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Incest Mera Pyara Devar - Ankush

aidenabhishek

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UPDATE 57​

कोई 8:15 को जीजू एयरपोर्ट को निकल गये. 9:30 को उनकी फ्लाइट थी और 1 घंटे पहले सिक्योरिटी चेक वग़ैरह के लिए एयरपोर्ट पहुँचना ज़रूरी था. कुछ देर हम तीनों आपस में बैठे बातें करते रहे, मैंने अपना सोने का इंतज़ाम हॉल में ही कर लिया था. जब वो दोनों अपने–2 कमरे में सोने चली गयी तो मैं भी तान चादर सोफे पर लंबा हो गया. एसी हॉल में पड़ते ही मुझे नींद ने धर दबोचा और मैं गहरी नींद में डूब गया.

पता नहीं रात का कौन सा पहर था, मेरी नींद खुली अपने लंड पर कुछ गीलापन सा महसूस करके. कुछ देर तो मैं इसी सोच विचार में रहा, कि ये सब सपने मैं तो नहीं हो रहा?? लेकिन जब मेरी नींद पूरी तरह खुल गयी, तब मुझे एहसास हुआ कि कोई मेरे लौड़े को मुँह में लेकर चूस रहा है. मैंने झट से अपनी आँखें खोल दी. देखा तो रमा दीदी मेरे लंड को चूस रही थी. एक हाथ उसका अपनी चूत सहलाने में बिज़ी था.

मैंने अपना हाथ रमा दीदी के सर पर रखा और उसे अपने लौड़े से हटाते हुए कहा – दीदी… तुम तो कुछ ज़्यादा ही चुदासी हो रही हो.. सुबह ही तो किया था.. फिर से?? ये हो क्या गया है तुम्हें?

रमा दीदी – पता नहीं अंकुश? मुझे नींद ही नहीं आई… रह-रहकर सुबह की याद आ जाती है.. और ना चाहते हुए, बार-बार मेरी चूत गीली हो रही है. जब रहा नहीं गया, तो मैं यहाँ खिंची चली आई… अंकुश अब तुम जाग ही गए हो, तो एक राउंड मेरी चूत को चोद दो न यार प्लीज़… वरना, मैं रात भर यूँ ही अपनी चूत को रगड़ते रहूंगी.

रमा दीदी की दशा देख कर मुझे हँसी आ गयी. नींद तो अब पूरी तरह गायब हो ही चुकी थी, तो रमा दीदी को वहीं सोफे पर पटक कर उसकी एकमात्र गाउन को निकाल फेंका. वास्तव में दीदी की चूत लगातार बहे जा रही थी. पता नहीं रमा दीदी कितनी देर से मेरे लौड़े को चूस रही थी, इसलिए मेरा लौड़ा भी फुल फॉर्म था. मैंने रमा दीदी की टाँगें चौड़ी करके अपने लौड़ा को एक दो बार उसकी गीली चूत के होंठों पर फिराया. मेरा लौड़ा रमा दीदी के कामरस से गीला हो गया. फिर रमा दीदी की चूत के छेद पर टिका कर एक करारा सा धक्का लगा दिया. रमा दीदी के मुँह से एक कराह निकल पड़ी. पूरा लंड डालकर मैंने रमा दीदी की चुदाई शुरू कर दी. आधे घंटे में मैंने रमा दीदी को अच्छे से रगड़-रगड़ कर चोदा. दो बार झड़ने के बाद रमा दीदी खुश हो गयी और अपनी गाउन उठाकर अपने कमरे में चली गयी, लेकिन मुझे अब नींद आने में थोड़ा समय लगने वाला था. फिर भी सोने की कोशिश करते-करते आख़िर में मुझे भी नींद आ ही गयी.

दूसरे दिन सुबह 9 बजे की ट्रेन पकड़ कर हम तीनों आर्यन के साथ गांव को चल पड़े. चूँकि ये लोकल पैसेंजर ट्रेन थी, तो रुकते-रुकते, हमें रास्ते में पूरा दिन लगने वाला था. अब इस ट्रेन में रिज़र्वेशन की सुविधा तो थी नहीं तो जिसको जहाँ जगह मिली बैठ गये. वो तो अच्छा हुआ कि हम थोड़ा वक़्त पर न्यू दिल्ली स्टेशन पर पहुँच गये थे तो आराम से आमने-सामने की सीट बैठने को मिल गयी थी. गाड़ी छूटने तक भी कोई ज़्यादा भीड़ भाड़ नहीं हुई. लेकिन जैसे–2 नये स्टेशन आते जा रहे थे, ट्रेन की बोगी में लोगों की संख्या बढ़ती जा रही थी.

मेरे सामने विंडो की तरफ मेघना बैठी थी. उसके बाजू में रमा दीदी. आर्यन मेरी गोद में था, जो कभी रमा दीदी के पास चला जाता तो कभी मेरी गोद में. अब जब लोग बढ़ेंगे तो स्वाभाविक सी बात है, गर्मी भी बढ़ेगी ही. मार्च के शुरुआती दिन, 10-11 बजते ही भयंकर गर्मी बढ़ गयी. लोग पसीने–2 होने लगे. वो तो अच्छा था, कि हम विंडो के पास थे. जब गाड़ी चलती थी, तो हवा आने से गर्मी में राहत मिल जाती थी. चार-चार लोगों की सीट पर ऑलरेडी 5-5 लोग बैठे हुए थे. फिर एक स्टेशन से कुछ लौन्डे लफाड़े और आ गये और वो जबरदस्ती से और घुसने लगे. एक तो मेरी वाली सीट पर टिक ही गया. एक और रमा दीदी के बाजू में टिकने के लिए बोलने लगा. अजी बोलने क्या लगा, बाजू वाले के घुटने दूसरी ओर मोड़ कर टिक ही गया और धीरे–2 हिलते हिलाते उसने अपने बैठने के लिए ख़ासी जगह बना ली. उसकी हरकतों से रमा दीदी बहुत अनकम्फ़र्टेबल फील करने लगी. वो लौंडा धीरे-2 अपनी कुहनी रमा दीदी की चुचियों पर दबाने की कोशिश करने लगा.

रमा दीदी ने उसे टोका भी, तो वो साला उलटा-पुल्टा जवाब देने लगा. मैंने बात बढ़ाना ठीक नहीं समझा. लेडीज साथ में थी, ऐसे लौन्डे लफाड़े से उलझने में अपना ही नुकसान होना था. वो तो साले फटेलंड गिरधारी. उनका क्या जाना था. मैंने उसे अपनी जगह आने को कहा और मैं उसकी जगह बैठ गया. अब रमा दीदी सामने वाली सीट पर आर्यन को गोद में ले के बैठ गयी. इस तरह से दोनों लेडी सेफ हो गयीं. लेकिन भीड़ और गर्मी का क्या किया जाए, जो निरंतर बढ़ती जा रही थी.

