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Fantasy Aryamani:- A Pure Alfa Between Two World's

nain11ster

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भाग:–160


वह दासी आर्यमणि के ओर पोटली बढ़ा दी और नभीमन किसी प्राचीन भाषा में एक मंत्र बोलकर, आर्यमणि को 5 बार उस मंत्र को पहले दोहराने कहा और बाद में वो पोटली लेने.… आर्यमणि भी 5 बार उस मंत्र को दोहराकर पोटली जैसे ही अपने हाथ में लिया, चारो ओर से उसे फन फैलाए सापों ने घेर लिया।

आर्यमणि:– हे शेषनाग वंशज नभीमन, हमे इस तरह से घेरने का मतलब।

नभीमन:– क्षमा करना, मैं एक और छल तो नही करना चाहता था, किंतु मैं विवश हूं। पाताल लोक की अनंत जिंदगी का तुम सब आनंद लो। मै न जाने कितने वर्षों से यहां के बाहर झांका तक नही परंतु श्राप का तुम्हारे ऊपर स्थानांतरण से अब मैं यहां की कैद से मुक्त हूं।

आर्यमणि:– तो क्या आप अपनी मुक्ति के लिये हम चारो के साथ अन्याय कर देंगे?

नभीमन:– एक बार मुझे ब्रह्मांड घूमकर वापस आने दो फिर मैं तुम्हे श्राप मुक्त कर दूंगा। मै वचन देता हूं।

आर्यमणि:– तुम्हारे भूत काल से लेकर वर्तमान तक, इन सब की जम्मेदारी मैं उठता हूं, यही अर्थ था ना उस 5 बार बोले मंत्र का...

रक्षक पत्थर लेने से पहले जो मंत्र आर्यमणि ने कहा था, उसी को रूपांतरित करके सुना दिया। जैसे ही आर्यमणि ने अपने शब्द कहे, नभीमन की आंखें फैल गई। वह मूर्छित होकर गिड़ गया। जैसे ही नभीमन मूर्छित होकर गिड़ा, अल्फा पैक के ऊपर चारो ओर से तरह–तरह के वार शुरू हो गये। कोई शर्प अग्नि छोड़ रहा था तो कोई विषैला जहर। हमला करने के अनगिनत तरीके वो शार्प जीव दिखा रहे थे, लेकिन कोई भी वार अल्फा पैक को छू नही पा रही थी।

सभी शर्प जीव आश्चर्य में थे। इतने भीषण हमले से तो एक पूरी क्षेत्र की आबादी ऐसे गायब होती जैसे पहले कभी अस्तित्व ही नही था, लेकिन ये चारो अपनी जगह खड़े थे। ये कमाल आर्यमणि का नही बल्कि नाभिमन का था। उसने अपनी जिम्मेदारी और साथ में रक्षक पत्थर दोनो आर्यमणि को सौंप चुका था। अब न तो नाभिमन पाताल लोक का राजा रह गया था और न ही उसका चोरी वाला रक्षक पत्थर उसके पास रहा। खुद की झोली खाली करके नाभिमन ने आर्यमणि को वह शक्तियां दे चुका था जिस वजह से पाताल लोक के हमले उसपर बेअसर था।

आर्यमणि अट्टहास से परिपूर्ण हंसी हंसते.… “तुम सब मूर्ख हो क्या? अब से मैं तुम्हारा राजा हूं। अभी–अभी तो नभीमन अपनी सारी जिम्मेदारी मुझ पर सौंप कर पता न बेहोश हुआ या मर गया।

नभीमन का भाई और पाताल लोक का सेनापति अभिमन.... “तू छलिया साधक हमारा राजा कभी नहीं बन सकता। तुझे हम अपनी सिद्धियों की शक्तियों से नही हरा सकते तो क्या, लेकिन भूल मत तू हमारे क्षेत्र में है और हम तुझे बाहुबल से परास्त कर देंगे।”

अभीमन अपनी बात कहकर जैसे ही हुंकार भरा, चारो सांपों के नीचे ढक गये। तभी उस माहोल में तेज गरज होने लगी। यह गरज इतनी ऊंची थी कि पूरा पाताल लोक दहल गया। और जब प्योर अल्फा के पैक ने टॉक्सिक रेंगते पंजों से हमला शुरू किया, तब उन जहरीले सपों को भी जहर दे रहे थे। वुल्फ पैक के पंजे, 5 फन वाले नाग के शरीर पर जहां भी लगता उस जगह पर पंजों के निशान छप जाते और वह सांप बेहोश होकर नीचे।

हर गुजरते पल के साथ अभीमन को अपने बाहुबल प्रयोग करने का अफसोस सा होने लगा। हजारों की झुंड में सांप कूदकर आते और उतनी ही तेजी के साथ पंजों का शिकार हो जाते। तभी पाताल लोक की भूमि पर रूही ने अपना पूरा पंजा ही थप से मार दिया। अनंत जड़ों के रेशे एक साथ निकले जो सांपों को इस कदर जकड़े की उनके प्राण हलख से बाहर आने को बेताब हो गये.…

नभीमन वहां किसी तरस उठ खड़ा हुआ और आर्यमणि के सामने हाथ जोड़ते... "सब रोक दीजिए। ये लोग बस अपने राजा को मूर्छित देख आवेश में आ गये थे।”

माहोल बिलकुल शांत हो गया था। जो शांप जहां थे, अपनी जगह पर रेशे में लिपटे थे। आर्यमणि, नभीमन के लिये जड़ों का आसन बनाया और दोनो सामने बैठ गये।.... “हे साधक आपको मेरे विषय में सब पहले से ज्ञात था।”...

आर्यमणि:– मैं सात्विक आश्रम के दोषियों के बारे में पढ़ रहा था और वहां सबसे पहला नाम तुम्हारा ही था।

नभीमन:– “हां, तुमने सही पढ़ा था। हजारों वर्ष पूर्व की ये कहानी है। मै अपने जवानी के दिनो मे था और नई–नई ताजपोशी हुई थी। पूरे ब्रह्मांड पर विजय पाने की इच्छा से निकला था। मुझे शक्ति का केंद्र स्थापित करना था। इसलिए हमने सबसे पहले उस ग्रह पर अपना साम्राज्य फैलाना ज्यादा उत्तम समझा जहां से हम अपनी शक्ति, तादात और नई सिद्धियों को बढ़ा सकते थे।”

“शक्ति स्वरूप एक ग्रह मिला नाम था जोरेन। ज़ोरेन ग्रह पर सभी ग्रहों के मिलन का प्रभाव सबसे अत्यधिक था। उस ग्रह पर ग्रहों के मिलन का प्रभाव इतना ज्यादा था कि वहां पैदा लेने वाला हर जीव अपनी इच्छा अनुसार अपने कोशिकाओं को पुनर्वयवस्थित कर किसी का भी आकार ले सकते थे। मेरा ये अर्ध–शर्प, अर्ध–इंसानी रूप वहीं की देन थी। ज़ोरेन ग्रह, पर जब हम पहुंचे तब वहां कोई सभ्यता ही नही थी। कुछ भटकते जीव थे जो किसी भी आकार के बन जाते थे।”

“वहां मुझे कोई युद्ध ही नही करना पड़ा। आराम से मैने वहां अपना समुदाय बसाया, नाम था निलभूत। बड़ा से क्षेत्र में भूमिगत शहर बसाया और शासन को चलाने के लिये एक महल। आखरी जहर, को वहां के गर्भ गृह में पहुंचाया, ताकि वह सबसे मजबूत शक्ति खंड हो, और वहीं से मैं पूरी शासन व्यवस्था देख सकूं। आखरी जहर के बारे में शायद तुम पहली बार सुन रहे होगे क्योंकि ये इतनी गोपनीय थी कि आज तक किसी महान महर्षि तक को इसका ज्ञान न हुआ। आखरी जहर का एक कतरा काफी है, मिलों फैले 10 लाख लोगों को मारने के लिये।”

“महल में शक्ति खंड का निर्माण के साथ ही मैंने अपने तीनो नागदंश को भी स्थापित किया। हमारे यहां जब राजा की ताजपोशी होते है तब उसे कुल 4 नागदंश मिलते है। बिना 4 नागदंश के कोई राजा नही बन सकता, यही नियम है। प्रत्येक नागदंश में बराबर शक्तियां होती है। एक नागदश राजा का, दूसरा नागदंश राजा के मुख्य सलाहकार का। एक नगदंश सेनापति का और एक नगदंश रानी का। चूंकि उस वक्त मेरी कोई रानी नहीं थी। न ही किसी को मैने मुख्य सलाहकार और सेनापति नियुक्त किया था। इसलिए तीनो नागदंश वहां स्थापित करने के बाद गर्भ गृह के ऊपर देवी का मंदिर और अंधेरा कमरा बनवाया ताकि मै पूरा केंद्र स्थापित कर सकूं। मै पूर्ण केंद्र की स्थापना कर चुका था और यहां से मुझे अपनी विजयी यात्रा की शुरवात करनी थी।”

“चूंकि मै पाताल लोक से काफी दूर निकल आया था और मणि की शक्ति कमजोर पड़ने के कारण युद्ध के लिये नही जा सकता था, इसलिए वापस पाताल लोक आना पड़ा। पाताल लोक की मणि ही इकलौती ऐसी चीज थी जिसे विस्थापित नही किया जा सकता था। किंतु हमारे खोजियों ने इसका भी कारगर उपाय ढूंढ निकाला था, रक्षक पत्थर। लाल रंग का यह रक्षक पत्थर अनोखा था। इस रक्षक पत्थर में मणि की शक्ति को कैद करके ब्रह्मांड के किसी भी कोने में ले जाया जा सकता था।”

“फिर क्या था, बल और अलौकिक सिद्धियों के दम पर मैने सात्त्विक गांव के गर्भ गृह से, रक्षक पत्थर को निकाल लाया। मुझे नही पता था कि वहां रक्षक पत्थर में जीवन के अनुकूल जीने योग्य जलवायु को संरक्षित करके रखा गया था, जो उस गांव में जीने का अनुकूल माहौल देता था। मै महर्षि गुरु वशिष्ठ के नाक के नीचे से पत्थर उठा तो लाया, किंतु पीछे ये देखना भूल गया की एक ही पल में उस गांव का वातावरण असीम ठंड वाला हो चुका था।”

“जबतक कुछ किया जाता वहां ठंड से 30 बच्चों की मृत्यु हो चुकी थी। महर्षि वशिष्ठ अत्यंत क्रोधित थे। वह पाताल लोक तक आये। न तो मुझे कुछ कहे न ही मृत्यु दण्ड दिया। बस पूरे नाग लोग को “कर्तव्य निर्वहन क्षेत्र विशेष” श्राप देकर चले गये। न तो वापस लौटे न ही किसी प्रकार का कोई समय अवधि दिया। बस तब से हम सब पाताल लोक में कैद होकर रह गये।”

