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Incest Maa beheno ka pyar

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Premkumar65

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अगले दिन मैं मम्मी के आंखों में उस प्यास को तलाश करने लगा जो उसने नैना आंटी के साथ बात करते वक्त जिक्र किया था. लेकिन मम्मी की बातें कहीं उलझी हुई नजर आ रही थी. मम्मी इतनी जल्दी मानने वालों में से तो नहीं है. जब भी नैना आंटी उसे बेटे के बारे में कहती तो मम्मी का विरोध बढ़ जाता था. क्योंकि वो अभी भी ऐसे रिश्ते के खिलाफ थी.

मैं सुबह बैठ पढ़ाई कर रहा था और कुसुम दीदी मेरे सामने, एक बिना स्लीव वाली टॉप में बैठी थी. मेरा मन पढ़ाई में कम मम्मी की बातों में और उसकी चाहत में ज्यादा था. तभी मेरी नजर कुसुम दीदी के छाती पर पड़ा जहां उसकी चूचियां टॉप से ढकी हुई थी. लेकिन वो ढकी होने के बाद भी काफी आकर्षक लग रही थी. मेरी नजर उन पर टिक गई और कुछ पल के लिए मैं भूल गया कि मैं पढ़ने बैठा हूं.

अपनी मम्मी की छिपी हुई कामुकता का ख्याल एक चिंगारी की तरह था, और अब अपनी बहन को देखकर मुझे अपने लंड में एक गर्माहट महसूस हो रहा था. मैं बस उसे देखता रहा, एक मूर्ति के तरह बैठा हुआ, उसके सीने को निहारता रहा. दीदी ने भी इस बात पर ध्यान दिया कि मैं उसके स्तनों को देखने की कोशिश कर रहा हूं. उसने तुरंत चुटकी बजाते हुए मेरा ध्यान तोड़ दिया.


कुसुम दीदी: (धीमी लेकिन गुस्से भरी आवाज में) क्या देख रहा है?
मैं: कुछ भी तो नहीं. बस ऐसे ही कुछ सोच रहा था.
कुसुम दीदी: बहुत सोचता है तू. पिछले 10 मिनट से देख रही हूं इस एक पन्ने को खोलकर बैठा हुआ है. तू पढ़ाई कर भी रहा है या फिर नौटंकी.


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मैं फिर से अपना ध्यान पढ़ाई की ओर किया. कुछ देर बीते लेकिन मन नहीं माना, मम्मी के किचन में खाना बनाने का आवाज बार-बार मेरे कानों में आ रहा था. जिसकी वजह से मेरा मन बेचैन था और जल्दी से उसे मिलने का बहाना ढूंढने लगा.

मैं: दीदी मैं आता हूं पानी पीकर. मुझे बहुत प्यास लग रही है.
कुसुम दीदी: ठीक है जा...

मैं जल्दी से उठ खड़ा हुआ और किचन की तरफ जाने लगा. मेरे दिमाग में चल रही उथल-पुथल शांत होने का नाम नहीं ले रही थी. जब भी कमरा शांत होता, मम्मी और नैना आंटी की आवाज़ की रिकॉर्डिंग मेरे दिमाग में बार-बार बजने लगती. जैसे ही मैं किचन में दाखिल हुआ, मैंने उन्हें देखा. मम्मी काउंटर के पास खड़ी थीं और उनकी पीठ मेरी तरफ थी.

वो अभी मुझे नजरअंदाज कर रही थी. मैंने फ्रिज से पानी लिया और उसे घूरते हुए पी रहा था. उसका ध्यान बिल्कुल मेरी तरफ नहीं था. वो खाना बनाने में व्यस्त थी. पानी पीकर मैं ग्लास रखा और अचानक उसके करीब जाकर उसकी कमर में हाथ डालकर अपनी ओर खींचा जिससे उसके बदन में सिहरन पैदा हो गई. वो चौंक गई और अपना चेहरा मेरी तरफ घुमाया. मेरी गर्म साँसें उसकी गर्दन पर महसूस हो रही थी. मैंने वक्त ना बर्बाद करते हुए तुरंत झुका और अपने होंठ उसके कान के ठीक नीचे टिका दिए.



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मैंने उसके गाल और फिर उसके जबड़े पर ज़बरदस्ती चुम्मा लेने लगा और आखिर में उसके होठ चुम लिया.

मैं: आप मुझसे बात क्यों नहीं कर रही हो?
मम्मी: तेरी इसी लक्षण की वजह से...तूने समझ कर क्या रखा है मुझे? जब जो चाहे वो कर देगा?
मैं: क्यों मजा नहीं आया था आपको पिछली बार?
मम्मी: (गुस्से में) छोड़ मुझे.

वो यह सब कह रही थी लेकिन मैं फिर भी उसे चूमता रहा. मैंने उसका सिर पीछे की ओर झुकाया और अपने होंठों को उसके होंठों पर ज़ोर से दबाया. वो एक कामुक और ज़बरदस्त चुंबन था. एक पल के लिए वो जम सी गई, उसके होंठ कसकर भिंचे हुए थे. लेकिन फिर, जैसे कुछ टूट गया ओर उसके होंठ नरम पड़ गए.


जैसे ही हमारा चुंबन गहरा हुआ और मुझे महसूस हुआ कि उसका शरीर मेरे शरीर से सटकर पिघलने लगा है, तभी दरवाज़े की तरफ से आई आहट की आवाज ने मेरे रोंगटे खड़े कर दिए. मैंने तुरंत चुम्मा लेना छोड़ दिया लेकिन इससे पहले कि मैं पीछे हट पाता, कुसुम दीदी दरवाजे पर खड़ी हो गई. वो मेरे पीछे-पीछे आई थी. मैंने उससे कहा था कि मैं बस पानी लेने जा रहा हूं, लेकिन उसे ज़रूर एक अजीब एहसास हो गया होगा जो मुझमें पूरे दिन से थी. उसने चुम्मा करते हुए तो नहीं देखा, मैं सही समय पर पीछे हट गया था. लेकिन उसने हमारी पोज़िशन ज़रूर देख ली थी. उसने देखा कि मैं मम्मी को पीछे से पकड़े हुए था और मेरे हाथ उसके गांड पर इस तरह से थे जो एक माँ और बेटे के रिश्ते के हिसाब से बहुत ज़्यादा अंतरंग थे.



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मम्मी ने जल्दी से अपनी साड़ी ठीक की, उसके हाथ बुरी तरह कांप रहे थे. उसने न तो मेरी तरफ देखा और न ही कुसुम दीदी की तरफ. वो खाना पकाने में व्यस्त होने का दिखावा करने लगी. मुझे लगा था कि दीदी पापा को फ़ोन करेंगी, या मुझे थप्पड़ मारेंगी, या चिल्लाने लगेंगी कि मैं कितना बुरा हूं. लेकिन उसने ऐसा कुछ नहीं किया. वो बस वहीं खड़ी रही, उसकी नज़रें मुझ पर और मम्मी पर घूम रही थी. उसके चेहरे पर डर के भाव नहीं थे, वो कुछ ज़्यादा ही पेचीदा बात थी. दीदी बस मुड़ी और किचन से बाहर चली गई.

कोई प्रतिक्रिया न होना, आमना-सामना होने से भी ज़्यादा डरावना होता है. एक घंटा बीत गया, मम्मी अपने कमरे में चली गई और दरवाज़ा बंद कर लिया. मैं दीदी के साथ लिविंग रूम में बैठा था. उसके बाद वो भी अपने कमरे में जाने के लिए उठी, लेकिन जाते-जाते उसने गंभीरता से कुछ कहा.


कुसुम दीदी: तुझसे मैं शाम को बात करती हूं.

ये वाकई में एक डरावना पल था. जो चीज छुपे तौर तरीके से होना चाहिए था वो अब एक और गलत दिशा में जा रहा था. लेकिन कुसुम दीदी का सामना करना मेरे लिए शेर का सामना करने के बराबर था. न जाने उसने क्या-क्या सोच लिया होगा. मैं अपने कमरे में गया लेकिन बेचैनी बरकरार थी. मैं बस शाम होने का इंतजार कर रहा था की कुसुम दीदी आखिर क्या करेगी.

वक्त बिता गया और धीरे-धीरे शाम का समय आ गया. तभी मेरे दरवाजे पर दस्तक हुई. मैंने घबराते हुए दरवाजा खोला तो सामने कुसुम दीदी थी.


कुसुम दीदी: यहां नहीं, चल छत पर बात करना है.

छत पर पहुंचते ही मेरा दिल जोरो से धड़क रहा था, कुसुम दीदी ने अपनी पूछताछ शुरू की.

कुसुम दीदी: मुझे जवाब दे, तु मम्मी को उस तरह क्यों पकड़े हुए थे? मैंने तेरे हाथ उनकी कमर पर देखे. मैंने देखा कि तु अपना शरीर उनके शरीर से सटा रहा था. वो कोई गले मिलना नहीं था. न ही तु उन्हें सहारा दे रहा था. वो कुछ और ही था.
मैं: मैं बस खाने के बारे में पूछ रहा था.
कुसुम दीदी: मुझसे झूठ मत बोल. हमारे बीच जो हुआ, उसके बाद तो बिल्कुल नहीं. क्या तुझे लगता है कि मैं भूल गई हूँ? मुझे वो किस याद है. मुझे याद है कि तुने मुझे किस नज़र से देखा था, और कैसे तुने मेरे साथ हदें पार करने की कोशिश की थी.


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मैं: मैं क्या करूं मैंने अपना हाल आपको समझाया था पहले भी. ये लकीरें किसने खींची हैं? समाज ने? किसी पुरानी किताब ने? मैं एक मर्द हूँ, दीदी.
कुसुम दीदी: आशीष, तु अभी मर्द' नहीं बना है. तु एक ऐसा लड़का है जो अपनी भावनाओं के बहकावे में आकर खुद को बर्बादी की कगार पर ले जा रहा है. ये ज़रूरतों की बात नहीं है. ये डिसिप्लिन की कमी है.
मैं: दीदी, मुझे बस एक पार्टनर चाहिए! कोई ऐसा जिसे मैं छू सकूँ, और जो मेरे अंदर की इस तड़प को शांत कर सके. मैं जवान हूं और ऐसे घर में फंसा हुआ हूं जहाँ सब ऐसा दिखावा करते हैं जैसे सेक्स जैसी कोई चीज़ ही नहीं होती.
कुसुम दीदी: तुझे फिर थप्पड़ खाना है? क्या बोल रहा है तू? थोड़ी भी शर्म नहीं अपनी बेहन से किस तरह बात करना है.
मैं: तो आप ही बताओ मैं क्या करूं?
कुसुम दीदी: तो ठीक है मैं अब खुल कर बात करती हूं.

उसके लहजे में गुस्से की जगह एक सख्त, बड़ी बहन जैसी सिख थी.

मैं: मुझे लगा था कि आप बहुत गुस्से में होगे. लेकिन आप तो बस... शांति से मुझे सब समझा रहे हो. मुझे समझ नहीं आ रहा.
कुसुम दीदी: मेरी शांति को माफ़ी मत समझना. मैं गुस्से में हूँ. मेरा गुस्सा उससे कहीं ज़्यादा है.
मैं: तो फिर आप चिल्ला क्यों नहीं रही हो?
कुसुम दीदी: क्योंकि तुझे पीटने या तुझ पर चिल्लाने से कोई हल नहीं निकलेगा. इससे तेरे दिमाग़ में चल रहे विचार नहीं मिटेंगे, और न ही इस घर का माहौल ठीक होगा.
मैं: कुसुम... दीदी... अगर आप सच में समझती हैं, तो प्लीज. मैं यह अकेले नहीं कर सकता. मैं इन इच्छाओं से अकेले नहीं लड़ सकता. मुझे लगता है कि मैं पागल हो रहा हूँ.
कुसुम दीदी: तु मुझसे क्या कह रहा है, आशीष?
मैं: मुझे आपके साथ की ज़रूरत है. सिर्फ़ एक ऐसी बहन के तौर पर नहीं जो मुझे पढ़ने के लिए कहती है, बल्कि एक ऐसी इंसान के तौर पर जो जानती है कि यहाँ फँसे होने का क्या मतलब है. मेरी मदद करो.


मैं दीदी के चेहरे पर चल रही उथल-पुथल देख सकता था. उसका सख्त चेहरा ढीला पड़ रहा था, और उसमें एक ऐसी उत्सुकता और कमज़ोरी दिख रही थी जो बिल्कुल मेरी जैसी थी.

कुसुम दीदी: तु उस इंसान से साथ माँग रहा है जिसे तुने बहकाने की कोशिश की थी.
मैं: क्योंकि सिर्फ आप ही जानती हैं. सिर्फ आप ही हैं जो दिखावा नहीं कर रही है.
कुसुम दीदी: अपने कमरे में जा, अभी मैं कुछ नहीं कह सकती. लेकिन हम इस बारे में फिर बात करेंगे. चेतावनी के तौर पर नहीं, बल्कि बातचीत के तौर पर. बस... मम्मी को तब तक दोबारा मत छूना जब तक मैं तुझे न बताऊँ कि इसे कैसे संभालना है.


मैंने सिर हिलाया, मेरे दिमाग में कई बातें चल रही थी. मैं वापस अपने कमरे में गया, लेकिन अब जीत का एहसास कुछ अलग था. मैं सिर्फ सज़ा से ही नहीं बचा था, मुझे उसी इंसान में एक साथी मिल गया था जिसे मुझे रोकना था और जो इस खेल में मेरे लिए सबसे बड़ी दुश्मन थी.

रात के वक्त, जो रिकॉर्डिंग बची थी मैं उसे सुनने के लिए बेचैन था. इसीलिए मैंने ध्यान लगाते हुए फिर से सुनना शुरू किया.


