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Incest Mera Pyara Devar - Ankush

aidenabhishek

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UPDATE 76

मुंबई जुहू चौपाटी, शाम के वक़्त यहाँ कुछ ज़्यादा ही रौनक रहती है, लोग दिन भर की थकान और स्ट्रेस दूर करने अकसर यहाँ चले आते हैं. अभी शाम होने में वक़्त था, दिन के लगभग 4 बजे होंगे. भले ही दिसंबर का महीना था लेकिन गर्मी में कोई ज़्यादा राहत नहीं थी. समुंदर की लहरों के साथ बहती हवा शरीर को कुछ राहत दे देती थी. चौपाटी के मेन पिकनिक स्पॉट से हटकर छोटी-छोटी चट्टानों की तरफ एक युवक गुम-सूम सी अवस्था में समंदर की ओर बढ़ा चला जा रहा था. उसे देखकर ऐसा लग रहा था मानो वो किसी सम्मोहन से बँधा समंदर की उछलती-कूदती लहरों में खोया हुआ उनसे कुछ पाने की इच्छा लेकर उनकी तरफ बढ़ा चला जा रहा हो. थोड़ी देर में ही वो एक ऐसी चट्टान पर जा पहुँचा जिससे समंदर की तेज लहरें टकराकर अपना दम तोड़कर वापस लौट जाती थी, उसके कुछ ही पलों बाद वो फिर से अपनी शक्ति बटोरकर उस चट्टान से आ टकराती, लेकिन चट्टान के हौसले बुलंद देख वो अपना सिर पटक कर फिर वापस लौट जाती. ये सिलसिला ना जाने कितनी सदियों से चला आ रहा था. ना तो लहरें अपनी हिम्मत खोने को तैयार थी और चट्टान तो जैसे थामे ही बैठी थी कि आओ देखें किसमें कितना है दम. चट्टान के ठीक नीचे गहरायी समेटे समंदर जिसका कोई ओर या छोर दिखाई नहीं पड़ता था. जितनी दूर तक नज़र जा सकती थी, बस पानी ही पानी. सफेद-सफेद रूई जैसी लहरों से सुशोभित, सूरज की तेज किरणों के बीच चाँदी की प्लेटों जैसी चमचमाती लहरें आ रही थी जा रही थी.

युवक चलते-चलते चट्टान के अंतिम छोर पर जा पहुँचा, इतना की अगर एक कदम और आगे बढ़ता कि सीधा समंदर की तेज लहरों के बीच. जहाँ से निकलना किसी इंसान तो क्या, जल के किसी जीव के बस की बात भी नहीं थी. कुछ देर वो युवक अपनी आँखें बंद किए ना जाने क्या सोचता रहा, फिर उसने कुछ निर्णय लिया और समंदर की तेज लहरों के बीच जंप लगाने के लिए अपना अगला कदम आगे बढ़ा दिया. उसी चट्टान की छोटी के साइड की ढलान पर एक और आदमी जिसकी उम्र कोई 30-32 साल की रही होगी बैठा समंदर की लहरों का मज़ा ले रहा था. अपनी तरफ आते उस युवक जो उससे उम्र में 3-5 साल छोटा ही लग रहा था को उसने देखा. उसकी अवस्था देखकर उसको शंका हुई. दीवानों की तरह बढ़े चले आ रहे युवक को देख वो सतर्क हो गया, क्योंकि वो जिस तरह से चोटी की तरफ बढ़ा चला आ रहा था. उससे साफ जाहिर था की वो समंदर की लहरों को देखने तो नहीं आ रहा है. वो फ़ौरन अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ. जब युवक अपने अंतर्द्वंद से लड़ रहा था तब तक वो उसके अत्यंत करीब जा पहुँचा. युवक पर ना जाने कैसा जुनून सवार था की उसे उस दूसरे व्यक्ति के आने की भनक तक भी नहीं लगी. फिर जैसे ही उसने समंदर की लहरों के बीच जंप लगाने की कोशिश की, उस व्यक्ति ने समय रहते उसकी कलाई थाम ली. अचानक से किसी और के द्वारा उसकी कलाई पकड़े जाने पर उस जंप लगते व्यक्ति के शरीर को एक तेज झटका लगा, वो उस व्यक्ति की तरफ घूमा. साथ ही साथ अपनी कलाई छुड़ाने का प्रयास भी किया. इस आपा धापी में वो जंप लगाने वाला व्यक्ति दूसरी तरफ आ गया और बचाने वाला चट्टान के किनारे की तरफ चला गया. उसकी कलाई इस झटके के साथ उसके हाथ से छूट गयी, लेकिन झोंक-झोंक में वो बचाने वाला व्यक्ति चट्टान के नीचे की तरफ गिरने लगा. भाग्य वश चट्टान से गिरते ही उसके हाथ एक बाहर को निकला हुआ उस चट्टान का सिरा हाथ आ गया, इधर जब उस युवक ने अपने बचाने वाले को ही समुंदर में गिरते देखा तो एक क्षण को तो वो सन्न खड़ा रह गया. लेकिन फिर जैसे ही देखा कि वो एक हाथ से ही चट्टान के नुकीले पत्थर को पकड़ कर लटका है, उसने फ़ौरन नीचे लेट कर अपना हाथ लंबा करके उसे थामने की कोशिश की. जैसे तैसे करके उस लटके हुए व्यक्ति ने अपना दूसरा हाथ लंबा करके उसके हाथ को थाम लिया और पैर के पंजों को चट्टान की चिकनी सतह पर जमाते हुए वो ऊपर आ गया. एक अप्रत्याशित अनहोनी होने से बच गयी थी. ऊपर आकर वो कितनी ही देर तक अपने डर पर काबू पता रहा. फिर दोनों मिलकर वहाँ से थोड़ा हटकर एक चट्टान पर आकर बैठ गये.

संयत होकर उस व्यक्ति ने उस युवक से पूछा - कौन हो तुम?? और ये सुसाइड क्यों करना चाहते थे??

युवक – मेरी छोड़ो, तुम बताओ, तुम कौन हो और यहाँ क्या कर रहे थे. शुक्र है भगवान का वरना मेरी वजह से मौत के ग्रास बन जाते?

व्यक्ति – मेरा नाम युसुफ है. यूपी के एक छोटे से गांव का रहने वाला हूँ. गाँव में मेरे बूढ़े अम्मी-अब्बू, 4 बहनें जिनमें से एक का ही निकाह हो पाया है अब तक. वहाँ बड़ी गुरबत की जिंदगी जी रहे हैं. मैंने सोचा यहाँ मुंबई में आकर कुछ काम धाम करके घर पैसे भेजूँगा. दो महीने हो गये लेकिन कोई काम नहीं मिला. हालात ये हैं कि जब किसी हिंदू के पास काम माँगने जाता हूँ, तो मुस्लिम नाम सुनकर काम देने को तैयार नहीं है और मुसलमान खुद ही इतने हैं कि उनके पास खुद कोई करने को काम नहीं है. जैसे तैसे कुछ मेहनत मजदूरी करके अपना पेट भरने का जुगाड़ करने लगा, लेकिन इतना नहीं कि घर कुछ भेज सकूँ.

थक कर चोरी-चकारी करने की ट्राइ किया लेकिन अब तक कोई बड़ा हाथ नहीं मार पाया. ऊपर से पकड़े जाने का ख़तरा हर समय मंडराता रहता है. बस किसी तरह से दिन कट जाता है. कभी-कभी तो भूखे पेट ही सोना पड़ जाता है. कभी-कभी सोचता हूँ कि बेकार ही यहाँ आया, इससे अच्छा तो अपने गांव में ही रहकर किसी के यहाँ खेत मज़दूरी कर लेता. भटकते हुए इधर निकल आया, समंदर की लहरों को देखकर यही सब सोच रहा था कि ना जाने मेरे परिवार का क्या हो रहा होगा. बस इतनी सी कहानी है मेरी. अब तुम बताओ कुछ अपने बारे में, लगता है तुम मुझसे भी ज़्यादा मुसीबत के मारे हो जो इतना बड़ा कदम उठा बैठे.

वो युवक कुछ देर तक यूँ ही बैठा रहा. युसुफ ने उसके कंधे पर अपना हाथ रखा. युवक ने उसकी तरफ सूनी-सूनी निगाहों से देखा फिर अनायास ही उसकी आँखें नम हो गयी.

युसुफ ने उसका कंधा थपथपाकर कहा – बोलो दोस्त जो भी तुम्हारे दिल में है. सुना है दुख बाँटने से कम हो जाते हैं.

युवक – क्या बताऊँ दोस्त… मेरी कहानी भी तुमसे कुछ हटके नहीं है… और फिर मेरे दुख ऐसे हैं जो कम होने वाले नहीं हैं. बस बढ़ते ही रहेंगे. अब तो दुखों के साथ-साथ मेरा आत्म सम्मान भी इतना घायल हो चुका है, कि जब भी उनसे टीस उठती है सहना मुश्किल हो जाता है. दिल के घाव दिनों-दिन नासूर बनते जा रहे हैं. अपना सब कुछ खो चुका हूँ, सहन शक्ति जवाब दे चुकी है इसलिए मैं अब अपनी जिंदगी खतम करने का फ़ैसला करके ही यहाँ आया था. लेकिन मेरी फूटी किस्मत, यहाँ भी तुमने मुझे बचा लिया. मरने भी नहीं दिया मुझे.

युसुफ – आत्महत्या कायरता है दोस्त, जो किसी समस्या का समाधान नहीं कर सकती.

युवक उसकी बात सुनकर रो ही पड़ा और उसके गले से लिपटकर फफकते हुए बोला – मैं कायर ही तो हूँ दोस्त… समस्याओं से लड़ते-लड़ते थक चुका हूँ… समाधान कहीं हो तो दिखे??

युसुफ – हौसला रखो दोस्त… हो सकता है हम दोनों मिलकर अपनी-अपनी समस्याओं का कोई हल निकाल सकें.

युवक – तुम जाओ यहाँ से… मुझे अकेला छोड़ दो भाई… कहीं ऐसा ना हो कि मेरी फूटी किस्मत की परछाई तुम्हारी समस्या और बढ़ा दे.

युसुफ – मेरे सामने समस्याओं का पूरा पहाड़ खड़ा है. तुम्हारी वजह से थोड़ी और बढ़ जायें तो भी क्या फर्क पड़ने वाला है. हां ये भी हो सकता है कि हम दोनों मिल बैठ कर कोई हल निकाल सकें. अब रोना छोड़ो और अपने बारे में बताओ.

युवक कुछ देर के लिए शांत रहा फिर एक लंबी साँस छोड़कर बोला – ठीक है, अगर मेरे बारे में जानना ही चाहते हो तो सुनो. मेरा नाम संजू शिंदे है. विदर्भ के एक छोटे से गांव का रहने वाला हूँ. मेरे पिता एक ग़रीब किसान थे. बड़ी मुश्किल से साल भर की रोटी का जुगाड़ कर पाते थे. थोड़ा बहुत बचता था उसे गांव का साहूकार कभी पापा द्वारा लिए गये कर्जे के सूद के तौर पर ले जाता था. परिवार में मेरे माँ-बाप के अलावा मैं सबसे बड़ा, एक बहन और उससे छोटा एक भाई था. जब मैं 10थ में पढ़ता था तभी कुपोषण के शिकार अधिक मेहनत की वजह से मेरे पिता का देहांत हो गया. घर की सारी ज़िम्मेदारी मेरी माँ पर आ गई. मेरी माँ उस वक़्त 32-33 साल की थी, दिखने में वो ठीक-ठाक ही लगती थी. मेहनत के कारण उनका बदन एकदम कसा हुआ था. खेतों में काम करने के बावजूद भी उनका रंग साफ ही था. गांव के लोग अकसर उनको ग़लत नज़र से ही ताड़ते थे. हमेशा ही हमारी गरीबी का फ़ायदा उठाने के चक्कर में ही रहते थे. अपनी इज़्ज़त बचाने के साथ-साथ माँ को दो वक़्त की रोटी भी जुटानी थी, तो उन्होंने मेरी आगे की पढ़ाई छुड़वा दी और मैं उनके साथ खेतों में काम करके घर की परिस्थितियों से लड़ने में उनकी मदद करने लगा. ऐसे ही हालातों से लड़ते-लड़ते किसी तरह हमने 5 साल निकाल दिए. मेरी बहन और छोटा भाई भी काम में हाथ बंटाने लगे, नतीजा अब हमारी स्थिति पहले से सुधरने लगी. हमें लगने लगा कि अब हम अपने दुखों से छुटकारा पाते जा रहे हैं. मेरी बहन अब जवान हो रही थी. सोचा कुछ दिनों में कोई अच्छा सा घर देख कर उसकी शादी कर देंगे. छोटे भाई को खूब पढ़ा लिखा कर शहर भेज देंगे किसी अच्छी सी नौकरी के लिए. लेकिन कहते हैं कि आदमी की सोचों से कई गुना तेज उसका वक़्त चलता है. मैं अब 22-23 साल का हट्टा-कट्टा जवान हो चुका था, खूब मेहनत करता और भर पेट ख़ाता, बाकी और कुछ सोचने विचारने का समय ही नहीं था मेरे पास.

मैं एक दिन खेती के लिए पास के कस्बे से बीज और खाद लेने गया हुआ था अपनी बैल गाड़ी लेकर. पीछे से गांव के दबंग लोग जिनमें से एक दो मेरे हाथों मार भी खा चुके थे मेरी माँ और बहन को छेड़ने के कारण. वो लाला के साथ वसूली के बहाने आ गये. जब मेरी माँ ने कहा कि लाला जी. हम तो आपका पूरा हिसाब कर चुके हैं, तो उसने झूठे बही खाते दिखाकर पहले तो पैसों का दबाव डाला.

