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UPDATE 76
मुंबई जुहू चौपाटी, शाम के वक़्त यहाँ कुछ ज़्यादा ही रौनक रहती है, लोग दिन भर की थकान और स्ट्रेस दूर करने अकसर यहाँ चले आते हैं. अभी शाम होने में वक़्त था, दिन के लगभग 4 बजे होंगे. भले ही दिसंबर का महीना था लेकिन गर्मी में कोई ज़्यादा राहत नहीं थी. समुंदर की लहरों के साथ बहती हवा शरीर को कुछ राहत दे देती थी. चौपाटी के मेन पिकनिक स्पॉट से हटकर छोटी-छोटी चट्टानों की तरफ एक युवक गुम-सूम सी अवस्था में समंदर की ओर बढ़ा चला जा रहा था. उसे देखकर ऐसा लग रहा था मानो वो किसी सम्मोहन से बँधा समंदर की उछलती-कूदती लहरों में खोया हुआ उनसे कुछ पाने की इच्छा लेकर उनकी तरफ बढ़ा चला जा रहा हो. थोड़ी देर में ही वो एक ऐसी चट्टान पर जा पहुँचा जिससे समंदर की तेज लहरें टकराकर अपना दम तोड़कर वापस लौट जाती थी, उसके कुछ ही पलों बाद वो फिर से अपनी शक्ति बटोरकर उस चट्टान से आ टकराती, लेकिन चट्टान के हौसले बुलंद देख वो अपना सिर पटक कर फिर वापस लौट जाती. ये सिलसिला ना जाने कितनी सदियों से चला आ रहा था. ना तो लहरें अपनी हिम्मत खोने को तैयार थी और चट्टान तो जैसे थामे ही बैठी थी कि आओ देखें किसमें कितना है दम. चट्टान के ठीक नीचे गहरायी समेटे समंदर जिसका कोई ओर या छोर दिखाई नहीं पड़ता था. जितनी दूर तक नज़र जा सकती थी, बस पानी ही पानी. सफेद-सफेद रूई जैसी लहरों से सुशोभित, सूरज की तेज किरणों के बीच चाँदी की प्लेटों जैसी चमचमाती लहरें आ रही थी जा रही थी.
युवक चलते-चलते चट्टान के अंतिम छोर पर जा पहुँचा, इतना की अगर एक कदम और आगे बढ़ता कि सीधा समंदर की तेज लहरों के बीच. जहाँ से निकलना किसी इंसान तो क्या, जल के किसी जीव के बस की बात भी नहीं थी. कुछ देर वो युवक अपनी आँखें बंद किए ना जाने क्या सोचता रहा, फिर उसने कुछ निर्णय लिया और समंदर की तेज लहरों के बीच जंप लगाने के लिए अपना अगला कदम आगे बढ़ा दिया. उसी चट्टान की छोटी के साइड की ढलान पर एक और आदमी जिसकी उम्र कोई 30-32 साल की रही होगी बैठा समंदर की लहरों का मज़ा ले रहा था. अपनी तरफ आते उस युवक जो उससे उम्र में 3-5 साल छोटा ही लग रहा था को उसने देखा. उसकी अवस्था देखकर उसको शंका हुई. दीवानों की तरह बढ़े चले आ रहे युवक को देख वो सतर्क हो गया, क्योंकि वो जिस तरह से चोटी की तरफ बढ़ा चला आ रहा था. उससे साफ जाहिर था की वो समंदर की लहरों को देखने तो नहीं आ रहा है. वो फ़ौरन अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ. जब युवक अपने अंतर्द्वंद से लड़ रहा था तब तक वो उसके अत्यंत करीब जा पहुँचा. युवक पर ना जाने कैसा जुनून सवार था की उसे उस दूसरे व्यक्ति के आने की भनक तक भी नहीं लगी. फिर जैसे ही उसने समंदर की लहरों के बीच जंप लगाने की कोशिश की, उस व्यक्ति ने समय रहते उसकी