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Incest Mera Pyara Devar - Ankush

aidenabhishek

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UPDATE 80

युसुफ उसकी चुचियों को मक्खन की तरह बिलो रहा था. कभी-कभी उसके कड़क बूब्स से खेलने लगता. तो वहीं संजू की उंगली उसकी चूत में हाहाकार मचाए हुए थी. नन्ही अपनी टाँगें फैलाकर नीचे से अपनी गान्ड उठा-उठाकर संजू की उंगली को और गहराई तक लेने का प्रयास करने लगी. नन्ही की गर्मी देख कर संजू भी बहुत गरम हो उठा, अपनी उंगलियों की मदद से उसने अपने पैंट की जिप खोल दी. लन्ड को बाहर करके नन्ही के हाथ में पकड़ा दिया. नन्ही की एक जाँघ लगातार संजू के लन्ड की वाट लगाए हुए थी, साथ ही वो अपने हाथ से भी उसकी मुट्ठी मारने लगी. उत्तेजना के चरम पर पहुँच कर संजू ने अपनी दो उंगली चूत की गहराईयों में उतार दी और तेज-तेज अंदर बाहर करके एक तरह से हाथ से ही उसे चोदने लगा.

उधर युसुफ ने भी गाड़ी के अंदर के अंधेरे का लाभ लेकर अपना लन्ड भी बाहर कर लिया. उसने नन्ही को अपनी तरफ पलटा कर अपना लन्ड उसके मुँह में दे दिया. ऐसे खेलों से अंजान होते हुए भी नन्ही वासना में अंधी हो चुकी थी. उसे ये भी होश नहीं था कि उसके मुँह में कब लन्ड घुस गया. नन्ही तो युसुफ के कटे हुए टोपे पर लगे नमकीन पानी को चाटते ही और ज़्यादा मदहोश हो गयी. लॉलीपॉप की तरह युसुफ के लन्ड को चाटने लगी. बिना आवाज़ किए ये तीनों बिना किसी की परवाह किए अपने-अपने कामों लगे थे.

युसुफ का लन्ड सबसे पहले जवाब दे गया, उसने नन्ही के गले तक अपनी पिचकारी छोड़ दी. इधर नन्ही भी अपने चरम पर थी. उसके पेट में क्या जा रहा है इस बात को नजरंदाज करके उसने बहुत तेज़ संजू के लन्ड को अपनी मुट्ठी में कस लिया. नन्ही अपनी गान्ड हवा में लहराकर भलभलाकर झड़ने लगी, उसके चूतरस से संजू का हाथ तर हो गया. लन्ड को कसकर दबाने से उसके लन्ड ने भी अपना लावा उगल दिया. लन्ड की सीधी पिचकारी नन्ही की जाँघ और चूत के मुँह पर पड़ी. गरम-गरम माल की बौछार अपनी चूत की फांकों पर पड़ते ही, झड़ी हुई नन्ही की आँखें मज़े से फिर मूंद गयी. मुँह में युसुफ के माल का स्वाद, हाथ, जाँघ, चूत संजू और खुद के पानी से लथपथ. जब तीनों को सुकून मिला तब होश आया.

संजू ने अपना हाथ चाटते हुए चटकारा सा लेकर बोला – नन्ही बड़ी नमकीन लौंडिया है यार..

संजू की बात सुनकर नन्ही बुरी तरह शरमा गयी. अपना लहँगा नीचे सरकाते हुए फुसफुसाई - मेरे घर आना आप दोनों.

अभी युसुफ कोई जवाब देता, मॅजिक झटके से रुक गया. धीरे-धीरे करके भीड़ खाली हुई, लास्ट में वो तीनों भी निकले.

नन्ही ने अपना थैला उठाया, नज़र झुकाए बोली – मैं इंतजार करूँगी… आना ज़रूर…

इतना कहकर वो किसी चंचल हिरनी की तरह कुलाँचें भरती हुई अपने घर की तरफ भाग गयी. पीछे से वो दोनों उसके लहंगे में थिरकती गान्ड को देखते हुए अपने-अपने लन्ड सेट कर के युसुफ के घर की तरफ बढ़ गये. युसुफ का घर बहुत छोटा सा ही था, कम हाइट के दो छोटे से कच्ची मिट्टी की ईंटों के कोठे बने हुए थे. मुख्य दरवाजे से घुसते ही एक आधी खुली और आधी छप्पर पड़ी थोड़ी सी जगह दोनों कोठों के सामने थी, जहाँ एक कोने में नहाने धोने के लिए लकड़ी के पुराने पत्तों से आड़ बनाकर एक पत्थर रख कर बनाया हुआ था. उसके ठीक बगल में ही खाना पीना बनाने के लिए छप्पर के नीचे चौका बना रखा था. इस समय परिवार के सभी लोग बड़ी बेटी वहीदा को छोड़कर चौके के आस-पास बैठे सुखी रोटियाँ लाल मिर्च की चटनी के साथ खा रहे थे. बीच वाली रेहाना रोटियाँ बना रही थी. वहीदा कहीं बाहर गयी थी, शायद किसी के सिले हुए कपड़े देने. दरवाजे को धकेल कर जब वो दोनों घर में प्रवेश हुए तो बूढ़ी आँखें अपने बेटे को देख कर ख़ुशी से चमक उठी, छोटी बहन रुखसार अपने भाई जान को देख कर चहकते हुए दरवाजे की तरफ दौड़ी और जाकर उसके गले से लग गयी. अपनी छोटी बहन रुखसार के गुदाज उभारों का दबाव अपने सीने पर पाकर युसुफ का लन्ड जो कुछ देर पहले ही पिचकारी मार चुका था, पाजामा में फिर से कुलबुलाने लगा.

युसुफ ने भी रुखसार के गोल-मटोल वॉलीबॉल जैसे कूल्हों पर हाथ फेरकर सहलाते हुए कहा – कैसी है मेरी गुड़िया??

रुखसार ने अपने भाई की आँखों में देखा, जानना चाहा कि आपका ये हाथ किस मकसद से मेरी गान्ड सहला रहा है?? फिर मुस्कराते हुए और ज़ोर से उससे चिपकते हुए बोली.

रुखसार – मैं तो ठीक हूँ, आप सुनाओ… कितने दिनों के बाद याद आई हम लोगों की और ये भाई कौन हैं??

युसुफ ने हल्के से रुखसार के एक चूतड़ को दबा दिया, फिर अपने से अलग करते हुए बोला – यहाँ लौटने लायक मैं बन ही नहीं पाया अब तक. जब इस लायक हुआ कि तुम सब लोगों को कुछ दे सकूँ तो दौड़ा चला आया. ये मेरा सबसे अज़ीज़ दोस्त संजू है अब ये भी हमारे परिवार का हिस्सा ही है.

फिर युसुफ पास जाकर अपने अब्बू-अम्मी को सलाम किया. संजू ने भी अपने हाथ जोड़ दिए. राज़ी ख़ुशी आदान प्रदान हुई. बातों-बातों में युसुफ ने उन्हें बता दिया कि दो दिन में ही हम लोग यहाँ से शहर में शिफ्ट हो रहे हैं. ज़रूरत का समान ही ले लेना, फालतू का यहाँ किसी को दे देना. फिर दोनों बारी-बारी से हाथ मुँह धोकर फ्रेश हुए. बेचारी रुखसार ने कहीं से साग भाजी का इंतजाम किया.

तब तक वहीदा भी आ गयी. वो भी अपने भाई के गले मिली. वहीदा के आगे पीछे के साइज़ को देख कर तो युसुफ का लन्ड पूरा ही खड़ा हो गया. वहीदा के गले मिलते ही युसुफ के लन्ड ने अपने लिए बिल तलाश कर लिया. युसुफ का लन्ड वहीदा की चूत के मुहाने पर जाकर ठोकरें देने लगा. खा-पीकर गांव में वैसे भी जल्दी सोने की आदत है, करें भी तो क्या? और कोई काम भी तो नहीं, बिजली होती नहीं, मनोरंजन के साधन कुछ थे नहीं. अब दो छोटे-छोटे कोठे थे उनमें ही इन सभी को एडजस्ट होना था.

वहीदा अपने अम्मी-अब्बू के साथ सोती थी, उसी में युसुफ का भी बिस्तर ज़मीन पर लगा दिया. दूसरा कोठा जिसमें सिलाई की मशीन, पास में एक 6” ऊँची तख़्ती सी पड़ी थी. जिसपर कपड़ों की काट छांट और इस्त्री वग़ैरह करते थे, उसी को साफ करके दोनों छोटी बहनें सो जाती थी. बाकी का कोठा कपड़ों से भरा होता था. जगह ही कितनी थी?

अब संजू को भी उसी कोठे में एडजस्ट करना था. तख़्ती दो के ही लायक थी, तीसरे की तो किसी भी सूरत में गुंजाइश हो ही नहीं सकती. चलो तीनों लड़कियाँ हो तो एडजस्ट कर भी लें. तो फिर कपड़े एक तरफ करके थोड़ी और जगह की और ज़मीन पर ही उसके लिए भी एक दरी डालकर बिस्तर का इंतज़ाम किया गया.

अभी लेटे हुए उन्हें कोई एक घंटा भी नहीं हुआ था, कि संजू को बाहर कुछ ख़ुसर-पुसर सी सुनाई दी. कुछ देर तो वो ये अनुमान लगाता रहा कि ये आवाज़ घर के बाहर से आ रही हैं या अंदर से? फिर जब उसे कन्फर्म हो गया तो वो चुपके से उठा और जाकर दरवाजे के बीच की झिरी से आँख सटा कर बाहर देखने की कोशिश करने लगा. कुछ देर तो उसे कुछ नहीं दिखा बस आवाज़ें ही सुनाई दे रही थी, जो शर्तिया युसुफ और उसकी बहन वहीदा की थी. कुछ देर में उसकी आँखें अंधेरे की अभ्यस्त हो गयी और जैसे ही उसे बाहर का दृश्य क्लियर सा हुआ, जिसे देखते ही एक साथ उसके लन्ड ने ठुनकी सी लगाई.

युसुफ वहीदा को पीछे से जकड़े हुए था और उसके दोनों हाथ उसकी बड़ी-बड़ी 36” की चुचियों पर जमे हुए थे जिन्हें वो बड़ी बेदर्दी से मसल रहा था. युसुफ का लन्ड खड़ा होकर वहीदा की गान्ड में घुसा जा रहा था.

वहीदा बुरी तरह सिसक कर बोली – आआहह… भाई जान धीरे से मसलो ना… और कितने बड़े करोगे इनको??? अभी तो मेरा निकाह भी नहीं हुआ उससे पहले ही ये इतने बड़े हो गये है. बाहर चलते हुए जब हिलते हैं तो मुझे बड़ी लज्जा आती है. अब जल्दी से मेरा निकाह करवाओ… वरना कोई करेगा भी नहीं…

युसुफ – बस मेरी बहना.. शहर में शिफ्ट होते ही सबसे पहले तेरा निकाह पक्का.. कोई अच्छा सा लड़का मिलते ही सबसे पहला काम यही करूँगा..

शहर का नाम सुनते ही वहीदा पलट गयी. अपने भाई के गले से लिपट कर वहीदा के होंठों का रस चूसकर बोली – क्या सच भाई जान?? हम लोग शहर में शिफ्ट होंगे??

युसुफ ने वहीदा का कुर्ता उतार दिया. एक पुरानी सी ढीली ढाली ब्रा से बाहर उबल पड़ रहे उसके सुडौल मोटे-मोटे चुचों को देख कर युसुफ बावला सा होकर वहीदा के बूब्स पर टूट पड़ा. वहीदा ने भी युसुफ के पाजामा को नीचे खिसका दिया और उसके तन्नाए लन्ड को अपनी चूत की मोटी-मोटी फांकों पर घिसते हुए बोली – शहर में आप लोग क्या करोगे??

युसुफ का अपनी बहन के मखमली गुदाज बदन की गर्मी से बुरा हाल होने लगा था. ऊपर से वहीदा युसुफ के लन्ड को लगातार अपनी गीली चूत पर रगडे जा रही थी. वहीदा को पलटा कर युसुफ ने दीवार के सहारे झुका लिया. पीछे से वहीदा की गदरायी गान्ड पर हाथ फिराते हुए युसुफ बोला

युसुफ – पहले तो मैं अपनी सेक्सी बहन को जी भर कर चोदूँगा, उसके बाद बताता हूँ…

इतना कहकर युसुफ ने अपना गरम लन्ड वहीदा की चूत के छेद पर अड़ा दिया और सर्रर्रर्ररर.. से एक झटके में ही पूरा अंदर तक पेल दिया. वहीदा के मुँह से एक बेहद ही कामुक सिसकी निकल पड़ी.

साथ ही संजू का लन्ड भी उसके पाजामा के अंदर फुल फॉर्म में आ गया, वो लगातार बाहर झाँक कर उस गरम सीन में खोया हुआ था. उसे पता भी नहीं चला कि कब वो दोनों घोड़ियाँ आकर उसके आजू-बाजू खड़ी हो गयी. खड़ी ही नहीं हुई, बल्कि दोनों तरफ से वो संजू के बदन से सट कर अपने बदन को उसके साथ रगड़ने लगी…

जब संजू को इस बात का एहसास हुआ तो उसने बारी-बारी से दोनों की तरफ देखा, मानो उसकी कोई चोरी पकड़ी गयी हो. उस अंदाज में संजू ने अपनी गर्दन झुका ली.

रेहाना ने संजू की चौड़ी छाती को सहलाते हुए कहा – यहाँ क्यों खड़े हैं जनाब?? बाहर कोई तमाशा हो रहा है क्या??

संजू पीछे हटना चाहता था, लेकिन रेहाना ने मजबूती से जकड़ कर संजू को हिलने भी नहीं दिया और रुखसार से बोली.

रेहाना – देख तो रुखसार.. बाहर जनाब क्या नज़ारा देख रहे थे??

वैसे तो उन दोनों को भी पता था, फिर भी रुखसार ने झाँक कर देखा, जहाँ युसुफ हुंकार भरते हुए अपनी बहन की पीछे से चुदाई कर रहा था. युसुफ की जांघों की ठप-ठप जब वहीदा के चुतड़ों पर पड़ती, तो उनमें मानो भूचाल सा आ जाता और वो दोनों सागर की लहरों की लहराकर ऊपर को हो जाते.

रुखसार – हाय… रेहाना… क्या गरमा-गरम चुदाई हो रही है?? दीदी और भाई की… देख तू भी देख…

संजू समझ गया कि ये तीनों ही बहनें चुदक्कड़ हैं… और इन्हें अपने ही सगे भाई से चुदवाने में कोई एतराज़ नहीं है…

संजू पीछे खिसकते हुए बोला - तुम दोनों मज़े लो. मैं चला सोने…

लेकिन जैसे ही संजू पलटा, पीछे से रुखसार संजू से चिपकते हुए बोली – अब इतना अच्छा सीन तो आप ही की वजह से देखने को मिला है… तो इसका समापन भी तो तुम्हें ही करना पड़ेगा जनाब…

संजू रुखसार के हाथ हटाते हुए बोला – यहाँ खड़े-खड़े ही चुदना चाहती हो.. अपनी दीदी की तरह??

संजू के मुँह से रज़ामंदी भरे शब्द सुनकर दोनों घोड़ियाँ कुलाँचें भरती हुई अपनी तख़्ती पर जा जमी. बीच में संजू के लिए जगह बनाकर वो दोनों बड़ी बेसब्री से संजू का इंतजार करने लगी... बाहर का गरमा गरम स्टेज शो कुछ देर और चला, फिर वहाँ एक दम से शांति छा गयी. गरम-गरम आहों का बाज़ार अब थम चुका था. इसका मतलब उन दोनों का कार्यक्रम अब समाप्त हो चुका था. लेकिन उसकी वजह से इस छोटे से कोठे का तापमान काफ़ी बढ़ चुका था…

दोनों बहनों को उनके अपने सगे भाई बहन की चुदाई के सीन ने इतना ज़्यादा कामोत्तेजित कर दिया था कि अब उन्हें संजू के उस दो कदम के फ़ासले को भी सहन करना दूभर लग रहा था. दोनों की चूत में मानो भट्टियाँ जल रही थीं. रेहाना एक हाथ से अपनी चूत को सहलाते हुए दूसरे हाथ की उंगली को अपने मुँह में डालकर चूसते हुए बोली.