नैना: सीमा, तुम्हारी आवाज़ थोड़ी ठीक से नहीं आ रही है.
मम्मी: हेलो, अब सुनाई दे रहा है?
नैना: हां हां बोलो. फ्री हो गई सारे कामों से?
मम्मी: हां वही रोज रोज के काम. मैं तो वही सोच रही थी, मैं तय नहीं कर पा रही हूं कि तुम सही हो या गलत. एक औरत होने के नाते मैं जानती हूं कि तुम्हारी शारीरिक मजबूरियां रही होगी.
नैना: सच बताओ, पति के दूर होने पर तुम असल में कैसे मैनेज कर रही हो?
मम्मी: (लंबी सांस लेते हुए) मैं ठीक हूँ, नैना. सच में. मैं अपनी बेटियों और आशीष के साथ खुश हूँ, घर में शांति है... लेकिन झूठ नहीं बोलूँगी, कभी-कभी अकेलापन बहुत महसूस होता है. दो महीने हो गए हैं, बिस्तर का एक हिस्सा खाली रहते हुए.
नैना: मैं तुम्हारी आवाज़ से समझ सकती हूँ. तुम किस चीज की कमी महसूस कर रही हो.
मम्मी: मुझे बस उनकी मौजूदगी की कमी खलती है. उनके साथ की. लेकिन अजीब बात है... मुझे लगता है कि मैं कहीं खो रही हूँ. तुम ये कैसे करती हो, नैना?
नैना: खुद से सच कहो. तुम्हारा दिल तो तुम्हारे पति को याद करता है, पर तुम्हारा शरीर? तुम्हारी चूत तड़प रही है, है ना? वो गहरी, कसकती हुई तड़प जो सिर्फ़ इसलिए नहीं जाती कि तुम किसी ऐसे इंसान से प्यार करती हो जो हज़ारों मील दूर है.
मम्मी: (हैरानी से) "नैना! प्लीज़... यह अश्लील है.
नैना: किसके लिए अश्लील है? दीवारों के लिए? हवा के लिए? हम औरतें हैं, अगर तुम उस तड़प को शांत नहीं करोगी, तो वह कड़वाहट में बदल जाएगी जो तुम्हें अंदर ही अंदर खोखला कर देगी.
मम्मी: ये नामुमकिन है. मैं एक माँ हूँ, एक पत्नी हूँ. मेरी एक इज़्जत है.
नैना: तुम्हें किसी अजनबी की ज़रूरत नहीं है, तुम्हें ऐसे इंसान की ज़रूरत है जो पहले से ही तुम्हारे आस-पास हो. जिस पर तुम भरोसा करती हो. जो तुम्हें वैसा ही देख सके जैसी तुम असल में हो.
मम्मी: मुझे समझ नहीं आ रहा कि तुम क्या कहना चाहती हो.
नैना: आशीष के बारे में सोचो. वो अब जवान हो गया है. मज़बूत और वो तुम्हारे साथ घर में ही तो रहता है.

ये हैरानी की बात थी. नैना आंटी की दी गई मम्मी को ऐसी सलाह की वो अपने बेटे से ही चूदवाले ले. मैं बता भी नहीं सकता उस वक्त इन दो औरतों की बातें सुनकर मेरे शरीर में कितनी बेचैनी थी.

मम्मी: (कुछ सेकंड की खामोशी) ...क्या?
नैना: जरा सोचो तो सही. उसे अपना दोस्त बनाओ. वो तुम्हें उस तरह समझ सकता है जैसा तुम्हारी बेटियाँ कभी नहीं समझ पाएँगी. वो तुम्हारी उन ज़रूरतों को पूरा कर सकता है और तुम्हारे राज़ को भी सुरक्षित रख सकता है.

मम्मी: नैना, ये बहुत ही भयानक बात है! वो मेरा बेटा है!
नैना: और वो एक मर्द भी है. कुदरत से क्यों लड़ना? जब समाधान तुम्हारे ही घर में मौजूद है, तो चुपचाप क्यों तड़पना?
मम्मी: ये गलत है! ये हमारी संस्कृति के खिलाफ और घिनौना है! हमारे समाज में, ये सबसे बड़ा पाप है. मैं आशीष को कभी भी उस नज़रिए से नहीं देख सकती.
नैना: तुम बहुत सोचती हो. मैंने समझाया था ना, संस्कृति बस उन लोगों के बनाए नियम हैं जो खुशी महसूस करने से डरते थे. तुम इसे पाप कहती हो, लेकिन मैं इसे आज़ादी कहती हूँ.
मम्मी: और वैसे भी... उसे पढ़ाई करनी है! उसकी पढ़ाई के लिए ये बहुत अहम समय है. उसे अपनी किताबों पर ध्यान देना चाहिए, न कि अपनी माँ की इच्छाओं पर!
नैना: तुम कहती हो कि उसे पढ़ाई करनी चाहिए. लेकिन मैं तुम्हें नौजवानों के बारे में एक राज़ की बात बताती हूँ... जब उनका तनाव दूर हो जाता है, तो वे कहीं बेहतर ढंग से पढ़ाई करते हैं.

आंटी की ये सब बातें सुनकर, मम्मी की आवाज में एक आह भरी थी.

मम्मी: तुम मेरे साथ ऐसा क्यों कर रही हो? तुम मुझे किसी ऐसी चीज़ की तरफ क्यों धकेलने की कोशिश कर रही हो जो इतनी... भयानक है?
नैना: क्योंकि मैं तुम्हारी परवाह करती हूँ, डार्लिंग. मैं भी इस रास्ते से गुज़री हूँ. जरा सोचो आशीष के चेहरे पर क्या भाव होंगे जब उसे पता चलेगा कि उसकी माँ सिर्फ़ उसकी देखभाल करने वाली नहीं, बल्कि एक ऐसी औरत है जिसकी एक ऐसी प्यास है जिसे सिर्फ वही बुझा सकता है.
मम्मी: तुम्हारी बातें सुनकर मुझे लग रहा है कि मैं पागल हो जाऊँगी.
नैना: ये पागलपन नहीं है. क्या ये डर है? या फिर ये सोचो कि उसका जवान लंड तुम्हारी तड़पती हुई चूत में अंदर जा रहा है?
मम्मी: ये बहुत गलत है... मैं उसे देख भी नहीं सकती, बिना कुछ महसूस किए. मैं बहुत डरी हुई हूँ.
नैना: उसे कोई इशारा दो, सीमा. उस लड़के को वो आदमी बनने का मौका दो, जिसकी तुम्हें ज़रूरत है.
क्या अपने बेटे के बारे में सोचते हुए तुम्हारी उंगलियां उस गीलेपन में फिसल रही हैं?

मम्मी: हाँ... हाँ...भगवान मेरी मदद करे, मैं खुद को रोक नहीं पा रही हूँ.
नैना: (संतुष्टि भरी आवाज़ में) हाँ, अब अपनी आँखें बंद करो. सोचो कि वो तुमसे कह रहा है कि वो अपनी माँ के साथ सेक्स करना चाहता है.
मम्मी: (ज़ोर से कराहते हुए, कांपती आवाज़ में) हे भगवान... आशीष... आह...... मैं नहीं कर सकती...
नैना: हाँ, तुम कर सकती हो. खुद को इसमें बहने दो. मैं तुम्हें कल फ़ोन करूँगी. अच्छी नींद लेना.

ये सब क्या था? बात इस हद तक गुजर गई थी और मुझे पता भी नहीं! वो तो अच्छा हुआ कि मैंने रिकॉर्डिंग सुन ली. लेकिन इसमें नैना आंटी का क्या फायदा हुआ? मेरे समझ में नहीं आ रहा था. क्या वो अपनी जैसी ही एक और औरत को बनाना चाहती थी या फिर वाकई में मम्मी को अपने अनुभव से मदद करना चाहती थी जैसा कि उसने कहा था.


मेरी हिम्मत पूरी तरह से बढ़ गई क्योंकि मैं समझ गया की मम्मी भी प्यासी है और रिकॉर्डिंग से यह साफ था कि उसने मेरा नाम लेते हुए अपनी चूत को सहलाया था. मेरा मन कर रहा था कि मैं तुरंत मम्मी के कमरे में जाकर उसकी सारी इच्छाएं पूरी कर दूं. लेकिन यहां मामला पेचीदा हो गया था. क्योंकि कुसुम दीदी ने भी मुझसे वादा करवाया था कि मैं मम्मी के साथ कुछ गलत ना करूं. मेरे हाथ में मेरे घर की तीनों औरतों का लगाम था और अब ये मेरे ऊपर निर्भर था पूरी तरह से, मैं किसको अपनी ओर पहले खींचना चाहता हूं. इसलिए मैंने यहां जोश से नहीं बल्कि होश में रहकर फैसला किया. फिलहाल कुसुम दीदी के साथ की सबसे ज्यादा जरूरत थी और वो इकलौती थी जिसकी चूत का नशा मुझ पर हावी हो गया, इसीलिए उसका कहना मानना जरूरी था.

अगली सुबह हम सब नाश्ता करने के लिए बैठे थे और मम्मी नाश्ता परोस रही थी. कुसुम दीदी रह रहकर कोई मजाकिया बात कर दे रही थी और खास करके उसने मेरे नए हेयर स्टाइल का मजाक उड़ाया जिसकी वजह से माहौल काफी खुशियों भरा था सबके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान थी.



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मम्मी मुझसे बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी और अपनी जज्बातों को दबाए हुए हंस रही थी. इंतजार था कुसुम दीदी के अगले कदम का. रीना दीदी खूबसूरत काली कुर्ती में मेरे बगल में बैठी हुई थी. तभी मैंने टेबल के नीचे अपने पैरों से रीना दीदी के पैरों को सहलाने लगा. वो भी मुझे देखकर मुस्कुराई और आंखों आंखों से इशारा कर रही थी कि कोई देख लेगा. वो अपने पैरों से ही मेरे पैर को हटाने की कोशिश कर रही थी और मैं उसे छेड़े जा रहा था.


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नाश्ता खत्म होने के बाद रीना दीदी शर्मा कर चली गई. कुसुम दीदी अब भी वहीं पर थी मैंने उसे तुरंत पूछा,

मैं: दीदी आपने बोला था कुछ बताने को.
कुसुम दीदी: तू चल अपने कमरे में और पढ़ाई कर, मैं आती हूं.

दीदी का यह कहना, मैं तुरंत उठकर चला गया अपने कमरे के अंदर. कुछ देर बाद में कुसुम दीदी वहां पर आई, पीछे मुड़कर हल्के से क्लिक की आवाज के साथ दरवाजा बंद किया और सीधे मेरी कुर्सी के पास आकर मुझ पर झुक गई. मैंने भी किताबों को एक तरफ किया. मुझे उसके फूलों जैसी ताज़गी भरी खुशबू आ रही थी.


कुसुम दीदी: मैं ये देखने आई थी कि क्या तु सच में ध्यान दे रहा है, या तेरा मन अभी भी उन चीज़ों के बारे में सोच रहा है जिनके बारे में तुझे नहीं सोचना चाहिए.
मैं: मैं कोशिश कर रहा हूँ, दीदी. लेकिन ये मुश्किल है. जब भी मैं मम्मी को देखता हूँ, या जब भी आपको देखता हूँ... तो मुझे अपने सीने में एक अजीब सा दबाव महसूस होता है. एक बेचैनी.

उसकी नज़र मेरी पैंट में उभरे हुए हिस्से पर पड़ती है जो की लंड के तनाव के वजह से हुआ था. फिर उसने मेरी ओर देखा.


कुसुम दीदी: तु कितना साफ-साफ सब ज़ाहिर कर देता है.

मेरा दिल ज़ोरों से धड़क रहा था, मैंने धीरे से हाथ बढ़ाया और झिझकते हुए उसकी कमर को पकड़ा और उसके साथ खड़ा हो गया.

मैं: मैं इसे अकेले नहीं संभाल सकता. आपने कहा था कि आप मेरा साथ दोगी. प्लीज़... मुझे बताओ कि क्या करना है.

मेरा हाथ अभी भी उसकी कमर में था और वह मेरे काफी करीब लेकिन वो एक इंच भी पीछे नहीं हटी.

कुसुम दीदी: सपोर्ट का मतलब ये नहीं है कि मैं बस हार मान लूंगी, आशीष. इसका मतलब है कि मैं तुझे सिखाऊंगी. मैं तुझे दिखाऊंगी कि इस भूख को कैसे कंट्रोल करना है... या इसे कैसे शांत करना है.

उसके यह कहते ही मैं अपना होंठ उसके होठों पर एकदम करीब ले गया इतना करीब कि हम दोनों की गर्म सांसे एक दूसरे के मुंह को गर्म कर रही थी.


मैं: मैं कुछ भी करूँगा. आप जैसा चाहोगी, मैं वैसा ही बन जाऊँगा. बस... प्लीज, रुको मत. मैं बहुत अकेला रहा हूँ, दी. मैं इसके लिए तरसता रहा हूँ.
कुसुम दीदी: मुझे पता है. तुझे ये समझना होगा कि यहाँ सब कुछ मेरे कंट्रोल में होगा.

इसीलिए पहल दीदी ने की और अपने होठों को मेरे होठों पर रख रखते हुए धीमी गति से एक चुम्मा लिया. ये रहस्यमई था, ये जादुई था, क्योंकि जिस कुसुम दीदी को मैं जानता था वो बिल्कुल ही सख्त और खतरनाक थी. गुस्सा तो उसके नाक पर रहता था. पर आज उसने खुद अपने होठों को मेरे होठ से मिलाया. मैं भी देर ना करते हुए उसे गहरी चुंबन की ओर ले गया. मेरी पकड़ उसके कमर पर और मजबूत हो गई हम दोनों की जिस्म एक दूसरे से सट गए.


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मैं उसकी चूचियों की गर्मी अपने सीने पर महसूस कर सकता था और शायद वो मेरे लैंड का तनाव अपनी चूत पर हमने कोई परवाह नहीं की बस एक दूसरे को बाहों में जोर से जकड़ कर चूमने लगे.

वो बरसात वाले दिन, जबरदस्ती से किया गया चुंबन में वो मजा नहीं था जो कि इस वाले में. क्योंकि इस बार दीदी का पूरा सहयोग था.

ये उसके साथ मेरा पहला असली चुंबन था. दांतों और जीभ का एक बेताब और अनाड़ी मिलन. ये दिनों से दबी हुई चाहत का इज़हार था. मैंने उसकी सांसों की मिठास और उसकी नमकीन स्वाद को महसूस किया, मेरी जीभ ज़ोर-ज़ोर से उसके मुँह में जा रही थी, मानो उस पर अपना हक जता रही हो. उसकी जुबान मेरी जुबान के साथ एक ऐसी तेज और जोश भरी लय में थिरकने लगी कि मेरा सिर चकराने लगा.

मुझे उसकी शरीर से निकलती गर्मी महसूस हुई, और मैंने अपना हाथ कपड़े के नीचे खिसकाया, ताकि डोरी खींचकर उसे खोल सकूँ और उसका बदन देख सकूँ. अचानक वो अकड़ गई. उसने झटके से मेरा हाथ हटा दिया, चुंबन तोड़कर कुछ इंच पीछे हट गई. उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं, होंठ गीले थे, लेकिन उसके चेहरे पर फिर से सावधानी और संयम वाले भाव आ गए थे.


कुसुम दीदी: नहीं, आशीष. अभी नहीं. तु बहुत तेज़ी दिखा रहा है. मैंने कहा था न सब कुछ मेरे कंट्रोल में है.
मैं: प्लीज़, दीदी... मैं यह बर्दाश्त नहीं कर सकता. मुझे आपको देखना है. मुझे आपको महसूस करना है. प्लीज़, बस मुझे...