अब 4 की सीट पर 6-6 लोग, सोच कर देखो कैसे बैठे होंगे? मैं एक तरफ की गान्ड ही टिकाए हुए था. और मेरा झुकाव मेघना की तरफ था. मेरी जाँघ मेघना के कूल्हे से एक दम सटी हुई थी. मेरी जाँघ के दबाव अपने कूल्हे पर पाकर मेघना का चेहरा गर्मी और उत्तेजना से लाल होने लगा. मेघना देख ज़रूर खिड़की से बाहर रही थी, लेकिन उसके मन में क्या चल रहा था, थोड़ा अंदाज़ा लग चुका था मुझे.

अगले स्टेशन पर और भीड़ बढ़ गयी डिब्बे में. लोग दोनों सीटो के बीच में भी खड़े होने लगे. मेरे सामने ही एक अधेड़ मोटी सी महिला आकर खड़ी हो गयी, जिससे मेरे और दीदी के बीच एक चर्बी की दीवार खड़ी हो गयी.

मेघना ने पहलू बदला और अपना मेरी तरफ का पैर सीट के ऊपर रख लिया, जिसकी वजह से उसकी गान्ड का आधा भाग मेरी जाँघ के ऊपर आ गया. अब मेरे लिए हाथ रखने की भी जगह नहीं थी, तो मैंने उस तरफ का अपना हाथ मेघना के पीछे सीट पर टिका लिया. मेघना ने तिरछी नज़र से ये देख लिया था, कि मैंने अपना एक हाथ उसके पीछे रखा है.

मेघना ने विंडो से बाहर को देखते हुए अपनी गान्ड को हिला-हिला कर धीरे-धीरे पीछे को शिफ्ट करने लगी. वैसे भी मेरा हाथ बमुश्किल 1-2 सेंटीमीटर ही अलग था मेघना की गान्ड से. मेघना के हिलते ही उसकी गान्ड की दरार ठीक मेरी उंगलियों के ऊपर आ गयी. साथ ही अब उसने अपना पैर जो सीट पर रखा था, उसे भी नीचे कर लिया. नतीज़तन मेघना की मांसल जाँघ मेरी जाँघ से दब गयी और गान्ड की दरार में मेरी उंगलियों की उपरी सतह फँस गयी.

उंगली की गाँठ का दबाव ठीक मेघना की गान्ड के छेद पर पड़ते ही उसके मुँह से एक दबी हुई सिसकी निकल गयी और चेहरा लाल सुर्ख हो गया. इधर उसकी गान्ड के छेद का दबाव मेरी उंगली की गाँठ पर महसूस होते ही मेरा भी हाल बेहाल होने लगा था. मेघना की गान्ड से निकलने वाली तरंगें मेरी उंगली से होती हुई, मेरे लंड तक पहुँच गयी, और मेरा लंड मेरी टाइट जीन्स की क़ैद में फड़फड़ाने लगा.

मेघना ने अपनी जाँघ के ऊपर जाँघ चढ़ाकर अपनी चूत के होंठों को कस लिया. जिसका एहसास मेघना की गान्ड की सिकुड़न से मेरी उंगली ने साफ-साफ महसूस किया. मेघना देख ज़रूर बाहर रही थी, लेकिन उसके फेस के एक्सप्रेशन बता रहे थे कि वो कितनी गरम हो चुकी है.

ये सच है, कि जाने अंजाने ही सही, जब कोई मर्द या औरत सेक्सुअल सेन्सेशन फील करने लगता है, तो वो उसे और ज़्यादा पाने की कोशिश में लग जाता है, फिर उसे अपने आस-पास का भी भय नहीं रहता. ऐसा ही कुछ हम दोनों के साथ भी हो रहा था.

मैंने अपनी वो उंगली, जिसकी गाँठ मेघना की गान्ड के छेद पर दबी हुई थी उसको मोड़ कर ऊपर उठा दिया. उधर मेघना ने ट्रेन के हिचकोलों का सहारा लेकर अपनी गान्ड को आगे पीछे मूव करना शुरू कर दिया. मेघना ने अपनी जाँघ को दूसरी जाँघ पर और ज़्यादा चढ़ा लिया, जिससे उसकी गान्ड थोड़ी और ऊपर हो गयी. अब मेघना मेरी उठी हुई उंगली पर अपनी गान्ड के छेद को और अच्छे से घिस सकती थी. मेघना की गर्मी निरंतर बढ़ती जा रही थी, एक कदम और आगे बढ़ते हुए उसने अपनी गान्ड को और पीछे धकेला.

ट्रेन के हिचकोलों के साथ-साथ मेघना अपनी गान्ड को आगे पीछे करते रहने की वजह से अब मेरी उंगली उसकी चूत के होंठों के अंतिम सिरे तक पहुँचने लगी. चूत के द्वार पर मेरी उंगली की गाँठ की दस्तक पाकर, मेघना की आँखें मुँद गयी. मेघना की पैंटी गीली हो चुकी थी जो मेरी उंगलियों से पता चल रहा था. मेघना का साथ देते हुए, मैंने भी अपने हाथ को आगे की तरफ सरकाने के साथ-साथ उसे पलटा दिया. अब मेरी उंगली सीधी होकर मेघना की चूत के होंठों पर सैर कर रही थी.

मेघना का हाल-बेहाल हो चुका था, अब उसके कान तक गरम होकर लाल पड़ चुके थे. गले की नसें खिचने लगी. कामोन्मादवश एक समय मेघना सारी शर्म-हया भूल कर अपना हाथ अपनी जांघों के बीच ले कर चली गई और उसने मेरे हाथ को पकड़ कर अपनी चूत के ऊपर दबा दिया. मेरी एक उंगली जो मेघना की चूत के ऊपर थी, वो उसकी सलवार और पैंटी को साथ लिए कुछ अंदर तक उसकी चूत में घुस गयी.

मेघना ने अपने होंठों को कस कर भींच लिया जिससे उसकी आह होंठों से बाहर ना निकले और अपनी जांघों को कसकर भींचते हुए मेघना झड़ने लगी. बहुत देर तक मेघना यूँ ही अपनी जांघों को कसे रही. फिर जब उत्तेजना शांत हुई तो धीरे–2 अपनी जांघों को ढीला छोड़ा. मेघना की जांघों का कसाव हटते ही मैंने अपना हाथ बाहर खींच लिया.

