UPDATE 57
कोई 8:15 को जीजू एयरपोर्ट को निकल गये. 9:30 को उनकी फ्लाइट थी और 1 घंटे पहले सिक्योरिटी चेक वग़ैरह के लिए एयरपोर्ट पहुँचना ज़रूरी था. कुछ देर हम तीनों आपस में बैठे बातें करते रहे, मैंने अपना सोने का इंतज़ाम हॉल में ही कर लिया था. जब वो दोनों अपने–2 कमरे में सोने चली गयी तो मैं भी तान चादर सोफे पर लंबा हो गया. एसी हॉल में पड़ते ही मुझे नींद ने धर दबोचा और मैं गहरी नींद में डूब गया.
पता नहीं रात का कौन सा पहर था, मेरी नींद खुली अपने लंड पर कुछ गीलापन सा महसूस करके. कुछ देर तो मैं इसी सोच विचार में रहा, कि ये सब सपने मैं तो नहीं हो रहा?? लेकिन जब मेरी नींद पूरी तरह खुल गयी, तब मुझे एहसास हुआ कि कोई मेरे लौड़े को मुँह में लेकर चूस रहा है. मैंने झट से अपनी आँखें खोल दी. देखा तो रमा दीदी मेरे लंड को चूस रही थी. एक हाथ उसका अपनी चूत सहलाने में बिज़ी था.
मैंने अपना हाथ रमा दीदी के सर पर रखा और उसे अपने लौड़े से हटाते हुए कहा – दीदी… तुम तो कुछ ज़्यादा ही चुदासी हो रही हो.. सुबह ही तो किया था.. फिर से?? ये हो क्या गया है तुम्हें?
रमा दीदी – पता नहीं अंकुश? मुझे नींद ही नहीं आई… रह-रहकर सुबह की याद आ जाती है.. और ना चाहते हुए, बार-बार मेरी चूत गीली हो रही है. जब रहा नहीं गया, तो मैं यहाँ खिंची चली आई… अंकुश अब तुम जाग ही गए हो, तो एक राउंड मेरी चूत को चोद दो न यार प्लीज़… वरना, मैं रात भर यूँ ही अपनी चूत को रगड़ते रहूंगी.
रमा दीदी की दशा देख कर मुझे हँसी आ गयी. नींद तो अब पूरी तरह गायब हो ही चुकी थी, तो रमा दीदी को वहीं सोफे पर पटक कर उसकी एकमात्र गाउन को निकाल फेंका. वास्तव में दीदी की चूत लगातार बहे जा रही थी. पता नहीं रमा दीदी कितनी देर से मेरे लौड़े को चूस रही थी, इसलिए मेरा लौड़ा भी फुल फॉर्म था. मैंने रमा दीदी की टाँगें चौड़ी करके अपने लौड़ा को एक दो बार उसकी गीली चूत के होंठों पर फिराया. मेरा लौड़ा रमा दीदी के कामरस से गीला हो गया. फिर रमा दीदी की चूत के छेद पर टिका कर एक करारा सा धक्का लगा दिया. रमा दीदी के मुँह से एक कराह निकल पड़ी. पूरा लंड डालकर मैंने रमा दीदी की चुदाई शुरू कर दी. आधे घंटे में मैंने रमा दीदी को अच्छे से रगड़-रगड़ कर चोदा. दो बार झड़ने के बाद रमा दीदी खुश हो गयी और अपनी गाउन उठाकर अपने कमरे में चली गयी, लेकिन मुझे अब नींद आने में थोड़ा समय लगने वाला था. फिर भी सोने की कोशिश करते-करते आख़िर में मुझे भी नींद आ ही गयी.
