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Incest Mera Pyara Devar - Ankush

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Mass

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super hot bhai...Ankush ko to har jagah choot aur gaand naseeb hai... :)

Look forward to the next update...
 
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aidenabhishek

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UPDATE 63

श्वेता अपनी साँसें नियंत्रित करते हुए बोली – बड़ा तगड़ा लौड़ा है इसका हेमा… मेरा तो काम हो गया, अब तू आजा…

श्वेता साइड में अपनी टाँगें फैला कर बैठ गयी और अपनी चूत से बह रहे रस को अपनी उंगलियों पर लेकर देखने लगी और फिर अपनी सनी हुई उंगलियाँ अपने मुँह में डालकर चूसने लगी.

हेमा मेरे मुँह से उठकर मेरे लंड पर बैठने लगी. जोश-जोश में वो एक साथ वजन रख कर बैठी, लेकिन जैसे ही उसे ये एहसास हुआ कि मेरे लंड को एक साथ अंदर लेना इतना आसान नहीं है तो आधे में ही उसकी आँखें बड़ी हो गयी और वो वहीं रुक कर लंबी-लंबी साँस भरते हुए बोली.

हेमा - सही कह रही थी तू श्वेता… ये तो साला कुछ ज़्यादा ही तगड़ा है यार… मेरी चूत फाड़ दी साले ने..

श्वेता हेमा के क्लिट को सहलाने लगी. हेमा ने फिर कोशिश की और पूरा लंड अंदर ले गयी. मैं सोचने लगा, पता नहीं ये श्वेता और हेमा कितनी देर तक मेरे ऊपर चढ़ेंगी. हर बार मैं भी अगर इनके साथ झाड़ता रहा तो मेरी तो टंकी खाली हो जाएगी, तो मैंने अपने ऊपर कंट्रोल बनाए रखने की कोशिश शुरू कर दी. लंड तो 4 घंटे तक बैठने वाला था ही नहीं. कुछ देर मेरे लंड पर कूदने के बाद हेमा भी लंबी हो गयी. उन दोनों को झड़ने के बाद भी मैंने अपना पानी नहीं निकलने दिया, तो वो साली चिढ़ गयीं, और मेरे लंड को फिर से बारी-बारी चूसने लगी.

1 घंटे के इस खेल में अब मुझे कंट्रोल रखना भारी होने लगा और मेरी भी कमर चलने लगी. ये देख कर वो दोनों मेरे लंड को हाथों में लेकर मुठियाने लगी. कुछ देर में ही मैंने एक लंबी हुंकार भरते हुए अपनी पिचकारी श्वेता की चुचियों के ऊपर छोड़ दी. बीच से ही हेमा ने लपक कर उसे अपने मुँह में ले लिया और बची हुई मलाई वो गटक गयी. हेमा ने मेरे लंड को चाट कर चमका दिया, फिर वो दोनों एक दूसरे के होंठों को चुस्ती रही. श्वेता की चुचियों से मलाई को चाटा और बाथरूम में जाकर नहाने लगी.

मैंने सोचा चलो अब ये नहा धोकर चली जाएँगी. इनकी खुजली जल्दी शांत हो गयी. लेकिन मेरा ये सोचना ग़लत साबित हुआ. वो कुछ देर बाद बाहर से आकर फिर मेरे ऊपर टूट पड़ी. इस तरह वो दोनों बहुत देर तक चुदाई करवाती रही. 4-4, 5-5 बार झड़ने के बाद वो संतुष्ट हुई. इतने में मेरा भी 3 बार पानी निकलवा ही दिया था दोनों ने. उसके बाद उन्होंने अपने कपड़े पहने, फिर श्वेता ने किसी को फोन किया और वो दोनों वहाँ से निकल गयी.

उन्हें गये हुए अभी 15 मिनिट ही हुए होंगे कि तभी एक साथ 4-5 औरतें कमरे में आई और देखते ही देखते वो सभी नंगी हो गयी. पर ये अच्छा हुआ, कि उन्होंने मेरे ऊपर बैठ कर लेटे-लेटे ही मुझे कुछ अंगूर और दूसरी चीज़ खिलाई और साथ-साथ मेरे बदन से खेलती रही. उसके बाद वो सब की सब मेरे ऊपर टूट पड़ी. किसी ने मेरे लंड को पकड़ा, कोई मेरी गोलियाँ ऐंठने लगी, तो किसी ने मेरे निप्पल के साथ खिलवाड़ करनी शुरू कर दी और एक-एक करके वो मेरे लंड के ऊपर बैठ-बैठ कर बारी-बारी से अपनी चूत का पानी निकलवाती रही. जबतक अंत में ड्रग का असर खतम नहीं हो गया और झड़-झड़ कर मेरा लंड, लंड से लुल्ली नहीं हो गया, तब तक उन्होंने मेरा पीछा नहीं छोड़ा. पर एक बात मैंने नोटिस की. श्वेता और हेमा के अलावा इन सभी ने कंडोम चढ़ाकर चुदाई करवाई थी.

मैं एकदम पस्त हो गया था. अब मेरे शरीर में सेक्स का एक कतरा भी नहीं बचा था. जब वो सब चली गयी, तो थकान के कारण मेरी आँखें अपने आप बंद हो गयी. मैं एक तरह से बेहोशी की अवस्था में जा चुका था. पूरे 18-20 घंटे तक मैं सोता ही रहा.

दूसरे दिन किसी के झकझोरने पर ही मेरी आँख खुली. देखा तो सामने श्वेता ही थी, आज उसके साथ हेमा के अलावा एक और औरत थी. मेरे बेड की हालत बदतर हो रही थी, मैं तो पूरा नंगा ही था, पूरे बदन पर औरतों के थूक, लार, और चूत रस लगा हुआ था, जो अब सूख चुका था. बेडशीट, मेरे माल और उन सभी औरतों के कामरस से जगह-जगह सनी हुई थी, जिनके धब्बे सूख गये थे. कमरे के फर्श पर जहाँ तहाँ कंडोम बिखरे पड़े थे, जिनमें किसी-किसी में मेरा माल अभी भी भरा हुआ था.

कमरे की हालत देख कर हेमा ने बुरा सा मुँह बनाया, फिर श्वेता ने मेरे दोनों हाथ और एक पैर खोल दिया और चेतावनी देते हुए बोली – अंकुश अगर तुमने कोई चालाकी करने की कोशिश की तो बाहर भानु और उसके आदमी तैयार बैठे हैं. वो तभी तक चुप हैं, जब तक तुम इस कमरे में बंद हो. अगर ग़लती से भी बाहर दिखाई दे गये, तो तुम्हें शूट करने की उन्हें खुली छूट है. मुझे पलंग से नीचे खड़ा करके उसके साथ आई तीसरी औरत ने बेड शीट चेंज की. जिसपर पता नहीं कब मेरा पेशाब भी निकल गया था. एक गीला तौलिया लेकर मेरे पूरे बदन को अच्छे से साफ करवाया. फिर एक डिब्बे में पानी के साथ लिक्विड वॉश डालकर मेरे लंड और उसके आस-पास को अच्छे से धोया.

मैंने अपने खुश्क होंठों पर जीभ फिरा कर श्वेता से पूछा – अब तो बता दो तुम मेरे साथ ऐसा क्यों कर रही हो??

श्वेता मेरे मुँह को अपने हाथ से दबाते हुए बोली – जल्दी क्या है अंकुश डार्लिंग?? बता दूँगी.. थोड़ा धीरज रखना सीखो, मैंने जब इतने दिन धीरज रखा तो तुम कुछ घंटे भी नहीं रख सकते??

उसके बाद हेमा ने मुझे एक ग्लास में जूस डालकर दिया, जिसमें पहले से ही ड्रग मिलाया हुआ था. साथ में कुछ सैंडविच दिए जिसे मैंने जूस के साथ गटका. जूस पीकर खाली ग्लास उसे थमा दिया, उसके बाद मेरे शरीर में फिर से कुछ जान पड़ी. कुछ देर के लिए श्वेता और हेमा बाहर चली गयी, तो मैंने उस तीसरी औरत जो लगभग 35-36 साल की हल्की सी साँवली सी थी उस से पूछा - तुम कौन हो?

सरोज – मेरा नाम सरोज है. मैं श्वेता मैडम की पर्सनल एस्सिटेंट हूँ.

फिर सरोज मेरे लटके हुए लंड को सहला कर बोली – मैडम तो कह रही थी, कि बड़ा दमदार लंड है तुम्हारा… लेकिन ये तो किसी मरे चूहे जैसा लग रहा है…

मैंने सरोज की बात पर कोई गौर नहीं किया और अपना अगला सवाल दाग दिया – तुम्हारी मैडम ने मुझे यहाँ इस तरह से क़ैद क्यों कर रखा है?

सरोज – मुझे ज़्यादा तो कुछ नहीं पता लेकिन शायद तुमने उन्हें कोई बहुत गहरी चोट पहुँचाई है, जिसका वो बदला अब तुमसे ले रही हैं.

मैं सोचने लगा, कि मैंने उसे क्या चोट पहुँचाई है? फिर जैसे ही मेरे दिमाग़ में उसके भाई वाला सीन घूमा, मेरी खोपड़ी उलट गयी, एक सेकेंड में ही समझ गया. लेकिन उसे ये बात पता कैसे लगी, कि मैंने उसका इस्तेमाल करके वो सब किया था? मैं अपनी सोचों में गुम था. सरोज अपने काम में लगी थी, धीरे-धीरे उसे इस काम में सफलता मिलने लगी थी,

मेरा लंड सिर उठाने लगा था, जिसे देखकर सरोज के चेहरे पर एक कामुक सी मुस्कान आ गयी और उसने उसे अपने मुँह में ले लिया. सरोज के सिर को अपने लंड पर दबाकर मैं सोचने लगा, कि कहीं ये बात भैया के ऑफिस से लीक तो नहीं हुई, कि उसके भाई ने मुखबरी करके असलम के माल को पकड़वाया था और फिर उसने आपस में लिंक जोड़ दिए हों. फिर मैंने खुद ही अपने विचारों को खारिज कर दिया. श्वेता जैसी औरत इतना सब नहीं सोच सकती. फिर आख़िर उसे पता कैसे लगा, यही सब सोच-सोच कर मैं अपना लंड चुसवा रहा था, कि तभी वो दोनों भी कमरे में आ गयी और मेरे खड़े लंड को देख कर श्वेता खुश होते हुए बोली – अरे वाह सरोज… तूने तो समय से पहले ही इसे तैयार कर दिया… शाबाश…. अब तू पीछे हट, आगे का काम हम संभालते हैं.

लंड की सुंदरता देख कर सरोज उसे चूमते हुए बोली – मैडम, मेरा भी ख़याल रखना. इसे देखकर मेरी चूत भी आँसू बहाने लगी है…

श्वेता ने हँसते हुए कहा – अरे क्यों नहीं सरोज… अब तो ये अपनी ही प्रॉपर्टी है, जैसे चाहे इस्तेमाल करो, क्यों हेमा?? तो शुरू करें??

इतना कहकर उन तीनों ने मिलकर मुझे फिर से पलंग पर धकेल दिया और किसी भूखी बाघिनों की तरह अपने शिकार पर झपट पड़ी. लगभग 3-4 घंटे तक वो मेरे लंड से चुदवाती रही. मुझे पूरी तरह से निचोड़ डाला उन तीनों ने, तब जाकर उन्होंने मेरा पीछा छोड़ा. मुझे थोड़ा बहुत खाने को दिया, उसके बाद मेरे दोनों हाथ भी बाँध दिए. पैर दोनों खोल दिए और हाथों की रस्सियों को इतना लंबा कर दिया, जिससे कोशिश करके में पलंग के साइड तक आकर धार मार सकूँ.

खाने के बाद मैंने श्वेता से फिर पूछा – अब तो बता दो आख़िर तुम ये ज़ुल्म मेरे ऊपर क्यों कर रही हो??

श्वेता मेरे बालों को पकड़ कर अपने दाँत किटकिटा कर बोली – ज़ुल्म?? तुम इसे ज़ुल्म कहते हो अंकुश?? चूत चोदना तो तुम्हारा फ़ेवरेट काम है.. और देखो.. मैंने तुम्हें कितनी तरह-तरह की चूत चोदने को दी हैं अंकुश … फिर भी कहते हो कि तुम्हारे ऊपर ज़ुल्म हो रहा है… हाहहाहा….

फिर श्वेता अपने ठहाकों पर ब्रेक लगाकर आक्रोशित स्वर में बोली – हां.. मिस्टर अंकुश… बहुत नाज़ है ना तुम्हें अपने इस लंड पर… जिसका इस्तेमाल करके तुमने इतने बड़े-बड़े काम किए हैं…

ये कहते हुए श्वेता ने मेरे लंड पर एक जोरदार थप्पड़ लगा दिया. मैं दर्द से बिल-बिला उठा, और मेरे मुँह से कराह निकल गयी.

मैंने कराहते हुए कहा – मैंने ऐसा क्या किया है?? जिसकी तुम मुझे इतनी बड़ी सज़ा दे रही हो?

श्वेता – सुनना चाहते हो तो सुनो अंकुश… सबसे पहले तुमने अपने इस लंड का इस्तेमाल करके शिखा को चोदा और उसकी वीडियो क्लिप बनाकर भानु को अपना केस वापस लेने पर विवश किया. चौंको मत.. मुझे सब पता है.. क्योंकि भानु हमारी आर्गेनाइजेशन का एक अहम मोहरा रहा है हमेशा से… कामिनी के कहने पर ही उसने तुम्हारी निशा के साथ वो सब किया था..

मैं – तो श्वेता, तुम भी उस काली दुनिया का हिस्सा थी??