मेघना ने अपनी नज़र आस-पास दौड़ाई. भीड़ में किसी का ध्यान किसी की तरफ नहीं था. वैसे भी वो पहाड़ जैसी औरत सामने खड़ी थी तो उसकी आड़ में कौन देखने वाला था. फिर मेघना ने मेरी तरफ देखा, तो मैं अपनी नज़र डिब्बे में बैठे लोगों की तरफ घुमाते हुए उसके रस से गीली उंगलियों को नाक पर रख कर सूंघने लगा. ये देखकर मेघना बुरी तरह शरमा गयी, अपनी नज़र नीची करके मन ही मन मुस्करा उठी. फिर मौका देखकर मेघना ने अपनी चूत को रगड़ कर उससे निकले रस के गीलेपन को अपने कपड़ों से पोंछ लिया.

कुछ देर के बाद ही एक बड़ा सा स्टेशन आया और डिब्बे की सारी भीड़ वहाँ उतर गयी. कुछ और नये मुसाफिर भी चढ़े, लेकिन अब उतनी भीड़ नहीं थी. हमने कुछ खाने पीने का सोचा. रमा दीदी कुछ समान घर से बना के लाई थी, वो निकालने लगी.

मेघना – आप खाना निकालो भाभी, तब तक में टॉयलेट जाकर आती हूँ.

ये कहकर मेघना टॉयलेट चली गयी. मैं समझ रहा था, वो टॉयलेट क्यों जा रही है. सफ़र के अंत तक मेघना ने मेरी तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखा. मुझसे नज़रें मिलाने की मेघना की हिम्मत ही नहीं हुई और सच कहूँ तो मेरी भी नहीं.

अंधेरा होते–2 हम अपने घर आ गये. मैं स्टेशन तक अपनी कार ले गया था, जो लौटने में बहुत काम आई और आराम से हम साजो-समान के साथ घर तक आ गये. रमा दीदी सभी से मिलकर बहुत खुश हुई, रुचि को खेलने के लिए आर्यन के रूप में एक और साथी मिल गया. अभी तक तो रुचि चाची के अंश के साथ ही थोड़ा बहुत खेल लेती थी.

मेघना भी घर में सभी से मिलकर बहुत खुश हुई. निशा ने तो मेघना को अपना दोस्त ही बना लिया और उसका समान अपने कमरे में शिफ्ट कर दिया. उन दोनों को देख कर लग ही नहीं रहा था, कि ये पहली बार मिली हैं. मोहिनी भाभी का लास्ट मंथ चल रहा था, वो ज़्यादातर रेस्ट ही करती रहती थी. रमा दीदी ज़्यादातर भाभी के पास ही अपना समय बिताने लगी.

शादी एक सादा और सिंपल तरीके से होने वाली थी, तो ज्यादा नाते-रिश्तेदारों का जमावड़ा लगने वाला नहीं था और कोई विशेष तैयारियाँ भी नहीं होनी थी. तय हुआ था, कि हम सभी लोग शहर में ही एक गेस्टहाउस और पार्टी प्लॉट रेंट पर ले लेंगे. वहीं छाया और उसका परिवार भी आ जाएँगे. सारी रस्म अदा करके, सिंपल तरीके से शादी हो जाएगी. गांव में आकर रिसेप्शन करके सारे गांव को दावत खिला दी जाएगी.

मैं कई दिनों से अपने ऑफिस नहीं जा पाया था. दूसरे दिन सुबह-सुबह ही गाड़ी लेकर अपने ऑफिस को निकल लिया. कुछ केस आए थे, जो मेरे असिस्टेंट ने हैंडल कर लिए. कुछ बड़े केस की डेट पोस्टपोन करके कुछ दिन बाद की करवा ली. जल्दी–2 सब काम निपटाकर मैं शाम को ही घर वापस लौट आया. कपड़े चेंज करके, मैं भाभी के कमरे में आकर बैठ गया. कुछ देर रुचि को पढ़ाता रहा, फिर मेघना आर्यन को लेकर वहीं आ गयी, तो रुचि अपनी पढ़ाई बंद करके उसके साथ खेलने में लग गयी.

दूसरे दिन सुबह जल्दी उठकर आदतन मैंने एक्सरसाइज वग़ैरह की और चाय पीकर खेतों की तरफ निकलने की सोची. अभी मैं चौपाल तक ही पहुँचा था, कि पीछे से मेघना की आवाज़ सुनाई दी. आर्यन को गोद में लिए वो मेरे पास आकर बोली.

मेघना - कहीं जा रहे हैं अंकुश जी?

मैं – हां.. थोड़ा खेतों की तरफ चक्कर मार कर आता हूँ, कोई काम था?

मेघना – हमें नहीं दिखाएँगे अपने खेत?

मैं – अरे.. व्हाई नॉट?? चलिए, अच्छा है, ताजी हवा मिलेगी और वैसे भी हमारे खेतों में बहुत कुछ है देखने लायक.

मैंने आर्यन को अपनी गोद में ले लिया और चल पड़े हम दोनों खेतों की तरफ. आपस में बातें करते हुए, आर्यन के साथ खेलते हुए, हम ट्यूबवेल तक पहुँच गये. रास्ते में आर्यन के बहाने हम दोनों एक दूसरे के काफ़ी नज़दीक भी आए. ट्यूबवेल पर आकर, मैंने आर्यन को पापा के पास छोड़ा और मेघना को लेकर अपने बगीचे की तरफ चल दिया. हम पानी की नाली के साथ–2 चले जा रहे थे. एक तरफ मैं चल रहा था और नाली के दूसरी तरफ मेरे बराबर में ही मेघना चल रही थी.

