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Fantasy Aryamani:- A Pure Alfa Between Two World's

nain11ster

Prime
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I love Fantasy and Sci-fiction story.
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भाग:–167


लगातार २ दिनो तक रोने के बाद आर्यमणि ने अपने आंसू पोछे..... “चाहकीली मुझे कोई देख भी न सके ऐसे जगह ले चलो।”

चाहकीली:– चाचू आप पहले से ही ऐसी जगह पर हो। यह सोधक प्रजाति का क्षेत्र का सबसे गहरा हिस्सा है, जहां हम अपने देवता को पूजते हैं। यहां किसी को भी आने की इजाजत नहीं है।

आर्यमणि:– फिर ये मेटल टूथ कैसे आ गये और तुम्हारे लोगों ने मुझे ऐसे पवित्र जगह लाने से रोका नहीं?

चाहकीली:– भगवान को भला उसके घर आने से कौन रोक सकता है। और ये मेटल टूथ तो केवल मेरे वियोग को मेहसूस कर यहां आ गये। ये सब मेरे दोस्त जो ठहरे...

आर्यमणि:– हम्मम ठीक है। मै अपनी साधना में बैठने वाला हूं। मुझे यहां किसी प्रकार का विघ्न नही चाहिए।

चाहकीली:– ठीक है फिर मैं मेटल टूथ को लेकर निकलती हूं, आप जब तक चाहिए यहां अपनी साधना कीजिए, आपको यहां छोटी सी सरसराहट की आवाज तक नहीं सुनाई देगी।

चाहकीली अपनी बात कहकर वहां से सबको लेकर निकली। आर्यमणि मंत्र उच्चारण करते आसान लगाया और पलथी लगाकर बैठा। जल साधना, सबसे कठोर साधना, उसमे भी इतनी गहराई में। दिन बीता, महीने बीते, बिता साल। दूसरे साल के 2 महीने बीते होंगे जब आर्यमणि ने अपना आंख खोल लिया।

बदन पर पूरा काई जमी थी। दाढ़ी फिट भर लंबी हो चली थी। बड़े–बड़े नाखून निकल आये थे। पर चेहरे पर अलग ही तेज और शांति के भाव थे। आंख खोलते ही उसने चाहकीली का स्मरण किया किंतु उसे कोई जवाब नही मिला। कुछ देर तक आर्यमणि ने गहरा ध्यान लगाया।

पिछले 14 महीने की तस्वीर साफ होने लगी थी। कैसे निमेषदर्थ ने पता लगाया की हत्याकांड वाले दिन चाहकीली ने समुद्री तूफान उठाया था। उस तूफान में उसकी सबसे बड़ी ख्वाइश अमेया कहीं खो गयी थी, जो बाद में निमेषदर्थ के लाख ढूंढने के बाद भी नही मिली। उसी के बाद से निमेषदर्थ चाहकीली को वश में करने पर तुल गया था।

किंतु चाहकीली और निमेषदर्थ के बीच एक ही बाधा थी, महाती। महती अक्सर ही निमेषदर्थ के सम्मोहन को पूर्ण नही होने देती। पर 8 महीने पहले, निमेषदर्थ ने बौने के समुदाय से पूरा मामला फसा दिया। जलपड़ी और बौने 2 ऐसे समुदाय थे, जिनपर पूरे महासागर का उत्तरदायित्व था। पिछले कई पीढ़ियों ने बौने के समुदाय से एक भी राजा नही देखा था, जबकि पूर्व में 3–4 जलपड़ी समुदाय के राजा होते तो एक बौने के राज घराने से राजा बनता था।

बौने समुदाय हो या फिर जलपड़ी समुदाय। राजा के लिये सब उसकी प्रजा ही थी। दोनो ओर से लोग सड़कों पर थे और उत्पात मचाकर प्रशासन के नाक में दम कर रखा था। महाती अपने पिता के साथ जैसे ही व्यस्त हुई, मौका देखकर निमेषदर्थ ने चाहकीली को सम्मोहित कर लिया।

सम्मोहित करने के बाद निमेषदर्थ सबसे पहले कैलाश मार्ग मठ ही गया। मठ में कितने सिद्ध पुरुष मिलते यह तो निमेषदर्थ को भी नही पता था, इसलिए अपनी पूरी तैयारी के साथ पहुंचा था। ऐतिहातन उसने अपने 5 सैनिक आगे भेजे और उस जगह का मुआयना करने कहा। 5 सैनिक मठ के दरवाजे तक पहुंचे किंतु प्रवेश द्वार मंत्रों से अभिमंत्रित थी।

कई दिनों तक निमेषदर्थ वहीं घात लगाये बैठा रहा। मठ से किसी के बाहर आने का इंतजार में उसने महीना बिता दिया, परंतु मठ से कोई बाहर नही निकला। हां लेकिन 1 महीने बाद बाहर से कुछ संन्यासी मठ में जरूर जा रहे थे। निमेषदर्थ, संन्यासियों की टोली देखकर समझ तो गया था कि अमेया उनके साथ नही थी और न ही मठ में उसके होने के कोई भी संकेत मिले थे। निमेषदर्थ अमेया का पता लगाने के इरादे से संन्यासियों का रास्ता रोक लिया। सबसे आग संन्यासी शिवम ही थे। निमेषदर्थ को सवालिया नजरों से देखते.... “तुम कौन हो और हमारा रास्ता क्यों रोक रखे हो?”..

निमेषदर्थ:– मैं महासागर मानव हूं। अपने पिता की पहली संतान और महासागर का होने वाला भावी महाराजा। महासागर की एक बच्ची थल पर आ गयी है और पता चला है कि वह यहीं इसी मठ में है।

संन्यासी शिवम:– यदि महासागर की कोई बच्ची यहां होती तो हमें अवश्य पता होता। फिर भी तुम अपनी संतुष्टि के लिये यहां ढूंढ सकते है।

निमेषदर्थ:– जब आप इतने सुनिश्चित है तो फिर अंदर जाकर ढूंढना ही क्यूं? गंगा जल हाथ पर लेकर मेरे साथ मंत्र दोहरा दीजिए, मैं पूर्णतः सुनिश्चित हो जाऊंगा।

संन्यासी शिवम:– यदि विजयदर्थ ये बात आकर कहते तो मैं एक बार सोचता भी, तुम किस अधिकार से मुझे सीधा आदेश दे रहे हो।

निमेषदर्थ:– संन्यासी तुम्हारी बातों से मुझे समझ में आ गया है कि अमेया तुम्हारे ही पास है। जल्दी से उस बच्ची को लौटा दो, वरना अंजाम अच्छा नही होगा...

संन्यासी शिवम ने एक छोटा सा मंत्र पढ़ा और कुछ ही पल में विजयदर्थ वहां पहुंच चुका था। विजयदर्थ जैसे ही वहां पहुंचा संन्यासी शिवम पर खिसयाई नजरों से देखते.... “संन्यासी एक योजन में तुम्हारे बुलाने से मैं चला क्या आया, तुम तो मुझे परेशान करने लगे।”

सन्यासी शिवम्:– जरा पीछे मुड़कर देखिए फिर पता चलेगा की कौन किसको परेशान कर रहा है।

विजयदर्थ जैसे ही पीछे मुड़कर देखा, सामने निमेषदर्थ खड़ा था। उसे यहां देख निमेषदर्थ घोर आश्चर्य करते.... “तुम यहां क्यों आये हो?”

निमेषदर्थ:– पिताजी इन्ही लोगों के पास अमेया है।

विजयदर्थ, खींचकर एक तमाचा जड़ते..... तुम सात्विक आश्रम द्वारा संचालित एक मठ के संन्यासी से उनके गुरु आर्यमणि की बच्ची को मांगने आये हो?

निमेषदर्थ:– पिताजी मुझे नही पता था कि...