श्वेता ठहाका लगाते हुए बोली – लो कर लो बात.. अबे गधे… जिसके चारों ओर लोग जिस काम में लगे हों, वो उससे अछूता कैसे रह सकता है?? यहाँ तो उसकी नींव ही मैंने और कामिनी ने मिलकर रखी थी उस्मान भाई के साथ मिलकर. बाकी के लोग तो बाद में जुड़े.

श्वेता का ये खुलासा सुनकर मेरी आँखें फटी की फटी रह गयी. फिर मैंने अपने आप को संयत कर के पूछा – तुम्हारे पति को ये सब पता था?

श्वेता – क्या बच्चों जैसा सवाल करते हो अंकुश?? जो आदमी हर बिज़नेस में पार्टनर हो.. वो उस काम में क्यों नहीं होगा? कामिनी ने तो पूरी कोशिश कि थी की उसका एसपी पति भी उसके साथ जुड़ जाए… लेकिन सीधे-सीधे नहीं कह सकती थी. शुरू-शुरू में तो वो उसके रूप जाल में फंसकर उसकी बात मानता था. कामिनी को लगने लगा था कि शायद वो भी हमारे साथ आ जाएगा. लेकिन फिर जब तुम भानु वाले केस में इन्वॉल्व हो गये और पुलिस पर मान हानि का दावा ठोक दिया. उसके बाद कहीं ना कहीं तुम्हें पटाने के चक्कर में उसका जमीर फिर से जाग उठा और उसका परिवार प्रेम फिर से जाग गया और वो तुम्हारे साथ हो गया. प्राची वाले केस में उसने तुम्हारा साथ दिया. इससे नाराज़ होकर कामिनी ने उसका बंगला छोड़ दिया, लेकिन कामिनी अपने पापा की वजह से डाइवोर्स देने के लिए तैयार नहीं हुई और शायद यही उसकी सबसे बड़ी ग़लती साबित हुई..

श्वेता जिस तरह से खुलासे पे खुलासे करती जा रही थी, मेरी जिज्ञासा उतनी ही बढ़ती जा रही थी. मैं मुँह फाड़े किसी अच्छे श्रोता की तरह श्वेता की बातें सुन रहा था.

श्वेता – ना कामिनी अपने डाइवोर्स को बचाने की कोशिश में तुमसे मिलती और तुम्हारे इसी लंड की चाह में फिर से तुम्हारे साथ संबंध सुधारने की कोशिश करती और ना ही वो मुझे तुमसे मिलवाती. चूँकि हम दोनों के बीच ऐसा कुछ भी नहीं था, जो छिपा हो, तो उसने तुम्हारे लंड के इतने क़िस्से कह डाले, जिन्हें सुनकर मेरी चूत इसे लेने के लिए फड़फड़ाने लगी और मैंने तुमसे चुदवाने के लिए होटल में मिलने वाली तुम्हारी शर्त एक्सेप्ट कर ली. जहाँ तुमने फिर से वही चाल चली जो शिखा और भानु के साथ चली थी और हमारी चुदाई की वीडियो बनाकर मेरे भाई को दिखाकर पुलिस का मुखबिर बना लिया. भले ही मैं अपने छोटे भाई से चुदवाती थी, फिर भी कोई भी बाप या भाई, अपनी बहन बेटी की चुदाई को सार्वजनिक होने नहीं दे सकता. उसी का तुमने फ़ायदा उठाकर उसको हमारे ही आर्गेनाइजेशन के खिलाफ इस्तेमाल किया. न.. न.. चौंको मत अंकुश.. यही सोच रहे हो ना कि ये सब मुझे कैसे और कब पता लगा?

मैंने बिना कोई जवाब दिए उसको सवालिया नज़रों से देखा.

श्वेता – काश! ये बात मुझे बहुत पहले ही पता चल जाती तो आज ये नौबत नहीं आती अंकुश. मेरा भाई, मेरा बाप, मेरी बहन जैसी फ्रेंड, उसके पापा, हमारा आर्गेनाइजेशन सब कुछ वैसा ही होता, जैसा पहले था.

ये सब कहकर एक क्षण को श्वेता इमोशनल हो गयी और उसकी पलकों की कोरों पर पानी की बूँदें इकट्ठा हो गयी.

श्वेता फिर जल्दी ही सामान्य होकर बोली – तुम्हें याद है अंकुश… जिस दिन हमने मेरे ऑफिस में लास्ट चुदाई की थी. काफ़ी देर तक मुझे खूब जमकर चोदने के बाद तुम्हें टॉयलेट लगी और तुम बाथरूम चले गये. अच्छी तरह से साफ सफाई करने में तुम्हें काफ़ी वक़्त लगा. उसी बीच तुम्हारे मोबाइल पर कोई मेसेज आया. जिज्ञासावश मैं तुम्हारे मोबाइल को देखने लगी, मुझे याद नहीं वो मेसेज क्या था? लेकिन इस चक्कर में तुम्हारे मेसेज लिस्ट में मैंने असलम का नाम देखा. उसका नाम तुम्हारे मेसेज बॉक्स में देख कर में बुरी तरह से चौंक पड़ी. मैंने उसे खोलकर पढ़ा, और मेरी खोपड़ी ही उलट गयी. फिर मैंने समय बर्बाद नहीं किया और फ़ौरन तुम्हारे मोबाइल का हॉटस्पॉट ऑन करके सारे वीडियो और मेसेज अपने मोबाइल में कॉपी कर लिए. तुम्हारे जाने के बाद मैंने वो सारे मेसेज जिन्हें तुमने क्लिप के साथ मेरे भाई को भी भेजा था और दूसरी वीडियो भी सब कुछ देखा. जिन्हें देख कर अब मेरे मन में कोई शंका बाकी नहीं रही, कि हमारी बर्बादी के पीछे का कारण क्या था. सबसे बड़ा झटका तो मुझे तब लगा, जिसमें तुमने मेरे भाई को एसपी के साथ मीटिंग करते हुए वीडियो बनाकर असलम को भेजा था. असलम और गुंजन दोनों आपस की गोली से कैसे मरे, ये मेरे दिमाग़ में एकदम क्लियर हो गया और तुम्हारे दिमाग़ की दाद दिए बिना नहीं रह पाई. सच में तुमने बहुत बड़ा गेम खेला था. इसी दुश्मनी के चलते उस्मान भाई ने मेरे डैड को मार डाला.

मैंने बीच में टोकते हुए कहा – असलम को तुम्हारे भाई ने नहीं मारा था. उसको मैंने गोली मारी और फिर कामिनी के चचेरे भाई और कमिश्नर के लौन्डे को गन पॉइंट पर ड्रग्स का ओवरडोज देकर उनकी महबूबा के साथ मैंने ही मारा, जानती हो क्यों?

श्वेता – हां अंकुश, लेकिन तुम किसी को सज़ा देने वाले कौन होते हो? तुम कोई भगवान तो नहीं हो ना??

मैं – भगवान किसी को सज़ा देने खुद नहीं आते श्वेता. वो ये काम मेरे जैसे लोगों से करने के लिए प्रेरणा देते हैं. तुम सब क़ानून और समाज के दुश्मन हो, जिन्हें मैंने अपने तरीक़े से सज़ा दी. इसका मुझे कोई दुख या मलाल नहीं है. अब तुम बेशक मुझे गोली से उड़ा दो, कोई गम नहीं. बस थोड़ा सा ये दुख रहेगा, कि उन गुनहगारों में अभी कुछ बाकी रह जाएँगे और एक बात, तुम लोग समाज के लिए कलंक हो, एक फ्री की एडवाइस देता हूँ मुझे जल्दी से मार डाल. अगर मैं ग़लती से तुम्हारी इस क़ैद से निकल गया, तो तुम जितने भी बचे हो किसी को नहीं छोड़ूँगा. श्वेता मैं तुम्हें उन लोगों से अलग समझता था, इसलिए तुम और तुम्हारा पति जिंदा बचे हुए हो, वरना…

ये बात मैंने इतने सर्द लहजे में कही, कि श्वेता के बदन में डर के मारे झुरझुरी सी दौड़ गयी. श्वेता भयभीत नज़रों से कुछ देर मेरी तरफ देखती रही.

फिर कुछ अपने को संभालते हुए श्वेता बोली – अंकुश तुम्हें इतनी आसान मौत नहीं मिलेगी कुत्ते… मैं चाहती हूँ तुम एड़ियां रगड़-रगड़ कर खुद से अपनी मौत माँगो. अंकुश तुमने जिस हथियार का इस्तेमाल करके ये सब किया है, उसी का इस्तेमाल मैं तुम्हारे साथ करूँगी और तुम्हें हर रोज़ अनगिनत औरतों के साथ चुदाई करवा-करवा के इतना बेबस और लाचार बना दूँगी, तुम्हारे शरीर से खून की एक-एक बूँद तक निचोड़ लूँगी. तुम हर लम्हा ये सोचोगे कि काश इससे अच्छा तो मौत ही आ जाए.

मैं – लेकिन श्वेता तुम्हारे ऑफिस की चुदाई को इतने दिन हो गये. फिर इतना समय तुमने क्यों लगाया मेरे ऊपर हाथ डालने में.

श्वेता – अंकुश मैं तुम्हारी सारी चालें समझने के बाद मैं बहुत देर तक तो यही फ़ैसला नहीं कर पाई, कि ये सब तुमने किया है. फिर जब मैंने अपने आपको समझा लिया और तुमसे बदला लेने का फ़ैसला लिया. अब मेरे पास मेरा कोई गैंग तो बचा नहीं था, तुमने सब लोगों को मौत दिलवा दी, या अपने हाथों से दे दी. अब अगर मैं या मेरे पति सीधे-सीधे तुमसे से टकराते तो शायद सफल नहीं होते. तभी मेरे दिमाग़ में भानु का नाम आया, जो तुमसे से बुरी तरह खार खाए बैठा था. मैंने उससे कांटेक्ट किया. भानु इस शर्त पर मेरा साथ देने को तैयार हुआ, कि मैं तुम्हें आख़िर में मौत के घाट उतरवा दूँगी. क्योंकि अगर तुम इस बार बच गए, तो भानु को पूरी तरह बर्बाद करने से पीछे नहीं हटेगा. इसलिए तुम्हें फसाने के लिए उसने फिर से शिखा का ही सहारा लिया और देखो आज तुम मेरे रहमों करम पर हो. अब तुम्हें रोज़ सेक्सुअली टॉर्चर किया जाता रहेगा और तुम कुछ नहीं कर पाओगे. हाहाहा….
 

Dhansu2

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श्वेता अपनी साँसें नियंत्रित करते हुए बोली – बड़ा तगड़ा लौड़ा है इसका हेमा… मेरा तो काम हो गया, अब तू आजा…

श्वेता साइड में अपनी टाँगें फैला कर बैठ गयी और अपनी चूत से बह रहे रस को अपनी उंगलियों पर लेकर देखने लगी और फिर अपनी सनी हुई उंगलियाँ अपने मुँह में डालकर चूसने लगी.

हेमा मेरे मुँह से उठकर मेरे लंड पर बैठने लगी. जोश-जोश में वो एक साथ वजन रख कर बैठी, लेकिन जैसे ही उसे ये एहसास हुआ कि मेरे लंड को एक साथ अंदर लेना इतना आसान नहीं है तो आधे में ही उसकी आँखें बड़ी हो गयी और वो वहीं रुक कर लंबी-लंबी साँस भरते हुए बोली.

हेमा - सही कह रही थी तू श्वेता… ये तो साला कुछ ज़्यादा ही तगड़ा है यार… मेरी चूत फाड़ दी साले ने..

श्वेता हेमा के क्लिट को सहलाने लगी. हेमा ने फिर कोशिश की और पूरा लंड अंदर ले गयी. मैं सोचने लगा, पता नहीं ये श्वेता और हेमा कितनी देर तक मेरे ऊपर चढ़ेंगी. हर बार मैं भी अगर इनके साथ झाड़ता रहा तो मेरी तो टंकी खाली हो जाएगी, तो मैंने अपने ऊपर कंट्रोल बनाए रखने की कोशिश शुरू कर दी. लंड तो 4 घंटे तक बैठने वाला था ही नहीं. कुछ देर मेरे लंड पर कूदने के बाद हेमा भी लंबी हो गयी. उन दोनों को झड़ने के बाद भी मैंने अपना पानी नहीं निकलने दिया, तो वो साली चिढ़ गयीं, और मेरे लंड को फिर से बारी-बारी चूसने लगी.

1 घंटे के इस खेल में अब मुझे कंट्रोल रखना भारी होने लगा और मेरी भी कमर चलने लगी. ये देख कर वो दोनों मेरे लंड को हाथों में लेकर मुठियाने लगी. कुछ देर में ही मैंने एक लंबी हुंकार भरते हुए अपनी पिचकारी श्वेता की चुचियों के ऊपर छोड़ दी. बीच से ही हेमा ने लपक कर उसे अपने मुँह में ले लिया और बची हुई मलाई वो गटक गयी. हेमा ने मेरे लंड को चाट कर चमका दिया, फिर वो दोनों एक दूसरे के होंठों को चुस्ती रही. श्वेता की चुचियों से मलाई को चाटा और बाथरूम में जाकर नहाने लगी.

मैंने सोचा चलो अब ये नहा धोकर चली जाएँगी. इनकी खुजली जल्दी शांत हो गयी. लेकिन मेरा ये सोचना ग़लत साबित हुआ. वो कुछ देर बाद बाहर से आकर फिर मेरे ऊपर टूट पड़ी. इस तरह वो दोनों बहुत देर तक चुदाई करवाती रही. 4-4, 5-5 बार झड़ने के बाद वो संतुष्ट हुई. इतने में मेरा भी 3 बार पानी निकलवा ही दिया था दोनों ने. उसके बाद उन्होंने अपने कपड़े पहने, फिर श्वेता ने किसी को फोन किया और वो दोनों वहाँ से निकल गयी.