अचानक से मेघना का पैर स्लिप हो गया और वो पानी की नाली में गिरने ही वाली थी, कि मैंने उसकी कमर में हाथ डालकर उसे थाम लिया. मेघना के पैर नाली में थे, मेरा एक हाथ उसकी कमर को थामे हुए था. उसकी गोल-2 मुलायम एक चुचि मेरे बदन से दब गयी. दूसरे हाथ का सहारा देने के लिए मेरा हाथ आगे आया, तो मेघना थोड़ा सा आगे को घूमी. सहारा देने के लिए मैं उसका कंधा पकड़ना चाहता था, लेकिन मेघना के घूमने की वजह से मेरा हाथ मेघना के बूब्स पे जा पड़ा और मैंने मेघना के बूब्स को जोर से पकड़ लिया.
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voltmeter

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Aapka sahi hai Bhai laadla devar ki puri story ko copy paste kiye jaa rahe sahi hai khudka dimag kaam nahi karta hoga story banane mai issiliye idhar ka udhar kar rahe ho 😏 😏 😏 😏 😏 😏 😏 😏 😏 😏 😏 😏 😏 😏 😏 😏 😏 😏 😏 😏 😏 😏 😏 😏 😏 😏 😏 😏 😏 😏
 

aidenabhishek

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UPDATE 58​

अचानक से मेघना का पैर स्लिप हो गया और वो पानी की नाली में गिरने ही वाली थी, कि मैंने उसकी कमर में हाथ डालकर उसे थाम लिया. मेघना के पैर नाली में थे, मेरा एक हाथ उसकी कमर को थामे हुए था. उसकी गोल-2 मुलायम एक चुचि मेरे बदन से दब गयी. दूसरे हाथ का सहारा देने के लिए मेरा हाथ आगे आया, तो मेघना थोड़ा सा आगे को घूमी. सहारा देने के लिए मैं उसका कंधा पकड़ना चाहता था, लेकिन मेघना के घूमने की वजह से मेरा हाथ मेघना के बूब्स पे जा पड़ा और मैंने मेघना के बूब्स को जोर से पकड़ लिया.

बूब्स पर हाथ लगते ही मेघना के मुँह से सिसकी नकल गयी. मेघना ने अपना एक हाथ मेरी कमर में डाल कर अपना सर मेरे कंधे पर टिका दिया. मैंने हड़बड़ा कर अपना हाथ उसकी बूब्स से हटाना चाहा तो फ़ौरन मेघना ने अपना एक हाथ मेरे हाथ के ऊपर रख दिया और मेरे हाथ को तेज़ दबा कर मेघना मेरे शरीर से चिपक गयी.

अपनी गर्दन उठाकर मेघना ने मेरी आँखों में झाँका. हम दोनों की नज़रें जुड़ गयी और कुछ देर तक टकटकी लगाए एक दूसरे को देखते रहे. मेघना की कमर से लिपटे मेरे हाथ ने शरारत कर दी और वो मेघना की गोल-मटोल, बाहर को उभरी हुई गान्ड, जो इस स्थिति में और ज़्यादा उभर आई थी, उसपर फिसल कर पहुँच गया और मेघना के गान्ड के उभर को तेज़ भींच दिया.

मेघना – ओहहहह.. मम्मीईईईईई..

मेघना के मुँह से एक दर्द भरी कराह निकल गयी और इसी के साथ हम दोनों की तंद्रा भी भंग हो गई. मेघना झट से अलग हो गयी और गर्दन झुकाए मेरे बराबर में फिर से चलने लगी.

मैंने मेघना से पूछा – मेघना जी कहीं चोट तो नहीं आई आपको?

मेघना – नहीं, थैंक्स अंकुश… आपने मुझे गिरने से बचा लिया.

मैं – सॉरी.. वो आपको संभालने के चक्कर में थोड़ा ज़ोर से पकड़ लिया आपको.

मेघना गर्दन नीचे करके मंद-मंद मुस्कराती हुई बोली – इट्स ओके अंकुश… मैं ठीक हूँ.

दो-तीन खेत पार करते ही हम बगीचे में पहुँच गये. मँझले चाचा ने उसको अच्छे से संभाला हुआ था. अब बीच–2 में कुछ फूलों के पेड़ भी लगा दिए थे. बगीचे की हरियाली देख कर मेघना बड़ी खुश हुई. इधर से उधर घूम-2 कर फूलों पर उड़ती हुई रंगबिरंगी तितलियों को पकड़ने की कोशिश करने लगी. फूलों की क्यारी के बीच में एक आम का बहुत बड़ा और पुराना पेड़ था, जिसके मोटे तने के सराउंडिंग मिट्टी डालकर एक गोल सा चबूतरा बनाया हुआ था, जिस पर हरी-2 दूब घास खड़ी थी.

मैं उस चबूतरे पर जाकर बैठ गया, और उसे इधर से उधर दौड़ते हुए देखने लगा. कभी-कभी, सुबह की ठंडी हवा के हल्के-2 झोंकों से उसकी जुल्फें उड़कर मेघना के गुलाबी गालों को चूम लेती थी. कुछ देर बाद मेघना थक गयी और मेरी बगल में बैठकर अपनी साँसों को संयत करने लगी. मेघना की साँसों की गति के साथ-साथ उसकी 34 की बूब्स भी उपर-नीचे हो रही थी.

साँसों को कंट्रोल करते हुए मेघना बोली - आपका गांव सच में बहुत अच्छा है और सबसे अच्छा आपका ये बगीचा है, जी करता है यहीं रह जाऊं.

मैंने जब मेघना की तरफ निगाह डाली तो वो एकटक मेरी ओर ही देख रही थी. मैंने उसके चेहरे पर नज़र डालते हुए कहा.

मैं – रुक जाइए ना मेघना जी.. आपका ही घर है ये भी…

मेघना थोड़ा मायूसी भरे स्वर में बोली – मजबूरी है, पढ़ाई भी तो करनी है. मम्मी पापा के अरमान पूरे करने हैं.

फिर अपनी गर्दन नीचे झुका कर बोली – आप लोगों के बारे में मैं कितना ग़लत थी. लेकिन यहाँ आकर आपके परिवार का अपनापन देख कर मुझे अपने आप पर ग्लानि सी होने लगी है.

मेघना मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर कहने लगी – आप सच में बहुत अच्छे इंसान हैं अंकुश… निशा भाभी बहुत खुश नसीब हैं… मुझे तो अब उनसे जलन हो रही है.

झोंक-2 में मेघना के मुँह से ये शब्द निकल तो गये. लेकिन जैसे ही उसने इस बारे में ध्यान दिया, फ़ौरन शर्मिंदगी के कारण उसकी गर्दन झुक गयी. मेघना के मुँह से ऐसे शब्द सुनकर मैं उसकी तरफ देखने लगा जो अब शर्म से अपनी गर्दन झुकाए अपनी नज़रों को ज़मीन में गड़ाए हुई थी. इतने में मेघना के बालों की एक लट शरारत करती हुई उसके गुलाबी गाल पर आकर खेलने लगी, लगा मानो चाँद पर कोई बदली का कतरा आ ठहरा हो.

बरबस ही मेरा हाथ उठा और मेघना की लट को संवारते हुए उसके चाँद से मुखड़े पर नज़र गड़ाए हुए बोला – आपको निशा से जलन क्यों हो रही है मेघना जी?