रेहाना – क्या नई नवेली दुल्हन की तरह आ रहे हो.. जल्दी करो ना…

संजू के उन दोनों के पास आने तक उन दोनों ने समय बरबाद ना करते हुए अपने-अपने कुर्ते निकाल फेंके. उन दोनों हवस में अंधी हो रही जवान घोड़ियों को इस अवस्था में देखकर संजू का लन्ड उसके पाजामे में कबड्डी खेलने लगा. उसे लगा कि कहीं साला कपड़े फाड़कर बाहर ना निकल पड़े. जैसे ही संजू उन दोनों के सामने जाकर खड़ा हुआ, रेहाना के सब्र का बाँध टूट गया. बड़ी बेदर्दी से संजू का हाथ पकड़ कर एक ज़ोर का झटका दिया, वो धप्प से उन दोनों के बीच में फँस गया. संजू ने अपने एक-एक हाथ को उनकी गर्दन के पीछे से निकाल कर दोनों की एक–एक चुचि पर कब्जा जमा लिया. उन्हें तेज़ उमेठते हुए बोला

संजू – तीनों बहनें बड़ी गरम माल हो तुम लोग..

रुखसार ने संजू के पाजामे को नीचे सरका दिया. अंडरवियर के ऊपर से ही संजू के तनतनाते लन्ड को मुँह दबोचते हुए बोली.

रुखसार – यहाँ भी कुछ कम गर्मी नहीं है जनाब…

संजू के मुँह से एक कराह निकल गयी – सस्सिईईईई.. आअहह… उसके थोबड़े को क्यों मसल रही है??

इतना कहकर संजू ने रुखसार के होंठों को अपने मुँह में भर कर चब-चबा डाला. रुखसार बस मुँह ही मुँह में गूँ… गूँ… करती रह गयी.

दूसरी तरफ रेहाना ने संजू के टीशर्ट और अपनी ब्रा को नोच डाला और अपनी 34” के बूब्स को संजू की चौड़ी कठोर छाती से रगड़ने लगी. रेहाना के निप्पल कड़क होकर जंगली बेर जैसे हो गये. रुखसार ने होंठ चुसाई करते हुए ही हल्के से अपनी गोल-मटोल गान्ड अधर की और अपनी पजामी को भी टाँगों से बाहर निकाल दिया. अपने बूब्स को संजू के सीने से रगड़ती हुई रेहाना ने पैंटी के ऊपर से ही अपनी छोटी बहन रुखसार की चूत को सहला दिया. मज़े से रुखसार की कमर और आगे को सरक गयी. संजू होंठों के साथ-साथ रुखसार की चुचियों को भी मथ रहा था. पुरानी अंगिया ना जाने कब धाराशाई हो चुकी थी. इधर रेहाना ने भी रुखसार की पैंटी सरका दी और अब वो रुखसार की चूत में अपनी उंगलियाँ डालकर उसे चोद रही थी. रुखसार से ये दोहरा हमला सहन नहीं हुआ, उसकी चूत लगातार रस छोड़ने लगी थी. चूत की गर्मी ने उसे इतना बहाल कर दिया कि संजू की छाती पर अपनी हथेली का भार डालकर उसे तख़्ती पर धकेल दिया. रुखसार अपनी गरम दहकती चूत को संजू के लन्ड पर सेट कर के उसपर बैठती चली गयी. पूरा लन्ड अंदर पहुँचते-पहुँचते रुखसार के मुँह से एक बेहद मादकता भरी आहहह… निकल गयी. आअहह… उउउम्म्मन…. जिसे सुनकर संजू अपनी गान्ड उचकाते हुए बोला.

संजू – क्यों रुखसार… बिना कटे लन्ड को लेकर मज़ा आया कि नहीं??

रुखसार - हाय अल्लाह… कितना लंबा है… उउउफफफ्फ़… बड़ा मज़ा दे रहा है ये तो…

कहते हुए रुखसार संजू के लन्ड पर कूदने लगी. कुछ देर बाद संजू ने भी नीचे से धक्के लगाना चालू कर दिया. उन दोनों की मदमस्त चुदाई देख कर रेहाना का हाल बेहाल होने लगा. अब रेहाना की चूत में भी बुरी तरह से चींटियां सी काटने लगी थी. रेहाना की चूत में लगी आग का जल्दी ही बुझना ज़रूरी था. रेहाना को इन दोनों की चुदाई जल्दी खतम होने के आसार नज़र नहीं आ रहे थे. तो उसने भी अपनी पैंटी निकाल फेंकी और रुखसार की तरफ मुँह करके वो संजू के मुँह पर अपनी चूत रख कर बैठ गयी. संजू ने भी उसकी मस्त सेक्सी मदमाती मखमली गान्ड पर थपकी देकर उसकी गीली चूत के रस को अपनी जीभ डालकर चपर-चपर चाटने लगा. दोनों बहनें किसी बैलगाड़ी के हिचकोलों की तरह संजू के ऊपर और नीचे लहरा रही थी. दोनों के हाथ एक दूसरी की चुचियों पर जम गये और वो दोनों आपस में एक दूसरी के होंठ भी चूसती जा रही थी. तीनों की आहों कराहो से उस छोटे से कोठे का तापमान बहुत बढ़ चुका था, वातावरण में चुदाई की खुशबू महकने लगी थी.

कुछ देर में ही रुखसार अपना पानी निकाल बैठी. तूफ़ानी रफ़्तार से अपनी गान्ड को आगे-पीछे घिसते हुए रुखसार भलभलाकर झड़ने लगी. थोड़ी देर तक रुखसार यूँ ही शांत संजू के ऊपर बैठी रही. उधर रेहाना का लावा भी फूटने वाला था. रेहाना भी अपनी चूत को संजू के मुँह पर दबाकर झड़ने लगी और अपना सारा अमृत कलश संजू के मुँह में खाली कर दिया. फिर दोनों ने बारी-बारी से संजू के लन्ड को चूसा. कुछ देर में ही उन दोनों ने बराबर-बराबर मात्रा में उसके लन्ड का प्रसाद अपने पेट में उतार लिया. चुसाई से रेहाना की चूत की खुजली कम होने की बजाए और तेज हो गयी थी, जो आग एक मोटे लन्ड के चूत की दीवारों से रगड़ने से बुझनी चाहिए वो जीभ से कहाँ बुझने वाली थी. रेहाना ने संजू के होश लौटने का भी इंतजार नहीं किया और संजू के मरे चूहे जैसे मुरझाए लन्ड पर बुरी तरह टूट पड़ी. संजू भी आख़िर जवान मर्द था, दो मिनट में ही उसका लन्ड फिर से टनटना कर दूसरी चूत में जाने के लिए तैयार था. घोड़ी बनाकर इस बार रेहाना की चूत की उसने वो चुदाई की, वो हाय तौबा मचाती हुई उसके लन्ड पर अपनी गान्ड पटक-पटक कर चुदने लगी. दोनों ही बहनें बहुत ही गरम माल निकली. पूरी रात वो तीनों जागकर भरपूर चुदाई का मज़ा लूटते रहे. संजू की सारी टंकी उन दोनों ने खाली कर दी और खुद भी खाली हो गयी.

दूसरे दिन खाना खा पीकर युसुफ गांव में अपने यार दोस्तों से मिलने चला गया. संजू से पूछा तो उसने रात की थकान के कारण मना कर दिया. मौके का फ़ायदा उठाकर उन दोनों घोड़ियों ने वहीदा को भी संजू से चुदवा दिया. ये घोड़ी तो बिल्कुल खोखली निकली. संजू को उसकी चूत मारने में बिल्कुल मज़ा नहीं आया. फिर उसने लौड़े को चूत से निकालकर उसकी गान्ड में डाल दिया. हिनहिना कर वो घोड़ी उसके लन्ड को गान्ड में भी आसानी से ले गयी.

गान्ड पर थप्पड़ लगाते हुए संजू ने कहा – तू तो सब तरफ से खोखली है वहीदा. बहुत लन्ड खोर लगती है, कितने ले चुकी है अब तक??

वहीदा ने अपनी गान्ड पीछे धकेलते हुए कहा – तुझे जैसे मज़ा मिलता है वैसे ले ना… लन्ड की गिनती जानकर क्या करेगा??? मैं चुदने के मामले में कभी परहेज नहीं करती, जैसा मिले ले लेती हूँ…

एक बार वहीदा की गान्ड में अपना पानी निकाल कर संजू गहरी नींद में डूब गया. तीसरे दिन उन सबने कुछ ज़रूरत का समान एक टेंपो में लादा और शहर की तरफ रवाना हो लिए. शहर में इतना बड़ा और अच्छा मकान देख कर युसुफ के परिवार वाले खुश हो गये. जहाँ जिसको अच्छा लगा अपना डेरा जमा दिया. थोड़े ही दिनों में उनके धंधे का खोम्चा इस शहर में जम गया. उनके ही गैंग के एक वफादार मुस्लिम जो तलाकशुदा था, उससे वहीदा का निकाह करा दिया. तीनों बहनें भी उसी धंधे में लग गयी. हिजाब में छुपा कर माल सप्लाई करने में वो माहिर हो गयी. कोई येड़ा कस्टमर होता उसे वो अपने हुस्न-शबाब के दर्शन कराकर काम निकाल लेती थी. उन्हें अपना काम निकालने के लिए किसी के सामने चूत खोलने पर भी कोई एतराज नहीं होता था.

कुछ ही दिनों में युसुफ और संजू गैंग ने अपने झंडे गाड़ दिए. उनकी परफॉरमेंस देख कर लीना बहुत खुश थी. उसने भी अपना मुंबई का धंधा कुछ भरोसेमंद लोगों को सौंपा, खुद भी इसी शहर में एक अच्छा सा बंगला खरीद कर शिफ्ट हो गयी. दिन-दूनी रात चौगुनी तरक्की से वो कुछ ही दिनों में एक छोटी-मोटी ड्रग डीलर से एक बड़े माफिया ग्रुप में तबदील हो गये..
 
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aidenabhishek

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बहुत दिन हो गये कहानी के मुख्य किरदारों से दूर रहते हुए. ख़ासकर मोहिनी भाभी की तो बहुत याद आती होगी आप सभी को, जिसके बिना अपना हीरो भी कुछ नहीं है.

समय काफ़ी तेज़ी से आगे बढ़ रहा था, जैसा कि मैंने तय किया था कि जब हमारा शहर वाला बंगला तैयार हो जाएगा. हमारा सारा परिवार चाची के अंश को लेकर शहर शिफ्ट हो जाएगा. शहर में आकर कुछ दिन बाद ही नेक्स्ट सेशन से बड़े भैया ने भी गुप्ता जी के डिग्री कालेज में बतौर प्रोफेसर जॉइन कर लिया.

मेरी बिटिया जिसका नाम मोहिनी भाभी ने तृष्णा रखा, वो भी अब बोलने, चलने फिरने लगी थी. इसी बीच रुचि ने भी 10 पास कर लिया था. छाया ने अपना ग्रेजुएशन कर लिया था. कृष्णा भैया उसे पुलिस में सेलेक्ट करवाना चाहते थे, लेकिन छाया का दिल नहीं था कि वो किसी बंधन में रह कर काम करे. शुरू से ही छाया मेरे साथ रहने के कारण स्वतंत्र रहने की आदि थी.

एक दिन मैं भी कृष्णा भैया के बंगले पर ही था. हम तीनों के बीच इसी बात को लेकर चर्चा थी. भैया छाया पुलिस जॉइन करने को प्रोत्साहित कर रहे थे, लेकिन उसका मन नहीं था. तो वो मेरी तरफ मुखातिब होकर बोली.

छाया – अंकुश.. आप बताओ मुझे क्या करना चाहिए?? वैसे मैं अपने देश और क़ानून की बहुत इज़्ज़त करती हूँ. लेकिन किसी बंधन में रह कर क़ानून की हिफ़ाज़त करना मुझे गवारा नहीं है, ख़ासकर पुलिस में.. जहाँ अपने मन से कोई भी डिसिशन ले ही नहीं सकते. हम कुछ अच्छा करना भी चाहें तो ऊपर के प्रेशर की वजह से कभी-कभी हाथ बँधे होते हैं.

कृष्णा – तो फिर छोड़ो सब कुछ और आराम से तुम घर संभालो. हमें भी ऐसी कोई ज़रूरत भी नहीं है कि तुम कुछ करो ही करो.

छाया – लेकिन मुझे खाली बैठना भी तो अच्छा नहीं लगता. जो कुछ अब तक मैंने अंकुश के साथ रहकर सीखा और जाना है उसे वेस्ट भी करना नहीं चाहती.

मैं - मेरे पास तुम्हारे लायक एक बहुत ही उम्दा प्लान है.. अगर पसंद हो तो??

मैंने उन दोनों की बातों के बीच पड़ते हुए कहा. वो दोनों मेरी तरफ देखने लगे. मैंने अपनी बात जारी रखते हुए कहा.

मैं – क्यों ना तुम एक प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसी खोल लो. तुम्हारा टैलेंट भी काम आता रहेगा और इनडाइरेक्टली क़ानून और पुलिस की मदद भी करती रहोगी… क्यों क्या ख्याल है??

मेरी बात पर कृष्णा भैया कुछ नाखुश नज़र आए, लेकिन छाया उनकी नापसंदगी को नजरंदाज करते हुए बोली – बात तो पते की है, लेकिन इस काम को मैं अकेली तो नहीं कर पाऊँगी… अंकुश तुम्हें इसमें मेरा साथ देना होगा…

मैं – ज़रूर… मेरे पास भी इतना ज़्यादा काम नहीं होता है… उसे जूनियर स्टाफ कुछ हद तक संभाल ही लेता है… एजेंसी ज़रूर तुम्हारे नाम से होगी.. लेकिन ज़्यादातर फील्ड वर्क हम दोनों ही मिलकर संभालेंगे.. क्यों भैया?? फिर तो आपको कोई प्राब्लम नहीं है इस काम से?

कृष्णा भैया हथियार डालते हुए बोले – जैसा तुम दोनों ठीक समझो.. चलो अच्छा है कुछ मेरे केस भी आसानी से हल हो जाया करेंगे जिन्हें मैं सिस्टम के बंधनों के कारण नहीं कर पाता..

बात फाइनल करते ही मैं इस काम में जुट गया. छाया के नाम से एक डिटेक्टिव एजेंसी रजिस्टर कर दी. एड देकर कुछ इच्छुक युवकों का स्टाफ भी रख लिया जिससे शुरुआत करने में आसानी रहे. हमारे प्रयासों से धीरे-धीरे कुछ छोटे-मोटे केस भी आने लगे, जैसे किसी की पत्नी अपने पति की जासूसी करवाना चाहती थी, कोई पति अपनी पत्नी की. किसी का किडनैप का केस तो किसी के यहाँ चोरी चकारी का. पुलिस में एसएसपी तक की पावर थी ही. लॉ को ध्यान में रखते हुए छाया की डिटेक्टिव एजेंसी का काम जमने लगा.

मुझे ये तो पता ही था कि भानु उस किलिंग में बच निकला है और बहुत हद तक वो इस शहर में तो रहेगा नहीं. तो मुमकिन है वो फिर से अपनी बहन शालिनी के पास ही गया होगा. हमने अपने कुछ लोग उसकी टोह में लगा दिए. ऐसे साँप पर नज़र रखना बेहद ज़रूरी भी था. क्या पता मौका देख कर कब अपना जहर उगल दे. इसी दौरान छाया ने ये पता लगा लिया कि भानु की बीवी शिखा इस शहर को छोड़कर अपनी ननद वाले शहर में शिफ्ट हो चुकी है. मेरा अनुमान सही निकला, तो ज़रूर भानु भी वहीं होना चाहिए. क्योंकि उसकी नज़र में पुलिस या मुझे ये नहीं पता होगा कि वो बच निकला है. तो बस लोकल पुलिस की नज़रों से बच कर वो कहीं भी रह सकता है. कस्बे की ज़मीन जायदाद बेचकर उसके पिता सूर्य प्रताप भी वहीं बस गये थे. लड़के की करतूतों से उनकी कमाई हुई इज़्ज़त मिट्टी में जो मिल गयी थी, तो फिर वहाँ रह कर करते भी क्या??