मैं रुका नहीं. मैंने उसके कान में फुसफुसाते हुए कहा कि मैं उसे कितना चाहता हूँ, मैंने इस पल का कितना सपना देखा था, और वही अकेली थी जो मेरी चाहत को समझती थी. मेरे हाथ चलते रहे, उसके कपड़ों के किनारों को छूते हुए, उसकी जॉलाइन और कान के निचले हिस्से को चूमते हुए, और फिर एक नई, बेताब शिद्दत के साथ उसके होंठों पर वापस आते हुए. मैंने उससे गुज़ारिश की, मेरी आवाज कांप रही थी, और मैंने वादा किया कि अगर वो मुझे बस उसे देखने दे, तो मैं उसकी हर बात मानूँगा.

आखिरकार, दीदी की हिचकिचाहट की दीवार टूट गई. उसने एक लंबी, कांपती हुई आह भरी और अपनी बाहों से कसकर मेरी गर्दन को पकड़ लिया, और मुझे वापस एक गहरे, रूह को छू लेने वाले चुंबन में खींच लिया. उसने मेरे होंठों के पास फुसफुसाया, उसकी आवाज़ मुश्किल से सुनाई दे रही थी.


कुसुम दीदी: ठीक है... लेकिन मैं जैसा चाहूंगी सिर्फ वैसा होगा.

उसने ऊपर हाथ बढ़ाया और धीरे-धीरे अपनी कुर्ती के बटन खोलने लगी. मैं मंत्रमुग्ध होकर देखता रहा, जैसे ही कुर्ती उसके कंधों से फिसलकर ज़मीन पर गिरी... मैंने उसके कपड़े हटाए, और रोशनी में उसकी मखमली, गोरी शरीर देखकर मेरे लंड का सुपाड़ा पूरी तरह से फूल गया. मेरी नज़रें उसकी ब्रा की लेस पर टिकी थीं, जो उसके उभरे हुए स्तनों को मुश्किल से ढके हुए थी. मैंने कई बार उसकी चूचियों की कल्पना की थी, लेकिन असलियत किसी भी कल्पना से कहीं ज़्यादा नशीली थी.

मैंने हाथ बढ़ाया, मेरी उंगलियाँ कांप रही थीं जब मैंने उसकी ब्रा के कपड़े को छुआ. मैं ब्रा के नीचे उसकी चूचियों की गर्माहट महसूस कर सकता था, और उस एहसास ने मेरे लंड में बिजली सी दौड़ा दी.


मैं: दीदी... प्लीज. मैं उन्हें चूसना चाहता हूँ.
कुसुम दीदी: नहीं, आशीष. ये बहुत ज़्यादा हो रहा है. हमने पहले ही किस किया है. मैं तुझे इससे आगे नहीं बढ़ने दे सकती. बस... बस मुझे देख.

मैंने नहीं सुना. मैं सुन भी नहीं सकता था. मेरे अंदर की भूख एक धधकती आग की तरह थी जिसने बाकी सब कुछ भुला दिया था. मैं और करीब आया, अपनी छाती को उसकी छाती से सटाया, और उसे अपने शरीर के बीच जकड़ लिया.


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मैंने उसे फिर से किस करना शुरू किया, लेकिन इस बार यह ज़्यादा आक्रामक और ज़बरदस्त था. मैंने अपने होंठ उसके मुँह से हटाकर उसके जबड़े पर, और फिर नीचे उसकी गले के संवेदनशील गड्ढे तक ले गया, जिससे वह धीरे से कराह उठी.

उसने मुझे दूर धकेलने की कोशिश की, लेकिन उसकी हरकतें कमज़ोर थी, मेरे स्पर्श के हमले के आगे उसका इरादा टूट रहा था. जब मैंने उसके कंधे को हल्के से काटा तो वह हाँफने लगी.


कुसुम दीदी: (सिसकियां लेते हुए) बहुत ज़िद्दी है तू.

मैं वापस उसके होंठों पर आया और उसे बहुत शिद्दत से चूमा, मेरी जीभ उसके मुँह में घूम रही थी जबकि मेरा हाथ उसकी ब्रा के ऊपर से उसकी चूचियां दबा रहा था. मैंने हुक के साथ छेड़छाड़ की, लेकिन उसे खोला नहीं, जिससे वो बेचैन और बेताब हो गई. उसका सिर पीछे दीवार से जा लगा उसकी आँखें बंद हो गई और उसने आखिरकार विरोध करना छोड़ दिया. उसने फुसफुसाते हुए कहा,


कुसुम दीदी: ठीक है, लेकिन सिर्फ एक बार करने दूंगी. सिर्फ़ एक बार.

मैंने उसके ब्रा का हुक बिना खोले नीचे से पकड़ कर ऊपर उठा दिया. पहली बार मैंने उन्हें देखा, उसकी दोनों रसीली चूचियां बाहर निकल आई. उसके नंगे सीने को देखकर मेरी सांसें जैसे रुक ही गई. निप्पल के आसपास का वो हल्का गुलाबी रंग, खड़े निप्पल ठंडी हवा में उभरे हुए थे. मैं उसके करीब झुका, मेरी गर्म सांसें उसकी निप्पल को छू रही थी. फिर मैंने निप्पल के चारों तरफ जीभ घुमाते हुए उसकी चूचियां पकड़ कर निप्पल को चूसने लगा और उसकी त्वचा के नमकीन और मीठे स्वाद को महसूस किया. इससे उसकी हल्की सिसकारियां शुरू हो गई और उसने मुझे अपने चूचि के और करीब खींच लिया.

कुसुम दीदी: उम्म्...आशु...आंह...हे भगवान...आह...

मैं उसके दूसरे स्तन की ओर बढ़ा, उसके निचले हिस्से को चाटा और फिर निप्पल को जितना हो सकता था अपने भीतर तक खींच लिया. मैं उसके दिल की तेज़ धड़कन सुन सकता था, जो बिल्कुल मेरी धड़कन जैसी ही तेज़ थी. जब मैं उसके स्तनों को चूसता और सहलाता रहा, तो मैंने उसमें एक बदलाव महसूस किया की मेरी जीभ के हर स्पर्श के साथ उसका शरीर कांप रहा था. मैंने उसकी सारी मर्यादाओं को तोड़ दिया था.

जब मेरा मुँह उसके स्तनों पर टिका हुआ था, तभी मेरा हाथ नीचे की ओर चला गया. मैंने उसके पजामे की कमरबंद पकड़ी, जो पहले से ही ढीली थी. धीरे-धीरे, जानबूझकर, मैंने कपड़े को नीचे सरकाना शुरू किया. जैसे ही पजामा उसके गांड से नीचे सरका. उसने ब्रा से ही मिलती जुलती रंग की सुंदर सी पैंटी पहनी थी जो कि उसके गोरे बदन को और चमका रही थी. मैंने उसकी जांघों को अपनी टांगों से कांपते हुए महसूस किया. शायद वो पहली बार का डर था.

मैं उसे एक पल के लिए भी छोड़ना नहीं चाहता था. उसके स्तनों पर मेरे मुँह की नमी अभी भी चमक रही थी, और मैं उसे सोफ़े की तरफ़ ले गया. मेरे साथ चलते हुए उसके पैर कांप रहे थे. मैंने उसे धीरे से कुशन पर पीछे की ओर धकेला. हाय उसका गोरा बदन...मुझे मदहोश किए जा रहा था. दीदी ने मेरी तरफ देखा, उसकी आँखें मदहोश थी और साँसें तेज़ चल रही थी. वो मज़बूत और दबंग बहन, जिसे मैं हमेशा से जानता था, अब मेरे स्पर्श से पूरी तरह पिघल चुकी थी.


मैं: आप बहुत खूबसूरत हो, दीदी. मैं रुक नहीं सकता... मेरा मन ही नहीं भरता आपसे.


उसने अपनी पीठ को थोड़ा ऊपर उठाया, उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी, और अनजाने में ही वो मुझे अपने करीब बुला रही थी. मैंने एक आखरी बार और उसकी चुचियों का साथ नहीं छोड़ा और उसे चूसने लगा. क्योंकि मेरे लिए भी ये पहला मौका था जब मेरी बेहन अपनी इच्छा से मुझे अपनी इज्जत देने को तैयार थी.


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मैं उसे अभी पूरी तरह से नंगा नहीं करना चाहता था. शरीर के कुछ हिस्सों का ढका होना ज़्यादा कामुक लग रहा था. मैं उसके पैरों के बीच घुटनों के बल बैठ गया, मेरा दिल ज़ोरों से धड़क रहा था. मैंने उसकी पैंटी की तरफ हाथ बढ़ाया, लेकिन उसे उतारने के बजाय, मैंने अपनी उंगलियों से कपड़े को एक तरफ खिसका दिया.


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जो नज़ारा दिखा, वो दिलकश था. उसकी कुंवारी चूत, गुलाबी, तंग और उत्तेजना की साफ, मीठी नमी से चमकती हुई. मैं आगे झुकता हुआ अपनी जीभ को एक नरमी के साथ उसके चूत की कली (क्लिटोरिस) पर दबाया.


कुसुम दीदी: आह्ह्ह… ये क्या...रुक... नहीं, प्लीज... आह्ह!

उसके गांड ऊपर की ओर उछले. मैंने धीरे-धीरे और लंबे स्ट्रोक्स के साथ उसे चाटना शुरू किया, उसके स्वाद का मज़ा लेते हुए. ये मम्मी के स्वाद से अलग था. जहाँ मम्मी की चूत में एक परिपक्व, भारी कस्तूरी जैसी गंध थी जो मुझे बेकाबू कर देती थी, वहीं कुसुम दीदी का स्वाद हल्का, मीठा और ताजगी भरा, मासूम खुशबू वाला था, जो किसी वर्जित फल जैसा महसूस होता था.

मैंने उसकी गुहारों को नज़रअंदाज़ किया और
मेरी जीभ उस चूत के संवेदनशील हिस्से के चारों ओर घूमती रही और फिर उसकी परतों के भीतर गहराई तक चली गई. मैं उसके रस का स्वाद ले सकता था, उसकी कुंवारपन का नमकीन और मीठापन, और यह अद्भुत लग रहा था. दोनों की अपनी-अपनी खासियतें थी. मम्मी की अनुभवी गर्मी और दीदी की तंग, ताज़ी मिठास. और उन दोनों को अपने वश में करने के ख्याल से ही मेरा लंड दर्दनाक हद तक तड़पने लगा.

जैसे-जैसे मैं उसकी चूत को चाटता और चूसता गया, दीदी पिघलती गई. उसने मुझे दूर धकेलने की कोशिश छोड़ दी, बल्कि, उसकी उंगलियों ने मेरे बालों को कसकर पकड़ लिया और मेरे चेहरे को अपनी जांघों के बीच और ज़ोर से दबाया.

मैं एक पल के लिए पीछे हटा और मुस्कुराते हुए उसकी ओर देखा, मेरा मुंह उसके रस से गिला हो चुका था.
उसने नीचे मेरी ओर देखा, उसने देखा कि उसके भाई का चेहरा उसकी चूत के रस से गिला हो गया है.


मैं: क्या आपको अब भी लगता है कि ये गलत है, दीदी?
कुसुम दीदी: मुझे इस बात से नफ़रत है कि मुझे ये कितना पसंद आ रहा है.

तनाव अपनी चरम सीमा पर था. मैं खड़ा हुआ और जल्दी से अपने कपड़े उतार दिए, जिससे मेरा लंड बाहर आ गया. वो पत्थर की तरह सख्त था. दीदी उसे पहली बार देखकर ठिठक गई, उसकी सांसें थम गई. उसने कभी किसी पुरुष का लंड इतनी करीब से नहीं देखा था, अपने भाई का तो बिल्कुल नही. वो उसे एकटक देखती रही, उसकी आँखें फटी की फटी रह गई. वो उसके आकार और उसकी मर्दानगी से मंत्रमुग्ध हो गई थी. मैं और करीब आया, मेरे लंड का सिरा लगभग उसकी जांघ को छू रहा था.

मैं: इसे छुओ, दीदी. ये आपके लिए है.

वो एक पल के लिए हिचकिचाई, फिर, धीरे-धीरे, उसकी उंगलियां आगे बढ़ीं. जब उसने पहली बार मेरे लंड की गर्म, मखमली त्वचा को छुआ, तो उसके मुँह से एक हल्की सी सिसकारी निकली. उसने अपना हाथ मेरे लंड के चारों ओर लपेटा. शुरुआत में उसकी पकड़ झिझक भरी थी, लेकिन जैसे ही उसने लंड के तनाव की गर्मी और सख्ती को महसूस किया, उसकी पकड़ कसती चली गई.


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जब उसने अपना हाथ ऊपर-नीचे चलाना शुरू किया, उसके चेहरे पर कामुकता के भाव उभर आए. वो उस एहसास से सम्मोहित थी, जिस तरह उसकी हथेली के नीचे लंड की नसें धड़क रही थी. अब हालात पूरी तरह बदल चुके थे. अब वो उस चरम सुख को पाने के लिए बेताब थी जो सिर्फ़ मैं ही दे सकता था.

कुसुम दीदी: (बहुत धीमी आवाज में) ये... बहुत बड़ा है. मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि मैं ये कर रही हूँ!

मैंने नीचे झुककर उसकी ठोड़ी पकड़ ली और उसे मेरी आँखों में देखने के लिए मजबूर किया. वो अब मेरी थी, आनंद और वर्जित के रोमांच से टूट चुकी थी. मैंने उसकी पैंटी उतारते हुए उसके पैरों को और चौड़ा किया, उसकी उत्तेजना की गंध मेरी नाक में भर गई, और मैं जानता था कि चाटना तो बस शुरुआत थी. मैं अपने लंड के चारों ओर उस कसी हुई, कुंवारी गर्मी को महसूस करना चाहता था.

मेरे लंड में बढ़ रहे दबाव को मैं और नहीं रोक पा रहा था. नीचे दीदी को देखा, उसके पैर फैले हुए थे और उसकी कुंवारी चूत चमक रही थी. मैंने उसके गरम गांड को मज़बूती से पकड़ा, मेरी उंगलियाँ उसकी मुलायम गांड में धंस गई, और मैंने अपने लंड के अगले हिस्से को उसके तंग, चूत के संकरे रास्ते पर रखा. उसकी आँखें फैल गई जब उसने अपनी वर्जिनिटी की रुकावट के ख़िलाफ मेरे दबाव को महसूस किया. उसने तेज़ी से अपना सिर हिलाया, उसकी आँखों में डर की एक झलक लौट आई.


कुसुम दीदी: नहीं... आशीष, रुक! मैंने कभी... इससे दर्द होगा! प्लीज, रुक.
मैं: श्श्श्श...डरो मत कुछ नहीं होगा...

मैंने धीरे-धीरे लंड आगे बढ़ाया, मेरा लंड का मोटा सुपाड़ा उसके चूत के नाजुक गुलाबी पंखुड़ियों को फैला रहा था. हल्का सा जोर देते हुए मैंने मेरे लंड के सुपाड़े को अंदर घुसाने की कोशिश करने लगा, उसके मुँह से एक तीखी, ऊँची चीख निकली, और उसकी पीठ सोफ़े से ऊपर की ओर मुड़ गई.