कलाई थाम ली. अचानक से किसी और के द्वारा उसकी कलाई पकड़े जाने पर उस जंप लगते व्यक्ति के शरीर को एक तेज झटका लगा, वो उस व्यक्ति की तरफ घूमा. साथ ही साथ अपनी कलाई छुड़ाने का प्रयास भी किया. इस आपा धापी में वो जंप लगाने वाला व्यक्ति दूसरी तरफ आ गया और बचाने वाला चट्टान के किनारे की तरफ चला गया. उसकी कलाई इस झटके के साथ उसके हाथ से छूट गयी, लेकिन झोंक-झोंक में वो बचाने वाला व्यक्ति चट्टान के नीचे की तरफ गिरने लगा. भाग्य वश चट्टान से गिरते ही उसके हाथ एक बाहर को निकला हुआ उस चट्टान का सिरा हाथ आ गया, इधर जब उस युवक ने अपने बचाने वाले को ही समुंदर में गिरते देखा तो एक क्षण को तो वो सन्न खड़ा रह गया. लेकिन फिर जैसे ही देखा कि वो एक हाथ से ही चट्टान के नुकीले पत्थर को पकड़ कर लटका है, उसने फ़ौरन नीचे लेट कर अपना हाथ लंबा करके उसे थामने की कोशिश की. जैसे तैसे करके उस लटके हुए व्यक्ति ने अपना दूसरा हाथ लंबा करके उसके हाथ को थाम लिया और पैर के पंजों को चट्टान की चिकनी सतह पर जमाते हुए वो ऊपर आ गया. एक अप्रत्याशित अनहोनी होने से बच गयी थी. ऊपर आकर वो कितनी ही देर तक अपने डर पर काबू पता रहा. फिर दोनों मिलकर वहाँ से थोड़ा हटकर एक चट्टान पर आकर बैठ गये.
संयत होकर उस व्यक्ति ने उस युवक से पूछा - कौन हो तुम?? और ये सुसाइड क्यों करना चाहते थे??
युवक – मेरी छोड़ो, तुम बताओ, तुम कौन हो और यहाँ क्या कर रहे थे. शुक्र है भगवान का वरना मेरी वजह से मौत के ग्रास बन जाते?
व्यक्ति – मेरा नाम युसुफ है. यूपी के एक छोटे से गांव का रहने वाला हूँ. गाँव में मेरे बूढ़े अम्मी-अब्बू, 4 बहनें जिनमें से एक का ही निकाह हो पाया है अब तक. वहाँ बड़ी गुरबत की जिंदगी जी रहे हैं. मैंने सोचा यहाँ मुंबई में आकर कुछ काम धाम करके घर पैसे भेजूँगा. दो महीने हो गये लेकिन कोई काम नहीं मिला. हालात ये हैं कि जब किसी हिंदू के पास काम माँगने जाता हूँ, तो मुस्लिम नाम सुनकर काम देने को तैयार नहीं है और मुसलमान खुद ही इतने हैं कि उनके पास खुद कोई करने को काम नहीं है. जैसे तैसे कुछ मेहनत मजदूरी करके अपना पेट भरने का जुगाड़ करने लगा, लेकिन इतना नहीं कि घर कुछ भेज सकूँ.
थक कर चोरी-चकारी करने की ट्राइ किया लेकिन अब तक कोई बड़ा हाथ नहीं मार पाया. ऊपर से पकड़े जाने का ख़तरा हर समय मंडराता रहता है. बस किसी तरह से दिन कट जाता है. कभी-कभी तो भूखे पेट ही सोना पड़ जाता है. कभी-कभी सोचता हूँ कि बेकार ही यहाँ आया, इससे अच्छा तो अपने गांव में ही रहकर किसी के यहाँ खेत मज़दूरी कर लेता. भटकते हुए इधर निकल आया, समंदर की लहरों को देखकर यही सब सोच रहा था कि ना जाने मेरे परिवार का क्या हो रहा होगा. बस इतनी सी कहानी है मेरी. अब तुम बताओ कुछ अपने बारे में, लगता है तुम मुझसे भी ज़्यादा मुसीबत के मारे हो जो इतना बड़ा कदम उठा बैठे.