फिर जब माँ ने कहा- ठीक है मैं शाम को संजू को भेजती हूँ हिसाब करने तो वो लोग अभी के अभी चुकता करने पर अड़ गये.

वसूली तो एक बहाना था, उसकी आड़ में वो लोग मेरी माँ के साथ बदतमीजी करने लगे. मेरी बहन और छोटा भाई भी था उन्होंने विरोध करना चाहा तो उन्होंने मेरे भाई–बहन को मजबूती से जकड़ लिया और उनकी आँखों के सामने ही मेरी माँ को मादरजात नंगा कर दिया. यही नहीं वो हरामज़ादे बारी-बारी से मेरी माँ के साथ बलात्कार करते रहे. उनमें से जिन्होंने मेरी बहन को जकड़ा हुआ था उन्होंने उसके साथ भी छेड़खानी शुरू कर दी, लेकिन उसने एक आदमी जो उसे मजबूती से पकड़े हुए था उसकी कलाई काट खाई. बिल-बिलाकर उसने उसे जैसे ही उसे छोड़ा वो वहाँ से जान बचाकर भाग निकली. मैं समान गाड़ी में लाद कर घर की तरफ ही आ रहा था कि मुझे अपनी तरफ बेतहाशा भागती हुई मेरी बहन चकोर दिखाई दी. पास पहुँच कर मैंने जैसे ही गाड़ी खड़ी की, वो भागकर मेरे सीने से लिपट कर रोने लगी. मेरे पूछने पर उसने रोते-रोते सारी बातें बताई, जिन्हें सुनकर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गयी. मैंने उसे गाड़ी में बिठाया और बेचारे बैलों पर डंडे बरसाता हुआ उन्हें दौड़ता हुआ जैसे ही घर के सामने पहुँचा वो हरामज़ादे मेरे घर से बाहर निकलते दिखाई दिए. मैं उनसे उलझने की बजाय अपने घर के अंदर भागा, लेकिन सामने का वीभत्स नज़ारा देखकर मेरे पैर लड़खड़ा गये, आँखों के सामने अंधेरा सा छा गया. अंदर मेरा भाई खून से लथपथ मरा पड़ा था. घर के हालत बता रहे थे कि उसने यथासंभव संघर्ष किया होगा. मेरी मादरजात माँ के पेट में भी एक लंबा सा छुरा धंसा हुआ था. मेरी समझ से वो भी मर चुकी थी. कुछ देर अपना सिर पकड़ कर मैं सन्नाटे की स्थिति में ही बैठा रहा, फिर जैसे मैंने कुछ निश्चय कर लिया था. उठकर अपनी कुल्हाड़ी ली और घर से बाहर चल दिया. तभी मेरे कानों में मेरी माँ की दर्द भरी कराह सुनाई दी. मेरे पैर ठिठक गये, लपक कर माँ के पास पहुँचा. उसका सिर अपनी गोद में रख कर जैसे ही मैंने वो छुरा बाहर खींचा, खून का मानो फव्वारा सा उसके पेट से बाहर निकला जिसने मेरे कपड़े भी लाल कर दिए. साथ ही माँ की गर्दन भी एक तरफ को लुढ़क गयी. बहुत देर तक उसके सिर को लेकर फुट-फूटकर रोता रहा. चकोर भी मेरे पास ही बैठकर रोती रही. फिर जैसे कुछ जुनून सा मेरे दिमाग़ पर छाने लगा. मेरा रोना अप्रत्याशित रूप से थम गया. मैंने अपनी बहन को चुप कराया, माँ और भाई की लाश को यूँ ही लावारिस छोड़ मैंने अपनी कुल्हाड़ी संभाली. चकोर का हाथ थामा और बिना कुछ लिए दिए उसे लेकर घर से बाहर निकल गया. वो बेचारी डरी सहमी उसकी हिम्मत भी नहीं हुई कि मुझसे कुछ पूछ भी ले. बस मेरे साथ लगभग घिसटती सी चलने लगी. मैंने उसे गांव के बाहर खड़े रहने को कहा और खुद उस हरामी बनिये के घर की तरफ बढ़ गया. उस वक़्त मेरा भाग्य अच्छा था जो सारे गुनहगार उसी के घर में एक साथ मिल गये, जो शायद आगे क्या हो सकता है इस विषय पर बातें कर रहे थे. घर में घुसते ही मैंने एक तरफ से उन हरामज़ादों को लकड़ी की तरह काटना शुरू कर दिया. 6-6 लोगों को एक साथ मार कर खून से सना मैं बाहर आया.

अपनी बहन को अपने साथ लिया और गांव की सीमा से दूर और दूर होता चला गया, क्योंकि अब वहाँ रहने का मतलब था अपने आप को जेल में सड़ाना या फाँसी पर झूल जाना. उसके बाद मेरी बहन का क्या होता, ये मैं भली भाँति जानता था. एक तालाब में जाकर मैंने खुद को और अपने कपड़ों को साफ किया और उसी रात मुंबई की ट्रेन पकड़ कर इस शहर में आ गया. अपनी सोच से तो मैं अपनी बहन को गांव से बचा लाया. लेकिन इस शहर में आते ही मेरे सामने मुसीबतों का पहाड़ खड़ा मिला. सिर पर छत नहीं. जेब में एक फूटी कौड़ी नहीं, खाने को दो दिन से पेट में एक अन्न का दाना तक नहीं गया था. दिनभर भटकने के बाद भी कहीं से कोई आशा की किरण नहीं मिली जिससे अपनी भूख भी शांत कर सकें. तक कर भूख से निढाल हम दोनों एक फुटपाथ पर रात गुजारने को मजबूर. पहने हुए कपड़ों के अलावा जेब में एक रुमाल तक नहीं. लेकिन थकान के कारण तेज नींद ने हमारी सारी समस्याओं का हल कर दिया. पता नहीं कब हमें नींद आ घेरा, एक बाउंड्री वॉल के सहारे पीठ टिकाते ही हमें नींद ने घेर लिया. ना जाने वो रात का कौन सा प्रहर था जब मेरी नींद एक लड़की की तेज-तेज चीखों के कारण खुल गयी. बगल में देखा तो मेरी बहन चकोर वहाँ नहीं थी. मैं चीख की दिशा में बेतहाशा दौड़ पड़ा. सड़क से हटकर झाड़ियों के पीछे वो चार लोग चकोर के साथ ज़बरदस्ती कर रहे थे. उसके कपड़े एक-एक करके उसका बदन छोड़ते जा रहे थे. अपने आप को बचाने की वो जी तोड़ कोशिश कर रही थी, लेकिन कब तक? मात्र एक पैंटी में वो अपने नग्न शरीर को ढकने की कोशिश कर रही थी और वो दरिंदे उसे चारों ओर से उसके बदन के साथ खेल रहे थे. हे भगवान ये क्या-क्या खेल, खेल रहा है तू मेरे साथ??? कब तक और कितना दुख देना चाहता है हमें?? मैंने मन ही मन ऊपरवाले से कहा.

लेकिन उसे तो जैसे मुझसे कोई सरोकार ही नहीं था. जीवन देकर जैसे उसने हमारे ऊपर कोई उपकार किया हो और छोड़ दिया हो समाज की दरिंदगी के बीच. ठीक है तू यही चाहता है तो यही सही. मैंने उधर से ध्यान हटाकर इधर-उधर नज़र दौड़ाई, कुछ दूरी पर मुझे एक जंग लगी हुई लोहे की रोड दिखाई पड़ गयी. मैंने उसे मजबूती से अपने हाथ में पकड़ा और पीछे से जाकर एक की खोपड़ी खोल दी. वो ढंग से चीख भी नहीं पाया और वहीं ढेर हो गया. बाकी बचे तीन लोगों ने जैसे ही देखा कि किसी ने उनके एक साथी को मार डाला है वो वहाँ से भागने लगे. तब तक मैंने उनमें से एक और को धर लिया. मौके का लाभ लेकर वो दो वहाँ भाग लिए.

उसी रात हमने वो इलाक़ा छोड़ दिया. दूसरे दिन मैं अपनी बहन को एक जगह छोड़ कर कुछ काम धंधे की तलाश में निकल पड़ा. लेकिन महानगरी मुंबई में काम मिलना भी इतना आसान नहीं है. सारे दिन भटकने के बाद यूँ ही खाली पेट भारी कदमों से मैं वहीं लौट आया जहाँ मैंने चकोर को छोड़ा था. लेकिन वहाँ मुझे चकोर नहीं मिली. चारों तरफ इधर उधर ढूँढता रहा. घूम फिर कर फिर वहीं आ जाता कि शायद कहीं इधर उधर गयी होगी. आ ही जाएगी. लेकिन उसका कहीं पता नहीं चला. मेरे चलने फिरने की शक्ति भी जवाब दे चुकी थी. आज चौथे दिन भी पेट खाली ही था. बस किसी नलके से पानी पी लिया जो खाली पेट वो भी लगने लगा था. थक कर मैं अपने घुटनो में मुँह देकर अंदर ही अंदर रोने लगा. ऊपरवाले को जी भर भरकर गालियाँ देता रहा. तभी किसी ने मेरे कंधे पर अपना हाथ रखा, मैंने बेमन से अपना सिर उठाकर अपने आँसुओं से भरे चेहरे को उठाकर देखा. तो आश्चर्य से मेरी आँखें फटी की फटी रह गयी.

मेरे सामने चकोर खड़ी थी. लेकिन कुछ बदली-बदली सी. साफ सुथरे नये से कपड़े. निखरा हुआ रंग जैसे अभी नहा धोकर आई हो. लेकिन उसके चेहरे पर पीड़ा साफ-साफ दिखाई दे रही थी. जिसे मैं उस वक़्त समझ नहीं पाया था. उसके एक हाथ में एक बड़ा सा बैग भी था.
 

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UPDATE 2

शंकर, गाँव के अति-प्रतिष्ठित व्यक्ति थे, एक बार को अपना काम भले ही बिगड़ता रहे, लेकिन अगर कोई मदद माँगने इनके द्वार पर आ गया, तो खाली हाथ तो कम-से-कम जाएगा नहीं. यथासंभव उसे यहाँ से मदद ज़रूर मिलेगी. उनकी इसी नेक-नीयत के चर्चे आस-पास के सभी गाँवों में थे. अपने जमाने के इस गाँव के वो सबसे अधिक शिक्षित व्यक्ति थे और गाँव के ही स्कूल में शिक्षक के तौर पर कार्यरत थे. अपने पिता के चारों बेटों में सबसे बड़े शंकर, शिक्षा का महत्व जानते थे, इसी कारण अपने छोटे भाइयों को भी पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया करते थे, लेकिन वो पढ़ नही पाए. दो बहनें भी थी जो तीन भाइयों से छोटी थी, लड़कियों को उस जमाने में ज़्यादा पढ़ाया लिखाया नही जाता था, फिर भी उनके कहने पर गाँव की आठवी क्लास तक की शिक्षा उन्हें दिलवाई ही दी. पिता के देहांत के बाद सारे परिवार की ज़िम्मेदारी उनको ही उठानी पड़ी, हालाँकि सभी भाई बहनों की शादियाँ तो पिता के सामने ही हो गयीं थीं.

शंकर की पत्नी विमला ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की परिवार को एक सुत्र में बाँधने की, लेकिन छोटे भाइयों के विचार ना मिलने के कारण सभी परिवार अलग-अलग रहने लगे. पिता लंबी-चौड़ी जायदाद छोड़ कर गये थे, सो बराबर-बराबर हिस्सों में बाँट दी गयी. चूँकि शंकर टीचर भी थे तो दूसरों से कुछ ज़्यादा अमन चैन से थे, उपर से उनके बच्चे भी अब बड़े हो चुके थे.

शंकर के तीन बेटे और एक बेटी थी, बेटी दो बेटों के बाद पैदा हुई थी और उसके बाद फिर एक और बेटा. सबसे छोटा बेटा जिसका नाम अंकुश है, जब आठवीं क्लास में पढ़ता था, तब उसके सबसे बड़े भाई राम की शादी हुई, शादी के समय राम शहर में रहकर ग्रॅजुयेशन कर रहा था.

दूसरे भाई कृष्णा क्लास 12 में पढ़ रहा था, बहन रमा अपने भाई कृष्णा के साथ ही साइकल पर बैठ कर उसी के स्कूल में पढ़ती थी, जो इस समय क्लास 10 में थी. शंकर अपने सभी बच्चों का समान रूप से ध्यान रखते थे, और उनकी हर जायज़ माँगों को पूरा करने की कोशिश करते जिससे उनके बच्चों को अपना भविष्य बनाने में कोई अड़चन ना आए. गाँव में उस दौरान शादियाँ छोटी उमर में ही कर दी जाती थी.

शादी के समय राम की पत्नी मोहिनी क्लास 12 में पढ़ रही थी, नई बहू के घर आने के तीसरे दिन ही उनके मायके विदा करा ले गये और ससुराल आने का मुहूर्त लगभग दो साल बाद का निकला. शादी के समय मोहिनी एकदम पतली दुबली कमजोर सी लड़की, लगता था मानो किसी लकड़ी के फ्रेम पर बनारसी साड़ी टाँग दी हो, और वैसे भी कुछ ज़्यादा समय अपनी ससुराल में गुज़ार भी नही पाई, ये भी हो सकता है कि राम अपनी पत्नी की शक्ल भी देख पाया था कि नहीं. अब गाँव के रस्म-रिवाज तो निभाने ही थे.

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बेचारा राम! शादी हुई ना हुई एक बराबर. खैर घर परिवार के लिए तो खुशी की बात थी, उनके भरे-पूरे परिवार में वो सबसे पहली शादी जो थी, तो स्वाभाविक था कि खूब धूम-धाम से खुशियाँ मनाई गयी. सभी चाचा भतीजों ने खूब बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया. शादी के एक साल के अंदर ही राम का ग्रॅजुयेशन पूरा हो गया और अब वो बी.एड. की पढ़ाई में जुट गया, पिता का प्लान उसको किसी कालेज में लेक्चरर बनाने का था.