उधर पड़ोस के ही शहर में ड्रग्स और हथियारों की तस्करी अप्रत्याशित रूप से बढ़ने लगी थी, जिसका थोड़ा बहुत असर आस-पास के शहरों तक पड़ना स्वाभाविक ही था. ये भी सर्व विदित है की पुलिस कहीं की भी हो उसका हाथ इन माफियाओं के साथ हो ही जाता है. 100 में से कोई एक अधिकारी ईमानदार भी हो तो उसे अपनी जान की परवाह बनी रहती है. यही हाल उस शहर का भी था नतीजा लीना का तस्करी का कारोबार खूब फल फूल रहा था. ऊपर से संजू की ख़ूँख़ार प्रवृति ने इलाक़े में दहशत फैला रखी थी. उसके हाथों कुछ मर्डर भी हो चुके थे, लेकिन लीना की पहुँच पुलिस प्रशासन में बहुत ऊपर तक थी. ऊपर से वो बेहद सुन्दर भी थी. आज के युग में जहाँ किसी चीज़ से काम ना बने वहाँ औरत के कामबान काम आ ही जाते हैं. युसुफ की तीनों बहनें भी इस काम में दक्ष हो चुकी थी. शबाब और पैसे से आज कुछ भी हासिल हो सकता है. तो बस लीना दिनों-दिन अपना कारोबार बढ़ाती जा रही थी. जिसकी गूँज 70-80 किमी दूर हमारे इस शहर तक भी पहुँच गयी. लेकिन यहाँ की पुलिस के कुछ ईमानदार प्रयासों से उनके पैर इस शहर में जम नहीं पा रहे थे.

हमारे आदमी भानु पर नज़र रखने की वजह से इस शहर की खबरें भी रखते थे. भानु पर नज़र रखने के साथ-साथ हमने उन्हें इस गैंग की अधिक से अधिक जानकारी जुटाने में लगा दिया.

लीना के बेहद करीबी युसुफ और संजू का हमें पता चल चुका था, इसलिए अब हमने खुद मैदान में कूदने का फ़ैसला कर लिया. सबसे पहले हमने उन दोनों की जन्म कुंडली निकालने का प्रयास किया. युसुफ तो लोकल ही था, तो उसकी सारी डीटेल्स आसानी से मिल गयी. लेकिन संजू महाराष्ट्र से था तो उसका बैकग्राउंड पता करने में थोड़ी मशक्कत करनी पड़ी. लेकिन एक बात जो उसकी खास थी, वो थी उसके हाइ एमोशन्स. आगे पीछे कोई था नहीं उसके, जिसके लिए वो कमाने खाने का लालच रखता हो. बस कुछ था तो युसुफ के साथ लगाव वो भी उसने उसकी जान बचाई थी इसलिए और यहाँ आकर उसकी बहनों की चूतें जिन्हें वो जब चाहता चोद लेता था. हां लेकिन आज भी उसकी पहली पसंद थी लीना, भले ही वो युसुफ की दोनों बहनों की तुलना में उम्र दराज थी. लेकिन नियमित एक्सरसाइज और अच्छे रहन सहन के कारण वो आज भी उनसे ज़्यादा जवान और मर्द मार औरत दिखती थी.

मैंने छाया को संजू के पीछे लगा दिया. लेकिन वो ज़्यादातर अपने साथ दो-चार गुर्गे रखता ही था. फिर भी मौका तो निकालना ही था. जो कभी ना कभी किसी मोड़ पर मिल ही जाना था. छाया अपनी तरफ से पूरी कोशिश में जुटी थी, तभी एक अजीब घटना प्रकाश में आई. जो हमारे आदमी को कुछ देर से पता चली. हुआ यों कि एक दिन लीना एक बड़े से शॉपिंग माल से बाहर निकली, माल से बाहर आते ही उसके इंतजार में खड़े उसके आदमी जिनमें युसुफ तो माल के अंदर से ही उसके साथ था बाहर से तीन और साथ हो लिए. हर समय वो एक दम सजी-धजी, कंधे तक के सुनहरी बाल. सिर पर गोल कैप जिससे कुछ हद तक उसका चेहरा दूर से नज़र नहीं आता था, आँखों पर स्याह काले गॉग्ल्स. अभी वो पार्किंग में खड़ी अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ ही रही थी कि अपने पास से ही आती हुई एक जानी पहचानी सी आवाज़ ने उसे ठिठकने पर मजबूर कर दिया..

बगल से गुज़रते हुए एक सरदार ने उसे धीरे से पुकारा - अरे कामिनी मैडम आप??

ये शब्द सुनते ही लीना के कदम वहीं थम गये और किसी स्वचालित खिलौने की तरह वो आवाज़ की दिशा में घूम गयी...

इन शब्दों में ना जाने कैसा जादू सा था. सुनते ही लीना बुरी तरह से चौंक पड़ी. उसे उस सरदार की आवाज़ कुछ जानी-पहचानी सी भी लगी. लीना पलटकर उस सरदार की तरफ देखने लगी जो उसे ठिठकता देख लपक कर उसकी ओर आने लगा. युसुफ के लिए ये नाम नितांत नया था. उसने अपने आस-पास नज़र घुमा कर देखा लेकिन उसे दूर-दूर तक कोई और महिला दिखाई नहीं दी. उसने उस सरदार को अपने पास आने से रोकना चाहा तो लीना ने हाथ का इशारा करके उसे रोक दिया और सरदार को अपने पास आने दिया.

उसके अत्यधिक नज़दीक जाकर वो सरदार लगभग फुसफुसा कर बोला – पहचाना मैडम?? मैं भानु… आपके लिए काम किया करता था…

लीना ने अपने होंठों पर उंगली रखकर उसे चुप रहने का संकेत किया और चुपचाप अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ते हुए बोली – आओ मेरे साथ…

लीना ने युसुफ को दूसरी गाड़ी में आने का इशारा किया और भानु को लेकर वो अपनी गाड़ी में आकर बैठ गयी. रास्ते में भानु अपने मन की उत्सुकता को नहीं दबा पाया और बोला.

भानु - मैंने तो सुना था मैडम कि आप भी उस हादसे में बाकी लोगों के साथ ही…

लीना जो वास्तव में कामिनी ही थी बोली – पहली बात… अभी मैं इस नाम को भूल चुकी हूँ.. मेरे सभी आदमी मुझे लीना के नाम से जानते हैं, तो आगे से इस बात का ख्याल रखना.. रही बात मेरे मरने या जीवित होने की तो सभी को यही अनुमान था कि मैं भी वहीं खतम हो गई हूँ, लेकिन मेरा भाग्य अच्छा था… अंकुश मुझे गोली मारने के बाद ज़्यादा देर तक वहाँ नहीं रुका.. भाग्यवश गोली भी मेरे सीने में दिल से ज़रा हटकर लगी थी, मैं उस समय तो अपने होश खो ही चुकी थी. लेकिन तभी मेरा ड्राइवर रामसिंह गुप्त गैलरी में हुई उस फायरिंग की आवाज़ सुनकर दौड़ता हुआ वहाँ जा पहुँचा, तब तक अंकुश मुझे मरा समझकर वहाँ से जा चुका था… ड्राइवर ने मुझे आनन-फानन में उठाकर गाड़ी में डाला और समय रहते वो मुझे मेरे पर्सनल डॉक्टर के पास ले गया, जहाँ उसने समय पर मेरी गोली निकाल दी. दूसरे दिन जब मुझे होश आया तो मैं पूरी तरह ख़तरे से बाहर थी. एक हफ्ते वहीं रहकर मैंने डॉक्टर को ढेर सारा इनाम दिया और फिर हम तीनों ने ही चुपके से वो शहर छोड़ दिया. रामसिंह तो आज भी मेरे साथ ही है जो अभी भी तुम्हारे सामने, मेरी गाड़ी चला रहा है. सही मायने में मुझे दूसरी जिंदगी देने वाला यही है. कुछ साल मैंने मुंबई में गुज़ारे, फिर मुझे एक दिन दो हीरे हाथ लगे, जिनमें एक जो अभी तुम्हें मेरे पास आने से रोक रहा था दूसरा कहीं मार-पीट में उलझा होगा. युसुफ यहीं कहीं पास के गांव का है. इसको पैसों की ज़रूरत थी, दोनों मिलकर मुंबई में छोटी-मोटी वारदातें किया करते थे. तो मैंने उन्हें अपने साथ ले लिया. कुछ समय पहले ही मैंने यहाँ अपना कारोबार शुरू किया है, दोनों की लगन और टीम वर्क से कुछ ही समय में मैं पहले से भी बड़ी ड्रग्स और हथियारों की डीलर बन चुकी हूँ. अब तुम अपने बारे में बताओ. तुम इस तरह भेष बदलकर क्यों छुपते फिर रहे हो??

भानु एक लंबी सी साँस छोड़कर बोला – मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था मैडम.

फिर उसने श्वेता के कहने पर अंकुश के किडनैप और उसके साथ श्वेता ने क्या-क्या किया, वो सब उसे बताता चला गया.
 
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युसुफ उसकी चुचियों को मक्खन की तरह बिलो रहा था. कभी-कभी उसके कड़क बूब्स से खेलने लगता. तो वहीं संजू की उंगली उसकी चूत में हाहाकार मचाए हुए थी. नन्ही अपनी टाँगें फैलाकर नीचे से अपनी गान्ड उठा-उठाकर संजू की उंगली को और गहराई तक लेने का प्रयास करने लगी. नन्ही की गर्मी देख कर संजू भी बहुत गरम हो उठा, अपनी उंगलियों की मदद से उसने अपने पैंट की जिप खोल दी. लन्ड को बाहर करके नन्ही के हाथ में पकड़ा दिया. नन्ही की एक जाँघ लगातार संजू के लन्ड की वाट लगाए हुए थी, साथ ही वो अपने हाथ से भी उसकी मुट्ठी मारने लगी. उत्तेजना के चरम पर पहुँच कर संजू ने अपनी दो उंगली चूत की गहराईयों में उतार दी और तेज-तेज अंदर बाहर करके एक तरह से हाथ से ही उसे चोदने लगा.

उधर युसुफ ने भी गाड़ी के अंदर के अंधेरे का लाभ लेकर अपना लन्ड भी बाहर कर लिया. उसने नन्ही को अपनी तरफ पलटा कर अपना लन्ड उसके मुँह में दे दिया. ऐसे खेलों से अंजान होते हुए भी नन्ही वासना में अंधी हो चुकी थी. उसे ये भी होश नहीं था कि उसके मुँह में कब लन्ड घुस गया. नन्ही तो युसुफ के कटे हुए टोपे पर लगे नमकीन पानी को चाटते ही और ज़्यादा मदहोश हो गयी. लॉलीपॉप की तरह युसुफ के लन्ड को चाटने लगी. बिना आवाज़ किए ये तीनों बिना किसी की परवाह किए अपने-अपने कामों लगे थे.

युसुफ का लन्ड सबसे पहले जवाब दे गया, उसने नन्ही के गले तक अपनी पिचकारी छोड़ दी. इधर नन्ही भी अपने चरम पर थी. उसके पेट में क्या जा रहा है इस बात को नजरंदाज करके उसने बहुत तेज़ संजू के लन्ड को अपनी मुट्ठी में कस लिया. नन्ही अपनी गान्ड हवा में लहराकर भलभलाकर झड़ने लगी, उसके चूतरस से संजू का हाथ तर हो गया. लन्ड को कसकर दबाने से उसके लन्ड ने भी अपना लावा उगल दिया. लन्ड की सीधी पिचकारी नन्ही की जाँघ और चूत के मुँह पर पड़ी. गरम-गरम माल की बौछार अपनी चूत की फांकों पर पड़ते ही, झड़ी हुई नन्ही की आँखें मज़े से फिर मूंद गयी. मुँह में युसुफ के माल का स्वाद, हाथ, जाँघ, चूत संजू और खुद के पानी से लथपथ. जब तीनों को सुकून मिला तब होश आया.

संजू ने अपना हाथ चाटते हुए चटकारा सा लेकर बोला – नन्ही बड़ी नमकीन लौंडिया है यार..

संजू की बात सुनकर नन्ही बुरी तरह शरमा गयी. अपना लहँगा नीचे सरकाते हुए फुसफुसाई - मेरे घर आना आप दोनों.

अभी युसुफ कोई जवाब देता, मॅजिक झटके से रुक गया. धीरे-धीरे करके भीड़ खाली हुई, लास्ट में वो तीनों भी निकले.

नन्ही ने अपना थैला उठाया, नज़र झुकाए बोली – मैं इंतजार करूँगी… आना ज़रूर…

इतना कहकर वो किसी चंचल हिरनी की तरह कुलाँचें भरती हुई अपने घर की तरफ भाग गयी. पीछे से वो दोनों उसके लहंगे में थिरकती गान्ड को देखते हुए अपने-अपने लन्ड सेट कर के युसुफ के घर की तरफ बढ़ गये. युसुफ का घर बहुत छोटा सा ही था, कम हाइट के दो छोटे से कच्ची मिट्टी की ईंटों के कोठे बने हुए थे. मुख्य दरवाजे से घुसते ही एक आधी खुली और आधी छप्पर पड़ी थोड़ी सी जगह दोनों कोठों के सामने थी, जहाँ एक कोने में नहाने धोने के लिए लकड़ी के पुराने पत्तों से आड़ बनाकर एक पत्थर रख कर बनाया हुआ था. उसके ठीक बगल में ही खाना पीना बनाने के लिए छप्पर के नीचे चौका बना रखा था. इस समय परिवार के सभी लोग बड़ी बेटी वहीदा को छोड़कर चौके के आस-पास बैठे सुखी रोटियाँ लाल मिर्च की चटनी के साथ खा रहे थे. बीच वाली रेहाना रोटियाँ बना रही थी. वहीदा कहीं बाहर गयी थी, शायद किसी के सिले हुए कपड़े देने. दरवाजे को धकेल कर जब वो दोनों घर में प्रवेश हुए तो बूढ़ी आँखें अपने बेटे को देख कर ख़ुशी से चमक उठी, छोटी बहन रुखसार अपने भाई जान को देख कर चहकते हुए दरवाजे की तरफ दौड़ी और जाकर उसके गले से लग गयी. अपनी छोटी बहन रुखसार के गुदाज उभारों का दबाव अपने सीने पर पाकर युसुफ का लन्ड जो कुछ देर पहले ही पिचकारी मार चुका था, पाजामा में फिर से कुलबुलाने लगा.

युसुफ ने भी रुखसार के गोल-मटोल वॉलीबॉल जैसे कूल्हों पर हाथ फेरकर सहलाते हुए कहा – कैसी है मेरी गुड़िया??

रुखसार ने अपने भाई की आँखों में देखा, जानना चाहा कि आपका ये हाथ किस मकसद से मेरी गान्ड सहला रहा है?? फिर मुस्कराते हुए और ज़ोर से उससे चिपकते हुए बोली.

रुखसार – मैं तो ठीक हूँ, आप सुनाओ… कितने दिनों के बाद याद आई हम लोगों की और ये भाई कौन हैं??

युसुफ ने हल्के से रुखसार के एक चूतड़ को दबा दिया, फिर अपने से अलग करते हुए बोला – यहाँ लौटने लायक मैं बन ही नहीं पाया अब तक. जब इस लायक हुआ कि तुम सब लोगों को कुछ दे सकूँ तो दौड़ा चला आया. ये मेरा सबसे अज़ीज़ दोस्त संजू है अब ये भी हमारे परिवार का हिस्सा ही है.

फिर युसुफ पास जाकर अपने अब्बू-अम्मी को सलाम किया. संजू ने भी अपने हाथ जोड़ दिए. राज़ी ख़ुशी आदान प्रदान हुई. बातों-बातों में युसुफ ने उन्हें बता दिया कि दो दिन में ही हम लोग यहाँ से शहर में शिफ्ट हो रहे हैं. ज़रूरत का समान ही ले लेना, फालतू का यहाँ किसी को दे देना. फिर दोनों बारी-बारी से हाथ मुँह धोकर फ्रेश हुए. बेचारी रुखसार ने कहीं से साग भाजी का इंतजाम किया.