मेरी बात का मेघना ने तुरंत कोई जवाब नहीं दिया, बस अपनी नज़रें ज़मीन में गड़ाए बैठी रही. मेघना के चेहरे पर शर्मिंदगी साफ दिखाई दे रही थी.

मैंने मेघना के हाथ को सहलाते हुए फिर से पूछा– बोलिए ना मेघना जी…

मेघना के होंठ कंपकंपा उठे. बड़ी मुश्किल से अपनी पलकों को उठाकर मेघना ने एक नज़र मेरे चेहरे पर डाली और अपने काँपते होंठों को खोला.

मेघना – आप जैसा हैंडसम और सुलझा हुआ जीवन साथी जो मिला है उन्हें.

मैंने ठहाका सा लगाते हुए कहा – मैं और हैंडसम?? आप मज़ाक बहुत अच्छा कर लेती हैं मेघना जी, ऐसा क्या दिखा आपको मुझमें जिससे मैं हैंडसम दिखाई दे रहा हूँ?

मेघना ने भरपूर नज़र मेरे चेहरे पर डाली और फिर मेरी आँखों में आँखें डालकर बोली – मेरी नज़र में आप किसी फिल्मी हीरो से कम नहीं हैं और सबसे बड़ी खूबी आप सभी के साथ इतने अच्छे से समन्वय बना लेते हैं. हर बात का सोल्युशन है आपके पास. एक परफेक्ट मैन की सारी खूबियाँ हैं आपके पास. एक लड़की को अपने जीवन साथी से और क्या चाहिए??

मैं – तो अब जलन करने से क्या हासिल होगा, जो होना था हो गया… अब आपके जो भी अरमान हों, जो भी मुझसे पाना चाहती हैं, वो अभी भी मिल सकता है.

मेरी बात सुनते ही एक झटके से मेघना ने अपना सर उठाया और मेरी तरफ देखने लगी. मेघना की आँखों में एक सवाल था, मानो वो पूछना चाहती हो कि क्या ऐसा संभव है??

मैं मेघना की नज़रों की भाषा अच्छे से समझ चुका था. मेरे चेहरे पर एक अर्थमयी मुस्कान तैर गयी. अपना एक हाथ मेघना की कमर में डालकर मैंने मेघना को अपनी तरफ खींचा और उसके थरथराते हुए होंठों पर अपने होंठ रख दिए. मेघना की आँखें बंद हो गयी चेहरा शर्म और लाज़ से लाल हो गया. दो मिनिट तक हम एक दूसरे के होंठों का रसपान करते रहे. फिर मैंने मेघना को छोड़ दिया.

मेरे अलग होते ही मेघना झटके से वहाँ से उठ गयी और थोड़ी दूर जाकर खड़ी हो गयी. मेघना की पीठ मेरी तरफ थी तो ये देख पाना मुमकिन नहीं था, कि वो इस समय क्या सोच रही होगी? मेरे मन में थोड़ा डर सा पैदा हुआ. पता नहीं, कहीं मेघना को बुरा तो नहीं लगा. कुछ देर बाद मैं हिम्मत करके उठा और पीछे से मेघना के कंधे पर अपना हाथ रख दिया. मेरे हाथ लगते ही मेघना सिहर गयी और लंबी-लंबी साँसें भरने लगी.

मैंने मेघना के बिल्कुल पास आकर कहा – सॉरी मेघना जी, मुझे लगा.. आप भी.. ये सब चाहती होंगी.. तो…

मेघना ने मेरी तरफ देखा उसकी आँखें तो कह रही थी कि उसे भी वो सब अच्छा लगा. फिर यों उठ के दूर जाने का क्या मतलब था??

मेघना - अब हमें घर चलना चाहिए… काफ़ी वक़्त हो गया है यहाँ आए हुए.. आर्यन भूखा होगा. उसने मेरी बात का कोई जवाब ना देते हुए कहा.

फिर हम वहाँ से ट्यूबवेल की तरफ चल दिए, वहाँ पहुँच कर पता चला कि पापा आर्यन को लेकर घर चले गये है. शायद वो अपनी मम्मी के पास जाने के लिए ज़िद करने लगा होगा. मैं बैठक वाले कमरे में गया, मेरे पीछे–2 मेघना भी आ गयी और जाकर सीधी चारपाई पर अपने पैर नीचे लटका कर बैठ गयी.

मैंने कहा – अब घर नहीं चलना है?

मेघना – आर्यन को तो अंकल जी ले ही गये हैं, तो थोड़ी देर और बैठते हैं अंकुश…. आइए आप भी बैठिए.

ये कहकर मेघना ने मेरा हाथ पकड़ा और अपने पास बिठा लिया.

मैंने अपने मन में कहा – आख़िर ये लड़की चाहती क्या है. कभी लगता है, मुझसे दूर भाग रही है, तो दूसरे ही पल लगता है, की कुछ है इसके मन में भी.

मेघना - अंकुश… क्या सोचने लगे??

मुझे यूँ चुप देख कर मेघना बोली.

मैं हड़बड़ा कर बोला – क.. क… कुछ नहीं.. बस ऐसे ही…

मेरी हड़बड़ाहट देख कर मेघना खिलखिलाकर हँस पड़ी और बोली – अंकुश… आप बिल्कुल बुद्धू हो सच में…

इतना कह कर मेघना ने मेरे होंठों को चूम लिया और बोली.

मेघना - एक लड़की के मन को समझना इतना आसान नहीं है मिस्टर अंकुश शर्मा…

मेघना मुझे चारपाई पर धक्का देकर मेरे सीने पर हाथ रख कर खुद भी मेरे बाजू में लेट गयी. फिलहाल मैंने अपने आप को उसके हवाले कर दिया और मन ही मन कहा – अच्छा मेघना, अब तुम भी पता लगाना, कि एक मर्द के मन में क्या है.

मेघना की मुलायम गोल-गोल संतरे जैसी बूब्स मेरे सीने से दबी हुई थी. अपनी एक टाँग को मेघना ने मेरे ऊपर रख लिया और मुस्कराते हुए ऊपर को बढ़ने लगी. अब मेघना मेरे ऊपर सवार थी. मेरे गले में अपनी नाज़ुक बाँहों का हार डालकर मेघना मेरे होंठों को चूसने लगी. मैंने अपने हाथ एकदम बिस्तर पर रख दिए और उसकी प्रेम लीला का आनंद लूटने लगा.

