बड़े होने जैसी संतुष्टि महसूस हुई हो! गिल्लू की ख़ुशी बड़ी संक्रामक थी।
भैया भाभी भी - जो अभी तक अमरूद के पेड़ को ले कर पूरी तरह से उदासीन थे - नन्हे गोलू को अमरूद के पुष्प दिखा कर कहते, “गोलू बेटे, वो देखो... अमरूद का फ़ूल,”
“अमलूद ता पूल...” गोलू भी अपनी तोतली भाषा में प्रकृति के इस आश्चर्य को देखता और महसूस करता। बहुत अच्छी बात थी कि भविष्य की पीढ़ी में प्रकृति को ले कर इस तरह की संवेदनशीलता, विस्मय, और कौतूहल वाले भाव थे।
मेरी अलग व्यथा थी। मैं डरता कि कहीं इस दमदार बारिश और हवा के थपेड़ों से उन कोमल फूलों को चोट न लग जाए... वो कहीं टूट न जाएँ। बारिश की अगली सुबह मैं जा कर देखता भी - कई सारे फूल आए और कई सारे टूटे भी! प्रकृति इन बातों की परवाह कहाँ करती है? एक फूल टूटता, तो दो और फूल आ जाते! मेरे लखनऊ जाते जाते कुछ फूलों की जगह नन्हे नन्हे, हरे रंग के अमरूदों ने ले ली।
मुझे ऐसा महसूस होने लगा था कि हमारे घर के सामने खड़ा यह अमरूद का पेड़, अब हमारे परिवार का सदस्य बन गया था। पहले तो केवल मैं ही उसके तले पढ़ाई करता था। लेकिन फिर गिल्लू और अब गोलू भी उस अमरूद के पेड़ की छाया तले खेलने लगे थे। न केवल वो दोनों, बल्कि आस पास के कुछ बच्चे भी! किसी ने बाबूजी और अम्मा से कह दिया कि पहली फसल के फलों को अगर तोड़ दें, तो अगली फसल बढ़िया आती है। हालाँकि गिल्लू को यह सुझाव नागवार गुजरा, लेकिन अम्मा ने किसी से कहला कर जो गिने-चुने फल निकले थे, उनको तुड़वा दिया। उन्होंने गिल्लू को यह कह कर बहला दिया कि अगर सारे फल ‘काने कुबड़े’ निकलेंगे तो उसको ही पसंद नहीं आएगा। थोड़ा मनाने समझाने के बाद गिल्लू मान गई। उसको भी समझ में आ गया कि अम्मा को भी लगाव था अमरूद से। ऐसे सुन्दर, फल-दायक वृक्ष पर भला कोई क्यों बुरी दृष्टि डाल सकता है? हरिश्चन्दर बाबू वाली बुढ़िया की विषाक्त मान्यता से हमारा वृक्ष बच गया था!
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हम सभी बच्चों में भी पुरानी, पिछड़ी सोच के विरुद्ध विद्रोह के भाव स्पष्ट थे। अवश्य ही भैया और भाभी सभी से अलग थलग से रहते थे, लेकिन जीवों और वनस्पतियों के लिए उनके मन में भी प्रेम था ही। गिल्लू सभी की ही चहेती थी - बिना किसी अपवाद के! लिहाज़ा, जो उसको पसंद था, वो सभी को ही पसंद आता था। शादी से पहले भाभी एक ऐसे धर्म को मानती थीं, जिसमें असंख्य बे-सर-पैर की मान्यताएँ होती हैं। इस परिवार में आ कर उनको आज़ादी की साँस मिली थी। लेकिन गोलू के पैदा होने के बाद उनका व्यवहार किसी सामान्य बहू जैसा ही हो गया था - आत्मकेंद्रित! पहले अपना पति, अपना बच्चा, उसके बाद कोई अन्य! अम्मा को उनके व्यवहार से थोड़ा दुःख रहता। जब वो युवा थीं तब उनकी सोच भी ऐसी ही स्वतंत्र थी। लेकिन सास, और फ़िर दादी बनने के उपरान्त उनके मन में भी अपेक्षाओं ने जन्म ले लिया था। उन अपेक्षाओं के पूरा न हो पाने से अम्मा निराश थीं। उधर उस बुढ़िया का हमारे अमरूद के पेड़ के विरुद्ध अम्मा के कान भरना कम नहीं हुआ।
मेरा मन लखनऊ में रम गया था। शुरू शुरू में मन में आया कि हर महीने घर जा कर हाज़िरी लगाऊँ, लेकिन मैंने इस विचार पर नियन्त्रण रखा। हज़रतगंज की वीथियों में ‘गंजिंग’ करना, चौक में चटकारेदार स्ट्रीट-फ़ूड का आस्वादन करना, गोमतीनगर में विभिन्न मॉल्स में जा कर मानव मादाओं के सौंदर्य को आँखों से पीना - यह अब मेरी दैनिक क्रिया-कलापों का हिस्सा बन गया था। ज़िन्दगी की एक अलग सी राह निकल आई थी - एक मुकम्मल जहाँ की तलाश अब एक मुकम्मल साथी की तलाश में बदलने लगी थी। उधर अम्मा शिकायत करतीं रहती थीं कि घर से बाहर जाते ही मैं उनको भूल गया। लेकिन वैसा था नहीं - मैं बस जीवन के नए अनुभवों में रम गया था। बाबूजी समझते थे इस बात को। वो अम्मा को समझाते कि बेटे को दुनिया देखने दो और उससे यूँ वापस आने की ज़िद न किया करो।