तब तक वहीदा भी आ गयी. वो भी अपने भाई के गले मिली. वहीदा के आगे पीछे के साइज़ को देख कर तो युसुफ का लन्ड पूरा ही खड़ा हो गया. वहीदा के गले मिलते ही युसुफ के लन्ड ने अपने लिए बिल तलाश कर लिया. युसुफ का लन्ड वहीदा की चूत के मुहाने पर जाकर ठोकरें देने लगा. खा-पीकर गांव में वैसे भी जल्दी सोने की आदत है, करें भी तो क्या? और कोई काम भी तो नहीं, बिजली होती नहीं, मनोरंजन के साधन कुछ थे नहीं. अब दो छोटे-छोटे कोठे थे उनमें ही इन सभी को एडजस्ट होना था.

वहीदा अपने अम्मी-अब्बू के साथ सोती थी, उसी में युसुफ का भी बिस्तर ज़मीन पर लगा दिया. दूसरा कोठा जिसमें सिलाई की मशीन, पास में एक 6” ऊँची तख़्ती सी पड़ी थी. जिसपर कपड़ों की काट छांट और इस्त्री वग़ैरह करते थे, उसी को साफ करके दोनों छोटी बहनें सो जाती थी. बाकी का कोठा कपड़ों से भरा होता था. जगह ही कितनी थी?

अब संजू को भी उसी कोठे में एडजस्ट करना था. तख़्ती दो के ही लायक थी, तीसरे की तो किसी भी सूरत में गुंजाइश हो ही नहीं सकती. चलो तीनों लड़कियाँ हो तो एडजस्ट कर भी लें. तो फिर कपड़े एक तरफ करके थोड़ी और जगह की और ज़मीन पर ही उसके लिए भी एक दरी डालकर बिस्तर का इंतज़ाम किया गया.

अभी लेटे हुए उन्हें कोई एक घंटा भी नहीं हुआ था, कि संजू को बाहर कुछ ख़ुसर-पुसर सी सुनाई दी. कुछ देर तो वो ये अनुमान लगाता रहा कि ये आवाज़ घर के बाहर से आ रही हैं या अंदर से? फिर जब उसे कन्फर्म हो गया तो वो चुपके से उठा और जाकर दरवाजे के बीच की झिरी से आँख सटा कर बाहर देखने की कोशिश करने लगा. कुछ देर तो उसे कुछ नहीं दिखा बस आवाज़ें ही सुनाई दे रही थी, जो शर्तिया युसुफ और उसकी बहन वहीदा की थी. कुछ देर में उसकी आँखें अंधेरे की अभ्यस्त हो गयी और जैसे ही उसे बाहर का दृश्य क्लियर सा हुआ, जिसे देखते ही एक साथ उसके लन्ड ने ठुनकी सी लगाई.

युसुफ वहीदा को पीछे से जकड़े हुए था और उसके दोनों हाथ उसकी बड़ी-बड़ी 36” की चुचियों पर जमे हुए थे जिन्हें वो बड़ी बेदर्दी से मसल रहा था. युसुफ का लन्ड खड़ा होकर वहीदा की गान्ड में घुसा जा रहा था.

वहीदा बुरी तरह सिसक कर बोली – आआहह… भाई जान धीरे से मसलो ना… और कितने बड़े करोगे इनको??? अभी तो मेरा निकाह भी नहीं हुआ उससे पहले ही ये इतने बड़े हो गये है. बाहर चलते हुए जब हिलते हैं तो मुझे बड़ी लज्जा आती है. अब जल्दी से मेरा निकाह करवाओ… वरना कोई करेगा भी नहीं…

युसुफ – बस मेरी बहना.. शहर में शिफ्ट होते ही सबसे पहले तेरा निकाह पक्का.. कोई अच्छा सा लड़का मिलते ही सबसे पहला काम यही करूँगा..

शहर का नाम सुनते ही वहीदा पलट गयी. अपने भाई के गले से लिपट कर वहीदा के होंठों का रस चूसकर बोली – क्या सच भाई जान?? हम लोग शहर में शिफ्ट होंगे??

युसुफ ने वहीदा का कुर्ता उतार दिया. एक पुरानी सी ढीली ढाली ब्रा से बाहर उबल पड़ रहे उसके सुडौल मोटे-मोटे चुचों को देख कर युसुफ बावला सा होकर वहीदा के बूब्स पर टूट पड़ा. वहीदा ने भी युसुफ के पाजामा को नीचे खिसका दिया और उसके तन्नाए लन्ड को अपनी चूत की मोटी-मोटी फांकों पर घिसते हुए बोली – शहर में आप लोग क्या करोगे??

युसुफ का अपनी बहन के मखमली गुदाज बदन की गर्मी से बुरा हाल होने लगा था. ऊपर से वहीदा युसुफ के लन्ड को लगातार अपनी गीली चूत पर रगडे जा रही थी. वहीदा को पलटा कर युसुफ ने दीवार के सहारे झुका लिया. पीछे से वहीदा की गदरायी गान्ड पर हाथ फिराते हुए युसुफ बोला

युसुफ – पहले तो मैं अपनी सेक्सी बहन को जी भर कर चोदूँगा, उसके बाद बताता हूँ…

इतना कहकर युसुफ ने अपना गरम लन्ड वहीदा की चूत के छेद पर अड़ा दिया और सर्रर्रर्ररर.. से एक झटके में ही पूरा अंदर तक पेल दिया. वहीदा के मुँह से एक बेहद ही कामुक सिसकी निकल पड़ी.

साथ ही संजू का लन्ड भी उसके पाजामा के अंदर फुल फॉर्म में आ गया, वो लगातार बाहर झाँक कर उस गरम सीन में खोया हुआ था. उसे पता भी नहीं चला कि कब वो दोनों घोड़ियाँ आकर उसके आजू-बाजू खड़ी हो गयी. खड़ी ही नहीं हुई, बल्कि दोनों तरफ से वो संजू के बदन से सट कर अपने बदन को उसके साथ रगड़ने लगी…

जब संजू को इस बात का एहसास हुआ तो उसने बारी-बारी से दोनों की तरफ देखा, मानो उसकी कोई चोरी पकड़ी गयी हो. उस अंदाज में संजू ने अपनी गर्दन झुका ली.

रेहाना ने संजू की चौड़ी छाती को सहलाते हुए कहा – यहाँ क्यों खड़े हैं जनाब?? बाहर कोई तमाशा हो रहा है क्या??

संजू पीछे हटना चाहता था, लेकिन रेहाना ने मजबूती से जकड़ कर संजू को हिलने भी नहीं दिया और रुखसार से बोली.

रेहाना – देख तो रुखसार.. बाहर जनाब क्या नज़ारा देख रहे थे??

वैसे तो उन दोनों को भी पता था, फिर भी रुखसार ने झाँक कर देखा, जहाँ युसुफ हुंकार भरते हुए अपनी बहन की पीछे से चुदाई कर रहा था. युसुफ की जांघों की ठप-ठप जब वहीदा के चुतड़ों पर पड़ती, तो उनमें मानो भूचाल सा आ जाता और वो दोनों सागर की लहरों की लहराकर ऊपर को हो जाते.

रुखसार – हाय… रेहाना… क्या गरमा-गरम चुदाई हो रही है?? दीदी और भाई की… देख तू भी देख…

संजू समझ गया कि ये तीनों ही बहनें चुदक्कड़ हैं… और इन्हें अपने ही सगे भाई से चुदवाने में कोई एतराज़ नहीं है…

संजू पीछे खिसकते हुए बोला - तुम दोनों मज़े लो. मैं चला सोने…

लेकिन जैसे ही संजू पलटा, पीछे से रुखसार संजू से चिपकते हुए बोली – अब इतना अच्छा सीन तो आप ही की वजह से देखने को मिला है… तो इसका समापन भी तो तुम्हें ही करना पड़ेगा जनाब…

संजू रुखसार के हाथ हटाते हुए बोला – यहाँ खड़े-खड़े ही चुदना चाहती हो.. अपनी दीदी की तरह??

संजू के मुँह से रज़ामंदी भरे शब्द सुनकर दोनों घोड़ियाँ कुलाँचें भरती हुई अपनी तख़्ती पर जा जमी. बीच में संजू के लिए जगह बनाकर वो दोनों बड़ी बेसब्री से संजू का इंतजार करने लगी... बाहर का गरमा गरम स्टेज शो कुछ देर और चला, फिर वहाँ एक दम से शांति छा गयी. गरम-गरम आहों का बाज़ार अब थम चुका था. इसका मतलब उन दोनों का कार्यक्रम अब समाप्त हो चुका था. लेकिन उसकी वजह से इस छोटे से कोठे का तापमान काफ़ी बढ़ चुका था…

दोनों बहनों को उनके अपने सगे भाई बहन की चुदाई के सीन ने इतना ज़्यादा कामोत्तेजित कर दिया था कि अब उन्हें संजू के उस दो कदम के फ़ासले को भी सहन करना दूभर लग रहा था. दोनों की चूत में मानो भट्टियाँ जल रही थीं. रेहाना एक हाथ से अपनी चूत को सहलाते हुए दूसरे हाथ की उंगली को अपने मुँह में डालकर चूसते हुए बोली.

रेहाना – क्या नई नवेली दुल्हन की तरह आ रहे हो.. जल्दी करो ना…

संजू के उन दोनों के पास आने तक उन दोनों ने समय बरबाद ना करते हुए अपने-अपने कुर्ते निकाल फेंके. उन दोनों हवस में अंधी हो रही जवान घोड़ियों को इस अवस्था में देखकर संजू का लन्ड उसके पाजामे में कबड्डी खेलने लगा. उसे लगा कि कहीं साला कपड़े फाड़कर बाहर ना निकल पड़े. जैसे ही संजू उन दोनों के सामने जाकर खड़ा हुआ, रेहाना के सब्र का बाँध टूट गया. बड़ी बेदर्दी से संजू का हाथ पकड़ कर एक ज़ोर का झटका दिया, वो धप्प से उन दोनों के बीच में फँस गया. संजू ने अपने एक-एक हाथ को उनकी गर्दन के पीछे से निकाल कर दोनों की एक–एक चुचि पर कब्जा जमा लिया. उन्हें तेज़ उमेठते हुए बोला

संजू – तीनों बहनें बड़ी गरम माल हो तुम लोग..

रुखसार ने संजू के पाजामे को नीचे सरका दिया. अंडरवियर के ऊपर से ही संजू के तनतनाते लन्ड को मुँह दबोचते हुए बोली.

रुखसार – यहाँ भी कुछ कम गर्मी नहीं है जनाब…

संजू के मुँह से एक कराह निकल गयी – सस्सिईईईई.. आअहह… उसके थोबड़े को क्यों मसल रही है??

इतना कहकर संजू ने रुखसार के होंठों को अपने मुँह में भर कर चब-चबा डाला. रुखसार बस मुँह ही मुँह में गूँ… गूँ… करती रह गयी.

दूसरी तरफ रेहाना ने संजू के टीशर्ट और अपनी ब्रा को नोच डाला और अपनी 34” के बूब्स को संजू की चौड़ी कठोर छाती से रगड़ने लगी. रेहाना के निप्पल कड़क होकर जंगली बेर जैसे हो गये. रुखसार ने होंठ चुसाई करते हुए ही हल्के से अपनी गोल-मटोल गान्ड अधर की और अपनी पजामी को भी टाँगों से बाहर निकाल दिया. अपने बूब्स को संजू के सीने से रगड़ती हुई रेहाना ने पैंटी के ऊपर से ही अपनी छोटी बहन रुखसार की चूत को सहला दिया. मज़े से रुखसार की कमर और आगे को सरक गयी. संजू होंठों के साथ-साथ रुखसार की चुचियों को भी मथ रहा था. पुरानी अंगिया ना जाने कब धाराशाई हो चुकी थी. इधर रेहाना ने भी रुखसार की पैंटी सरका दी और अब वो रुखसार की चूत में अपनी उंगलियाँ डालकर उसे चोद रही थी. रुखसार से ये दोहरा हमला सहन नहीं हुआ, उसकी चूत लगातार रस छोड़ने लगी थी. चूत की गर्मी ने उसे इतना बहाल कर दिया कि संजू की छाती पर अपनी हथेली का भार डालकर उसे तख़्ती पर धकेल दिया. रुखसार अपनी गरम दहकती चूत को संजू के लन्ड पर सेट कर के उसपर बैठती चली गयी. पूरा लन्ड अंदर पहुँचते-पहुँचते रुखसार के मुँह से एक बेहद मादकता भरी आहहह… निकल गयी. आअहह… उउउम्म्मन…. जिसे सुनकर संजू अपनी गान्ड उचकाते हुए बोला.

संजू – क्यों रुखसार… बिना कटे लन्ड को लेकर मज़ा आया कि नहीं??

रुखसार - हाय अल्लाह… कितना लंबा है… उउउफफफ्फ़… बड़ा मज़ा दे रहा है ये तो…

कहते हुए रुखसार संजू के लन्ड पर कूदने लगी. कुछ देर बाद संजू ने भी नीचे से धक्के लगाना चालू कर दिया. उन दोनों की मदमस्त चुदाई देख कर रेहाना का हाल बेहाल होने लगा. अब रेहाना की चूत में भी बुरी तरह से चींटियां सी काटने लगी थी. रेहाना की चूत में लगी आग का जल्दी ही बुझना ज़रूरी था. रेहाना को इन दोनों की चुदाई जल्दी खतम होने के आसार नज़र नहीं आ रहे थे. तो उसने भी अपनी पैंटी निकाल फेंकी और रुखसार की तरफ मुँह करके वो संजू के मुँह पर अपनी चूत रख कर बैठ गयी. संजू ने भी उसकी मस्त सेक्सी मदमाती मखमली गान्ड पर थपकी देकर उसकी गीली चूत के रस को अपनी जीभ डालकर चपर-चपर चाटने लगा. दोनों बहनें किसी बैलगाड़ी के हिचकोलों की तरह संजू के ऊपर और नीचे लहरा रही थी. दोनों के हाथ एक दूसरी की चुचियों पर जम गये और वो दोनों आपस में एक दूसरी के होंठ भी चूसती जा रही थी. तीनों की आहों कराहो से उस छोटे से कोठे का तापमान बहुत बढ़ चुका था, वातावरण में चुदाई की खुशबू महकने लगी थी.

कुछ देर में ही रुखसार अपना पानी निकाल बैठी. तूफ़ानी रफ़्तार से अपनी गान्ड को आगे-पीछे घिसते हुए रुखसार भलभलाकर झड़ने लगी. थोड़ी देर तक रुखसार यूँ ही शांत संजू के ऊपर बैठी रही. उधर रेहाना का लावा भी फूटने वाला था. रेहाना भी अपनी चूत को संजू के मुँह पर दबाकर झड़ने लगी और अपना सारा अमृत कलश संजू के मुँह में खाली कर दिया. फिर दोनों ने बारी-बारी से संजू के लन्ड को चूसा. कुछ देर में ही उन दोनों ने बराबर-बराबर मात्रा में उसके लन्ड का प्रसाद अपने पेट में उतार लिया. चुसाई से रेहाना की चूत की खुजली कम होने की बजाए और तेज हो गयी थी, जो आग एक मोटे लन्ड के चूत की दीवारों से रगड़ने से बुझनी चाहिए वो जीभ से कहाँ बुझने वाली थी. रेहाना ने संजू के होश लौटने का भी इंतजार नहीं किया और संजू के मरे चूहे जैसे मुरझाए लन्ड पर बुरी तरह टूट पड़ी. संजू भी आख़िर जवान मर्द था, दो मिनट में ही उसका लन्ड फिर से टनटना कर दूसरी चूत में जाने के लिए तैयार था. घोड़ी बनाकर इस बार रेहाना की चूत की उसने वो चुदाई की, वो हाय तौबा मचाती हुई उसके लन्ड पर अपनी गान्ड पटक-पटक कर चुदने लगी. दोनों ही बहनें बहुत ही गरम माल निकली. पूरी रात वो तीनों जागकर भरपूर चुदाई का मज़ा लूटते रहे. संजू की सारी टंकी उन दोनों ने खाली कर दी और खुद भी खाली हो गयी.