“पाताल लोक के बड़े से भू–भाग पर अनंत अलौकिक जीव बसते थे। वह अलौकिक जीव को पालने हेतु बहुत से ऋषि अपने अनुयायियों को वहां भेजा करते थे। मैने पूरा भू–भाग पाताल लोक में विलीन करके केवल उतना ही क्षेत्र ऊपर रहने दिया जिसमे जलीय जीव प्रजनन कर सके, लेकिन फिर भी कोई ऋषि पाताल लोक के दरवाजे पर नही पहुंचा।”

“मेरी विडंबना तो देखो। 4 दंश जब तक मैं अपने उत्तराधिकारी को न दे दूं, तब तक कोई दूसरा राजा नही बन सकता। और मैं तो 3 दंश दूर ग्रह पर छोड़ आया जहां से मैं क्या कोई भी नाग वापस नहीं ला सकता। मैने गलती की और मेरी गलती की सजा पूरा नाग लोक उठा रहा है। मुझ जैसे पापी राजा से इनको छुटकारा नही मिल रहा।”

“मैने वैसे छल से तुम्हे फसाया जरूर था पर मैं यहां से सीधा ज़ोरेन की सीमा में जाता और अपना नाग दंश वापस लेकर चला आता। फिर मैं नए उत्तराधिकारी के हाथ ने ये पूरा पाताल लोक सौंपकर कुछ वर्ष तक अलौकिक जीव की सेवा करने के उपरांत इच्छा मृत्यु ले लेता।

आर्यमणि:– मैं तुम्हारा श्राप तो मिटा नहीं सकता, क्योंकि महर्षि वशिष्ठ ने 8 जिंदगी को साक्षी रखकर वह श्राप दिया था, जिनमे से अब एक भी जीवित नहीं है। इसलिए कोई भी नाग अब नाग लोक नही छोड़ सकता। लेकिन हां 3 दिन के सिद्धि योजन से मैं उस नियम में फेर बदल जरूर कर सकता हूं जो अगले राजा बनने में बाधक है।

नभीमन:– क्या ऐसा कोई उपाय है?

आर्यमणि:– हां ऐसा एक उपाय है भी और जो सबसे जरूर चीज चाहिए होती है नाग मणि, वह भी हमारे पास है।

नभीमन:– तो क्या कृपाण की नागमणि सात्त्विक आश्रम के पास है?

आर्यमणि:– ये कृपाण कौन है...

नाभिम:– इक्छाधारी नाग का प्रथम साधक। वह इंसान जिसने साधना से ईश्वर को प्रसन्न किया और बदले में उसे इच्छाधारी नाग का वर मिला था। वैसे तो हर इच्छाधारी नाग के पास अपना मणि होती है, किंतु वह काल्पनिक मणि होता है जो इक्छाधारी नाग के विघटन के साथ ही समाप्त हो जाता है। यदि सात्त्विक आश्रम के पास मणि है तो वह कृपाण की ही मणि होगी।

आर्यमणि:– ऐसा क्यों? किसी दूसरे इक्छाधारी नाग की मणि क्यों नही हो सकती?

नाभिमन का भाई अभिमन.... “भैया इसे कुछ मत बताना, जब तक की ये हमे न बता दे की आपका श्राप इसपर स्थानांतरित क्यों नही हुआ?

आर्यमणि:– क्यों वो श्राप मुझ पर स्थानांतरित करने पर लगे हो। तुम में से कोई भी ये श्राप लेलो....

नाभीमन:– पूरा नाग लोक की प्रजाति ही शापित है, तो किसका श्राप किस पर स्थानांतरित कर दूं। और अभिमन तुम अब भी नही समझे। ये सात्विक आश्रम के गुरु है। सात्विक आश्रम की कोई संपत्ति जब वापस से उनके गुरु के हाथ में गयी, तो वो चोरी कैसे हुई। इसलिए श्राप इन पर स्थानांतरित नही हुआ।

अभिमन:– माफ करना गुरुदेव। हम सब अपनी व्यथा में एक बार फिर भूल कर गये। हमे समझना चाहिए था इस दरवाजे तक कोई मामूली इंसान थोड़े ना आ सकता है। बस नर–भेड़िया ने हमे दुविधा में डाल दिया था। हमे लगा एक भेड़िया कहां से सिद्ध प्राप्त करेगा। और यदि सिद्ध प्राप्त भी हो तो कहां सात्विक आश्रम से जुड़ा होगा।

आर्यमणि:– अब मेरे भी सवाल का जवाब दे दो। किसी दूसरे इक्छाधारी नाग की मणि क्यों नही हो सकती...

नभीमन:– क्योंकि मणि के बिना इक्छाधारी नाग इक्छाधरी नही रह जायेगा। 2 दिन उन्हे नागमणि नही मिला, तब वो या तो नाग बन जाते हैं या इंसान। दोनो ही सूरत में वो इक्छाधारी नही रहते और मणि विलुप्त।

आर्यमणि:– और वो कृपाण की मणि।

नभीमन:– वह मणि पाताल लोक के मणि जैसा ही है। बस वह बहुत छोटे प्रारूप में है और यहां उस मणि का पूर्ण विकसित रूप है। गुरुदेव उस मणि का राज न खुलने पाए वरना पृथ्वी पर कई मुर्दे उस मणि को लेने के लिये जमीन से बाहर आ जायेंगे। और वह मणि ऐसा है की मुर्दों को भी मौत दे दे।

आर्यमणि:– ये बात मैं ध्यान रखूंगा। वैसे हमने बहुत सी जानकारी साझा कर ली। अब उस काम को भी कर ले, जिस से पाताल लोक अपना नया राजा देखेगा।

नभीमन:– हां वो काम आप कीजिए जबतक एक जिज्ञासा जो मेरे दरवाजे पर खड़ी है, क्या मैं आपके साथियों के साथ उसे भी पाताल लोक की सैर करवा दूं।

आर्यमणि, दूर नजर दिया। पता चला पाताल लोक का दरवाजा हर जगह से दिखता है। आर्यमणि इसके जवाब में रूही के ओर देखा। रूही मुस्कुराकर हां में जवाब दी और चाहकीली को अंदर बुलाया गया। राजा नाभिमन ने भी जब पहली बार अमेया को गोद में लिया, उन्होंने लगभग एक घंटे तक अपनी आंखें ही नही खोली, और जब आंखें खोली तब चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान थी।

नभीमन:– इस शांति वाहक देवीतुल्य का नाम क्या है।

रूही:– अमेया...

नभिमन:– मेरे हजारों वर्षों की अशांति को इसने थोड़े से समय में ही दूर कर दिया। मृत्यु के उपरांत जो सुकून प्राप्त होती है, ठीक वैसा ही सुकून था। अभिमन एक बार तुम भी देवीतुल्य अमेय को हृदय से लगाकर देखो...

अपने भाई के कहने पर अभिमन ने भी अमेया को सीने से लगाया। वह भी आश्चर्य में था। उसने वो सुकून को पाया जो उसे जीवन में पहले कभी नहीं मिली थी और न ही कभी ऐसे सुकून की कल्पना उसने किया था। फिर तो सभी शेषनाग एक श्रेणी में बंध गये और जैसे ही नभीमन ने अपनी प्रजा में एक साथ सकून को बांटा, पूरी प्रजा ही गदगद हो चुकी थी।

बड़े धूम से और बड़ा सा काफिला अल्फा पैक को पाताल लोक घूमाने निकला। पौराणिक अलौकिक जीव जैसे बारासिंघा, गरुड़, नील गाय, एकश्रिंगी श्वेत अश्व, कामधेनु गाय, ऐरावत हाथी, अनोखे पंछियों को देखने का मिला। वहीं पाताल लोक के एक हिस्से से गुजरते हुये सबको भयानक काल जीव भी दिख रहे थे। सोच से परे उनका आकार और देखने में उतने ही डरावने। लगभग 40 ऐसी भीषणकारी प्रजाति पाताल लोक में निवास करती थी, जिसे उग्र देख प्राण वैसे ही छूट जाये।

3 दिनो तक आर्यमणि अपने योजन में लगा रहा और इन 3 दिनो में अल्फा पैक ने पाताल लोक का पूरा लुफ्त उठाया। लौटते वक्त तो अलबेली ने पूछ भी लिया की क्या हमने पाताल लोक पूरा घूम लिया? इसपर नभीमन ने हंसते हुये बताया... “पाताल लोक अनंत है, इसकी कोई सीमा नहीं। यह अलौकिक रूप से ब्रह्मांड के कई हिस्सों से जुड़ा है, लेकिन यह पूरा भू–भाग सदैव धरातल के नीचे होता है और इसके कुल 6 दरवाजे है, जो 6 अलग–अलग हिस्सों में है। हर 6 दरवाजे पर हजारों किलोमीटर का ऊपरी भू–भाग होता है, जहां पाताल लोक के जीव अक्सर विचरते है। यहां आम या खास किसी के भी आने की अनुमति नही, केवल सिद्ध प्राप्त ही इन क्षेत्रों में आ सकते है।”

जानकारी पाकर अलबेली के साथ–साथ पूरा अल्फा पैक चकित हो गया। खैर 3 दिन बाद आर्यमणि पूर्ण योजन कर चुका था और बाकी सब भी लौट आये। जाने से पहले अभिमन ने अमेया को गुप्त वर दिया और कहने लगे... “अमेया मेरी स्वघोषित पुत्री है, जिसे जल और पाताल लोक में कोई छू नही सकता।”... इसी घोषणा के साथ अल्फा पैक के सभी सदस्यों को नाभीमन और उसकी असंख्य नाग ने अपनी स्वेक्षा अपना लोग माना, और भेंट स्वरूप अपनी छवि सबने साझा किया। छोटी से भेंट थी जिसके चलते अब अल्फा पैक पाताल लोक कभी भी आ सकते थे। इस भेंट को स्वीकार कर अल्फा पैक आगे बढ़ा।

आर्यमणि के पाताल लोक छोड़ने से पहले नभिमन ने वादा किया की वह अपने पूरे समुदाय के साथ योजन पर बैठेगा, और चाहे जितने दिन लग जाये, टापू का पूरा भू भाग ऊपर कर देगा। वहां बसने वाले जीव फिर से अपनी जमीन पर होंगे न की पाताल में।

आर्यमणि धन्यवाद कहते हुये निकला। सभी ज्यों ही पाताल लोक के दरवाजे के बाहर आये, चहकिली शर्मिंदगी से अपना सर नीचे झुकाती... "मुझे सच में नही पता था कि महाराज आप लोगों को फसाने के लिये बुला रहे थे।"

रूही प्यार से चहकिली के बदन पर स्पर्श करती... "तुम क्यों उदास हुई, देखो अमेया भी बिलकुल शांत हो गयी"..

अलबेली:– तुम बहुत अच्छी हो चहकिली और अच्छे लोगो का फायदा अक्सर धूर्त लोग उठा लेते है। तुम अफसोस करना छोड़ दो...