घर से बराबर चिट्ठियाँ आतीं - बाबूजी और अम्मा की चिट्ठियों के संग गिल्लू की चिट्ठी भी रहती हमेशा। भैया लोगों से तो फ़ोन पर ही बातें हो पातीं। वैसे भी उनसे दो तीन महीनों में एक बार बात हो जाए, तो बहुत था। मँझले भैया का प्यार पींगे भर रहा था और वो कभी भी शादी कर लेने वाले थे। गिल्लू की प्यारी चिट्ठियों में अमरूद का ज़िक्र ज़रूर शामिल रहता। हालाँकि इस वर्ष फल तो एक भी नहीं आने दिया गया, लेकिन उसकी पत्तियों से चटनी ज़रूर बनाई गई।
नौकरी लगने के बाद दीपावली में मैं पहली बार घर गया। भाभी वैसे तो पूरे समय अपने कमरे में ही रहतीं, लेकिन जब उनको पता चला कि उनके लिए भी लखनऊ से साड़ी लाया हूँ, तो बड़ी मिठास के साथ मुझसे मिलीं। शीघ्र ही बात मँझले भैया की शादी की होने लगी। पता चला कि भैया वैसे तो कोर्ट मैरिज करना चाहते थे, लेकिन दोनों परिवारों की इच्छा थी कि विधिपूर्वक शादी हो। हाँ - कौन सी विधि से हो, उसी को ले कर सारा जंजाल फैला हुआ था। मौजूदा भाभी को अपनी आने वाली देवरानी को ले कर अनेकों संशय थे। कारण पूछने पर उन्होंने बताया कि संशय उनके विजातीय होने के कारण हैं। मुझे मन ही मन हँसी आ गई - बड़ी भाभी एक अलग धर्म को मानने वाली थीं और उनको आने वाली भाभी के विजातीय होने से कष्ट था! अद्भुत है मानव चरित्र!
मेरी उपस्थिति के कारण इस बार दीपावली पर अम्मा का उत्साह देखने योग्य था। मेरी पसंद के अनेकों व्यंजन पकाए थे उन्होंने। उनकी किसी सहेली ने बताया था कि अगर ज़मीकन्द को अमरूद की पत्तियों में लपेट कर पकाया जाए तो उसका स्वाद और भी बढ़ जाता है। तो इस बार उसी विधि से ज़मीकन्द को पकाया गया था। घर की साज सज्जा का काम भैया लोगों पर निर्भर था। इस बार उन्होंने अमरूद के पेड़ को भी बिजली की झालरों से सजाया था, और रात में उसकी छटा मनोहर लग रही थी। पता चला कि गोलू और उसके नन्हे मित्र इस पेड़ पर चढ़ कर खेलते हैं। अम्मा ने भी बताया कि अब घर में और भी रौनक रहती है। मुझको लगने लगा था इस वृक्ष के कारण हमारे घर के सदस्यों में आत्मीयता बढ़ने लगी थी।
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समय बीतता गया। मँझले भैया की शादी अगले वर्ष के आरम्भ में संपन्न हो गई। मैं उनकी शादी में शरीक़ नहीं हो पाया क्योंकि उसी समय मेरा भारत-भ्रमण चल रहा था। आशा थी कि नई भाभी के साथ अम्मा की अच्छी जमेगी। लेकिन फिर अम्मा की चिट्ठियों और फ़ोन पर बातों के माध्यम से पता चला कि छोटी भाभी को भी बड़ी के ही समान गृहकार्य में कोई रूचि नहीं है। दोनों भाभियों में स्पर्धा चल रही थी कि कम से कम काम करना पड़े घर का। जब भी घर आता अम्मा की बातें मुझे अतिशयोक्ति लगतीं। हाँ - यह ठीक था कि दोनों भाभियाँ गृहकार्य को लेकर उतनी उत्साहित नहीं थीं जितना अम्मा को उनसे उम्मीद थी। कभी कभी लगता कि अम्मा अपने समय में शायद उतनी आधुनिक नहीं थीं, जितना हमको लगता था। अपनी बहुओं को लेकर उनकी सोच और अपेक्षाएँ अन्य सासों जैसी ही थी। ख़ैर, मई आते आते यह खबर भी आ गई कि छोटी भाभी प्रेग्नेंट हैं।