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कुसुम दीदी: आह...! रुक! दर्द हो रहा है! ओह भगवान, ओह!!

मैं रुका रहा, हिलना-डुलना बंद कर दिया क्योंकि मुझे उसके शरीर में कंपन महसूस हो रहा था. मुझे उसकी चूत की गर्मी और कसाव महसूस हो रहा था, घर्षण बहुत तेज़ था. वो हल्की-हल्की सिसक रही थी, शुरुआती खिंचाव का दर्द उसे परेशान कर रहा था. मैं नीचे झुका और उसे गहराई से चूमा, उसका ध्यान भटकाने के लिए और किसी तरह की आवाज ना हो उससे बचने के लिए अपनी जीभ उसके मुँह में घुमाई, जबकि मेरे शरीर का निचला हिस्सा लगातार और ज़ोरदार दबाव डालता रहा.


मैं: (उसके होंठों के पास दबी हुई आवाज़ में) शशश... बस साँस लो, दीदी. अच्छा लगने लगेगा.


मैंने अचानक एक मज़बूत धक्का दिया, और अंदर धकेला. जब मैंने उसकी सील को तोड़ा तो मुझे एक साफ़ आवाज़ सुनाई दी. उसी वक्त मैंने अपना मुंह उसके मुंह पर दबा दिया जिससे कि उसकी आवाज दब जाए. उसकी उंगलियाँ मेरे कमर को कसकर पकड़ रही थी और उसके नाखून मेरी त्वचा में गड़ रहे थे जो कि मुझे खरोच भी रही थी.


कुसुम दीदी: नहीं इसे निकाल...आह! ओह भगवान! ओह... ये... ये मुझे फाड़ रहा है!

मैं वहीं जमा रहा, उसके अंदर आधा घुसा हुआ, ताकि उसका शरीर इस नए अनुभव के साथ तालमेल बिठा सके. कसाव अविश्वसनीय था. मम्मी की चूत की तुलना में कहीं ज़्यादा तंग. ऐसा लग रहा था जैसे मैं गर्म, मखमली रेशम में लिपटा हुआ हूँ जो मुझे छोड़ना नहीं चाहता था.

धीरे-धीरे, चीखें लंबी, कांपती हुई कराहों में बदल गई. तेज़ दर्द कम होने लगा था. मैंने बस कुछ इंच आगे-पीछे हिलना शुरू किया, ये देखने के लिए कि उसे कैसा लग रहा है. हर छोटी हरकत पर उसकी सांसें तेज़ हो जातीं. उसकी आवाज़ दर्द भरी चीख से बदलकर उलझन भरे मज़ा की कराह में बदल जाती.


कुसुम दीदी: आह...ऊऊह्ह्ह्ह... ऐसा लग रहा है... अहह...जैसे सब कुछ भरा हुआ है. मुझे यकीन नहीं हो रहा...कि तु मेरे अंदर है.
मैं: हां दीदी देखो मैं आपको चोद रहा हूं.
कुसुम दीदी: इश्श्श्श्श...चुप हो जा!
मैं: अब क्या शर्माना? आप तो मेरी जान हो.
कुसुम दीदी: उम्म्म्म्म...

मैंने रफ़्तार बढ़ाई, लगभग पूरी तरह बाहर निकलकर फिर से अंदर धकेलने लगा. जांघों के उसके गांड से टकराने की आवाज सुनाई देने लगी. दीदी का मज़ा उस बचे-खुचे दर्द पर हावी होने लगा था.


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कुसुम: आह! हाँ... थोड़ा धीरे. आह्ह्ह…आह्ह्ह… मम्मी और रीना पीछे आंगन में है!

सेक्स सम्मोहक हो गया था, गर्मी और वर्जित घर्षण का एक धुंधला सा एहसास. मैं उसे पूरे रंग में चोद रहा था. हम दोनों हवस में डूब चुके थे.

कुसुम दीदी: ओह, आशीष... और! ओ माय गॉड! आह...
मैं: हाँ दीदी...हाँ, देखो, आपका भाई आपकी चूत चोद रहा है...
कुसुम दीदी: ऊऊह्ह्ह्ह…तेरा बहुत बड़ा है सच में!
मैं: क्या दीदी?
कुसुम दीदी: कुछ नहीं.
मैं: बोलो ना...
कुसुम दीदी: नहीं...

मैंने लंड को पूरा बाहर निकालते हुए एक जोरदार धक्का मारा. जिससे लंड पूरा उसकी चूत की गहराई में घुस गया.

कुसुम दीदी: आह्ह्ह्हह…….नही…रुकक्क…..आअह्ह्ह्ह!!!
मैं: अब बोलो क्या बड़ा है?
कुसुम दीदी: (सीसकते हुए) अहह...उन्ह..

एक और जोरदार लंड का झटका,

कुसुम दीदी: आह्ह्ह्हह……हाँ...तेरा लंड बड़ा है! आह्ह्ह्हह...धीरे करना प्लीज!

मेरा लंड उसके तंग चूत की सुरंग में फिसल रहा था और हर धक्के के साथ उसे फैला रहा था. उसकी कराहें तेज़ हो गई, जो मेरे धक्कों की गति के साथ तालमेल बिठा रही थी.

कुसुम दीदी: ओह... आह...ऊऊह्ह्ह्ह…आह्ह्ह…आह्ह्ह… आह्ह्ह्हह……... हाँ! और!

वो अपनी चरम सीमा तक पहुँच रही थी, उसका शरीर तन रहा था, और उसकी साँसें छोटी, तेज़ सिसकियों में बदल रही थी.

मैंने अपनी रफ़्तार बढ़ाई, मेरे झटके हल्के और तेज़ हो गए, जो उसके चूत के मुहाने पर ज़ोर से लग रहे थे. दीदी उस एहसास में पूरी तरह खो गई थी, चरम सुख तक पहुँचते ही उसकी आवाज़ काँपने लगी. एक लंबी, सुरीली और परमानंद भरी कराह जो किसी समर्पण जैसी लग रही थी.



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कुसुम दीदी: हाँ...आंह...ओह! मैं... आह्ह्ह्हह……


उसकी अंदरूनी मांसपेशियों ने मेरे लंड को ज़ोरदार और लयबद्ध तरीके से जकड़ लिया, जैसे सारा रस निचोड़ रही हों. मैं जितनी गहराई तक जा सकता था, एक आखिरी ज़ोरदार झटका दिया और उसके अंदर स्खलित हो गया. मैंने महसूस किया कि मेरा गर्म वीर्य उसकी कुंवारी कोख में भर रहा है, उसे पूरी तरह से भर रहा है. हम एक-दूसरे से सटकर गिर पड़े, पसीने और शारीरिक तरल पदार्थों से भीगे हुए, हमारी साँसें तेज़ और एक जैसी चल रही थी. कुसुम दीदी वहीं लेटी रही, थकी हुई और निढाल, उसके होंठों पर एक छोटी सी, संतुष्ट मुस्कान थी. दर्द गायब हो चुका था.

बारिश की वो ठंडी हवा हम दोनों के बदन को धीरे-धीरे ठंडा कर रही थी, जहाँ मैं और दीदी एक-दूसरे से लिपटे हुए लेटे थे. हवा में सेक्स और पसीने की महक घुली हुई थी. दीदी की साँसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं और वो छत की ओर देख रही थी. उसकी आँखों में हैरानी और नए-नए मिले सुख का मिला-जुला भाव था. काफी देर तक हममें से किसी ने कुछ नहीं कहा. हमने जो किया था, उसका डर एक भारी चादर की तरह हम पर छाया हुआ था, फिर भी हमारे बीच एक गुप्त अपनापन और बिजली जैसी सिहरन महसूस हो रही थी.


कुसुम दीदी: मुझे यकीन नहीं हो रहा कि हमने सच में ऐसा किया, आशीष. अगर मम्मी को पता चल गया... हे भगवान, वो तो हमें मार ही डालेंगी.

मैंने उसके माथे को चूमा, मेरी आवाज़ धीमी और उसके मन को शांत करने वाली थी.

मैं: उन्हें पता नहीं चलेगा. ये हमारा राज़ है, दीदी.

अगला कुछ पल हमने जल्दबाजी और घबराहट भरी खामोशी में खुद को साफ-सुथरा करने में बिताया. कुसुम दीदी बहुत संभलकर चल रही थी. पैरों के बीच हो रही तकलीफ उसे हर उस चूदाइ के झटके की याद दिला रही थी जो अभी-अभी हुई थी. उसने जल्दी से कपड़े पहने, अपनी कुर्ती ठीक की. उसका चेहरा शर्म से लाल हो रहा था. जब हम कमरे से बाहर निकले, तो घर के पिछले हिस्से से आवाज़ें आ रही थीं. मम्मी और रीना बागान में साफ सफाई कर रही थी और पौधे लगा रही थी. उनके काम-काज का सामान्य माहौल, घर के अंदर अभी-अभी हुई उस चूदाइ से बिल्कुल अलग था. कुसुम दीदी ने इस माहौल में घूलने मिलने की कोशिश की.


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कुसुम दीदी: आप लोग अभी तक मेहनत कर रहे हैं.
मम्मी: हां बारिश का मौसम है. सोचा कुछ नए फूल और कुछ पौधे लगा देते हैं, तो जल्दी खिल जाएंगे.
आशीष की पढ़ाई पूरी हो गई?

रीना दीदी: ध्यान देना आजकल ज्यादा बदमाश हो गया है. पढ़ाई में तो मन ही नहीं लगता, पता नहीं कहां खोया रहता है.
कुसुम दीदी: नहीं-नहीं, आप टेंशन मत लो मैं हूं ना.


सूरज ढलने के साथ ही घर में रात के खाने की तैयारी शुरू हो गई. मैंने दरवाज़े से देखा कि मम्मी और रीना दीदी अंदर आई, उनके कपड़ों पर धूल लगी थी और वे थकी हुई लेकिन खुश लग रही थीं. कुसुम दीदी किचन में मम्मी की मदद कर रही थी. वो बिल्कुल सामान्य व्यवहार कर रही थी. उसके हाव-भाव सहज थे और आवाज स्थिर थी जब वो उन सब्ज़ियों के बारे में बात कर रही थी जो उन्होंने तोड़ी थी. उसे देखना दिलचस्प था, वही लड़की जो कुछ घंटे पहले ही मेरे नीचे चरम सुख में चीख रही थी, अब एक आज्ञाकारी बेटी और बहन की तरह लग रही थी. मैं कमरे में मौजूद तीनों महिलाओं के बीच छिपी हुई भावनाओं को महसूस कर सकता था. उनमें से किसी को भी एक दूसरे के बारे में ये नहीं पता था कि मैं उनके परिवार की पवित्रता को पहले ही भंग कर चुका था.

मैंने अपनी सबसे बड़ी बहन रीना की ओर देखा. कुछ दिन पहले, मुझे वो अकेली मिली थी और मैंने अपनी उंगलियाँ उसकी शर्मीली चूत में डाल दी थीं. उसने कुसुम दीदी की तरह मुझसे ज़्यादा विरोध नहीं किया था.

रीना दीदी मेरी नज़र को भांपते हुए, उसने तुरंत नज़रे हटा ली और उसके गाल हल्के गुलाबी हो गए. वो तेज़ी से बातें करने लगी, उसकी आवाज़ सामान्य से थोड़ी ऊँची थी.


रीना दीदी: क्या तुमने पड़ोसी की नई कार देखी, कुसुम? मिसेज शर्मा सुबह से ही उसकी डींगें मार रही थीं. सच कहूँ तो, जिस तरह से वो बात करती हैं, लगता है जैसे उन्होंने लॉटरी जीत ली हो!

वो इधर-उधर की बातें कर रही थी, छोटी-मोटी गपशप का इस्तेमाल उस याद को छिपाने के लिए कर रही थी जब मेरी उंगलियों ने उसे फैलाया था. फिर भी जब उसे लगता कि कोई नहीं देख रहा है, तो वह बार-बार मेरी ओर देख लेती थी.

हम डिनर के लिए टेबल पर बैठे थे, कुछ पल के लिए सिर्फ प्लेटों पर चम्मचों के टकराने की आवाज़ आ रही थी. मम्मी टेबल के सबसे आगे बैठी थीं, उनके चेहरे पर सोच-विचार के भाव थे. उन्होंने दोपहर का काफ़ी समय नैना आंटी के साथ फ़ोन पर बिताया था, और उन बातचीत का असर उनके मुझे देखने के अंदाlज़ में साफ दिख रहा था. उनकी आँखों में एक प्यास थी, एक ऐसी उत्सुकता जो बेताबी की हद तक पहुँच रही थी. मम्मी मुझे चाहती थी. नैना आंटी के उकसाने वाले सुझावों ने उन्हें तैयार कर दिया था, और उनके अकेलेपन ने उस आग को और भड़का दिया था, जिसे नज़रअंदाज़ करना अब नामुमकिन था. लेकिन वो एक माँ के तौर पर अपनी भूमिका में फंसी हुई थी. वो कभी मेरे होंठों को देखतीं, तो कभी मेरी छाती को. उनका हाथ पानी के गिलास को जरा ज़्यादा ही कसकर पकड़े हुए था. वो हाथ बढ़ाकर मुझे छूना चाहती थीं, यह जानना चाहती थीं कि जो गर्मी वो महसूस कर रही थीं, क्या वैसी ही गर्मी मुझमें भी है. लेकिन उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि परफेक्ट माँ की छवि को तोड़े बिना इस दूरी को कैसे मिटाया जाए.


मम्मी: (गला साफ़ करते हुए) आशीष, तु आजकल बहुत चुप-चुप रहता है. क्या तुझे कोई परेशानी है? या फिर... तेरे मन में कुछ और चल रहा है?

ये सवाल टटोलने जैसा था, एक बुलावा था. वो माहौल को भांप रही थीं, उम्मीद कर रही थी कि मैं उन्हें कोई इशारा दूँ कि मुझे उनकी चाहत का पता है. कुसुम दीदी ने ऊपर देखा, उसके होंठों पर एक छोटी सी, छिपी हुई मुस्कान थी जब उसने मम्मी से मेरी तरफ़ देखा. वो जानती थी कि मैंने पहले ही उसे अपना बना लिया था, और वो हमारी मम्मी के अंदर उमड़ती उस कच्ची चाहत को देख सकती थी.

मैंने मम्मी की आँखों में सीधे देखा, मेरे होंठों के कोने पर एक हल्की सी मुस्कान तैर गई.


मैं: सब कुछ बहुत बढ़िया चल रहा है, मम्मी. बस... आजकल मैं बहुत सी नई चीज़ें खोज रहा हूँ.