दूसरे दिन सुबह 9 बजे की ट्रेन पकड़ कर हम तीनों आर्यन के साथ गांव को चल पड़े. चूँकि ये लोकल पैसेंजर ट्रेन थी, तो रुकते-रुकते, हमें रास्ते में पूरा दिन लगने वाला था. अब इस ट्रेन में रिज़र्वेशन की सुविधा तो थी नहीं तो जिसको जहाँ जगह मिली बैठ गये. वो तो अच्छा हुआ कि हम थोड़ा वक़्त पर न्यू दिल्ली स्टेशन पर पहुँच गये थे तो आराम से आमने-सामने की सीट बैठने को मिल गयी थी. गाड़ी छूटने तक भी कोई ज़्यादा भीड़ भाड़ नहीं हुई. लेकिन जैसे–2 नये स्टेशन आते जा रहे थे, ट्रेन की बोगी में लोगों की संख्या बढ़ती जा रही थी.
मेरे सामने विंडो की तरफ मेघना बैठी थी. उसके बाजू में रमा दीदी. आर्यन मेरी गोद में था, जो कभी रमा दीदी के पास चला जाता तो कभी मेरी गोद में. अब जब लोग बढ़ेंगे तो स्वाभाविक सी बात है, गर्मी भी बढ़ेगी ही. मार्च के शुरुआती दिन, 10-11 बजते ही भयंकर गर्मी बढ़ गयी. लोग पसीने–2 होने लगे. वो तो अच्छा था, कि हम विंडो के पास थे. जब गाड़ी चलती थी, तो हवा आने से गर्मी में राहत मिल जाती थी. चार-चार लोगों की सीट पर ऑलरेडी 5-5 लोग बैठे हुए थे. फिर एक स्टेशन से कुछ लौन्डे लफाड़े और आ गये और वो जबरदस्ती से और घुसने लगे. एक तो मेरी वाली सीट पर टिक ही गया. एक और रमा दीदी के बाजू में टिकने के लिए बोलने लगा. अजी बोलने क्या लगा, बाजू वाले के घुटने दूसरी ओर मोड़ कर टिक ही गया और धीरे–2 हिलते हिलाते उसने अपने बैठने के लिए ख़ासी जगह बना ली. उसकी हरकतों से रमा दीदी बहुत अनकम्फ़र्टेबल फील करने लगी. वो लौंडा धीरे-2 अपनी कुहनी रमा दीदी की चुचियों पर दबाने की कोशिश करने लगा.
रमा दीदी ने उसे टोका भी, तो वो साला उलटा-पुल्टा जवाब देने लगा. मैंने बात बढ़ाना ठीक नहीं समझा. लेडीज साथ में थी, ऐसे लौन्डे लफाड़े से उलझने में अपना ही नुकसान होना था. वो तो साले फटेलंड गिरधारी. उनका क्या जाना था. मैंने उसे अपनी जगह आने को कहा और मैं उसकी जगह बैठ गया. अब रमा दीदी सामने वाली सीट पर आर्यन को गोद में ले के बैठ गयी. इस तरह से दोनों लेडी सेफ हो गयीं. लेकिन भीड़ और गर्मी का क्या किया जाए, जो निरंतर बढ़ती जा रही थी.
अब 4 की सीट पर 6-6 लोग, सोच कर देखो कैसे बैठे होंगे? मैं एक तरफ की गान्ड ही टिकाए हुए था. और मेरा झुकाव मेघना की तरफ था. मेरी जाँघ मेघना के कूल्हे से एक दम सटी हुई थी. मेरी जाँघ के दबाव अपने कूल्हे पर पाकर मेघना का चेहरा गर्मी और उत्तेजना से लाल होने लगा. मेघना देख ज़रूर खिड़की से बाहर रही थी, लेकिन उसके मन में क्या चल रहा था, थोड़ा अंदाज़ा लग चुका था मुझे.
अगले स्टेशन पर और भीड़ बढ़ गयी डिब्बे में. लोग दोनों सीटो के बीच में भी खड़े होने लगे. मेरे सामने ही एक अधेड़ मोटी सी महिला आकर खड़ी हो गयी, जिससे मेरे और दीदी के बीच एक चर्बी की दीवार खड़ी हो गयी.