विजयदर्थ ने पूरी बात सुनना भी उचित नही समझा। वह अपना पंजा झटका और निमेषदर्थ के गले, हाथ और पाऊं मोटे जंजीरों में कैद हो चुके थे। विजयदर्थ अपनी गुस्से से लाल आंखें दिखाते..... “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई थल पर आकर अपनी पहचान जाहिर करने और यहां के जीवन में हस्तछेप करने की। वैसे भी तुम मेरे उत्तराधिकारी कभी नहीं रहे और आज की हरकतों के बात तुम राजकुमार भी नही रहे। अपनी सजा भुगतने के बाद तुम सामान्य नागरिक का जीवक जीयोगे। संन्यासी इसकी गलती की सजा मैं दे रहा हूं। आप से विनती है आप भी इस बात को यहीं समाप्त कर दे।”

संन्यासी शिवम:– आपके न्याय प्रणाली से मैं बेहद प्रसन्न हुआ। ठीक है मैं इस बात को यहीं समाप्त करता हूं।

इस वाकये के बाद निमेषदर्थ अपने हर तरह के अधिकार खो चुका था। हां वो भी एक दंश का मालिक था, इसलिए उस दंश का अधिकार उस से नही छीना जा सकता था। अपनी कैद से खुन्नस खाया विजयदर्थ, रिहा होते ही अपनी बहन हिमा से मिला और अपनी सजा के लिये चाहकीली को जिम्मेदार मानते हुये उसे मारने की योजना बना लिया। जिस दिन चाहकीली को जान से मारने की तैयारी चल रही थी, आर्यमणि अपनी साधना को वहीं पूर्ण विराम लगाते, अपनी आंखें खोल लिया।

सोधक जीव के गुप्त स्थान से आर्यमणि उठकर बाहर आया। कुछ दूर चलने के बाद आर्यमणि सोधक प्रजाति के आबादी वाले क्षेत्र में पहुंच गया। क्षेत्र के सीमा पर चाहकीली के पिता शावल मिल गये। बड़ी चिंता और बड़े–बड़े आंसुओं के साथ आर्यमणि को देखते..... “आर्यमणि वो मेरी बच्ची चाहकीली।”...

आर्यमणि धीमे मुस्कुराया और अपना हाथ शावल के बदन पर रखते..... “चिंता मत करो, चाहकीली को कुछ नही होगा। कल सुबह तक वो तुम लोगों के साथ होगी। मै इतना ही बताने यहां तक आया था।”...

अपनी बात कहकर आर्यमणि सीधा अंतर्ध्यान हो गया और उस सभा में पहुंचा जहां चाहकीली को मृत्यु की सजा दी जा रही थी। आर्यमणि भिड़ के पीछे से गरजते हुये.... “तुम्हे नही लगता की तुम्हारी ये सभा भ्रष्ट हो चुकी है। मां जैसे एक मासूम से जीव के दिमाग को काबू कर उसे मारने जा रहे हो?”

“मेरी सभा में ये कौन बोला?”..... आर्यमणि के सवाल पर उस सभा का मुखिया ने गरजते हुये पूछा। आर्यमणि यह आवाज भली भांति पहचानता था। आर्यमणि जैसे–जैसे अपनी दोनो बांह फैला रहा था, वैसे–वैसे भिड़ दोनो किनारे हो रही थी और बीच से रास्ता बनते जा रहा था। आर्यमणि के नजरों के सामने उसका दोषी निमेषदर्थ खड़ा था। बीच का रास्ता जो खाली था, इस खाली रास्ते पर अचानक ही जड़ों ने कब्जा जमा लिया और देखते ही देखते निमेषदर्थ जड़ों में लिपटा हुआ था।

जड़ों में लिपटने के साथ ही निमेषदर्थ की यादें आर्यमणि के पास आने लगी और उस याद में आर्यमणि ने अपने एक और दोषी को पाया जो इस वक्त इसी सभा में मौजूद थी किंतु हत्याकांड वाले दिन वह दिखी नही थी। निमेषदर्थ की बहन हिमा। जैसे ही आर्यमणि को अपना दूसरा दोषी मिला, आर्यमणि बिना वक्त गवाए उसे भी जड़ों में जकड़ चुका था।

दोनो किनारे पर जो भीड़ खड़ी थी, उसमे एक हजार कुशल सैनिक भी थे। हालांकि वो जड़ों में तो नही जकड़े थे, लेकिन किसी अदृश्य शक्ति ने उनके पाऊं जमा दिये हो जैसे। कोई भी हील तक नही पा रहा था। आर्यमणि एक–एक कदम बढ़ाते हुये निमेषदर्थ के पास पहुंचा। आर्यमणि अपने गुस्से से लाल आंखें निमेषदर्थ को दिखाते .... “आखिर किस लालच में तुमने मेरे परिवार को मार डाला था निमेष।”...

निमेषदर्थ:– देखो आर्यमणि मैं तो बस एक मोहरा था।

आर्यमणि:– तुम्हारी यादों में मैं सब देख चुका हूं। तभी तो तुम्हारी बहन भी जड़ों में जकड़ी हुई है। तुम दोनो अपने आखरी वक्त में किसी को याद करना चाहो तो कर सकते हो।

“ठीक है मुझे वक्त दो। मै सबको याद कर लेता हूं।”.... इतना कह कर निमेषदर्थ अपनी आंख मूंदकर जोड़–जोड़ से कहने लगा.... “हे मेरे अनुयाई, मेरे रक्षक.. मैं तुम्हे याद कर रहा हूं। सबको मैं दिल से याद कर रहा हूं। ऐसा लग रहा है मेरे प्राण अब जाने वाले है। मौत मेरे नजरों के सामने खड़ी है। वह मुझे बेबस कर चुकी है। वह मुझे घूर रही है और किसी भी वक्त मुझे अपने चपेट में ले लेगी।”...

निमेषदर्थ चिल्लाकर अपनी भावना कह रहा था। हर शब्द के साथ जैसे वहां का माहोल बदल रहा हो। निमेषदर्थ जहां खड़ा था, उस से तकरीबन 100 मीटर आगे चाहकीली अचेत अवस्था में लेटी थी। निमेषदर्थ के हर शब्द के साथ उसमें जैसे जान आ रहा हो। जैसे ही निमेषदर्थ का बोलना समाप्त हुआ वहां का माहौल ही बदल गया।

चारो ओर सोधक प्रजाति के जीव फैले हुये थे। सोधक जीव की संख्या इतनी थी कि एक के पीछे एक कतार में इस प्रकार खड़े थे कि मानो जीवित पहाड़ों की श्रृंखला सामने खड़ी थी। न सिर्फ सोधक प्रजाति थे बल्कि शार्क और व्हेल जैसी मछलियां की भी भारी तादात में थी, जो सोधक प्रजाति के आगे थी और उन सबने मिलकर निमेषदर्थ को घेर लिया था।

चाहकीली तो सबसे पास में ही थी। खूंखार हुई शार्क और वेल्स के साथ वह भी निमेषदर्थ के चक्कर लगा रही थी। इसी बीच निमेषदर्थ खुद को जड़ों की कैद से आजाद करके पागलों की तरह हंसने लगा..... “क्या सोचे थे हां... मेरी जगह पर मुझे ही मार सकते हो। अभी तक तो इन जानवरों को ये नहीं पता की मेरी मौत कौन है। जरा सोचो मेरे एक इशारे पर तुम्हारा क्या होगा? फिर अभी तो तुम पर यह जानवर भरी पड़ेगा। इन जानवरों का मालिक मैं, फिर तुम पर कितना भारी पर सकता हूं।”...

आर्यमणि, निमेषदर्थ की बातें सुनकर मुश्कुराया। फिर उसकी बहन हिमा के ओर देखते..... “तुम्हे भी कुछ कहना है?”...

हिमा:– मुझे कुछ बोलने के लिये तुम जैसों के इजाजत की ज़रूरत नही। भाई इसे जानवरों का चारा बना दो।

निमेषदर्थ:– बिलकुल बहना, अभी करता हूं।

फिर तो मात्र एक उंगली के इशारे थे और सभी खूंखार जलीय जीवों ने जैसे एक साथ हमला बोल दिया हो। जिसमे चाहकिली सबसे आगे थी। आर्यमणि के शरीर से 50 गुणा बड़ा मुंह फाड़े चाहकिली एक इंच की दूरी पर रही होगी, तभी वहां के माहौल में वह दहाड़ गूंजी जो आज से पहले कभी किसी ने नहीं सुनी गयी थी। ऐसी दहाड़ जो महासागर के ऊपरी सतह पर तो कोई भूचाल नही लेकर आयी लेकिन पानी की गहराई में कहड़ सा मचा दिया था। ऐसी दहाड़ जिसे सुनकर जलीय मानव का कलेजा कांप गया। ऐसी दहाड़ जिसे सुनने वाले हर समुद्री जीव अपना सर झुकाकर अपनी जगह ठहर गये। जीव–जंतुओं को नियंत्रित करने की इतनी खतरनाक वह दहाड़ थी कि पूरे महासागर के जीव–जंतु जिस जगह थे वहीं अपने सर झुका कर रुक गये।

आर्यमणि:– चाहकीली क्या तुम मुझे सुन रही हो...