उन्हें गये हुए अभी 15 मिनिट ही हुए होंगे कि तभी एक साथ 4-5 औरतें कमरे में आई और देखते ही देखते वो सभी नंगी हो गयी. पर ये अच्छा हुआ, कि उन्होंने मेरे ऊपर बैठ कर लेटे-लेटे ही मुझे कुछ अंगूर और दूसरी चीज़ खिलाई और साथ-साथ मेरे बदन से खेलती रही. उसके बाद वो सब की सब मेरे ऊपर टूट पड़ी. किसी ने मेरे लंड को पकड़ा, कोई मेरी गोलियाँ ऐंठने लगी, तो किसी ने मेरे निप्पल के साथ खिलवाड़ करनी शुरू कर दी और एक-एक करके वो मेरे लंड के ऊपर बैठ-बैठ कर बारी-बारी से अपनी चूत का पानी निकलवाती रही. जबतक अंत में ड्रग का असर खतम नहीं हो गया और झड़-झड़ कर मेरा लंड, लंड से लुल्ली नहीं हो गया, तब तक उन्होंने मेरा पीछा नहीं छोड़ा. पर एक बात मैंने नोटिस की. श्वेता और हेमा के अलावा इन सभी ने कंडोम चढ़ाकर चुदाई करवाई थी.

मैं एकदम पस्त हो गया था. अब मेरे शरीर में सेक्स का एक कतरा भी नहीं बचा था. जब वो सब चली गयी, तो थकान के कारण मेरी आँखें अपने आप बंद हो गयी. मैं एक तरह से बेहोशी की अवस्था में जा चुका था. पूरे 18-20 घंटे तक मैं सोता ही रहा.

दूसरे दिन किसी के झकझोरने पर ही मेरी आँख खुली. देखा तो सामने श्वेता ही थी, आज उसके साथ हेमा के अलावा एक और औरत थी. मेरे बेड की हालत बदतर हो रही थी, मैं तो पूरा नंगा ही था, पूरे बदन पर औरतों के थूक, लार, और चूत रस लगा हुआ था, जो अब सूख चुका था. बेडशीट, मेरे माल और उन सभी औरतों के कामरस से जगह-जगह सनी हुई थी, जिनके धब्बे सूख गये थे. कमरे के फर्श पर जहाँ तहाँ कंडोम बिखरे पड़े थे, जिनमें किसी-किसी में मेरा माल अभी भी भरा हुआ था.

कमरे की हालत देख कर हेमा ने बुरा सा मुँह बनाया, फिर श्वेता ने मेरे दोनों हाथ और एक पैर खोल दिया और चेतावनी देते हुए बोली – अंकुश अगर तुमने कोई चालाकी करने की कोशिश की तो बाहर भानु और उसके आदमी तैयार बैठे हैं. वो तभी तक चुप हैं, जब तक तुम इस कमरे में बंद हो. अगर ग़लती से भी बाहर दिखाई दे गये, तो तुम्हें शूट करने की उन्हें खुली छूट है. मुझे पलंग से नीचे खड़ा करके उसके साथ आई तीसरी औरत ने बेड शीट चेंज की. जिसपर पता नहीं कब मेरा पेशाब भी निकल गया था. एक गीला तौलिया लेकर मेरे पूरे बदन को अच्छे से साफ करवाया. फिर एक डिब्बे में पानी के साथ लिक्विड वॉश डालकर मेरे लंड और उसके आस-पास को अच्छे से धोया.

मैंने अपने खुश्क होंठों पर जीभ फिरा कर श्वेता से पूछा – अब तो बता दो तुम मेरे साथ ऐसा क्यों कर रही हो??

श्वेता मेरे मुँह को अपने हाथ से दबाते हुए बोली – जल्दी क्या है अंकुश डार्लिंग?? बता दूँगी.. थोड़ा धीरज रखना सीखो, मैंने जब इतने दिन धीरज रखा तो तुम कुछ घंटे भी नहीं रख सकते??

उसके बाद हेमा ने मुझे एक ग्लास में जूस डालकर दिया, जिसमें पहले से ही ड्रग मिलाया हुआ था. साथ में कुछ सैंडविच दिए जिसे मैंने जूस के साथ गटका. जूस पीकर खाली ग्लास उसे थमा दिया, उसके बाद मेरे शरीर में फिर से कुछ जान पड़ी. कुछ देर के लिए श्वेता और हेमा बाहर चली गयी, तो मैंने उस तीसरी औरत जो लगभग 35-36 साल की हल्की सी साँवली सी थी उस से पूछा - तुम कौन हो?

सरोज – मेरा नाम सरोज है. मैं श्वेता मैडम की पर्सनल एस्सिटेंट हूँ.

फिर सरोज मेरे लटके हुए लंड को सहला कर बोली – मैडम तो कह रही थी, कि बड़ा दमदार लंड है तुम्हारा… लेकिन ये तो किसी मरे चूहे जैसा लग रहा है…

मैंने सरोज की बात पर कोई गौर नहीं किया और अपना अगला सवाल दाग दिया – तुम्हारी मैडम ने मुझे यहाँ इस तरह से क़ैद क्यों कर रखा है?

सरोज – मुझे ज़्यादा तो कुछ नहीं पता लेकिन शायद तुमने उन्हें कोई बहुत गहरी चोट पहुँचाई है, जिसका वो बदला अब तुमसे ले रही हैं.

मैं सोचने लगा, कि मैंने उसे क्या चोट पहुँचाई है? फिर जैसे ही मेरे दिमाग़ में उसके भाई वाला सीन घूमा, मेरी खोपड़ी उलट गयी, एक सेकेंड में ही समझ गया. लेकिन उसे ये बात पता कैसे लगी, कि मैंने उसका इस्तेमाल करके वो सब किया था? मैं अपनी सोचों में गुम था. सरोज अपने काम में लगी थी, धीरे-धीरे उसे इस काम में सफलता मिलने लगी थी,

मेरा लंड सिर उठाने लगा था, जिसे देखकर सरोज के चेहरे पर एक कामुक सी मुस्कान आ गयी और उसने उसे अपने मुँह में ले लिया. सरोज के सिर को अपने लंड पर दबाकर मैं सोचने लगा, कि कहीं ये बात भैया के ऑफिस से लीक तो नहीं हुई, कि उसके भाई ने मुखबरी करके असलम के माल को पकड़वाया था और फिर उसने आपस में लिंक जोड़ दिए हों. फिर मैंने खुद ही अपने विचारों को खारिज कर दिया. श्वेता जैसी औरत इतना सब नहीं सोच सकती. फिर आख़िर उसे पता कैसे लगा, यही सब सोच-सोच कर मैं अपना लंड चुसवा रहा था, कि तभी वो दोनों भी कमरे में आ गयी और मेरे खड़े लंड को देख कर श्वेता खुश होते हुए बोली – अरे वाह सरोज… तूने तो समय से पहले ही इसे तैयार कर दिया… शाबाश…. अब तू पीछे हट, आगे का काम हम संभालते हैं.

लंड की सुंदरता देख कर सरोज उसे चूमते हुए बोली – मैडम, मेरा भी ख़याल रखना. इसे देखकर मेरी चूत भी आँसू बहाने लगी है…

श्वेता ने हँसते हुए कहा – अरे क्यों नहीं सरोज… अब तो ये अपनी ही प्रॉपर्टी है, जैसे चाहे इस्तेमाल करो, क्यों हेमा?? तो शुरू करें??

इतना कहकर उन तीनों ने मिलकर मुझे फिर से पलंग पर धकेल दिया और किसी भूखी बाघिनों की तरह अपने शिकार पर झपट पड़ी. लगभग 3-4 घंटे तक वो मेरे लंड से चुदवाती रही. मुझे पूरी तरह से निचोड़ डाला उन तीनों ने, तब जाकर उन्होंने मेरा पीछा छोड़ा. मुझे थोड़ा बहुत खाने को दिया, उसके बाद मेरे दोनों हाथ भी बाँध दिए. पैर दोनों खोल दिए और हाथों की रस्सियों को इतना लंबा कर दिया, जिससे कोशिश करके में पलंग के साइड तक आकर धार मार सकूँ.

खाने के बाद मैंने श्वेता से फिर पूछा – अब तो बता दो आख़िर तुम ये ज़ुल्म मेरे ऊपर क्यों कर रही हो??

श्वेता मेरे बालों को पकड़ कर अपने दाँत किटकिटा कर बोली – ज़ुल्म?? तुम इसे ज़ुल्म कहते हो अंकुश?? चूत चोदना तो तुम्हारा फ़ेवरेट काम है.. और देखो.. मैंने तुम्हें कितनी तरह-तरह की चूत चोदने को दी हैं अंकुश … फिर भी कहते हो कि तुम्हारे ऊपर ज़ुल्म हो रहा है… हाहहाहा….

फिर श्वेता अपने ठहाकों पर ब्रेक लगाकर आक्रोशित स्वर में बोली – हां.. मिस्टर अंकुश… बहुत नाज़ है ना तुम्हें अपने इस लंड पर… जिसका इस्तेमाल करके तुमने इतने बड़े-बड़े काम किए हैं…

ये कहते हुए श्वेता ने मेरे लंड पर एक जोरदार थप्पड़ लगा दिया. मैं दर्द से बिल-बिला उठा, और मेरे मुँह से कराह निकल गयी.

मैंने कराहते हुए कहा – मैंने ऐसा क्या किया है?? जिसकी तुम मुझे इतनी बड़ी सज़ा दे रही हो?

श्वेता – सुनना चाहते हो तो सुनो अंकुश… सबसे पहले तुमने अपने इस लंड का इस्तेमाल करके शिखा को चोदा और उसकी वीडियो क्लिप बनाकर भानु को अपना केस वापस लेने पर विवश किया. चौंको मत.. मुझे सब पता है.. क्योंकि भानु हमारी आर्गेनाइजेशन का एक अहम मोहरा रहा है हमेशा से… कामिनी के कहने पर ही उसने तुम्हारी निशा के साथ वो सब किया था..

मैं – तो श्वेता, तुम भी उस काली दुनिया का हिस्सा थी??

श्वेता ठहाका लगाते हुए बोली – लो कर लो बात.. अबे गधे… जिसके चारों ओर लोग जिस काम में लगे हों, वो उससे अछूता कैसे रह सकता है?? यहाँ तो उसकी नींव ही मैंने और कामिनी ने मिलकर रखी थी उस्मान भाई के साथ मिलकर. बाकी के लोग तो बाद में जुड़े.

श्वेता का ये खुलासा सुनकर मेरी आँखें फटी की फटी रह गयी. फिर मैंने अपने आप को संयत कर के पूछा – तुम्हारे पति को ये सब पता था?

श्वेता – क्या बच्चों जैसा सवाल करते हो अंकुश?? जो आदमी हर बिज़नेस में पार्टनर हो.. वो उस काम में क्यों नहीं होगा? कामिनी ने तो पूरी कोशिश कि थी की उसका एसपी पति भी उसके साथ जुड़ जाए… लेकिन सीधे-सीधे नहीं कह सकती थी. शुरू-शुरू में तो वो उसके रूप जाल में फंसकर उसकी बात मानता था. कामिनी को लगने लगा था कि शायद वो भी हमारे साथ आ जाएगा. लेकिन फिर जब तुम भानु वाले केस में इन्वॉल्व हो गये और पुलिस पर मान हानि का दावा ठोक दिया. उसके बाद कहीं ना कहीं तुम्हें पटाने के चक्कर में उसका जमीर फिर से जाग उठा और उसका परिवार प्रेम फिर से जाग गया और वो तुम्हारे साथ हो गया. प्राची वाले केस में उसने तुम्हारा साथ दिया. इससे नाराज़ होकर कामिनी ने उसका बंगला छोड़ दिया, लेकिन कामिनी अपने पापा की वजह से डाइवोर्स देने के लिए तैयार नहीं हुई और शायद यही उसकी सबसे बड़ी ग़लती साबित हुई..

श्वेता जिस तरह से खुलासे पे खुलासे करती जा रही थी, मेरी जिज्ञासा उतनी ही बढ़ती जा रही थी. मैं मुँह फाड़े किसी अच्छे श्रोता की तरह श्वेता की बातें सुन रहा था.

श्वेता – ना कामिनी अपने डाइवोर्स को बचाने की कोशिश में तुमसे मिलती और तुम्हारे इसी लंड की चाह में फिर से तुम्हारे साथ संबंध सुधारने की कोशिश करती और ना ही वो मुझे तुमसे मिलवाती. चूँकि हम दोनों के बीच ऐसा कुछ भी नहीं था, जो छिपा हो, तो उसने तुम्हारे लंड के इतने क़िस्से कह डाले, जिन्हें सुनकर मेरी चूत इसे लेने के लिए फड़फड़ाने लगी और मैंने तुमसे चुदवाने के लिए होटल में मिलने वाली तुम्हारी शर्त एक्सेप्ट कर ली. जहाँ तुमने फिर से वही चाल चली जो शिखा और भानु के साथ चली थी और हमारी चुदाई की वीडियो बनाकर मेरे भाई को दिखाकर पुलिस का मुखबिर बना लिया. भले ही मैं अपने छोटे भाई से चुदवाती थी, फिर भी कोई भी बाप या भाई, अपनी बहन बेटी की चुदाई को सार्वजनिक होने नहीं दे सकता. उसी का तुमने फ़ायदा उठाकर उसको हमारे ही आर्गेनाइजेशन के खिलाफ इस्तेमाल किया. न.. न.. चौंको मत अंकुश.. यही सोच रहे हो ना कि ये सब मुझे कैसे और कब पता लगा?

मैंने बिना कोई जवाब दिए उसको सवालिया नज़रों से देखा.