थोड़ी बहुत बात चीत और ढेर सारा दिलासा देने के बाद, तब कही जाकर चहकिली चहकना शुरू की। महासागर की अनंत गहराई का सफर जारी रखते, ये लोग विजयदर्थ की राज्य सीमा में पहुंच गये। वुल्फ पैक प्रवेश द्वार पर खड़ा था और सामने का नजारा देख उनका मुंह खुला रह गया। दिमाग में एक ही बात आ रही थी, "क्या कोई विकसित देश यहां के 10% जितना भी विकसित है...

 

king cobra

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भाग:–160


वह दासी आर्यमणि के ओर पोटली बढ़ा दी और नभीमन किसी प्राचीन भाषा में एक मंत्र बोलकर, आर्यमणि को 5 बार उस मंत्र को पहले दोहराने कहा और बाद में वो पोटली लेने.… आर्यमणि भी 5 बार उस मंत्र को दोहराकर पोटली जैसे ही अपने हाथ में लिया, चारो ओर से उसे फन फैलाए सापों ने घेर लिया।

आर्यमणि:– हे शेषनाग वंशज नभीमन, हमे इस तरह से घेरने का मतलब।

नभीमन:– क्षमा करना, मैं एक और छल तो नही करना चाहता था, किंतु मैं विवश हूं। पाताल लोक की अनंत जिंदगी का तुम सब आनंद लो। मै न जाने कितने वर्षों से यहां के बाहर झांका तक नही परंतु श्राप का तुम्हारे ऊपर स्थानांतरण से अब मैं यहां की कैद से मुक्त हूं।

आर्यमणि:– तो क्या आप अपनी मुक्ति के लिये हम चारो के साथ अन्याय कर देंगे?

नभीमन:– एक बार मुझे ब्रह्मांड घूमकर वापस आने दो फिर मैं तुम्हे श्राप मुक्त कर दूंगा। मै वचन देता हूं।

आर्यमणि:– तुम्हारे भूत काल से लेकर वर्तमान तक, इन सब की जम्मेदारी मैं उठता हूं, यही अर्थ था ना उस 5 बार बोले मंत्र का...

रक्षक पत्थर लेने से पहले जो मंत्र आर्यमणि ने कहा था, उसी को रूपांतरित करके सुना दिया। जैसे ही आर्यमणि ने अपने शब्द कहे, नभीमन की आंखें फैल गई। वह मूर्छित होकर गिड़ गया। जैसे ही नभीमन मूर्छित होकर गिड़ा, अल्फा पैक के ऊपर चारो ओर से तरह–तरह के वार शुरू हो गये। कोई शर्प अग्नि छोड़ रहा था तो कोई विषैला जहर। हमला करने के अनगिनत तरीके वो शार्प जीव दिखा रहे थे, लेकिन कोई भी वार अल्फा पैक को छू नही पा रही थी।

सभी शर्प जीव आश्चर्य में थे। इतने भीषण हमले से तो एक पूरी क्षेत्र की आबादी ऐसे गायब होती जैसे पहले कभी अस्तित्व ही नही था, लेकिन ये चारो अपनी जगह खड़े थे। ये कमाल आर्यमणि का नही बल्कि नाभिमन का था। उसने अपनी जिम्मेदारी और साथ में रक्षक पत्थर दोनो आर्यमणि को सौंप चुका था। अब न तो नाभिमन पाताल लोक का राजा रह गया था और न ही उसका चोरी वाला रक्षक पत्थर उसके पास रहा। खुद की झोली खाली करके नाभिमन ने आर्यमणि को वह शक्तियां दे चुका था जिस वजह से पाताल लोक के हमले उसपर बेअसर था।

आर्यमणि अट्टहास से परिपूर्ण हंसी हंसते.… “तुम सब मूर्ख हो क्या? अब से मैं तुम्हारा राजा हूं। अभी–अभी तो नभीमन अपनी सारी जिम्मेदारी मुझ पर सौंप कर पता न बेहोश हुआ या मर गया।

नभीमन का भाई और पाताल लोक का सेनापति अभिमन.... “तू छलिया साधक हमारा राजा कभी नहीं बन सकता। तुझे हम अपनी सिद्धियों की शक्तियों से नही हरा सकते तो क्या, लेकिन भूल मत तू हमारे क्षेत्र में है और हम तुझे बाहुबल से परास्त कर देंगे।”

अभीमन अपनी बात कहकर जैसे ही हुंकार भरा, चारो सांपों के नीचे ढक गये। तभी उस माहोल में तेज गरज होने लगी। यह गरज इतनी ऊंची थी कि पूरा पाताल लोक दहल गया। और जब प्योर अल्फा के पैक ने टॉक्सिक रेंगते पंजों से हमला शुरू किया, तब उन जहरीले सपों को भी जहर दे रहे थे। वुल्फ पैक के पंजे, 5 फन वाले नाग के शरीर पर जहां भी लगता उस जगह पर पंजों के निशान छप जाते और वह सांप बेहोश होकर नीचे।

हर गुजरते पल के साथ अभीमन को अपने बाहुबल प्रयोग करने का अफसोस सा होने लगा। हजारों की झुंड में सांप कूदकर आते और उतनी ही तेजी के साथ पंजों का शिकार हो जाते। तभी पाताल लोक की भूमि पर रूही ने अपना पूरा पंजा ही थप से मार दिया। अनंत जड़ों के रेशे एक साथ निकले जो सांपों को इस कदर जकड़े की उनके प्राण हलख से बाहर आने को बेताब हो गये.…

नभीमन वहां किसी तरस उठ खड़ा हुआ और आर्यमणि के सामने हाथ जोड़ते... "सब रोक दीजिए। ये लोग बस अपने राजा को मूर्छित देख आवेश में आ गये थे।”

माहोल बिलकुल शांत हो गया था। जो शांप जहां थे, अपनी जगह पर रेशे में लिपटे थे। आर्यमणि, नभीमन के लिये जड़ों का आसन बनाया और दोनो सामने बैठ गये।.... “हे साधक आपको मेरे विषय में सब पहले से ज्ञात था।”...

आर्यमणि:– मैं सात्विक आश्रम के दोषियों के बारे में पढ़ रहा था और वहां सबसे पहला नाम तुम्हारा ही था।

नभीमन:– “हां, तुमने सही पढ़ा था। हजारों वर्ष पूर्व की ये कहानी है। मै अपने जवानी के दिनो मे था और नई–नई ताजपोशी हुई थी। पूरे ब्रह्मांड पर विजय पाने की इच्छा से निकला था। मुझे शक्ति का केंद्र स्थापित करना था। इसलिए हमने सबसे पहले उस ग्रह पर अपना साम्राज्य फैलाना ज्यादा उत्तम समझा जहां से हम अपनी शक्ति, तादात और नई सिद्धियों को बढ़ा सकते थे।”

“शक्ति स्वरूप एक ग्रह मिला नाम था जोरेन। ज़ोरेन ग्रह पर सभी ग्रहों के मिलन का प्रभाव सबसे अत्यधिक था। उस ग्रह पर ग्रहों के मिलन का प्रभाव इतना ज्यादा था कि वहां पैदा लेने वाला हर जीव अपनी इच्छा अनुसार अपने कोशिकाओं को पुनर्वयवस्थित कर किसी का भी आकार ले सकते थे। मेरा ये अर्ध–शर्प, अर्ध–इंसानी रूप वहीं की देन थी। ज़ोरेन ग्रह, पर जब हम पहुंचे तब वहां कोई सभ्यता ही नही थी। कुछ भटकते जीव थे जो किसी भी आकार के बन जाते थे।”

“वहां मुझे कोई युद्ध ही नही करना पड़ा। आराम से मैने वहां अपना समुदाय बसाया, नाम था निलभूत। बड़ा से क्षेत्र में भूमिगत शहर बसाया और शासन को चलाने के लिये एक महल। आखरी जहर, को वहां के गर्भ गृह में पहुंचाया, ताकि वह सबसे मजबूत शक्ति खंड हो, और वहीं से मैं पूरी शासन व्यवस्था देख सकूं। आखरी जहर के बारे में शायद तुम पहली बार सुन रहे होगे क्योंकि ये इतनी गोपनीय थी कि आज तक किसी महान महर्षि तक को इसका ज्ञान न हुआ। आखरी जहर का एक कतरा काफी है, मिलों फैले 10 लाख लोगों को मारने के लिये।”

“महल में शक्ति खंड का निर्माण के साथ ही मैंने अपने तीनो नागदंश को भी स्थापित किया। हमारे यहां जब राजा की ताजपोशी होते है तब उसे कुल 4 नागदंश मिलते है। बिना 4 नागदंश के कोई राजा नही बन सकता, यही नियम है। प्रत्येक नागदंश में बराबर शक्तियां होती है। एक नागदश राजा का, दूसरा नागदंश राजा के मुख्य सलाहकार का। एक नगदंश सेनापति का और एक नगदंश रानी का। चूंकि उस वक्त मेरी कोई रानी नहीं थी। न ही किसी को मैने मुख्य सलाहकार और सेनापति नियुक्त किया था। इसलिए तीनो नागदंश वहां स्थापित करने के बाद गर्भ गृह के ऊपर देवी का मंदिर और अंधेरा कमरा बनवाया ताकि मै पूरा केंद्र स्थापित कर सकूं। मै पूर्ण केंद्र की स्थापना कर चुका था और यहां से मुझे अपनी विजयी यात्रा की शुरवात करनी थी।”

“चूंकि मै पाताल लोक से काफी दूर निकल आया था और मणि की शक्ति कमजोर पड़ने के कारण युद्ध के लिये नही जा सकता था, इसलिए वापस पाताल लोक आना पड़ा। पाताल लोक की मणि ही इकलौती ऐसी चीज थी जिसे विस्थापित नही किया जा सकता था। किंतु हमारे खोजियों ने इसका भी कारगर उपाय ढूंढ निकाला था, रक्षक पत्थर। लाल रंग का यह रक्षक पत्थर अनोखा था। इस रक्षक पत्थर में मणि की शक्ति को कैद करके ब्रह्मांड के किसी भी कोने में ले जाया जा सकता था।”

“फिर क्या था, बल और अलौकिक सिद्धियों के दम पर मैने सात्त्विक गांव के गर्भ गृह से, रक्षक पत्थर को निकाल लाया। मुझे नही पता था कि वहां रक्षक पत्थर में जीवन के अनुकूल जीने योग्य जलवायु को संरक्षित करके रखा गया था, जो उस गांव में जीने का अनुकूल माहौल देता था। मै महर्षि गुरु वशिष्ठ के नाक के नीचे से पत्थर उठा तो लाया, किंतु पीछे ये देखना भूल गया की एक ही पल में उस गांव का वातावरण असीम ठंड वाला हो चुका था।”