चाहकीली:– कोई विधि से मेरी जान ले लो चाचू। मै इस नालायक निमेषदर्थ की बातों में आकर आपको ही निगलने वाली थी। मुझे अब जीवित नहीं रहना...

आर्यमणि:– अपना सर ऊपर उठाओ...

चाहकीली अपना सर ऊपर की। उसके आंखों से उसके आंसू बह रहे थे। आर्यमणि अपना हाथ बढ़ाकर उसके एक बूंद गिरते आंसू को अपने हथेली पर लेते.... “बेटा रोने जैसी बात नही है। तुम्हारा दिमाग निमेष के कब्जे में था। अब मेरी बात ध्यान से सुनो।”...

निमेषदर्थ:– ये तुम कर कैसे रहे हो। मेरे जानवरों को होश में कैसे ले आये...

आर्यमणि का फिर एक इशारा हुआ और एक बार फिर निमेषदर्थ जड़ों में जकड़ा हुआ था.... “निमेष तुमसे मैं कुछ देर से बात करता हूं। तब तक हिमा तुम अपने आखरी वक्त में किसी को याद करना चाहो तो कर लो।”.... इतना कहने के बाद अपने हथेली के आंसू को अभिमंत्रित कर.... “चाहकीली अपना सर नीचे करो”...

चाहकिली थोड़ा पीछे हटकर अपना सर पूरा नीचे झुका दी। आर्यमणि थोड़ा ऊपर हुआ और चाहकीली के माथे के ठीक बीच आंसू वाला पूरा पंजा टिकाते हुये..... “आज के बाद तुम्हारे दिमाग को कोई नियंत्रित नही कर सकेगा। इसके अलावा जितने भी सोधक का दिमाग किसी ने काबू किया होगा, तुम्हारे एक आवाज पर वो सब भी मुक्त होंगे। अब तुम यहां से सभी जीवों को लेकर जाओ। मै जरा पुराना हिसाब बराबर कर लूं।”

चाहकीली:– चाचू मुझे भी इस निमेष का विनाश देखना है।

आर्यमणि:– वो जड़ों की कैद से आजाद होने वाला है। मै नही चाहता की यहां के युद्ध में एक भी जीव घायल हो। मेरी बात को समझो। तुम चाहो तो इन्हे दूर ले जाने बाद वापस आओ और एक किलोमीटर दूर से ही इसके विनाश को देखो। ऐसा तो कर सकती हो ना।

चाहकीली, चहकती हुई... “हां बिलकुल चाचू।”... इतना कहने के बाद चाहकीली एक कड़क सिटी बजाई और सभी जीवों को लेकर वहां से निकली। वो जगह जैसे ही खाली हुई, आर्यमणि दोनो भाई बहन को खोलते.... “उम्मीद है तुमने अपने सभी प्रियजनों को याद कर लिया होगा। अब अपनी मृत्यु के लिये तैयार हो जाओ।”

“किसकी मृत्यु”.... इतना कहकर हिमा ने अपना दंश को आर्यमणि के सामने कर दिया। उसके दंश से लगातार छोटे–छोटे उजले कण निकल रहे थे जो आर्यमणि के ओर बड़ी तेजी से बढ़ रहे थे। देखने में ऐसा लग रहा था जैसे एनीमशन में शुक्राणु चलते है। ये उजले कण भी ठीक उसी प्रकार से आर्यमणि के ओर बढ़ रहा था।

सभी कण लगातार आर्यमणि के ओर बढ़ रहे थे लेकिन जैसे ही वह एक फिट की दूरी पर रहते, अपने आप ही नीचे तल में गिरकर कहीं गायब हो जाते। फिर तो कई खतरनाक हमले एक साथ हुये। पहले हिमा अकेली कर रही थी। बाद ने हिमा और निमेषदर्थ ने एक साथ हमला किया। उसके बाद निमेषदर्थ ने अपने 1000 कुशल सैनिकों को आज़ाद करके सबको साथ हमला करने बोला।

आर्यमणि अपना दोनो हाथ ऊपर उठाते.... “एक मिनट रुको जरा।”...

निमेषदर्थ:– क्यों एक साथ इतने लोग देखकर फट गयी क्या?

आर्यमणि:– फट गयी... फट गयी.. ये मेरी अलबेली की भाषा हुआ करती थी, जिसकी मृत्यु की कहानी तुमने लिखी थी।

कुछ बूंद आंसू आंखों के दोनो किनारे आ गये। आर्यमणि उन्हे साफ करते.... “हां फट गयी समझो। यहां आम लोग है, पहले उन्हे जाने दो। मै कौन सा यहां से भागा जा रहा हूं।”

निमेषदर्थ कुछ देर के लिये रुका। वहां से जब सारे लोग हटे तब एक साथ हजार लोगो की कतार थी। ठीक सामने आर्यमणि खड़ा। निमेषदर्थ का एक इशारा हुआ और हजार हाथ आर्यमणि के सामने हमला करने के लिये तन गये। उसके अगले ही पल हर जलीय सैनिक के हाथ से काला धुआं निकल रहा था। निमेषदर्थ और हिमा के दंश से भी भीषण काला धुवां निकल रहा था। धुएं के बीच आर्यमणि कहीं गुम सा हो गया। कहीं किसी तरह की कोई हलचल नहीं।

Nice updates👍🎉🎉
 

Naina

Nain11ster creation... a monter in me
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लगातार २ दिनो तक रोने के बाद आर्यमणि ने अपने आंसू पोछे..... “चाहकीली मुझे कोई देख भी न सके ऐसे जगह ले चलो।”

Itna paani aaya kaha se body me ki bina ruke ro raha tha ..... Ye nain11ster unkil scince & logic ko bollywood style bana diya hai :dscream:
 

krish1152

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भाग:–166


टापू पर हत्याकांड वाले दिन...

रूही, इवान और अलबेली की लाशें गिर चुकी थी। आर्यमणि हताश अपने घुटने पर बैठा हुआ था। निमेषदर्थ को उसके प्रयोग के लिये आर्यमणि का खून देने के बाद, जैसे ही माया खंजर चलाई, ठीक उसी वक्त चाहकीली महासागर के उस हिस्से में पहुंच चुकी थी। चाहकिली थी तो काफी दूर लेकिन हृदय में जैसे वियोग सा उठा था और पल में उसकी आवाज ने जो कहर बरसाया उसका परिणाम यह हुआ की जिस पहाड़ पर अल्फा पैक का शिकार हो रहा था, वह पूरा पहाड़ ही बीच से ढह गया। देखने से ऐसा लग रहा था मानो वहां 2 पहाड़ के मध्य गहरी खाई बन गयी हो।

जिस वक्त चाहकीली ने यह सुनामी उठाई उस वक्त माया खंजर चला चुकी थी। चाहकिली की आवाज पर पानी, सुनामी का रूप ले चुकी थी। पानी कई हजार फीट ऊंचा उठा और इस रफ्तार से पहाड़ी के उस हिस्से से गुजरा की पूरी पहाड़ मानो रेत के तिनके की तरह ढह गयी। माया जो साफ मौसम में अपना खंजर चलाई थी, वह पानी के सुनामी के बीच फंस गयी। हालांकि खंजर सर को छू चुकी थी लेकिन सर को पूरा फाड़ने से पहले ही वह जगह नीचे महासागर में घुस गयी। माया को लगा उसका काम हो गया और खंजर पूरी चली थी। ढहते पहाड़ के साथ आर्यमणि, निमेषदर्थ, और माया तीनो ही पानी में गिरे। पानी में गिड़ने के दौरान ही निमेषदर्थ के हाथ से अमेया छूट कर अलग हो गयी। माया और निमेषदर्थ तो पानी के साथ बह गये लेकिन पानी के ठीक पीछे पूरी रफ्तार से आ रही चाहकीली तेज वेग से बहते पानी को अपनी पूंछ से फाड़ती हुई आर्यमणि और अमेया को उसमे लपेटी और बिना रुके वहां से गुप्त स्थान पहुंची।