श्वेता – काश! ये बात मुझे बहुत पहले ही पता चल जाती तो आज ये नौबत नहीं आती अंकुश. मेरा भाई, मेरा बाप, मेरी बहन जैसी फ्रेंड, उसके पापा, हमारा आर्गेनाइजेशन सब कुछ वैसा ही होता, जैसा पहले था.

ये सब कहकर एक क्षण को श्वेता इमोशनल हो गयी और उसकी पलकों की कोरों पर पानी की बूँदें इकट्ठा हो गयी.

श्वेता फिर जल्दी ही सामान्य होकर बोली – तुम्हें याद है अंकुश… जिस दिन हमने मेरे ऑफिस में लास्ट चुदाई की थी. काफ़ी देर तक मुझे खूब जमकर चोदने के बाद तुम्हें टॉयलेट लगी और तुम बाथरूम चले गये. अच्छी तरह से साफ सफाई करने में तुम्हें काफ़ी वक़्त लगा. उसी बीच तुम्हारे मोबाइल पर कोई मेसेज आया. जिज्ञासावश मैं तुम्हारे मोबाइल को देखने लगी, मुझे याद नहीं वो मेसेज क्या था? लेकिन इस चक्कर में तुम्हारे मेसेज लिस्ट में मैंने असलम का नाम देखा. उसका नाम तुम्हारे मेसेज बॉक्स में देख कर में बुरी तरह से चौंक पड़ी. मैंने उसे खोलकर पढ़ा, और मेरी खोपड़ी ही उलट गयी. फिर मैंने समय बर्बाद नहीं किया और फ़ौरन तुम्हारे मोबाइल का हॉटस्पॉट ऑन करके सारे वीडियो और मेसेज अपने मोबाइल में कॉपी कर लिए. तुम्हारे जाने के बाद मैंने वो सारे मेसेज जिन्हें तुमने क्लिप के साथ मेरे भाई को भी भेजा था और दूसरी वीडियो भी सब कुछ देखा. जिन्हें देख कर अब मेरे मन में कोई शंका बाकी नहीं रही, कि हमारी बर्बादी के पीछे का कारण क्या था. सबसे बड़ा झटका तो मुझे तब लगा, जिसमें तुमने मेरे भाई को एसपी के साथ मीटिंग करते हुए वीडियो बनाकर असलम को भेजा था. असलम और गुंजन दोनों आपस की गोली से कैसे मरे, ये मेरे दिमाग़ में एकदम क्लियर हो गया और तुम्हारे दिमाग़ की दाद दिए बिना नहीं रह पाई. सच में तुमने बहुत बड़ा गेम खेला था. इसी दुश्मनी के चलते उस्मान भाई ने मेरे डैड को मार डाला.

मैंने बीच में टोकते हुए कहा – असलम को तुम्हारे भाई ने नहीं मारा था. उसको मैंने गोली मारी और फिर कामिनी के चचेरे भाई और कमिश्नर के लौन्डे को गन पॉइंट पर ड्रग्स का ओवरडोज देकर उनकी महबूबा के साथ मैंने ही मारा, जानती हो क्यों?

श्वेता – हां अंकुश, लेकिन तुम किसी को सज़ा देने वाले कौन होते हो? तुम कोई भगवान तो नहीं हो ना??

मैं – भगवान किसी को सज़ा देने खुद नहीं आते श्वेता. वो ये काम मेरे जैसे लोगों से करने के लिए प्रेरणा देते हैं. तुम सब क़ानून और समाज के दुश्मन हो, जिन्हें मैंने अपने तरीक़े से सज़ा दी. इसका मुझे कोई दुख या मलाल नहीं है. अब तुम बेशक मुझे गोली से उड़ा दो, कोई गम नहीं. बस थोड़ा सा ये दुख रहेगा, कि उन गुनहगारों में अभी कुछ बाकी रह जाएँगे और एक बात, तुम लोग समाज के लिए कलंक हो, एक फ्री की एडवाइस देता हूँ मुझे जल्दी से मार डाल. अगर मैं ग़लती से तुम्हारी इस क़ैद से निकल गया, तो तुम जितने भी बचे हो किसी को नहीं छोड़ूँगा. श्वेता मैं तुम्हें उन लोगों से अलग समझता था, इसलिए तुम और तुम्हारा पति जिंदा बचे हुए हो, वरना…

ये बात मैंने इतने सर्द लहजे में कही, कि श्वेता के बदन में डर के मारे झुरझुरी सी दौड़ गयी. श्वेता भयभीत नज़रों से कुछ देर मेरी तरफ देखती रही.

फिर कुछ अपने को संभालते हुए श्वेता बोली – अंकुश तुम्हें इतनी आसान मौत नहीं मिलेगी कुत्ते… मैं चाहती हूँ तुम एड़ियां रगड़-रगड़ कर खुद से अपनी मौत माँगो. अंकुश तुमने जिस हथियार का इस्तेमाल करके ये सब किया है, उसी का इस्तेमाल मैं तुम्हारे साथ करूँगी और तुम्हें हर रोज़ अनगिनत औरतों के साथ चुदाई करवा-करवा के इतना बेबस और लाचार बना दूँगी, तुम्हारे शरीर से खून की एक-एक बूँद तक निचोड़ लूँगी. तुम हर लम्हा ये सोचोगे कि काश इससे अच्छा तो मौत ही आ जाए.

मैं – लेकिन श्वेता तुम्हारे ऑफिस की चुदाई को इतने दिन हो गये. फिर इतना समय तुमने क्यों लगाया मेरे ऊपर हाथ डालने में.

श्वेता – अंकुश मैं तुम्हारी सारी चालें समझने के बाद मैं बहुत देर तक तो यही फ़ैसला नहीं कर पाई, कि ये सब तुमने किया है. फिर जब मैंने अपने आपको समझा लिया और तुमसे बदला लेने का फ़ैसला लिया. अब मेरे पास मेरा कोई गैंग तो बचा नहीं था, तुमने सब लोगों को मौत दिलवा दी, या अपने हाथों से दे दी. अब अगर मैं या मेरे पति सीधे-सीधे तुमसे से टकराते तो शायद सफल नहीं होते. तभी मेरे दिमाग़ में भानु का नाम आया, जो तुमसे से बुरी तरह खार खाए बैठा था. मैंने उससे कांटेक्ट किया. भानु इस शर्त पर मेरा साथ देने को तैयार हुआ, कि मैं तुम्हें आख़िर में मौत के घाट उतरवा दूँगी. क्योंकि अगर तुम इस बार बच गए, तो भानु को पूरी तरह बर्बाद करने से पीछे नहीं हटेगा. इसलिए तुम्हें फसाने के लिए उसने फिर से शिखा का ही सहारा लिया और देखो आज तुम मेरे रहमों करम पर हो. अब तुम्हें रोज़ सेक्सुअली टॉर्चर किया जाता रहेगा और तुम कुछ नहीं कर पाओगे. हाहाहा….
Bahut hi jabardast update,kya turn mara hai story me, waiting for update
 
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aidenabhishek

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UPDATE 64

मैंने चिल्लाते हुए कहा – ज़्यादा दाँत मत फाड़ श्वेता, ये क्यों नहीं कहती, कि तू मुझे बेबस करके लंबे समय तक अपनी चूत की प्यास बुझाना चाहती है.

श्वेता – जो चाहे समझ ले अंकुश, दे जितनी गाली देना चाहता है. हां मैं अपनी प्यास बुझाना चाहती हूँ और वो भी मनमाने तरीक़े से, जब चाहूं तब, और तू बुझाता रहेगा, जब तक मैं चाहूं. हाहाहाहाहा… सरोज, बाँध दे साले के चारों हाथ पैर, हगने पेशाब करने दे साले को बेड पर ही.

ये कहकर श्वेता भभकते चेहरे के साथ हेमा को लेकर रूम से बाहर चली गयी.

सरोज मेरे हाथ पैर बाँधने लगी. ना जाने क्यों उसने मेरे हाथों की रस्सी कुछ ज़्यादा लंबी रख छोड़ी और अपनी एक आँख दबा कर वो भी बाहर चली गयी. गुस्से की वजह से मैं उस समय उसका इशारा नज़र अंदाज कर गया. अब मेरे पास सिवाय उस बेड पर बिना कपड़ों के पड़े रहने के और कोई चारा नहीं था. श्वेता के चले जाने के बाद में बेबस हालत में पड़ा सोचने लगा, सारी बातें क्लियर हो चुकी थी कि ये क्यों और कैसे हुआ? अब बस ये सोचना था कि यहाँ से कैसे निकला जाए. रात शायद बहुत हो चुकी थी. बाहर से झींगुरों की आवाज़ें आ रही थी, बदन पके फोड़े की तरह टूट रहा था. थकान बुरी तरह से हावी थी, फिर भी नींद मेरी आँखों से कोसों दूर थी. शरीर में इतनी शक्ति बाकी नहीं थी, कि रस्सियों को किसी तरह तोड़ने की कोशिश की जा सके.

मैं अपनी सोचों में गुम यहाँ से निकलने की कोई तरकीब निकालने के बारे में सोच ही रहा था कि तभी ना जाने कहाँ से एक बड़ा सा कीड़ा मेरे गले पर आ गया और उसने मुझे बुरी तरह से काट लिया. मेरे गले में बुरी तरह से जलन होने लगी. उसे भगाने के लिए मैं इधर से उधर अपने सिर को हिलाने लगा, इसी दौरान मुझे लगा, कि मेरा मुँह मेरे हाथों तक पहुँच रहा है. मेरे दिमाग़ को एक तेज झटका लगा. सरोज शायद जान बूझकर मेरी रस्सी लंबी करके गयी थी और उसने वो आँख से…. हां! शायद वो ये इशारा देकर गयी है. इसका मतलब सरोज चाहती है, कि मैं यहाँ से निकलने की कोशिश करूँ. मैंने आँखें बंद करके मन ही मन उसको धन्यवाद किया और अपना मुँह दाएँ हाथ की रस्सी की गाँठ तक ले गया. निरंतर कोशिश के बाद मैंने अपने एक हाथ की गाँठ को अपने दाँतों से खोल लिया. अब मेरा एक हाथ और शरीर हिलने डुलने के लिए फ्री था, तो आसानी से एक हाथ और दाँतों के सहारे मैंने दूसरे हाथ की गाँठ भी खोल ली. पैरों की रस्सी खोलकर मैंने अपने शरीर को थोड़ा खोलने की कोशिश की जो पड़े-पड़े अकड़ गया था. लेकिन खड़े होते ही मुझे कमज़ोरी की वजह से चक्कर सा आ गया, तब मुझे ये एहसास हुआ कि श्वेता की धमकी कितनी सही थी. अगर ऐसा ही दो-चार दिन और चलता रहा, तो हो सकता है, मेरे शरीर से खून की एक-एक बूँद निचुड़ जाएगी, और बिना कुछ किए मेरे प्राण पखेरू उड़ जाएँगे.

कुछ देर मैंने पलंग पर बैठकर दो-चार लंबी-लंबी साँसें लेकर अपने अंदर शक्ति का संचार किया और उठकर गेट की तरफ बढ़ गया. मुझे पता था, गेट बाहर से बंद होगा. उसे खुलवाने के लिए कोई नाटक तो करना ही पड़ेगा, तो ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा – अरे कोई हाईईइ… बचाओ मुझे..

कुछ देर तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई, तो मैं फिर से चिल्लाया. इस बार किसी के कदमों की आहट मुझे सुनाई दी. फिर गेट का सरकंडा सरकाने की आवाज़ हुई, फिर एक इंसानी साया अंदर दाखिल हुआ.

मैं दीवार से सटा हुआ था, जब उसने सामने बेड खाली देखा तो एकदम से पलटने लगा, लेकिन तब तक मैंने उसकी गर्दन अपने बाजू में कस ली.

उसकी गर्दन पर अपने बाजू का दबाव बढ़ाते हुए मैंने गुर्रा कर कहा – कोई होशियारी करने की कोशिश मत करना वरना मैं तेरा अभी के अभी गला दबा दूँगा. बता बाहर और कितने आदमी हैं?

ये बातें हम गेट पर खड़े-खड़े ही कर रहे थे, इससे पहले कि वो कोई जवाब देता, पीछे से मेरे सिर पर कोई वजनी चीज़ की चोट पड़ी और मैं अचेत होकर वहीं गिर पड़ा और मेरी ये निकलने की कोशिश नाकाम हो गयी...



दूसरी तरफ मेरे घर पर..

जिस दिन मुझे श्वेता ने किडनैप किया था, उसी दिन मेरी शादी की सालगिरह थी, तो मेरा घर जाना ज़रूरी था. छोटा-मोटा सेलिब्रेशन रखा था. घर पर भाभी और निशा ने सभी तैयारियाँ कर ली थी. इसी बहाने छाया भी ज़िद करके कृष्णा भैया के साथ गांव पहुँच गयी थी. जब मैं देर रात तक भी घर नहीं पहुँचा, तो सबको चिंता होने लगी. छाया ने अपनी मम्मी को फोन लगाकर पता किया, उन्होंने कहा कि वो तो आज यहाँ आए ही नहीं.

कृष्णा भैया को पता था कि गुप्ता जी मेरे क्लाइंट हैं, तो उन्होंने उनको भी फोन किया वहाँ से भी ना ही मिली. सभी तरफ से कोई खबर ना पाकर सबके मन में घबराहट होने लगी. निशा ने तो रोना-धोना ही शुरू कर दिया, जिसे छाया और मोहिनी भाभी ने संभाल लिया.