इस बार गर्मियों में मैं एक सप्ताह के लिए घर आया हुआ था। अमरूद के पेड़ की छाँव में कुर्सियाँ डाल कर हम सभी भाई-बहन-भाभियाँ देर तक बतियाते और चाय की चुस्कियाँ लेते। उस समय हमारे बीच एक अलग ही तरह का मैत्री-पूर्ण भाव उत्पन्न हो जाता जो हमारे उम्र के अंतर से परे था। बातचीत के दौरान हम कभी कभी अपने परिवार के वृद्धजनों के व्यवहार पर नाराज़गी भी दिखाते थे। शायद ‘जनरेशन गैप’ इसी को कहते हैं। लेकिन हमारा भाव हमारे वृद्धजनों को ले कर वैमनस्य वाला नहीं था। हम ये बातें एक सकारात्मक सोच के साथ करते थे। नई या अलग सोच का आरम्भ इसी प्रकार होता है। सभी को अपना जीवन, अपने तरीक़े से जीने का अधिकार है। बात बस इतनी सी है, कि एक बड़े परिवार में सभी का सामंजस्य कैसे बैठे।
इस वर्ष अमरूद का पेड़ फलों से अच्छी तरह से लदा-फदा था। पिछले साल से अब तक वो लगभग दो और फुट ऊँचा हुआ था और उसकी सभी डालियाँ और तने अब पहले से अधिक मज़बूत हो गए थे। इतने समय में हमको पहली बात पता चला कि इस अमरूद की क्या वैराइटी थी - उसके फल छोटे छोटे थे, लगभग गोल थे, और उन पर छोटी छोटी लाल रंग की चित्तियाँ पड़ी हुई थीं। बाहर से आते जाते लोग लालचवश कुछ फल तोड़ भी लेते थे। हरिश्चन्दर बाबू और उनकी बुढ़िया भी उनमें शामिल थे। गिल्लू और गोलू इस बात पर अम्मा के साथ बहुत मज़ाक करते और बुढ़िया की खिंचाई करते। वैसे इस बार अमरूद में इतने सारे फल निकले थे कि आरम्भ के कुछ दिनों तक बुरा मानने (अगर कोई गाहे बगाहे अमरूद तोड़ लेता था, तो) के बाद अब घर में सभी का मन उदार हो गया था। हालाँकि अम्मा की चिट्ठियों में यह शिकायत अवश्य रहती थी कि गोलू को अपनी माँ से इस बात पर डाँट पड़ती है कि वह अपनी मनमानी करते हुए अपने साथियों में अमरूद बाँट दिया करता है।
अगले दो वर्षों में अमरूद का पेड़ बढ़ता रहा और फलता रहा।
गोलू एक चंचल बच्चा हो गया था, और उसको भी मेरी ही तरह अमरूद के पेड़ में एक मित्र मिल गया था। उसका अधिकतर समय उसी के इर्द गिर्द व्यतीत होता। गिल्लू की सहायता से उसने एक मोटी रस्सी में गाँठ बाँध बाँध कर रस्सी-चढ़ाई जैसा एक खेल ईजाद कर लिया था। वो कई बार गिर भी चुका था और अपनी माँ के हाथों इस कारण से कई बार पिट चुका था। दूसरे भैया को बेटी हुई थी। हालाँकि वो अभी नन्ही सी ही थी, लेकिन अपने भैया को इस खेल में लिप्त देख कर उसका भी खेलने का मन होता। गोलू उसको भी अपने खेल में शामिल करता रहता। गिल्लू अब तक एक सौम्य किशोरी बन गई थी। लेकिन उसका अमरूद के प्रति लगाव लेशमात्र भी कम नहीं हुआ। उसने हाल ही में अमरूद की टहनियों में चिड़ियों के लिया चुग्गे लटका दिए थे। सभी को लगता था कि ऐसा करने से चिड़ियाँ अमरूद के फलों को नुकसान पहुँचा देंगी, लेकिन वो कम ही हुआ। अपनी पसंद के चुग्गे मिलने से, दरअसल, अब चिड़ियाँ फलों को कम ही खाती थीं।
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अम्मा कुछ समय से मेरे लिए रिश्ता ढूंढ रही थीं। अपनी दोनों बहुओं से निराश हो कर, मेरा जीवन संवारने की कमान अब उन्होंने सम्हाल ली थी। वो चाहती थीं कि उनकी सबसे छोटी बहू, बिल्कुल ‘आदर्श बहू’ हो! लेकिन उनको पता नहीं था कि गोमतीनगर के मॉल्स में सुंदरियों को निहारते निहारते, मुझे वाक़ई एक सुंदरी से इश्क़ हो गया था। अम्मा को एक और बात का संताप था। मँझले भैया शीघ्र ही घर छोड़ कर जाने वाले थे। उनको नोएडा में अच्छी नौकरी मिल गई थी। यह कोई ऐसी अनहोनी बात नहीं थी... घर का कोई भी सदस्य घर से अलग हो, माँ बाप को थोड़ा-बहुत दुःख होता ही है। लेकिन अम्मा ने उस दुःख को एक अलग ही आयाम दे दिया था। उनके अनुसार मँझली बहू ने उनका घर तोड़ दिया था। एक और दुःख था उनको - दोनों भाभियों को एक से अधिक संतान करने की बात समझ ही नहीं आती थी। वो अपना उदाहरण देतीं, बच्चों को बड़ा करने में अपने सहयोग का विश्वास दिलातीं, लेकिन भाभियाँ इस विषय पर टस से मस न होतीं!