वो युवक कुछ देर तक यूँ ही बैठा रहा. युसुफ ने उसके कंधे पर अपना हाथ रखा. युवक ने उसकी तरफ सूनी-सूनी निगाहों से देखा फिर अनायास ही उसकी आँखें नम हो गयी.
युसुफ ने उसका कंधा थपथपाकर कहा – बोलो दोस्त जो भी तुम्हारे दिल में है. सुना है दुख बाँटने से कम हो जाते हैं.
युवक – क्या बताऊँ दोस्त… मेरी कहानी भी तुमसे कुछ हटके नहीं है… और फिर मेरे दुख ऐसे हैं जो कम होने वाले नहीं हैं. बस बढ़ते ही रहेंगे. अब तो दुखों के साथ-साथ मेरा आत्म सम्मान भी इतना घायल हो चुका है, कि जब भी उनसे टीस उठती है सहना मुश्किल हो जाता है. दिल के घाव दिनों-दिन नासूर बनते जा रहे हैं. अपना सब कुछ खो चुका हूँ, सहन शक्ति जवाब दे चुकी है इसलिए मैं अब अपनी जिंदगी खतम करने का फ़ैसला करके ही यहाँ आया था. लेकिन मेरी फूटी किस्मत, यहाँ भी तुमने मुझे बचा लिया. मरने भी नहीं दिया मुझे.
युसुफ – आत्महत्या कायरता है दोस्त, जो किसी समस्या का समाधान नहीं कर सकती.
युवक उसकी बात सुनकर रो ही पड़ा और उसके गले से लिपटकर फफकते हुए बोला – मैं कायर ही तो हूँ दोस्त… समस्याओं से लड़ते-लड़ते थक चुका हूँ… समाधान कहीं हो तो दिखे??
युसुफ – हौसला रखो दोस्त… हो सकता है हम दोनों मिलकर अपनी-अपनी समस्याओं का कोई हल निकाल सकें.
युवक – तुम जाओ यहाँ से… मुझे अकेला छोड़ दो भाई… कहीं ऐसा ना हो कि मेरी फूटी किस्मत की परछाई तुम्हारी समस्या और बढ़ा दे.
युसुफ – मेरे सामने समस्याओं का पूरा पहाड़ खड़ा है. तुम्हारी वजह से थोड़ी और बढ़ जायें तो भी क्या फर्क पड़ने वाला है. हां ये भी हो सकता है कि हम दोनों मिल बैठ कर कोई हल निकाल सकें. अब रोना छोड़ो और अपने बारे में बताओ.
युवक कुछ देर के लिए शांत रहा फिर एक लंबी साँस छोड़कर बोला – ठीक है, अगर मेरे बारे में जानना ही चाहते हो तो सुनो. मेरा नाम संजू शिंदे है. विदर्भ के एक छोटे से गांव का रहने वाला हूँ. मेरे पिता एक ग़रीब किसान थे. बड़ी मुश्किल से साल भर की रोटी का जुगाड़ कर पाते थे. थोड़ा बहुत बचता था उसे गांव का साहूकार कभी पापा द्वारा लिए गये कर्जे के सूद के तौर पर ले जाता था. परिवार में मेरे माँ-बाप के अलावा मैं सबसे बड़ा, एक बहन और उससे छोटा एक भाई था. जब मैं 10थ में पढ़ता था तभी कुपोषण के शिकार अधिक मेहनत की वजह से मेरे पिता का देहांत हो गया. घर की सारी ज़िम्मेदारी मेरी माँ पर आ गई. मेरी माँ उस वक़्त 32-33 साल की थी, दिखने में वो ठीक-ठाक ही लगती थी. मेहनत के कारण उनका बदन एकदम कसा हुआ था. खेतों में काम करने के बावजूद भी उनका रंग साफ ही था. गांव के लोग अकसर उनको ग़लत नज़र से ही ताड़ते थे. हमेशा ही हमारी गरीबी का फ़ायदा उठाने के चक्कर में ही रहते थे. अपनी इज़्ज़त बचाने के साथ-साथ माँ को दो वक़्त की रोटी भी जुटानी थी, तो उन्होंने मेरी आगे की पढ़ाई छुड़वा दी और मैं उनके साथ खेतों में काम करके घर की परिस्थितियों से लड़ने में उनकी मदद करने लगा. ऐसे ही हालातों से लड़ते-लड़ते किसी तरह हमने 5 साल निकाल