आनन फानन में कृष्णा भैया शहर को दौड़ पड़े और अपना सारा फोर्स मुझे ढूँढने में लगा दिया. दो रातें और एक पूरा दिन पुलिस शहर की सड़कों पर चक्कर लगाती रही लेकिन उन्हें मेरा कोई सुराग नहीं मिला. हर तरफ से निराशा ही हाथ लगी. कृष्णा भैया की तरफ से कोई पॉजिटिव रेस्पॉन्स ना पाकर सब बहुत परेशान हो उठे. कहाँ गया? क्या हुआ? कहीं कोई दुर्घटना तो. नहीं... नहीं… भगवान इतना निर्दयी नहीं हो सकता. निशा और मोहिनी भाभी का रोते-रोते बुरा हाल था, बड़े भैया और पापा समेत घर भर में मातम सा छा गया.

लेकिन छाया.. हां छाया… मेरी सच्ची सिपाही, उसके दिमाग़ ने काम करना नहीं छोड़ा और उसने धीरे से मोहिनी भाभी को कहा – दीदी. मुझे कुछ-कुछ अंदाज़ा है, अंकुश कहाँ होंगे…

मोहिनी भाभी अवाक उसकी तरफ देखने लगी, निशा का भी रोना थम गया.

छाया – हो ना हो, ये उन्हीं लोगों में से किसी का काम हो जिन्हें अंकुश ने उनके अंजाम तक पहुँचाया है.

मोहिनी भाभी – लेकिन उनमें से अब कोई बचा भी तो नहीं है, जो अंकुश को नुकसान पहुँचाए.

छाया – मुझे कुछ सोचने दो…

छाया एकांत में जाकर बहुत देर तक सोचती रही. छाया ने पूरे घटना क्रम को सिरे से सोच डाला. अपनी बहन प्राची के बलात्कार से लेकर उन चारों को मौत देने तक, यहाँ तक कि उनके आर्गेनाइजेशन को नेस्तनाबूद करने तक की सारी घटना पर उसने गौर किया. उसे कोई क्लू नहीं पकड़ में आया, तो उसने फिर से गौर किया. फिर जैसे ही छाया के दिमाग़ में गुंजन का नाम आया जिसे वो भूली हुई थी.

छाया ने एकदम से चुटकी बजाकर कहा – मिल गया.. हाआँ.. बिल्कुल… वो ही हो सकती है.

छाया की ये बातें मोहिनी भाभी के कानों में पड़ी.

मोहिनी भाभी – क्या बड़बड़ा रही हो छाया? क्या मिल गया??

छाया मुस्कुराती हुई मोहिनी भाभी के पास आई और बोली – दीदी… अपने अंकुश के लिए क्या कर सकती हैं आप??

मोहिनी भाभी – ये भी कोई पूछने की बात है?? वो मेरा सब कुछ हैं… उसके लिए मैं अपनी जान भी दे दूं तो वो भी कम होगी…

छाया – और किसी की जान भी लेनी पड़े तो??

मोहिनी भाभी – तुम क्या समझती हो?? अपनों के लिए जान लेना सिर्फ़ तुम्ही जानती हो?? अरे अंकुश के लिए इंसान तो क्या, शैतान से भी भिड़ जाऊंगी मैं??

मोहिनी भाभी का ऐसा दुर्गा रूप देख कर छाया बोली – तो फिर चलिए मेरे साथ… अब लगता है, मेरा फिर से हथियार उठाने का वक़्त आ गया है.

निशा – दीदी, मैं भी चलूंगी आप लोगों के साथ.

मोहिनी भाभी ने बड़े प्यार से उसके सिर पर हाथ फिराया और बोली – तू सिर्फ़ मेरे अंकुश की निशानी की हिफ़ाज़त कर और अपनी बहन पर भरोसा रख… अपनी जान देकर भी मैं अपनी बहन के सुहाग को ले आऊंगी और फिर मेरे साथ तो ये शेरनी भी है, तो फिर मुझे किसका डर?

ये कहकर मोहिनी भाभी अपने नवजात शिशु जो अभी कुछ महीनों का ही था और घर की ज़िम्मेदारी निशा को सौंप कर दोनों घर से चल पड़ी. भैया और पापा पूछते रह गये कि कहाँ जा रही हो?

मोहिनी भाभी ने सिर्फ़ इतना ही कहा – घर का ख्याल रखना, हम जल्दी ही लौटेंगे.

छाया ने बड़े भैया की गाड़ी ली और आँधी तूफान की तरह शहर की ओर दौड़ा दी. अपने बंगले पर आकर छाया ने अपना हुलिया चेंज किया. कुछ ही देर में छाया अब एक नव युवक ड्राइवर के भेष में नज़र आ रही थी. ऐसे ही उसने मोहिनी भाभी को भी एक ग्रामीण युवक में बदल दिया. छाया की कलाकारी देख कर मोहिनी भाभी दंग रह गयी. इन सब कामों से फारिग होने के बाद…

मोहिनी भाभी – छाया.. आख़िर तुम करना क्या चाहती हो? और हम जा कहाँ रहे हैं??

अब छाया को लगा कि ये सही समय है मोहिनी दीदी को सब कुछ बताने और उन्हें समझने का, तभी वो अपना रोल अच्छे से कर पाएँगी.

छाया – दीदी.. मैंने सभी संभावनाओं पर कई बार गौर किया. मुझे ऐसी कोई वजह नज़र नहीं आई, जहाँ से भैया पर अटैक हो सकता है, सिवाय एक के…

मोहिनी भाभी बस छाया को देखती रही, क्योंकि उनके पास और कहने को कुछ था ही नहीं.

छाया को ने आगे कहा – योगराज की बेटी श्वेता के अलावा और कोई नहीं बचा है, जिसे हम भूल बैठे थे कि उसे कुछ नहीं पता होगा. लेकिन मेरा सिक्स्थ सेंस कह रहा है, कि श्वेता को कहीं ना कहीं से भनक लग ही गयी होगी और उसी ने ये हरकत की हो सकती है.

मोहिनी भाभी – तुम शायद भानु को भूल रही हो.. वो शुरू से ही हमारे परिवार के पीछे पड़ा है, ख़ासकर कोर्ट में मुँह की खाने के बाद.

छाया – नहीं दीदी., मैं भानु को नहीं भूली हूँ… मैंने उस संभावना पर भी गौर किया था, लेकिन उसके ना होने के कई कारण हैं. एक तो उसका मोटिव इतना सीरीयस नहीं है. दूसरा अगर भानु इसके पीछे होता तो अंकुश को किडनैप नहीं करता… या तो बुरी तरह ज़ख्मी कर देता या फिर… इतना कहकर छाया ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी.

मोहिनी भाभी – जब तुम इतनी श्योर हो तो हम देवर जी को क्यों नहीं बता देते.. वो अपने पुलिस फोर्स को लेकर उन्हें बचा सकते हैं ना.

छाया – लेकिन हमें कन्फर्म तो नहीं है ना कि ये उसी का किया धरा है और मान भी लें कि उसी ने किया है, तो भी बिना किसी सबूत के पुलिस उसपर हाथ नहीं डाल सकती.

मोहिनी भाभी – तो फिर अब हम क्या करने वाले हैं?

छाया – मेरा हुलिया देख रही हैं आप… उसी के मुताबिक, अब हम उसके ड्राइवर को किडनैप करेंगे और उसकी जगह मैं उसकी ड्राइवर बन जाऊंगी. अगर ये काम उसी ने किया है, तो दिन में कम से कम एक बार वो ज़रूर वहाँ जाती होगी जहाँ उसने उन्हें क़ैद किया होगा.

मोहिनी भाभी – लेकिन छाया.. इस काम में मेरा क्या रोल रहेगा?

छाया - आप उसकी गाड़ी के आस-पास ही रहना और जैसे ही मैं इशारा करूँ.. आप उसकी डिक्की में छुप जाना. ये तो आप कर सकती हैं ना..

मोहिनी भाभी – तुम पहले एक बार डिक्की खोलना बंद करना बता दो मुझे, कहीं कुछ गड़बड़ ना हो.

छाया ने उन्हें डिक्की खोलना सिखा दिया और ये हिदायत कर दी, कि डिक्की में बैठने के बाद उसे बिल्कुल बंद मत करना, वरना वो लॉक हो जाएगी, और आप अंदर से उसे नहीं खोल पाओगी. इसलिए हल्की सी गैप बनाकर रखना.

मोहिनी भाभी ने सब अच्छे से समझ कर अपनी गर्दन हिलाकर हामी भरी. भाभी को उसने एक पुरानी सी जीन्स और अपनी एक टीशर्ट पहनने को दी थी, जिसके ऊपर से एक ग्रामीण युवक जैसा ढीला-ढाला कुर्ता, और एक स्वाफी (तौलिया).

छाया - अभी दीदी, आप सिर्फ़ टॉप में ही रहो, और इस बैग में कुर्ता और स्वाफी रख लो, जब हुलिया चेंज करने की ज़रूरत पड़े, तभी इसके ऊपर कुर्ता पहन कर अपने बालों को समेट कर स्वाफी लपेट लेना और ये लो मूँछें इन्हें भी लगा लेना.

मोहिनी भाभी ने वो सब समान एक पॉलीबाग में रख लिया. साथ ही छाया ने एक खंजर भी उनके बैग में डाल दिया, जो कभी भी सेल्फ़ डिफेन्स में काम आ सकता था. लेकिन मोहिनी भाभी ने टॉप और जीन्स पहली बार पहने थे, तो उन्हें बड़ी शरम सी महसूस हो रही थी. छाया उनके मन की बात समझ गयी.

छाया ने मोहिनी भाभी का संकोच दूर करने के लिहाज से जीन्स के ऊपर से उनके कूल्हे को दबाकर बोली – ओह्ह्ह दीदी, जस्ट फॉर फन… इतना भी क्या शरमाना? इन कपड़ों में आप सचमुच हॉट लग रही हो…

छाया की बात से मोहिनी भाभी और ज़्यादा शरमा गयी. इतना सब कुछ मोहिनी को सिखा पढ़ा कर वो दोनों वहाँ से निकल ली. अपने मिशन पर समय के मुताबिक, श्वेता को इस समय अपने ऑफिस में होना चाहिए था, तो गाड़ी उसने अपने बंगले पर ही छोड़ी और एक ऑटो लेकर वो दोनों उसके ऑफिस की तरफ चल दी.

श्वेता एक बहुत बड़े एंपायर की मालकिन थी. उसकी अपनी खुद की बहुत बड़ी बिल्डिंग थी, ढेरों स्टाफ, बिल्डिंग के आगे बड़ा सा लॉन, मेन गेट के बाजू में ही ऑफिस की कैंटीन, जिसमें सभी ड्राइवर वग़ैरह बैठ कर सारे दिन अपने साहब लोगों का इंतजार करते थे. श्वेता के ड्राइवर का पता लगाना छाया के बाएँ हाथ का खेल था. बिल्डिंग के बाहर रिक्शा रुकवा कर छाया ने एक बार अपना हुलिया चेक किया और भाभी को एक पेड़ के नीचे इंतजार करने का बोलकर छाया मेन गेट की तरफ बढ़ गयी. गेट पर ही उसने श्वेता के ड्राइवर की कुंडली पता कर ली, वो इस समय कैंटीन में था, तो छाया सीधी जाकर कैंटीन में पहुँची. वहाँ और भी लोग थे, तो उनसे पता करके छाया रामसिंह (ड्राइवर) जो कैंटीन की एक खाली बेंच पर लेटा हुआ था. छाया उसके एक दम पास जाकर ठेठ हरियानवी में बोली – रे ताऊ, रामसिंह थारा ही नाम सै के?

रामसिंह अपने पास एक नौजवान ड्राइवर को देख कर बैठते हुए बोला – हां भाई मेरा ही नाम रामसिंह सै. के काम सै म्हारे ते?

छाया – अरे ताऊ, म्हारे को कोई काम ना सै थारे से… एक भाभी बाहर रोड ऊपर खड़ी थारे ने पूछ रही थी.

रामसिंह – भाभी? कैसी है?

छाया – मन्ने तो घनी चोखी लागी, ये ही कोई 30-35 साल की.

रामसिंह – पर तू कौन सै भाई?

छाया – मैं तो बाजू आली कंपनी में ड्राइवर सूं. वो वहाँ खड़ी थी, तो मन्ने पूछ लिया. इब ज्यादा रिक्वेस्ट करण लागी, तो मैं थारे धोरे बोलन आ गया.

रामसिंह – चल देखूं तो सही कौन भाभी सै.

गेट से बाहर आकर छाया ने दूर से ही उसे बता दिया कि देख वो पेड़ के नीचे खड़ी सै. तू मिल ले ताऊ, मैं चलता हूँ.

इतना कहकर छाया रामसिंह के जवाब का इंतजार किए बिना ही बाजू वाली फैक्टरी के गेट की तरफ बढ़ गयी. उत्सुकता वस रामसिंह मोहिनी की तरफ चल दिया.

टॉप और जीन्स में खड़ी औरत उसका इंतज़ार कर रही है, ये देख कर 45 साल के रामसिंह की बाछे खिल उठी. वो उसके पास जा कर बोला – अरी कॉन सै तू, और यहाँ मेरा इंतज़ार क्यों करे सै?

मोहिनी ने बड़े मादक अंदाज में अपने नीचे का आधा होंठ, दाँतों में दबा कर जैसे ही अपनी तिरछी नज़र उसपर डाली, रामसिंह के तो होश ही उड़ गये. मोहिनी के रूप जाल में फंसकर रामसिंह सारे सवाल जवाब करना भूल गया और मोहिनी की सुंदरता में खो गया. मोहिनी अपनी नज़रों से सेक्सी अंदाज में अपने पीछे आने का इशारा देकर एक तरफ को चल दी.

रामसिंह किसी रिमोट कंट्रोल से चलने वाले खिलौने की तरह उसके पीछे-पीछे चल पड़ा. बाजू वाली फैक्टरी के पीछे की साइड एक बहुत बड़ा खाली प्लॉट था, जिसका कोई उसे ना होने के कारण उसमें कीकर और तमाम तरह की झाड़ियाँ खड़ी थी.