“जबतक कुछ किया जाता वहां ठंड से 30 बच्चों की मृत्यु हो चुकी थी। महर्षि वशिष्ठ अत्यंत क्रोधित थे। वह पाताल लोक तक आये। न तो मुझे कुछ कहे न ही मृत्यु दण्ड दिया। बस पूरे नाग लोग को “कर्तव्य निर्वहन क्षेत्र विशेष” श्राप देकर चले गये। न तो वापस लौटे न ही किसी प्रकार का कोई समय अवधि दिया। बस तब से हम सब पाताल लोक में कैद होकर रह गये।”

“पाताल लोक के बड़े से भू–भाग पर अनंत अलौकिक जीव बसते थे। वह अलौकिक जीव को पालने हेतु बहुत से ऋषि अपने अनुयायियों को वहां भेजा करते थे। मैने पूरा भू–भाग पाताल लोक में विलीन करके केवल उतना ही क्षेत्र ऊपर रहने दिया जिसमे जलीय जीव प्रजनन कर सके, लेकिन फिर भी कोई ऋषि पाताल लोक के दरवाजे पर नही पहुंचा।”

“मेरी विडंबना तो देखो। 4 दंश जब तक मैं अपने उत्तराधिकारी को न दे दूं, तब तक कोई दूसरा राजा नही बन सकता। और मैं तो 3 दंश दूर ग्रह पर छोड़ आया जहां से मैं क्या कोई भी नाग वापस नहीं ला सकता। मैने गलती की और मेरी गलती की सजा पूरा नाग लोक उठा रहा है। मुझ जैसे पापी राजा से इनको छुटकारा नही मिल रहा।”

“मैने वैसे छल से तुम्हे फसाया जरूर था पर मैं यहां से सीधा ज़ोरेन की सीमा में जाता और अपना नाग दंश वापस लेकर चला आता। फिर मैं नए उत्तराधिकारी के हाथ ने ये पूरा पाताल लोक सौंपकर कुछ वर्ष तक अलौकिक जीव की सेवा करने के उपरांत इच्छा मृत्यु ले लेता।

आर्यमणि:– मैं तुम्हारा श्राप तो मिटा नहीं सकता, क्योंकि महर्षि वशिष्ठ ने 8 जिंदगी को साक्षी रखकर वह श्राप दिया था, जिनमे से अब एक भी जीवित नहीं है। इसलिए कोई भी नाग अब नाग लोक नही छोड़ सकता। लेकिन हां 3 दिन के सिद्धि योजन से मैं उस नियम में फेर बदल जरूर कर सकता हूं जो अगले राजा बनने में बाधक है।

नभीमन:– क्या ऐसा कोई उपाय है?

आर्यमणि:– हां ऐसा एक उपाय है भी और जो सबसे जरूर चीज चाहिए होती है नाग मणि, वह भी हमारे पास है।

नभीमन:– तो क्या कृपाण की नागमणि सात्त्विक आश्रम के पास है?

आर्यमणि:– ये कृपाण कौन है...

नाभिम:– इक्छाधारी नाग का प्रथम साधक। वह इंसान जिसने साधना से ईश्वर को प्रसन्न किया और बदले में उसे इच्छाधारी नाग का वर मिला था। वैसे तो हर इच्छाधारी नाग के पास अपना मणि होती है, किंतु वह काल्पनिक मणि होता है जो इक्छाधारी नाग के विघटन के साथ ही समाप्त हो जाता है। यदि सात्त्विक आश्रम के पास मणि है तो वह कृपाण की ही मणि होगी।

आर्यमणि:– ऐसा क्यों? किसी दूसरे इक्छाधारी नाग की मणि क्यों नही हो सकती?

नाभिमन का भाई अभिमन.... “भैया इसे कुछ मत बताना, जब तक की ये हमे न बता दे की आपका श्राप इसपर स्थानांतरित क्यों नही हुआ?

आर्यमणि:– क्यों वो श्राप मुझ पर स्थानांतरित करने पर लगे हो। तुम में से कोई भी ये श्राप लेलो....

नाभीमन:– पूरा नाग लोक की प्रजाति ही शापित है, तो किसका श्राप किस पर स्थानांतरित कर दूं। और अभिमन तुम अब भी नही समझे। ये सात्विक आश्रम के गुरु है। सात्विक आश्रम की कोई संपत्ति जब वापस से उनके गुरु के हाथ में गयी, तो वो चोरी कैसे हुई। इसलिए श्राप इन पर स्थानांतरित नही हुआ।

अभिमन:– माफ करना गुरुदेव। हम सब अपनी व्यथा में एक बार फिर भूल कर गये। हमे समझना चाहिए था इस दरवाजे तक कोई मामूली इंसान थोड़े ना आ सकता है। बस नर–भेड़िया ने हमे दुविधा में डाल दिया था। हमे लगा एक भेड़िया कहां से सिद्ध प्राप्त करेगा। और यदि सिद्ध प्राप्त भी हो तो कहां सात्विक आश्रम से जुड़ा होगा।

आर्यमणि:– अब मेरे भी सवाल का जवाब दे दो। किसी दूसरे इक्छाधारी नाग की मणि क्यों नही हो सकती...

नभीमन:– क्योंकि मणि के बिना इक्छाधारी नाग इक्छाधरी नही रह जायेगा। 2 दिन उन्हे नागमणि नही मिला, तब वो या तो नाग बन जाते हैं या इंसान। दोनो ही सूरत में वो इक्छाधारी नही रहते और मणि विलुप्त।

आर्यमणि:– और वो कृपाण की मणि।

नभीमन:– वह मणि पाताल लोक के मणि जैसा ही है। बस वह बहुत छोटे प्रारूप में है और यहां उस मणि का पूर्ण विकसित रूप है। गुरुदेव उस मणि का राज न खुलने पाए वरना पृथ्वी पर कई मुर्दे उस मणि को लेने के लिये जमीन से बाहर आ जायेंगे। और वह मणि ऐसा है की मुर्दों को भी मौत दे दे।

आर्यमणि:– ये बात मैं ध्यान रखूंगा। वैसे हमने बहुत सी जानकारी साझा कर ली। अब उस काम को भी कर ले, जिस से पाताल लोक अपना नया राजा देखेगा।

नभीमन:– हां वो काम आप कीजिए जबतक एक जिज्ञासा जो मेरे दरवाजे पर खड़ी है, क्या मैं आपके साथियों के साथ उसे भी पाताल लोक की सैर करवा दूं।

आर्यमणि, दूर नजर दिया। पता चला पाताल लोक का दरवाजा हर जगह से दिखता है। आर्यमणि इसके जवाब में रूही के ओर देखा। रूही मुस्कुराकर हां में जवाब दी और चाहकीली को अंदर बुलाया गया। राजा नाभिमन ने भी जब पहली बार अमेया को गोद में लिया, उन्होंने लगभग एक घंटे तक अपनी आंखें ही नही खोली, और जब आंखें खोली तब चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान थी।

नभीमन:– इस शांति वाहक देवीतुल्य का नाम क्या है।

रूही:– अमेया...

नभिमन:– मेरे हजारों वर्षों की अशांति को इसने थोड़े से समय में ही दूर कर दिया। मृत्यु के उपरांत जो सुकून प्राप्त होती है, ठीक वैसा ही सुकून था। अभिमन एक बार तुम भी देवीतुल्य अमेय को हृदय से लगाकर देखो...

अपने भाई के कहने पर अभिमन ने भी अमेया को सीने से लगाया। वह भी आश्चर्य में था। उसने वो सुकून को पाया जो उसे जीवन में पहले कभी नहीं मिली थी और न ही कभी ऐसे सुकून की कल्पना उसने किया था। फिर तो सभी शेषनाग एक श्रेणी में बंध गये और जैसे ही नभीमन ने अपनी प्रजा में एक साथ सकून को बांटा, पूरी प्रजा ही गदगद हो चुकी थी।

बड़े धूम से और बड़ा सा काफिला अल्फा पैक को पाताल लोक घूमाने निकला। पौराणिक अलौकिक जीव जैसे बारासिंघा, गरुड़, नील गाय, एकश्रिंगी श्वेत अश्व, कामधेनु गाय, ऐरावत हाथी, अनोखे पंछियों को देखने का मिला। वहीं पाताल लोक के एक हिस्से से गुजरते हुये सबको भयानक काल जीव भी दिख रहे थे। सोच से परे उनका आकार और देखने में उतने ही डरावने। लगभग 40 ऐसी भीषणकारी प्रजाति पाताल लोक में निवास करती थी, जिसे उग्र देख प्राण वैसे ही छूट जाये।

3 दिनो तक आर्यमणि अपने योजन में लगा रहा और इन 3 दिनो में अल्फा पैक ने पाताल लोक का पूरा लुफ्त उठाया। लौटते वक्त तो अलबेली ने पूछ भी लिया की क्या हमने पाताल लोक पूरा घूम लिया? इसपर नभीमन ने हंसते हुये बताया... “पाताल लोक अनंत है, इसकी कोई सीमा नहीं। यह अलौकिक रूप से ब्रह्मांड के कई हिस्सों से जुड़ा है, लेकिन यह पूरा भू–भाग सदैव धरातल के नीचे होता है और इसके कुल 6 दरवाजे है, जो 6 अलग–अलग हिस्सों में है। हर 6 दरवाजे पर हजारों किलोमीटर का ऊपरी भू–भाग होता है, जहां पाताल लोक के जीव अक्सर विचरते है। यहां आम या खास किसी के भी आने की अनुमति नही, केवल सिद्ध प्राप्त ही इन क्षेत्रों में आ सकते है।”

जानकारी पाकर अलबेली के साथ–साथ पूरा अल्फा पैक चकित हो गया। खैर 3 दिन बाद आर्यमणि पूर्ण योजन कर चुका था और बाकी सब भी लौट आये। जाने से पहले अभिमन ने अमेया को गुप्त वर दिया और कहने लगे... “अमेया मेरी स्वघोषित पुत्री है, जिसे जल और पाताल लोक में कोई छू नही सकता।”... इसी घोषणा के साथ अल्फा पैक के सभी सदस्यों को नाभीमन और उसकी असंख्य नाग ने अपनी स्वेक्षा अपना लोग माना, और भेंट स्वरूप अपनी छवि सबने साझा किया। छोटी से भेंट थी जिसके चलते अब अल्फा पैक पाताल लोक कभी भी आ सकते थे। इस भेंट को स्वीकार कर अल्फा पैक आगे बढ़ा।

आर्यमणि के पाताल लोक छोड़ने से पहले नभिमन ने वादा किया की वह अपने पूरे समुदाय के साथ योजन पर बैठेगा, और चाहे जितने दिन लग जाये, टापू का पूरा भू भाग ऊपर कर देगा। वहां बसने वाले जीव फिर से अपनी जमीन पर होंगे न की पाताल में।

आर्यमणि धन्यवाद कहते हुये निकला। सभी ज्यों ही पाताल लोक के दरवाजे के बाहर आये, चहकिली शर्मिंदगी से अपना सर नीचे झुकाती... "मुझे सच में नही पता था कि महाराज आप लोगों को फसाने के लिये बुला रहे थे।"

रूही प्यार से चहकिली के बदन पर स्पर्श करती... "तुम क्यों उदास हुई, देखो अमेया भी बिलकुल शांत हो गयी"..