दिए. मेरी बहन और छोटा भाई भी काम में हाथ बंटाने लगे, नतीजा अब हमारी स्थिति पहले से सुधरने लगी. हमें लगने लगा कि अब हम अपने दुखों से छुटकारा पाते जा रहे हैं. मेरी बहन अब जवान हो रही थी. सोचा कुछ दिनों में कोई अच्छा सा घर देख कर उसकी शादी कर देंगे. छोटे भाई को खूब पढ़ा लिखा कर शहर भेज देंगे किसी अच्छी सी नौकरी के लिए. लेकिन कहते हैं कि आदमी की सोचों से कई गुना तेज उसका वक़्त चलता है. मैं अब 22-23 साल का हट्टा-कट्टा जवान हो चुका था, खूब मेहनत करता और भर पेट ख़ाता, बाकी और कुछ सोचने विचारने का समय ही नहीं था मेरे पास.
मैं एक दिन खेती के लिए पास के कस्बे से बीज और खाद लेने गया हुआ था अपनी बैल गाड़ी लेकर. पीछे से गांव के दबंग लोग जिनमें से एक दो मेरे हाथों मार भी खा चुके थे मेरी माँ और बहन को छेड़ने के कारण. वो लाला के साथ वसूली के बहाने आ गये. जब मेरी माँ ने कहा कि लाला जी. हम तो आपका पूरा हिसाब कर चुके हैं, तो उसने झूठे बही खाते दिखाकर पहले तो पैसों का दबाव डाला.
फिर जब माँ ने कहा- ठीक है मैं शाम को संजू को भेजती हूँ हिसाब करने तो वो लोग अभी के अभी चुकता करने पर अड़ गये.
वसूली तो एक बहाना था, उसकी आड़ में वो लोग मेरी माँ के साथ बदतमीजी करने लगे. मेरी बहन और छोटा भाई भी था उन्होंने विरोध करना चाहा तो उन्होंने मेरे भाई–बहन को मजबूती से जकड़ लिया और उनकी आँखों के सामने ही मेरी माँ को मादरजात नंगा कर दिया. यही नहीं वो हरामज़ादे बारी-बारी से मेरी माँ के साथ बलात्कार करते रहे. उनमें से जिन्होंने मेरी बहन को जकड़ा हुआ था उन्होंने उसके साथ भी छेड़खानी शुरू कर दी, लेकिन उसने एक आदमी जो उसे मजबूती से पकड़े हुए था उसकी कलाई काट खाई. बिल-बिलाकर उसने उसे जैसे ही उसे छोड़ा वो वहाँ से जान बचाकर भाग निकली. मैं समान गाड़ी में लाद कर घर की तरफ ही आ रहा था कि मुझे अपनी तरफ बेतहाशा भागती हुई मेरी बहन चकोर दिखाई दी. पास पहुँच कर मैंने जैसे ही गाड़ी खड़ी की, वो भागकर मेरे सीने से लिपट कर रोने लगी. मेरे पूछने पर उसने रोते-रोते सारी बातें बताई, जिन्हें सुनकर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गयी. मैंने उसे गाड़ी में बिठाया और बेचारे बैलों पर डंडे बरसाता हुआ उन्हें दौड़ता हुआ जैसे ही घर के सामने पहुँचा वो हरामज़ादे मेरे घर से बाहर निकलते दिखाई दिए. मैं उनसे उलझने की बजाय अपने घर के अंदर भागा, लेकिन सामने का वीभत्स नज़ारा देखकर मेरे पैर लड़खड़ा गये, आँखों के सामने अंधेरा सा छा गया. अंदर मेरा भाई खून से लथपथ मरा पड़ा था. घर के हालत बता रहे थे कि उसने यथासंभव संघर्ष किया होगा. मेरी मादरजात माँ के पेट में भी एक लंबा सा छुरा धंसा हुआ था. मेरी समझ से वो भी मर चुकी थी. कुछ देर अपना सिर पकड़ कर मैं सन्नाटे की स्थिति में ही बैठा रहा, फिर जैसे मैंने कुछ निश्चय कर लिया था. उठकर अपनी कुल्हाड़ी ली और घर से बाहर चल दिया. तभी मेरे कानों में मेरी माँ की दर्द भरी कराह सुनाई दी. मेरे पैर