मोहिनी एक घनी सी झाड़ी के पीछे जा कर खड़ी हो गयी, दस कदम तय करके रामसिंह भी उसके पास पहुँच गया. जाते ही पीछे से रामसिंह ने मोहिनी की कमर में हाथ डालकर जैसे ही उसके बदन को अपनी बाँहों में लिया, भड़ाक से एक मोटे से डंडे का वार रामसिंह की खोपड़ी पर पड़ा. रामसिंह वहीं ढेर हो गया. छाया और मोहिनी दोनों रामसिंह की टाँग खींचकर और घनी झाड़ियों में ले गयी, फिर अच्छे से उसके हाथ पैर बाँध कर मुँह में कपड़ा ठूंस दिया.

रामसिंह को वहीं पड़ा छोड़ कर छाया ने कहा – दीदी, अब आप फ़ौरन अपने देहाती वाले लिबास में आ जाओ और हां मेन गेट के आस-पास ही रहना. मैं बस एक मिनट के लिए गाड़ी रोकूंगी, उतने में ही आपको थोड़ी सी डिक्की खोलकर बिना किसी की नज़र में आए बैठ जाना है.

इतना कहकर छाया अंदर चली गयी. लगभग 5 बजे उसे श्वेता बाहर आती हुई दिखाई दी. उसके साथ दो औरतें और थी, उसे देखते ही छाया फ़ौरन उसकी गाड़ी के पास पहुँची. इससे पहले कि श्वेता गाड़ी तक पहुँचती, छाया श्वेता के लिए पीछे का गेट खोलकर खड़ी हो गयी.

श्वेता ने छाया को गौर से देखा और बोली – तुम कौन हो?? और रामसिंह कहाँ है??

छाया अपनी आवाज़ को भारी बना कर बोली - वो मैं साहब.. मैं उनका भतीजा हूँ, अकस्मात चाची की तबीयत खराब हो गयी, इसलिए वो मुझे यहाँ छोड़ कर चले गये.

श्वेता – कमाल है, कैसा गधा आदमी है?? कम से कम बोलकर तो जाता??

छाया – वो गये तो थे अंदर बोलने, पर शायद आप नहीं होंगी ऑफिस में…

श्वेता – अच्छा ठीक है, तुम अच्छे से गाड़ी चला लेते हो ना??

छाया – जी मेमसाहब, चाचा से भी अच्छी तरह चला लेता हूँ…

श्वेता – तुमने हमारे फार्म हाउस का रास्ता देखा है??

छाया – नहीं मेमसाहब, आप रास्ता बताती जाना, मैं पहुँचा दूँगा…

श्वेता पीछे की सीट पर बैठते हुए बोली – ठीक है.. आओ हेमा चलते हैं… सरोज तुम आगे बैठो..

मेन गेट से निकल कर कोई 50 मीटर पर रोड साइड में एक लेटर बॉक्स था. उसके पास गाड़ी रोक कर..

छाया ने कहा – सॉरी मेमसाहब, एक मिनट में आया. एक लेटर बॉक्स में डालकर.

श्वेता उसे डाँटते हुए बोली – तब से पड़े-पड़े क्या कर रहे थे??? डाल नहीं सकते.. अब जाओ जल्दी डाल कर आओ…

छाया लेटर बॉक्स की तरफ बढ़ गयी और यूं ही एक कागज का टुकड़ा उसने बॉक्स में सरका दिया, कनखियों से उसने देख लिया कि मोहिनी डिक्की खोलकर बैठ चुकी है. आधे घंटे के बाद उनकी गाड़ी शहर के बाहर एक फार्म हाउस में जा कर रुकी. वो तीनों उसे पार्किंग में गाड़ी खड़ी करके इंतज़ार करने का बोलकर अंदर चली गयी.

छाया ने उनके जाते ही फ़ौरन गाड़ी एक साइड में बनी पार्किंग की तरफ बढ़ा दी, क्योंकि सामने ही गेट के पास 4 हथियार बंद मुस्टंडे खड़े थे. उसे डर था, कि कहीं गाड़ी के रुकते ही मोहिनी दीदी डिक्की खोलकर बाहर ना जाएँ और कुछ करने पहले ही हमारा भंडा फुट जाए.

पार्किंग में गाड़ी लगा कर, उसने डिक्की को उपर किया. ग्रामीण युवक के भेष में मोहिनी बाहर आई. दिन छुप रहा था. पश्चिम में सूरज की लाली आसमान में छा चुकी थी. उन्हें नहीं पता था कि ये यहाँ क्या करने आई हैं, और कितनी देर रुकने वाली हैं. छाया ने मोहिनी भाभी को बिल्डिंग के पीछे की तरफ जा कर छुपने को कहा और खुद सामने मेन गेट की तरफ बढ़ गयी. फार्म हाउस ज़्यादा बड़ा नहीं था. लगभग 3-4 एकड़ के गार्डन जैसे ग्राउंड के एक साइड में ये छोटी एक मंज़िला इमारत थी. सामने के मेन गेट से घुसते ही, एक बड़ा सा हॉल जैसा था. उसके ठीक सामने कोई 15 फीट लंबी गैलरी थी. जिसके दोनों तरफ एक-एक दरवाजा था. गैलरी के अंतिम छोर पर एक बड़ा सा गेट जो शायद एक और हॉल नुमा कमरे का होगा. कुल मिला कर गैलरी के एक तरफ एक कमरा, उसके सामने किचन और पीछे एक हॉल, यानी दो हॉल एक कमरा और रसोई.

छाया बेधड़क अंदर हाल में चली गयी, उन मुस्टंडो ने उसे टोका, तो वो बोली – मैं मेमसाहब का ड्राइवर हूँ…

हॉल में पहुँचते ही उसे एक और बंदा सोफे पर बैठा दिखाई दिया, जो शायद भानु था.

छाया ने उससे पुछा – आए भाई साहब! मेमसाहब कित गयी??

भानु कुछ देर उसके चेहरे को देखता रहा, एक मासूम से युवक जिसकी हल्की-हल्की मूंछें जो कतई ड्राइवर नहीं हो ना चाहिए. उसने सोचा शायद कोई मजबूरी रही होगी बेचारे की.

भानु – वो अपनी फ्रेंड्स के साथ सामने वाले हॉल में मीटिंग में हैं. उन्हें यहाँ दो-तीन घंटे लगेंगे. तब तक तुम बाहर उनका इंतज़ार करो. इतने से ज़्यादा अब छाया यहाँ कुछ कर भी नहीं सकती थी. उसे लगा कि अगर अंकुश भैया को यहाँ क़ैद कि या भी होगा, तो श्वेता इस समय वहीं होगी.

ये सोचकर छाया बाहर आ गयी, साइड से होते हुए पीछे की तरफ बढ़ गयी, जहाँ उसे मोहिनी भाभी खड़ी मिल गयी एक पेड़ की ओट में. छाया ने मोहिनी भाभी को अंदर की सारी वस्तु स्थिति से अवगत कराया. कुछ देर वो दोनों वहीं खड़ी बातें करती रही, वातावरण में थोड़ा अंधेरा सा घिरने लगा था. पीछे की साइड में लाइट की भी कोई उचित व्यवस्था नहीं थी. छाया के मुताबिक पीछे वाले हॉल में ही श्वेता और उसकी फ्रेंड्स हैं. जिसकी दीवार उनके सामने थी…

मोहिनी – आओ छाया चलो यहाँ कोई विंडो वग़ैरह ज़रूर होनी चाहिए, उससे अंदर देखने की कोशिश करते हैं…

पीछे की तीन तरफ की दीवारें उसी हॉल नुमा कमरे की थी. पीछे की पूरी दीवार एकदम सपाट थी, उसमें कोई भी विंडो नहीं थी. बस एक रोशनदान जैसा था, जो काफ़ी उँचाई पर था. छाया उस रोशनदान को ध्यान से देखने लगी, तभी उसके कानों में अंदर की आवाज़ें पड़ी.

छाया - देखो दीदी, इसी कमरे में हैं वो, सुनो कुछ आवाज़ें आ रही हैं.. छाया ने फुसफुसा कर मोहिनी भाभी से कहा.

मोहिनी भाभी भी उन आवाज़ों को सुनने की कोशिश करने लगी, लेकिन कुछ साफ-साफ सुनाई नहीं दे रहा था. अब अंदर क्या हो रहा है उसे जानने या देखने के लिए उनकी बेचैनी बढ़ने लगी. छाया हॉल की एक साइड वाली दीवार की तरफ बढ़ गयी, वहाँ उसे एक विंडो दिखी, लेकिन वो स्लाइडिंग थी एक दम डार्क ग्लास की, जिसमें से आर-पार नहीं देखा जा सकता था. छाया ने उसे स्लाइड करने की कोशिश की लेकिन वो शायद अंदर से लॉक थी. छाया पुनः मोहिनी भाभी के पास आई और बताया कि एक विंडो उधर है तो सही, लेकिन अंदर से लॉक है.

मोहिनी भाभी – चलो दूसरी तरफ ट्राइ करते हैं, शायद उधर भी कुछ हो??

वो दोनों दूसरी साइड वाली दीवार की तरफ मुड़ गयी. एक विंडो उधर भी थी, ये दो तरफ खुलने वाली लकड़ी के कपाट वाली विंडो थी, जिसके कपाट बाहर को ही खुलते थे. मोहिनी ने अपनी उंगलियों के नाख़ून उसके नीचे से फँसाकर उसे हिलाने की कोशिश की, तो वो कपाट हिल गया.

मोहिनी भाभी की आँखों की चमक बढ़ गयी और वो फुसफुसा कर बोली – ये खुला है छाया…

उन्होंने आहिस्ता से उसे थोड़ा सा खोलकर उसमें झिरी सी बना ली. जितने से अंदर झाँका जा सके. जैसे ही मोहिनी भाभी ने अंदर झाँक कर देखा, उनकी साँसें थम गयी. वो सकते की सी हालत में पीछे को हटती चली गयी, उनकी आँखों के आगे अंधेरा सा छाने लगा. मोहिनी भाभी का दिमाग़ सुन्न पड़ गया और वो लहराते हुए गिरने ही वाली थी, कि पीछे से छाया ने उन्हें थाम लिया.
 

aidenabhishek

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छाया – क्या हुआ दीदी, ऐसा क्या है उस कमरे में?

मोहिनी भाभी ने कोई जवाब नहीं दिया. सकते की वजह से उनकी जीभ तालू से चिपक गयी थी. बस अपनी एक उंगली उस तरफ उठाकर इशारा कर दिया. थोड़ी देर में वो सम्हल गयी, तो छाया ने उन्हें खड़े रहने को कहकर खुद उसके अंदर झाँक कर देखने लगी. अंदर का सीन देख कर एक बार तो छाया के भी होश गुम हो गये. लेकिन उसने जल्दी ही अपने पर काबू पा लिया.

हॉल नुमा कमरे के बीचो-बीच एक बड़े से बेड पर इस समय अंकुश बिना कपड़ों के पीठ के बल लेटा हुआ, जिसके चारों हाथ पैर बेड के चारों कोनों पर रस्सी से बँधे हुए थे. श्वेता, हेमा और सरोज, उन तीनों, के अलावा दो और औरतें जो शायद इनके आने से पहले ही यहाँ मौजूद होंगी. वो सभी एकदम नंगी, कामपिपासु औरतों की तरह अंकुश को शिकार की भाँति रौंद रही थी.

श्वेता अंकुश के लंड पर सवार थी, हेमा उसके मुँह पर अपनी चूत रख कर बैठी अपनी कमर आगे पीछे कर रही थी. सरोज उसकी छाती को, उसके निप्पल को सहलाते हुए अपनी चूत में उंगलियाँ डाले थी. उन दो में से एक अंकुश की टाँगों के बीच घुसकर उसके टट्टों को चूसे जा रही थी. बीच-बीच में हाथ से भी सहलाती, साथ ही अपने दूसरे हाथ से अपनी गीली चूत को सहला रही थी और पाँचवीं बीच में बैठी कभी श्वेता की चुचियों से खेलती तो कभी हेमा की चुचियों से.

5-5 नंगी औरतों के बीच अकेला मर्द अंकुश, वो भी असहाय अवस्था में पड़ा जिसकी हालत देख कर ऐसा लग रहा था, मानो वो कई हफ्तों से बीमार हो. लेकिन अंकुश का लंड एक दम तना हुआ कड़क सीधा खड़ा, श्वेता की चूत में सटासट अंदर बाहर हो रहा था. अंदर का इतना वीभत्स और घिनौना सीन देख कर छाया की आँखों में आँसू आ गये. अपने सबसे प्यारे दोस्त जैसे देवर को पहली बार उसने इतना विवश देखा था. छाया ने अपने मुँह पर हाथ रखकर अपनी सिसकी को बाहर आने से रोका, तभी उसे अपने पीछे मोहिनी भाभी के होने का एहसास हुआ. मोहिनी भाभी भी छाया के नज़दीक आकर अंदर देख रही हैं.

हिच.. कच… लाख रोकने के बाद भी मोहिनी भाभी के मुँह से हिचकी निकल गयी. छाया ने पलट कर उनके कंधे पर हाथ रख कर हौसला बनाए रखने का इशारा किया. मोहिनी भाभी वहाँ से दौड़कर उसी पेड़ की तरफ़ भाग गयी. उनसे ये वीभत्स और घिनौना नज़ारा ज़्यादा देर तक देखा नहीं गया. अपने अंकुश की ये हालत देख कर मोहिनी भाभी का दिल खून के आँसू रो रहा था. वो पेड़ के तने से पीठ टिका कर वहीं घुटने मोड़ कर बैठ गयी, और अपना सिर टाँगों के बीच देकर रोने लगी.