दूसरे दिन खाना खा पीकर युसुफ गांव में अपने यार दोस्तों से मिलने चला गया. संजू से पूछा तो उसने रात की थकान के कारण मना कर दिया. मौके का फ़ायदा उठाकर उन दोनों घोड़ियों ने वहीदा को भी संजू से चुदवा दिया. ये घोड़ी तो बिल्कुल खोखली निकली. संजू को उसकी चूत मारने में बिल्कुल मज़ा नहीं आया. फिर उसने लौड़े को चूत से निकालकर उसकी गान्ड में डाल दिया. हिनहिना कर वो घोड़ी उसके लन्ड को गान्ड में भी आसानी से ले गयी.

गान्ड पर थप्पड़ लगाते हुए संजू ने कहा – तू तो सब तरफ से खोखली है वहीदा. बहुत लन्ड खोर लगती है, कितने ले चुकी है अब तक??

वहीदा ने अपनी गान्ड पीछे धकेलते हुए कहा – तुझे जैसे मज़ा मिलता है वैसे ले ना… लन्ड की गिनती जानकर क्या करेगा??? मैं चुदने के मामले में कभी परहेज नहीं करती, जैसा मिले ले लेती हूँ…

एक बार वहीदा की गान्ड में अपना पानी निकाल कर संजू गहरी नींद में डूब गया. तीसरे दिन उन सबने कुछ ज़रूरत का समान एक टेंपो में लादा और शहर की तरफ रवाना हो लिए. शहर में इतना बड़ा और अच्छा मकान देख कर युसुफ के परिवार वाले खुश हो गये. जहाँ जिसको अच्छा लगा अपना डेरा जमा दिया. थोड़े ही दिनों में उनके धंधे का खोम्चा इस शहर में जम गया. उनके ही गैंग के एक वफादार मुस्लिम जो तलाकशुदा था, उससे वहीदा का निकाह करा दिया. तीनों बहनें भी उसी धंधे में लग गयी. हिजाब में छुपा कर माल सप्लाई करने में वो माहिर हो गयी. कोई येड़ा कस्टमर होता उसे वो अपने हुस्न-शबाब के दर्शन कराकर काम निकाल लेती थी. उन्हें अपना काम निकालने के लिए किसी के सामने चूत खोलने पर भी कोई एतराज नहीं होता था.

कुछ ही दिनों में युसुफ और संजू गैंग ने अपने झंडे गाड़ दिए. उनकी परफॉरमेंस देख कर लीना बहुत खुश थी. उसने भी अपना मुंबई का धंधा कुछ भरोसेमंद लोगों को सौंपा, खुद भी इसी शहर में एक अच्छा सा बंगला खरीद कर शिफ्ट हो गयी. दिन-दूनी रात चौगुनी तरक्की से वो कुछ ही दिनों में एक छोटी-मोटी ड्रग डीलर से एक बड़े माफिया ग्रुप में तबदील हो गये..
Jabardast update and nice story
 
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Tri2010

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UPDATE 81

बहुत दिन हो गये कहानी के मुख्य किरदारों से दूर रहते हुए. ख़ासकर मोहिनी भाभी की तो बहुत याद आती होगी आप सभी को, जिसके बिना अपना हीरो भी कुछ नहीं है.

समय काफ़ी तेज़ी से आगे बढ़ रहा था, जैसा कि मैंने तय किया था कि जब हमारा शहर वाला बंगला तैयार हो जाएगा. हमारा सारा परिवार चाची के अंश को लेकर शहर शिफ्ट हो जाएगा. शहर में आकर कुछ दिन बाद ही नेक्स्ट सेशन से बड़े भैया ने भी गुप्ता जी के डिग्री कालेज में बतौर प्रोफेसर जॉइन कर लिया.

मेरी बिटिया जिसका नाम मोहिनी भाभी ने तृष्णा रखा, वो भी अब बोलने, चलने फिरने लगी थी. इसी बीच रुचि ने भी 10 पास कर लिया था. छाया ने अपना ग्रेजुएशन कर लिया था. कृष्णा भैया उसे पुलिस में सेलेक्ट करवाना चाहते थे, लेकिन छाया का दिल नहीं था कि वो किसी बंधन में रह कर काम करे. शुरू से ही छाया मेरे साथ रहने के कारण स्वतंत्र रहने की आदि थी.

एक दिन मैं भी कृष्णा भैया के बंगले पर ही था. हम तीनों के बीच इसी बात को लेकर चर्चा थी. भैया छाया पुलिस जॉइन करने को प्रोत्साहित कर रहे थे, लेकिन उसका मन नहीं था. तो वो मेरी तरफ मुखातिब होकर बोली.

छाया – अंकुश.. आप बताओ मुझे क्या करना चाहिए?? वैसे मैं अपने देश और क़ानून की बहुत इज़्ज़त करती हूँ. लेकिन किसी बंधन में रह कर क़ानून की हिफ़ाज़त करना मुझे गवारा नहीं है, ख़ासकर पुलिस में.. जहाँ अपने मन से कोई भी डिसिशन ले ही नहीं सकते. हम कुछ अच्छा करना भी चाहें तो ऊपर के प्रेशर की वजह से कभी-कभी हाथ बँधे होते हैं.

कृष्णा – तो फिर छोड़ो सब कुछ और आराम से तुम घर संभालो. हमें भी ऐसी कोई ज़रूरत भी नहीं है कि तुम कुछ करो ही करो.

छाया – लेकिन मुझे खाली बैठना भी तो अच्छा नहीं लगता. जो कुछ अब तक मैंने अंकुश के साथ रहकर सीखा और जाना है उसे वेस्ट भी करना नहीं चाहती.

मैं - मेरे पास तुम्हारे लायक एक बहुत ही उम्दा प्लान है.. अगर पसंद हो तो??

मैंने उन दोनों की बातों के बीच पड़ते हुए कहा. वो दोनों मेरी तरफ देखने लगे. मैंने अपनी बात जारी रखते हुए कहा.

मैं – क्यों ना तुम एक प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसी खोल लो. तुम्हारा टैलेंट भी काम आता रहेगा और इनडाइरेक्टली क़ानून और पुलिस की मदद भी करती रहोगी… क्यों क्या ख्याल है??

मेरी बात पर कृष्णा भैया कुछ नाखुश नज़र आए, लेकिन छाया उनकी नापसंदगी को नजरंदाज करते हुए बोली – बात तो पते की है, लेकिन इस काम को मैं अकेली तो नहीं कर पाऊँगी… अंकुश तुम्हें इसमें मेरा साथ देना होगा…

मैं – ज़रूर… मेरे पास भी इतना ज़्यादा काम नहीं होता है… उसे जूनियर स्टाफ कुछ हद तक संभाल ही लेता है… एजेंसी ज़रूर तुम्हारे नाम से होगी.. लेकिन ज़्यादातर फील्ड वर्क हम दोनों ही मिलकर संभालेंगे.. क्यों भैया?? फिर तो आपको कोई प्राब्लम नहीं है इस काम से?

कृष्णा भैया हथियार डालते हुए बोले – जैसा तुम दोनों ठीक समझो.. चलो अच्छा है कुछ मेरे केस भी आसानी से हल हो जाया करेंगे जिन्हें मैं सिस्टम के बंधनों के कारण नहीं कर पाता..

बात फाइनल करते ही मैं इस काम में जुट गया. छाया के नाम से एक डिटेक्टिव एजेंसी रजिस्टर कर दी. एड देकर कुछ इच्छुक युवकों का स्टाफ भी रख लिया जिससे शुरुआत करने में आसानी रहे. हमारे प्रयासों से धीरे-धीरे कुछ छोटे-मोटे केस भी आने लगे, जैसे किसी की पत्नी अपने पति की जासूसी करवाना चाहती थी, कोई पति अपनी पत्नी की. किसी का किडनैप का केस तो किसी के यहाँ चोरी चकारी का. पुलिस में एसएसपी तक की पावर थी ही. लॉ को ध्यान में रखते हुए छाया की डिटेक्टिव एजेंसी का काम जमने लगा.

मुझे ये तो पता ही था कि भानु उस किलिंग में बच निकला है और बहुत हद तक वो इस शहर में तो रहेगा नहीं. तो मुमकिन है वो फिर से अपनी बहन शालिनी के पास ही गया होगा. हमने अपने कुछ लोग उसकी टोह में लगा दिए. ऐसे साँप पर नज़र रखना बेहद ज़रूरी भी था. क्या पता मौका देख कर कब अपना जहर उगल दे. इसी दौरान छाया ने ये पता लगा लिया कि भानु की बीवी शिखा इस शहर को छोड़कर अपनी ननद वाले शहर में शिफ्ट हो चुकी है. मेरा अनुमान सही निकला, तो ज़रूर भानु भी वहीं होना चाहिए. क्योंकि उसकी नज़र में पुलिस या मुझे ये नहीं पता होगा कि वो बच निकला है. तो बस लोकल पुलिस की नज़रों से बच कर वो कहीं भी रह सकता है. कस्बे की ज़मीन जायदाद बेचकर उसके पिता सूर्य प्रताप भी वहीं बस गये थे. लड़के की करतूतों से उनकी कमाई हुई इज़्ज़त मिट्टी में जो मिल गयी थी, तो फिर वहाँ रह कर करते भी क्या??

उधर पड़ोस के ही शहर में ड्रग्स और हथियारों की तस्करी अप्रत्याशित रूप से बढ़ने लगी थी, जिसका थोड़ा बहुत असर आस-पास के शहरों तक पड़ना स्वाभाविक ही था. ये भी सर्व विदित है की पुलिस कहीं की भी हो उसका हाथ इन माफियाओं के साथ हो ही जाता है. 100 में से कोई एक अधिकारी ईमानदार भी हो तो उसे अपनी जान की परवाह बनी रहती है. यही हाल उस शहर का भी था नतीजा लीना का तस्करी का कारोबार खूब फल फूल रहा था. ऊपर से संजू की ख़ूँख़ार प्रवृति ने इलाक़े में दहशत फैला रखी थी. उसके हाथों कुछ मर्डर भी हो चुके थे, लेकिन लीना की पहुँच पुलिस प्रशासन में बहुत ऊपर तक थी. ऊपर से वो बेहद सुन्दर भी थी. आज के युग में जहाँ किसी चीज़ से काम ना बने वहाँ औरत के कामबान काम आ ही जाते हैं. युसुफ की तीनों बहनें भी इस काम में दक्ष हो चुकी थी. शबाब और पैसे से आज कुछ भी हासिल हो सकता है. तो बस लीना दिनों-दिन अपना कारोबार बढ़ाती जा रही थी. जिसकी गूँज 70-80 किमी दूर हमारे इस शहर तक भी पहुँच गयी. लेकिन यहाँ की पुलिस के कुछ ईमानदार प्रयासों से उनके पैर इस शहर में जम नहीं पा रहे थे.

हमारे आदमी भानु पर नज़र रखने की वजह से इस शहर की खबरें भी रखते थे. भानु पर नज़र रखने के साथ-साथ हमने उन्हें इस गैंग की अधिक से अधिक जानकारी जुटाने में लगा दिया.

लीना के बेहद करीबी युसुफ और संजू का हमें पता चल चुका था, इसलिए अब हमने खुद मैदान में कूदने का फ़ैसला कर लिया. सबसे पहले हमने उन दोनों की जन्म कुंडली निकालने का प्रयास किया. युसुफ तो लोकल ही था, तो उसकी सारी डीटेल्स आसानी से मिल गयी. लेकिन संजू महाराष्ट्र से था तो उसका बैकग्राउंड पता करने में थोड़ी मशक्कत करनी पड़ी. लेकिन एक बात जो उसकी खास थी, वो थी उसके हाइ एमोशन्स. आगे पीछे कोई था नहीं उसके, जिसके लिए वो कमाने खाने का लालच रखता हो. बस कुछ था तो युसुफ के साथ लगाव वो भी उसने उसकी जान बचाई थी इसलिए और यहाँ आकर उसकी बहनों की चूतें जिन्हें वो जब चाहता चोद लेता था. हां लेकिन आज भी उसकी पहली पसंद थी लीना, भले ही वो युसुफ की दोनों बहनों की तुलना में उम्र दराज थी. लेकिन नियमित एक्सरसाइज और अच्छे रहन सहन के कारण वो आज भी उनसे ज़्यादा जवान और मर्द मार औरत दिखती थी.

मैंने छाया को संजू के पीछे लगा दिया. लेकिन वो ज़्यादातर अपने साथ दो-चार गुर्गे रखता ही था. फिर भी मौका तो निकालना ही था. जो कभी ना कभी किसी मोड़ पर मिल ही जाना था. छाया अपनी तरफ से पूरी कोशिश में जुटी थी, तभी एक अजीब घटना प्रकाश में आई. जो हमारे आदमी को कुछ देर से पता चली. हुआ यों कि एक दिन लीना एक बड़े से शॉपिंग माल से बाहर निकली, माल से बाहर आते ही उसके इंतजार में खड़े उसके आदमी जिनमें युसुफ तो माल के अंदर से ही उसके साथ था बाहर से तीन और साथ हो लिए. हर समय वो एक दम सजी-धजी, कंधे तक के सुनहरी बाल. सिर पर गोल कैप जिससे कुछ हद तक उसका चेहरा दूर से नज़र नहीं आता था, आँखों पर स्याह काले गॉग्ल्स. अभी वो पार्किंग में खड़ी अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ ही रही थी कि अपने पास से ही आती हुई एक जानी पहचानी सी आवाज़ ने उसे ठिठकने पर मजबूर कर दिया..

बगल से गुज़रते हुए एक सरदार ने उसे धीरे से पुकारा - अरे कामिनी मैडम आप??

ये शब्द सुनते ही लीना के कदम वहीं थम गये और किसी स्वचालित खिलौने की तरह वो आवाज़ की दिशा में घूम गयी...

इन शब्दों में ना जाने कैसा जादू सा था. सुनते ही लीना बुरी तरह से चौंक पड़ी. उसे उस सरदार की आवाज़ कुछ जानी-पहचानी सी भी लगी. लीना पलटकर उस सरदार की तरफ देखने लगी जो उसे ठिठकता देख लपक कर उसकी ओर आने लगा. युसुफ के लिए ये नाम नितांत नया था. उसने अपने आस-पास नज़र घुमा कर देखा लेकिन उसे दूर-दूर तक कोई और महिला दिखाई नहीं दी. उसने उस सरदार को अपने पास आने से रोकना चाहा तो लीना ने हाथ का इशारा करके उसे रोक दिया और सरदार को अपने पास आने दिया.

उसके अत्यधिक नज़दीक जाकर वो सरदार लगभग फुसफुसा कर बोला – पहचाना मैडम?? मैं भानु… आपके लिए काम किया करता था…

लीना ने अपने होंठों पर उंगली रखकर उसे चुप रहने का संकेत किया और चुपचाप अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ते हुए बोली – आओ मेरे साथ…

लीना ने युसुफ को दूसरी गाड़ी में आने का इशारा किया और भानु को लेकर वो अपनी गाड़ी में आकर बैठ गयी. रास्ते में भानु अपने मन की उत्सुकता को नहीं दबा पाया और बोला.

भानु - मैंने तो सुना था मैडम कि आप भी उस हादसे में बाकी लोगों के साथ ही…

लीना जो वास्तव में कामिनी ही थी बोली – पहली बात… अभी मैं इस नाम को भूल चुकी हूँ.. मेरे सभी आदमी मुझे लीना के नाम से जानते हैं, तो आगे से इस बात का ख्याल रखना.. रही बात मेरे मरने या जीवित होने की तो सभी को यही अनुमान था कि मैं भी वहीं खतम हो गई हूँ, लेकिन मेरा भाग्य अच्छा था… अंकुश मुझे गोली मारने के बाद ज़्यादा देर तक वहाँ नहीं रुका.. भाग्यवश गोली भी मेरे सीने में दिल से ज़रा हटकर लगी थी, मैं उस समय तो अपने होश खो ही चुकी थी. लेकिन तभी मेरा ड्राइवर रामसिंह गुप्त गैलरी में हुई उस फायरिंग की आवाज़ सुनकर दौड़ता हुआ वहाँ जा पहुँचा, तब तक अंकुश मुझे मरा समझकर वहाँ से जा चुका था… ड्राइवर ने मुझे आनन-फानन में उठाकर गाड़ी में डाला और समय रहते वो मुझे मेरे पर्सनल डॉक्टर के पास ले गया, जहाँ उसने समय पर मेरी गोली निकाल दी. दूसरे दिन जब मुझे होश आया तो मैं पूरी तरह ख़तरे से बाहर थी. एक हफ्ते वहीं रहकर मैंने डॉक्टर को ढेर सारा इनाम दिया और फिर हम तीनों ने ही चुपके से वो शहर छोड़ दिया. रामसिंह तो आज भी मेरे साथ ही है जो अभी भी तुम्हारे सामने, मेरी गाड़ी चला रहा है. सही मायने में मुझे दूसरी जिंदगी देने वाला यही है. कुछ साल मैंने मुंबई में गुज़ारे, फिर मुझे एक दिन दो हीरे हाथ लगे, जिनमें एक जो अभी तुम्हें मेरे पास आने से रोक रहा था दूसरा कहीं मार-पीट में उलझा होगा. युसुफ यहीं कहीं पास के गांव का है. इसको पैसों की ज़रूरत थी, दोनों मिलकर मुंबई में छोटी-मोटी वारदातें किया करते थे. तो मैंने उन्हें अपने साथ ले लिया. कुछ समय पहले ही मैंने यहाँ अपना कारोबार शुरू किया है, दोनों की लगन और टीम वर्क से कुछ ही समय में मैं पहले से भी बड़ी ड्रग्स और हथियारों की डीलर बन चुकी हूँ. अब तुम अपने बारे में बताओ. तुम इस तरह भेष बदलकर क्यों छुपते फिर रहे हो??