अब कृष्णा भी बड़े भाई के पास शहर पहुँच गये थे अपने ग्रॅजुयेशन करने के लिए, सब कुछ सही चल रहा था, कि ना जाने विमला को किसी बीमारी ने घेर लिया, उन्होंने बिस्तर ही पकड़ लिया, बहुत इलाज कराया लेकिन कोई फ़ायदा नही हुआ. मोहिनी के ससुराल आने की तिथि में अभी 6 महीने बाकी थे लेकिन माँ की हालत दिनो दिन गिरती देख पिताजी ने बेटे का गौना अति-शीघ्र करने के लिए अपने समधी से बात की. वो भी भले लोग समस्या को समझ, राज़ी हो गये और आनन-फानन में बेटे का गौना करा लिया, बहू के आते ही माँ विमला परलोक सिधार गयी.

मोहिनी अभी खुद भी एक बच्ची ही थी, जो अभी 19 वे साल में चल ही रही थी, उसको अपने छोटी ननद और देवर को अपने बच्चों की तरह संभालना था.

कैसे? ये उसकी समझ में नहीं आ रहा था. पति शहर में रहकर शिक्षा ले रहे थे, ससुर से घूँघट करना पड़ता था. ससुर बहू के बीच का कम्यूनिकेशन ज़्यादा तर छोटे बेटे अंकुश के या ननद रमा के माध्यम से ही होता था. वैसे ननद- भौजाई में 3-4 साल का ही एज डिफरेन्स था, रमा ने समझदारी दिखाते हुए, अपनी भाभी को अपनी दोस्त की तरह व्यवहार करना शुरू कर दिया, जिसके चलते मोहिनी का दिल इस घर में लगने लगा, और जल्दी ही वो परिस्थितियों के हिसाब से ढलने लगी. कुछ ही दिनों में अंकुश का अपनी भाभी के प्रति एक माँ बेटे जैसा लगाव हो गया, अब वो उसकी हर ख्वाइश का ध्यान रखती, अंकुश भी हर छोटी बड़ी ज़रूरतों के लिए अपनी भाभी को ही बोलता.

देवर भाभी का लगाव इतना बढ़ गया कि अब उसको अपनी भाभी के दुलार के बग़ैर नींद नही आती थी, कभी-2 तो वो उसकी गोद में ही सर रख कर सो जाता था. फिर वो बेचारी सोते हुए को जैसे-तैसे उठा कर उसके बिस्तर तक पहुँचाती या फिर वो खुद भी उसके बगल में ही सो जाती. मोहिनी अब शादी के समय वाली दुबली पतली लड़की नहीं रही थी, बीते डेढ़ सालों में उसके शरीर में काफ़ी बदलाव आ गया था, वो अब एक सुंदर नयन नक्श की गोरी-चिट्टी मध्यम कद काठी 5’5” की हाइट 32-26-32 के फिगर वाली सुन्दर युवती हो गयी थी.

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पतले-पतले गुलाबी होठ, गोल चेहरा, हल्के भरे हुए गुलाबी गाल जिनमें दोनों साइड हँसने पर डिंपल पड़ते थे, सुराहीदार लंबी गर्दन, कमर तक लंबे घने काले स्याह बाल, कुल मिलाकर एक बहुत ही ख़ूबसूरत लड़की थी. ससुराल आने के बाद अंकुश ने जब अपनी भाभी को बिना घूँघट के देखा तो वो उसे किसी देवी के तरह, और वही छवि उसने अपने मन-मस्तिष्क में उसकी बिठा ली.

पति-पत्नी का मिलन उनके आने के भी काफ़ी दिनों के बाद ही हुआ था, क्योंकि सास के देहांत के बाद कुछ महीनों तक तो सभी शोक संतप्त ही थे. राम जब भी घर आते थे, तो जैसे-तैसे सकुच-संकोच करके समय निकाल पाते, उपर से दुलारा देवर, जो हर समय अपनी प्यारी भाभी के दामन से ही चिपका रहता था. माँ का दुलारा, सबसे छोटा बेटा ही होता है, उनकी मौत के बाद भाभी उसको संभालने में कोई कसर नहीं रखना चाहती थी, बेचारे राम मोहन संकोच वश कुछ कह भी नहीं पाते थे, बिन माँ का बच्चा वो भी छोटा भाई, कहें भी तो क्या?

बहू के घर में रहते, पिता घर में कम ही आते थे… उनका ज़्यादा तर समय तो स्कूल में बच्चों के बीच, उसके बाद खेती-बाड़ी की देखभाल में ही चला जाता था. घर वो बस खाने के लिए ही आते थे. ससुराल आने के तीन महीने तक भी उनकी सुहागरात का कोई अता-पता नही था, फिर एक दिन रमा जो अब ऐसी परिस्थितियों को समझने लगी थी, उसने इशारों-इशारों में अपने छोटू (अंकुश को प्यार से सभी छोटू ही बुलाते थे) को समझाने की कोशिश की.

अगर आप लोगों की इजाजत हो तो यहाँ से ये कहानी अंकुश (छोटू) की ज़ुबानी शुरू करता हूँ. इजाजत है ना? ओके?

हम राम भैया को बड़े भैया और कृष्णा भैया को छोटे भैया कह कर बुलाते हैं. बड़े भैया हर शनिवार की शाम घर आते थे, और मंडे अर्ली मॉर्निंग निकल जाते थे. एक दिन शनिवार देर शाम को भैया घर आने वाले थे, मे और भाभी आपस में बातें करते हुए, मस्ती मज़ाक भी कर रहे थे. भाभी जब हँसती हैं तो उनके दोनों गालों में गड्ढे (डिम्पल) पड़ते हैं, मे उनमें अपनी उंगली घुसा कर हल्के- हल्के सहला देता था, तो भाभी और ज़्यादा मस्ती करने लगती. तो उस दिन भैया आने वाले थे, रमा दीदी ने मुझे इशारे से अपने पास बुलाया और बोली – छोटू! भैया मेरी एक बात मानेगा..?

मैं – हां ! दीदी बोलो क्या बात है…?

रमा दीदी – बड़े भैया जब आते हैं ना तब तू ना ! थोड़ा भाभी से अलग रहा कर..!

मैं भोलेपन से बोला – क्यों दीदी? ऐसा क्यों बोल रही हो? उन्होंने तो मुझे कभी ऐसा बोला नहीं!

रमा दीदी – भाभी शर्म की वजह से कुछ नहीं बोलती, तू ना! उतने टाइम मेरे पास आकर पढ़ लिया कर.

मैं – नहीं दीदी ! मुझे तो भाभी के पास बैठ कर पढ़ना ज़्यादा अच्छा लगता है..

रमा दीदी – ओफफफू…तू समझा कर पागल. देख भैया उनके पति हैं ना.

मैं – तो उसमें क्या? मैं थोड़ी ना उनको भाभी से बात करने के लिए ना बोलता हूँ!

रमा दीदी – तू बिल्कुल पागल ही है… अरे बुद्धू पति-पत्नी अकेले में ही ज़्यादा अच्छे से बात कर पाते हैं. अब बोल मानेगा ना मेरी बात.

मैं – ठीक है दीदी, मैं भाभी से बोलकर आपके पास आ जाऊंगा. लेकिन भाभी की तरह आपको मेरे साथ मस्ती करनी पड़ेगी जब बोर हो जाऊंगा तो.

रमा दीदी – ठीक है! मेरा प्यारा छोटू कितना समझदार है. चल अब तू खेलने जा और आज हम दोनों रात को एक साथ बैठ कर पढ़ेंगे. ओके?

मैं उनको ओके बोलकर बाहर खेलने चला गया. वैसे मैं बहुत कम ही साथ के मोहल्ले के बच्चों के साथ खेलता था, क्योंकि वो सब आवारा किस्म के थे, पढ़ने लिखने से उनको कोई मतलब नहीं था. उनके परिवार में भी कोई पढ़ने लिखने वाला नहीं था, जो उनको रोके. इसलिए पिताजी ज़्यादा खेलने भी नहीं देते ऐसे बच्चों के साथ.

उस दिन देर शाम भैया घर आए, हम सब ने मिलकर खाना खाया, पिताजी ने भैया से दोनों भाइयों की पढ़ाई लिखाई के बारे में बात-चीत की फिर कुछ देर खाने के बाद भी बैठे साथ में. भाभी और दीदी ने मिलकर घर का काम निपटाया, फिर जब बाबूजी, बाहर चले गये तो दीदी ने मुझे अपने पास पढ़ने के बहाने से बुला लिया. हम दोनों पढ़ाई में लग गये. जब हम सब वहाँ से चले गये, भाभी किचन में बर्तन साफ कर रही थी, भैया ने चुपके से उनको पीछे से जकड़ लिया और उनके गले पर किस कर लिया. अचानक बिना किसी उम्मीद के भाभी को एक झटका सा लगा और वो हड़बड़ा कर पलट गयी, हड़बड़ाहट में उनका सर भैया की नाक में लगा, भैया हाथों से नाक दबाए खड़े रह गये, दर्द से उनकी आँखों में पानी आ गया. भाभी झट से उनके पैरो में गिर गयी और गिडगिडाते हुए बोली - सॉरी जी! माफ कर दो! मुझे नहीं पता था कि आप इस तरह से! मैं डर गयी थी कि पता नहीं कौन…आ गया…?
Ye kahani pahle bhi padh chuka hu 4ya 5saal pahle but abhi bhi utna hi maza aata he
 

aidenabhishek

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UPDATE 77

आश्चर्य के साथ बहुत देर तक मैं उसे देखता ही रहा., वो अपने होंठों को आपस में कसकर दबाते हुए मेरे पास बैठ गयी. ऐसा लगा मानो वो किसी दर्द को पीने की कोशिश कर रही हो.

मैंने उसका हाथ पकड़कर कहा – कहाँ चली गयी थी तू? पता है मैं कितना परेशान हो गया था तुझे यहाँ ना पाकर.

चकोर – अरे परेशान होने की कोई बात नहीं है.. ये बता तुझे कोई काम धंधा मिला?

संजू घोर निराशा में डूबे स्वर में बोला – नहीं कुछ नहीं मिला… कोई हरामजादा सीधे मुँह बात तक करने को तैयार नहीं है काम तो क्या देगा…

चकोर – मैं जानती हूँ यहाँ ऐसा ही होता है… बिना जान पहचान यहाँ किसी को मज़दूरी भी नहीं करने देता कोई… चल छोड़… ले मैं तेरे लिए खाना लाई हूँ…

फिर उसने बैग से खाने का एक पैकेट निकाला. ये तुझे किसने दिया? मैंने उसे सवाल किया तो उसने मेरी बात को टालते हुए कहा – सब बता दूँगी पहले तू खाना खा… मुझे भी भूख लगी है.

अब चार दिन का भूखा आदमी और उसके सामने बिरयानी रख दी जाए तो वो बिना कुछ सोचे समझे उसपर टूट ही पड़ेगा, यही हाल मेरा हुआ. हालाँकि चकोर भी खाने में मेरा साथ दे रही थी, लेकिन मैं तो खाने पर भूखे कुत्ते की तरह टूट पड़ा था. मुझे यूं खाते देख उसके खुश्क होंठों पर एक फीकी सी मुस्कान आ गयी.

खा-पीकर मैंने उसे फिर वही सवाल किया तो बदले में उसने बैग से एक जोड़ी कपड़े निकाल कर मेरे हाथ में पकड़ा दिए और मुस्कुरा कर बोली – पहले कहीं नहा धोकर ये कपड़े बदल ले, फिर कहीं अच्छी जगह बैठकर बातें करेंगे.

मैंने बिना कोई सवाल किए उससे कपड़े लिए और पास में ही एक सार्वजनिक शौचालय में जाकर अपने शरीर का मैल धोया, वो कपड़े पहने जो मेरे लगभग फिट ही आए. उसके बाद में जब चकोर के पास पहुँचा तो उसके पास एक मोटी सी थोड़ी साँवले रंग की एक महिला खड़ी मिली. जिसके दाँत हमेशा पान खाते रहने से लाल-पीले हो रहे थे.

मुझे देखते ही चकोर बोली – भैया ये शन्नो ताई हैं. इन्होंने ही मुझे एक जगह काम दिला दिया है. उसी के एडवांस से ये सब लिया है.

फिर मेरा हाथ पकड़ कर बोली – यही नहीं पास ही में एक खोली भी किराए पर दिला दी है. जिसमें हम दोनों आराम से रह सकते हैं. चल आजा…

मैं निठल्ला जवान आदमी, शर्म के मारे उस बेचारी से ये भी नहीं पूछ सका कि आख़िर इतनी जल्दी उसे क्या काम मिल गया और वो भी एडवांस के साथ? खैर रहने को छत पाकर, खाना खाकर में कुछ समय के लिए सब कुछ भूल गया. कई दिनों बाद भरपेट खाना मिलने से बहुत गहरी नींद आई उस रात. दूसरे दिन मैं फिर अपने लिए काम ढूँढ ने निकल पड़ा लेकिन सारे दिन भटकने के बाद नतीजा वही ढाक के तीन पात. शाम को चकोर फिर खाने का पैकेट लेकर आई. जिसे खा पीकर हारा थका मैं फिर गहरी नींद में सो गया. इसी तरह दिन निकलते रहे मैं भटकता रहा, चकोर खाने पीने का इंतज़ाम करती रही. मेरे दिमाग़ में ये कभी-कभी ये सोचकर बड़ी कोफ़्त होती जा रही थी कि देखो मैं मुस्टंडा सा खाली बैठा हूँ, मेरी बहन कमाने जाती है. एक दो बार मैंने शन्नो ताई को भी बोला कि वो मेरे लिए भी कोई काम धंधा बताए. लेकिन वो टाल-म-टोल करती रही, तरह-तरह के बहाने बनाती रही. मैं अब अपने आप को दुनिया का सबसे निठल्ला और मजबूर इंसान समझने लगा, जिस भाई को अपनी छोटी बहन के हाथ पीले करने की चिंता होनी चाहिए वही भाई अपनी बहन के रहमों-करम पे जिंदा था. उसकी कमाई खा रहा था, जो ना जाने कैसे-कैसे करके क्या-क्या करके चार पैसे कमाती थी. इसी कोफ़्त में आकर नतीजा ये हुआ कि मैं अपने जैसे ही दूसरे फालतू लोगों के साथ उठने बैठने लगा. नशे पत्ते करने लगा. नशे की लत ने मुझे अब ये भी सोचने से रोक दिया कि मुझे कुछ करना चाहिए. दिन, महीने, साल इसी तरह गुजर गये. एक दिन चकोर बीमार पड़ गयी. एक खैराती हॉस्पिटल में शन्नो ने ही उसे भरती करा दिया. काफ़ी इलाज हुआ लेकिन वो ठीक नहीं हुई. एक दिन मेरे अंदर के भाई ने डॉक्टर से पूछ ही लिया कि आख़िर मेरी बहन को बीमारी क्या है?