उस बात का दोहरा मतलब हवा में तैर रहा था. रीना दीदी घबराहट में खिलखिलाकर हँसी और अपनी सीट पर थोड़ी हिली-डुली, जबकि मम्मी की साँसें थम सी गई. डिनर चलता रहा, पारिवारिक मेल-जोल का दिखावा, जिसके पीछे वर्जित वासना का तूफ़ान छिपा था. तीन औरतें, एक घर, और एक बेटा जो उनकी दुनिया का गुप्त केंद्र बन चुका था. हर एक के मन में वर्जित इच्छा का एक अलग रंग था.
Uffff bahut hi sexy update hai. First time kisi sealed chut me lund dalne ka mazaa alag hi hai. Maine apni cousin ( mama ki ladki ki seal todi thi. Chudai usse pahle bhi kar chuka tha par jo mazaa tight seal pack chodne me aata wo kahin nahin hai.
 

Premkumar65

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मैं सोकर उठा तो मेरे दिमाग में कुसुम दीदी की तंग, गुलाबी चूत की यादें और रीना दीदी का शर्मीला, शर्म से लाल चेहरा ताज़ा था. लेकिन मेरा मुख्य टारगेट टेबल के सिरे पर बैठी महिला थी. मैंने तब तक इंतज़ार किया जब तक मम्मी नहाने नहीं चली गई. और जैसे ही वो नहाने गई मैंने उसके फोन की जांच पड़ताल की. बड़ी आसानी और महारत से मैंने कॉल लॉग्स देखे और लेटेस्ट रिकॉर्डिंग कॉपी कर ली. मैं अपने कमरे में वापस आया, हेडफ़ोन लगाए और प्ले बटन दबा दिया.

मम्मी: नैना... मैं इसके बारे में सोचे बिना रह नहीं पा रही. सच में नहीं. जब भी आशीष मुझे देखता है, तो मुझे... नीचे की तरफ में एक अजीब सी गर्मी महसूस होती है. मुझे समझ नहीं आता कि शुरुआत कैसे करूँ.
नैना: (हल्के से हँसते हुए, उसकी आवाज़ में तजुर्बा और हिम्मत बढ़ाने वाला अंदाज़ था) अरे, तुम अभी भी एक शर्मीली दुल्हन की तरह बर्ताव कर रही हो! तुम्हारी शादी को दशकों हो चुके हैं. तुम उसे चाहती हो, है ना?
मम्मी: इस कदर तो नहीं चाहती थी लेकिन जब से तुमने मेरा कान भरा है...मैं क्या बताऊं!! (थोड़ी देर खामोश रहने के बाद, धीमी और बेताब आवाज़ में) हाँ, मैं चाहती हूँ. लेकिन कैसे? मैं बहुत उलझन में हूँ. मैं बात शुरू करने की कोशिश करती हूँ, उसके करीब जाने की कोशिश करती हूँ, लेकिन उसका चेहरा देखते ही मेरी हिम्मत जवाब दे जाती है. मुझे डर लगता है कि मेरा मजाक ना बन जाए.
नैना: ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम परफेक्ट माँ का रोल बहुत अच्छी तरह निभा रही हो. तुम किसी मर्द को तब रिझा नहीं सकतीं जब तुम ऐसी लग रही हो जैसे उसे दाल-चावल परोसने वाली हो. तुम्हें अपनी इस छवि को तोड़ना होगा, तुम्हें उसे चौंकाना होगा.
मम्मी: उसे चौंकाना? नैना, तुम क्या कह रही हो? मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा कि कहाँ से शुरू करूँ.
नैना: बिल्कुल! यही तो समस्या है. वो पुराने ज़माने की साड़ियाँ, पड़ोस की औरतों और पेरेंट्स टीचर मीटिंग्स के लिए होती हैं. वो सब कुछ छिपा देती हैं. अगर तुम चाहती हो कि आशीष उन कपड़ों की परतों के नीचे छिपे तुम्हारे कर्व्स को देखे, तो तुम्हें दादी-नानी जैसे कपड़े पहनना बंद करना होगा.
मम्मी: (झिझकते हुए) लेकिन... मैं उनचास साल की हूँ, नैना. मेरे तीन बच्चे हैं. मैं अचानक से ऐसे कपड़े नहीं पहन सकती... जो तुम कह रही हो. ये बहुत अजीब लगेगा. अगर लड़कियों ने देख लिया तो? अगर पड़ोसियों ने देख लिया तो?
नैना: पड़ोसियों की बात किसने की? जरा सोचो, ये दुनिया के लिए नहीं है. ये उसके लिए है. तुम इसे चुपके से करो. एक ऐसी प्राइवेट दुनिया बनाओ जहाँ सिर्फ आशीष को पता हो कि उसकी माँ असल में कितनी हॉट है.
मम्मी: (अब उसकी आवाज़ में थोड़ी और उत्सुकता है) चुपके से? तुम्हारा मतलब है... घर के अंदर?
नैना: बिल्कुल. छोटी शुरुआत करो. उन बहुत बड़ी कॉटन पैंटीज़ से छुटकारा पाओ जो डायपर जैसी लगती हैं. कुछ लेस वाली चीज़ें लो. कुछ ऐसा लो जिससे तुम्हें खुद सेक्सी महसूस हो. क्योंकि अगर तुम्हें खुद ऐसा महसूस नहीं होगा, तो उसे भी नहीं होगा. मैं एक स्लीक वन-पीस ड्रेस की बात कर रही हूँ जिसमें कुछ भी छिपा न रहे.
मम्मी: (हल्की सी साँस रोकते हुए) नैना, मैं नहीं कर सकती! मैंने अपनी ज़िंदगी में कभी ऐसी चीज़ें नहीं पहनीं.
नैना: यही तो बात है, पगली! एक्सपोज़र ही तो इच्छा जगाता है. तुम चाहती हो कि वो तुम्हें पाने के लिए तड़पे. तुम चाहती हो कि वो सोचे कि अंदर क्या है.
मम्मी: मुझे नहीं पता. मैं डरी हुई हूँ, लेकिन... हे भगवान, उसके मुझे उस तरह देखने का ख्याल, बस सोचकर ही मेरे अंदर एक अजीब सी हलचल होने लगती है.
नैना: (हल्का सा हँसते हुए) हाँ, अब आई न असली बात! यही तो वो औरत है जिसे मैं जानती हूँ. अब सुनो. तुम किसी भी मॉल में जाकर ये चीज़ें नहीं खरीद सकतीं. तुम कन्फ्यूज़ हो जाओगी और कुछ बोरिंग सा खरीद लोगी. मेरी एक करीबी दोस्त का बुटीक है. लॉन्जरी और स्टाइलिश ड्रेसेस की खास दुकान. उसे अच्छे से पता है कि तुम्हारी उम्र की औरत को कैसे तैयार किया जाए ताकि वो किसी अप्सरा जैसी लगे.
मम्मी: मैं ऐसे ही किसी लॉन्जरी की दुकान में जाकर सिडक्शन वाले कपड़े तो नहीं माँग सकती!
नैना: तुम अकेली नहीं होगी. मैं तुम्हारे साथ चलूँगी. हम साथ जाएँगी, और मेरी दोस्त बाकी सब संभाल लेगी.
मम्मी: (उसकी आवाज़ अब पक्की लग रही थी, हालांकि अभी भी थोड़ी कांप रही थी) ठीक है, ठीक है, मैं ये करूँगी. मैं अब और नाटक नहीं कर सकती कि मैं सिर्फ उसकी माँ हूँ.
नैना: मुझ पर भरोसा करो, आशीष जैसे लड़के हमेशा अपनी माँ के बारे में जानने के लिए उत्सुक रहते हैं, खासकर तब जब माँ तुम जैसी खूबसूरत हो. बस जैसा मैं कहूँ, वैसा करना. कपड़े ले लेना, जब लड़कियाँ बाहर हों या सो रही हों तो उन्हें पहनना, और फिर जादू होने देना.
मम्मी: शुक्रिया, नैना. मिलते हैं.

रिकॉर्डिंग एक क्लिक के साथ खत्म होती है. मैंने हेडफ़ोन हटाए, मेरी साँसे तेज चल रही थी. मेरा लंड पूरी तरह से खड़ा था और मेरे अंडरवियर में कस रहा था. माँ होने की दीवार ढह रही थी, और वो सीधे उस जाल में कदम रख रही थी जो मैंने बिछाया था. मैंने दरवाज़े की ओर देखा, कल्पना की कि वो सिल्क की वन-पीस ड्रेस पहने हुए है, उसके स्तन कपड़े में कस रहे हैं, और उसकी आँखें मुझसे उसे अपना लेने की गुज़ारिश कर रही हैं. खेल अब और भी ज़्यादा साफ और कामुक होने वाला था.

मेरी मम्मी, उसे लग रहा था कि वो मुझे लुभाने का खेल खेल रही है, लेकिन मेरे हाथ में मौजूद रिकॉर्डिंग की वजह से असल कंट्रोल मेरे पास था. मैं उसे वासना के उस पागलपन तक ले जाना चाहता था जहाँ वो अपनी माँ वाली गरिमा भूलकर मुझसे खुद को पाने की भीख मांगे. लेकिन पहले, मेरी एक और भूख थी जिसे मिटाना जरूरी था. रीना दीदी दूसरे कमरे में व्यस्त थीं. उका शर्मीला स्वभाव उसे बाद के लिए आसान शिकार बनाता था, लेकिन अभी मेरी नज़र कुसुम दीदी पर थी. मैं उस कमरे में गया जहाँ वो आराम कर रही थी.


मैं: (मैंने धीरे से कहा, पीछे से अपनी बाहें उनकी कमर के चारों ओर लपेटते हुए ) दीदी, चलो थोड़ा मज़ा करते हैं.
कुसुम दीदी: (दबी हुई आवाज में) आशीष... नहीं, मैं नहीं कर सकती. मेरे उसमें दर्द हो रहा है. पिछली बार की वजह से अभी भी बहुत सूजी हुई है.


मैंने सेक्स के लिए ज़ोर नहीं डाला. अभी नहीं, मैं इंतज़ार के रोमांच की अहमियत जानता था. इसके बजाय, मैंने उसे अपनी बाहों में घुमाया और उसके चेहरे को देखा. मैंने फुसफुसाते हुए कहा, मेरा हाथ उसकी पतली कुर्ती के ऊपर से उसके स्तन को थामने के लिए ऊपर बढ़ा और मैंने उसके नरम चूचियों को दबाया.

मैं: मैं धीरे-धीरे कर सकता हूँ, दीदी. हमें पूरी तरह से करने की ज़रूरत नहीं है. बस थोड़ा सा मज़ा लेंगे.

मैंने उसके होंठों को एक जोशीले, बेताब चुंबन में जकड़ लिया. उसके हाथों ने मेरे कंधों को कसकर पकड़ लिया और मुझे और करीब खींचा, मानो उसे मेरा साथ कभी कम न लगे, भले ही उसके पैरों के बीच दर्द हो रहा हो. उसने और भी जोश के साथ मुझे चूमा, उसकी जीभ मेरी जीभ के साथ कभी लिपट रही थी तो कभी छूट रही थी और उसका शरीर मेरे शरीर से सटकर मुड़ने लगा. हम काफी देर तक इसी तरह एक-दूसरे की बाहों में लिपटे रहे. घर में सन्नाटा था, बस हमारे गीले, गहरे चुंबनों की आवाज और हमारे दिलों की तेज धड़कनें सुनाई दे रही थी. तभी रीना दीदी की आवाज आई,

रीना दीदी: आशीष कहां है? सुबह से पढ़ाई नहीं किया तूने... चल पढ़ने बैठ.

जब मैं आखिरकार उससे अलग हुआ, कुसुम दीदी भी उठकर बाहर लिविंग रूम की तरफ चली गई. वो रिकॉर्डिंग वाली बात सच थी. मम्मी कहीं बाहर जा रही थी नैना आंटी के साथ और ये बात उसने कुसुम से बताते हुए कहा कि "ख्याल रखना".


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मुझे देखते ही मम्मी के चेहरे पर एक अलग सी मुस्कान आ गई. मैं समझ गया था उसकी मुस्कुराहट के पीछे का कारण. पर अब मेरी बारी थी, मैं भी उसे थोड़ा परेशान करना चाहता था. इसीलिए मैंने नजर अंदाज किया.

रीना दीदी: मम्मी देखो ना, पढ़ाई नहीं कर रहा है सुबह से.
मम्मी: ओ रीना! जाने दो ना. पढ़ लेगा थोड़ा उसे भी वक्त दो.


कहकर मम्मी बाहर चली गई. मम्मी के साथ 'चूहे-बिल्ली' का खेल एक लत बन गया था. जब भी वो मेरे पास से गुजरती तो मुझे महसूस होता कि उसकी नज़रें मुझ पर टिकी हैं. वो टेबल पर झुकती, जिससे उसका क्लीवेज साफ दिखता, या हॉलवे में गलती से अपना बदन मेरे बदन से छुआ देती. वो बेताब थी और मुझे यह सब बहुत अच्छा लग रहा था. उसे नज़रअंदाज़ करके, उससे बेरुखी और दूरी बनाकर, मैं उसे तरसा रहा था. मैं चाहता था कि मम्मी मेरे लिए इतनी बेताब हो जाएँ कि कांपने लगे, और अपने ही बेटे के साथ सेक्स करने की उसकी चाहत उसके शरीर के हर नैतिक बंधन से ज़्यादा मज़बूत हो जाए.

इधर मम्मी तरस रही थी, उधर मैं कुसुम दीदी के साथ अपना तालमेल बैठा रहा था. हमारा रिश्ता बहुत गहरा हो गया था. तभी कुदरत ने दखल दिया. कुसुम को पीरियड्स शुरू हो गए, और अचानक उसके साथ सेक्स न कर पाने की वजह से मुझमें एक बेचैनी बढ़ने लगी. ऐसा लगा जैसे मेरे लंड में कोई टाइम बम टिक-टिक कर रहा हो.

कुछ दिनों तक घर का माहौल प्रेशर कुकर जैसा तनावपूर्ण रहा. मम्मी की कोशिशें और भी बेबाक हो गई. उसकी आँखें दिलचस्पी का कोई इशारा पाने के लिए मिन्नतें करती, जबकि मैं पत्थर की दीवार की तरह बेअसर बना रहता. मैं उसमे बढ़ती हताशा देख सकता था. वो उलझन में थीं, आहत थीं, और पहले से कहीं ज़्यादा उत्तेजित थी.

एक रात मैं हल्की नींद में था कि तभी फोन में हल्का वाइब्रेशन के साथ कोई टोन बजा. पर नींद के कारण पहले तो मैंने नजरअंदाज किया. लेकिन वो फिर बजा. जब मैंने आखिरकार स्क्रीन स्वाइप की, तो मैंने देखा कि ये तो मम्मी है जो मुझे मैसेज कर रही है. मैंने तुरंत मैसेज पढ़ना शुरू किया. मैंने देखा, आदर्श माँ गायब हो गई थी, उसकी जगह एक ऐसी औरत आ गई थी जो अपने बेटे के ध्यान के लिए तड़प रही थी.