चूंकि चाहकील निमेषदर्थ को देख चुकी थी इसलिए आर्यमणि और अमेया को ऐसी जगह छिपाई, जहां से महासागरीय इंसान तो क्या स्वयं देवता भी उन्हें नही ढूंढ पाते। दोनो को छिपाने के बाद चाहकीली सीधा राजधानी पहुंची। यूं तो सोधक कभी भी शहरी इलाकों से गुजरते नही। पहला मौका था जब चाहकीली अल्फा पैक को लेकर राजधानी पहुंची थी। और यह दूसरा मौका था।

चाहकीली प्रशासनिक भवन के चारो ओर गोल–गोल चक्कर काटती ह्रदय कंपन करने वाली तरंगे छोड़ रही थी। प्रशासनिक भवन में काम कर रहे सभी आला अधिकारी भय से अपना काम छोड़ भवन से बाहर निकलने की कोशिश करने लगे, लेकिन चाहकीली का शरीर प्रवेश द्वार को पूरा घेरे खड़ी थी। महा एक हॉल में कुछ अधिकारियों से मुलाकात कर रही थी, जब उसने भी वह डरवाना तरंग सुना।

सबको आराम से बैठने बोलकर वह जैसे ही बाहर आयी, बाहर पूरा अफरा–तफरी का माहौल था। महाती अपने कलाई में लटक रहे छोटे से धनुष के धागे को धीमे से खींचकर नीचे निकास द्वार तक पहुंची। जबतक महाती वहां पहुंचती, चाहकीली पूरी तरह से शांत हो चुकी थी। महाती चाहकीली के पंख के ऊपर खड़ी हो गयी। चाहकीली, महाती को अपने पंख में लॉक करती वहां से निकल गयी। शहर की भिड़–भाड़ से जैसे ही वो बाहर निकली...

महाती:– ए बड़बोली.. ऐसा भी कौन सा इमरजेंसी था जो तू राजधानी पहुंच गयी। वैसे भी आज कल तो तेरे नए–नए दोस्त बन गये, फिर मेरी क्या जरूरत...

चाहकीली:– वो नए दोस्त भी तेरी तरह मुझसे बात कर सकते हैं, लेकिन आज तक उन्हे भी पता नही की तू मुझसे बात कर सकती है।

महाती:– बड़ा एहसान कर दी जो उन्हे ये बात न बताई। मै तो तेरे एहसान तले दब गयी।

चाहकीली:– मेरे एहसानो तले दबी ही है। भूल मत मैं बीच में नही आती तो तू बौनो की बस्ती में मर चुकी होती।

महाती:– अच्छा और वो जो तेरे पेट के अंदर घुसकर जो मैने तुझे दर्द से राहत दिया था उसकी भी चर्चा कर ले। अंदर इतना एसिड और बैक्टीरिया का सामना करना पड़ा था कि मैं मरते–मरते बची थी। और भी बताऊं के मैने अपने धनुष से तेरे लिये क्या–क्या किया था।

चाहकीली:– हां याद है ना मुझे... भीषण दर्द में मुझे नाग लोक की भूमि पर तड़पता छोड़ गयी थी। मार देती तो ज्यादा अच्छा लगता।

महाती:– मार देती तो तेरे नए दोस्त कैसे मिलते। तुझे जिंदा कैसे देखती... वो भी पहले की तरह चहकती हुई।

चाहकीली और भी ज्यादा रफ्तार बढ़ाती.... “जो दर्द मैने झेला था, वह दर्द किसी को न मिले। मै दर्द से तड़प रही थी जब वह हाथ पहली बार मेरे सर से टीका और एक पल के लिये मुझे असीम शांति मिली थी। फिर तो उसने मेरे दर्द और बीमारी का पूरी तरह से उपचार कर नई जिंदगी दिया और आज खुद”...

महाती:– क्या हुआ... आर्यमणि ठीक तो है न...

चाहकीली:– उसके सभी साथी मर चुके है और आर्यमणि चाचू हील भी नही रहे। धड़कने चालू है पर कुछ कह नही सकते।

महाती:– ये क्या हो गया? हमारे क्षेत्र में उन्ही के साथ ऐसा भीषण कांड हो गया। तुम्हे पक्का यकीन है रूही, अलबेली, इवान नही रहे?

चाहकीली:– सब तुम्हारे भाई ने किया है। उसके साथ कुछ बाहरी लोग थे। सबने मिलकर धोखे से उन सबका शिकार कर लिया। किसी तरह मैं आर्यमणि चाचू को वहां से हटा तो दी लेकिन तब तक घातक हमला हो चुका था।

महाती:– हम सबकी बच्ची कहां है?

चाहकीली:– घटना के वक्त अमेया तो तुम्हारे भाई के गोद में ही थी। वह पूरी तरह से सुरक्षित है। उसे भी चाचू के साथ ही रखा है।

महाती:– हम्मम, ये कमीना निमेष बहुत दूर की सोच रहा है। हमे अमेया को जमीन पर रखना होगा और आर्यमणि का इलाज यहीं महासागर में करना होगा।

चाहकीली:– ऐसा क्यों?

महाती:– दोनो साथ रहेंगे तो सबको पता चल जायेगा की आर्यमणि जिंदा है। दोबारा हमला हो सकता है।

चाहकीली:– और कहीं अमेया को तुम्हारा भाई उठा ले गया तो?

महाती:– जो भी अमेया को उठा ले जायेगा वो उसे मरेगा तो नही ही। आर्यमणि जब पूर्ण रूप से स्वास्थ्य हो जायेगा तब अमेया को वापस ले आयेंगे। तुम तो उनके साथ ज्यादा वक्त बियायी हो। कोई उनका भरोसेमंद साथी है, जो अमेया को छिपाकर रख सके...

चाहकीली:– हां बहुत मजबूत साथी है। एक तरह से वह आर्यमणि का मजबूत परिवार है।

महाती:– ठीक है, फिर अमेया को उसके पास जल्दी लेकर चल...

कुछ ही देर में दोनो एक गुप्त स्थान पर थे। वहां से चाहकीली, महाती और अमेया को लेकर पूरा महासागर पार करती कैलाश मठ तक पहुंची। महाती पानी के नीचे तल में ही रही और अमेया को ऊपर के पंख में डालकर चाहकीली पानी के ऊपर हुई। आचार्य जी मठ में थे, जब उन्हें चाहकीली के आने की खबर मिली। अभी 2 दिन पहले ही चाहकीली से मुलाकात हुई थी। काफी खुश थे जब आचार्य जी ने रक्षा पत्थर को देखा था। किंतु उसी के कुछ देर बाद कुछ अनहोनी का आभाष उन्हे और संन्यासी शिवम दोनो को हुआ था। पीछे से अपस्यु को अल्फा पैक का इमरजेंसी संदेश भी मिला।

चाहकीली की खबर सुनकर आचार्य जी तेजी से बाहर निकले। चाहकीली के साथ अमेया को देखकर आचार्य जी भाव विभोर हो उठे। उन्हे लगा जैसे अल्फा पैक भी चाहकीली के साथ पहुंचा हो। उन्होंने चाहकीली से आर्यमणि के विषय में जानकारी लेने की कोशिश किये लेकिन चाहकीली की भाषा समझना और उसके भाव को परखना आचार्य जी के वश में नहीं था। चाहकीली के साथ किसी का न होना इस बात के ओर साफ इशारा कर गया कि अब कोई नही बचा।

चाहकीली वहां से जाने ही वाली थी कि तभी संन्यासी शिवम् चाहकीली को रोकते हुये “सेल बॉडी सब्सटेंस” के कई जार उसके सामने रखते..... “गुरुदेव अपनी सिद्धि प्राप्त करने के लिये नाग–लोक के भू–भाग पहुंचे थे। मै जानता हूं वो जीवित है, लेकिन कब तक रहेंगे इस एक प्रश्न ने बेचैन कर रखा है। यदि तुम उनके शरीर में किसी तरह ये द्रव्य डाल सकी तो उनकी जान बच जायेगी। इन्हे अपने हाथों से उठा लो तो मैं समझूंगा की तुम मेरी बात समझ गयी।”