डॉक्टर का जवाब सुनकर तो जैसे मेरे अंदर की इंसानियत भी जैसे मर गयी. अपने नकारापन से मैंने अपनी प्यारी बहन को नरक की आग में झोंक दिया था. उसे एचआईवी का घातक रोग लग गया था. यहाँ आकर जो पहला निवाला मैंने खाया था वो उसने अपना शरीर बेचकर मुझे दिया था. लेकिन नशे की लत ने मुझे इतना बेगैरत कर डाला था, मैं कुछ करने लायक नहीं था तो उसी खैराती हॉस्पिटल में उसे मरने को छोड़ दिया. लेकिन उस दिन के बाद मेरी अंतरात्मा ने मुझे चैन से जीने नहीं दिया, लाख सिर पटकने पर में चार पैसे जुटाने में नाकाम रहा. मेरी नाकामियों का ख़ामियाजा मेरी बहन उठा रही थी. चार पैसे जुटाने की धुन में मैंने एक जगह चोरी करने की कोशिश की लेकिन हाय रे मेरी फूटी किस्मत, पहली बार में ही धर लिया गया. 6 महीने की सज़ा हुई, जिसे काट कर जब बाहर आया तो मेरी बहन, मेरी प्यारी बहन मुझे छोड़कर जा चुकी थी. जिसकी मौत का मैं खुद ज़िम्मेदार था. इतना कहते-कहते संजू फुट-फूटकर रोने लगा.

अपनी हिचकियों पर काबू करते हुए आगे बोला – अब तुम ही बताओ दोस्त, इस दुनिया में मेरे लिए बचा ही क्या जिसके लिए मैं जी सकूँ??

मैंने अपनी जिंदगी को खतम करने का फ़ैसला ले लिया और यहाँ चला आया. लेकिन वाह रे मेरी किस्मत, तुमने मुझे वो भी नहीं करने दिया.

युसुफ उसे सांत्वना देते हुए बोला – मैंने मैथ में एक फ़ॉर्मूला पढ़ा था. (-)+(-)=+ हो जाता है. मेरी बदनसीबी जब तुम्हारी बदनसीबी के साथ जुड़ जाएगी तो हो सकता है हम दोनों की बदनसीबी दूर हो जाए.

संजू अपने आँसू पोंछते हुए बोला – मेरे पास तो अब कुछ है नहीं खोने या पाने को, अगर मेरा जीवन तुम्हारे ही कुछ काम आए तो भी मैं अपने आप को धन्य समझूंगा. आज से जैसा तुम कहोगे मैं वैसा ही करूँगा. दोनों को अपनी-अपनी आपबीती आपस में शेयर करते-करते काफ़ी वक़्त निकल गया था. वातावरण में अंधेरा छा चुका था. वो दोनों नये-नये बदनसीब दोस्त वहाँ से एक दूसरे का हाथ थामकर चल पड़े अपनी अंजान मंज़िल की तरफ जिसका कोई पता नहीं था कि वो कहाँ मिलेगी.

युसुफ के पास कुछ पैसे थे जो उसने कुछ कबाड़ इकट्ठा करके कमाए थे, उससे उन दोनों ने पेट की भूख शांत की, उसके बाद उन दोनों ने डिसाइड किया कि अब जो भी हो आगे वो और गुरबत की जिंदगी नहीं जीएंगे. युसुफ ने सही ही कहा था कि (-)+(-)=+ होता है. उसी रात उन्होंने एक दुकान का ताला तोड़ा और अच्छी ख़ासी रकम उनके हाथ लगी. दूसरे ही दिन एक अच्छी सी खोली किराए पर ली और दोनों दोस्त एक नई राह पर चलने लगे. संजू जहाँ मरने मारने से नहीं डरता था, वहीं युसुफ अपनी बुद्धि और विवेक से काम निकाल लेता था. देखते ही देखते कुछ ही महीनों में उस इलाक़े में उनकी धाक जमने लगी. संजू की दिलेरी से छोटे बड़े गुंडे दहशत खाने लगे, वो ज़रा-ज़रा सी बात पर ही बिना अंजाम की परवाह किए हाथ छोड़ देता था. यहाँ तक कि एक दो को उसने चाकू से घायल भी कर डाला और खुद भी हुआ. संजू शिंदे के पास तो कुछ पाने या खोने के लिए था ही नहीं लेकिन युसुफ का अपना भरा पूरा परिवार था जिसे वो गांव छोड़ आया था. उसे ये भी नहीं पता था कि अब वो लोग किस हालत में होंगे. उसे उनकी ज़िंदगियाँ संवारने के लिए धन की ज़रूरत थी, जो इन छोटे-मोटे चोरी चकोरी से पूरा पड़ने वाला नहीं था. वो दिन रात किसी लंबे हाथ मारने की फिराक में लगा रहता था, जिसका जिक्र वो कई मर्तबा संजू से भी कर चुका था, लेकिन संजू के मुताबिक वो जो बोलेगा वो करने को तैयार था. उसके पास अकूत शक्ति थी, दिलेरी थी, कुछ नहीं था तो बस पैसे कमाने के लिए दिमाग़, जिसकी कमी की वजह से वो अपनी जान से प्यारी बहन को भी खो चुका था.

एक दिन मरीना बीच के पत्थरों पर बैठे वो दोनों इसी बारे में विचार विमर्श कर रहे थे कि किस तरह से एक लंबा हाथ मारा जाए जिससे उनकी धन की ज़रूरत पूरी हो सके. जब किसी ठोस नतीजे पर ना पहुँच सके तो थक कर वो दोनों वहाँ से जाने के लिए उठ खड़े हुए, चलने के लिए जैसे ही मुड़े की सामने एक निहायत ही खूबसूरत औरत को देख कर वो दोनों अपनी जगह पर जाम होकर रह गये.

28-30 साल की बेहद खूबसूरत औरत को अपने सामने देख कर वो दोनों तगे से खड़े उसके सौन्दर्य में खो गये. गोरे चिट्टे पैरों में चमकीले फैन्सी सैंडल, ब्राउन लॉन्ग स्कर्ट जो उसकी पिंडलियों को बखूबी ढके हुए, लेकिन उसके ऊपर तो मानो कयामत का साम्राज्य फैला हुआ था. उसकी 32 की कमर तक स्कर्ट के बाद ऊपर वो एकदम फक्क सफेद झीना सा टॉप पहने थी जिससे उसकी काले रंग की ब्रा साफ-साफ दिखाई दे रही थी. कसे हुए टॉप में क़ैद उसकी 34 की कसी हुई ठोस बूब्स पर उन दोनों की नज़र जम कर रह गयी. टॉप का गला इतना चौड़ा की उसकी ब्रा की स्ट्रैप कंधों के ऊपर दिख रही थी. ब्रा के स्ट्रैप उस चमकीले टॉप के बाहर दिख रहे थे. सामने उसकी गोरी-गोरी बूब्स के बीच की गहरी दरार देख कर किसी का भी मन उन्हें मसलने का हो जाए. यहाँ तक का सफ़र तय करने के बाद उन दोनों की नज़र जैसे ही उसके चेहरे पर पड़ी, मन ही मन वो उसकी प्रशंसा किए बिना नहीं रह सके. एकदम गोरी रंगत, मानो वो कोई विदेशी महिला उनके सामने खड़ी हो. गोल-गोल चेहरा, हल्के फूले हुए गाल, लाली लिए हुए पतले-पतले होंठों पर सुर्ख लाली, सुतवाँ नाक, कमान समान भौंह के नीचे काले स्याह गॉग्ल्स से ढकी उसकी आँखें, सुनहरे कंधे तक के बाल, जो एक बेहद चमकीले ब्राउन कलर के स्कार्फ़ से ढके हुए थे. दोनों ही उसे देखते ही रह गये. नज़र उसके रूप लावण्य से हटने का नाम ही नहीं ले रही थी. जब बहुत देर तक भी उनकी नीयत उसे देखने से नहीं भरी.

चुटकी बजकर उस युवती ने उन दोनों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया – कहाँ खो गये युसुफ मियाँ.. संजू शिंदे??? क्या कोई सुन्दर औरत पहले कभी नहीं देखी??

अब तक तो वो बेचारे दोनों उस अप्सरा जैसी खूबसूरत औरत के रूप जाल में ही खोए हुए थे लेकिन अब उसके मुँह से अपने नाम सुनकर तो वो दोनों अपनी जगह पर उछल ही पड़े. उन दोनों की हालत पर वो मेनका मंद-मंद मुस्करा रही थी.

उनकी हालत का मज़ा उठाते हुए वो बोली – ऐसे क्यों चौंक रहे हो… मुझे तो तुम दोनों की पूरी कुंडली पता है… क्यों युसुफ मियाँ, धन कमाने के लिए परेशान हो. अपने घरवालों को सुख सुविधा देना चाहते हो. क्यों मैं सही कह रही हूँ ना???

युसुफ हक्का बक्का अभी भी उसे इस तरह से देख रहा था मानो उसके सामने औरत का रूप लेकर कोई अजूबा खड़ा हो.

बड़ी मुश्किल से अपनी इस हालत पर काबू करते हुए युसुफ बस इतना ही बोल पाया – हां…. लेकिन??

उसकी बात बीच में ही काटते हुए वो बोली – लेकिन वेकीन के चक्कर में मत पड़ो… ये बताओ, पैसा कमाने के लिए क्या-क्या कर सकते हो??

अब तक शांत खड़ा संजू बोला – ओ मैडम जी… पहले तो आप अपने बारे में बताओ… कौन हो और हम लोगों के बारे में इतना सब कैसे जानती हो??

संजू की बात पर चुटकी लेते हुए वो हसीना बोली – अरे वाह… संजू… तुम्हारे मुँह में भी जबान है? मैं तो सोच रही थी कि बोलने का काम बस युसुफ मियाँ का ही है.. चलो तुम पूछते हो तो अपने बारे में भी बता देती हूँ. मेरा नाम लीना है, अपने काम के बारे में मैं यहाँ कुछ नहीं बता सकती… रही बात तुम लोगों के बारे में इतनी जानकारी कैसे है, तो उसी दिन से मेरी नज़र तुम दोनों पर है जब तुम दोनों जुहू बीच पर एक दूसरे को पहली बार मिले थे, जब युसुफ ने तुम्हारी जान बचाई थी. अब मैं आती हूँ असल मुद्दे पर, अगर तुम लोगों को पैसा कमाना है तो ये लो मेरा कार्ड, कल दोपहर के बाद आकर मुझसे इस पते पर मिलो.

युसुफ ने आगे बढ़कर उसके हाथ से कार्ड लिया. हां इस दौरान वो उसके हाथ को टच करने का लालच नहीं छोड़ पाया. उसकी इस हरकत पर लीना नाम की वो हसीना उसके चेहरे पर नज़र डालकर मुस्कराती हुई पलट कर एक तरफ को बढ़ गयी. पीछे वो दोनों हतप्रभ खड़े उसकी थिरकती गान्ड को तब तक निहारते रहे जब तक की वो उनकी आँखों से ओझल नहीं हो गयी.
 
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संजू - बड़ा ही कड़क माल है यार…

उसके ओझल होते ही संजू के मुँह से निकले इस शब्द ने युसुफ की तंद्रा भंग की. एक लंबी सी साँस लेकर उसने अपने उस हाथ को चूमा जिसने उसके हाथ को टच किया था.

युसुफ – सही कहा तुमने… लेकिन साली को हमसे क्या काम लेना है जो इतने दिनों से हमारे पीछे लगी हम लोगों के बारे में तहकीकात कर रही है. कुछ तो गड़बड़ है भाई??

संजू ने उसका हाथ थामा और उसे खींचते हुए बोला – हमें क्या लेना देना साली से?? होगी कोई.. चलो चल कर कुछ खाते-पीते हैं, भूख लग रही है.

युसुफ – हां चलो, लेकिन देखना तो पड़ेगा कि आख़िर ये चीज़ क्या है… और हम लोगों से कौन सा काम लेने वाली है???

वो चलते-चलते पास के ही एक सस्ते से होटल कम बार में घुस गये. कुछ सस्ती सी व्हिस्की ऑर्डर की और बैठकर पीने लगे. एक-एक पेग लेने के बाद…

संजू बोला – मेरे ख्याल से हमें इस औरत को अपने दिमाग़ से निकाल देना चाहिए. ये सुनहरी नागिन ना जाने कैसा काम हमसे निकलवाना चाहती है? अपना काम निकाल कर रफूचक्कर हो जाए और हम लोग पुलिस के लफडे में फँस जाएँ.