भानु एक लंबी सी साँस छोड़कर बोला – मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था मैडम.

फिर उसने श्वेता के कहने पर अंकुश के किडनैप और उसके साथ श्वेता ने क्या-क्या किया, वो सब उसे बताता चला गया.
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UPDATE 82

कामिनी ये सब मुँह बाए सुनती रही. फिर जब उसने बताया कि कैसे मोहिनी ने आकर उसे उनके चंगुल से निकाला जिसे सुनकर कामिनी के मुँह से किसी ज़हरीली नागिन की तरह फुफकार निकली.

कामिनी - वो हरामज़ादी कुतिया हर बार मेरे रास्ते का काँटा बनती रही है… अब मैं सबसे पहले उसको ही अपने रास्ते से हटाऊंगी, उसके बाद उस हरामज़ादे अंकुश से अपना बदला लूँगी…

फिर एक गहरी साँस छोड़ते हुए कामिनी बोली - खैर आगे बोलो… फिर क्या हुआ??

भानु – मैं किसी तरह वहाँ से बच निकला और इसी शहर में अपनी बहन के पास छुपकर रहने लगा… वहाँ की पुलिस कुत्ते की तरह मुझे तलाश कर रही थी. फिर ना जाने कहाँ से उस हरामज़ादे वकील अंकुश को मेरे यहाँ होने की भनक लग गयी… शिकारी कुत्ते की तरह सूंघते हुए वो उसी जोसेफ के भेष में मेरी बहन से मिला… पुराने धंधे को दुबारा खड़ा करने का लालच देकर उसने मेरी बहन से मेरा पता निकलवा लिया… सच कहूँ तो मैं भी उसके झाँसे में फँस गया और एक बार फिर उसके हत्थे चढ़ गया… मुझे ब्लैकमेल करके उसने वो कांड करा दिया जिसकी कल्पना करते ही मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं.

भानु ने कामिनी को वो सब बताया जो उसने श्वेता और उसकी फ्रेंड के साथ किया था.

भानु - फिर उसने ना जाने कैसे श्वेता के पति को वहाँ भेज दिया, जिसने हमारा सारा गैंगबैंग अपनी आँखों से देख लिया. गुस्से में अंधे पुष्पराज ने वहाँ मौजूद सबको गोली से उड़ा दिया और खुद को भी गोली मार ली. उस सामूहिक हत्याकांड में मैं भाग्यवश बच गया, गोली मेरे सिर की एक साइड को चीरते हुए निकल गयी थी. हालाँकि घाव काफ़ी गहरा था, लेकिन किसी तरह बचते बचाते में शहर के विपरीत दिशा में जंगलों की ओर निकल गया, जहाँ एक नदी तक पहुँचते-पहुँचते मेरे होश जवाब दे गये. नदी के पानी में हाथ देते ही में वहीं पानी में गिर गया. मुझे नहीं पता मैं कितने दिन बेहोश रहा, लेकिन जब होश में आया तो किसी छोटे से गांव में किसी मल्लाह (केवट) की छोटी सी झोंपड़ी में था. जो नदी से मुझे अपने घर ले आया और उसने देशी जड़ी बूटियों के सहारे नई जिंदगी दी. उसी के मुताबिक में पूरे एक हफ्ते तक बेहोश रहा था. वहाँ से किसी तरह भेष बदलकर मैं फिर से इसी शहर में आ बसा हूँ. पुलिस रेकॉर्ड में मैं मर चुका हूँ, जिसका फ़ायदा उठा रहा हूँ.

कामिनी – तो अब क्या प्लान है??

भानु – घर गृहस्थी तो जैसे चलनी थी वैसे चल रही है. पापा ने अपने नाम से कुछ कारोबार शुरू किया है, लेकिन अब जब आप दोबारा मिल ही गयी हैं तो एक बार फिर उस हरामज़ादे वकील अंकुश को सबक सिखाने का दिल करने लगा है.

कामिनी – तुम चिंता मत करो… इस बार उसे उसके परिवार के साथ पूरी तरह खतम करके ही रहूंगी… मैं उसे मरते दम तक नहीं भूल सकती, जिसके कारण मेरा कारोबार, घर-परिवार सब कुछ तबाह हो गया… उसे मैं यूँ ही आसानी से कैसे भुला सकती हूँ?? सच पूछो तो मेरा मुंबई से यहाँ आने का मक़सद भी यही है. आज मेरे पास पैसा हैं, ताक़त है और सबसे बढ़कर एक ऐसा आदमी है जिसे बस एक बार इशारा करना है, वो उसके घर में घुसकर सब कुछ तबाह कर देगा.

भानु उत्साहित स्वर में बोला – तो फिर देर किस बात की मैडम?

कामिनी – मैं उसे इतनी आसानी से नहीं मारूँगी… उसे पहले अपनों के लिए तड़पना होगा… ख़ासकर उसकी उस प्यारी मोहिनी भाभी के लिए… जिसने उसे इस काबिल बनाया है… बस तुम कुछ दिन मेरे साथ रहकर मेरे आदमियों के साथ काम में हाथ बँटाओ… उन्हें समझो… अपने को उनके साथ ढालो… हम जल्दी ही इस काम को अंजाम देंगे…

फिर कामिनी ने अपने ड्राइवर को रास्ते में ही गाड़ी रोकने का इशारा किया. भानु को वहीं उतारकर अपने अड्डे का पता देकर खुद आगे बढ़ गयी. उसी शाम संजू एक छोटे से गैंग से अपने माल की वसूली करके लौट रहा था. अपने गुर्गों को उसने उनके घर भेज दिया और अकेला ही अड्डे की तरफ जा रहा था. अंधेरा घिर चुका था, शहर की ख़स्ताहाल व्यवस्था ये थी कि मैं सड़क पर भी स्ट्रीट लाइट ना के बराबर थी. इस समय उसकी बाइक एक संकरी अंधेरी गली से गुजर रही थी, कि तभी उसने अपनी बाइक की हेड लाइट में कुछ इंसानी जिस्मों को हरकत करते देखा. थोड़ा नज़दीक आने पर पता चला कि 4 लफंगे एक अकेली लड़की के साथ छेड़-छाड़ कर रहे हैं. सलीके के सलवार सूट पहनी वो लड़की यथा संभव अपने आप को उन गुण्डों से बचाने के लिए जद्दोजहद कर रही थी. जगह-जगह से उसके कपड़े फट चुके थे जहाँ से उसका दूधिया अंग दिखाई देने लगा था. वो मदद के लिए गुहार भी लगा रही थी, लेकिन वहाँ कोई सुनने वाला हो तब तो आए और अगर कोई सुन भी रहा होगा तो अपनी जान बचाने की गरज से देख कर भी अनदेखा करके खिसक लिया होगा. संजू ने उनसे कुछ दूरी पर अपनी बाइक रोकी, उसे साइड स्टैंड पर टिकाया और वहीं से उसने उन लोगों को चेतावनी देते हुए कहा.

संजू - छोड़ो उसे… क्यों परेशान कर रहे हो एक बेचारी लड़की को??

लेकिन उन गुण्डों पर उसकी बात का कोई असर होता दिखाई नहीं दिया और वो उसे लगातार उसके बदन से खिलवाड़ करने में लगे रहे. संजू को ये बात असहनीय लगी और वो लपक कर उन गुण्डों के पास जा पहुँचा. जाते ही उसने आनन-फानन में दो को पकड़ कर एक तरफ को उछाल दिया. देखते ही देखते वहाँ घमासान छिड़ गया. संजू उनपर भारी पड़ रहा था. अकेले ने उन चारों गुण्डों को दुम दबाकर भागने पर मजबूर कर दिया. जब चारों वहाँ से जान बचाकर भाग खड़े हुए तब संजू ने उस लड़की की तरफ ध्यान दिया, जो सड़क के एक अंधेरे से कोने में बैठी डर के मारे घुटनों में मुँह देकर सुबक रही थी. संजू ने धीरे से उसके कंधे पर अपना हाथ रखा. वो लड़की उसका हाथ रखते ही बुरी तरह से काँप गयी.

सिर उठाकर देखा तो संजू बोला– घबराओ नहीं… वो लोग भाग गये अब तुम्हें डरने की कोई ज़रूरत नहीं है…

लड़की उठकर उसके सीने से लिपट गयी और फूट-फूट कर रो पड़ी.

संजू ने उसकी पीठ सहलाते हुए कहा – कौन हो तुम और यहाँ क्या कर रही थी??

लड़की – मैं कोचिंग से आ रही थी, कि तभी ये गुंडे मेरे पीछे लग लिए. मैंने तेज-तेज कदम बढ़ाकर बचने की कोशिश की लेकिन यहाँ अंधेरे में आते ही उन्होंने मुझे ज़बरदस्ती पकड़ लिया और मेरे साथ….

संजू – कहाँ रहती हो??? आओ मैं तुम्हें छोड़ देता हूँ…

लड़की – मैं कुछ दूर पर एक कमरा किराए पर लेकर रहती हूँ. गांव से यहाँ पढ़ने आई थी, भगवान आपका भला करे… समय पर आकर आपने मेरी इज़्ज़त बचा ली, वरना मैं कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रहती.

संजू – चलो मैं तुम्हें तुम्हारे कमरे तक छोड़ देता हूँ.

इतना कहकर संजू अपनी बाइक पर जा बैठा, पीछे वो लड़की भी बैठ गयी. कुछ देर बाद वो एक मामूली सी बस्ती के एक कोने में बने एक छोटे से मकान के एक बाहरी साइड बने कमरे में बैठे थे.

लड़की – मैं आपको क्या कहकर बुलाऊँ??

संजू – मेरा नाम संजू है. तुम मुझे अपना भाई मान सकती हो.

लड़की – मेरा नाम निर्मला है और सच कहूँ तो आप मुझे मेरे भाई ही लगे, जिसने अपनी जान जोखिम में डाल कर आज एक अंजान लड़की की इज़्ज़त बचाकर अपने भाई होने का सबूत दिया है… वैसे आप करते क्या हैं?

संजू निर्मला के इस सवाल पर चुप रह गया. जब कुछ देर उसने कुछ नहीं बोला तो निर्मला बोली – कोई बात नहीं अगर आप नहीं बताना चाहते तो ना सही.. वैसे भी इस अंजान शहर में आपको भाई मानकर मैंने कोई तो अपना पाया है. अब काम जो भी हो उससे हमारे नये रिश्ते पर क्या फर्क पड़ना है??

संजू – ऐसी बात नहीं है निर्मला… दरअसल मैं जो करता हूँ, उसे जानकर कहीं तुम मुझसे नफ़रत ना करने लगो.. ना जाने मेरे मुँह से क्यों तुम्हारे लिए बहन शब्द निकल गया, वरना मैं तो इतना गिरा हुआ इंसान हूँ, जिसने अपनी खुद की सगी बहन को अपनी नाकामियों की बलि चढ़ा दिया.

इतना कहते-कहते संजू का गला भर आया. लाख रोकने पर भी उसकी आँखों में दो बूँद पानी की तैर गयी. निर्मला ने उसके पास जाकर अपना सिर उसके कंधे पर टिका दिया.

निर्मला हाथ से संजू की पीठ पर बड़े स्नेह से सहलाते हुए बोली – मैं ये कभी नहीं मान सकती कि तुम्हारे जैसा भाई अपनी बहन के साथ कुछ भी ग़लत कर सकता हो या किया हो. ज़रूर कुछ ऐसे हालत रहे होंगे, जिनके हाथों इंसान हमेशा मजबूर होता आया है. अगर चाहो तो अपना गम इस बहन के साथ शेयर कर सकते हो, मन हल्का हो जाएगा.

संजू ने एक लंबी साँस लेकर अपनी आप बीती उसे सुनाई, जिसे सुनकर उन दोनों की आँखें झर-झर बरसने लगी. फिर माहौल को हल्का करते हुए निर्मला बोली.

निर्मला - आज से ये बहन हमेशा अपने भाई के साथ खड़ी होगी. अब तुम अपने आपको अकेला मत समझना भाई. मुझे तुम्हारे इन कामों से कोई गिला नहीं है. मैं बस ये चाहूँगी कि हो सके तो मुझे भी ऐसे हालातों से लड़ने लायक बना दो, जिससे फिर एक बार अपनी बहन को हालातों की वजह से खोना ना पड़े. चार पैसे कमाने के लिए कोई भी काम ग़लत नहीं होता. ग़लत होता है सही के साथ ग़लत करना. अगर तुम चाहो तो मैं भी तुम्हारे इस काम में हाथ बँटाना चाहूँगी. जिससे तुम्हें ये ना लगे कि तुम कुछ ग़लत करते हो.

कुछ देर तक उसे संजू ये सब ना करने की सलाह देता रहा.

फिर जब निर्मला ने कहा कि अगर तुम समझते हो कि ये काम मेरे लिए ग़लत है, तो फिर तुम भी छोड़ दो.

निर्मला के तर्क सुनकर संजू को झुकना ही पड़ा और उसे अपने साथ शामिल करने का प्रॉमिस करके वो वहाँ से चला गया.

दूसरे दिन लीना ने भानु को अपने गैंग के मेन लोगों से मिलवाया. युसुफ उससे पहले ही मिल चुका था, लेकिन संजू आज ही मिला था. भानु की अहमियत लीना के लिए अपने से ज़्यादा देखकर संजू को कुछ अट-पटा सा लगा, लेकिन अपने में मस्त रहने वाला संजू इस बात को नजरंदाज कर गया. बहरहाल कुछ दिन और ऐसे ही निकल गये. इस बीच संजू निर्मला को कुछ लड़ाई के दाँव-पेंच सिखाने लगा. फिर एक दिन उसने उसे लीना से भी मिलवाया और उसकी इच्छा उसे बताई. लीना को स्टूडेंट्स की तो वैसे ही ज़रूरत रहती थी, क्योंकि सबसे ज़्यादा ड्रग्स सप्लाई कालेज में ही होती है. तो भला उसे क्या एतराज हो सकता था, लिहाजा निर्मला और संजू ज़्यादातर साथ-साथ रहने लगे. दोनों एक दूसरे की बहुत इज़्ज़त करते थे. दोनों में भाई-बहन का पाक रिश्ता था. दोनों के बीच किस तरह का रिश्ता है ये बात संजू ने अपने बाकी साथियों को भी बता दी थी. फिर भला उसके गैंग में किसकी मज़ाल जो उसे गंदी नज़र से देख भी सके. धीरे-धीरे निर्मला के और दोस्त भी उसके साथ आ गये और धंधे में संजू का हाथ बंटाने लगे.

धंधे की बातों के अलावा लीना उर्फ कामिनी और भानु के बीच अकसर ये बातें होती रहती थी कि कैसे और किस तरह से अंकुश से कुछ इस तरह से बदला लिया जाए कि वो जिंदा रहते हुए भी तिल-तिल कर मरे??