आचार्य जी किसी तरफ अपनी भावनाओं पर काबू करते.... “शिवम वो बेजुबान तुम्हारी बात नही समझ रही, लेकिन तुम तो समझने की कोशिश करो। आर्यमणि अब जीवित नही तभी तो केवल उसकी बच्ची को लेकर आयी है।

संन्यासी शिवम्, आचार्य जी की बातों को साफ नकारते.... “ये जीव गुरु आर्यमणि को क्यों नही लायी या गुरु आर्यमणि क्यों नही यहां पहुंचे इसके पीछे कोई कारण हो सकता है, लेकिन आपकी समीक्षा गलत है। मेरा हृदय कहता है गुरु आर्यमणि जीवित है।”

आगे भी इस विषय पर बातें होती रही। यूं तो आचार्य जी कई बार अपनी दिव्य दृष्टि डाल चुके थे, परंतु नाग लोक के भू–भाग के क्षेत्र में वह दृष्टि नही पहुंच सकती थी। दोनो में फिर दिव्य–दृष्टि योजन पर बातें होने लगी। चाहकीली को लगा उसके विषय में कुछ कहा जा रहा था, इसलिए वह भी समझने की कोशिश करने लगी। लेकिन तभी नीचे से महाती चलने का इशारा कर दी।

चाहकीली यूं तो कुछ भी नही समझी किंतु संन्यासी शिवम् की भावना को वह भांप ली। अपने छोटे–छोटे पंख में उस जार को अच्छे से फंसा ली। चाहकिली फिर वहां रुकी नही। दोनो (चाहकीली और महाती) जैसे ही महासागर की गहराइयों में पहुंचे, महाती झुंझलाती हुई कहने लगी..... “तू जब उनकी भाषा समझ नही सकती, फिर क्यों सुन रही थी?”

चाहकीली:– उनकी भाषा न सही भावना तो समझ में आ रही थी ना।

महाती:– ठीक है मैं धनुष का प्रयोग करने वाली हूं... थोड़ी धीमे हो जा।

जैसे ही चाहकीली धीमी हुई महाती अपने कलाई पर लटक रहे छोटे से धनुष को निकालकर जैसे ही अपने हाथ में ली, पूरा धनुष अपने आकार में आ गया। खाली धनुष के डोर को पूरा खींचकर जैसे ही महाती ने छोड़ा, गहरे पानी के अंदर गोलाकार रास्ता बन गया। चाहकीली उन रास्तों से गुजरी और सीधा आर्यमणि के पास थी।

महाती ने आर्यमणि के शरीर का ऊपरी मुआयना किया। पीछे से चाहकीली अपनी जिज्ञासा दिखाती.... “कब तक चाचू जागेंगे?... उन्हे दर्द तो नहीं हो रहा?”... महाती उसे चुप रहने का इशारा करती अपना काम करने लगी। थोड़ी देर जांच करने के बाद..... “दिमाग पूरा बंद है। पहले मैं देखती हूं संन्यासी ने क्या दिया है। यदि उसकी दी हुई दवा से काम बन गया तब तो ठीक वरना आर्यमणि को हॉस्पिटल ले जाना होगा। और हां मामला दिमाग से जुड़ा हुआ है तो शायद ठीक होने में काफी वक्त लग जाये।

आर्यमणि बिलकुल बेजान सा पड़ा हुआ था। उसका सर बीच से फटा था। कुछ इंच खंजर अंदर घुसी थी, जिस कारण उसे होश नही आ रहा था और न ही उसका सर हील हो रहा था। महाती बिना देर किये कुछ संकेत भेजी और वहां पर “किं किं किं” करते मेटल टूथ का बड़ा सा झुंड पहुंच गया। महाती और मेटल टूथ के बीच कुछ सांकेतिक संवाद हुये। कुछ देर तक सांकेतिक संवाद करने के बाद महाती ने आर्यमणि के ओर इशारा न कर दिया। जैसा ही मेटल टूथ की झुंड ने आर्यमणि को देखा "ची, ची" करने लगे। इस बार जब मेटल टूथ के झुंड ने “ची ची” की आवाज निकाली चाहकीली की आंखें बड़ी हो गयी और वो बड़े ध्यान से देखने लगी।

इधर मेटल टूथ की झुंड से हजारों मेटल टूथ टूटकर आर्यमणि के करीब पहुंचे। कुछ देर तक आर्यमणि के शरीर का निरक्षण करने के बाद अपनी आवाज में कुछ बातें करने लगे। उनकी बात जैसे ही समाप्त हुई, आर्यमणि का पूरा शरीर मेटल टूथ से ढक गया। उनका काम होने के बाद जैसा ही वो आर्यमणि के ऊपर से हटे आर्यमणि को पूरा साफ करके उठे थे। हां वो अलग बात थी कि आर्यमणि के शरीर से पूरे बाल और पूरे कपड़े भी उसने साफ कर दिया था।

आर्यमणि का शरीर बिलकुल चमक रहा था। कुछ गिने चुने मेटल टूथ थे, जो आर्यमणि के शरीर से चिपके हुये थे। सभी वाइटल ऑर्गन जैसे लीवर, किडनी, फेफेरे, हृदय, इनके अलावा पाऊं के सभी उंगलियों से लेकर माथे तक निश्चित दूरी बनाकर उनपर मेटल टूथ चिपके हुये थे। ठीक उसी प्रकार शरीर के पिछले हिस्से पर भी ऐसे ही चिपके थे। आर्यमणि के सिर पर जहां खंजर लगी थी, उस पूरे लाइन को मेटल टूथ ने कवर कर लिया था। देखते ही देखते चिपके हुये मेटल टूथ के कंचे जैसे शरीर से पूरा लाल रक्त बहने लगा।

लाल रक्त के साथ कभी हरा द्रव्य तो कभी पीला द्रव्य निकल रहा था। वहीं सर का ऊपरी हिस्सा जो कुछ इंच नीचे तक चिड़ा हुआ था, वहां पर लगे मेटल टूथ के शरीर से लगातार पीला और नीला द्रव्य निकल रहा था। तकरीबन एक घंटे बाद आर्यमणि ने काफी तेज श्वास अपने अंदर खींचा और एक बार अपना आंख खोलकर फिर बेहोश हो गया। सभी मेटल टूथ आर्यमणि के शरीर से अलग हो गये शिवाय सर पर बैठे मेटल टूथ के। जो भी मेटल टूथ सिर से चिपके थे, अपने दातों से ही आर्यमणि के माथे पर टांका लगा दिया हो जैसे।

एक बार फिर मेटल टूथ और महाती के बीच सांकेतिक वार्तालाप शुरू हो चुकी थी। महाती ने फिर से कुछ समझाया और समझाने के बाद “सेल बॉडी सब्टांस” वाले जार के ओर इशारा कर दिया। मेटल टूथ का झुंड कुछ देर तक जार को देखता रहा। उनमें से कुछ ने उस जार को बड़ी सावधानी से ऐसे खोला की उसका द्रव्य पानी में न घुले और कुछ मेटल टूथ ने सेल बॉडी सब्सटेंस का मजा लिया। जिन मेटल टूथ ने मजे लिये सबने अपने साथियों से कुछ कहा। फिर तो मेटल टूथ आ रहे थे, जार से द्रव्य पी रहे थे और वापस लौट जाते। 2 जार को इन लोगों ने खोल दिया और करोड़ों मेटल टूथ सेल बॉडी सब्सटेंस को पीने के बाद मीटिंग करने लगे।

देखते ही देखते मेटल टूथ के झुंड ने आर्यमणि का मुंह खोल दिया। मेटल टूथ सेल बॉडी सब्सटेंस को अपने मुंह ने रखते और आर्यमणि के मुंह में घुसकर उसे गिड़ा देते। ऐसा करते हुये उन्होंने पहले जार को खाली कर दिया। फिर कुछ देर तक रुके और आर्यमणि के श्वास की समीक्षा करने लगे। जैसे ही उन्हें लगा की आर्यमणि की हालत में पहले से सुधार है, महाती के पास पहुंच गये।

महाती ने पूरी समीक्षा ली। खुद से एक बार और आर्यमणि की जांच की। जांच के बाद वो इतनी खुश थी कि चाहकीली की पंख पकड़कर जोड़–जोड़ से भींचने लगी। महाती की खुशी देख चाहकीली भी खुशी से उछलती.... “चाचू कब तक होश में आयेंगे?”...