अलबेली:– तुम बहुत अच्छी हो चहकिली और अच्छे लोगो का फायदा अक्सर धूर्त लोग उठा लेते है। तुम अफसोस करना छोड़ दो...

थोड़ी बहुत बात चीत और ढेर सारा दिलासा देने के बाद, तब कही जाकर चहकिली चहकना शुरू की। महासागर की अनंत गहराई का सफर जारी रखते, ये लोग विजयदर्थ की राज्य सीमा में पहुंच गये। वुल्फ पैक प्रवेश द्वार पर खड़ा था और सामने का नजारा देख उनका मुंह खुला रह गया। दिमाग में एक ही बात आ रही थी, "क्या कोई विकसित देश यहां के 10% जितना भी विकसित है...

superb update Ameya me to bahut sari super power aa chuki hain meko lagta hai naagraaj ke chal se sab nikal aaye ab fir se nayjo ki gand todni hai
 

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I love Fantasy and Sci-fiction story.
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भाग:–160


वह दासी आर्यमणि के ओर पोटली बढ़ा दी और नभीमन किसी प्राचीन भाषा में एक मंत्र बोलकर, आर्यमणि को 5 बार उस मंत्र को पहले दोहराने कहा और बाद में वो पोटली लेने.… आर्यमणि भी 5 बार उस मंत्र को दोहराकर पोटली जैसे ही अपने हाथ में लिया, चारो ओर से उसे फन फैलाए सापों ने घेर लिया।

आर्यमणि:– हे शेषनाग वंशज नभीमन, हमे इस तरह से घेरने का मतलब।

नभीमन:– क्षमा करना, मैं एक और छल तो नही करना चाहता था, किंतु मैं विवश हूं। पाताल लोक की अनंत जिंदगी का तुम सब आनंद लो। मै न जाने कितने वर्षों से यहां के बाहर झांका तक नही परंतु श्राप का तुम्हारे ऊपर स्थानांतरण से अब मैं यहां की कैद से मुक्त हूं।

आर्यमणि:– तो क्या आप अपनी मुक्ति के लिये हम चारो के साथ अन्याय कर देंगे?

नभीमन:– एक बार मुझे ब्रह्मांड घूमकर वापस आने दो फिर मैं तुम्हे श्राप मुक्त कर दूंगा। मै वचन देता हूं।

आर्यमणि:– तुम्हारे भूत काल से लेकर वर्तमान तक, इन सब की जम्मेदारी मैं उठता हूं, यही अर्थ था ना उस 5 बार बोले मंत्र का...

रक्षक पत्थर लेने से पहले जो मंत्र आर्यमणि ने कहा था, उसी को रूपांतरित करके सुना दिया। जैसे ही आर्यमणि ने अपने शब्द कहे, नभीमन की आंखें फैल गई। वह मूर्छित होकर गिड़ गया। जैसे ही नभीमन मूर्छित होकर गिड़ा, अल्फा पैक के ऊपर चारो ओर से तरह–तरह के वार शुरू हो गये। कोई शर्प अग्नि छोड़ रहा था तो कोई विषैला जहर। हमला करने के अनगिनत तरीके वो शार्प जीव दिखा रहे थे, लेकिन कोई भी वार अल्फा पैक को छू नही पा रही थी।

सभी शर्प जीव आश्चर्य में थे। इतने भीषण हमले से तो एक पूरी क्षेत्र की आबादी ऐसे गायब होती जैसे पहले कभी अस्तित्व ही नही था, लेकिन ये चारो अपनी जगह खड़े थे। ये कमाल आर्यमणि का नही बल्कि नाभिमन का था। उसने अपनी जिम्मेदारी और साथ में रक्षक पत्थर दोनो आर्यमणि को सौंप चुका था। अब न तो नाभिमन पाताल लोक का राजा रह गया था और न ही उसका चोरी वाला रक्षक पत्थर उसके पास रहा। खुद की झोली खाली करके नाभिमन ने आर्यमणि को वह शक्तियां दे चुका था जिस वजह से पाताल लोक के हमले उसपर बेअसर था।

आर्यमणि अट्टहास से परिपूर्ण हंसी हंसते.… “तुम सब मूर्ख हो क्या? अब से मैं तुम्हारा राजा हूं। अभी–अभी तो नभीमन अपनी सारी जिम्मेदारी मुझ पर सौंप कर पता न बेहोश हुआ या मर गया।

नभीमन का भाई और पाताल लोक का सेनापति अभिमन.... “तू छलिया साधक हमारा राजा कभी नहीं बन सकता। तुझे हम अपनी सिद्धियों की शक्तियों से नही हरा सकते तो क्या, लेकिन भूल मत तू हमारे क्षेत्र में है और हम तुझे बाहुबल से परास्त कर देंगे।”

अभीमन अपनी बात कहकर जैसे ही हुंकार भरा, चारो सांपों के नीचे ढक गये। तभी उस माहोल में तेज गरज होने लगी। यह गरज इतनी ऊंची थी कि पूरा पाताल लोक दहल गया। और जब प्योर अल्फा के पैक ने टॉक्सिक रेंगते पंजों से हमला शुरू किया, तब उन जहरीले सपों को भी जहर दे रहे थे। वुल्फ पैक के पंजे, 5 फन वाले नाग के शरीर पर जहां भी लगता उस जगह पर पंजों के निशान छप जाते और वह सांप बेहोश होकर नीचे।

हर गुजरते पल के साथ अभीमन को अपने बाहुबल प्रयोग करने का अफसोस सा होने लगा। हजारों की झुंड में सांप कूदकर आते और उतनी ही तेजी के साथ पंजों का शिकार हो जाते। तभी पाताल लोक की भूमि पर रूही ने अपना पूरा पंजा ही थप से मार दिया। अनंत जड़ों के रेशे एक साथ निकले जो सांपों को इस कदर जकड़े की उनके प्राण हलख से बाहर आने को बेताब हो गये.…

नभीमन वहां किसी तरस उठ खड़ा हुआ और आर्यमणि के सामने हाथ जोड़ते... "सब रोक दीजिए। ये लोग बस अपने राजा को मूर्छित देख आवेश में आ गये थे।”

माहोल बिलकुल शांत हो गया था। जो शांप जहां थे, अपनी जगह पर रेशे में लिपटे थे। आर्यमणि, नभीमन के लिये जड़ों का आसन बनाया और दोनो सामने बैठ गये।.... “हे साधक आपको मेरे विषय में सब पहले से ज्ञात था।”...

आर्यमणि:– मैं सात्विक आश्रम के दोषियों के बारे में पढ़ रहा था और वहां सबसे पहला नाम तुम्हारा ही था।

नभीमन:– “हां, तुमने सही पढ़ा था। हजारों वर्ष पूर्व की ये कहानी है। मै अपने जवानी के दिनो मे था और नई–नई ताजपोशी हुई थी। पूरे ब्रह्मांड पर विजय पाने की इच्छा से निकला था। मुझे शक्ति का केंद्र स्थापित करना था। इसलिए हमने सबसे पहले उस ग्रह पर अपना साम्राज्य फैलाना ज्यादा उत्तम समझा जहां से हम अपनी शक्ति, तादात और नई सिद्धियों को बढ़ा सकते थे।”

“शक्ति स्वरूप एक ग्रह मिला नाम था जोरेन। ज़ोरेन ग्रह पर सभी ग्रहों के मिलन का प्रभाव सबसे अत्यधिक था। उस ग्रह पर ग्रहों के मिलन का प्रभाव इतना ज्यादा था कि वहां पैदा लेने वाला हर जीव अपनी इच्छा अनुसार अपने कोशिकाओं को पुनर्वयवस्थित कर किसी का भी आकार ले सकते थे। मेरा ये अर्ध–शर्प, अर्ध–इंसानी रूप वहीं की देन थी। ज़ोरेन ग्रह, पर जब हम पहुंचे तब वहां कोई सभ्यता ही नही थी। कुछ भटकते जीव थे जो किसी भी आकार के बन जाते थे।”

“वहां मुझे कोई युद्ध ही नही करना पड़ा। आराम से मैने वहां अपना समुदाय बसाया, नाम था निलभूत। बड़ा से क्षेत्र में भूमिगत शहर बसाया और शासन को चलाने के लिये एक महल। आखरी जहर, को वहां के गर्भ गृह में पहुंचाया, ताकि वह सबसे मजबूत शक्ति खंड हो, और वहीं से मैं पूरी शासन व्यवस्था देख सकूं। आखरी जहर के बारे में शायद तुम पहली बार सुन रहे होगे क्योंकि ये इतनी गोपनीय थी कि आज तक किसी महान महर्षि तक को इसका ज्ञान न हुआ। आखरी जहर का एक कतरा काफी है, मिलों फैले 10 लाख लोगों को मारने के लिये।”

“महल में शक्ति खंड का निर्माण के साथ ही मैंने अपने तीनो नागदंश को भी स्थापित किया। हमारे यहां जब राजा की ताजपोशी होते है तब उसे कुल 4 नागदंश मिलते है। बिना 4 नागदंश के कोई राजा नही बन सकता, यही नियम है। प्रत्येक नागदंश में बराबर शक्तियां होती है। एक नागदश राजा का, दूसरा नागदंश राजा के मुख्य सलाहकार का। एक नगदंश सेनापति का और एक नगदंश रानी का। चूंकि उस वक्त मेरी कोई रानी नहीं थी। न ही किसी को मैने मुख्य सलाहकार और सेनापति नियुक्त किया था। इसलिए तीनो नागदंश वहां स्थापित करने के बाद गर्भ गृह के ऊपर देवी का मंदिर और अंधेरा कमरा बनवाया ताकि मै पूरा केंद्र स्थापित कर सकूं। मै पूर्ण केंद्र की स्थापना कर चुका था और यहां से मुझे अपनी विजयी यात्रा की शुरवात करनी थी।”

“चूंकि मै पाताल लोक से काफी दूर निकल आया था और मणि की शक्ति कमजोर पड़ने के कारण युद्ध के लिये नही जा सकता था, इसलिए वापस पाताल लोक आना पड़ा। पाताल लोक की मणि ही इकलौती ऐसी चीज थी जिसे विस्थापित नही किया जा सकता था। किंतु हमारे खोजियों ने इसका भी कारगर उपाय ढूंढ निकाला था, रक्षक पत्थर। लाल रंग का यह रक्षक पत्थर अनोखा था। इस रक्षक पत्थर में मणि की शक्ति को कैद करके ब्रह्मांड के किसी भी कोने में ले जाया जा सकता था।”