उधर इन सारी साज़िशों से दूर शर्मा फैमिली में खुशियों की नित नई कहानियाँ जनम लेती रहती थी. सब लोग मिल-जुलकर शहर वाले बंगले में रहने लगे थे. हफ्ते में एक-दो बार छाया और एसएसपी कृष्ण कांत आकर परिवार के साथ समय बिताते थे. वहीं पापा महीने में एक-दो बार गांव जाकर दोनों चाचियों के साथ समय व्यतीत कर लेते थे. मैं भी कभी कभार छोटी चाची से मिलने चला जाता था, वो भी अपने बेटे को मिलने चाचा के साथ शहर आ जाती थी. मोहिनी भाभी और निशा दोनों बहनें मेरे लिए कभी-कभी जन्नत भरा माहौल पैदा कर देती. कुल मिलाकर कुछ किलोमीटर की दूरियाँ भी हम सबके बीच ना के बराबर ही थी.
 

aidenabhishek

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UPDATE 83

मेरी वकालत का काम अच्छा चल रहा था, जिसमें मुझे ज़्यादा कुछ नहीं करना पड़ता था. ज़्यादातर क्लाइंट उद्योग जगत से थे. फिक्स काम था जिसे स्टाफ के लोग संभाल लेते थे. उधर दूसरे शहर में तेज़ी से पनप रही आपराधिक गतिविधियों पर हमारी नज़र बराबर बनी हुई थी, जिसमें हाल ही के कुछ दिनों में एक अभूतपूर्व सफलता हाथ लगी थी.

छाया की बहुत दिनों से चल रही कोशिश कामयाब रही थी. बस अब हमें इंतजार था तो सही मौके का जिसमें एक ही बार में सारी बुराइयाँ खतम हो जानी थी. छाया के मुँह से संजू के बारे में इतना कुछ सुन सुनकर उससे एक बार मिलने की मेरी उत्सुकता जाग उठी. छाया जो कि ज़्यादातर उसी शहर में रहकर अपने मिशन को अंजाम दे रही थी उसे सारी योजना समझाकर एक दिन मैंने संजू से मिलने का मन बना ही लिया..

संजू और निर्मला अकसर शाम के वक़्त शहर से दूर, खुले में घूमने निकल जाया करते थे. उस दिन भी वो कुछ देर एक पार्क में घूमकर लौट रहे थे कि तभी एक युवक ने जो देखने में किसी फिल्मी हीरो जैसा दिखता था. लाल सुर्ख चेहरे पर हल्की-हल्की दाढ़ी मूँछें बहुत ही फब रही थी उस युवक पर. संजू और निर्मला जैसे ही पार्क से बाहर आकर सड़क पर चलने लगे.

पीछे से उन दोनों पर फबती कसते हुए वो युवक बोला – वाह क्या जोड़ी है लैला-मजनूं की… ऐसा लगता है लंगूर के हाथ हूर आ गयी हो.

संजू ने मुड़कर उस युवक को देखा जो उसे ही देख कर मुस्करा रहा था. अपने को लंगूर कहे जाने पर ही संजू को उसपर गुस्सा आ रहा था. उसपर उसकी मुस्कराहट ने आग में घी का काम कर दिया.

संजू उसे खा जाने वाली नज़रों से घूरते हुए बोला – बेटा अभी लंगूर का हाथ नहीं पड़ा है वरना यहाँ दिखाई भी नहीं देता और ये लैला मजनूं किसे बोला?? ये मेरी बहन है.. अपने दिमाग़ की गंदगी साफ कर जिसमें हर लड़के लड़की के लिए ग़लत ही भाव भरे हैं.

युवक उसकी बात पर ताली बजाते हुए बोला – अरे वाह… पहली बार किसी भाई को इतने अंधेरे में अकेले एकांत में अपनी बहन को पार्क में घूमते देखा है.

संजू उसकी बात पर भड़कते हुए बोला – तुझसे मतलब… अपने काम से काम रख वरना.!!!

वो युवक भी भड़कते हुए बोला – वरना क्या?? झाँट उखाड़ेगा तू?

युवक के मुँह से ये शब्द निकलते ही संजू का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुँचा. इतना उसे गम कहाँ था तो छूटते ही उसने उस युवक पर हाथ छोड़ दिया. युवक को उसके इस दुस्साहस की उम्मीद नहीं थी. संजू का भरपूर मुक्का उसकी कनपटी पर पड़ा. युवक की आँखों के सामने लाल-पीले तारे जगमगा उठे. उसे संजू के मुक्के ने बता दिया कि सामने वाला भी कम नहीं है. अभी वो अपने सिर को झटक कर अपने होश ठिकाने लाने की कोशिश कर ही रहा था कि तभी संजू की आवाज़ उसके कानों में पड़ी.

संजू - क्यों पता चला कि मैं क्या कर सकता हूँ?? अब चलता बन यहाँ से वरना वो गत बनाऊंगा की घरवाले भी पहचानने से इनकार कर देंगे.

लेकिन उसके ठीक उलट वो युवक मुस्कराते हुए बोला – मानना पड़ेगा कि तू भी कम खिलाड़ी नहीं है लेकिन अब मुझे भी तो झेल…

ये कहते ही उसने संजू के ऊपर जंप लगा दी. इससे पहले कि संजू संभल पाता… युवक की दोनों टाँगें हवा में उछली और भड़ाक से उसके दोनों पैर संजू की छाती से जा टकराए. लाख संभालने की कोशिश के बावजूद संजू अपनी जगह से 10 फुट पीछे जाकर गिरा. चोट बहुत तेज लगी थी, कुछ पल के लिए वो उस चोट से पड़ा रह गया. लेकिन जल्दी ही अपने पैरों पर खड़ा होते हुए किसी चीते की तरह उसने युवक पर जंप लगा दी. उधर वो युवक भी अब पूरी तरह से सतर्क था. उसने भी संजू पर ठीक उसी समय जंप लगाई, नतीजा बीच में ही दोनों के सिर भड़ाक से एक दूसरे से जा टकराए. दोनों ही अपनी विपरीत दिशा में ज़मीन पर जा गिरे. गिरते ही वो दोनों उछलकर अपने पैरों पर खड़े थे. जहाँ संजू उसे खा जाने वाली नज़रों से घूर रहा था वहीं उस युवक के चेहरे पर वही प्यारी सी मुस्कान थी. जिसे संजू सहन नहीं कर सका और किसी बिगड़ैल भैंसे की तरह हुंकारते हुए उससे जा भिड़ा.

पास में खड़ी निर्मला उन दोनों की लड़ाई बड़ी तन्मयता से देख रही थी. कभी संजू उस युवक पर भारी पड़ता दिखाई देता तो दूसरे ही पल वो युवक संजू पर. लड़ते-लड़ते उन दोनों को काफ़ी वक़्त हो गया था. दोनों के ही कई जगह गहरी चोटें भी आ चुकी थी, जगह-जगह चेहरे पर खून झलकने लगा था. लेकिन उन दोनों में से कोई किसी से कम पड़ता नज़र नहीं आ रहा था. फिर एक पल ऐसा आया कि संजू ने उस पर जंप लगाई, चीते की फुर्ती से युवक अपनी जगह से थोड़ा सा हटा. हवा में ही उसने एक हाथ से संजू की गर्दन दबोच ली और उसे पूरी ताक़त से ज़मीन पर दे पटका. फोर्स इतना ज़्यादा था कि संजू की रीढ़ की हटी कड़क गयी. लाख संभलने के बावजूद एक क्षण को उसकी चेतना जवाब दे गयी और वो वहीं पड़ा रह गया, उठने की शक्ति जवाब दे गयी.

युवक ने उसे चिढ़ाने की कोशिश करते हुए कहा – चल बच्चे उठ… क्या हुआ निकल गयी सारी हेकड़ी?? तब तो बड़ी-बड़ी डींगें हांक रहा था. याद रखना शेर को सवा शेर मिल ही जाता है.

इतना कहकर वो युवक अपने कपड़े झाड़ता हुआ वहाँ से जाने लगा. तभी पीछे से निर्मला ने अपने बैग से रिवाल्वर निकाला और उस युवक की पीठ को अपने निशाने पर ले लिया. इससे पहले कि वो उस पर गोली चलाती. संजू अपनी शक्ति बटोरकर उठा और उसने निर्मला का हाथ ऊपर कर दिया. आनन फानन में घोड़ा दब गया और फायर की आवाज़ दूर-दूर तक गूँज उठी. युवक ने पीछे मूड कर देखा, निर्मला की गन की नाल से धुआँ निकल रहा था.

निर्मला अपनी गन वाली कलाई संजू की गिरफ़्त से छुड़ाते हुए बोली - छोड़ो भाई मुझे… उसने तुम्हें शिकस्त दी है… मैं उसे छोड़ूँगी नहीं…

संजू – नहीं बहन… मैं किसी बहादुर आदमी को यूँ धोके से मरता हुआ नहीं देख सकता… उसने मुझे अपनी ताक़त और हुनर से शिकस्त दी है… जिसे में दिल से स्वीकार करता हूँ.

संजू की बात सुनकर वो युवक पलटा और संजू के कंधे पर हाथ रख कर बोला – तुम सच में एक बहादुर इंसान हो. बहुत दिनों बाद मुझे कोई मर्द मिला है. एक बहादुर ही दूसरे बहादुर की कद्र कर सकता है. आशा करता हूँ, कि भविष्य में अगर हम कभी मिलें तो इस तरह से ना मिलें, बल्कि दोस्तों की तरह मिलें. बाइ…

ये कहकर वो युवक अपने रास्ते बढ़ गया. सब कुछ हमारे रडार पर ही चल रहा था. इस शहर को हमारी पुलिस अच्छे से संभाले थी और उस शहर का हर काम हमारी निगाह में था. लेकिन कहते हैं, कि अमृत मंथन में जहर भी निकलता है जिसे खुद को ही पीना पड़ता है. ऐसा ही कुछ आने वाले समय में होने वाला था.

एक बहुत प्रसिद्ध कहावत है, “दीपक तले अंधेरा”, यही हमारे साथ भी हुआ. हम लोग अपराध रोकने के लिए यथा संभव प्रयास में लगे थे, लेकिन हमारे साथ ही एक ऐसा वाक़या हो गया जिसे हम रोकने में नाकामयाब रहे.

रुचि 11 में पढ़ रही थी. उसका स्कूल, शहर से बाहर एक इंटरनेशनल स्टैंडर्ड का स्कूल था. स्कूल तक लाने ले जाने के लिए स्कूल की तरफ से ही बस की सुविधा थी. आज उसके स्कूल में पेरेंट्स मीटिंग रखी थी. भैया को अपने कालेज से फ़ुर्सत नहीं थी तो मीटिंग अटेंड करने के लिए मोहिनी भाभी को ही जाना पड़ा. ड्राइवर को साथ लेकर वो अपनी कार से रुचि के स्कूल गयी. तय हुआ था कि लौटने पर वो रुचि को भी अपने साथ लाने वाली थी. पेरेंट्स मीटिंग खतम होते-होते लगभग 3 बज गये. माँ-बेटी कार से लौट रही थी कि अचानक से उनकी कार पंक्चर हो गयी. पंक्चर क्या, उसके चारों व्हील एक साथ बैठ गये. बड़ी मुश्किल से ड्राइवर ने गाड़ी को कंट्रोल किया, फिर भी वो रोड से नीचे तक घिसती चली गयी. अभी उन लोगों की कुछ समझ में आया भी नहीं था कि आख़िर ये हुआ कैसे? ड्राइवर गाड़ी संभालने के बाद इंजन बंद करके उतरकर नीचे देखने के लिए गेट खोल ही रहा था कि तभी ना जाने कहाँ से 5-6 हथियार बंद नकाबपोषों ने उनकी गाड़ी को चारों तरफ से घेर लिया. बदमाशों ने ड्राइवर के हाथ पैर बाँधकर उसी गाड़ी की सीट पर डाला और जबरन भाभी और रुचि को घसीटकर गाड़ी से बाहर निकाला. तभी वहाँ एक काले रंग की स्कॉर्पियो आकर रुकी. दोनों को जबरन उसमें ठूंस दिया. चिल्लाने की कोशिश की तो मुँह पट्टियों से कस दिया और देखते ही देखते वो स्कॉर्पियो उन दोनों को लेकर वहाँ से नौ-दो-ग्यारह हो गयी.

जैसे तैसे किसी तरह ड्राइवर ने किसी राहगीर की मदद से अपने बंधनों को आज़ाद करवाया और घर पर फोन किया. घर पर उस समय निशा अकेली ही थी, सुनकर उसके होश गुम हो गये. बेचारी सिवाय रोने-धोने के और क्या करती. फिर अपने आपको संभालकर उसने रोते-रोते मुझे फोन किया. मैंने फोन पर ही उसे सांत्वना देते हुए धीरज रखने को कहा. मेरे लिए ये घटना किसी गाज गिरने से कम नहीं थी. अपने परिवार पर किसी तरह का संकट मेरे लिए असहनीय था. वो भी ख़ासकर अपनी प्यारी भाभी और सबकी दुलारी मेरी भतीजी को इस तरह के संकट में फँसा सुनकर एक पल को तो मेरे भी होश गुम हो गये. दिमाग़ ने काम करना बंद कर दिया. चारों तरफ अंधेरा सा छा गया, किसी तरह मैंने अपने आप को संभाला और फिर कृष्णा भैया को इस बात की सूचना दी. सुनते ही उनकी पूरी फोर्स एक्शन में आ गई और इलाक़े में उस काली स्कॉर्पियो की तलाश में जुट गयी.

मैंने छाया को कांटेक्ट करके सारी बातें बताई. एक बार को वो भी सुनकर बेचैन हो उठी. लेकिन उस समय वो जहाँ थी वहाँ अपने आस-पास अपने एक्सप्रेशन को शो नहीं कर सकती थी. कुछ देर बाद सामने से उसका फोन आया और डीटेल्स में सारी बातें हुई, लेकिन वो ये पता नहीं लगा पाई कि ये काम उसी गैंग के द्वारा किया गया है या नहीं. जिस तरह की जानकारी छाया ने बीते दिनों में जुटाई थी. उससे ये तो तय था कि भानु किसी औरत के लिए काम करता है.

चूँकि छाया ने कामिनी को कभी देखा नहीं था तो उससे मिलने के बाद भी वो ये नहीं जानती थी कि वो जिंदा है और फिर से अपना धंधा खड़ा कर चुकी है. लेकिन ना जाने क्यों मुझे बार-बार ये शक़ हो रहा था कि हो ना हो ये काम भानु ने ही अंजाम दिया है. क्योंकि उसके अलावा ऐसा मोटिव किसी और के पास हो ही नहीं सकता. बार-बार की डिफीट के बाद वो तिलमिलाए बैठा होगा. अब जब उसे किसी पावरफुल गैंग का साथ मिल गया है तो वो मेरे ऊपर चोट ज़रूर ही करेगा.
 

urc4me

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Ankush ko Mhini aur Ruchi ke apharan se ysko chhudane ki koshish me kamini aur Bhanu ke nexus hath lagegi. Pratiksha agle rasprad update ki
 

Tri2010

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मेरी वकालत का काम अच्छा चल रहा था, जिसमें मुझे ज़्यादा कुछ नहीं करना पड़ता था. ज़्यादातर क्लाइंट उद्योग जगत से थे. फिक्स काम था जिसे स्टाफ के लोग संभाल लेते थे. उधर दूसरे शहर में तेज़ी से पनप रही आपराधिक गतिविधियों पर हमारी नज़र बराबर बनी हुई थी, जिसमें हाल ही के कुछ दिनों में एक अभूतपूर्व सफलता हाथ लगी थी.

छाया की बहुत दिनों से चल रही कोशिश कामयाब रही थी. बस अब हमें इंतजार था तो सही मौके का जिसमें एक ही बार में सारी बुराइयाँ खतम हो जानी थी. छाया के मुँह से संजू के बारे में इतना कुछ सुन सुनकर उससे एक बार मिलने की मेरी उत्सुकता जाग उठी. छाया जो कि ज़्यादातर उसी शहर में रहकर अपने मिशन को अंजाम दे रही थी उसे सारी योजना समझाकर एक दिन मैंने संजू से मिलने का मन बना ही लिया..