युसुफ – एक औरत से ही डर गया मेरा शेर? अरे यार देखें तो सही इसमें हमारा कितना फ़ायदा होने वाला है. क्या पता इसका साथ देने से हमारे भी बारे न्यारे हो जायें?

संजू – साला डरता कौन है…. वो भी एक मामूली सी औरत से. मुझे तो बस औरत जात से नफ़रत सी हो चुकी है. एक औरत की वजह से ही मेरी बहन उस दलदल में फँस गयी, तब से मुझे किसी भी औरत पर भरोसा नहीं रहा.

बातों के चलते वो दो-दो पेग और पी चुके थे. ये उनका अब रोज़ का ही काम हो गया था. नशा अपना असर दिखाने लगा था.

युसुफ ने संजू को चढ़ाते हुए कहा – अरे यार संजू.. वैसे भी हम कौन से करोड़पति हैं जो वो हमारा कुछ ले लेगी. कुछ नहीं मिला तो मौका देख कर साली को मिलकर चोद डालेंगे.

संजू को भी नशे में उसकी कड़क जवानी नज़र आने लगी थी. वो थोड़ा झूमते हुए बोला – ये सही कहा युसुफ भाई तुमने. पैसे वैसे गये तेल लेने… साली की कड़क जवानी का मज़ा तो ले ही लेंगे. बहुत कड़क है बहनचोद. वैसे मैंने आज तक किसी औरत को नहीं चोदा है. लेकिन इसे देखकर मेरा ये नियम भंग करने का मन करने लगा है.

झूमते हुए युसुफ ने कहा - मैं तो बस एक बार उसकी मस्त मटकती गान्ड को खूब मसल-मसलकर जमकर चोदना चाहता हूँ. उसकी उस चिकनी गोल-मटोल गान्ड में लन्ड डालकर हिलाना चाहता हूँ. उसके बाद भले ही उसकी गान्ड पे लात मारकर अपने रास्ते निकल लेंगे. संजू.. क्या बोलता है??

संजू - डन!

ये कहकर संजू और युसुफ ने एक दूसरे को हाई-फ़ाईव किया. एक-एक पेग और गटकने के बाद उन्होंने जमकर खाना खाया और कल उस सुंदरी से मिलने का प्लान तय करके वो दोनों अपनी खोली की तरफ चल दिए. दूसरे दिन सुबह से ही वो दोनों लीना से मिलने की तैयारी में जुट गये. उन्होंने रात में ही अपने लिए अच्छे-अच्छे कपड़े खरीद लिए थे. नहा धोकर एक सस्ता सा सेंट लगाकर नये कपड़े पहने और तयशुदा समय पर वो दोनों उससे मिलने को चल दिए. कार्ड पर दिए गये पते पर पहुँचकर उन्होंने अपने सामने एक फ्लैट के बंद दरवाजे की बेल बजाई. अंदर कहीं चिड़ियाँ सी चहचहाईं. कोई दो मिनट के इंतजार के बाद दरवाजा खुला और उसी के साथ-साथ सामने का दृश्य देख कर उन दोनों के मुँह भी खुले रह गये.

दरवाजे के बीचो-बीच लीना खड़ी थी, इस समय वो बिना किसी मेकअप के थी, लेकिन फिर भी उसकी सुंदरता में कोई खास कमी नहीं थी. ऊपर से उसके कपड़े… हाए… देखना इन दोनों में से किसी का खड़े-खड़े ही पानी ना निकल जाए. निहायत ही छोटा सा शॉर्ट, जो मुश्किल से उसके उभरे हुए चुतड़ों को ढक पा रहा था. इतना टाइट कि आगे से उसकी चूत की मोटी-मोटी फाँकें साफ-साफ अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही थी. उनके बीच की दरार… उउउफफफ्फ़… युसुफ की देख कर हालत ही खराब होने लगी, उसके मुँह में उसकी उन फांकों को चाटने के ख्याल से ही पानी भर आया. कमर में इतना नीचे बँधा था कि अगर उसकी चूत पर बाल होते तो शर्तिया ऊपर से दिखाई देते और उसका टॉप… माशाअल्लाह… उसके बूब्स को बमुश्किल ढक पा रहा था. नीचे से इतना लूज़, ऐसा लग रहा था, मानो उसे किन्हीं दो खूँटियों के ऊपर ऐसे ही टाँग रखा हो. अगर कोई बैठकर झाँकने लगे तो उसकी ब्रा समेत चुचियों का पूरा भूगोल पता कर सकता था. यही नहीं ऊपर उसका इतना चौड़ा गला कि उसकी पिंक ब्रा आधी तक दिख रही थी. उसके पुष्ट बूब्स की गहरी खाई देख कर वो दोनों पलक झपकाना ही भूल गये. टॉप के ढीले होने की वजह से उसका एक तरफ का शोल्डर बिल्कुल नंगा था, जिससे उसकी ब्रा की स्ट्रैप अलग ही दिख रही थी. कंधे तक के खुले रेशमी बालों के बीच उसका चाँद सा मुखड़ा जिस पर इस समय शरारत से भरपूर मुस्कराहट विद्यमान थी.

अपनी नशीली आँखों से उन दोनों को घूरते हुए बोली - वेलकम दोस्तों… मेरे घर में तुम दोनों का स्वागत है.. आओ.. अंदर आओ..

इन शब्दों के साथ ही वो अपनी जगह पर पलट गयी.

उफफफ्फ़… क्या कयामत है यार??? लगता है आज तो पानी निकलवाकर ही रहेगी ये… पीछे से उसके शॉर्ट का और ही बुरा हाल था. इतना नीचा कि उसके कूल्हों की गोलाईयों की ढलान बिल्कुल साफ दिखाई दे रही थी. उसकी माइक्रो पैंटी की डोरी जो कमर के बंद से होती हुई उसकी गान्ड की दरार में घुसी पड़ी थी, पीछे से साफ दिख रही थी कि वो अंदर किस जगह और कितनी सुरक्षित होगी. अपने गोल-गोल नितंबों को मटकाते हुए वो उन दोनों के आगे-आगे चल रही थी, उसके पीछे आहें भरते हुए वो दोनों किसी चाबी लगे खिलौनों की तरह उसकी मटकती गान्ड के मज़े लेते हुए पैंट में अपने-अपने लन्ड एडजस्ट करते हुए चल पड़े.

एक छोटी सी लॉबी पार करके वो एक हॉलनुमा कमरे में पहुँची जहाँ एक लॉन्ग सोफा, दो चेयर और एक सेंटर टेबल पड़ी हुई थी. सामने एक बेहद सुसज्जित शो केस में एक 44” का टीवी था जिस पर इस समय कोई हॉलीवुड मूवी चल रही थी. कुल मिलकर लीना यहाँ ऐश की जिंदगी बसर कर रही थी, जिसके श्रोत का उन्हें अभी कुछ पता नहीं था. उसने लॉन्ग सोफे की तरफ इशारा करके उन दोनों को बैठने के लिए कहा और खुद एक चेयर पर बैठ गयी. जो सेंटर टेबल के उस पार ठीक उनके सामने थी. बैठते हुए जानबूझकर उसने अपनी संगमरमर जैसी चिकनी गोल मांसल जांघों के बीच गैप बना रखा था जिसमें से उसकी चूत की मोटी-मोटी फाँकें उभरी हुई साफ-साफ नुमाया हो रही थी. बैठने के बाद उसका टाइट शॉर्ट उस जगह पर और ज़्यादा टाइट हो गया, जिससे उसका मुलायम सॉफ्ट कपड़ा दोनों फांकों के बीच की दरार में धँस गया. कुल मिलाकर कपड़े के बावज़ूद उन दोनों को उसकी ढाई-तीन इंच लंबी चूत की शेप क्लियर दिखाई दे रही थी. उन दोनों का ध्यान अपनी जन्नत पर पाकर वो मन ही मन खुश हो रही थी. उसे पता था कि किसी भी मर्द से काम निकलवाने का कौन सा सटीक तरीक़ा होता है.

अपने चेहरे पर स्माइल लाकर वो बोली – तुम दोनों को यहाँ तक पहुँचने में कोई तकलीफ़ तो नहीं हुई??

उसकी आवाज़ सुनकर उन दोनों ने एक साथ झटके से अपने सिर उठाए. एक साथ ही उनके मुँह से निकला - ज… ज्ज… जी.. कोई खास नहीं.

लीना – तो बताओ क्या लेना पसंद करोगे?? कुछ ठंडा… गरम..??

एक बार उसके चेहरे पर नज़र डालकर उन दोनों की नज़रें झिझक के कारण फिर झुक गयी. नज़र झुकाए हुए ही युसुफ ने कहा – जी मैडम जी, जो आप पिलाना चाहें..

लीना – नहीं.. तुम लोग मेरे मेहमान हो और मेहमान की इच्छा जानकार ही मेहमान नवाज़ी होती है… बोलो क्या लोगे??

युसुफ थोड़ी हिम्मत जुटाकर बोला – इच्छा तो हमारी कुछ और ही पीने की है… लेकिन आप पिलाएँगी नहीं.

लीना – ऐसा क्यों सोचते हो? बोलो तो सही क्या पीना चाहते हो?? मेरे पास हर तरह की ब्रांड मिलेगी तुम्हें.. बिंदास कहो, क्या चाहिए तुम्हें??

युसुफ भी पक्का खिलाड़ी था, वो थोड़ा ढिठाई के साथ बोला – जो हम पीना चाहते हैं, वो तो आपके पास है और आप इतनी दूर बैठी हैं… तो फिर… कैसे???

लीना भी पूरी खेली खाई थी, वो युसुफ की बात का मतलब अच्छे से समझ रही थी. लेकिन बजाय गुस्सा दिखाने के उसने अपनी एक जाँघ उठाकर दूसरी के ऊपर रखते हुए कहा – बड़े उस्ताद हो युसुफ मियाँ… उंगली पकड़ने की बजाय सीधा हाथ ही थामना चाहते हो… अभी तो चाय से काम चला लो… उसके लिए तुम लोगों को थोड़ा इम्तिहान देना पड़ेगा…

मोटी-मोटी गुदाज जांघों के बीच दबाव पड़ने से उसका योनि प्रदेश कुछ और ज़्यादा ही फूल गया. उस पर नज़र गड़ाते हुए युसुफ बोला.

युसुफ - उसके लिए हम किसी भी इम्तिहान से गुजरने को तैयार हैं.. बोलो क्या करना होगा??

उसकी बात पर मन ही मन मुस्कराकर लीना ने अपनी मेड को आवाज़ दी – लूसी… ज़रा दो चाय लाना… साथ में कुछ स्नैक्स भी…

चाय पीते हुए लीना ने कहा – मैं तुम लोगों को दो पैकेट दूँगी, जिन्हें तुम्हें, हिना बार एंड क्लब के मालिक, अब्बास अली को उसके ठिकाने पर पहुँचना है और उससे 10 लाख लेकर आने हैं. याद रखना, वो थोड़ा टेढ़ा आदमी है. अब तुम जानो ये काम कैसे करना है… अगर तुम ये पैकेट उसे देकर पेमेंट ले आए तो उसमें से 10% यानी 1 लाख तुम दोनों का इनाम.

अब तक शांत बैठा संजू बोला – टेढ़े के लिए हम भी टेढ़े हैं… उसकी आप चिंता मत करो… बस आप अपना प्रॉमिस याद रखना.

लीना – हां.. हां.. क्यों नहीं.. चाहो तो उसमें से 1 लाख अपने निकाल कर ही देना मुझे..

संजू – मैं पैसे की बात नहीं कर रहा… जो आपने कुछ देर पहले वादा किया था.. स्पेशल इनाम का हमारे लौटने के बाद..

लीना खिलखिलाकर हँसते हुए बोली – आई.. शाबाश.. तो संजू शिंदे को भी वो गिफ्ट चाहिए… चलो तुम भी क्या याद करोगे… किस रईस से पाला पड़ा है, तुम दोनों की तमन्ना ज़रूर पूरी की जाएगी… तुम्हारे आज के इम्तिहान में सफल होने की ख़ुशी में मेरी तरफ से एक स्पेशल पार्टी तय. जो खाना चाहो, पीना चाहो और जो भी.. आज रात लूसी भी हमारे जश्न में शामिल होगी…

लीना ने लूसी की मोटी गान्ड दबाते हुए कहा – क्यों लूसी तुम्हें तो कोई प्राब्लम नहीं??

लूसी - आईईई मैडम.. जैसा आप कहो…

इतना कहकर लूसी अपनी गान्ड सहलाते हुए वहाँ से अपनी गान्ड हिलाती हुई किचन में भाग गयी. चाय नाश्ते के बाद उन दोनों ने लीना से पैकेट लिए और विदा लेकर उसके फ्लैट से निकल लिए.

बाहर आकर संजू ने कहा – युसुफ भाई देखो तो सही ऐसा क्या इन पैकेट में जिसकी कीमत 10 लाख रुपये है.

युसुफ – अरे यार तू रहेगा पक्का भोंदू ही… अब क्लब वाले को सोना या हीरे मोटी तो भेजेगी नहीं. कुछ ना कुछ नशे-पत्ते की ही चीज़ होगी.. चल देखते हैं… इसको कैसे निपटाना है और सुन, जब तक कोई ऐसी वैसी प्राब्लम खड़ी ना हो तब तक भड़कने का नहीं. समझा… मौके के हिसाब से काम लेना है हमें. याद रहे ये अपना पहला ऐसा काम है जिसमें अच्छा ख़ासा धन के साथ-साथ दो-दो मस्त जवानियाँ भोगने को मिलने वाली हैं. इसलिए किसी भी सूरत में हमें फेल नहीं होना है, बस थोड़ा अपने आप पर संयम रखना.. ओके??