मैंने भले ही अपने आपको इनएक्टिव कर रखा था, लेकिन मेरे लंड महाराज तो मेरे अधिकार में थे नहीं. मेघना की मोटी-मोटी रूई जैसी मुलायम जांघों की रगड़ लगते ही मेरा लंड किसी डंडे जैसा सख़्त हो गया.

मेघना मेरे ऊपर आ गयी और अपनी गान्ड को मेरे लंड के ऊपर रखकर मसलने लगी. बुरी तरह से मेरे होंठों को चूसती हुई वो अपनी चुचियों को मेरे सीने से रगड़ने लगी. साथ ही मेघना की चूत मेरे लंड को मसाज दे रही थी. मेघना एक टॉप और लेग्गिंग में थी. बहुत देर तक मेघना मेरे ऊपर अपनी मनमानी करती रही जिससे उसकी चूत रस बहाते–2 पैंटी को गीला करने लगी. मेरी तरफ से कोई रिएक्शन ना होते देख, मेघना ने मेरी तरफ सवालिया नज़रों से देखा, मानो कहना चाहती हो कि प्लीज़ अब मुझे चोद डालो.

मैंने मुस्कराते हुए, पहली बार अपने हाथों को हरकत दी और मेघना की गान्ड को ज़ोर से मसल दिया.

मेघना – आईईईईईईई… म्माआआआअ… धीरे… से मसलो.. अंकुश…

फिर मैंने मेघना की बगलों में हाथ डालकर उसे पलटा दिया और उसे नीचे करके खुद उसके ऊपर आ गया. नीचे से मेघना के टॉप में हाथ डालकर ब्रा के ऊपर से मैंने मेघना के बूब्स को तेज़ मसल डाला और कपड़ों के ऊपर से ही अपने लंड को मेघना की गीली चूत के मुँह पर अटका दिया.

मेघना - सीईईईईईईईईई… आअहह.. उफफफफफ्फ़.. आआअहह.. ह…

मेरा लंड इतना कड़क हो गया था कि मेघना के दो कपड़ों के बावजूद भी कपड़ों समेत मेरा लंड मेघना की गीली चूत के मुहाने में फँस गया. मेघना मज़े से सराबोर मादकता में चूर होने लगी. जब मैंने मेघना के बगल में आकर उसकी मादक गीली चूत को अपनी मुट्ठी में लेकर दबाया तो मेघना की कमर हवा में लहरा उठी और उसकी चूत ने अपना काम रस छोड़ दिया जिससे पैंटी के साथ-साथ उसकी लेग्गिंग भी आगे से गीली हो गयी.

मेघना हाँफते हुए बोली – उफफफफफ्फ़… अंकुश.. डार्लिंग… नाउ फक मी.. प्लीज़.. आई कैन नॉट वेट मोर…

मैं मेघना को और तड़पाना चाहता था लेकिन जब वो चुदने के लिए बेकरार दिखने लगी तो मैंने एक कदम आगे बढ़ाते हुए मेघना का टॉप निकाल दिया और उसकी चुचियों को ब्रा के ऊपर से ही मसलने लगा. मेघना नागिन की तरह बिस्तर पर लहराती हुई बुरी तरह से लंड के लिए तड़पने लगी. फिर जब मैंने मेघना के निप्पल को ब्रा के ऊपर से ही पकड़ कर उमेठ दिया तो मेघना बुरी तरह उछल पड़ी और मुझे अपने ऊपर से धकेल कर एक बार फिर मेरे लंड पर बैठ कर अपनी चूत को उसपर रगड़ने लगी.

मेघना - सीईईईईईईईईई… आहहह… अंकुश डार्लिंग.. उउउफफफफफफफफफ्फ़… अब क्यों तड़पा रहे हो???

मेघना सिसकते हुए बोली - फक मी जस्ट नाउ अंकुश.. आई वान्ट योर डिक इनसाइड माय पुस्सी…. प्लीज…

मैंने फिर से मेघना को बिस्तर पर लिटा दिया, और उसके लोवर को निकाल कर पैंटी के ऊपर से ही उसकी चूत को सहलाते हुए उसकी पैंटी को खींच कर घुटनों तक ही कर पाया था कि तभी, मुझे बाहर से किसी के इस तरफ आने की आहट सुनाई दी. किसी के आने की आहट पाकर मेरे कान खड़े हो गये. मैंने फ़ौरन बिस्तर से नीचे जंप लगा दी और मेघना को अपने कपड़े ठीक करने का बोल कर बाहर की तरफ लपका. मैंने गेट के बाहर झाँक कर देखा लेकिन मुझे वहाँ कोई दिखाई नहीं दिया. फिर मैं जैसे ही पानी की हौद की तरफ आया, सामने से पापा आर्यन को गोद में लिए खेतों की तरफ से आ रहे थे.

मेरा लंड अभी भी बुरी तरह अकड़ा हुआ था. अपने लंड को मैंने जैसे तैसे ऊपर को एलास्टिक में खोंसा और अपनी टीशर्ट को थोड़ा नीचे को खींच कर उसे छुपाने की असफल कोशिश की. मुझे पापा को थोड़ी देर बाहर ही रोकना था, जब तक कि मेघना अपने कपड़े नहीं पहन लेती. तो लपक कर उनके पास पहुँचा और अचंभित स्वर में बोला.

मैं - पापा! आप अभी तक यही थे?? मैंने सोचा आर्यन को लेकर घर चले गये होंगे.

पापा आर्यन के गाल को पुचकारते हुए बोले - घर नहीं गये थे.. इसे थोड़ा खेतों की तरफ घुमाने ले गया था. वहाँ प्रभा बहू मिल गयी तो वो इसे खिलाने लगी, मेघना बेटी कहाँ है?

अभी मैं उनकी बात का कोई जवाब देने ही वाला था कि मेघना भी अपने कपड़े सही करके बाहर आती हुई बोली - अरे अंकल जी आप भी अभी यहीं हैं. आर्यन भूखा होगा..

मैंने पापा से लेकर आर्यन को अपनी गोद में लिया और उसे लेकर हम घर की तरफ चल दिए. मेघना मेरे आगे–2 चल रही थी. उसकी 36” की गान्ड कसे हुए लेग्गिंग में थिरकती हुई क्या मस्त मटक रही थी, मन किया कि पीछे से एक थप्पड़ तो लगा ही दूं. लेकिन अधूरी प्यास लिए ना जाने मेघना के मन में क्या चल रहा था, जो अभी तक उसने मेरे से कोई बात भी नहीं की थी. अब इस अवस्था में ना जाने क्या रिएक्ट करे, तो अपना मन मसोस कर रह गया.