ठिठक गये, लपक कर माँ के पास पहुँचा. उसका सिर अपनी गोद में रख कर जैसे ही मैंने वो छुरा बाहर खींचा, खून का मानो फव्वारा सा उसके पेट से बाहर निकला जिसने मेरे कपड़े भी लाल कर दिए. साथ ही माँ की गर्दन भी एक तरफ को लुढ़क गयी. बहुत देर तक उसके सिर को लेकर फुट-फूटकर रोता रहा. चकोर भी मेरे पास ही बैठकर रोती रही. फिर जैसे कुछ जुनून सा मेरे दिमाग़ पर छाने लगा. मेरा रोना अप्रत्याशित रूप से थम गया. मैंने अपनी बहन को चुप कराया, माँ और भाई की लाश को यूँ ही लावारिस छोड़ मैंने अपनी कुल्हाड़ी संभाली. चकोर का हाथ थामा और बिना कुछ लिए दिए उसे लेकर घर से बाहर निकल गया. वो बेचारी डरी सहमी उसकी हिम्मत भी नहीं हुई कि मुझसे कुछ पूछ भी ले. बस मेरे साथ लगभग घिसटती सी चलने लगी. मैंने उसे गांव के बाहर खड़े रहने को कहा और खुद उस हरामी बनिये के घर की तरफ बढ़ गया. उस वक़्त मेरा भाग्य अच्छा था जो सारे गुनहगार उसी के घर में एक साथ मिल गये, जो शायद आगे क्या हो सकता है इस विषय पर बातें कर रहे थे. घर में घुसते ही मैंने एक तरफ से उन हरामज़ादों को लकड़ी की तरह काटना शुरू कर दिया. 6-6 लोगों को एक साथ मार कर खून से सना मैं बाहर आया.
अपनी बहन को अपने साथ लिया और गांव की सीमा से दूर और दूर होता चला गया, क्योंकि अब वहाँ रहने का मतलब था अपने आप को जेल में सड़ाना या फाँसी पर झूल जाना. उसके बाद मेरी बहन का क्या होता, ये मैं भली भाँति जानता था. एक तालाब में जाकर मैंने खुद को और अपने कपड़ों को साफ किया और उसी रात मुंबई की ट्रेन पकड़ कर इस शहर में आ गया. अपनी सोच से तो मैं अपनी बहन को गांव से बचा लाया. लेकिन इस शहर में आते ही मेरे सामने मुसीबतों का पहाड़ खड़ा मिला. सिर पर छत नहीं. जेब में एक फूटी कौड़ी नहीं, खाने को दो दिन से पेट में एक अन्न का दाना तक नहीं गया था. दिनभर भटकने के बाद भी कहीं से कोई आशा की किरण नहीं मिली जिससे अपनी भूख भी शांत कर सकें. तक कर भूख से निढाल हम दोनों एक फुटपाथ पर रात गुजारने को मजबूर. पहने हुए कपड़ों के अलावा जेब में एक रुमाल तक नहीं. लेकिन थकान के कारण तेज नींद ने हमारी सारी समस्याओं का हल कर दिया. पता नहीं कब हमें नींद आ घेरा, एक बाउंड्री वॉल के सहारे पीठ टिकाते ही हमें नींद ने घेर लिया. ना जाने वो रात का कौन सा प्रहर था जब मेरी नींद एक लड़की की तेज-तेज चीखों के कारण खुल गयी. बगल में देखा तो मेरी बहन चकोर वहाँ नहीं थी. मैं चीख की दिशा में बेतहाशा दौड़ पड़ा. सड़क से हटकर झाड़ियों के पीछे वो चार लोग चकोर के साथ ज़बरदस्ती कर रहे थे. उसके कपड़े एक-एक करके उसका बदन छोड़ते जा रहे थे. अपने आप को बचाने की वो जी तोड़ कोशिश कर रही थी, लेकिन कब तक? मात्र एक पैंटी में वो अपने नग्न शरीर को ढकने की कोशिश कर रही थी और वो दरिंदे उसे चारों ओर से उसके बदन के साथ खेल रहे थे. हे भगवान ये क्या-क्या खेल, खेल रहा है तू मेरे साथ??? कब तक और कितना दुख देना चाहता है हमें?? मैंने मन ही मन ऊपरवाले से कहा.