कुछ देर बाद जब मोहिनी भाभी के कंधे पर किसी के हाथ का अहसास हुआ. उन्होंने अपना सिर ऊपर उठाया, चेहरा आँसू से भीग चुका था. मोहिनी भाभी झट से छाया के गले लग कर फुट-फुट कर रोने लगी.

छाया ने मोहिनी भाभी की पीठ सहलाते हुए कहा - हौसला रखिए दीदी, जब हम यहाँ तक आ ही गये हैं, तो अब अंकुश को इस मुसीबत से निकाल भी ले जाएँगे. कम से कम अंकुश मिले तो सही. अब जो भी अंकुश के साथ हुआ या हो रहा है, उसे हम वापस तो नहीं ला सकते. लेकिन आगे क्या करना है उसपर विचार करने का वक़्त है, ना कि कमजोर पड़कर आँसू बहाने का.

मोहिनी भाभी अपनी रुलाई पर काबू रखते हुए बोली – शायद तुम ठीक कह रही हो छाया, लेकिन तुम्हारे जैसा हौसला कहाँ से लाऊँ मैं? तुम्हें पता है, जब मैं इस घर में ब्याहकर आई थी, तब ये अंकुश निक्कर पहन कर मेरी उंगली पकड़ कर चलता था. मेरे आने के कुछ ही हफ्तों बाद माँ जी मुझे इसका हाथ सौंप कर चल बसी. मैंने अंकुश को अपने बेटे की तरह बड़ा किया है.. आज उसकी ये हालत देख कर मेरा दिल खून के आँसू रो रहा है छाया, कैसे हौसला रखूं??

छाया – फिर भी आपको हौसला रखना ही होगा दीदी… अपने उसी अंकुश के लिए, हमें लड़ना होगा. उन्हें इस हालत में पहुँचाने वालों को उनके किए की सज़ा देनी होगी. आप अभी से इस तरह टूट जाएँगी, तो उन्हें कौन निकालेगा उस दलदल से? आप चुप हो जाइए प्लीज़, वरना सारा खेल खतम हो जाएगा. किसी को भनक भी लग गयी, तो हम दोनों भी इनके हाथ लग जाएँगे, फिर कोई सूरत नहीं कि हम कुछ कर पायें.

छाया की बात का मोहिनी भाभी के ऊपर तुरंत असर हुआ और वो शांत हो गयी. लेकिन आँखें अभी भी लगातार बरस रही थी, बीच-बीच में उनकी हिचकियाँ भी निकल जाती. मोहिनी भाभी को शांत करके छाया ने कृष्णा भैया को फोन लगाया. यूज़र बिज़ी का मेसेज लगातार आ रहा था. छाया ने सोचा, शायद वो मीटिंग में होंगे, या कहीं फील्ड एक्शन में बिज़ी होंगे, अभी डिस्टर्ब करना भी सही नहीं है, तो छाया ने कॉल बैक का मेसेज टाइप करके सेंड कर दिया.

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अगले दिन शहर में राज्य के गृह मंत्री का दौरा होना था, उसकी सिक्योरिटी को लेकर शहर की पुलिस के सारे बड़े अधिकारी इस समय पुलिस मुख्यालय में मीटिंग कर रहे थे. सबके मोबाइल ऑफ थे, जब छाया ने एसएसपी कृष्णा को फोन किया था, तो वो उस समय वहीं थे, इसलिए उसने मेसेज छोड़ दिया.

छाया - इट्स अर्जेंट प्लीज़ कॉल व्हेन फ्री, मैटर ईज़ सीरीयस रिलेटेड टू अंकुश…

इतना मेसेज लिख कर छाया ने मोहिनी भाभी से कहा – दीदी, वो तो शायद बिज़ी हैं. उनका मोबाइल ऑफ लग रहा है, मेसेज कर दिया है. अब हमें यहाँ से चलना होगा.

मोहिनी भाभी ने छाया की तरफ गहन आश्चर्य से देखा और बोली – अंकुश को इस हालत में छोड़ कर??

छाया – और हम यहाँ कर भी क्या सकते हैं दीदी?? वैसे भी मुझे श्वेता को उसके घर छोड़ना पड़ेगा, उसके बाद वापस अंकुश को अपने साथ ही लेकर आ पाएँगे.

मोहिनी भाभी – नहीं मैं अपने बेटे को छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगी… तुझे जाना है तो जा, तब तक मैं यहीं रहूंगी.

छाया ने बहुत समझाने की कोशिश के, आप यहाँ अकेली क्या करेंगी? कहीं मुसीबत में पड़ सकती हैं. लेकिन मोहिनी भाभी ने उसकी एक नहीं सुनी. आख़िरकार छाया को उन्हें वहीं अकेला छोड़ कर जाना पड़ा, क्योंकि श्वेता और उसकी दोनों साथियों के लौटने का समय होने वाला था. उसे उसकी गाड़ी के पास होना ज़रूरी था. कुछ देर में ही छाया श्वेता को लेकर जा चुकी थी. पीछे की तरफ कोई लाइट की व्यवस्था भी नहीं थी, तो अब रात के अंधेरे में मोहिनी को अकेले में डर सा लगने लगा. मोहिनी भाभी का मन अपने देवर अंकुश की तरफ लगा हुआ था, रह-रहकर उसके मन से हुक उठ रही थी. जिसे वो कड़ा जी करके दबाने की कोशिश कर रही थी. उनका दिल अपने बेटे जैसे अंकुश की वो हालत देखकर भर उठता. जब नहीं रहा गया तो मोहिनी भाभी फिर से उसी खिड़की के पास चली आई.

इस समय अंकुश बिना कपड़ों के ही बेहोशी की हालत में पड़ा था. पूरे बिस्तर पर माल और उन रंडियों के कामरस के जगह-जगह धब्बे ही धब्बे नज़र आ रहे थे. जहाँ-तहाँ कमरे के फर्श पर माल से भरे हुए कॉन्डोम भी पड़े हुए थे. ये सब देखकर मोहिनी को घिन सी आने लगी. अंकुश की इस दयनीय अवस्था को देखकर मोहिनी की आँखें फिर से भर आई और हमेशा सबका भला चाहने वाली भाभी के मुँह से श्वेता और उसके साथियों के लिए गालियाँ निकलने लगी.

मोहिनी उन्हें कोसते हुए बोली – भगवान करे इन हरामज़ादी रंडियों के कीड़े पड़ें.

जिस विंडो से मोहिनी अंदर देख रही थी, उसमें लोहे की ग्रिल लगी हुई थी. जिससे अंदर जाने की कोई संभावना बन नहीं सकती थी. लेकिन उनका मन अंकुश के पास जाने के लिए बेचैन होने लगा. मोहिनी दूसरी साइड वाली विंडो की तरफ चल पड़ी, उसके पास जाकर उसके फ्रेम में अपनी उंगलियों के पोरों से वो उसे सरकाने का निरर्थक प्रयास करने लगी. आदमी जब कुछ करने की ठान लेता है, तो उसका दिमाग़ हर वो संभावना तलाश करने में जुट जाता है, जिससे उसका काम बन सके.

खिड़की के स्लाइड को खोलने की धुन में मोहिनी की निगाहें इधर-उधर भटकने लगी, शायद कोई ऐसी चीज़ मिल जाए जिससे इसे ज़ोर देकर खिसकाया जा सके. लेकिन एक तो अंधेरा, सामने की लाइट वहाँ तक इतनी नहीं आ रही थी कि कोई चीज़ आसानी से नज़र आ जाए. मोहिनी वहीं ज़मीन पर बैठकर हाथों से ज़मीन को टटोल-टटोल कर ऐसी किसी चीज़ की तलाश करने लगी. कहते हैं ना, कि हिम्मते मर्द, मददे खुदा… इसी कोशिश में मोहिनी के दिमाग़ में ये बात आई, कि उसके बैग में खंजर है, जो चलते समय छाया ने सेल्फ़ डिफेन्स के लिए दिया था.

मोहिनी ने फ़ौरन खंजर निकालकर उसकी नोक को विंडो के फ्रेम के अंदर घुसाने की कोशिश की, लेकिन उसके बीच में इतनी जगह नहीं थी कि वो आसानी से घुस सके. फिर मोहिनी ने सोचा कि अगर इसके मूठ पर किसी पत्थर से ठोका जाए तो शायद काम बन सकता है. लेकिन फ़ौरन ही उन्होंने ये विचार त्याग दिया, क्योंकि ठोकने से आवाज़ पैदा होगी, जो सामने बैठे लोगों तक पहुँच सकती है.

अब करें तो क्या? कुछ नहीं सूझा तो मोहिनी उसकी मूठ पर अपनी हथेली से हल्के-हल्के चोट करने लगी. खंजर की नोक उन्हें थोड़ी सी दरार के अंदर जाती दिखी. ये देखकर मोहिनी का उत्साह बढ़ गया और मोहिनी उसपर अपनी हथेली से ज़ोर-ज़ोर से वार करने लगी. नाज़ुक बदन मोहिनी की हथेली में दर्द होने लगा, लेकिन उन्होंने इसकी परवाह किए बिना वो अपने प्रयास में जुटी रही. यहाँ तक कि उनकी हथेली से खून निकलने लगा, लेकिन धुन की पक्की मोहिनी भाभी ने उसकी नोक को दरार के बीच में फँसा कर ही दम लिया. अब मोहिनी उसको झटके दे-देकर उसके लॉक को तोड़ने की कोशिश में जुट गयी. अथक प्रयास के बाद एक कट्ट की आवाज़ के साथ उसका लॉक टूट गया.

ये देखकर मोहिनी की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. बिना समय गँवाए, उन्होंने उसे स्लाइड किया. लगभग आधी विंडो खुल चुकी थी जिससे एक सामान्य कद काठी का इंसान उसके अंदर आसानी से जा सकता था. मोहिनी भाभी का शरीर भी ज़्यादा भारी भरकम नहीं थी, तो वो थोड़े से प्रयास से अंदर कूद गयी.

अपने बेटे जैसे देवर को पाल पोसकर एक अच्छे ख़ासे 6 फूटा मर्द बनाने में उन्होंने जो मेहनत की थी, उसे यूँ हफ्तों के बीमार जैसी हालत में पाकर उनकी आँखें बरस उठी. शरीर की सारी हड्डियाँ दिखाई दे रही थी. जो सीना, जांघें और बाजू अपनी भाभी के ऊपर छाने पर उसे किसी छोटी बच्ची की तरह ढक लिया करते थे, आज वही शरीर हड्डियों का ढाँचा नज़र आ रहा था. अपनी करुणा पर काबू करते हुए मोहिनी ने अंकुश को बंधन मुक्त किया. अंकुश के सूखे, पपड़ी पड़े होंठों को अपनी जीभ से गीला किया. अंकुश की नशे से बोझिल आँखें हल्के से खुली, और एक कराह के साथ ही फिर से बंद हो गयी.

अंकुश को मोहिनी ने जैसे तैसे करके कपड़े पहनाकर उसके बदन को ढका और उसे सहारा देकर बेड पर बिठाया. उसका बदन किसी नशे में चूर शराबी की तरह इधर से उधर झूलने लगा. मोहिनी ने अंकुश के गाल थपथपाकर उसे जगाने की बहुत कोशिश की, लेकिन उसकी आँखें नहीं खुली.

मोहिनी बेचैन हो उठी, वो सुबकते हुए बोली – उठ जा अंकुश.. मेरे लाल.. अपनी भाभी को यूँ निराश मत करो अंकुश.

जब कोई चारा नहीं दिखा तो मोहिनी सोचने लगी, लगता है अब छाया का ही इंतजार करना पड़ेगा. कुछ देर मोहिनी अंकुश को लिटाकर कमरे में इधर से उधर टहलने लगी. मन नहीं माना, तो फिर से कोशिश शुरू कर दी. मोहिनी जल्द से जल्द अंकुश को इस नरक से दूर ले जाना चाहती थी. उन्हें डर था कहीं छाया के इंतजार करने के बीच अगर यहाँ कोई आ धमका तो.

एक निर्णय लेकर मोहिनी ने अंकुश को अपनी पीठ पर लादा और खिड़की तक किसी तरह घसीटते हुए लाई फिर अंकुश के पीछे जाकर उसकी जांघों के नीचे से हाथ फँसाकर पहले उसके पैर बाहर को लटकाए और उसकी बगलों में हाथ देकर उसे बाहर की तरह उतारने लगी. अंकुश के पैर ज़मीन से टच होते ही मोहिनी खुद विंडो पर चढ़ने लगी. इसी चक्कर में अंकुश मोहिनी के हाथ से छूट गया, और वो बाहर ज़मीन पर धप्प की आवाज़ के साथ गिर पड़ा.

मोहिनी ने झटपट बाहर आकर अंकुश को अपने सहारे से खड़ा किया और आहिस्ता-आहिस्ता कोशिश करते हुए अंधेरे की तरफ बढ़ गयी. अंकुश के गिरने की आवाज़ थोड़ी ज़्यादा थी जो रात के सन्नाटे की वजह से कुछ दूर तक चली गयी.

उसी समय उन गुण्डों में से कोई एक शायद उस तरफ टॉयलेट वगैरह के लिए निकला होगा, तो उस आवाज़ को सुन कर चौंक पड़ा. उसने उस आवाज़ की दिशा में अपने कदम बढ़ा दिए. जैसे ही वो उस तरफ पहुँचा, दूर से अंधेरे में उसे दो इंसानी साये नज़र आए.

मोहिनी अंकुश का एक बाजू अपने गले में डालकर उसे सहारा दिए हुए धीरे-धीरे लॉन की तरफ बढ़ रही थी.

वो गुंडा, जैसे ही उनके कुछ करीब पहुँचा उसने आवाज़ दी – कौन है वहाँ?