फिर मैंने अपनी तरफ से ही बात शुरू करते हुए कहा – सॉरी मेघना… वो मैं वो.. आपको अधूरा….

मैंने मेघना का रिएक्शन जानने की गरज से अपनी बात को अधूरा ही छोड़ दिया. मेरी बात पर वो ठिठकी और बराबर में आकर थोड़ी स्माइल देते हुए उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा – इसमें आपको सॉरी बोलने की क्या ज़रूरत है अंकुश?? आपकी भी तो वही कंडीशन है जो मेरी है… अब अंकल जी आ गये तो इसमें किसी की क्या ग़लती.. थैंक्स टू गॉड… उन्होंने हमें देखा नहीं वरना, पता नहीं आज क्या होता?? किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रहते हम लोग.

मैं – इसका मतलब, कुछ ग़लत कर रहे थे हम लोग??

मेघना ने अपनी नज़रें झुका ली और अपने निचले होंठ को दाँतों से काटते हुए बोली – सही ग़लत तो पता नहीं.. लेकिन उस वक़्त मैं अपना कंट्रोल ज़रूर खो चुकी थी. आई आम सॉरी..

मैं - ये क्या मेघना जी… अभी थोड़ी देर पहले आपने मुझे सॉरी बोलने को मना किया, और अब आप क्यों कह रही हैं?? वैसे भी इसमें आपकी कोई ग़लती नहीं थी.. अब सिचुएशन ही ऐसी हो गयी कि कोई भी अपना कंट्रोल खो सकता था…

मेरी बात पर मेघना कुछ और ज़्यादा शरमा गयी और अपनी गर्दन झुका कर चलने लगी. इन्हीं बातों के चलते पता ही नहीं चला कि हम कब घर पहुँच गये..

मेरी गोद से आर्यन को लेते हुए रमा दीदी ने पूछा – कहाँ घूम आए??

मैंने बताया कि हम इसे खेतों पर घूमने ले गये थे. रमा दीदी ने इशारे से पूछा कि मेघना भी साथ में थी क्या??

मैंने भी इशारे से हां बोल दिया. फिर जब मेघना निशा के पास चली गयी तो रमा दीदी बोली – ये बिगड़ी घोड़ी तो लगता है लाइन पर आ गयी… वैसे कुछ बात बनी कि नहीं??

मैं – बस मेघना को अपने लंड से चोदने ही वाला था, कि पापा आ गये…

रमा दीदी अपने मुँह पर हाथ रख कर बोली – हाय राम.. फिर? कहीं पकड़े तो नहीं गये???

मैंने हंसते हुए कहा – नहीं दीदी.. बाल-बाल बच गये. वरना आज तो लौड़े लग ही जाने थे…

घर में मेंबर बढ़ने से अब मेरा और निशा का कार्यक्रम भी नहीं हो पा रहा था. आज सुबह-सुबह मेघना के साथ हुए अधूरे एनकाउंटर ने मेरा दिमाग़ खराब कर रखा था. लंच के बाद मैं अपने कमरे में लैपटॉप लेकर बैठ गया, कुछ केस के अपडेट किए. एक दो रिव्यू देकर असिस्टेंट को मेल भेज दिए.

मैं अपने काम में लगा हुआ था कि तभी निशा अपना किचन का काम निपटाकर आ गयी. निशा इस समय एक सिल्क की फुल लंबाई की गाउन पहने थी. फिटिंग साइज़ की गाउन में से अपनी निप्पल चमकाते उसके बूब्स ने मेरे कुछ राहत की साँस ले चुके लंड को फिर से भड़काने का काम कर दिया. निशा अलमारी खोलकर थोड़ा झुक कर उसमें से कुछ निकल रही थी. गोल मटोल गान्ड के कट गाउन से एकदम क्लियर उभर आए थे. गान्ड की दरार को तो निशा की पैंटी ने कुछ हद तक संभाल लिया था. फिर भी मेरा मन भटक ही गया और मैं लैपटॉप का कवर डाल कर धीरे से उठा और अपना लंड निशा की गान्ड की दरार में जा टिकाया. मेरे लंड को निशा अपनी गान्ड पर फील करते ही झटके से खड़ी हो गयी और पलटकर मुस्कराते हुए मुझे अपने से दूर धकेलते हुए बोली.

निशा - इस घोड़े को थोड़ा काबू में रखो अंकुश… मुझे अपने कपड़े निकालने दो..

मैंने निशा की चुचियों को मसलते हुए कहा – मैं तुमसे क्या कह रहा हूँ?? तुम अपना काम करती रहो…

निशा प्यार से बोली – ऐसे कैसे करती रहूं… तुम्हारा क्या भरोसा.. यहीं खड़े-2 ही अपने लंड को मेरी गान्ड में डाल दिया तो??

मैं – तो क्या आफ़त आ जाएगी निशा.. लंड तो जाने वाली जगह में जाएगा ही..

ये कहकर मैंने निशा के होंठों पर अपने होंठ रख दिए. कुछ देर निशा अपने हाथ को मेरे सीने पर रख कर मुझे दूर करने के लिए कोशिश करती रही, लेकिन एक मिनिट में ही उसका विरोध धराशायी हो गया और निशा भी मेरे चेहरे को अपने दोनों हाथों में लेकर साथ देने लगी. जब निशा ने मोर्चा संभाल लिया तो मैंने अपने हाथों को दूसरे इम्पोर्टेन्ट काम पर लगा दिया और निशा की गान्ड को मसलने लगा.

हम दोनों की जीभ एक दूसरे से अठखेलियाँ करने लगी थी, निशा अपनी आँखें मूँदे, मज़े से किस्सिंग में खोने लगी. मौका देखकर मैंने निशा की गाउन ऊपर कर दी. नीचे वो मात्र एक पैंटी में ही थी.

निशा ने किस तोड़कर कहा – गेट खुला है अंकुश.. कोई आ जाएगा…

मैं – कोई नहीं आ रहा निशा.. दोपहर में सब आराम कर रहे होंगे…

ये कहकर मैंने अपना लोवर नीचे सरका दिया. फिर मैंने निशा को गाउन से पूरी तरह आज़ाद करके मात्र ब्रा और पैंटी में ही उसे दीवार के सहारे सटा दिया. कुछ देर निशा की चुचियों को मसलने के बाद मैंने उसके उन दो छोटे-2 कपड़ों को भी निकाल फेंका. दीवार से पीठ टिकाए निशा लंबी-लंबी साँसें भरने लगी, चुदाई की खुमारी उसके ऊपर हावी हो चुकी थी. मैंने निशा की एक जाँघ के नीचे हाथ ले जाकर उसे ऊपर उठाया और खड़े-खड़े ही अपना लंड निशा की चूत में डाल दिया.