संजू – अरे यार युसुफ भाई तुम इतना डरते काहे को हो.. चलो देखते हैं क्या हालत बनते हैं वैसा ही करेंगे.. आप फिकर मत करो. सब ठीक ही होगा.

युसुफ – खुदा करे सब ठीक ही हो…

इस तरह बातें करते हुए वो दोनों निकल पड़े अपनी मंज़िल की ओर. हिना बार एंड क्लब, मुंबई की घनी आबादी के बीच, दिन छिपते ही यहाँ नशेडियों की भीड़ जमा होने लगती है. अभी दिन छिपने में देरी थी इस वजह से बार अभी लगभग खाली ही था. इक्का-दुक्का ग्राहक शांति से अपनी टेबल पर बैठा था. युसुफ और संजू सीधे रिसेप्शन काउंटर पर पहुँचे.

काउंटर पर बैठे आदमी ने उनसे सवाल किया – बोलो क्या चाहिए?

युसुफ – हमें अब्बास भाई से मिलना है.

वो – काहे कू?

युसुफ अपने हाथों में दबे पैकेट की तरफ इशारा करते हुए – ये पैकेट उनको देने का है.

वो – क्या है इनमें?

संजू – ओए सयाने.. ज्यास्ती सवाल जवाब नहीं करने का… उसकू बोल… दो लोग मिलने को आए हैं. लीना मैडम ने पैकेट भेजेला है… वो समझ जाएँगा..

वो अकड़ कर बोला – ओए लौन्डे… इधर ज्यास्ती नहीं बोलने का.. समझा क्या?? वरना बाद में पछताने का भी समय नहीं मिलता.

युसुफ ने बीच में कूदते हुए कहा – जाने दे भाई, छोकरा नादान है. तुम अब्बास भाई को हमारे आने की खबर दो.

वो संजू की तरफ खा जाने वाली नज़र से घूरते हुए बोला – चल ठीक है. तुम इधेर एच खड़ा रहने का, मैं अभी बोलके आता.

कोई दो मिनट बाद ही वो एक दरवाजे के पीछे से निकल कर आते ही बोला – जाओ तुम लोग, भाई अंदर ही बैठेला है और सुनो, तुम लोग के पास कोई हथियार तो नहीं?

युसुफ ने ना में गर्दन हिलाई और संजू का हाथ पकड़ कर उस बंद दरवाजे की तरफ बढ़ गया. रास्ते में. तू तो आते ही शुरू हो गया… किसी दिन बेमौत मरवाएगा. युसुफ ने उसे समझाते हुए कहा.

अभी संजू कोई जवाब देने ही वाला था कि तभी वो दोनों दरवाजे के उसपार जा पहुँचे. अंदर एक ऑफिस नुमा कमरा था जहाँ एक सोफे के आगे एक टेबल था, साथ में दो चेयर पड़ी थी. सोफे पर एक मध्यम कद काठी का पक्के रंग वाला उमर कोई 40 साल जिसके नाक के पास एक चाकू का निशान था, लाल-लाल आँखों वाला व्यक्ति जो शायद अब्बास ही था. लगभग पूरे सोफे पर पसरा हुआ बैठा था. साथ की चेयर पर दो और लोग भी थे, जो शायद उसके खास चमचे होंगे.

उन दोनों को देखते ही अब्बास बोला – आओ रे तुम लोग… बैठो.. क्या लोगे? व्हिस्की, रम या देशी??

युसुफ ने आगे बढ़कर उसे सलाम बोला और जाकर उसकी बगल में बैठते हुए बोला – नहीं भाई इस टेम हम लोग कुछ नहीं लेते. ये पैकेट भेजे हैं लीना मैडम ने आपको देने के वास्ते.

अब्बास पैकेट टेबल पर रखवा कर बोला – माल तो अच्छा है कि नहीं?

युसुफ – हमें नहीं पता भाई… आप खुद ही चेक कर लो.

अब्बास एक आदमी की तरफ इशारा करते हुए बोला – देख अहमद एक पैकेट खोल के चेक कर.. माल अच्छा होएंगा तभीच लेगा अपुन. वरना और बहुत हैं देने वाले..

अहमद ने चाकू की नोक से पैकेट की सील तोड़ी, जिसमें सफेद पाउडर की थैलियाँ भरी हुई थी, उनमें से एक थैली निकाल कर उसको खोला. थोड़ा सा पाउडर एक 1000 के नोट पर रख कर उसने उसे सूँघा.

अहमद - माल तो कड़क है भाई.. लगता है इंपोर्टेड है…

इतना कहकर उसने वो नोट अब्बास को थमा दिया. उसने भी चेक किया और बोला - सही बोला तू… इंपोर्टेड है. लीना साली जैसी खुद कड़क है वैसाइच माल रखती है… चल ठीक है.. वो ड्रावर से 5 गड्डी निकाल कर ये छोकरा लोग को दे दे.

युसुफ – 5 गड्डी मतलब?

अब्बास – 5 पेटी… बोले तो 5 लाख…

युसुफ – लेकिन मैडम तो 10 लाख बोली लाने को..

अब्बास – आए सयाने… 5 लाख बोला तो 5 लाख… एक पैसा ज्यास्ती नहीं… ये पकड़ और कट ले इधर से.. वरना.. पैसे भी जाएँगे और माल भी.. बोल देना अपनी मैडम को.. इससे ज्यास्ती नहीं मिलेगा.

अब्बास की धमकी भरी बातें सुनकर युसुफ को होंठ खुश्क हो गये. उसके मुँह पर मानो ताला चिपक गया हो. लेकिन तभी संजू बोल पड़ा.

संजू - ये तो ग़लत बात है. 10 लाख का माल 5 लाख में कैसे दे सकते हैं? चलो युसुफ भाई माल उठाओ… चलते हैं यहाँ से..

इतना कहकर उसने एक पैकेट की तरफ हाथ बढ़ा दिया. इससे पहले की संजू पैकेट से हाथ लगा पाता कि बाजू में खड़े अहमद ने उसकी कलाई थाम ली. उसे मजबूती से पकड़ कर बोला – शेर के मुँह से गोश्त निकालना चाहता है लौन्डे.

अब तक युसुफ भी अपनी जगह से खड़ा हो चुका था. वो बात संभालने के लिए बीच में कुछ बोलना चाहता था. लेकिन संजू को इतना कहाँ सहन होना था. बिना अंजाम की परवाह किए उसने उलटे हाथ का मुक्का अहमद की नाक पर दे मारा. मानो कोई हथौड़ा पड़ा हो उसकी नाक पर, उसके सिर के चारों ओर चिड़ियाँ सी चहकने लगी. वो अपने होश ठिकाने नहीं रख पाया बेचारा. नाक से खून की धार निकल पड़ी, उसकी कलाई छोड़कर वो पीछे को उलट गया. अपने एक साथी को गिरते देख अब्बास अपनी जगह से उठना ही चाहता था कि उसे युसुफ ने दबोच लिया. वो दोनों सोफे पर ही गुत्थमगुत्था हो गये. दूसरा बंदा जो अभी तक चेयर पर ही बैठा था, फ़ौरन उठ खड़ा ही नहीं हुआ. वो संजू की तरफ लपका. झपट कर उसने पीछे से संजू के गले में अपनी बाजू लपेट दी.

गर्दन पर दबाव डालते हुए बोला – बहुत उछल -कूद कर रहा है साले… अब देख कैसे बच के जाएगा यहाँ से.

संजू को अपने गले की नसें दबने लगी. उसने उस बंदे को पीछे धकेलना शुरू किया. गर्दन पर उसका दबाव पल-प्रति पल बढ़ रहा था. पूरा दम-खम लगाकर संजू ने उसे टीवी शो केस पर ले जाकर अपनी पीठ का भार देकर दबा दिया. शो केस का एक कोना उसकी पीठ में लगा. दर्द से वो बिल-बिला उठा और उसके बाजू की पकड़ संजू के गले पर ढीली पड़ गयी. मौके का फ़ायदा उठाकर उसने अपने आप को आज़ाद किया. पलट कर अपने घुटने का भरपूर बार उसके पेट पर किया. दर्द से वो आगे को दोहरा हो गया. ऊपर से संजू का मुक्का उसकी गर्दन पर पड़ा. मुक्का पड़ते ही वो ज़मीन पर मुँह के बल गिर पड़ा. अब उसमें जल्दी से उठ पाने की शक्ति नहीं थी. उधर युसुफ अब्बास के मुकाबले कमजोर पड़ रहा था. नीचे से अब्बास ने अपने घुटने मोड़ कर उसे ऊपर उठने पर मजबूर कर दिया. अभी भी वो दोनों एक दूसरे का गला दबा रहे थे. युसुफ के थोड़ा ऊपर होते ही, अब्बास ने उसे पैरों पर उठाकर एक ओर को उछाल दिया. फुर्ती से अपनी गन निकाली और उसे संजू पर तान दिया. अब्बास उसके बेहद नज़दीक पहुँचकर गुर्राया - बहुत बड़ा काम कर गया तू लौन्डे. मेरे ही अड्डे पर मेरे ही आदमियों पर हाथ छोड़ दिया. अब तू तो गया हरामज़ादे.

संजू ठहरा ठेठ गँवार, मरने का उसे डर था ही नहीं. उसने फ़ौरन उसकी गन की नाल थाम ली. उसे अपने माथे से सटाते हुए बोला – चल मार साले चला गोली.

उसकी ये अप्रत्याशित डेरिंग देखकर एक बारगी अब्बास जैसे गुंडे की हवा सरक गयी. लेकिन अगले ही पल अपने को संभालते हुए उसने अपनी गन का लॉक खोला. इससे पहले कि वो उसका घोड़ा दबा पाता, संजू ने झटके से उसके हाथ से गन छीन ली और उसे उसकी कनपटी पर टिकाते हुए बोला – अब तुझे मुझसे कौन बचाएगा साले हरामी??

पाँसा पलटे देख अब्बास की हवा सरक गयी, उसके चेहरे पर मौत की परछाइयाँ साफ-साफ दिखाई देने लगी, तभी युसुफ अपने शिकार से फारिग होकर बोला.

युसुफ – अब्बास… जल्दी से माल निकाल वरना ये लौंडा वाकई में एडा है. गोली चल गयी तो फिर तेरे को सोचने का वक़्त भी नहीं मिलेगा… जल्दी कर..

मरता क्या ना करता, उसने अहमद की तरफ इशारा किया. उसने ड्रावर से और 5 गड्डी निकाल कर टेबल पर रख दी. पूरे 10 लाख अपनी कमीज़ में ठूँसकर युसुफ ने संजू को निकलने का इशारा किया.

संजू – ये दोनों पैकेट भी उठा लो युसुफ भाई… अब इस भोसड़ी वाले को ढंग से सबक सिखाना है..

युसुफ - ये तू कैसी बात कर रहा है?

संजू – मैंने कहा एक पैकेट उठाओ जल्दी….

इतना कहकर गन अब्बास की कनपटी से सटाये हुए ही उसने एक पैकेट अपने कब्ज़े में ले लिया… ना चाहते हुए भी दूसरा पैकेट युसुफ को उठाना पड़ा.

संजू - चल अब हमें गेट तक छोड़कर आ मादरचोद… और याद रखना आज के बाद हरेक को एक ही लाठी से हांकने की भूल कभी मत करना… चल..

नाल का दबाव बढ़ाते हुए वो उसे दरवाजे तक ले गया. युसुफ को पहले बाहर करके उसने अपना पैकेट भी उसे थमाया, एक जोरदार किक अब्बास की टाँगों के बीच जमकर वो फुर्ती से बाहर निकल गया. टाँगों के जोड़ पर संजू की भरपूर ठोकर खाकर अब्बास पीछे को उलट गया. उनके पीछे आ रहे अहमद के ऊपर जाकर वो गिरा. दोनों आपस में ही उलझ कर रह गये इतने में संजू ने बाहर से दरवाजे को लॉक कर दिया. बिना एक पल गँवाए वो दोनों आँधी तूफान की तरह उसके क्लब से बाहर निकल गये.!!!!

बाहर आते ही मैं सड़क से हटकर उन्होंने गलियों का रास्ता लिया. वहाँ से तकरीबन 2 किमी भागने के बाद दोनों ने एक टैक्सी को हाथ दिया. टैक्सी में बैठते ही युसुफ ने एक बार पीछे मुड़कर देखा, फिर राहत की साँस लेकर बोला, बच गये यार वरना आज तो मर ही जाते.

संजू ने बिना देखे ही कहा – क्यों?? तुम्हें ऐसा क्यों लगा?

युसुफ – तू भी यार कमाल करता है. बिना सोचे समझे हाथ पैर चलाने लगता है. ये तो सोच वो उनका अड्डा था… यार..

संजू के चेहरे पर इस समय भी कोई भाव नहीं थे. बस थोड़ी साँसें उखड़ी हुई थी. भागने के कारण, लंबी साँस लेकर बोला – और इसके अलावा कोई चारा था तुम्हारे पास? या तो 5 लाख में माल देकर चुप-चाप लौट आते और उन्हें लेकर चंपत होना पड़ता. क्योंकि लीना मैडम कभी भी ये नहीं समझती कि हमारे सामने क्या परिस्थिति थी और वैसे भी उसने हमें कहा ही था कि अब्बास थोड़ा टेढ़ा आदमी है, इसलिए तो उसने हमारा इम्तिहान लिया है. आसान होता तो वो अपने किसी भी आदमी से डिलीवरी करा ही देती.

युसुफ बात की गहराई को समझते हुए बोला – शायद तू ठीक कह रहा है दोस्त.. लेकिन मैं चाहता था कि बातों से ही काम बन जाए.. पर चलो.. अंत भला तो सब भला.. अब इस माल का क्या करें?? क्योंकि मैडम के माल के पैसे तो हम लोग ले ही आए.