और फिर जब उनको पता चला कि मुझे भी एक लड़की पसंद है, तो उन्होंने बड़ी हाय तौबा मचाई। उन्होंने क्या क्या सपने संजोए थे, लेकिन मैंने उनके हर सपनों पर पानी फेर दिया था। जिस दिन मैं वापस जा रहा था, अम्मा रोने लगी थीं। ऐसा मेरे सामने उन्होंने कभी नहीं किया था। अनायास ही मेरे मन में यह ख़याल आ रहे थे कि मैंने अपनी अम्मा को दुःख पहुँचाया है। मैंने यथासंभव जितना जल्दी हो सके, वहाँ से निकल जाना चाहता था। लखनऊ की ट्रेन चढ़ते हुए मुझे सबसे अधिक अम्मा और न जाने क्यों, उस अमरूद के पेड़ की याद आ रही थी। अम्मा की इसलिए क्योंकि बढ़ती उम्र के साथ उनके अंदर एक तरह की दुर्बलता और अक्षमता आने लगी थी, और वो हमको दिखाई देने लगी थी। और अमरूद के पेड़ की याद इसलिए क्योंकि वो मेरे लिए एक प्रेरणा-स्रोत था; उसके सान्निध्य में मेरे भीतर एक जागृति जागती रही। उसकी छाया तले बैठ कर मैंने अपनी कल्पनाओं में एक नया संसार बनाया था, जिससे मुझे संतुष्टि मिलती थी।
एक बात थी जो मेरे मन में खटक रही थी - अपनी हाय तौबा में अम्मा ने एक दो बार अमरूद के पेड़ को भी कोस दिया था। ‘नाश हो इस मनहूस पेड़ का’ जैसा वाक्य भी कहा था उन्होंने... मानों पारिवारिक समस्याओं का ठीकरा वो उसके सर मँढ़ना चाहती हों! ऐसे में अमरूद के पेड़ की याद आनी और भी स्वाभाविक थी। पहले तो उस बुढ़िया ने अनेकों बाद घर के सामने अमरूद का पेड़ होने को अपशगुनी बता कर उसको कटवा देने की अनुशंसा करी थी और अब अम्मा भी उसको मनहूस मानने लगी थीं! ऐसा लग रहा था कि अम्मा हर उस बात का विरोध करना चाहती थीं, जो उनके विचारों से भिन्न है या जिनसे हमको लगाव है। जिस विचारधारा के विरोध के कारण अम्मा जेल गईं, अब लग रहा था कि उन्होंने भी वही विचारधारा धारण कर ली थी। अम्मा की बातों से हम सभी बच्चों में क्षोभ हो रहा था - ख़ास कर गोलू और गिल्लू में! अब मैं भी उन्ही के साथ हो गया था।
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बहुत मान मनौव्वल के बाद अम्मा मेरी शादी के लिए मानी थीं। हमारी शादी पर मैंने अम्मा को उनकी पूरी मनमानी करने की स्वतंत्रता दे दी थी। शादी से पूर्व, मैंने अपनी होने वाली पत्नी को समझाया था कि मेरी अम्मा कैसी हैं। उसको अम्मा के बारे में यह सारी बातें बताना भी अजीब लग रहा था। कैसे और कब कोई उन्नतशील विचारधारा रखने वाला व्यक्ति दकियानूसी सोच रखने लगता है, अम्मा उसका अनन्य उदाहरण बन गईं थीं। होने वाली पत्नी समझदार थी - उसको समझ में आ गया। वैसे भी उसको पता था कि यहाँ उसको बस कुछ दिन ही रहना है, फिर वापस लखनऊ ही जाना है। इसलिए होने वाली सास के साथ अनावश्यक खट-पट करने से कोई लाभ नहीं होगा। कुछ दिन मीठा मीठा बोल लो, और शांति से रह लो, कम से कम सौहार्द बना रहेगा। जब अम्मा ने मेरी धर्मपत्नी को जल्दी जल्दी दो तीन बच्चों का आशीर्वाद दे डाला, तो धर्मपत्नी के साथ मैं खुद भी शर्मिंदा हो गया। अम्मा का एक उन्नतिशील विचारधारा वाली महिला से, एक डरी हुई, दकियानूसी महिला में परिवर्तन अब पूरा हो गया था।
मेरा वैवाहिक जीवन नए अनुभवों के साथ व्यतीत होता रहा। संतान की जल्दी न तो मुझे थी और न ही धर्मपत्नी को! अम्मा को इस बात से कुढ़न महसूस होती। उनकी छोटी बहू भी किसी काम की न निकली! इतना समझाया था, लेकिन उनकी बात की कोई वख़त ही कहाँ है? गृहस्थी और हम दोनों के काम में व्यस्त होने के कारण अब घर जाना बहुत कम हो गया था। इस बार जब एक पड़ोसी लखनऊ आ रहे थे, तो बाबूजी ने उनके हाथों अमरूद भिजवाए थे। साथ आई चिट्ठी में उन्होंने लिखा था कि इस साल अमरूद में फलों की भरमार है, लेकिन उनको खाने वाला घर में कोई नहीं है। बाबूजी इसी साल रिटायर होने वाले थे। उनकी भाषा में भी भावनात्मक मजबूरी सुनाई देने लगी थी। उन्होंने इस बार दीपावली घर में साथ ही मनाने की बात सुझाई थी।