लेकिन उसे तो जैसे मुझसे कोई सरोकार ही नहीं था. जीवन देकर जैसे उसने हमारे ऊपर कोई उपकार किया हो और छोड़ दिया हो समाज की दरिंदगी के बीच. ठीक है तू यही चाहता है तो यही सही. मैंने उधर से ध्यान हटाकर इधर-उधर नज़र दौड़ाई, कुछ दूरी पर मुझे एक जंग लगी हुई लोहे की रोड दिखाई पड़ गयी. मैंने उसे मजबूती से अपने हाथ में पकड़ा और पीछे से जाकर एक की खोपड़ी खोल दी. वो ढंग से चीख भी नहीं पाया और वहीं ढेर हो गया. बाकी बचे तीन लोगों ने जैसे ही देखा कि किसी ने उनके एक साथी को मार डाला है वो वहाँ से भागने लगे. तब तक मैंने उनमें से एक और को धर लिया. मौके का लाभ लेकर वो दो वहाँ भाग लिए.
उसी रात हमने वो इलाक़ा छोड़ दिया. दूसरे दिन मैं अपनी बहन को एक जगह छोड़ कर कुछ काम धंधे की तलाश में निकल पड़ा. लेकिन महानगरी मुंबई में काम मिलना भी इतना आसान नहीं है. सारे दिन भटकने के बाद यूँ ही खाली पेट भारी कदमों से मैं वहीं लौट आया जहाँ मैंने चकोर को छोड़ा था. लेकिन वहाँ मुझे चकोर नहीं मिली. चारों तरफ इधर उधर ढूँढता रहा. घूम फिर कर फिर वहीं आ जाता कि शायद कहीं इधर उधर गयी होगी. आ ही जाएगी. लेकिन उसका कहीं पता नहीं चला. मेरे चलने फिरने की शक्ति भी जवाब दे चुकी थी. आज चौथे दिन भी पेट खाली ही था. बस किसी नलके से पानी पी लिया जो खाली पेट वो भी लगने लगा था. थक कर मैं अपने घुटनो में मुँह देकर अंदर ही अंदर रोने लगा. ऊपरवाले को जी भर भरकर गालियाँ देता रहा. तभी किसी ने मेरे कंधे पर अपना हाथ रखा, मैंने बेमन से अपना सिर उठाकर अपने आँसुओं से भरे चेहरे को उठाकर देखा. तो आश्चर्य से मेरी आँखें फटी की फटी रह गयी.
मेरे सामने चकोर खड़ी थी. लेकिन कुछ बदली-बदली सी. साफ सुथरे नये से कपड़े. निखरा हुआ रंग जैसे अभी नहा धोकर आई हो. लेकिन उसके चेहरे पर पीड़ा साफ-साफ दिखाई दे रही थी. जिसे मैं उस वक़्त समझ नहीं पाया था. उसके एक हाथ में एक बड़ा सा बैग भी था.