संजू – पहले ये डिसाइड करो, कि हमें उसके साथ लंबे समय तक काम करना है या बस अभी तक के लिए ही है?? अगर अभी तक का ही विचार है तो उसके पास जाने की हमें कोई ज़रूरत नहीं है. 10 लाख कैश हैं और 5-10 लाख में इस माल को भी कोई भी ले लेगा.

युसुफ – मेरे ख्याल से सोने के अंडे देने वाली मुर्गी को एक साथ हलाल नहीं करना चाहिए. चलो… चलकर उसे सारी बातें साफ-साफ बता देते हैं.. आगे उसकी मर्ज़ी..
 

aidenabhishek

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UPDATE 79

कुछ देर में ही वो उसकी बिल्डिंग के पास पहुँच गये. अभी रात के 9 बजे थे, टैक्सी का पेमेंट करके लिफ्ट से ऊपर पहुँचे. उनके हाथों में दोनों पैकेट देख कर…

लीना – क्या हुआ? सौदा नहीं बना?? मुझे पता था वो टेढ़ा आदमी है. चलो कोई ना… कम से कम माल सही सलामत वापस ले आए यही बहुत है.

उसकी बात पर वो दोनों मंद-मंद मुस्कराने लगे.

लीना – क्या बात है, तुम लोग इस तरह मुस्करा क्यों रहे हो??

तभी युसुफ ने अपनी ढीली ढाली कमीज़ से गड्डी निकालनी शुरू की. पूरी 10 गड्डी उसके हाथ में रखते हुए बोला – उस टेढ़े को सीधा कर दिया इसने.

लीना – क्या मतलब?

फिर उसने सारी बातें उसे डीटेल में सुनाई. वो विस्मय के साथ सब सुनती रही, फिर कुछ देर मौन रहने के बाद अचानक से लीना संजू के ऊपर झपट पड़ी. वो वहीं सोफे पर लुढ़क गया. लीना खुद उसके ऊपर सवार होकर उसके चेहरे को अपने दोनों हाथों में जकड़ा और दे दनादन उसके चेहरे पर चुंबनों की बौछार कर दी. संजू बस भौचक्का देखता रह गया, वहीं युसुफ की नज़र उसकी गोल-मटोल थिरकती गान्ड की दरार में जा अटकी. लीना के गोल-गोल मोटे-मोटे कड़क बूब्स संजू की छाती से दब गये. चूत की गर्मी पाकर उसका अब तक सोया पड़ा लन्ड उसके पैंट में अंगड़ाई लेने लगा. संजू ने भी अपने दोनों हाथ लीना की मुलायम गान्ड पर कस दिए और लीना की चूत को अपने लन्ड के ऊपर दबा दिया. कुछ देर चूमने के बाद लीना संजू के ऊपर से उठ गयी. संजू को मज़ा आना शुरू ही हुआ था..

लीना का हाथ पकड़कर संजू बोला – क्या हुआ मैडम?? उठ क्यों गयी?? थोड़ा और करो ना, मज़ा आ रहा है.

लीना मुस्करा कर संजू के लन्ड को दबाते हुए बोली – डोंट वरी… आज तुम्हारी सारी तमन्नाएँ पूरी होंगी मेरे शेर… आज से पहले मुझे तुम्हारे जैसा शेरदिल आदमी कभी नहीं मिला.. मैं तुम्हें मरते दम तक खोना नहीं चाहूँगी. पहले जीत का जश्न पीने पिलाने से शुरू करते हैं.

फिर लीना ने लूसी को आवाज़ दी – लूसी… पार्टी का इंतज़ाम करो…

कुछ देर बाद लूसी ट्रे में एक स्कॉच की बॉटल, चार ग्लास और कुछ स्नैक्स सुखी तली हुई मेवा के साथ लाती हुई दिखी. लूसी को देख कर युसुफ की आँखें चौड़ी हो गयी. जापानी पॉलिएस्टर की फक्क सफेद टाइट शर्ट जिसके दो बटन खुले हुए. बिना ब्रा के उसकी एक दम कड़क दूध जैसी गोरी बूब्स की अंदर साइड शर्ट के खुले बटन्स से नुमाया हो रही थी. नीचे उसने लाल चौखाने की इतनी छोटी सी स्कर्ट पहन रखी थी चलते में उसकी गान्ड की गोलाईयों की छटा भी कभी कभार दिखाई दे जाती थी. लूसी जैसे ही आकर टेबल पर समान सजाने के लिए झुकी, पीछे से उसकी आधी गान्ड उजागर हो गयी. युसुफ ने उसके पीछे आकर उसके मटके जैसे चुतड़ों पर हाथ फिराते हुए कहा.

युसुफ - हाय लूसी… क्या मस्त गान्ड है तेरी.. जी कर रहा है, चूम लूँ इसे…

मना किसने किया है युसुफ मियाँ, आज की रात हम दोनों ही तुम्हारे लिए हैं., जैसे चाहो, जहाँ चाहो पटक-पटक कर खूब रस निचोड़ो.. हँसते हुए लीना बोली

सच… सच में… मैडम… थैंक यू… कहकर युसुफ ने लूसी की गान्ड के पीछे बैठकर सच में ही उसकी गोरी-गोरी, खूब उभरी हुई गान्ड की गोलाईयों को बारी-बारी से चूम लिया. लूसी आगे को और झुक गयी, तो युसुफ ने उसकी माइक्रो पैंटी की डोरी को गान्ड के छेद से एक तरफ किया और उसकी गान्ड के कथई छेद को अपनी जीभ की नोक से चाट लिया.

सस्सिईईईई… आअहह… लूसी अपनी गान्ड को उसके मुँह पर दबाते हुए सिसकी.

इतना कामुक नज़ारा देख कर संजू अपनी जगह से उठा और उसने लूसी की शर्ट के पल्लों को पकड़ कर एक दूसरे के विपरीत दिशा में खींच डाला. चत्टार्ररर.. चत्टाररर.. की आवाज़ के साथ उसकी शर्ट के सारे बटन खुल गये. लूसी की 34” की एकदम गोल-मटोल बूब्स हवा में लहरा उठी. दो बड़े-बड़े लट्टू जैसे उसके स्तन, जिनके निप्पल अभी किशमिश के दाने जैसे ही थे, कड़क होने लगे.

लीना ग्लास में स्कॉच डालते हुए बोली – तुम दोनों को तो बिना पीए ही लूसी की जवानी का नशा चढ़ने लगा… पीने के बाद कैसे होश रख पाओगे…

संजू लीना का टॉप उतारकर एक तरफ फेंकते हुए बोला – कौन आज होश में रहना चाहता है मैडम जी…

बोलते हुए उसने लीना की ब्रा के स्ट्रैप भी उधेड़ दिए. अब दोनों ही घोड़ियाँ ऊपर से एकदम नंगी थी. दोनों मर्दों की नज़र दोनों की जवानियों पर फिसल रही थी. ये फ़ैसला करना मुश्किल पड़ रहा था की दोनों में से किसकी बूब्स ज़्यादा सुंदर और सुडौल हैं?? फिर दोनों मर्दों ने अपने-अपने कपड़े भी निकाल दिए मात्र अंडरवियर में आकर जहाँ संजू ने लीना को अपनी गोद में बिठाया और युसुफ ने लूसी को. दोनों हसीनाओं ने टेबल से पेग उठाकर उन्हें थमाए, फिर एक-एक पेग खुद लेकर चारों ने आपस में जाम टकराकर चियर्स बोला और सिप करते हुए एक दूसरे की जवानियों से खेलने लगे. जब शाम की शुरुआत ऐसी हो तो रात कैसी होगी ये कहने की ज़रूरत नहीं है. चारों ने मिलकर उस रात को इतना रंगीन बना दिया कि उनकी काम लीला देख कर इन्द्रलोक में बैठे देवराज इन्द्र को भी इनसे जलन होने लगी होगी. दो-दो पेग लेने तक वो चारों बुरी तरह से उत्तेजित हो चुके थे, तो पहला राउंड संजू और लीना का रहा वहीं युसुफ ने लूसी को अलटा-पलटा कर खूब चोदा. उसके बाद एक-एक पेग उन्होंने खाने के साथ लिया, फ्रेश हुए और फिर से चुदाई का दौर चल पड़ा. इस बार संजू ने अपना कड़क 8” का खूँटा लूसी की चूत में डाला और युसुफ ने लीना की जमकर चुदाई की.

लीना की चूत में लन्ड पेलते हुए युसुफ ने कहा – मैडम आपको तो पता ही है, मेरा परिवार गांव में गुरबत में जी रहा है… आप कहो तो एक चक्कर मार आऊँ..

लीना अपनी गान्ड पीछे को धकेलते जुए बोली – चले जाना… पहले कुछ दिन यहाँ रहकर तुम लोग धंधे के उसूलों को अच्छे से समझ लो, फिर तुम्हारे लिए मैंने एक प्लान सोचा है…

पूरा लन्ड लीना की चूत में पेलकर युसुफ ने कहा – क्या प्लान है आपका?

लीना – हाए.. पहले मेरी चूत की प्यास बुझाओ… फिर बताती हूँ…

ये कहकर लीना ने युसुफ की गान्ड दबाकर उसे अपनी चूत पर कस कर दबाया. अपनी चूत की फांकों को कसकर दबाते हुए वो भलभलाकर झड़ने लगी और युसुफ को भी पूरी तरह निचोड़ लिया. उधर लूसी भी पूरी चुद्दकड़ लड़की निकली. इतनी कम उम्र में भी उसे चुदाई की सारी ट्रिक पता थी, कैसे किसी मर्द को उकसाया जाता है… अपनी मादक आहों से वो संजू को और उत्तेजित करती रही जिससे उसने अपना पूरी दम लगाकर लूसी की चूत की चुदाई की. इस तरह वो चारों रात भर चुदाई अभियान में बढ़-चढ़कर अपना-अपना झंडा गाढ़ने की कोशिश करते रहे. जहाँ दोनों मर्द अपनी तरफ से कोशिश कर रहे थे की वो इन दोनों रंडियों से पानी मंगवा देंगे. संजू तो फिर भी टक्कर लेता रहा. लेकिन युसुफ मियाँ की हिम्मत जवाब दे गयी. उसे मानना ही पड़ा कि औरत की चूत की थाह लेना हर किसी के बस की बात नहीं.

दूसरी सुबह उन चारों में से किसी की आँख खुलने का नाम नहीं ले रही थी.

लेकिन कोई 11 बजे लीना के मोबाइल की बेल ने उसे उठने पर मजबूर कर ही दिया. फोन अब्बास का था, शुरू-शुरू में कुछ उसने अकड़ दिखाई लेकिन लीना के धमकाने पर वो लाइन पर आ गया और अपने माल के लिए गुहार करने लगा.

लीना – देखो अब्बास मियाँ… मैं अपना धंधा पूरी ईमानदारी से कर रही हूँ. माल में कोई खोट हो तो फ्री, लेकिन अगर कोई मेरे पैसे खाने की कोशिश करेगा तो वो ठीक नहीं. मैंने तो अब तक तुम्हारी साख की वजह से ही कोई डील नहीं की, लेकिन जब मुझे तुमसे भी ज़्यादा येड़ा लड़का मिल गया तो तुम्हारा ऑफर मान लिया. अब उसने तुम्हारी गेम बजा डाली तो अब इतना फड़फड़ाने की क्या ज़रूरत है? पूरी ईमानदारी से धंधा करो… मैं तैयार हूँ… अपना आदमी आज शाम जुहू बीच पर भेज देना, तुम्हारा माल तुम्हें मिल जाएगा…

दो हफ्ते यूँ ही मौज मस्ती में निकल गये. दिनों दिन युसुफ लेन-देन के मामले में माहिर होने लगा. वहीं संजू गन वगैरह चलाना सीख कर और ज़्यादा शातिर हो गया.

एक दिन मस्ती करते हुए लीना बोली – युसुफ कहाँ है तुम्हारा गांव??

युसुफ – मैडम आपने अली** शहर तो देखा होगा, उससे कोई 25 किमी दूर है.

लीना – तो गांव जाकर अभी क्या करने वाले हो?

युसुफ – मैं चाहता हूँ, बुढ़ापे में अम्मी-अब्बू को कुछ आराम दे सकूँ. बहनों का निकाह हो जाए, अच्छा घर उन्हें बनवा के दे सकूँ और ग़रीब की क्या ज़रूरतें होती हैं.

लीना – गांव में तुम्हारी कोई खेतीबाड़ी भी है क्या?

युसुफ – अरे कहाँ मैडम जी… खेतीबाड़ी होती तो मैं यहाँ मुंबई में खाक छानने क्यों आता…

लीना – मेरे दिमाग़ में एक प्लान है… क्यों ना तुम अपने परिवार को उसी शहर में शिफ्ट कर लो. एक घर ले कर दे दो उनको और एक अच्छी सी गुप्त जगह तलाश करके अपना धंधा वहाँ फैलाने की कोशिश करो.

युसुफ – ये तो बहुत उम्दा प्लान बनाया है आपने मैडम. अगर संजू साथ दे तो वहाँ तो अपना धंधा और जल्दी ही फैलने फूलने लग जाएगा.

लीना – क्यों संजू… क्या कहते हो? जाना चाहोगे युसुफ भाई के साथ?

संजू – मेरा क्या है, कहीं भी आ जा सकता हूँ… मेरे कौन आगे पीछे है देखने वाला??

लीना दोनों को नये मोबाइल सेट देते हुए बोली – ये लो तुम दोनों के लिए अलग-अलग मोबाइल, दोनों में हम तीनों के नंबर फीड किए हुए. जब भी बात करनी हो कभी भी एक दूसरे से जब चाहे बात कर सकते हैं. तो फिर तय रहा, तुम लोग कल ही निकल जाओ. शहर में अपने लिए अच्छा सा घर देख लो, धंधे के लिए जगह तलाश करो. कुछ माल लेते जाना, जिससे अपना काम शुरू करने की कोशिश कर देना. खतम होने पर बस कॉल कर देना दूसरे दिन जितना चाहिए उतना माल तुम्हें मिल जाएगा.