महाती:– जो जार संन्यासी ने दिया वह चमत्कार से कम नही। मैने मेटल टूथ को समझा दिया है कि क्या करना है। अब मैं यहां से जा रही हूं और तू एक बार भी चर्चा मत करना की इनका इलाज मैने किया था। या मैं यहां आयी भी थी।

चाहकीली:– लेकिन ऐसा क्यों?

महाती अपनी आंखें दिखाती... “कोई सवाल नही जो बोली वो कर।”...

अपनी बात कहकर महाती ने सेल बॉडी सब्सटेंस से भरे एक जार को लेकर चली गयी। मेटल टूथ को जैसा समझाया गया था वह बिलकुल वैसा ही कर रहे थे। आर्यमणि को हर 6 घंटे पर धीरे–धीरे “सेल बॉडी सब्सटेंस” दे रहे थे।

आर्यमणि के सर पर हमला हुआ था। ऐसी जगह जहां से हर चीज कंट्रोल होती है। और एक बार सर के हिस्से में भाड़ी गड़बड़ हुआ, फिर तो सारे शरीर के सभी सिस्टम काम करना बंद कर देता है। एक तरह से मेटल टूथ ने सेल बॉडी सब्सटेंस को आर्यमणि के शरीर में पहुंचाकर उसकी जान ही बचाई थी।

सेल बॉडी सब्सटेंस ने अपना काम किया। क्षति हुई हर स्नायु तंतु सुचारू रूप से काम करना शुरू कर चुका था। आर्यमणि का अपना हीलिंग पूरी तरह से दुरस्त हो चुका था। सर के घाव भर चुके थे। चाहकीली और मेटल टूथ लागातार आर्यमणि की देख रहे कर रहे थे। अचानक ही रात को आर्यमणि की आंखे खुल गयी और जागते ही वो वियोग से रोने लगा। चाहकीली ने बहुत सारी बातें की, लेकिन एक ऐसा शब्द नही था जो आर्यमणि के वियोग को कम कर सके।
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krish1152

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भाग:–167


लगातार २ दिनो तक रोने के बाद आर्यमणि ने अपने आंसू पोछे..... “चाहकीली मुझे कोई देख भी न सके ऐसे जगह ले चलो।”

चाहकीली:– चाचू आप पहले से ही ऐसी जगह पर हो। यह सोधक प्रजाति का क्षेत्र का सबसे गहरा हिस्सा है, जहां हम अपने देवता को पूजते हैं। यहां किसी को भी आने की इजाजत नहीं है।

आर्यमणि:– फिर ये मेटल टूथ कैसे आ गये और तुम्हारे लोगों ने मुझे ऐसे पवित्र जगह लाने से रोका नहीं?

चाहकीली:– भगवान को भला उसके घर आने से कौन रोक सकता है। और ये मेटल टूथ तो केवल मेरे वियोग को मेहसूस कर यहां आ गये। ये सब मेरे दोस्त जो ठहरे...

आर्यमणि:– हम्मम ठीक है। मै अपनी साधना में बैठने वाला हूं। मुझे यहां किसी प्रकार का विघ्न नही चाहिए।

चाहकीली:– ठीक है फिर मैं मेटल टूथ को लेकर निकलती हूं, आप जब तक चाहिए यहां अपनी साधना कीजिए, आपको यहां छोटी सी सरसराहट की आवाज तक नहीं सुनाई देगी।

चाहकीली अपनी बात कहकर वहां से सबको लेकर निकली। आर्यमणि मंत्र उच्चारण करते आसान लगाया और पलथी लगाकर बैठा। जल साधना, सबसे कठोर साधना, उसमे भी इतनी गहराई में। दिन बीता, महीने बीते, बिता साल। दूसरे साल के 2 महीने बीते होंगे जब आर्यमणि ने अपना आंख खोल लिया।

बदन पर पूरा काई जमी थी। दाढ़ी फिट भर लंबी हो चली थी। बड़े–बड़े नाखून निकल आये थे। पर चेहरे पर अलग ही तेज और शांति के भाव थे। आंख खोलते ही उसने चाहकीली का स्मरण किया किंतु उसे कोई जवाब नही मिला। कुछ देर तक आर्यमणि ने गहरा ध्यान लगाया।

पिछले 14 महीने की तस्वीर साफ होने लगी थी। कैसे निमेषदर्थ ने पता लगाया की हत्याकांड वाले दिन चाहकीली ने समुद्री तूफान उठाया था। उस तूफान में उसकी सबसे बड़ी ख्वाइश अमेया कहीं खो गयी थी, जो बाद में निमेषदर्थ के लाख ढूंढने के बाद भी नही मिली। उसी के बाद से निमेषदर्थ चाहकीली को वश में करने पर तुल गया था।

किंतु चाहकीली और निमेषदर्थ के बीच एक ही बाधा थी, महाती। महती अक्सर ही निमेषदर्थ के सम्मोहन को पूर्ण नही होने देती। पर 8 महीने पहले, निमेषदर्थ ने बौने के समुदाय से पूरा मामला फसा दिया। जलपड़ी और बौने 2 ऐसे समुदाय थे, जिनपर पूरे महासागर का उत्तरदायित्व था। पिछले कई पीढ़ियों ने बौने के समुदाय से एक भी राजा नही देखा था, जबकि पूर्व में 3–4 जलपड़ी समुदाय के राजा होते तो एक बौने के राज घराने से राजा बनता था।

बौने समुदाय हो या फिर जलपड़ी समुदाय। राजा के लिये सब उसकी प्रजा ही थी। दोनो ओर से लोग सड़कों पर थे और उत्पात मचाकर प्रशासन के नाक में दम कर रखा था। महाती अपने पिता के साथ जैसे ही व्यस्त हुई, मौका देखकर निमेषदर्थ ने चाहकीली को सम्मोहित कर लिया।

सम्मोहित करने के बाद निमेषदर्थ सबसे पहले कैलाश मार्ग मठ ही गया। मठ में कितने सिद्ध पुरुष मिलते यह तो निमेषदर्थ को भी नही पता था, इसलिए अपनी पूरी तैयारी के साथ पहुंचा था। ऐतिहातन उसने अपने 5 सैनिक आगे भेजे और उस जगह का मुआयना करने कहा। 5 सैनिक मठ के दरवाजे तक पहुंचे किंतु प्रवेश द्वार मंत्रों से अभिमंत्रित थी।

कई दिनों तक निमेषदर्थ वहीं घात लगाये बैठा रहा। मठ से किसी के बाहर आने का इंतजार में उसने महीना बिता दिया, परंतु मठ से कोई बाहर नही निकला। हां लेकिन 1 महीने बाद बाहर से कुछ संन्यासी मठ में जरूर जा रहे थे। निमेषदर्थ, संन्यासियों की टोली देखकर समझ तो गया था कि अमेया उनके साथ नही थी और न ही मठ में उसके होने के कोई भी संकेत मिले थे। निमेषदर्थ अमेया का पता लगाने के इरादे से संन्यासियों का रास्ता रोक लिया। सबसे आग संन्यासी शिवम ही थे। निमेषदर्थ को सवालिया नजरों से देखते.... “तुम कौन हो और हमारा रास्ता क्यों रोक रखे हो?”..