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आखिर कितनी आसानी से मम्मी ने झूठ बोल दिया. उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि वो अपने बातों को सीधे-सीधे मेरे सामने रख सके.


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उसका इस तरह से मैसेज में चुम्मा देना, मुझे उसकी ओर खींच रहा था. वो मेरी बात मान गई थी.



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मुझे हंसी आ गई. छत से पानी टपकना? यह अब तक का सबसे बेकार और बेअसर बहाना था. वो सीधे बात करने से डर रही थी. अब, मैंने जवाब देना पूरी तरह बंद कर दिया. मैं चाहता था कि वो घबरा जाए, जिससे वो उस दूरी को मिटाने के लिए बेताब हो जाए. उसकी बातों से उसकी हवस झलक रही थी.


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मैंने अपना फ़ोन लॉक किया और उसे एक तरफ फेंक दिया. उसने मिन्नतें की थीं, झूठ बोला था और साफ तौर पर वो एक ऐसी निजी दुनिया चाहती थी जहाँ वो माँ न हो, और मैं सिर्फ़ उसका बेटा न रहूँ. मैं खड़ा हुआ, मेरा लंड पूरा खड़ा हो गया था और अपनी मम्मी के चूत की आग बुझाने के लिए तैयार था. मैं दरवाज़े के हैंडल तक पहुँचा, हथेली पर ठंडी धातु महसूस हुई. मैंने दरवाज़ा खटखटाया नहीं. मैंने बस नॉब घुमाया और दरवाज़ा खुल गया.

ये क्या था? मैंने जिसे देखा वो मेरी साधारण संस्कारी मम्मी नहीं थी, वो तो साक्षात कोई सेक्स की देवी लग रही थी. उसका वो रूप देखकर मेरी आंखें फटी की फटी रह गई. मेरी नज़रें उसे सिर से पाँव तक देख रही थी. वे भारी, सादी साड़ियाँ और ढीले-ढाले सूट अब नहीं थे जो उसके शरीर के उभारों को छिपाते थे. उसने रेशम का एक पतला लिबास पहना था. उसे मध्य रोशनी में वो पारदर्शी लिबास उसके शरीर के हर एक बनावट को और उसके कामुक खूबसूरती को दर्शा रहा था. उसने ब्रा नहीं पहनी थी, बस उसी कपड़े का सहारा था जो उसके स्तनों पर लिपटा था. उससे वे भारी और आकर्षक लग रहे थे. किसी प्रकार का कोई बालों का जुड़ा नहीं, उसके बाल खुले थे, और उसकी आंखों में अभी भी शर्म था.



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मैं कुछ नहीं बोला. मुझे बोलने की ज़रूरत भी नहीं थी. मैं आगे बढ़ा, दरवाज़े की चौखट पार की और अपने पीछे दरवाज़ा धीरे से बंद किया. कमरे में उसके परफ्यूम की खुशबू थी. मम्मी मेरे सामने नज़रें झुकाए शर्मिंदगी से खड़ी थी. मैंने हाथ बढ़ाया, मेरी उंगलियाँ उसके गालों की मुलायम त्वचा को छूती हुई गुज़रीं और फिर मैंने मज़बूती से उसकी ठुड्डी ऊपर उठाई, ताकि वो सीधे मेरी आँखों में देख सके. उसके होंठ कांप रहे थे. उसकी आँखें मेरी आँखों में कुछ ढूंढ रही थी.


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मैं: वॉट्सऐप पर आप बहुत परेशान लग रही थी मम्मी. छत से पानी टपक रहा था? सच में? क्या आपको यही सबसे अच्छा बहाना मिला?

उसने नज़रें हटाने की कोशिश की, लेकिन मैंने उसकी ठुड्डी मज़बूती से पकड़ रखी थी और उसे अपनी नज़रों में जकड़ कर रखा था.

मम्मी: (घबराती हुई आवाज में) म...मुझे समझ नहीं आ रहा था कि और क्या कहूँ. मुझे घुटन महसूस हो रही थी. मुझे लगा था कि शायद तू मेरी वजह से नाराज है.
मैं: क्यों नहीं रहूं मैंने तो आपको पाने की कोशिश की थी. लेकिन आपने मेरे साथ बुरा बर्ताव किया था.

मैंने उसे याद दिलाया, और अपने अंगूठे से उसके निचले होंठ की रेखा को सहलाते हुए उसे थोड़ा रगड़ा.

मैं: आपने मुझे दूर धकेल दिया था. मम्मी, आप मेरे लिए ये सब क्यों पहन रही हो?

उसकी आँखें एक पल के लिए बंद हो गई, पतले सिल्क के नीचे उसका सीना तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहा था.

मम्मी: मैं चाहती थी... मैं चाहती थी कि तू मुझे देखे.
मैं फिर से खूबसूरत महसूस करना चाहती थी.
प्लीज... मुझसे नाराज़ मत होना.


मैंने अपना हाथ उसकी कमर के चारों ओर घुमाया और उसे अपने बिल्कुल करीब खींच लिया. वो एहसास बिजली जैसा था. मैं उसके पेट की गर्माहट, उसके गांड की चौड़ाई और उसके स्तनों की नरमी को अपने सीने पर कसकर महसूस कर सकता था. उसका शरीर अपने-आप मेरे शरीर के साथ ढल गया, और उसके हाथों ने हिचकिचाहट के साथ मेरे कंधों को पकड़ लिया. मैंने उसे कसकर पकड़ लिया, उसे अपने साथ जोड़े रखा, और उसे अपने खड़े लंड का आकार और सख्ती महसूस कराई जो उसके पेट पर दबाव डाल रही थी.

उसकी आँखें फैल गई जब उसे एहसास हुआ कि उसने अपने बेटे के अंदर क्या जगा दिया है. पीछे हटने के बजाय, उसका माथा मेरे माथे से सट गया. मैं नीचे झुका और उसके होंठों को अपने होंठों से चूम लिया. मैंने उसे धीरे-धीरे, गहराई और प्यार के साथ चूमा, उस बेताबी और चाहत को महसूस किया जिसे वह हफ़्तों से छिपाए हुए थी. शुरू में, उसके होंठ काँप रहे थे, लेकिन जैसे-जैसे मैंने चुंबन को गहरा किया और अपनी जीभ को उसकी जीभ के साथ घुमाया, उसकी सांसे और जोर से छूटने लगी.


मम्मी: उम्म्...मम्म्म..म्म्म...


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मैंने पक्का किया कि चुंबन आरामदायक हो, उसे सही लय में लाया, उसे महसूस कराया कि यह ठीक है, कि उसे चाहा जा रहा है. वो मुझसे इस कदर लिपटी थी मानो मेरे अंदर ही समा जाएगी. उसने अपनी पीठ को मोड़ा, उसके पूरे शरीर में एक सिहरन दौड़ गई, और उसकी उंगलियाँ मेरे कंधों में गड़ गई.

मम्मी: ओह गॉड, आशीष... मैंने तुम्हें बहुत याद किया है...

मैं बस एक इंच पीछे हटा, बोलते समय मेरे होंठ उसके होंठों को छू गए.

मैं: अब आपको शर्माने की ज़रूरत नहीं है. बस आप और मैं.

उसने मेरी तरफ देखा, उसकी आँखों में वासना झलक रही थी. उसने एक शब्द भी नहीं कहा. उसने बस मेरा हाथ पकड़ा और मुझे बड़े, सुनसान बिस्तर की ओर ले गई, गुलाबी रेशम के नीचे उसकी गांड मोहक ढंग से हिल रही थी. जैसे ही उसके पैरों का निचला हिस्सा गद्दे के किनारे से टकराया, मैंने उसे धीरे से धक्का दिया और वो हल्की सी आह के साथ चादर पर पीछे की ओर गिर गई. मैं तुरंत उसके ऊपर आ गया, मेरे शरीर ने उसे मुलायम गद्दे पर दबा दिया. मेरी चाहत के बोझ ने उसकी बची-खुची हिचकिचाहट को भी खत्म कर दिया. मैंने फिर से उसके होंठों से शुरुआत की, लेकिन इस बार चुंबन ज़्यादा गहरी और आक्रामक थी. मैं चाहता था कि वो उस भूख को पूरी तरह महसूस करे जो मेरे अंदर लंबे समय से दबी हुई थी. उसकी सांसे तेज और उखड़ी हुई थी, उसने अपने हाथ से मेरे टी-शर्ट को खींचकर निकाल दिया और मुझे अपनी ओर खींचने लगी. जैसे वो डूब रही हो और मैं ही उसकी सांस लेने का एकमात्र ज़रिया होऊं.

धीरे-धीरे, मैं अपने होंठों को उसकी गर्दन पर नीचे की ओर ले गया और उसके कान के ठीक नीचे हल्के से काटा.


मम्मी: इश्श्श्श...सश्ह..अहह!

उसका सिर पीछे की ओर तकिए पर झुक गया. मैं और नीचे बढ़ा, अपनी जीभ से उस पतले, चमकते गाउन के गले वाले हिस्से तक और उसके कंधे को चाट रहा था. फिर उसके सीने पर कपड़े के हिस्से को अपने दाँतों से नीचे की ओर खींचा, जिससे उसके स्तन कमरे की ठंडी हवा के संपर्क में आ गए. वे शानदार थे. उसकी चूचियां भरे हुए और गोरे, जिन पर हल्के रंग के, उभरे हुए निप्पल ऐसे लग रहे थे जैसे क्रीम पर चेरी रखी हो. मैंने इंतज़ार नहीं किया. मैं झुका और निप्पल को चाटने लगा और फिर उसे चूसना शुरू किया.


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मम्मी: आह…बेटा…आंह!!

मैंने अपनी जीभ को एरियोला (निप्पल के आस-पास का घेरा) के चारों ओर घुमाया, उसके उभार को छेड़ा और फिर बारी-बारी से दोनों निप्पल को जोर से चूसने लगा.

मम्मी: ओह गॉड, आशीष... प्लीज... ये कितना... कितना अच्छा लग रहा है!

मैंने अपने हाथ से उसके नरम चूचियों को दबाया, और फिर उसे कसकर पकड़ा, और अपनी हथेली में उसके औरत होने का एहसास महसूस किया. उसका शरीर मेरे छूने पर ऐसी बेचैनी के साथ प्रतिक्रिया कर रहा था जो नशीली थी. लेकिन जैसे ही मैंने अपना हाथ नीचे किया और सिल्क गाउन के नीचे खिसकाया, मैंने महसूस किया कि वो तन गई है. उसकी जाँघें कसकर एक-दूसरे से जुड़ी हुई थी. माँ होने की शर्म की एक आखिरी, बची-खुची रुकावट.

मैं: मेरे लिए खोलो, मम्मी. मुझे देखने दो कि आप अपने बेटे के लिए कितनी गीली हो गई हो.

धीरे-धीरे, तड़पते हुए, उसने अपने घुटने खोल दिए. रेशमी कपड़ा उसकी कमर तक खिसक गया, जिससे उसका निचला हिस्सा खुल गया. मैंने उसकी वो पतली धागे जैसी पैंटी को बिना खोले हुए एक तरफ खिसकाया. उसकी चूत एक सुंदर, साफ, गुलाबी दरार जैसी थी, जो पहले से ही प्राकृतिक चिकनाहट की एक मोटी परत से चमक रही थी. उसमें वही कस्तूरी और एक हल्की, ममतामयी खुशबू का नशीला मिश्रण था, जिसे मैंने पहले भी चखा था. लेकिन उस जोर जबरदस्ती वाले चाहत के मुकाबले, आज की रात कुछ ज्यादा रंगीन थी.

मैंने अपना शरीर खिसकाया और उसके पैरों के बीच आ गया. मैं अभी अंदर नहीं गया. मैं मम्मी के चूत की पूजा करना चाहता था. मैंने अपना चेहरा उसकी जांघों से सटाया और उसकी कामुक उत्तेजना की खुशबू को महसूस किया. फिर, मैंने अपनी जीभ बाहर निकाली और उसके चूत के निचले हिस्से से लेकर क्लिटोरिस तक एक लंबी, धीमी चाट लगाई. मम्मी मुंह दबाकर चीख पड़ी, उसकी पीठ इतनी ज़ोर से मुड़ी कि उसके मोटे मोटे गांड लगभग बिस्तर से ऊपर उठ गए. उसका स्वाद अद्भुत था. सच में किसी नजाकत भरी चूत से ज्यादा मजेदार मम्मी की रसभरी चूत थी. उसकी बनावट और सुंदरता गजब की थी.

अगले कुछ मिनट मैंने उसे सुख देने में बिताए. मैंने अपनी जीभ से उसके क्लिटोरिस के चारों ओर घेरा बनाया और उस चूत पर अपना नाम लिखा, जिससे वो सिसकने लगी. मैंने अपनी उंगलियों से उसके चूत के होठों को चौड़ा किया और जीभ को लंबा निकाल कर कोशिश करते हुए पूरी जीभ उसकी उस छेद में घुसा दिया. उसकी गरम चूत की मांसपेशियों को मेरा जीभ महसूस कर रहा था और चूत की सुरंग के हर कोने को छेड़ रहा था. मम्मी की सिसकारियां गहरी होने लगी,


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मम्मी: आशीष! ओह, नहीं...बस...…आह्ह्ह…!


वो बेकाबू होकर कांप रही थी, उसके हाथ कभी बेडशीट को पकड़ते तो कभी मेरे बालों को और आनंद की चरम सीमा पर उसके पैर की उंगलियां सिकुड़ रही थीं. जब वो अपनी उत्तेजना की चरम सीमा पर पहुँची, तो मैं वापस ऊपर खिसका और उसकी कांपती हुई जांघों के बीच अपनी जगह बनाई. मैंने अभी उसमें प्रवेश नहीं किया था. इसके बजाय, मैंने अपने लंड को लिया और उसकी पूरी तरह गीली चूत पर थपथपाना शुरू किया.

मेरे लंड के अगले हिस्से का उसकी चूत के दाने से टकराने और उसके रस की गीलापन से पैदा होने वाली गीली थप्पड़ "थप्प.. थप्प...थप्प..... " की आवाज हवा में गूंज रही थी. मम्मी के मुँह से एक धीमी चीख निकली और उसने अनजाने में ही अपने हाथों से अपनी आँखें ढक लीं. वो जो हो रहा था, उसकी सच्चाई को देख नहीं पा रही थी, फिर भी उसके गांड ऊपर की ओर उठ रहे थे. मैं नीचे झुका और धीरे से उसके हाथों को उसके चेहरे से हटाया ताकि उसे मेरी ओर देखना पड़े. मैंने उसके होंठों को एक और गहरे, जोशीले चुंबन में जकड़ लिया, उसके समर्पण का स्वाद चखा. मैंने उसके मुँह के पास फुसफुसाया,


मैं: मेरी तरफ देखो, मम्मी. देखो मैं तुम्हें कितना चाहता हूँ.