जैसा कि पहले बताया जा चुका है, युसुफ के गांव में बुड्ढे माँ-बाप तीन कुँवारी बहनें थी. सबसे बड़ी एक बहन का निकाह हो चुका था जो उससे जस्ट छोटी थी. दूसरे नंबर की वहीदा भी अब तक 26-27 साल की हो चुकी थी. उससे छोटी रेहाना उससे दो साल छोटी माने 24-25 की और सबसे छोटी रुखसाना भी अब 22 साल की हो चुकी थी. युसुफ के अब्बू टेलरिंग का काम करते थे, लेकिन आज के जमाने में गांव में भी अब कौन सिलवाकर कपड़े पहनता है, कभी कभार कोई बड़ा-बुड्ढ़ा या फिर कोई ग़रीब आदमी कपड़े सिलवाने आ जाता था.

हां औरतें ज़रूर ब्लाउज पेटीकोट सिलवाती थी. जिसे वहीदा और कभी-कभी उसकी अम्मी सिल कर दे देती थी. जिनकी सिलवाने की कीमत भी गांव में लोग बड़ी मुश्किल से देते वो भी आज-कल करके काफ़ी लटकाने के बाद. बड़ी मुश्किल से दो वक़्त की रोटियों का गुज़ारा हो पाता था. कभी-कभी लड़कियों को जंगल से लकड़ियाँ काट कर लाना पड़ता, एक-दो बकरी पाल रखी थी उनसे कुछ आमदनी हो जाती. कुल-मिलाकर बस दिन किसी तरह निकल ही रहे थे. उसके बूढ़े अब्बू शहज़ाद ख़ान की कमर झुक गयी थी. वक़्त की मार ने वक़्त से पहले ही बूढ़ा बना दिया था. वरना इस उमर में शहर में लोग अधेड़ उम्र में गिने जाते हैं.

युसुफ और संजू सीधे घर ना जाकर शहर में पहले उन्होंने अपने लिए एक 5 कमरों का एक अच्छा सा घर खरीदा. फिर काफ़ी तलाश करने के बाद उन्हें एक उजाड़ पड़ी हवेली का पता चला वो भी वहाँ के कुछ बेरोज़गार युवकों की मदद से. जिसे उन्होंने अपने धंधे के लिए किराए पर लिया जो काफ़ी दिनों से विवादित थी, जिसपर कुछ दबंगों का कब्जा था, तो उन्होंने ही उसे लीज पर दे दिया. सबसे खास बात उस मकान की ये थी कि उसके नीचे एक गुप्त तहखाना भी था जो उन्हें अपने धंधे के लिए सबसे उपयुक्त लगा. कुछ बेरोज़गार युवकों को अपने साथ मिलाकर काम करने को तैयार भी कर लिया. इतना काम निपटाकर उन दोनों ने युसुफ के गांव का रुख़ किया.

गांव निकलने के लिए वो काफ़ी लेट हो गये थे. गांव की तरफ जाने वाले रोड पर आकर पता किया कि इस वक़्त क्या साधन मिल सकता था गाँव जाने के लिए. लेने को वो दोनों स्पेशल टैक्सी भी ले जा सकते थे लेकिन ये सब जताकर वो खामख्वाह इतनी जल्दी इस इलाक़े में अपने आप को उजागर नहीं करना चाहते थे. पता चला कि युसुफ के गांव तक के लिए प्राइवेट वहाँ जैसे तीन पहिए के टेंपो या फिर टाटा मॅजिक जैसे वहाँ ही मिल सकते हैं. काफ़ी देर के इंतजार के बाद वहाँ एक मॅजिक आकर रुकी. इलाक़े का नाम पुकार कर उसका क्लीनर पैसेंजर को बुलाने लगा.

युसुफ ने संजू का हाथ पकड़ा और पीछे से यू आकर वाली सीट पर सामने जाकर दोनों बैठ गये. युसुफ को अंदाज़ा था कि इसमें भीड़ होने वाली है, इसलिए वो उसे लेकर फ़ौरन जाकर सीट घेर कर बैठ गया. ये बात दो मिनट में ही सच साबित हो गयी. उनके देखते ही देखते गाड़ी लोगों से फुल हो गयी. सीटों की तो बात ही छोड़ो, लोग सीटों के बीच की खाली जगह में भी आकर खड़े होने लगे.

मॅजिक लोगों से खचाखच भर गया, यहाँ तक कि एक पैर रखने की जगह नहीं बची, तभी उसमें एक लड़की घुसी. लोगों ने उसे ज़बरदस्ती से अंदर ठूंस दिया. धीरे-धीरे एक-एक पैर जमाती हुई वो युसुफ और संजू जहाँ बैठे थे वहाँ तक पहुँच गयी. इधर उधर मंडी घुमाने तक की गुंजाइश नहीं थी. चूँकि भीड़ के कारण अंदर अंधेरा सा हो गया था, कुछ भी साफ-साफ दिखाई नहीं दे रहा था. वो लड़की झुकी हुई अपने लिए टिकने लायक जगह तलाश कर रही थी कि किसी तरह वो अपने चूतड़ टिका सके. तभी उसकी नज़र युसुफ पर पड़ी. मानो उसे कोई खजाना मिल गया हो.

चहकते हुए बोली – अरे भाई जान आप…. गांव जा रहे हो???

युसुफ उसकी तरफ गौर से देखने लगा.

वो फिर बोली – अरे पहचाना नहीं?? मैं नन्ही… आपकी बहन रेहाना की दोस्त…

युसुफ ने उसे पहचानते हुए कहा – ओह… तू नन्ही है… मेरी तो पहचान में ही नहीं आई. तू तो काफ़ी बड़ी हो गयी है… गांव जा रही है??

नन्ही – हन भाई जान, पर इस गाड़ी में लगता है पैर रखने की भी जगह नहीं बची. फिर वो संजू की तरफ इशारा करके बोली – ये भाई भी आपके साथ हैं क्या??

युसुफ ने जैसे ही हां में गर्दन हिलाई, वो फ़ौरन बोल पड़ी – तो फिर दोनों मिलकर मेरे लिए थोड़ी जगह बनाओ ना. झुके-झुके गांव तक कमर ही दुखने लगेगी… मेरी..

युसुफ ने संजू की तरफ देखा. दोनों ने एक नाकाम कोशिश की दोनों के बीच जगह बनाने की लेकिन एक इंच जगह भी नहीं कर पाए.

बहुत मुश्किल है नन्ही… बोल अब कैसे करें?? युसुफ अपनी असमर्थता जताते हुए बोला.

नन्ही – कोई बात नहीं.. कुछ देर की ही तो बात है.. जैसे बचपन में आप मुझे गोद में बिठा लेते थे, वैसे ही अब बैठ जाऊंगी.

इतना कहकर उसने उसकी रज़ामंदी का भी इंतजार नहीं किया और झट से अपनी गुदगुदी 34” चौड़ी गान्ड रखकर युसुफ की गोद में बैठ गयी. उसके बैठते ही युसुफ की हवा सरक गयी. उसे ये अंदाज़ा भी नहीं था कि ये लड़की इतनी बिंदास निकलेगी कि भरी गाड़ी में उसकी गोद में ही आकर बैठ जाएगी. लेकिन नन्ही की भी अपनी मजबूरी थी. एक घंटा से भी ज़्यादा का रास्ता वो यूं झुके-झुके नहीं काट सकती थी. ऊपर से सही से पैर जमाने की गुंजाइश भी नहीं थी. युसुफ की टाँगों को उसका वजन झेलना मुश्किल पड़ रहा था. उसकी हालत का मज़ा लेते हुए संजू मन ही मन मुस्करा रहा था. आख़िर में युसुफ को बोलना ही पड़ा.

युसुफ – नन्ही.. तू तो बहुत भारी हो गयी है. मेरी तो टाँगें अभी से दुखने लगी.

नन्ही उसे उलाहना सा देते हुए बोली – भाई जान… कैसे मर्द हो… एक लड़की का वजन भी नहीं झेल सकते. चलो फिर मैं एक काम करती हूँ, अपना आधा वजन इस भाई पर रख लूँ?

युसुफ – हां ये ठीक रहेगा… चल तू अपने पैर संजू की तरफ कर ले और आधा वजन मेरी जांघों पर आ जाएगा, आधा संजू की…

संजू उनके बीच पाक रही खिचड़ी से कतई सहमत नज़र नहीं आया. लेकिन कहता भी क्या. उसके दोस्त के गांव की लड़की के सामने वो मना भी नहीं कर पाया. जैसे तय हुआ अब नन्ही वैसे ही अपनी जांघों का आधा भार संजू की टाँगों पर रख कर एक तरह से उन दोनों की गोद में अधलेटी सी हो गयी. उसकी मुलायम रूई जैसी गद्दार गान्ड की गर्मी से युसुफ का लन्ड उसके पैंट में अकड़ने लगा, जिसका उभार नन्ही को अपने एक कूल्हे पर हो रहा था.

उसने युसुफ की तरफ देखा, दोनों की नज़र मिलते ही दोनों मुस्करा उठे. नन्ही ने लज्जा वश अपनी नज़र झुका ली. दूसरी तरफ उसकी एक जाँघ संजू के लौड़े से सटी हुई थी, नतीजा जाँघ के मांसल दबाव से उसका लन्ड भी करवट बदलने लगा. गान्ड और जाँघ पर अलग-अलग दो लन्ड की चुभन के एहसास ने नन्ही की साँसों को गरमा दिया. गाड़ी चलते ही हिचकोलों ने और आग में घी डालने का काम कर दिया.

अब युसुफ के हाथ भी हरकत करने लगे. युसुफ ने अपना एक हाथ नन्ही के चिकने पेट पर फिराना शुरू कर दिया. नन्ही बिना नज़र मिलाए आनंद लूट रही थी. फिर जैसे ही युसुफ का हाथ नन्ही की मांसल हल्की सी गहरी नाभि पर पहुँचा, युसुफ की उंगलियाँ नाभि के आस-पास के क्षेत्र को सहलाने लगी. लेकिन जब युसुफ ने अपनी एक उंगली नन्ही के नाभि कुंड में प्रवेश कराया, नन्ही की सहन शक्ति जवाब दे गयी. गुदगुदी के मारे नन्ही का पेट थिरकने लगा. हल्के से हँसते हुए नन्ही ने अपना हाथ युसुफ के हाथ पर रख कर उसे रोकते हुए कहा.

नन्ही – क्या करते हो भाई जान… गुदगुदी हो रही है मुझे…

युसुफ ने नन्ही के कान में फुसफुसा कर कहा – तो तू ही बता मैं अपना हाथ कहाँ रखूं??

नन्ही ने एक बार अपनी वासना में लिपटी नज़र युसुफ पर डाली और कहा – और जहाँ भी रखना हो रखो, लेकिन यहाँ नहीं…

नन्ही की नाभि प्रदेश से अपना हाथ सरका कर युसुफ ने उसकी चोली पर रखते हुए कहा – यहाँ रख लूँ??

नन्ही का चेहरा शर्म और कामुकता से लाल हो गया, उसने बस इतना ही कहा – मुझे नहीं पता…

ये युसुफ के लिए खुला निमंत्रण था. वो कुछ देर तक अपने हाथ से नन्ही की मांसल चुचियों को सहलाता रहा. इधर संजू ने जब उनकी काम क्रीड़ा देखी, तो उसने भी पीछे रहना मुनासिब नहीं समझा और आहिस्ता से अपना एक हाथ नन्ही के घाघरे में डाल दिया और उसकी बालों रहित चिकनी पिंडलियों को सहलाने लगा. अब नन्ही पर दोहरी मार पड़ रही थी. मज़े में उसने अपनी आँखें मूंद ली और दोनों के स्पर्श का मज़ा लूटने लगी. धीरे-धीरे दोनों मर्दों की हरकतें बढ़ती ही जा रही थी. ऊपर युसुफ ने उसकी चोली के बटन खोल डाले, ऊपर से नन्ही ने अपना आँचल डालकर ढक लिया और वो दोनों हाथों से उसके गोल-गोल चुचियों को मसलने लगा. उधर संजू का हाथ अपनी मंज़िल की ओर बढ़ रहा था. कुछ देर उसकी पिंडलियों को सहलाने के बाद वो उसकी जाँघ तक पहुँच गया. नन्ही ने पहले तो अपनी टाँगें खोलकर हाथ को अंदर तक जाने का रास्ता दे दिया, फिर जैसे ही उसका हाथ उसकी योनि पर पहुँचा. नन्ही ने अपनी मांसल जांघों को कस लिया साथ ही उसके मुँह से दबी-दबी सी मादक सिसकी निकल गयी.

संजू ने दूसरे हाथ का इशारा देकर उसे टाँगें चौड़ी करने को कहा. नन्ही भी अब पूरा मज़ा लेने के मूड में थी, तो उसने अपनी जांघें फिर से खोल दी. संजू ने मौके का फ़ायदा उठा कर नन्ही की पैंटी को एक तरफ सरका दिया. नन्ही की चूत बुरी तरह से गीली हो चुकी थी, उसी गीलेपन के कारण संजू की एक उंगली उसकी चूत में अंदर तक सरक गयी. नन्ही ने बुरी तरह तड़प कर संजू के लन्ड को हाथ से मसल दिया. बेचारी दो मर्दों की हरकतों को झेलने में असमर्थ होती जा रही थी.
 
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Sanju aur yusuf ki harkate shandaar. Leena sayad Kamini hai jo bachkar bhag nikli Chor chorise jay sinajorise na jaye. Pratiksha agle rasprad update ki
 
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