निमेषदर्थ:– मैं महासागर मानव हूं। अपने पिता की पहली संतान और महासागर का होने वाला भावी महाराजा। महासागर की एक बच्ची थल पर आ गयी है और पता चला है कि वह यहीं इसी मठ में है।

संन्यासी शिवम:– यदि महासागर की कोई बच्ची यहां होती तो हमें अवश्य पता होता। फिर भी तुम अपनी संतुष्टि के लिये यहां ढूंढ सकते है।

निमेषदर्थ:– जब आप इतने सुनिश्चित है तो फिर अंदर जाकर ढूंढना ही क्यूं? गंगा जल हाथ पर लेकर मेरे साथ मंत्र दोहरा दीजिए, मैं पूर्णतः सुनिश्चित हो जाऊंगा।

संन्यासी शिवम:– यदि विजयदर्थ ये बात आकर कहते तो मैं एक बार सोचता भी, तुम किस अधिकार से मुझे सीधा आदेश दे रहे हो।

निमेषदर्थ:– संन्यासी तुम्हारी बातों से मुझे समझ में आ गया है कि अमेया तुम्हारे ही पास है। जल्दी से उस बच्ची को लौटा दो, वरना अंजाम अच्छा नही होगा...

संन्यासी शिवम ने एक छोटा सा मंत्र पढ़ा और कुछ ही पल में विजयदर्थ वहां पहुंच चुका था। विजयदर्थ जैसे ही वहां पहुंचा संन्यासी शिवम पर खिसयाई नजरों से देखते.... “संन्यासी एक योजन में तुम्हारे बुलाने से मैं चला क्या आया, तुम तो मुझे परेशान करने लगे।”

सन्यासी शिवम्:– जरा पीछे मुड़कर देखिए फिर पता चलेगा की कौन किसको परेशान कर रहा है।

विजयदर्थ जैसे ही पीछे मुड़कर देखा, सामने निमेषदर्थ खड़ा था। उसे यहां देख निमेषदर्थ घोर आश्चर्य करते.... “तुम यहां क्यों आये हो?”

निमेषदर्थ:– पिताजी इन्ही लोगों के पास अमेया है।

विजयदर्थ, खींचकर एक तमाचा जड़ते..... तुम सात्विक आश्रम द्वारा संचालित एक मठ के संन्यासी से उनके गुरु आर्यमणि की बच्ची को मांगने आये हो?

निमेषदर्थ:– पिताजी मुझे नही पता था कि...

विजयदर्थ ने पूरी बात सुनना भी उचित नही समझा। वह अपना पंजा झटका और निमेषदर्थ के गले, हाथ और पाऊं मोटे जंजीरों में कैद हो चुके थे। विजयदर्थ अपनी गुस्से से लाल आंखें दिखाते..... “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई थल पर आकर अपनी पहचान जाहिर करने और यहां के जीवन में हस्तछेप करने की। वैसे भी तुम मेरे उत्तराधिकारी कभी नहीं रहे और आज की हरकतों के बात तुम राजकुमार भी नही रहे। अपनी सजा भुगतने के बाद तुम सामान्य नागरिक का जीवक जीयोगे। संन्यासी इसकी गलती की सजा मैं दे रहा हूं। आप से विनती है आप भी इस बात को यहीं समाप्त कर दे।”

संन्यासी शिवम:– आपके न्याय प्रणाली से मैं बेहद प्रसन्न हुआ। ठीक है मैं इस बात को यहीं समाप्त करता हूं।

इस वाकये के बाद निमेषदर्थ अपने हर तरह के अधिकार खो चुका था। हां वो भी एक दंश का मालिक था, इसलिए उस दंश का अधिकार उस से नही छीना जा सकता था। अपनी कैद से खुन्नस खाया विजयदर्थ, रिहा होते ही अपनी बहन हिमा से मिला और अपनी सजा के लिये चाहकीली को जिम्मेदार मानते हुये उसे मारने की योजना बना लिया। जिस दिन चाहकीली को जान से मारने की तैयारी चल रही थी, आर्यमणि अपनी साधना को वहीं पूर्ण विराम लगाते, अपनी आंखें खोल लिया।

सोधक जीव के गुप्त स्थान से आर्यमणि उठकर बाहर आया। कुछ दूर चलने के बाद आर्यमणि सोधक प्रजाति के आबादी वाले क्षेत्र में पहुंच गया। क्षेत्र के सीमा पर चाहकीली के पिता शावल मिल गये। बड़ी चिंता और बड़े–बड़े आंसुओं के साथ आर्यमणि को देखते..... “आर्यमणि वो मेरी बच्ची चाहकीली।”...

आर्यमणि धीमे मुस्कुराया और अपना हाथ शावल के बदन पर रखते..... “चिंता मत करो, चाहकीली को कुछ नही होगा। कल सुबह तक वो तुम लोगों के साथ होगी। मै इतना ही बताने यहां तक आया था।”...

अपनी बात कहकर आर्यमणि सीधा अंतर्ध्यान हो गया और उस सभा में पहुंचा जहां चाहकीली को मृत्यु की सजा दी जा रही थी। आर्यमणि भिड़ के पीछे से गरजते हुये.... “तुम्हे नही लगता की तुम्हारी ये सभा भ्रष्ट हो चुकी है। मां जैसे एक मासूम से जीव के दिमाग को काबू कर उसे मारने जा रहे हो?”

“मेरी सभा में ये कौन बोला?”..... आर्यमणि के सवाल पर उस सभा का मुखिया ने गरजते हुये पूछा। आर्यमणि यह आवाज भली भांति पहचानता था। आर्यमणि जैसे–जैसे अपनी दोनो बांह फैला रहा था, वैसे–वैसे भिड़ दोनो किनारे हो रही थी और बीच से रास्ता बनते जा रहा था। आर्यमणि के नजरों के सामने उसका दोषी निमेषदर्थ खड़ा था। बीच का रास्ता जो खाली था, इस खाली रास्ते पर अचानक ही जड़ों ने कब्जा जमा लिया और देखते ही देखते निमेषदर्थ जड़ों में लिपटा हुआ था।

जड़ों में लिपटने के साथ ही निमेषदर्थ की यादें आर्यमणि के पास आने लगी और उस याद में आर्यमणि ने अपने एक और दोषी को पाया जो इस वक्त इसी सभा में मौजूद थी किंतु हत्याकांड वाले दिन वह दिखी नही थी। निमेषदर्थ की बहन हिमा। जैसे ही आर्यमणि को अपना दूसरा दोषी मिला, आर्यमणि बिना वक्त गवाए उसे भी जड़ों में जकड़ चुका था।

दोनो किनारे पर जो भीड़ खड़ी थी, उसमे एक हजार कुशल सैनिक भी थे। हालांकि वो जड़ों में तो नही जकड़े थे, लेकिन किसी अदृश्य शक्ति ने उनके पाऊं जमा दिये हो जैसे। कोई भी हील तक नही पा रहा था। आर्यमणि एक–एक कदम बढ़ाते हुये निमेषदर्थ के पास पहुंचा। आर्यमणि अपने गुस्से से लाल आंखें निमेषदर्थ को दिखाते .... “आखिर किस लालच में तुमने मेरे परिवार को मार डाला था निमेष।”...

निमेषदर्थ:– देखो आर्यमणि मैं तो बस एक मोहरा था।

आर्यमणि:– तुम्हारी यादों में मैं सब देख चुका हूं। तभी तो तुम्हारी बहन भी जड़ों में जकड़ी हुई है। तुम दोनो अपने आखरी वक्त में किसी को याद करना चाहो तो कर सकते हो।

“ठीक है मुझे वक्त दो। मै सबको याद कर लेता हूं।”.... इतना कह कर निमेषदर्थ अपनी आंख मूंदकर जोड़–जोड़ से कहने लगा.... “हे मेरे अनुयाई, मेरे रक्षक.. मैं तुम्हे याद कर रहा हूं। सबको मैं दिल से याद कर रहा हूं। ऐसा लग रहा है मेरे प्राण अब जाने वाले है। मौत मेरे नजरों के सामने खड़ी है। वह मुझे बेबस कर चुकी है। वह मुझे घूर रही है और किसी भी वक्त मुझे अपने चपेट में ले लेगी।”...