मेघना ने पहलू बदला और अपना मेरी तरफ का पैर सीट के ऊपर रख लिया, जिसकी वजह से उसकी गान्ड का आधा भाग मेरी जाँघ के ऊपर आ गया. अब मेरे लिए हाथ रखने की भी जगह नहीं थी, तो मैंने उस तरफ का अपना हाथ मेघना के पीछे सीट पर टिका लिया. मेघना ने तिरछी नज़र से ये देख लिया था, कि मैंने अपना एक हाथ उसके पीछे रखा है.
मेघना ने विंडो से बाहर को देखते हुए अपनी गान्ड को हिला-हिला कर धीरे-धीरे पीछे को शिफ्ट करने लगी. वैसे भी मेरा हाथ बमुश्किल 1-2 सेंटीमीटर ही अलग था मेघना की गान्ड से. मेघना के हिलते ही उसकी गान्ड की दरार ठीक मेरी उंगलियों के ऊपर आ गयी. साथ ही अब उसने अपना पैर जो सीट पर रखा था, उसे भी नीचे कर लिया. नतीज़तन मेघना की मांसल जाँघ मेरी जाँघ से दब गयी और गान्ड की दरार में मेरी उंगलियों की उपरी सतह फँस गयी.
उंगली की गाँठ का दबाव ठीक मेघना की गान्ड के छेद पर पड़ते ही उसके मुँह से एक दबी हुई सिसकी निकल गयी और चेहरा लाल सुर्ख हो गया. इधर उसकी गान्ड के छेद का दबाव मेरी उंगली की गाँठ पर महसूस होते ही मेरा भी हाल बेहाल होने लगा था. मेघना की गान्ड से निकलने वाली तरंगें मेरी उंगली से होती हुई, मेरे लंड तक पहुँच गयी, और मेरा लंड मेरी टाइट जीन्स की क़ैद में फड़फड़ाने लगा.
मेघना ने अपनी जाँघ के ऊपर जाँघ चढ़ाकर अपनी चूत के होंठों को कस लिया. जिसका एहसास मेघना की गान्ड की सिकुड़न से मेरी उंगली ने साफ-साफ महसूस किया. मेघना देख ज़रूर बाहर रही थी, लेकिन उसके फेस के एक्सप्रेशन बता रहे थे कि वो कितनी गरम हो चुकी है.
ये सच है, कि जाने अंजाने ही सही, जब कोई मर्द या औरत सेक्सुअल सेन्सेशन फील करने लगता है, तो वो उसे और ज़्यादा पाने की कोशिश में लग जाता है, फिर उसे अपने आस-पास का भी भय नहीं रहता. ऐसा ही कुछ हम दोनों के साथ भी हो रहा था.
मैंने अपनी वो उंगली, जिसकी गाँठ मेघना की गान्ड के छेद पर दबी हुई थी उसको मोड़ कर ऊपर उठा दिया. उधर मेघना ने ट्रेन के हिचकोलों का सहारा लेकर अपनी गान्ड को आगे पीछे मूव करना शुरू कर दिया. मेघना ने अपनी जाँघ को दूसरी जाँघ पर और ज़्यादा चढ़ा लिया, जिससे उसकी गान्ड थोड़ी और ऊपर हो गयी. अब मेघना मेरी उठी हुई उंगली पर अपनी गान्ड के छेद को और अच्छे से घिस सकती थी. मेघना की गर्मी निरंतर बढ़ती जा रही थी, एक कदम और आगे बढ़ते हुए उसने अपनी गान्ड को और पीछे धकेला.
ट्रेन के हिचकोलों के साथ-साथ मेघना अपनी गान्ड को आगे पीछे करते रहने की वजह से अब मेरी उंगली उसकी चूत के होंठों के अंतिम सिरे तक पहुँचने लगी. चूत के द्वार पर मेरी उंगली की गाँठ की दस्तक पाकर, मेघना की आँखें मुँद गयी. मेघना की पैंटी गीली हो चुकी थी जो मेरी उंगलियों से पता चल रहा था. मेघना का साथ देते हुए, मैंने भी अपने हाथ को आगे की तरफ सरकाने के साथ-साथ उसे पलटा दिया. अब मेरी उंगली सीधी होकर मेघना की चूत के होंठों पर सैर कर रही थी.