पहली बार बाबूजी ने कुछ माँगा था मुझसे - उनको मना कर पाना मेरे लिए असंभव था। इसलिए मैंने और धर्मपत्नी ने पूरे एक सप्ताह का प्लान बनाया उनके साथ रहने का। हमको पता था कि इतने दिनों में अम्मा उसका और मेरा जीना दुश्वार कर देंगी। लेकिन अब धर्मपत्नी के मन में भी माँ बनने की इच्छा बलवती होने लगी थी, और वो चाहती थीं कि अम्मा की चिंता थोड़ी दूर हो सकें। हम जब घर पहुँचे तो घर पहचान में ही नहीं आया - अजीब से नीरवता छाई हुई थी। गिल्लू कॉलेज गई हुई थी और गोलू स्कूल। मँझले भैया का परिवार यहाँ नहीं था - वो दीपावली के दिन आने वाले थे। बड़ी भाभी हमारे स्वागत के लिए द्वार पर ही थीं। हमको कभी बताया नहीं गया था, लेकिन इस समय वो भी प्रेग्नेंट थीं। लेकिन अपनी गर्भावस्था में वो खुश नहीं लग रही थीं। बाद में उन्होंने बताया कि अम्मा के साथ रोज़ रोज़ की किटकिट से तंग आ कर उन्होंने एक और बच्चा करने का निर्णय ले किया था। लेकिन चूँकि इसमें उनका स्वयं का मत नहीं था, इसलिए वो अम्मा से नाराज़ थीं।
शाम को जब गिल्लू और गोलू घर आए, तो हमको पा कर बहुत खुश हुए। उन दोनों के लिए धर्मपत्नी ने अनेकों उपहार लाये थे। गिल्लू अब सौम्य नवयुवती बन गई थी। उसकी आँखों में भविष्य की आशाओं की कोमल सपने साफ़ दिखाई देते थे। गोलू भी बड़ा हो रहा था। उसका शरीर भी भारी हो रहा था, इसलिए अब वो अमरूद के पेड़ पर पहले जैसे चढ़ नहीं पाता था, नहीं तो उसकी डालियाँ टूट जातीं। लेकिन दोनों ही पहले के ही समान उस पेड़ से मोहब्बत करते थे, और उसकी देखभाल करते थे। मेरी धर्मपत्नी ने पहली बार उस पेड़ को इतने ध्यान से देखा था। उसको देखते ही उसके मुँह से उसकी सुंदरता को ले कर अनेकों शब्द निकल गए, “कितना सुन्दर पेड़ है”, “कितनी रौनक रहती है इसके कारण”, “कितनी सारी चिड़ियें यहाँ आ कर बैठती हैं,” इत्यादि! अम्मा को धर्मपत्नी की बढ़ाई रत्ती भर न सुहाई। लेकिन उन्होंने जैसे तैसे स्वयं को ज़ब्त कर लिया, कि कहीं छोटी बहू उनके बारे में अनाप शनाप न सोचने लगे।
उधर मेरी धर्मपत्नी के मन में अलग ही बातें चल रही थीं। दीपवाली में पूजा के लिए वो अम्मा के आदर्शों के मुताबिक ही तैयार हुई - पाँवों में आलता लगा कर और दुल्हन के लिबास में, पूरे सोलह श्रृंगार के साथ! उसको यूँ सजा-धजा देख कर अचानक से ही अम्मा के चेहरे पर संतोष के भाव आ गए। नालायक बहू अचानक से ही ‘आदर्श बहू’ बन गई। छोटी भाभी भी अपनी जेठानी और देवरानी के चलते ढंग से तैयार हुईं, और पूरे समय अपनी सास के साथ मधुर व्यवहार दिखाती रहीं। अम्मा बहुत समय के बाद बड़ी प्रसन्न हुईं। पूजा के बाद जब मेरी धर्मपत्नी ने अम्मा के पैर छुए तो उन्होंने उसको माँ बनने का आशीर्वाद पहले दिया, और सदा-सुहागन रहने का बाद में!
हमारे सोने की व्यवस्था बैठक में की गई थी। मँझले भैया वाला कमरा अभी भी उन्ही का था - हालाँकि वो घर छोड़ चुके थे। मैं अब इस घर पर अपना कोई अधिकार नहीं मानता था। मैं अब भविष्य की तरफ़ मुखातिब हो गया था। कुछ समय पहले ही मैंने लखनऊ में अपना घर खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी - उसके लिए अग्रिम डिपाजिट भी कर दिया था और बैंक से होम लोन का भी आवंटन हो गया था। सोचा कि यह खबर सभी को दीपावली के अगले दिन सुनाऊँगा। रात में बच्चों के संग आतिशबाज़ी के खेल और उत्तम भोजन के आस्वादन के बाद, बिस्तर में जब धर्मपत्नी ने बड़े लुभावने अंदाज़ में मुझको अपने आलिंगन में आमंत्रित किया, तब मुझे समझ में आया की उसके मन में क्या चल रहा था। मैंने भी रात भर उसके खेल में पूरे उत्साह से भाग लिया। सुबह अम्मा ने उसको देख कर मुस्कुराते हुए कहा कि लगता है जल्दी ही दो दो खुशखबरियाँ आने वाली हैं इस घर में!