“फिर क्या था, बल और अलौकिक सिद्धियों के दम पर मैने सात्त्विक गांव के गर्भ गृह से, रक्षक पत्थर को निकाल लाया। मुझे नही पता था कि वहां रक्षक पत्थर में जीवन के अनुकूल जीने योग्य जलवायु को संरक्षित करके रखा गया था, जो उस गांव में जीने का अनुकूल माहौल देता था। मै महर्षि गुरु वशिष्ठ के नाक के नीचे से पत्थर उठा तो लाया, किंतु पीछे ये देखना भूल गया की एक ही पल में उस गांव का वातावरण असीम ठंड वाला हो चुका था।”

“जबतक कुछ किया जाता वहां ठंड से 30 बच्चों की मृत्यु हो चुकी थी। महर्षि वशिष्ठ अत्यंत क्रोधित थे। वह पाताल लोक तक आये। न तो मुझे कुछ कहे न ही मृत्यु दण्ड दिया। बस पूरे नाग लोग को “कर्तव्य निर्वहन क्षेत्र विशेष” श्राप देकर चले गये। न तो वापस लौटे न ही किसी प्रकार का कोई समय अवधि दिया। बस तब से हम सब पाताल लोक में कैद होकर रह गये।”

“पाताल लोक के बड़े से भू–भाग पर अनंत अलौकिक जीव बसते थे। वह अलौकिक जीव को पालने हेतु बहुत से ऋषि अपने अनुयायियों को वहां भेजा करते थे। मैने पूरा भू–भाग पाताल लोक में विलीन करके केवल उतना ही क्षेत्र ऊपर रहने दिया जिसमे जलीय जीव प्रजनन कर सके, लेकिन फिर भी कोई ऋषि पाताल लोक के दरवाजे पर नही पहुंचा।”

“मेरी विडंबना तो देखो। 4 दंश जब तक मैं अपने उत्तराधिकारी को न दे दूं, तब तक कोई दूसरा राजा नही बन सकता। और मैं तो 3 दंश दूर ग्रह पर छोड़ आया जहां से मैं क्या कोई भी नाग वापस नहीं ला सकता। मैने गलती की और मेरी गलती की सजा पूरा नाग लोक उठा रहा है। मुझ जैसे पापी राजा से इनको छुटकारा नही मिल रहा।”

“मैने वैसे छल से तुम्हे फसाया जरूर था पर मैं यहां से सीधा ज़ोरेन की सीमा में जाता और अपना नाग दंश वापस लेकर चला आता। फिर मैं नए उत्तराधिकारी के हाथ ने ये पूरा पाताल लोक सौंपकर कुछ वर्ष तक अलौकिक जीव की सेवा करने के उपरांत इच्छा मृत्यु ले लेता।

आर्यमणि:– मैं तुम्हारा श्राप तो मिटा नहीं सकता, क्योंकि महर्षि वशिष्ठ ने 8 जिंदगी को साक्षी रखकर वह श्राप दिया था, जिनमे से अब एक भी जीवित नहीं है। इसलिए कोई भी नाग अब नाग लोक नही छोड़ सकता। लेकिन हां 3 दिन के सिद्धि योजन से मैं उस नियम में फेर बदल जरूर कर सकता हूं जो अगले राजा बनने में बाधक है।

नभीमन:– क्या ऐसा कोई उपाय है?

आर्यमणि:– हां ऐसा एक उपाय है भी और जो सबसे जरूर चीज चाहिए होती है नाग मणि, वह भी हमारे पास है।

नभीमन:– तो क्या कृपाण की नागमणि सात्त्विक आश्रम के पास है?

आर्यमणि:– ये कृपाण कौन है...

नाभिम:– इक्छाधारी नाग का प्रथम साधक। वह इंसान जिसने साधना से ईश्वर को प्रसन्न किया और बदले में उसे इच्छाधारी नाग का वर मिला था। वैसे तो हर इच्छाधारी नाग के पास अपना मणि होती है, किंतु वह काल्पनिक मणि होता है जो इक्छाधारी नाग के विघटन के साथ ही समाप्त हो जाता है। यदि सात्त्विक आश्रम के पास मणि है तो वह कृपाण की ही मणि होगी।

आर्यमणि:– ऐसा क्यों? किसी दूसरे इक्छाधारी नाग की मणि क्यों नही हो सकती?

नाभिमन का भाई अभिमन.... “भैया इसे कुछ मत बताना, जब तक की ये हमे न बता दे की आपका श्राप इसपर स्थानांतरित क्यों नही हुआ?

आर्यमणि:– क्यों वो श्राप मुझ पर स्थानांतरित करने पर लगे हो। तुम में से कोई भी ये श्राप लेलो....

नाभीमन:– पूरा नाग लोक की प्रजाति ही शापित है, तो किसका श्राप किस पर स्थानांतरित कर दूं। और अभिमन तुम अब भी नही समझे। ये सात्विक आश्रम के गुरु है। सात्विक आश्रम की कोई संपत्ति जब वापस से उनके गुरु के हाथ में गयी, तो वो चोरी कैसे हुई। इसलिए श्राप इन पर स्थानांतरित नही हुआ।

अभिमन:– माफ करना गुरुदेव। हम सब अपनी व्यथा में एक बार फिर भूल कर गये। हमे समझना चाहिए था इस दरवाजे तक कोई मामूली इंसान थोड़े ना आ सकता है। बस नर–भेड़िया ने हमे दुविधा में डाल दिया था। हमे लगा एक भेड़िया कहां से सिद्ध प्राप्त करेगा। और यदि सिद्ध प्राप्त भी हो तो कहां सात्विक आश्रम से जुड़ा होगा।

आर्यमणि:– अब मेरे भी सवाल का जवाब दे दो। किसी दूसरे इक्छाधारी नाग की मणि क्यों नही हो सकती...

नभीमन:– क्योंकि मणि के बिना इक्छाधारी नाग इक्छाधरी नही रह जायेगा। 2 दिन उन्हे नागमणि नही मिला, तब वो या तो नाग बन जाते हैं या इंसान। दोनो ही सूरत में वो इक्छाधारी नही रहते और मणि विलुप्त।

आर्यमणि:– और वो कृपाण की मणि।

नभीमन:– वह मणि पाताल लोक के मणि जैसा ही है। बस वह बहुत छोटे प्रारूप में है और यहां उस मणि का पूर्ण विकसित रूप है। गुरुदेव उस मणि का राज न खुलने पाए वरना पृथ्वी पर कई मुर्दे उस मणि को लेने के लिये जमीन से बाहर आ जायेंगे। और वह मणि ऐसा है की मुर्दों को भी मौत दे दे।

आर्यमणि:– ये बात मैं ध्यान रखूंगा। वैसे हमने बहुत सी जानकारी साझा कर ली। अब उस काम को भी कर ले, जिस से पाताल लोक अपना नया राजा देखेगा।

नभीमन:– हां वो काम आप कीजिए जबतक एक जिज्ञासा जो मेरे दरवाजे पर खड़ी है, क्या मैं आपके साथियों के साथ उसे भी पाताल लोक की सैर करवा दूं।

आर्यमणि, दूर नजर दिया। पता चला पाताल लोक का दरवाजा हर जगह से दिखता है। आर्यमणि इसके जवाब में रूही के ओर देखा। रूही मुस्कुराकर हां में जवाब दी और चाहकीली को अंदर बुलाया गया। राजा नाभिमन ने भी जब पहली बार अमेया को गोद में लिया, उन्होंने लगभग एक घंटे तक अपनी आंखें ही नही खोली, और जब आंखें खोली तब चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान थी।

नभीमन:– इस शांति वाहक देवीतुल्य का नाम क्या है।

रूही:– अमेया...

नभिमन:– मेरे हजारों वर्षों की अशांति को इसने थोड़े से समय में ही दूर कर दिया। मृत्यु के उपरांत जो सुकून प्राप्त होती है, ठीक वैसा ही सुकून था। अभिमन एक बार तुम भी देवीतुल्य अमेय को हृदय से लगाकर देखो...

अपने भाई के कहने पर अभिमन ने भी अमेया को सीने से लगाया। वह भी आश्चर्य में था। उसने वो सुकून को पाया जो उसे जीवन में पहले कभी नहीं मिली थी और न ही कभी ऐसे सुकून की कल्पना उसने किया था। फिर तो सभी शेषनाग एक श्रेणी में बंध गये और जैसे ही नभीमन ने अपनी प्रजा में एक साथ सकून को बांटा, पूरी प्रजा ही गदगद हो चुकी थी।

बड़े धूम से और बड़ा सा काफिला अल्फा पैक को पाताल लोक घूमाने निकला। पौराणिक अलौकिक जीव जैसे बारासिंघा, गरुड़, नील गाय, एकश्रिंगी श्वेत अश्व, कामधेनु गाय, ऐरावत हाथी, अनोखे पंछियों को देखने का मिला। वहीं पाताल लोक के एक हिस्से से गुजरते हुये सबको भयानक काल जीव भी दिख रहे थे। सोच से परे उनका आकार और देखने में उतने ही डरावने। लगभग 40 ऐसी भीषणकारी प्रजाति पाताल लोक में निवास करती थी, जिसे उग्र देख प्राण वैसे ही छूट जाये।

3 दिनो तक आर्यमणि अपने योजन में लगा रहा और इन 3 दिनो में अल्फा पैक ने पाताल लोक का पूरा लुफ्त उठाया। लौटते वक्त तो अलबेली ने पूछ भी लिया की क्या हमने पाताल लोक पूरा घूम लिया? इसपर नभीमन ने हंसते हुये बताया... “पाताल लोक अनंत है, इसकी कोई सीमा नहीं। यह अलौकिक रूप से ब्रह्मांड के कई हिस्सों से जुड़ा है, लेकिन यह पूरा भू–भाग सदैव धरातल के नीचे होता है और इसके कुल 6 दरवाजे है, जो 6 अलग–अलग हिस्सों में है। हर 6 दरवाजे पर हजारों किलोमीटर का ऊपरी भू–भाग होता है, जहां पाताल लोक के जीव अक्सर विचरते है। यहां आम या खास किसी के भी आने की अनुमति नही, केवल सिद्ध प्राप्त ही इन क्षेत्रों में आ सकते है।”

जानकारी पाकर अलबेली के साथ–साथ पूरा अल्फा पैक चकित हो गया। खैर 3 दिन बाद आर्यमणि पूर्ण योजन कर चुका था और बाकी सब भी लौट आये। जाने से पहले अभिमन ने अमेया को गुप्त वर दिया और कहने लगे... “अमेया मेरी स्वघोषित पुत्री है, जिसे जल और पाताल लोक में कोई छू नही सकता।”... इसी घोषणा के साथ अल्फा पैक के सभी सदस्यों को नाभीमन और उसकी असंख्य नाग ने अपनी स्वेक्षा अपना लोग माना, और भेंट स्वरूप अपनी छवि सबने साझा किया। छोटी से भेंट थी जिसके चलते अब अल्फा पैक पाताल लोक कभी भी आ सकते थे। इस भेंट को स्वीकार कर अल्फा पैक आगे बढ़ा।

आर्यमणि के पाताल लोक छोड़ने से पहले नभिमन ने वादा किया की वह अपने पूरे समुदाय के साथ योजन पर बैठेगा, और चाहे जितने दिन लग जाये, टापू का पूरा भू भाग ऊपर कर देगा। वहां बसने वाले जीव फिर से अपनी जमीन पर होंगे न की पाताल में।

आर्यमणि धन्यवाद कहते हुये निकला। सभी ज्यों ही पाताल लोक के दरवाजे के बाहर आये, चहकिली शर्मिंदगी से अपना सर नीचे झुकाती... "मुझे सच में नही पता था कि महाराज आप लोगों को फसाने के लिये बुला रहे थे।"

रूही प्यार से चहकिली के बदन पर स्पर्श करती... "तुम क्यों उदास हुई, देखो अमेया भी बिलकुल शांत हो गयी"..