मेघना का हाल-बेहाल हो चुका था, अब उसके कान तक गरम होकर लाल पड़ चुके थे. गले की नसें खिचने लगी. कामोन्मादवश एक समय मेघना सारी शर्म-हया भूल कर अपना हाथ अपनी जांघों के बीच ले कर चली गई और उसने मेरे हाथ को पकड़ कर अपनी चूत के ऊपर दबा दिया. मेरी एक उंगली जो मेघना की चूत के ऊपर थी, वो उसकी सलवार और पैंटी को साथ लिए कुछ अंदर तक उसकी चूत में घुस गयी.
मेघना ने अपने होंठों को कस कर भींच लिया जिससे उसकी आह होंठों से बाहर ना निकले और अपनी जांघों को कसकर भींचते हुए मेघना झड़ने लगी. बहुत देर तक मेघना यूँ ही अपनी जांघों को कसे रही. फिर जब उत्तेजना शांत हुई तो धीरे–2 अपनी जांघों को ढीला छोड़ा. मेघना की जांघों का कसाव हटते ही मैंने अपना हाथ बाहर खींच लिया.
मेघना ने अपनी नज़र आस-पास दौड़ाई. भीड़ में किसी का ध्यान किसी की तरफ नहीं था. वैसे भी वो पहाड़ जैसी औरत सामने खड़ी थी तो उसकी आड़ में कौन देखने वाला था. फिर मेघना ने मेरी तरफ देखा, तो मैं अपनी नज़र डिब्बे में बैठे लोगों की तरफ घुमाते हुए उसके रस से गीली उंगलियों को नाक पर रख कर सूंघने लगा. ये देखकर मेघना बुरी तरह शरमा गयी, अपनी नज़र नीची करके मन ही मन मुस्करा उठी. फिर मौका देखकर मेघना ने अपनी चूत को रगड़ कर उससे निकले रस के गीलेपन को अपने कपड़ों से पोंछ लिया.
कुछ देर के बाद ही एक बड़ा सा स्टेशन आया और डिब्बे की सारी भीड़ वहाँ उतर गयी. कुछ और नये मुसाफिर भी चढ़े, लेकिन अब उतनी भीड़ नहीं थी. हमने कुछ खाने पीने का सोचा. रमा दीदी कुछ समान घर से बना के लाई थी, वो निकालने लगी.
मेघना – आप खाना निकालो भाभी, तब तक में टॉयलेट जाकर आती हूँ.
ये कहकर मेघना टॉयलेट चली गयी. मैं समझ रहा था, वो टॉयलेट क्यों जा रही है. सफ़र के अंत तक मेघना ने मेरी तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखा. मुझसे नज़रें मिलाने की मेघना की हिम्मत ही नहीं हुई और सच कहूँ तो मेरी भी नहीं.
अंधेरा होते–2 हम अपने घर आ गये. मैं स्टेशन तक अपनी कार ले गया था, जो लौटने में बहुत काम आई और आराम से हम साजो-समान के साथ घर तक आ गये. रमा दीदी सभी से मिलकर बहुत खुश हुई, रुचि को खेलने के लिए आर्यन के रूप में एक और साथी मिल गया. अभी तक तो रुचि चाची के अंश के साथ ही थोड़ा बहुत खेल लेती थी.
मेघना भी घर में सभी से मिलकर बहुत खुश हुई. निशा ने तो मेघना को अपना दोस्त ही बना लिया और उसका समान अपने कमरे में शिफ्ट कर दिया. उन दोनों को देख कर लग ही नहीं रहा था, कि ये पहली बार मिली हैं. मोहिनी भाभी का लास्ट मंथ चल रहा था, वो ज़्यादातर रेस्ट ही करती रहती थी. रमा दीदी ज़्यादातर भाभी के पास ही अपना समय बिताने लगी.