उसने अपनी आँखें खोलीं, जो इच्छा से भरी और मदहोश थीं,

मम्मी: प्लीज... आशीष... प्लीज़ इसे अंदर डाल. मैं अब और बर्दाश्त नहीं कर सकती. बस मुझे चोद.

जैसे ही उसने मुझसे चोदने की गुज़ारिश की, मैंने उसकी कमर को ज़ोर से पकड़ा और उसके शरीर को अपने शरीर से सटा लिया. मैंने लंड को चूत की छेद पर रखते हुए एक झटका दिया और लंड आधा अंदर घुस गया. अपनी कमर को उठाते हुए मैंने एक और झटका दिया और लंड पूरी तरह से मम्मी की चूत के गहराई में चला गया.

मम्मी: आह...ऊऊह्ह्ह्ह…बेटा…आह्ह्ह…

मेरे मोटे लंड का उसकी चूत की दीवारों को फैलाना बहुत ज़बरदस्त एहसास था. वो इतने लंबे समय से खाली थी, और अब उसे उसका अपना बेटा भर रहा था. इस रिश्ते की भावना ने एक उत्प्रेरक का काम किया, जिससे उसकी चूत ने मुझे इतनी ज़ोर से जकड़ लिया कि मेरा तो पानी निकल जाता. मैंने थोड़ा अपने आप पर काबू पाते हुए और ज़बरदस्त तेज़ी से उसके अंदर धक्के मारना शुरू कर दिया.


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शांत कमरे में मेरे जांघों के उसके गांड से टकराने की आवाज गूंज रही थी. हर धक्का गहरा था, मेरा लंड उसके गर्भाशय तक पहुँच रहा था. मम्मी के पैर मेरी कमर के चारों ओर लिपटे हुए थे, उसकी एड़ियाँ मेरी पीठ में गड़ रही थीं, और वो मुझे अपने अंदर और गहराई तक खींच रही थी.

मम्मी: हाँ! बस ऐसे ही... ओह... बेटा…आह्ह्ह…आह्ह्ह…

उसके हाथ अब उसकी आँखों को नहीं ढके हुए थे. वे मेरे कंधों को नोच रहे थे. उसकी चूत एक गर्म, गीले दस्ताने की तरह थी, जो मेरे लंड के हर इंच को कसकर जकड़े हुए थी. मैं नीचे झुका, उसके कंधे को काटा, और मेरी गर्म और तेज़ साँसें उसके कान को गर्म कर रही थी. मैंने पोजीशन बदलने का फ़ैसला किया, क्योंकि मैं उसे इस बार उसे नए-नए तरीके से चोदना चाहता था.

मैं: मेरे ऊपर आओ ना..

ये सुनकर वो मेरे ऊपर बैठकर चूदवाने को तैयार हो गई. मैं सीधा लेट गया, अपने मोटे भारी गांड को उठाते हुए वो मेरे लंड पर बैठने लगी. एक दो बार तो कोशिश करने पर लंड अंदर ही नहीं गया, बार-बार फिसल जा रहा था. तभी मम्मी ने मुझे शांत रहने का इशारा किया और अपने हाथों से मेरे लंड को पकड़ कर अपनी चूत में डालने लगी. वो अनुभवी थी, उसे पता था यह कैसे करना है. धीरे-धीरे लंड पुरा उसकी चूत के अंदर समा गया. उसकी चूचियां मेरे मुंह के सामने लटक रही थी, मैंने उसे चूसना शुरू किया और उसकी कमर को जोर से पकड़ लिया. वो उछल-उछलकर मुझसे चूदवा रही थी.


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मैंने उसकी गांड पर जोरदार थप्पड़ मारा इससे वो चौंक गई उसकी आंखें बड़ी हो गई. इससे वो भी अपने रंग में आ गई और मेरे लंड को पूरी तरह से निचोड़ रही थी जैसे कोई मशीन. उसके मोटे गांड बहुत कामुक थे, मैं उसे जोर-जोर से मसलने लगा. हम दोनों चूदाइ का भरपूर आनंद ले रहे थे तभी इस बार मम्मी ने फिर से पोजीशन बदला और अपना पीठ मेरी ओर करते हुए फिर से मेरे लंड पर बैठी उसकी गांड मेरी आंखों के सामने थी. जैसे वो ऊपर नीचे उठ बैठ रही थी, उसके मोटे गांड छल-उछलकर मेरे पेट पर लग रहे थे और जोरदार थपकियों की आवाज होने लगी. उसकी हरकतों से पता चल रहा था कि वो बहुत ज्यादा प्यासी है, उसने सारी शर्म और हया छोड़ दी. वो अपने हाथ को पीछे मेरे सीने पर टिका कर चाहती थी कि मैं उसे चोदूं. मैंने भी कमर उठाकर अपना लंड तेजी से उसकी चूत में मारना शुरू किया, थपकियों की आवाज बढ़ती गई और लंड की रफ्तार भी.

चूदाइ बहुत जबरदस्त था उसके कमर को पड़कर मैं उसे चोदता रहा और उसने अपने आप को मेरे हवाले कर दिया. ऐसा लग रहा था मानो उसकी चूत मेरे लंड के लिए ही बना हो. वो चूदाइ का हर एक झटका सहती रही. उसने पूरी तरह से मुझे भिगो दिया था और चूदवाई जा रही थी. मैं भी लंबे-लंबे झटके मारना शुरू किया, उसकी कामुक हवस से भरी सिसकारियां निकल रही थी.


मम्मी: आह...ऊऊह्ह्ह्ह…हाँ! हे भगवान! चोद...हाँ!ओह...ज़ोर से!!!

मैं महसूस कर सकता था कि मेरा लंड एक ऐसी जगह टकरा रहा था जिससे वो ऐसी चीख निकली जो मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी. मैंने आगे बढ़कर उसके चूचियों को पकड़ा और ज़ोर से दबाया, उसे अपनी ओर खींचा और ज़ोर-ज़ोर से धक्के लगाने लगा. मम्मी पूरी तरह से हवा में हो गई और अपना पूरा वजन मेरे लंड पर डाल दिया. मज़ा इतना बढ़ गया था कि वो लगभग दर्द जैसा लगने लगा था, फिर भी वो और ज़्यादा के लिए गिड़गिड़ा रही थी.


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उसके गांड हिल रहे थे, उसकी चूत से पानी निकल रहा था जिससे घर्षण आसान हो गया था, और हर धक्के के साथ एक तेज, गीली आवाज़ आ रही थी. मैं बिना रुके, पूरी ताकत के साथ उसके अंदर जा रहा था, जैसे मैं उसके हर हिस्से पर अपना अधिकार जमाना चाहता था, माँ और बेटे के बीच की सीमा को मिटाते हुए.

मैंने नीचे हाथ बढ़ाया, मेरे अंगूठे ने उसकी क्लिटोरिस को ढूँढा और ज़ोर-ज़ोर से रगड़ने लगा, जबकि मैं नीचे से उसे चोदता रहा. ये दोहरा चूदाइ उसके लिए बहुत ज़्यादा था. उसकी साँसें फूलने लगी, छोटी और तेज आहें भरने लगी. मैं महसूस कर सकता था कि उसकी चूत में ऐंठन शुरू हो गई है, दीवारें मेरे लंड के चारों ओर ज़ोर से सिकुड़ रही थी.


मम्मी: ऊऊह्ह्ह्ह…बेटा…नहीं...आह्ह्ह…आह्ह्ह…अहह


उसकी चूत ने मुझे ज़ोरदार, संकुचनों की एक श्रृंखला में जकड़ लिया, मेरे लंड को इतनी तीव्रता से निचोड़ा कि मैं भी चरम सीमा पर पहुँच गया.


मैं: आह्ह्ह्हह…….मम्मी...ओह...मेरी माँ...
मम्मी: हाँ बेटा...
मैं: ओह...मेरा निकलने वाला है
मम्मी: आहा...ओह बेटा...निकलने दे...हाँ...आअह्ह्ह्ह!!!

मैंने एक धीमी, जानवरों जैसी गुर्राहट निकाली, मेरी मांसपेशियाँ तन गई और मैंने तीन आखिरी, ज़बरदस्त झटके दिए, खुद को जितना हो सके उतना अंदर धकेल दिया. मैंने महसूस किया, वीर्य की एक गर्म, गाढ़ी धारा उसकी कोख में भर गई, उसे पूरी तरह से भर दिया. मैं ज़ोर से कराह उठा, मेरा माथा उसकी पीठ पर टिका था और अपना सब कुछ उसमें खाली कर रहा था.

हम कुछ देर तक वैसे ही पड़े रहे. कमरे में बस हमारी एक साथ चलती भारी साँसों की आवाज़ आ रही थी. मैं धीरे-धीरे उससे अलग हुआ, उसके चेहरे पर पूरी तरह समर्पण और सुखद थकान के भाव थे. उसने मेरी ओर देखा, उसकी आँखों में प्यार और मदहोशी थी. शर्म पूरी तरह गायब हो चुकी थी और उसकी जगह एक गहरे, गुप्त बंधन ने ले ली थी.


मम्मी मेरे बगल में लेटी थी, कुछ घंटों के लिए, हम एक ऐसी दुनिया में थे जहाँ माँ शब्द का कोई मतलब नहीं था.



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जैसे-जैसे घड़ी में सुबह के 3:00 बजने को आए, मम्मी हिली और उसकी आँखें धीरे-धीरे खुली. सुख का नशा अभी भी था, लेकिन उसकी जगह अचानक चिंता ने ले ली थी. उसके चेहरे पर अभी भी बची हुई चाहत और माँ वाली घबराहट का मिला-जुला भाव था. वो जानती थी कि अगर कुसुम या रीना जाग गई और मुझे उसके बिस्तर पर देख लिया, तो अंधेरे में हमने जो राज़ बनाया था, वह टूट जाएगा.

मम्मी: आशीष... बेटा, तुझे जाना होगा, अपने कमरे में वापस जा. अभी. चुपके से... लड़कियों के जागने से पहले. अगर उन्होंने देख लिया, तो... मुझे नहीं पता क्या होगा.


मैंने उसकी आँखों में उलझन देखी. मैं हिला नही, मैं उससे सटा रहा, मेरे शरीर में अभी भी ऊर्जा दौड़ रही थी, मेरा लंड फिर से उत्तेजित होने लगा था, उसकी बिखरी हुई और अस्त-व्यस्त हालत को देखकर. इस स्थिति का वर्जित होना, कुछ ही दीवारों के पार मेरी बहनों के पकड़े जाने का जोखिम, एक ज़बरदस्त उत्तेजक का काम कर रहा था.

मैं: मैं अभी नहीं जाना चाहता.
मम्मी: आशीष, प्लीज़... हमें सावधान रहना होगा.

उसने विनती की, लेकिन उसकी आवाज में कोई दृढ़ता नहीं थी. जब मैं उसके करीब झुका और उसकी गर्दन के किनारे को चाटा, तो उसकी साँसें अटक गई. जोखिम का रोमांच बहुत ज़्यादा था. मैंने अचानक और ज़ोरदार हरकत के साथ उसे पलटा और बिस्तर के किनारे की ओर धकेल दिया. उसके मुँह से एक दबी हुई चीख निकली जब उसके गांड गद्दे से टकराए और उसका ऊपरी शरीर नीचे दब गया, उसकी छाती चादरों में दब गई. मैंने उसके कमर को पकड़ा, उसके गांड को हवा में ऊपर उठाया और उसे बिस्तर के किनारे पर झुका दिया ताकि उसकी चूत पूरी तरह खुल जाए.

रात की ठंड और मम्मी के नशे की वजह से लंड अपने आप पत्थर की तरह मजबूत और खड़ा हो चुका था. मैंने कोई फोरप्ले नहीं किया. मैंने अपने पूरी तरह से कड़े लंड को सही जगह पर रखा और पीछे से एक ही ज़ोरदार झटके के साथ उसके अंदर घुस गया. उसके गीले, चूत की सुरंग में मेरे लंड के फिसलने की आवाज उस शांत कमरे में गूंज उठी.


मम्मी: ओह! अहह...अहह!

मम्मी की चीखी, लेकिन उसने तुरंत अपना हाथ अपने मुँह पर रख लिया ताकि आवाज बाहर न आए. उसकी आँखें डर और चरम सुख से फटी हुई थी. अचानक हुए प्रवेश और बिस्तर के कोण ने मुझे उसके और अंदर जाने पर मजबूर कर दिया. मैं हर धक्के के साथ उसके गर्भाशय से टकरा रहा था, और बेताबी और तेज़ी के साथ खुद को उसके अंदर धकेल रहा था. ये पहले जैसा धीमा और एक-दूसरे को समझने वाला सेक्स नहीं था. ये तेज़, कामुक और बेताब करने वाला था. मैं ज़ोर-ज़ोर से धक्के लगा रहा था, मेरा जांघ उसकी गांड से टकराकर जोर से थप-थप की आवाज पैदा करने लगा. मैं खुद को और अंदर धकेल रहा था, मम्मी कांप रही थी, उसकी उंगलियाँ बेडशीट को नोच रही थीं, और उसकी दबी हुई कराहें उसके गले से निकल रही थी.


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मम्मी: उफ़्फ...इतनी जोर से...नहीं... ओह! मुझे... जल्दी... इससे पहले कि वो जाग जाएं!
मैं: कोई नहीं जागेगा...
मम्मी: बेटा बस...आअह्ह्ह्ह!!!
मैं: बस हो गया

मैंने अपनी गति बढ़ा दी, मेरे धक्के छोटे, तेज और ज़बरदस्त हो गए. उसकी चूत में जोरदार झटका मारने के कुछ दस मिनट बाद हमारे बीच की गर्मी चरम सीमा पर पहुँच रही थी. वो हाँफ रही थी, उसका शरीर ज़ोरो से काँप रहा था. उसकी चूत ने एक आखिरी, ज़बरदस्त सिकुड़न के साथ मेरे लंड को इतनी कसकर जकड़ा कि मेरा संयम लगभग टूट ही गया था.

मैं उसके अंदर पूरी तरह समाया हुआ था, लेकिन जैसे ही मैंने बाहर निकलने की कोशिश की, मेरे मन में एक अजीब सी, हटकर इच्छा जागी. मैं नहीं चाहता था कि मेरा वीर्य बस उसके गर्भ में खो जाए. मैं चाहता था कि वो उसे चखे. मैं चाहता था कि वो उस रस की हर एक बूंद को पी जाए जिसने अभी-अभी उसके शरीर पर अपना अधिकार जमाया था. मैंने अपने लंड को उसके अंदर ही बनाए रखा, और उसके कान में फुसफुसाने के लिए नीचे झुका.



मैं: इसे बस बहने मत देना, मम्मी. मैं चाहता हूँ कि आप इसे मुझसे चूसकर निकालो. आप मेरे लंड को अपने मुँह में लो और हर एक बूंद पी जाओ.