अलबेली:– तुम बहुत अच्छी हो चहकिली और अच्छे लोगो का फायदा अक्सर धूर्त लोग उठा लेते है। तुम अफसोस करना छोड़ दो...

थोड़ी बहुत बात चीत और ढेर सारा दिलासा देने के बाद, तब कही जाकर चहकिली चहकना शुरू की। महासागर की अनंत गहराई का सफर जारी रखते, ये लोग विजयदर्थ की राज्य सीमा में पहुंच गये। वुल्फ पैक प्रवेश द्वार पर खड़ा था और सामने का नजारा देख उनका मुंह खुला रह गया। दिमाग में एक ही बात आ रही थी, "क्या कोई विकसित देश यहां के 10% जितना भी विकसित है...
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Arvind Sharma

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CFL7897

Be lazy
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Wo bhai....kya hi raz khola hai

Nilbhuti samuday ki utpati yehi se hui thi..
Khair patal lok k raza ko bhi pyar se unke shrap se mukt karne ka tarika bata diya..

Shandar raha bhai
 

Akil

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SANJU ( V. R. ) Ankitarani andyking302 komaalrani Casinar
Aaj phir se readers ka dil tod diya nain11ster unkil ne... Nischal aur hella ko out kar diya story se.. Ye kaisa anyaay hai,😭😭 julm ki had paar kar di .. Please aap paancho nainu unkil ko samajhaiye ki without nischal hella puri xf fiki hai😞
Without Nishchhal aur Hella toh na but without bhola Nishchhal and tharki Jiviya zaroor fiqi hai 😁😆
 

krish1152

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krish1152

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भाग:–159


रूही, अलबेली और इवान, यह आवाज सुनकर चौंक गये। उन्हे लग रहा था की उनका दम घुट जायेगा, लेकिन मुंह और नाक से घुसता हुआ पानी कान के पीछे से निकल रहा था और वहीं से श्वांस भी ले रहे थे। तीनो मुंह खोलकर कुछ बोलने की कोशिश कर रहे थे लेकिन किसी की आवाज नही निकल रही थी... "अरे शांत हो जाओ और आर्यमणि चाचू से पूछो कैसे बात करना है।"..

तीनो ही आर्यमणि के ओर देखकर फिर से मुंह खोले और हाथ से सवालिया इशारा करने लगे... "अरे जो भी कहना है अपने मन में कहो... पानी में ऐसे ही बात होगी। और ये आवाज चहकिली की है। इसके दर्द के साथ हमने इसकी भाषा को भी अपने अंदर समा लिया था।"

रूही:– चहकिली पानी में मेरी बच्ची को मत रखो। अभी वो मात्र 7 दिन की ही तो है...

चहकिली:– अरे वो बड़बोली महाती ने आप सबको अब ठीक वैसा प्राणी बना दिया जैसा हम सब है। समझिए अब आप सब भी पानी के इंसान हुये। अब भला मछली के बच्चे को पानी से कैसा खतरा होगा...

रूही:– लेकिन मेरी अमेया..

चहकिली:– मतलब मैं अपनी प्यारी बहन को तकलीफ पहुंचाऊंगी... ये तो मेरी प्यारी है... आप देखो तो कितनी खुश है वो... उसकी चहकती किलकारी मेरे कानो में आ रही है... आप सब भी शांत रहो तो सुन सकते है..

सभी शांत हो गये। और जब शांत हुए तब वो सब भी अमेया की आवाज सुन सकते थे। सबके चेहरे पर मुस्कान फैल गई। सभी अमेया को ही देख रहे थे।

आर्यमणि:– चहकिली हम जा कहां रहे हैं?

चहकिली:– बहुत लंबा सफर होने वाला है इसलिए बस अपने आस पास के मनमोहक नजरों का मजा लीजिए और ये हम आ गये है शार्क की बस्ती में...

"शार्क"… ”शार्क”… ”शार्क”… रूही, अलबेली, इवान तीनो एक साथ चौंकते हुए कहने लगे...

आर्यमणि:– इनसे हमें कोई खतरा अलबेली...

चहकिली:– आप भूल रहे है कि आप लोग एक सोधक के साथ है। आपको विजयदर्थ और उसकी सेना से खतरा नही, फिर तो उनके सामने इनका कोई वजूद ही नही। आप खुदको पानी का इंसान मानिए.. जो आप वहां ऊपर कर सकते है वही यहां भी... इसलिए चिंता को मरिए गोली...

अलबेली:– चहकिली, विजयदर्थ भी जब तुम्हारा कुछ नही बिगाड सकता फिर तुम्हारी प्रजाति आज खतरे में क्यों है...

चहकिली:– मैं तो बच्ची हूं.. अभी तो मेरा पहला चक्र का शुरवात ही हुआ है, इसलिए इस विषय पर कुछ कह नही सकते। वैसे भी मैं सिर्फ आप लोगों से ही बात कर पा रही हूं, यहां के मानव से तो बात भी नहीं होता। अभी यहां रुक कर शार्क को देखना है क्या?

अलबेली:– देख ही रही हूं... और देख कर फट भी रही है...

चहकिली:– रुको मैं इनकी फाड़ती हूं...

अपनी बात कहती चाहकील ने एक तेज आवाज लगाई... इस बार वाकई चहकिली ने अपना मुंह खोला था। आवाज तो कुछ नही आयी, लेकिन पानी में ऐसा तरंग उत्पन्न हुआ कि सभी शार्क दुबक गई। चहकिली इधर लहराती, उधर बलखाती पानी के अंदर काफी तेजी से चल रही थी।

चहकिली:– आप सब अब घुसने जा रहे हैं बच्चों के शहर..

"बच्चों के शहर"… सबने लगभग एक साथ कहा..

चहकिली:– जी हां सही सुना, बच्चों के शहर... यहां के जीव इतने छोटे ऊपर से इतने पारदर्शी होते है कि दिखे ही न। एक क्या जब ये 100 की झुंड में रहते हैं तो भी नही दिखते। केवल जब ये लोग अपना मुंह खोलते हैं, तभी दिखते है।

आर्यमणि:– मुंह खोलने से दिख जाते है।

चहकिली:– अरे इतने सवाल क्यों पूछ रहे, पहुंच तो गये उनके शहर। खुद ही देख लो.…

अलबेली:– हां लेकिन यहां क्या देखना है??? कुछ दिख रहा है... क्यायायायायाया..

"अमेयायायायायाया…."… रूही की जोरदार चींख , जो मुंह से आवाज बनकर तो नही निकला, लेकिन उसकी प्रतिक्रिया ही कुछ ऐसी थी.…

आर्यमणि तो रूही से भी ज्यादा व्याकुल... उसने अपना पंजा ठीक वैसा ही रखा, जैसा भूमि के अंदर घुसकर भूमि से जड़ों के रेशों को निकालने के लिये करता था... हुआ ये कि जैसे ही ये लोग बच्चों के शहर पहुंचे, ठीक उसी वक्त अमेया, चहकिली के पंख से छूट गई और बड़ी तेजी से वो तैरती हुई कहीं गायब हो गयी.…

सबकी चींख एक साथ निकल गयी। और इधर आर्यमणि तो बौखलाकर जैसे पानी को कमांड देने की कोशिश कर रहा हो। हालांकि आर्यमणि के ऐसा करने से कुछ हुआ तो नही सिवाय पानी में कुछ क्रिस्टल जैसा पैदा होने के, लेकिन फिर भी आर्यमणि कोशिश कर रहा था। अभी सदमे से उबर नहीं पाए थे, अब सब के सब हैरानी से आश्चर्य में पड़े हुए थे...

अमेया, एक पल बाएं तो अगले पल पल गायब। नजर घुमाकर देखे तो कब वो बाएं से दाएं पहुंची, कोई इल्म नहीं। हां लेकिन सब इसलिए शांत थे, क्योंकि अमेया की किलकारी उन सबके मस्तिष्क में गूंज रही थी। ऐसी प्यारी हंसी की सबका मन मोह रही थी।

रूही:– चहकिली जान निकाल दिया तुमने। ऐसा कोई करता है क्या?

चहकिली:– माफ कर दो मुझे। ये नन्हे जीव बड़े शरारती हैं। इनपर किसी का जोड़ नही चलता। मेरे पंख खोलकर अमेया को ले गये। वैसे चिंता जैसी बात होती तो क्या मैं इस ओर अमेया को लेकर आती?

आर्यमणि:– अब बहुत हुआ चहकिली, उन्हे कहो अभी मेरी बच्ची को यहां लेकर आये...

चहकिली:– वो आपको सुन सकते है।

आर्यमणि:– कौन?