बहुत दिनों बाद अम्मा को इस तरह से खुश होते हुए देखा था मैंने! नहीं तो पिछले कुछ वर्षों से वो न जाने किस अवसाद की गहराई में धँसी चली जा रही थीं! अम्मा के चेहरे से अनजान भय के बादल कुछ समय के लिए हट गए थे, और यह देख कर मुझको बड़ा संतोष हो रहा था। इस बार दीपावली का त्यौहार वैसा ही बीता जैसा कुछ वर्षों पहले बीतता था। और तो और, अम्मा और बाबूजी दोनों ही मेरी इस बात के समर्थन में थे कि गिल्लू हमारे साथ रह कर अपनी आगे की पढ़ाई करे। पहले अपनी एकलौती और लाड़ली बेटी से बिछोह ही बात सुन कर अम्मा का रक्तचाप बढ़ जाता था। लेकिन इस बार वो संयत रहीं और यह विचार उनको स्वीकृत था। हमको और मँझले भैया भाभी को विदा करते समय हालाँकि अम्मा और बाबूजी की आँखों में आँसू थे, लेकिन उनके चेहरों पर थोड़ा संतोष भी था।
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दीपावली के बाद आने वाली दो तीन चिट्ठियाँ सामान्य रहीं, लेकिन जैसे जैसे जाड़े का अन्धकार बढ़ने लगा, वैसे वैसे चिट्ठियों में सुनाई देने वाले भाव का अन्धकार भी बढ़ने लगा! बाबूजी रिटायर हो गए थे और अब उनमें और अम्मा में घर्षण बढ़ गया था। बड़ी भाभी की गर्भावस्था के अग्रवर्ती महीनों के कारण अब वो घर का काम उतना नहीं देख पाती थीं और जल्दी ही वो अपने मायके चली गईं। अचानक से ही चहल पहल वाला घर वीरान हो गया। गोलू अपनी पढ़ाई के लिए यहीं रह गया, लेकिन उसकी देखभाल का बोझ भी अम्मा पर आ गया। उनका रोना कलपना अब और बढ़ गया। बाबूजी की चिट्ठी से पता चला कि अम्मा को टीबी हो गई थी। यह ऐसा कोई आसाध्य रोग नहीं था - लेकिन फिर भी उसकी चोट अम्मा की चोटिल भावनाओं पर भारी पड़ीं।
भाभी की डिलीवरी के पहले आई चिट्ठी में अम्मा ने बहुत मार्मिक सी बात बताई कि बड़े भैया भाभी, नवजात के साथ वापस आने के बाद रसोई अलग करना चाहते हैं। इस बात को लेकर बहुत मन-मुटाव हो गया था और फिलहाल सभी का जीना दुश्वार हो गया है। बाबूजी ने चिट्ठी में लिखा था कि अम्मा घर में होने वाले सारे कलेशों के मूल में अमरूद के पेड़ को मानती है, और रोज़ उसको काटने की बात करती रहती हैं। सभी उसको अपशगुनी बताते आये थे, लेकिन उन्होंने ही किसी की बात न मानी। अब वो उसी का परिणाम भुगत रही हैं।
मैंने एक बारे में एक बार बाबूजी से फ़ोन पर बात भी करी कि अम्मा को आख़िर हो क्या गया? वो बेचारे क्या ही बोलते? अम्मा वृद्ध हो रही थीं; वो स्वयं भी वृद्ध हो रहे थे। ऐसे में जीवनसंगिनी अगर अंधविश्वासों के चादर ओढ़ ले, तो कैसे निर्वाह हो? वो अम्मा को कुछ कह नहीं पाते थे। मुझसे उन्होंने कहा कि अगर अम्मा को उनके परिवार की बदलती गतिशीलता नकारात्मक लगती है, और अगर वो उसका सारा दोष अमरूद के पेड़ पर लाद कर संतुष्ट हो सकती हैं, तो वो उनका विरोध नहीं करेंगे!