मम्मी एकदम जम गई. उसके होंठों से एक तीखी, सुनाई देने वाली सिसकारी निकली और वो मेरे नीचे अकड़ गई. उसने ऊपर मेरी ओर देखा, उसकी आँखें असली हैरानी से फटी रह गई. यह मांग कुछ ऐसी थी जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी. उसकी पारंपरिक दुनिया में, और यहाँ तक कि उसकी छिपी हुई कल्पनाओं में भी, ओरल सेक्स करने का विचार खासकर अपने ही बेटे के साथ एक ऐसी सीमा थी जिसे पार करने की हिम्मत उसने कभी नहीं की थी. उसने ऐसा किसी के लिए नहीं किया था, यहाँ तक कि अपनी शादी के सबसे जोशीले दिनों में भी नहीं.

मम्मी: आशीष... मैं नहीं कर सकती. मुझे नहीं पता कैसे... मैंने कभी नहीं किया... ये बहुत बड़ी बात है, बेटा.

मैंने उसे पीछे नहीं हटने दिया. मैंने उसके गांड को मज़बूती से पकड़ा और उसे याद दिलाया कि इस कमरे में कौन कंट्रोल में है. मैंने धीरे-धीरे अपना लंड उसके चूत से बाहर निकालना शुरू किया, लेकिन पूरी तरह से अलग नहीं हुआ. मैंने अपने लंड के अगले हिस्से को बाहर झाँकने दिया, जो उसके रस से चमक रहा था और उसकी चूत के मुहाने को छेड़ रहा था. मैं और करीब झुका, मेरी गर्म साँसें उसकी त्वचा को छू रही थी.

मैं: बस एक बार, मम्मी. बस मेरे लिए कोशिश करो. आपने मुझे अपना शरीर, अपनी चूत, अपना सब कुछ दे दिया है... तो अब क्यों रुक रही हो? क्या आप जानना नहीं चाहती कि मेरा स्वाद कैसा है?

जिस तरह से मैंने कहा, उस बेबाक और ज़बरदस्ती वाले अंदाज ने शायद उसके विरोध की बची-खुची कसर भी तोड़ दी. कुछ ऐसा करने का ख्याल जो मना था, जो पूरी तरह से गलत था, उसने उसके अंदर जोश बढ़ाने वाला ईंधन थी. वो पीछे मुड़ी, उसने मेरे मोटे लंड को देखा, जिस पर अभी भी उसके चूत का रस लगा हुआ था. झिझकते हुए, उसने सिर हिलाया. जब तक वो हिली, 3:30 बज चुके थे. घर में गहरी खामोशी छाई हुई थी, वो हिम्मत करते हुए मेरे सामने घुटनों के बल बैठी थी. मम्मी ने हैरानी के साथ मेरे लंड को देखा. वो पत्थर जैसा सख्त था, गर्व से खड़ा और धड़क रहा था. उसने कभी अपने बेटे का लंड इतनी करीब से नहीं देखा था. उसने हाथ बढ़ाया, हल्के से सुपाडे को छुआ, धीरे-धीरे, काँपती हुई साँस के साथ, वो आगे झुकी.

मम्मी ने सुपाडे को चाटना शुरू किया, जीभ का एक झिझकता हुआ, शर्मीला स्पर्श. यह एक ऐसा स्वाद था जिसे वो पहले कभी नहीं जानती थी. पुरुष की कामुक उत्तेजना की कच्ची गंध. मेरी सांसे भी तेज होने लगी. मेरी धीमी कराह से हिम्मत पाकर, वो और बेबाक हो गई. उसने अपना मुँह खोला और झिझकते हुए मेरे लंड का सिरा अपने मुँह में ले लिया.

शुरू में, वो अनाड़ी थी, उसके होंठ मुश्किल से सुपाडे को पकड़ पा रहे थे, लेकिन जैसे ही उसने मेरे लंड के बड़े आकार को अपने मुँह में महसूस किया, एक जिज्ञासा जाग उठी. उसने चूसना शुरू किया, वैक्यूम बनाते समय उसके गाल अंदर की ओर खिंच रहे थे.

उसने इस क्रिया के आनंद को महसूस किया, जिस तरह से मेरा लंड उसकी जीभ और मुँह के ऊपरी हिस्से पर महसूस हो रहा था. उसने अपना सिर हिलाना शुरू किया, उसकी जीभ लंड के चारों ओर घूम रही थी, उसकी लार सुपाडे को चिकना कर रही थी जैसे-जैसे वो और अंदर जा रही थी.


मम्मी: उम्म्म्म्म....मम्म्म

वो इस एहसास से हैरान थी, उसकी आँखें कभी खुल रही थी तो कभी बंद हो रही थीं क्योंकि उसने खुद को इस क्रिया के हवाले कर दिया था. वो अब यह सिर्फ मेरे लिए नहीं कर रही थी.

उसके गर्म, गीले मुँह का एहसास बर्दाश्त से बाहर हो रहा था. मेरा लंड आग की तरह जल रहा था. उसके गले की खिंचाव इतनी ज़बरदस्त थी कि उसने बाकी सब कुछ भुला दिया. मैंने उसके सिर के पिछले हिस्से को पकड़ा, मेरी उंगलियाँ उसके लहराते बालों में उलझ गई, मैंने उसकी गति को नियंत्रित किया और उसे और अंदर धकेला, जब तक कि मुझे उसके गले का पिछला हिस्सा महसूस नहीं हुआ.



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मैं: ओह...मम्मी. पानी निकलने वाला है, मम्मी!

उसके मुँह से "गल्प-गल्प...गल्प-गल्प" की आवाज़ तेजी से लगातार आ रही थी. मैं कराह उठा, मेरे कमर अपने-आप उसके मुँह की तरफ धकेलने लगे. मम्मी पीछे नहीं हटी. उसने मेरी जांघों को कसकर पकड़ा और मुझे अपनी ओर खींचा, वो अपने बेटे की निशानी अपने अंदर चाहती थी. जब मैं चरम सीमा पर पहुँचा, तो मेरे मुँह से एक गहरी आवाज निकली और वीर्य की एक गाढ़ी, गर्म धार उसके गले के पिछले हिस्से से टकराई, और उसके बाद एक फिर दूसरा और तीसरी धार निकालने के बाद मम्मी का दम थोड़ा घुटने लगा, उसकी आँखे फैल गई जब मेरे वीर्य की पहली लहर उससे टकराई, लेकिन वो रुकी नही. वो चूसती रही, मुझमें से आखिरी बूँद तक निचोड़ती रही. उसने मुश्किल से निगला, वो गाढ़ा, मलाईदार तरल उसके गले से नीचे उतर रहा था. जब मैं आखिरकार पीछे हटा, तो लार और वीर्य की एक पतली चमक उसके होंठों से जोड़े हुए थी. मम्मी अपनी एड़ियों के बल पीछे बैठ गई, उसके होंठ चमक रहे थे, और उसके मुँह के कोने से मेरे वीर्य की थोड़ी सी मात्रा रिस रही थी. उसने धीरे-धीरे अपने होंठ चाटे, स्वाद का मज़ा लेते हुए.

मम्मी: (फुसफुसाते हुए) तेरा स्वाद... कमाल का है.

मैं मुस्कुराया और उसे चूमने के लिए आगे झुका, हमारे होंठों के बीच मेरे ही वीर्य का स्वाद साझा हो रहा था.


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सूरज उगने में अभी कई घंटे बाकी थे, लेकिन 3:30 बजे के अंधेरे में हमने जो बंधन बनाया था, वह अब अटूट था. हमने सब कुछ साझा किया था. शरीर और वीर्य और अब पीछे मुड़ने का कोई रास्ता नहीं था.

पूरी रात मेहनत करने के बाद मेरी नींद अभी भी अधूरी थी. फिर भी मम्मी के उत्सुकता ने मुझे सुबह जल्दी जगा दिया. मैं किचन में गया और मम्मी को देखा. वो एक पारंपरिक, सम्मानित भारतीय माँ जैसी लग रही थी. अच्छी तरह से पहनी हुई सुंदर साड़ी, बाल सलीके से बंधे हुए, और उसकी चाल-ढाल में ऐसी नज़ाकत थी जिससे पता ही नहीं चलता था कि कुछ घंटे पहले ही हमने कितनी गंदी तरीके से सेक्स किया था.

जैसे ही मैं उसके पास पहुँचा, जैसे ही हमारी नज़रें मिलीं, उसके चेहरे पर एक अजीब सी शर्म दौड़ गई और उसने तुरंत नज़रें हटा ली. उनकी गर्दन पर शर्म की लाली फैल गई.



मम्मी: (धीमी आवाज में) आशीष... चल जा. अपने कमरे में जा. पिछली बार कुसुम ने हमें किचन में लगभग पकड़ ही लिया था...

मैंने हमारे बीच की दूरी कम की, उसे अपनी ओर खींचा, अपनी बाहें उसकी कमर के चारों ओर लपेट ली. मैं झुका और उसे चूमा. कोई शर्मीला चुंबन नहीं, बल्कि एक गहरा, अधिकार जताने वाला चुंबन. जैसे ही मेरे होंठ उसके होंठों से मिले, मुझे वही गर्मी, वही बेताब भूख महसूस हुई जो सुबह उसमें थी.


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मेरा लंड खड़ा हो गया और उसकी कमर से रगड़ खाने लगा. मम्मी ने यह महसूस करते ही अपनी गांड से मुझे पीछे की ओर धक्का दिया और जब मेरे तरफ घूमी तो उसकी चेहरे पर एक शर्मीली हंसी थी.


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मम्मी: जा जाकर अपना काम कर और मुझे भी काम करने दे.


मैं मुस्कुराया, मैं घर के पिछले हिस्से की ओर बढ़ा, जहाँ आसमान का रंग गहरा स्लेटी हो गया था और हल्की बारिश शुरू हो गई थी, जिससे सुबह की उमस भरी हवा ठंडी हो रही थी. वहाँ, दरवाज़े पर कुसुम दीदी बैठी थी. वो सिमटकर बैठी थी और लयबद्ध तरीके से गिरती बारिश की बूंदों को देख रही थी, उसके चेहरे पर सोच-विचार और खोई-खोई सी भाव-भंगिमा थी. वो बहुत खूबसूरत लग रही थी, नम हवा से उसकी त्वचा चमक रही थी. जब मैं उसके पास बैठा, तो हमारे बीच खामोशी छाई हुई थी. दीदी भी मम्मी की तरह ही शर्मीली थी. वो भूल चुकी थी, उसे मुझ पर कभी गुस्सा भी आता था. हमारी अपनी एक कहानी थी, खोज और तीव्र जुनून की एक गुप्त कहानी जो घर के बाकी लोगों से छिपी हुई थी.

शुरू में उसने मेरी तरफ नहीं देखा, उसकी नज़रें गिरती बारिश की बूंदों पर टिकी थी.


मैं: कैसा लग रहा है? क्या आपके पीरियड्स अभी भी चल रहे हैं?
कुसुम दीदी: (धीरे से) अभी एक दिन बाकी है. अभी और दर्द है.

मुझे घर का नक्शा अच्छी तरह पता था. मम्मी रसोई में व्यस्त थीं, शायद मेरे चुंबन की वजह से अभी भी उनकी साँसें तेज़ थी और रीना दीदी अपने कमरे में बंद लैपटॉप में लगी हुई थी. घर का पिछला हिस्सा हमारी सुरक्षित जगह थी, जो बारिश के पर्दे और दूसरे कमरों से दूरी की वजह से छिपी हुई थी.

मैंने और कुछ नहीं कहा, बस कुसुम दीदी के गाल को थाम लिया और उसका चेहरा अपनी ओर खींच लिया. मैंने उसे जोश के साथ चूमा, और मुझे उसके मुँह की मिठास महसूस हो रही थी. उस चुंबन में वो पूरी तरह खो गई, जबकि हमारे आस-पास बारिश हो रही थी.


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मैं मम्मी और मंझली बेटी को तो पा चुका था. अब बस सबसे बड़ी बेटी, रीना, ही उस पहेली का आखिरी हिस्सा थी जिसे पूरा करना बाकी था. वो मुझे अपने कमरे में मिली, उसके लैपटॉप की नीली रोशनी उसके ध्यानमग्न चेहरे पर पड़ रही थी. तीनों बहनों में रीना सबसे शांत और संयमित थी. वही एक थी जो ज़िम्मेदार बड़ी बहन की छवि बनाए रखने की सबसे ज़्यादा कोशिश करती थी.

रीना दीदी: आशीष... तू यहाँ क्या कर रहा है. जाके पढाई कर. तुने अपने चैप्टर पूरे कर लिए?

मैं मुस्कुराते हुए उसके डेस्क के पास गया. मेरे होंठ उसके कान के पास थे, और मेरी आवाज़ धीमी और छेड़छाड़ भरी थी.

मैं: पढ़ाई? हम किस पढ़ाई की बात कर रहे हैं, रीना दीदी? वो पढ़ाई जिसमें मैं किताबें पढ़ता हूँ... या वो!

दीदी ने दरवाज़े की ओर देखा, उसे डर था कि कहीं मम्मी या कुसुम दीदी अंदर न आ जाएँ,

रीना दीदी: (गुस्से में) चुप हो जा! अगर किसी ने सुन लिया तो?
मैं: मैं भूल नहीं पा रहा कि आपकी चूत कितनी मुलायम और गुदगुदी है, दी.

ये सुनकर वो शर्मा गई और हल्की मुस्कुराहट उसके चेहरे पर छा गई. उसका चेहरा मेरी तरफ ओर झुका और मैंने उसके होंठों को एक प्यासी चुंबन में जकड़ लिया. कुछ मिनटों के लिए, दुनिया सिमटकर हमारे मुँह की गर्मी और हमारी एक साथ चलती साँसों की आवाज तक ही रह गई.


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जब मैं उससे अलग हुआ, मेरी ज़िंदगी की तीन सबसे अहम औरतें मेरी हवस के जाल में पूरी तरह फंसी हुई थी. दिन घर की खुशियों और छिपी हुई कामुकता के माहौल में गुजरा. खासकर मम्मी तो पूरी तरह बदल गई थी. दिलचस्प बात ये थी कि नैना आंटी के लगातार फ़ोन आने बंद हो गए थे. उन्हें अब अपनी सहेली की सलाह या हिम्मत बढ़ाने वाली बातों की ज़रूरत नहीं थी.
Akhir teeno auraton ko pata hi liya.
 
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lonelyjuhi

Member
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Vah vah vah bahut hi hot aur romance wala erotic update hai ye. Bahut hi maja aya yaar.
Aap ne bahut mast likha hai, bahut bahut maza aya padhke
 

Amrish Pori

New Member
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3
Awesome update and amazing yaar!
behad hi lajawab aur mast kahaani!
yaar aap ek ek ghatna ko itne shandaar tarike se dikhate ho ki mai bata nhi sakta,
 
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