तभी सामने सिल्वर रंग के करोड़ों दांत चमकने लगे। सबने जब गौर से देखा तब पाया की धुएं के रंग के कोई बहुत ही छोटा जीव है, जो दिखने में हु–बहु उजले रंग का घोस्ट इमोजी की तरह दिख रहा था। एक इंच का पूरा आकार। नीचे छोटा सा पूंछ और ऊपर का बदन गोल आकार का। और एक इंच के आकार वाले छोटे से जीव के मुंह में ऊपर और नीचे आधे इंच के दांत रहे होंगे। दिखने में बिलकुल चांदी के रंग का और चमकता हुआ। मुंह में करीब 30 दांत होंगे जो बिलकुल नुकीले और धारदार थे। दांत इतने नुकीले और धारदार थे की मोटे से मोटे मेटल के परत को फाड़ कर रख दे।

हवा में करोड़ों ऐसे दांत एक साथ ऊपर से लेकर नीचे तक चमक रहे थे। उन चमकते दांत के ठीक मध्य से उन जीवों का 1000 का झुंड अमेया को उन तक पहुंचा रहा था। सभी कोई जितने हैरान उतने ही ज्यादा प्रसन्न भी थे। अमेया के प्रति इन छोटे जीव का प्रेम देखकर सभी खुश हो गये। उस माहोल में इकलौता आर्यमणि ही था जिनसे ये छोटे पिद्दी जैसे जीव बात कर रहे थे। आर्यमणि उनकी बात समझ भी रहा था और सबको समझा भी रहा था।

चलने से पहले आर्यमणि और उसके पैक ने उन सब जीवों को एक साथ हील किया। मेटल टूट के शारीरिक जितने भी दर्द थे उन्हें महसूस किया। और जब वहां से इनका कारवां आगे बढ़ने लगा तब आर्यमणि इन्हे "मेटल टूथ" नाम देता चला।

महासागर के अंदर एक अलग ही दुनिया बसती थी। यहां रंग बिरंगे मछलियों और अन्य जलीय जीव जिनके बारे में पढ़ते हैं, उनके अलावा भी कई सारी दुर्लभ प्रजातियां थी, जिनका इल्म पृथ्वी पर रहने वाले किसी भी प्रकार के शोधकर्ता के पास नही था। चहकिली कई प्रकार के जीवों के बस्ती से गुजरी।… फिर वो 6 पाऊं वाले स्तनपाई जीव हो जो दिखने में चींटी की तरह थे, लेकिन उनका आकार हाथी जितना बड़ा था। या फिर तल के नीचे घोंसला बनाकर रहने वाले सूंढ वाले जीव हो, जिनका शरीर तो नही दिखता लेकिन तल के नीचे से गोल गड्ढा बनाकर अपने सूंढ जरूर बाहर निकले रहते थे।

भ्रमण करते हुये ये लोग पहुंच चुके थे, पाताल लोक के दरवाजे पर। 5 फन वाला सांप का का विशाल देश, जो महासागर के अपने हिस्से से कहीं जाते ही नही थे और कोई इनके क्षेत्र में घुस जाए ऐसा संभव नही था। जैसा की चहकिली ने यात्रा के दौरान वर्णन किया। ऐसे अलौकिक शेषनागों के दरवाजे तक आकर भला उन्हे देखे बिना कैसे जा सकते थे।

शेषनाग की सीमा के अंदर तो नही जा सकते थे इसलिए सीमा पर ही खड़े होकर उन्हें देखने लगे। काफी रंग बिरंगे और मनमोहक जीव थे। आर्यमणि को उन्हे करीब से जानने की जिज्ञासा हुई। अनायास ही उसके कदम आगे बढ़ गये किंतु वह सीमा के अंदर प्रवेश करता, उस से पहले ही कई सारे 5 फन वाले नाग कतार लगाकर अपना फन फैला लिया। सभी एक कतार में अपने फन से ना का इशारा करते हुये आर्यमणि को अंदर आने से रोकने लगे...

रूही, आर्यमणि को खींचती हुई उसे पीछे हटने कही। वहीं अपनी दूसरी हथेली से सांप के ओर इशारा करती... "हम बस आपको देख रहे थे। आपके क्षेत्र में दखल अंदाजी करने का जरा भी इरादा नहीं था"…

इधर रूही जैसे ही अपना पंजा दिखाकर बात करने लगी, सांप अपने फन घुमाकर जैसे एक दूसरे को घूर रहे थे। अचानक ही उस माहोल में सांपों की अजीब सी फुंफकार गूंजने लगी। अलबेली और इवान, आर्यमणि और रूही को पीछे खिंचते... "चलो यहां से, ये जगह काफी खतरनाक लग रही"…

इवान अपनी बात समाप्त भी नही किया था इतने में ही दरवाजा घेरे सांपों ने बीच से ऐसे रास्ता खोला जैसे सबको अंदर बुला रहे हो। उफ्फ आंखों के आगे क्या हैरतंगेज नजारा था..... ऐसा लग रहा था जैसे कई किलोमीटर भूमि पर किसी ने खेती किया है। चारो ओर फसल लहलहा रही थी और ठीक मध्य से फसलों को काटकर एक छोटा सा रास्ता बना दिया गया था। यहां का नजारा भी ठीक ऐसा ही था। बस फसल की जगह सांप के फन लहरा रहे थे, जिनकी बिंदी जैसी नीली आंखें चमक रही थी...

रूही, इवान और अलबेली, तीनो ही आर्यमणि को देखने लगे। आर्यमणि मुस्कुराते हुए अपना पहला कदम आगे बढ़ाया। इस बार कोई रास्ता नही रोक रहा था। आर्यमणि अपने दाएं–बाएं फन फैलाए शेषनाग को देखते बढ़ रहा था और पीछे–पीछे उसका पूरा पैक... रास्ते के सबसे आखरी में काली वीराना खाली मैदान था, जिसके ठीक मध्य में कुछ चमक रहा था, पर उसे भेड़िए की नजर से भी देख पाना सम्भव नही था।

उस काले वीराने रण में ले जाने के लिये 7 फन वाला सांप आगे आया। ये बाकी 5 फन वाले सांपो से अलग था। सुनहरा रंग और उसका बदन इतना चमक रहा था कि आस–पास के तल को देखा जा सकता था। वह सांप आगे–आगे चला और उसके पीछे आर्यमणि और उसका पूरा पैक।

ठीक मध्य में जब वो पहुंचे, उन्हे एक मानव दिखा। उस मानव के नीचे का हिस्सा सांप के पूंछ जैसा था और कमर के ऊपर पेट से लेकर सिर तक, इंसानी रूप। अर्ध–शर्प अर्ध–इंसान दिखने वाला वो आदमी एक आसान पर विराजमान था। चेहरा पर तेज और होटों पर मुस्कान थी। वहीं उसके नाग वाला हिस्सा बिलकुल काले ग्रेनाइट पत्थर जैसा दिख रहा था, बिलकुल चमकता और शख्त… उनके आस पास, उन्ही की तरह अर्ध–शर्प अर्ध–इंसान दिखने वाली अप्सराएं थी।

वह आदमी अपना परिचय देते... "मेरा नाम नभीमन है। मै शेषनाग का वंशज हूं और सम्पूर्ण पाताल लोक का शासक, अपने राज्य में तुम्हारा स्वागत करता हूं।"…

आर्यमणि:– आप पाताल लोक के शासक है, फिर वो विजयदर्थ...

नभीमन:– विजय पूरे महासागर को देखता है और मैं पूरे पाताल लोक को...

अलबेली:– दोनो में अंतर क्या है महाराज?

नभीमन:– यहां रहकर खुद जान लो। मैं तुम सबको पाताल लोक में रहने का आमंत्रण देता हूं।

आर्यमणि:– देखिए नभीमन जी हम पृथ्वी पर ही अच्छे हैं।

नभीमन के पास खड़ी अप्सराएं फुफकार मारती, अपना आधा धर लहराकर अल्फा पैक के ठीक सामने। सभी का गुस्से से लाल चेहरा अल्फा पैक देख सकते थे.… "इन्हे नाम से पुकाड़ने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?"

नभीमन:– सेविकाओं पीछे आओ… न तो मैं इनका राजा हूं और न ही ये मेरे अधीन है। माफ करना तुमलोग.. आम तौर पर ये सभी सुंदरियां शांत रहती है। खैर वो सब जाने दो और मुझे ये बताओ, तुम सब अपने जमीन से इतने नीचे कैसे आ गये...

रूही:– शोधक प्रजाति की एक बच्ची है, चहकिली... वही हमे घूमाने ले आयी…

नभीमन, अपने दोनो हाथ से नमन करते... "वो गहरे महासागर के जीव नही बल्कि ये लोग तो मां समान है। सम्पूर्ण जलीय जीव के पोषणकर्ता... गहरे तल के कचरे को अपने अंदर समाकर, पोषक तत्व बदले में देने वाली.. कोई संशय नहीं की वो तुम्हे यहां क्यों लेकर आयी…

आर्यमणि:– क्यों लेकर आयी…

तभी कहीं बहुत दूर से चहकिली की आवाज आयी… "आप हमारे महाराज का थोड़ा दर्द ले लीजिए... वह बहुत पीड़ा में है।"…

रूही:– मुझे लगा की आपने अपने दिव्य दृष्टि से मुझमें कुछ खास देखा होगा, लेकिन यहां तो चहकिली ने चुगली कर दी थी। वैसे क्या आपके पास कोई ऐसी अलौकिक शक्ति नही जिस से आप स्वयं को ठीक कर सके?

इवान:– हां आपके पास तो बहुत सी दिव्य शक्तियां होनी चाहिए...

नभीमन:– दिव्य शक्ति !!!! हाहाहाहाहा… न जाने कितने ही इंसानों ने ऐसी शक्तियों के तलाश में कितनी जिंदगियां तबाह कर डाली। पाताल के गर्भ की कई शक्तियों को तो तपस्वी मनुष्य अपने साथ ले गये। और अंत में क्या हुआ... स्वयं ईश्वर को अवतार लेकर उन शक्तियों को नष्ट करना पड़ा... हम तो अकींचन साधु है, जिसके पास अब कुछ नही बचा। हां थोड़ी बहुत मणि की शक्ति है, लेकिन अब वो भी धूमिल होती जा रही है। मणि अब इतना कमजोर हो गया है कि मैं अब हमेशा पीड़ा में ही रहता हूं...

आर्यमणि:– चहकिली मुझे यहां तक लेकर आयी है, इसकी जरूर कोई वजह रही होगी। मैं आपकी कैसे मदद कर सकता हूं?

नभीमन:– कई हजार वर्ष पूर्व मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गयी थी। मैं ताकत की चाहत में भटक गया था और गुरु वशिष्ठ के रक्षक मणि को उनके गांव के गर्भ गृह से चुरा लाया। रक्षक मणि ने मुझे अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने में मदद तो की, लेकिन मैं कभी चैन से जी नही पाया। मैं चाहता हूं वो मणि तुम उसके सही जगह तक पहुंचा दो...

आर्यमणि:– और वो सही जगह कहां है?..

नभीमन:– चहकिली को पता है...

आर्यमणि:– हम्मम... ठीक है। यादि आपकी पीड़ा इस से दूर होती है तो मैं तैयार हूं...

आर्यमणि की बात सुनकर नभीमन का चेहरे पर मुस्कान फैल गई। एक विजयि कुटिल मुस्कान जो नभीमन के चेहरे पर साफ झलक रही थी। नभीमन की हंसी तब तक बनी रही जबतक एक छोटी सी पोटली लिये, उसकी एक दासी आर्यमणि के पास नही पहुंच गयी।

वह दासी आर्यमणि के ओर पोटली बढ़ा दी और नभीमन किसी प्राचीन भाषा में एक मंत्र बोलकर, आर्यमणि को 5 बार उस मंत्र को पहले दोहराने कहा और बाद में वो पोटली लेने.… आर्यमणि भी 5 बार उस मंत्र को दोहराकर पोटली जैसे ही अपने हाथ में लिया, चारो ओर से उसे फन फैलाए सापों ने घेर लिया।
Nice update
 
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