बाबूजी की बात समझ में आती थी मुझे। लेकिन, इतने वर्षों बाद पुनः यह मूर्खतापूर्ण बात सुन कर मुझको बहुत बुरा लगा; धर्मपत्नी को भी। ख़ास कर अम्मा के विचारों में ऐसा आमूल-चूल परिवर्तन दुःखदायक था। हमारे हिसाब से उस घर के प्रांगण में सब जीवंत चीज़ वो अमरूद का पेड़ ही था। गिल्लू इस बात से बेहद नाराज़ थी और अब उसका भी अम्मा के साथ आए दिन झगड़ा होता रहता था। दकियानूसी सोच ने कब हमारे हँसते खेलते परिवार में सेंध लगा दी थी, यह समझना कठिन हो गया था। मैंने भी चिट्ठी लिख कर अमरूद का पेड़ न काटने बात कही और अम्मा बाबूजी और अन्य सभी को अपने गृह-प्रवेश के अवसर पर लखनऊ आमंत्रित किया। धर्मपत्नी अपनी आशाओं के विपरीत, दीपावली में गर्भ-धारण न कर सकी। इस बात से न केवल वो, बल्कि अम्मा भी निराश हो गईं। एक और समस्या हुई - गृह प्रवेश के लिए सभी को बुला तो लिया, लेकिन घर के मिलने में तीन महीनों की देर हो गई। अम्मा ने इस सभी बातों का दोष भी अमरूद के ऊपर मंढ़ दिया।
अपने दुःखों का ठीकरा दूसरों के सर रखना एक मानवीय फ़ितरत है। शायद ही कोई इस फ़ितरत से अछूता है। जब हमारे साथ कुछ अच्छा होता है, तो वह हमने किया होता है; लेकिन अगर कुछ गड़बड़ हो जाए, वो किसी अन्य के कारण हुआ होता है। हम निर्दोष होते हैं। एक मासूम सा पौधा, जो न जाने कैसे, इतनी विषम परिस्थितियों में, बिना हमारे सहयोग के एक फलदार वृक्ष बन गया था। लेकिन अपनी तरुणाई से युवावस्था तक उस पर लोगों ने केवल कुदृष्टि ही डाली। अफ़सोस केवल इस बात का था कि अब उस कुदृष्टि में हमारे परिवार के लोग भी सम्मिलित हो गए थे। कहाँ मैं सोचता था कि अपने घर में एक फलदार वृक्ष होना गौरव-पूर्ण भाव होगा। गोलू के साथी कितनी ईर्ष्या करते होंगे उससे! कैसे कैसे सुखद अनुभव मिलते होंगे बच्चों को उस वृक्ष के कारण! असंख्य खेलों के कौशल सीखते होंगे उसके कारण! बच्चे ही क्या, वयस्क भी इससे कितने लाभान्वित होते होंगे! उसकी छाया में कुर्सियाँ डाल कर, अपने मित्रों के संग कितनी मंडलियाँ जमाई जा सकती हैं!
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घर से किसी के भी आने से पहले हमारा ही जाना हुआ। मेरी धर्मपत्नी अंततः गर्भवती हो गई थीं, और बड़े भैया और भाभी अपने नवजात के साथ घर पर फिलहाल शांति से रह रहे थे। अम्मा ने ज़िद पकड़ ली कि होली पर दोनों जने आ जाओ! अम्मा ऐसी चिड़चिड़ी हो गईं थीं कि उनकी बातों को नकारना, मतलब हफ़्तों तक अपने दिमाग में संताप पालना! न जाने क्यों इस बार घर जाते समय मन बहुत व्याकुल हो रहा था। रात के अँधेरे में जब कई चौराहों पर होलिका जलाई जा रही थी तो असंख्यों बार दोहराई हुई बातें याद आ रही थीं, बातें जैसे कि ‘अपने अंदर की बुराईयों को जलाओ।’ यह बातें प्रत्येक त्यौहार में कही और सुनी जाती हैं, लेकिन हर बार नकार दी जाती हैं।
घर के प्रांगण में आने से पहले ही दिल बैठ गया। विगत कुछ वर्षों से जिस हरियाली की मुझको आदत हो गई थी, अब वो अनुपस्थित थी! क्रोध, क्षोभ, निराशा, और अविश्वास के असंख्यों भाव मन में आ गए, लेकिन उनको अम्मा और बाबूजी के सामने मैं कह न सका। मुझे इस बात से भी बड़ी निराशा हुई जब हमारे आने से घर के बड़ों में कोई स्वागत भाव नहीं दिखाई दिया। अम्मा की आँखों में भी अपराधबोध दिखाई दे रहा था। जब अपनी बनाई गई विफ़लताओं का ठीकरा किसी निर्दोष के सर मँढ़ कर उसका बलिदान कर दिया जाता है, तो उसको हत्या कहलाती है। अमरूद के पेड़ की हत्या हो चुकी थी।
सुबह उठा, तो पाया कि जहाँ अमरूद के पेड़ का तना था, अब वहाँ उसी की गोलाई में छोटे फूलों की क्यारी बना दी गई थी। लेकिन बीच में उस पेड़ के कटे हुए तने का अवशेष एक सफ़ेद चकत्ते के समान चमक रहा था, मानों धरती की स्निग्ध त्वचा पर कोढ़ हो आया हो। वो कोढ़ प्रतीक था इस बात का कि हमारी लाख कोशिशों के बाद भी अम्मा अपने मिथ्या भय से पराजित हो गई थीं। वो कोढ़ प्रतीक था इस बात का कि आधुनिक शिक्षा और चेतना से लबरेज़ हम, अपने माता पिता को उनके निराधार डर से उबरने का आश्वासन नहीं दे पाए। वो कोढ़ प्रतीक था इस बात का कि अम्मा का डर, जो पहले क्षणिक होता था, अब वो स्थाई हो चला था। अम्मा की धारणाएँ कि बड़ी भाभी की अलग होने की इच्छा, मँझले भाई का अलगाव, उनकी खुद की बीमारी, और मेरी धर्मपत्नी का लम्बे समय तक माँ न बन पाना, यह सब घर के सामने उगे उस अमरूद के पेड़ का दुष्परिणाम है, जिसको हरिश्चन्दर बाबू वाली बुढ़िया ने बहुत पहले ही अपशगुनी बता दिया था। उसके जाते ही बड़ी भाभी की तरफ़ से किचकिच बंद हो गई और मेरी धर्मपत्नी गर्भवती हो गई - यह सभी अम्मा के लिए उस पेड़ के अनिष्टकारी होने का संकेत था।