शादी एक सादा और सिंपल तरीके से होने वाली थी, तो ज्यादा नाते-रिश्तेदारों का जमावड़ा लगने वाला नहीं था और कोई विशेष तैयारियाँ भी नहीं होनी थी. तय हुआ था, कि हम सभी लोग शहर में ही एक गेस्टहाउस और पार्टी प्लॉट रेंट पर ले लेंगे. वहीं छाया और उसका परिवार भी आ जाएँगे. सारी रस्म अदा करके, सिंपल तरीके से शादी हो जाएगी. गांव में आकर रिसेप्शन करके सारे गांव को दावत खिला दी जाएगी.
मैं कई दिनों से अपने ऑफिस नहीं जा पाया था. दूसरे दिन सुबह-सुबह ही गाड़ी लेकर अपने ऑफिस को निकल लिया. कुछ केस आए थे, जो मेरे असिस्टेंट ने हैंडल कर लिए. कुछ बड़े केस की डेट पोस्टपोन करके कुछ दिन बाद की करवा ली. जल्दी–2 सब काम निपटाकर मैं शाम को ही घर वापस लौट आया. कपड़े चेंज करके, मैं भाभी के कमरे में आकर बैठ गया. कुछ देर रुचि को पढ़ाता रहा, फिर मेघना आर्यन को लेकर वहीं आ गयी, तो रुचि अपनी पढ़ाई बंद करके उसके साथ खेलने में लग गयी.
दूसरे दिन सुबह जल्दी उठकर आदतन मैंने एक्सरसाइज वग़ैरह की और चाय पीकर खेतों की तरफ निकलने की सोची. अभी मैं चौपाल तक ही पहुँचा था, कि पीछे से मेघना की आवाज़ सुनाई दी. आर्यन को गोद में लिए वो मेरे पास आकर बोली.
मेघना - कहीं जा रहे हैं अंकुश जी?
मैं – हां.. थोड़ा खेतों की तरफ चक्कर मार कर आता हूँ, कोई काम था?
मेघना – हमें नहीं दिखाएँगे अपने खेत?
मैं – अरे.. व्हाई नॉट?? चलिए, अच्छा है, ताजी हवा मिलेगी और वैसे भी हमारे खेतों में बहुत कुछ है देखने लायक.
मैंने आर्यन को अपनी गोद में ले लिया और चल पड़े हम दोनों खेतों की तरफ. आपस में बातें करते हुए, आर्यन के साथ खेलते हुए, हम ट्यूबवेल तक पहुँच गये. रास्ते में आर्यन के बहाने हम दोनों एक दूसरे के काफ़ी नज़दीक भी आए. ट्यूबवेल पर आकर, मैंने आर्यन को पापा के पास छोड़ा और मेघना को लेकर अपने बगीचे की तरफ चल दिया. हम पानी की नाली के साथ–2 चले जा रहे थे. एक तरफ मैं चल रहा था और नाली के दूसरी तरफ मेरे बराबर में ही मेघना चल रही थी.
अचानक से मेघना का पैर स्लिप हो गया और वो पानी की नाली में गिरने ही वाली थी, कि मैंने उसकी कमर में हाथ डालकर उसे थाम लिया. मेघना के पैर नाली में थे, मेरा एक हाथ उसकी कमर को थामे हुए था. उसकी गोल-2 मुलायम एक चुचि मेरे बदन से दब गयी. दूसरे हाथ का सहारा देने के लिए मेरा हाथ आगे आया, तो मेघना थोड़ा सा आगे को घूमी. सहारा देने के लिए मैं उसका कंधा पकड़ना चाहता था, लेकिन मेघना के घूमने की वजह से मेरा हाथ मेघना के बूब्स पे जा पड़ा और मैंने मेघना के बूब्स को जोर से पकड़ लिया.