निमेषदर्थ चिल्लाकर अपनी भावना कह रहा था। हर शब्द के साथ जैसे वहां का माहोल बदल रहा हो। निमेषदर्थ जहां खड़ा था, उस से तकरीबन 100 मीटर आगे चाहकीली अचेत अवस्था में लेटी थी। निमेषदर्थ के हर शब्द के साथ उसमें जैसे जान आ रहा हो। जैसे ही निमेषदर्थ का बोलना समाप्त हुआ वहां का माहौल ही बदल गया।

चारो ओर सोधक प्रजाति के जीव फैले हुये थे। सोधक जीव की संख्या इतनी थी कि एक के पीछे एक कतार में इस प्रकार खड़े थे कि मानो जीवित पहाड़ों की श्रृंखला सामने खड़ी थी। न सिर्फ सोधक प्रजाति थे बल्कि शार्क और व्हेल जैसी मछलियां की भी भारी तादात में थी, जो सोधक प्रजाति के आगे थी और उन सबने मिलकर निमेषदर्थ को घेर लिया था।

चाहकीली तो सबसे पास में ही थी। खूंखार हुई शार्क और वेल्स के साथ वह भी निमेषदर्थ के चक्कर लगा रही थी। इसी बीच निमेषदर्थ खुद को जड़ों की कैद से आजाद करके पागलों की तरह हंसने लगा..... “क्या सोचे थे हां... मेरी जगह पर मुझे ही मार सकते हो। अभी तक तो इन जानवरों को ये नहीं पता की मेरी मौत कौन है। जरा सोचो मेरे एक इशारे पर तुम्हारा क्या होगा? फिर अभी तो तुम पर यह जानवर भरी पड़ेगा। इन जानवरों का मालिक मैं, फिर तुम पर कितना भारी पर सकता हूं।”...

आर्यमणि, निमेषदर्थ की बातें सुनकर मुश्कुराया। फिर उसकी बहन हिमा के ओर देखते..... “तुम्हे भी कुछ कहना है?”...

हिमा:– मुझे कुछ बोलने के लिये तुम जैसों के इजाजत की ज़रूरत नही। भाई इसे जानवरों का चारा बना दो।

निमेषदर्थ:– बिलकुल बहना, अभी करता हूं।

फिर तो मात्र एक उंगली के इशारे थे और सभी खूंखार जलीय जीवों ने जैसे एक साथ हमला बोल दिया हो। जिसमे चाहकिली सबसे आगे थी। आर्यमणि के शरीर से 50 गुणा बड़ा मुंह फाड़े चाहकिली एक इंच की दूरी पर रही होगी, तभी वहां के माहौल में वह दहाड़ गूंजी जो आज से पहले कभी किसी ने नहीं सुनी गयी थी। ऐसी दहाड़ जो महासागर के ऊपरी सतह पर तो कोई भूचाल नही लेकर आयी लेकिन पानी की गहराई में कहड़ सा मचा दिया था। ऐसी दहाड़ जिसे सुनकर जलीय मानव का कलेजा कांप गया। ऐसी दहाड़ जिसे सुनने वाले हर समुद्री जीव अपना सर झुकाकर अपनी जगह ठहर गये। जीव–जंतुओं को नियंत्रित करने की इतनी खतरनाक वह दहाड़ थी कि पूरे महासागर के जीव–जंतु जिस जगह थे वहीं अपने सर झुका कर रुक गये।

आर्यमणि:– चाहकीली क्या तुम मुझे सुन रही हो...

चाहकीली:– कोई विधि से मेरी जान ले लो चाचू। मै इस नालायक निमेषदर्थ की बातों में आकर आपको ही निगलने वाली थी। मुझे अब जीवित नहीं रहना...

आर्यमणि:– अपना सर ऊपर उठाओ...

चाहकीली अपना सर ऊपर की। उसके आंखों से उसके आंसू बह रहे थे। आर्यमणि अपना हाथ बढ़ाकर उसके एक बूंद गिरते आंसू को अपने हथेली पर लेते.... “बेटा रोने जैसी बात नही है। तुम्हारा दिमाग निमेष के कब्जे में था। अब मेरी बात ध्यान से सुनो।”...

निमेषदर्थ:– ये तुम कर कैसे रहे हो। मेरे जानवरों को होश में कैसे ले आये...

आर्यमणि का फिर एक इशारा हुआ और एक बार फिर निमेषदर्थ जड़ों में जकड़ा हुआ था.... “निमेष तुमसे मैं कुछ देर से बात करता हूं। तब तक हिमा तुम अपने आखरी वक्त में किसी को याद करना चाहो तो कर लो।”.... इतना कहने के बाद अपने हथेली के आंसू को अभिमंत्रित कर.... “चाहकीली अपना सर नीचे करो”...

चाहकिली थोड़ा पीछे हटकर अपना सर पूरा नीचे झुका दी। आर्यमणि थोड़ा ऊपर हुआ और चाहकीली के माथे के ठीक बीच आंसू वाला पूरा पंजा टिकाते हुये..... “आज के बाद तुम्हारे दिमाग को कोई नियंत्रित नही कर सकेगा। इसके अलावा जितने भी सोधक का दिमाग किसी ने काबू किया होगा, तुम्हारे एक आवाज पर वो सब भी मुक्त होंगे। अब तुम यहां से सभी जीवों को लेकर जाओ। मै जरा पुराना हिसाब बराबर कर लूं।”

चाहकीली:– चाचू मुझे भी इस निमेष का विनाश देखना है।

आर्यमणि:– वो जड़ों की कैद से आजाद होने वाला है। मै नही चाहता की यहां के युद्ध में एक भी जीव घायल हो। मेरी बात को समझो। तुम चाहो तो इन्हे दूर ले जाने बाद वापस आओ और एक किलोमीटर दूर से ही इसके विनाश को देखो। ऐसा तो कर सकती हो ना।

चाहकीली, चहकती हुई... “हां बिलकुल चाचू।”... इतना कहने के बाद चाहकीली एक कड़क सिटी बजाई और सभी जीवों को लेकर वहां से निकली। वो जगह जैसे ही खाली हुई, आर्यमणि दोनो भाई बहन को खोलते.... “उम्मीद है तुमने अपने सभी प्रियजनों को याद कर लिया होगा। अब अपनी मृत्यु के लिये तैयार हो जाओ।”

“किसकी मृत्यु”.... इतना कहकर हिमा ने अपना दंश को आर्यमणि के सामने कर दिया। उसके दंश से लगातार छोटे–छोटे उजले कण निकल रहे थे जो आर्यमणि के ओर बड़ी तेजी से बढ़ रहे थे। देखने में ऐसा लग रहा था जैसे एनीमशन में शुक्राणु चलते है। ये उजले कण भी ठीक उसी प्रकार से आर्यमणि के ओर बढ़ रहा था।

सभी कण लगातार आर्यमणि के ओर बढ़ रहे थे लेकिन जैसे ही वह एक फिट की दूरी पर रहते, अपने आप ही नीचे तल में गिरकर कहीं गायब हो जाते। फिर तो कई खतरनाक हमले एक साथ हुये। पहले हिमा अकेली कर रही थी। बाद ने हिमा और निमेषदर्थ ने एक साथ हमला किया। उसके बाद निमेषदर्थ ने अपने 1000 कुशल सैनिकों को आज़ाद करके सबको साथ हमला करने बोला।

आर्यमणि अपना दोनो हाथ ऊपर उठाते.... “एक मिनट रुको जरा।”...

निमेषदर्थ:– क्यों एक साथ इतने लोग देखकर फट गयी क्या?

आर्यमणि:– फट गयी... फट गयी.. ये मेरी अलबेली की भाषा हुआ करती थी, जिसकी मृत्यु की कहानी तुमने लिखी थी।

कुछ बूंद आंसू आंखों के दोनो किनारे आ गये। आर्यमणि उन्हे साफ करते.... “हां फट गयी समझो। यहां आम लोग है, पहले उन्हे जाने दो। मै कौन सा यहां से भागा जा रहा हूं।”

निमेषदर्थ कुछ देर के लिये रुका। वहां से जब सारे लोग हटे तब एक साथ हजार लोगो की कतार थी। ठीक सामने आर्यमणि खड़ा। निमेषदर्थ का एक इशारा हुआ और हजार हाथ आर्यमणि के सामने हमला करने के लिये तन गये। उसके अगले ही पल हर जलीय सैनिक के हाथ से काला धुआं निकल रहा था। निमेषदर्थ और हिमा के दंश से भी भीषण काला धुवां निकल रहा था। धुएं के बीच आर्यमणि कहीं गुम सा हो गया। कहीं किसी तरह की कोई हलचल नहीं।
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