अम्मा का अंधविश्वास, सभी की तार्किक चेतना पर विजय पा चुका था।
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जाने के एक दिन पहले मैंने यूँ ही संकेत के रूप में अमरूद के बारे में अम्मा से पूछा, तो गिल्लू के क्रोध को सहारा मिला। उसकी मासूम आँखों में तूफानी झोंका उत्पन्न हो गया। उसके नथुने गुस्से में फड़कने लगे और उसका मुँह गुस्से से फूल गया। अम्मा कुछ ठीक से कह न सकीं। उनके मन के किसी कोने में उनका अपराध बोध अभी भी जीवित था। शायद उनको भी दुःख था। लेकिन इसलिए नहीं कि उनके हाथों कोई गलत काम हो गया था, बल्कि इसलिए क्योंकि गिल्लू नाराज़ थी और हम सभी उनकी इस हरकत से निराश थे। मुझे गिल्लू का क्रोध अच्छा लगा। युवा पीढ़ी में ऐसा क्रोध होना, चली आ रही सड़ी-गली मान्यताओं और अंधविश्वासों के उन्मूलन के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। बस, इस क्रोध का उचित रूप से पालन होना चाहिए और सही दिशा दिखाई जानी चाहिए।
वापस लखनऊ जाने से पिछली रात गिल्लू हमारे पास आई। उसने हम दोनों से बहुत देर तक बातें कीं। हमें पता था कि गिल्लू अमरूद के पेड़ के कटने से बहुत नाराज़ थी। इसलिए हम उसका ध्यान उधर से हटाने के लिए उसके लखनऊ आने, वहाँ पढ़ाई करने, और उसके भविष्य की बातें करने लगे। उस बातचीत के दौरान मैंने कई बार महसूस किया कि गिल्लू के चेहरे पर एक अनोखा संतोष दिखाई दे रहा था। मैंने बहुत कोशिश की, लेकिन जब रहा नहीं गया, तो मैंने उससे कारण पूछ ही लिया।
उत्तर में उसने अपनी जेब से एक छोटी सी कागज़ की पुड़िया निकाल कर मेरी हथेली में रख दी। उसे खोलकर देखा तो पाया कि उसमें अमरूद के कुछ छोटे-छोटे बीज थे। बात समझ में आ गई, फिर भी मन में उत्सुकता बनी रही।
“भैया,” उसने षड़यंत्रकारी अंदाज़ में, हल्की मुस्कान के साथ कहा, "मैंने पूरे लॉन में अमरूद के बीज बो दिए हैं... अब तो किसी अपशगुन की भी ख़ैर नहीं!”
“गिल्लू!” मैंने प्रशंसा भरे भाव में शिकायत की।
गिल्लू के विद्रोह से मुझे बड़ा गर्व हुआ।
“आप भी अपने घर के सामने बो दीजिएगा इन्हे,” उसने बीजों की पुड़िया की ओर संकेत करते हुए कहा, “जब आपका नन्हा बाबू आएगा न, तो मेरे और गोलू के बचपन की तरह, उसका बचपन और भी यादगार हो जाएगा...”
अगली सुबह जब उठा, तो मन हल्का सा लगा। टहलने की गरज से बाहर निकला तो देखा कि बाबूजी के गुलाबों के पौधों में दो-तीन गुलाब खिले हुए थे। लॉन में एक दो स्थानों पर गिल्लू द्वारा बीज बोने के चिन्ह स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। मन में विचार आए बिना न रहे, कि अगली होली पर जब हम आएँगे, तो कितना कुछ बदल जाएगा! हमारी गोद में एक नन्ही सी जान होगी, और इस लॉन में नन्हे-नन्हे, कम से कम आधा दर्जन अमरूद के पौधे होंगे! अम्मा चाहे कितना भी अन्धविश्वास मान लें, वो किसी भी नन्ही जान - चाहे वो अमरूद का नवजात पौधा ही क्यों न हो - का अनिष्ट नहीं कर सकेंगीं! क्या पता, उतने समय में हम उनको समझा सकें! मना सकें कि सतत परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है और उनका परिवार टूट नहीं रहा है, बल्कि बढ़ रहा है और मज़बूत हो रहा है।
जाते जाते मैंने एक आख़िरी बार मुड़ कर देखा। सूर्य की रौशनी से तप्त वो चकत्ता अब सफ़ेद नहीं लग रहा था, बल्कि स्वर्मिण हो गया था। मेरी दृष्टि बाबूजी, अम्मा, भैया-भाभी, और फिर अंत में मुझे हाथ हिलाकर अलविदा करती गिल्लू पर पड़ी। वो मुस्कुरा रही थी - विजय के संतोष वाली मुस्कान!
मैं भी मुस्कुरा दिया, और भविष्य की दिशा में चल दिया।
समाप्त.