निशा - ससिईईईई… आआअहह.. अंकुश.. धीरे… तुम बहुत जालिम हो… कहीं भी कैसे भी पेल देते हो…

निशा की सेक्सी बातों ने मुझ पर जबरदस्त असर किया और मैंने एक और झटका देकर पूरा लंड निशा की चूत में डाल दिया. निशा के मुँह से एक मीठी सी आहहह… निकल गयी. फिर निशा ने अपनी उस टाँग को मेरी कमर में लपेट लिया. मुझे ऐसे खड़े-2 चुदाई में बहुत मज़ा आ रहा था. निशा भी भरपूर साथ दे रही थी. जब धक्कों की गति और तेज हो गयी. तो निशा का खड़ा रहना मुश्किल होने लगा, और सिसक कर बोली.

निशा - ससिईईईई… आआअहह.. अंकुश.. मुझे पलंग पर ले चलो… खड़ा होना मुश्किल हो रहा है..

निशा की बात सुनते ही मैंने उसकी दूसरी टाँग भी उठा कर अपनी कमर पर रख ली और अपने धक्के जारी रखे. निशा की बाहें मेरे गले में लिपटी हुई थी. निशा की टाँगें मेरे कमर के इर्दगिर्द थी. पीठ दीवार से टिकाए निशा मस्ती में चूर मेरे ताबड़तोड़ धक्कों का मज़ा ले रही थी.

निशा - आअहह… सस्स्सिईई... हाए... रामम्म… बहुत मज़ा आ रहा.. है.. अंकुश..

हम बीच-बीच में स्मूच करते हुए चुदाई का मज़ा लूट रहे थे. तभी मुझे महसूस हुआ कि कोई गेट पर है और हमारे गरमा-गरम शो का मज़ा लूट रहा है. अपने ताबड़तोड़ धक्के जारी रखते हुए मैंने जैसे ही गेट की तरफ देखा, वहाँ मुझे दरवाजे में हल्का सा गैप दिखा, जिसमें से मेघना की एक झलक दिखाई दी. जैसे ही मैंने मेघना को देखा, वो झट से दरवाजे की ओट में हो गयी. मुझे पता था कि मेघना गयी नहीं है और हमारी चुदाई देख रही है. मैंने ऐसा जाहिर किया जैसे मैंने मेघना को देखा ही नहीं और अपना काम जारी रखा. मेघना हमें देख रही है, यही एहसास मुझे और ज़्यादा उत्तेजित करने लगा और मेरे धक्कों की रफ़्तार और ज़्यादा बढ़ गयी. मैं जैसे ही धक्का लगता निशा पूरी तरह उछल जाती और उसके मुँह से मादक कराह निकल पड़ती.

निशा - आज तुम्हें क्या हो गया है.. अंकुश.. जो इतनी बेरहमी से मेरी चुदाई कर रहे हो?? मेरी कमर ही चटका दी तुमने तो… आईईईई.. माआआ… आहहह.. हाए.. अंकुश.. धीरे.. प्लीज़… बस करो… उईईई… मां… मैं तो झड़ गईईईईईईईईईई…

निशा के पैर मेरी कमर से कसने लगे. किसी छिपकली की तरह निशा मेरे सीने से चिपक कर झड़ने लगी. कुछ देर यूँ ही चिपके रहने के बाद मैंने निशा के होंठ चूम लिए. फिर निशा को नीचे उतार कर पलट दिया. अब निशा का मुँह दीवार की तरफ था. मैंने निशा को हाथ दीवार से टिका कर थोड़ा झुकने को कहा. वो जैसे ही थोड़ा झुक कर खड़ी हुई. मैंने गेट की तरफ तिरछी नज़र डाली. मुझे मेघना की आँखें दिखाई दे गयी. उसे अनदेखा करते हुए, मैंने अपना मुँह निशा की गान्ड में डाल दिया. निशा की गान्ड के छोटे से भूरे रंग के छेद को जीभ से कुरेद कर चूत के निचले भाग को नोक से चाट लिया. निशा एक बार फिर से गरम होने लगी और अपनी गान्ड को और पीछे को उभार दिया.

नीचे मेरा लौड़ा, सीधा 90 डिग्री के एंगल पर लहरा रहा था, जिसपर मेघना नज़र गड़ाए हुए टकटकी लगा कर देख रही थी. सही मौका ताड़ मैंने अपने लौड़ा को हाथ में लिया, उसे मेघना को दिखाकर दो-तीन बार मसला, और अपने लंड को दरवाजे की तरफ करके मुठियाने लगा. मेरा उद्देश्य मेघना को हद से ज़्यादा गरम करने का था, जिसमें कामयाबी मिलती दिख रही थी. मेघना का हाथ पैंटी के अंदर जाता हुआ साफ दिखाई दे गया. मैंने निशा की गान्ड को थपथपाया और पीछे से अपना लंड निशा की चूत में डाल दिया. दीवार की आड़ लेकर खड़ी मेघना, हमारी चुदाई का सीन देख कर इतनी गरम हो गयी, कि अपने होंठों पर जीभ फिराती हुई, अपनी चूत को मसलने लगी.

मैंने निशा की गान्ड पर थप्पड़ मारते हुए कहा – आअहह… निशा क्या मस्त सेक्सी गान्ड है तुम्हारी.. किसी दिन इसको तो मैं फाड़ के रख दूँगा…

तभी मेघना का एक हाथ अपनी गान्ड पर चला गया और वो उसे सहलाते हुए अपनी चूत में उंगली करने लगी. मेरे धक्कों ने निशा को हिलाकर रख दिया, उधर मेघना अपने पंजों पर खड़ी दे दनादन अपनी चूत में उंगली अंदर बाहर कर रही थी. हम तीनों ही अपने चरम की तरफ बढ़ते जा रहे थे. कमरे के अंदर और बाहर मादक सिसकियाँ माहौल को और मादक बना रही थी. आख़िरकार एक साथ तीन-तीन आहें वातावरण में गूँज उठी और जोरदार आहें भरते हुए तीनों ही एक साथ झड़ने लगे. निशा पलट कर मेरे सीने से लिपट गयी. मैं दरवाजे की तरफ मुँह करके प्यार से निशा की गान्ड सहलाए जा रहा था. मेघना अपने कामरस से गीले हाथ को अपनी पैंटी से पोंछते हुए उसे ऊपर चढ़ा रही थी.
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