उसकी आवाज़ सुनकर मोहिनी डर के मारे काँप उठी, वो उसे लिए हुए वहीं ठिठक गयी. फिर उसने अपना साहस बटोरकर खंजर पर अपनी पकड़ सख्त कर ली. सोचा अब जो होगा देखा जाएगा. पास आते ही वो बंदा समझ गया, कि कोई क़ैदी को बचाकर ले जाने की कोशिश कर रहा है.

उसने अपनी गन निकाल कर उनपर तानते हुए चेतावनी भरे स्वर में कहा – भागने की कोशिश भी मत करना, वरना भेजा उड़ा दूँगा. आगे कदम बढ़ाता हुआ वो अब उनसे चन्द कदमों के फ़ासले पर ही था.

मोहिनी ने अंकुश का बैलेंस बनाकर उसे उसके पैरों पर खड़ा किया और खुद उसके बगल से बिजली की तेज़ी से उस गुंडे की तरफ लपकी. पलक झपकते ही अपने हाथ में पकड़ा हुआ खंजर उन्होंने उसकी छाती में पैवस्त कर दिया. झटके से उस गुंडे का बदन पीछे हटा, जिससे उसका गन वाला हाथ ऊपर को उठ गया और साथ ही उसकी उंगली भी ट्रिग्गर पर दब गयी. धायँ की आवाज़ रात के सन्नाटे को चीरती हुई दूर-दूर तक गूँज उठी. वो गुंडा एक मर्मान्तक चीख के साथ एक पल के लिए फड़फड़ाया और फिर शांत पड़ गया. मोहिनी ने अपना खंजर उसके सीने से बाहर खींचा और एक धक्का देकर उसे पीछे को धकेल दिया..

उधर छाया श्वेता एंड कंपनी को छोड़ने पहले हेमा के घर पहुँची. उसे ड्रॉप करके श्वेता को उसके घर छोड़ा, इसी में उसे काफ़ी वक़्त लग गया. श्वेता के बंगले से निकलते ही छाया ने अपने पति को फोन लगाया. किस्मत से लाइन मिल गयी. उसको अपनी पोज़िशन बता कर वो रोड पर आकर खड़ी हो गयी. 10 मिनिट में ही कृष्णा ने उसे वहाँ से पिक किया और उसके बताए लोकेशन पर गाड़ी आँधी तूफान की तरह फार्म हाउस की तरफ दौड़ा दी. अभी वो फार्म हाउस से कुछ ही दूरी पर थे, तभी उन्हें गोली की आवाज़ सुनाई दी, जिसने उन दोनों की धड़कनें बढ़ा दी. किसी अनिष्ट की आशंका में छाया के हाथ प्रार्थना करने के अंदाज में जुड़ गये, कृष्णा ने जबड़े कसते हुए गाड़ी की स्पीड और बढ़ा दी.

उधर खून से सना खंजर हाथ में लिए मोहिनी किसी चंडी सी नज़र आ रही थी. ढीले-ढाले कुर्ता और पुरानी सी जीन्स, सिर के बालों को स्वाफी में लपेटे नकली मूँछों में भले ही उसका हुलिया बदल गया हो. लेकिन उसके अंदर का ममतामयी दिल इतना कठोर भी हो सकता है कि किसी की जान भी ले सके, इसका उसे खुद भी विश्वास नहीं हो पा रहा था. लेकिन अपने बेटे जैसे देवर की जान बचाने के लिए मोहिनी ने ये कदम भी उठा लिया था, और मोहिनी आने वाले किसी भी तरह के संकट से दो-दो हाथ करने का फ़ैसला कर चुकी थी.

मोहिनी अंकुश को संभाले हुए फिर से आगे बढ़ने लगी, लेकिन गोली के धमाके की आवाज़ सुनकर भानु और उसके तीन साथी बुरी तरह चौंक गये.

वो बेतहाशा आवाज़ की दिशा में भागे. मोहिनी किसी शेरनी की तरह अंकुश को संभाले गार्डन के अंधेरे हिस्से में बढ़ी चली जा रही थी, कि तभी एक तरफ से भानु की आवाज़ सुनकर वो ठिठक गयी. सामने हाथ में गन लिए भानु उन दोनों को निशाने पर लेकर गरजा.

भानु - कौन हो तुम??? वहीं रुक जाओ वरना गोली मार दूँगा…

फिर जैसे ही भानु की नज़र पास में पड़े अपने एक साथी की लाश पर पड़ी, ये देख कर उसका भेजा घूम गया, उसके सोचने समझने की शक्ति जवाब दे गयी और आव ना देखा ताव, उसने ट्रिग्गर दबा दिया.

मोहिनी फ़ौरन पलट गयी और उसने अंकुश के आगे आकर अपने बदन से छुपा कर खुद उसकी ढाल बन गयी. भानु की गन से निकली गोली सीधी मोहिनी की पीठ में समा गयी. मोहिनी को अपनी पीठ में गरम लावा सा महसूस हुआ. मोहिनी के मुँह से एक मर्मान्तक चीख उबल पड़ी.

मोहिनी - अंकुश अ.. आहहह…

दर्द से मोहिनी की पीठ अंदर चली गयी, सिर आसमान की तरफ उठ गया और वो अंकुश की बाँहों में झूल गयी.

एक ग्रामीण से दिखने वाले युवक के मुँह से औरत की आवाज़ सुनकर भानु और उसके साथी बुरी तरह से चौंक पड़े. उधर अंकुश के कानों में जब अपनी भाभी की चीख पड़ी और अंकुश शब्द सुनाई दिया तो उसकी चेतना वापस लौटने लगी. उसने अपनी शक्ति समेटकर मोहिनी भाभी के शरीर को अपनी बाँहों में संभाल लिया.

भानु और उसके साथी अभी मामले को समझने की कोशिश कर ही रहे थे. इससे पहले कि वो उनपर और हमला कर पाते, तभी आँधी तूफान की तरह एसएसपी की गाड़ी एक झटके के साथ वहाँ आकर रुकी. गाड़ी ठीक से खड़ी भी नहीं हो पाई थी कि उससे पहले ही छाया झपट कर बाहर आई और आनन-फानन में उसने अपनी गन का मुँह उन गुण्डों पर खोल दिया. पलक झपकते ही भानु के दो गुंडे शहीद हो गये. इतने में भानु को मौका मिल गया और अंधेरे का फ़ायदा उठाकर वो और उसका एक साथी पीछे की दीवार फांदकर भाग निकलने में कामयाब हो गये.

कृष्णा उनका पीछा करने वाले थे कि छाया ने रोक दिया. दोनों ने मिलकर फ़ौरन भाभी और अंकुश को गाड़ी में डाला, और उसे हॉस्पिटल की तरफ दौड़ा दिया. समय रहते मेडिकल हेल्प मिलने से मोहिनी भाभी की गोली निकाल दी गयी, अब वो ख़तरे से बाहर थी.

बाकी के परिवार के लोग भी खबर सुनकर हॉस्पिटल में आ चुके थे. फिलहाल छाया के अलावा, बाकी किसी को ये नहीं बताया कि अंकुश को चार दिन तक सेक्सुअली टॉर्चर किया गया था. फार्म हाउस से हॉस्पिटल के रास्ते में ही अंकुश ने छाया को इशारा कर दिया था, कि वो किसी के सामने श्वेता का नाम ना ले. पुलिस की जगह-जगह तलाशी के बाद भी भानु का कहीं पता नहीं चला. मोहिनी भाभी के होश में आते ही, छाया ने उनको भी इशारों-इशारों में समझा दिया. पुलिस समेत बाकी सबको यही बताया गया, कि उसे भानु ने रंजिश के चलते उसे किडनैप किया था और चार दिन से उसे ड्रग्स दे-देकर टॉर्चर कर रहा था. इससे पहले कि भानु अंकुश को तड़पा-तड़पा कर मारता, भाभी और छाया ने उसे ढूँढ निकाला और समय रहते मोहिनी भाभी ने अपनी जान पर खेलकर उसे बचा लिया.

डॉक्टर वीना के हॉस्पिटल में दोनों को एक स्पेशल रूम में रखा गया था. अंकुश को पूरे 48 घंटों तक नींद में ही रखा था. जिससे उसके अंदर के ड्रग्स का असर पूरी तरह खतम हो जाए. साथ ही साथ उसके बदन में जो कमज़ोरी थी, वो ग्लूकोस की बॉटल और खून के ज़रिए पूरी की जा रही थी.

निशा और छाया पूरे समय उन दोनों के पास ही रही. मोहिनी भाभी को होश तो आ चुका था, लेकिन उनका जख्म ताज़ा और गहरा होने की वजह से उन्हें भी बेहोश ही रखा था. आज तीन दिन के बाद, दोनों को एक साथ ही होश में लाया गया था. अब मैं पूरी तरह अपने आप को तरो ताज़ा महसूस कर रहा था, मेरे होश में आते ही निशा ने मुझे सहारा देकर बिठाया. उसकी आँखों में पानी देख कर मेरी भी आँखें नम हो गयी. फिर मैंने प्यार से उसके गाल पर हाथ फिराया, उसके चेहरे को अपनी तरफ झुकाकर उसका माथा चूम कर बोला.

मैं – अब मैं ठीक हूँ… इन दो शेरनियों ने मेरी मौत को भी मात दे दी.

छाया भी मेरे पास आ गयी, तो मैंने उसके माथे को भी चूमकर उसे थैंक्स कहा तो वो बोली.

छाया – थैंक्स किसलिए अंकुश… ये तो मेरी तरफ से गुरु दक्षिणा थी. ये सब तो आप ही की देन है. वरना मैं किस लायक थी…

ये कहते-कहते छाया की आवाज़ भर्रा गयी. मैंने छाया का हाथ अपने हाथ में लेकर सहलाया, और प्यार से डाँटते हुए कहा - बस इसके आगे अब और नहीं…. वरना गुरु जी नाराज़ हो जाएँगे…

मेरी इस बात से उन दोनों के चेहरे पर मुस्कान आ गयी, जिसे मैं देखना चाहता था. फिर मैंने निशा को गेट बंद करने का इशारा किया और खुद अपने बेड से उतर कर मोहिनी भाभी के पास जाकर बैठ गया, जो अभी भी आँखें बंद किए सो रही थी. मैंने भाभी का हाथ अपने हाथ में ले लिया और उनके माथे पर चुंबन लेकर उनके सिर के बालों को सहलाया. मेरे हाथ का स्पर्श पाकर उन्होंने अपनी आँखें खोल दी, मेरे चेहरे पर नज़र पड़ते ही उनके सूखे होंठों पर मुस्कान आ गयी, और कमजोर आवाज़ में पूछा.

मोहिनी भाभी – अब कैसे हो अंकुश?

मैंने एक बार फिर उनके माथे पर चूमकर कहा – आपके होते हुए आपके अंकुश को भला कुछ हो सकता है?

ये सुनकर उनकी आँखें नम हो गयी, पलकों की कोरों से पानी की दो बूँद बिस्तर पर टपक पड़ी.

फिर उन्होंने धीरे से कहा – अपनी भाभी के सूखे होंठों को तर नहीं करोगे अंकुश?

मैंने उनके कान के पास अपना मुँह ले जाकर कहा – यहाँ छाया भी है भाभी.

मोहिनी भाभी – मुझे पता है, वो मेरी सबसे छोटी बहन है, जो हम सबकी गुरु है. उससे शरमाने की ज़रूरत नहीं है.

मैं – फिर भी उसे तो ये सब पता नहीं होगा ना कि हमारा संबंध कैसा है?

मोहिनी भाभी – अच्छा रुको…

फिर उन्होंने छाया को पुकारा, वो झट से उनके पास आकर दूसरे तरफ बैठ गयी. मैंने अंकुश को अपने सूखे होंठ तर करने को कहा, तो ये कहते हैं कि छाया से पुछो, तुम्हें कोई एतराज तो नहीं??

छाया भाभी की बात सुनकर एकदम हड़बड़ा गयी, फिर कुछ सोच कर बोली – तो मैं पिला देती आपको पानी, उन्हें क्यों परेशान करती हैं.

मोहिनी भाभी मुस्कुरा कर बोली – अरे बावली.. पानी से भी कहीं होंठ तर होते हैं?? अपने अंकुश के पास एक स्पेशल रसायन है, जिससे बहुत अच्छे से तर कर देता है ये… कभी तुम भी कराकर देखना. चलो अंकुश, अब झिझक छोड़ो, ये हमारे देवर भाभी के बीच की बात है. इसमें बेचारी छुटकी को क्यों घसीटते हो.

हमारी बातों से जहाँ छाया अनजानों की तरह देख रही थी, वहीं निशा मंद-मंद मुसकुराए जा रही थी. फिर मैंने जैसे ही झुक कर मोहिनी भाभी के लबों को चूमा. छाया फटी-फटी आँखों से हमें देखने लगी, जब उसने पलट कर निशा की तरफ देखा तो उसे मुस्कुराते हुए पाकर वो और ज़्यादा हैरान रह गयी. एक बार थोड़ा चूमकर मैं सीधे बैठ गया.

मोहिनी भाभी अपने होंठों पर जीभ फिरा कर बोली – अंकुश… कुछ मज़ा नहीं आया… थोड़ा अच्छे से करो ना…

मैंने मुस्कराते हुए मोहिनी भाभी को फिर से स्मूच किया और इस बार जो किस हुआ, वो लगभग इश्क फिल्म का जूही और आमिर के किस से मिलता जुलता सा था. हम दोनों की साँसें फूल गयी. जब एक दूसरे से अलग हुए तो लंबी-लंबी साँसें भर रहे थे. छाया के तो होश ही उड़े हुए थे, वो इस सोच में थी कि आख़िर ये देवर भाभी का किस तरह का रिश्ता है???
 
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