संजू और निर्मला अकसर शाम के वक़्त शहर से दूर, खुले में घूमने निकल जाया करते थे. उस दिन भी वो कुछ देर एक पार्क में घूमकर लौट रहे थे कि तभी एक युवक ने जो देखने में किसी फिल्मी हीरो जैसा दिखता था. लाल सुर्ख चेहरे पर हल्की-हल्की दाढ़ी मूँछें बहुत ही फब रही थी उस युवक पर. संजू और निर्मला जैसे ही पार्क से बाहर आकर सड़क पर चलने लगे.

पीछे से उन दोनों पर फबती कसते हुए वो युवक बोला – वाह क्या जोड़ी है लैला-मजनूं की… ऐसा लगता है लंगूर के हाथ हूर आ गयी हो.

संजू ने मुड़कर उस युवक को देखा जो उसे ही देख कर मुस्करा रहा था. अपने को लंगूर कहे जाने पर ही संजू को उसपर गुस्सा आ रहा था. उसपर उसकी मुस्कराहट ने आग में घी का काम कर दिया.

संजू उसे खा जाने वाली नज़रों से घूरते हुए बोला – बेटा अभी लंगूर का हाथ नहीं पड़ा है वरना यहाँ दिखाई भी नहीं देता और ये लैला मजनूं किसे बोला?? ये मेरी बहन है.. अपने दिमाग़ की गंदगी साफ कर जिसमें हर लड़के लड़की के लिए ग़लत ही भाव भरे हैं.

युवक उसकी बात पर ताली बजाते हुए बोला – अरे वाह… पहली बार किसी भाई को इतने अंधेरे में अकेले एकांत में अपनी बहन को पार्क में घूमते देखा है.

संजू उसकी बात पर भड़कते हुए बोला – तुझसे मतलब… अपने काम से काम रख वरना.!!!

वो युवक भी भड़कते हुए बोला – वरना क्या?? झाँट उखाड़ेगा तू?

युवक के मुँह से ये शब्द निकलते ही संजू का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुँचा. इतना उसे गम कहाँ था तो छूटते ही उसने उस युवक पर हाथ छोड़ दिया. युवक को उसके इस दुस्साहस की उम्मीद नहीं थी. संजू का भरपूर मुक्का उसकी कनपटी पर पड़ा. युवक की आँखों के सामने लाल-पीले तारे जगमगा उठे. उसे संजू के मुक्के ने बता दिया कि सामने वाला भी कम नहीं है. अभी वो अपने सिर को झटक कर अपने होश ठिकाने लाने की कोशिश कर ही रहा था कि तभी संजू की आवाज़ उसके कानों में पड़ी.

संजू - क्यों पता चला कि मैं क्या कर सकता हूँ?? अब चलता बन यहाँ से वरना वो गत बनाऊंगा की घरवाले भी पहचानने से इनकार कर देंगे.

लेकिन उसके ठीक उलट वो युवक मुस्कराते हुए बोला – मानना पड़ेगा कि तू भी कम खिलाड़ी नहीं है लेकिन अब मुझे भी तो झेल…

ये कहते ही उसने संजू के ऊपर जंप लगा दी. इससे पहले कि संजू संभल पाता… युवक की दोनों टाँगें हवा में उछली और भड़ाक से उसके दोनों पैर संजू की छाती से जा टकराए. लाख संभालने की कोशिश के बावजूद संजू अपनी जगह से 10 फुट पीछे जाकर गिरा. चोट बहुत तेज लगी थी, कुछ पल के लिए वो उस चोट से पड़ा रह गया. लेकिन जल्दी ही अपने पैरों पर खड़ा होते हुए किसी चीते की तरह उसने युवक पर जंप लगा दी. उधर वो युवक भी अब पूरी तरह से सतर्क था. उसने भी संजू पर ठीक उसी समय जंप लगाई, नतीजा बीच में ही दोनों के सिर भड़ाक से एक दूसरे से जा टकराए. दोनों ही अपनी विपरीत दिशा में ज़मीन पर जा गिरे. गिरते ही वो दोनों उछलकर अपने पैरों पर खड़े थे. जहाँ संजू उसे खा जाने वाली नज़रों से घूर रहा था वहीं उस युवक के चेहरे पर वही प्यारी सी मुस्कान थी. जिसे संजू सहन नहीं कर सका और किसी बिगड़ैल भैंसे की तरह हुंकारते हुए उससे जा भिड़ा.

पास में खड़ी निर्मला उन दोनों की लड़ाई बड़ी तन्मयता से देख रही थी. कभी संजू उस युवक पर भारी पड़ता दिखाई देता तो दूसरे ही पल वो युवक संजू पर. लड़ते-लड़ते उन दोनों को काफ़ी वक़्त हो गया था. दोनों के ही कई जगह गहरी चोटें भी आ चुकी थी, जगह-जगह चेहरे पर खून झलकने लगा था. लेकिन उन दोनों में से कोई किसी से कम पड़ता नज़र नहीं आ रहा था. फिर एक पल ऐसा आया कि संजू ने उस पर जंप लगाई, चीते की फुर्ती से युवक अपनी जगह से थोड़ा सा हटा. हवा में ही उसने एक हाथ से संजू की गर्दन दबोच ली और उसे पूरी ताक़त से ज़मीन पर दे पटका. फोर्स इतना ज़्यादा था कि संजू की रीढ़ की हटी कड़क गयी. लाख संभलने के बावजूद एक क्षण को उसकी चेतना जवाब दे गयी और वो वहीं पड़ा रह गया, उठने की शक्ति जवाब दे गयी.

युवक ने उसे चिढ़ाने की कोशिश करते हुए कहा – चल बच्चे उठ… क्या हुआ निकल गयी सारी हेकड़ी?? तब तो बड़ी-बड़ी डींगें हांक रहा था. याद रखना शेर को सवा शेर मिल ही जाता है.

इतना कहकर वो युवक अपने कपड़े झाड़ता हुआ वहाँ से जाने लगा. तभी पीछे से निर्मला ने अपने बैग से रिवाल्वर निकाला और उस युवक की पीठ को अपने निशाने पर ले लिया. इससे पहले कि वो उस पर गोली चलाती. संजू अपनी शक्ति बटोरकर उठा और उसने निर्मला का हाथ ऊपर कर दिया. आनन फानन में घोड़ा दब गया और फायर की आवाज़ दूर-दूर तक गूँज उठी. युवक ने पीछे मूड कर देखा, निर्मला की गन की नाल से धुआँ निकल रहा था.

निर्मला अपनी गन वाली कलाई संजू की गिरफ़्त से छुड़ाते हुए बोली - छोड़ो भाई मुझे… उसने तुम्हें शिकस्त दी है… मैं उसे छोड़ूँगी नहीं…

संजू – नहीं बहन… मैं किसी बहादुर आदमी को यूँ धोके से मरता हुआ नहीं देख सकता… उसने मुझे अपनी ताक़त और हुनर से शिकस्त दी है… जिसे में दिल से स्वीकार करता हूँ.

संजू की बात सुनकर वो युवक पलटा और संजू के कंधे पर हाथ रख कर बोला – तुम सच में एक बहादुर इंसान हो. बहुत दिनों बाद मुझे कोई मर्द मिला है. एक बहादुर ही दूसरे बहादुर की कद्र कर सकता है. आशा करता हूँ, कि भविष्य में अगर हम कभी मिलें तो इस तरह से ना मिलें, बल्कि दोस्तों की तरह मिलें. बाइ…

ये कहकर वो युवक अपने रास्ते बढ़ गया. सब कुछ हमारे रडार पर ही चल रहा था. इस शहर को हमारी पुलिस अच्छे से संभाले थी और उस शहर का हर काम हमारी निगाह में था. लेकिन कहते हैं, कि अमृत मंथन में जहर भी निकलता है जिसे खुद को ही पीना पड़ता है. ऐसा ही कुछ आने वाले समय में होने वाला था.

एक बहुत प्रसिद्ध कहावत है, “दीपक तले अंधेरा”, यही हमारे साथ भी हुआ. हम लोग अपराध रोकने के लिए यथा संभव प्रयास में लगे थे, लेकिन हमारे साथ ही एक ऐसा वाक़या हो गया जिसे हम रोकने में नाकामयाब रहे.

रुचि 11 में पढ़ रही थी. उसका स्कूल, शहर से बाहर एक इंटरनेशनल स्टैंडर्ड का स्कूल था. स्कूल तक लाने ले जाने के लिए स्कूल की तरफ से ही बस की सुविधा थी. आज उसके स्कूल में पेरेंट्स मीटिंग रखी थी. भैया को अपने कालेज से फ़ुर्सत नहीं थी तो मीटिंग अटेंड करने के लिए मोहिनी भाभी को ही जाना पड़ा. ड्राइवर को साथ लेकर वो अपनी कार से रुचि के स्कूल गयी. तय हुआ था कि लौटने पर वो रुचि को भी अपने साथ लाने वाली थी. पेरेंट्स मीटिंग खतम होते-होते लगभग 3 बज गये. माँ-बेटी कार से लौट रही थी कि अचानक से उनकी कार पंक्चर हो गयी. पंक्चर क्या, उसके चारों व्हील एक साथ बैठ गये. बड़ी मुश्किल से ड्राइवर ने गाड़ी को कंट्रोल किया, फिर भी वो रोड से नीचे तक घिसती चली गयी. अभी उन लोगों की कुछ समझ में आया भी नहीं था कि आख़िर ये हुआ कैसे? ड्राइवर गाड़ी संभालने के बाद इंजन बंद करके उतरकर नीचे देखने के लिए गेट खोल ही रहा था कि तभी ना जाने कहाँ से 5-6 हथियार बंद नकाबपोषों ने उनकी गाड़ी को चारों तरफ से घेर लिया. बदमाशों ने ड्राइवर के हाथ पैर बाँधकर उसी गाड़ी की सीट पर डाला और जबरन भाभी और रुचि को घसीटकर गाड़ी से बाहर निकाला. तभी वहाँ एक काले रंग की स्कॉर्पियो आकर रुकी. दोनों को जबरन उसमें ठूंस दिया. चिल्लाने की कोशिश की तो मुँह पट्टियों से कस दिया और देखते ही देखते वो स्कॉर्पियो उन दोनों को लेकर वहाँ से नौ-दो-ग्यारह हो गयी.

जैसे तैसे किसी तरह ड्राइवर ने किसी राहगीर की मदद से अपने बंधनों को आज़ाद करवाया और घर पर फोन किया. घर पर उस समय निशा अकेली ही थी, सुनकर उसके होश गुम हो गये. बेचारी सिवाय रोने-धोने के और क्या करती. फिर अपने आपको संभालकर उसने रोते-रोते मुझे फोन किया. मैंने फोन पर ही उसे सांत्वना देते हुए धीरज रखने को कहा. मेरे लिए ये घटना किसी गाज गिरने से कम नहीं थी. अपने परिवार पर किसी तरह का संकट मेरे लिए असहनीय था. वो भी ख़ासकर अपनी प्यारी भाभी और सबकी दुलारी मेरी भतीजी को इस तरह के संकट में फँसा सुनकर एक पल को तो मेरे भी होश गुम हो गये. दिमाग़ ने काम करना बंद कर दिया. चारों तरफ अंधेरा सा छा गया, किसी तरह मैंने अपने आप को संभाला और फिर कृष्णा भैया को इस बात की सूचना दी. सुनते ही उनकी पूरी फोर्स एक्शन में आ गई और इलाक़े में उस काली स्कॉर्पियो की तलाश में जुट गयी.

मैंने छाया को कांटेक्ट करके सारी बातें बताई. एक बार को वो भी सुनकर बेचैन हो उठी. लेकिन उस समय वो जहाँ थी वहाँ अपने आस-पास अपने एक्सप्रेशन को शो नहीं कर सकती थी. कुछ देर बाद सामने से उसका फोन आया और डीटेल्स में सारी बातें हुई, लेकिन वो ये पता नहीं लगा पाई कि ये काम उसी गैंग के द्वारा किया गया है या नहीं. जिस तरह की जानकारी छाया ने बीते दिनों में जुटाई थी. उससे ये तो तय था कि भानु किसी औरत के लिए काम करता है.

चूँकि छाया ने कामिनी को कभी देखा नहीं था तो उससे मिलने के बाद भी वो ये नहीं जानती थी कि वो जिंदा है और फिर से अपना धंधा खड़ा कर चुकी है. लेकिन ना जाने क्यों मुझे बार-बार ये शक़ हो रहा था कि हो ना हो ये काम भानु ने ही अंजाम दिया है. क्योंकि उसके अलावा ऐसा मोटिव किसी और के पास हो ही नहीं सकता. बार-बार की डिफीट के बाद वो तिलमिलाए बैठा होगा. अब जब उसे किसी पावरफुल गैंग का साथ मिल गया है तो वो मेरे ऊपर चोट ज़रूर ही करेगा.
Lovely update
UPDATE 82

कामिनी ये सब मुँह बाए सुनती रही. फिर जब उसने बताया कि कैसे मोहिनी ने आकर उसे उनके चंगुल से निकाला जिसे सुनकर कामिनी के मुँह से किसी ज़हरीली नागिन की तरह फुफकार निकली.

कामिनी - वो हरामज़ादी कुतिया हर बार मेरे रास्ते का काँटा बनती रही है… अब मैं सबसे पहले उसको ही अपने रास्ते से हटाऊंगी, उसके बाद उस हरामज़ादे अंकुश से अपना बदला लूँगी…

फिर एक गहरी साँस छोड़ते हुए कामिनी बोली - खैर आगे बोलो… फिर क्या हुआ??

भानु – मैं किसी तरह वहाँ से बच निकला और इसी शहर में अपनी बहन के पास छुपकर रहने लगा… वहाँ की पुलिस कुत्ते की तरह मुझे तलाश कर रही थी. फिर ना जाने कहाँ से उस हरामज़ादे वकील अंकुश को मेरे यहाँ होने की भनक लग गयी… शिकारी कुत्ते की तरह सूंघते हुए वो उसी जोसेफ के भेष में मेरी बहन से मिला… पुराने धंधे को दुबारा खड़ा करने का लालच देकर उसने मेरी बहन से मेरा पता निकलवा लिया… सच कहूँ तो मैं भी उसके झाँसे में फँस गया और एक बार फिर उसके हत्थे चढ़ गया… मुझे ब्लैकमेल करके उसने वो कांड करा दिया जिसकी कल्पना करते ही मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं.

भानु ने कामिनी को वो सब बताया जो उसने श्वेता और उसकी फ्रेंड के साथ किया था.

भानु - फिर उसने ना जाने कैसे श्वेता के पति को वहाँ भेज दिया, जिसने हमारा सारा गैंगबैंग अपनी आँखों से देख लिया. गुस्से में अंधे पुष्पराज ने वहाँ मौजूद सबको गोली से उड़ा दिया और खुद को भी गोली मार ली. उस सामूहिक हत्याकांड में मैं भाग्यवश बच गया, गोली मेरे सिर की एक साइड को चीरते हुए निकल गयी थी. हालाँकि घाव काफ़ी गहरा था, लेकिन किसी तरह बचते बचाते में शहर के विपरीत दिशा में जंगलों की ओर निकल गया, जहाँ एक नदी तक पहुँचते-पहुँचते मेरे होश जवाब दे गये. नदी के पानी में हाथ देते ही में वहीं पानी में गिर गया. मुझे नहीं पता मैं कितने दिन बेहोश रहा, लेकिन जब होश में आया तो किसी छोटे से गांव में किसी मल्लाह (केवट) की छोटी सी झोंपड़ी में था. जो नदी से मुझे अपने घर ले आया और उसने देशी जड़ी बूटियों के सहारे नई जिंदगी दी. उसी के मुताबिक में पूरे एक हफ्ते तक बेहोश रहा था. वहाँ से किसी तरह भेष बदलकर मैं फिर से इसी शहर में आ बसा हूँ. पुलिस रेकॉर्ड में मैं मर चुका हूँ, जिसका फ़ायदा उठा रहा हूँ.

कामिनी – तो अब क्या प्लान है??

भानु – घर गृहस्थी तो जैसे चलनी थी वैसे चल रही है. पापा ने अपने नाम से कुछ कारोबार शुरू किया है, लेकिन अब जब आप दोबारा मिल ही गयी हैं तो एक बार फिर उस हरामज़ादे वकील अंकुश को सबक सिखाने का दिल करने लगा है.

कामिनी – तुम चिंता मत करो… इस बार उसे उसके परिवार के साथ पूरी तरह खतम करके ही रहूंगी… मैं उसे मरते दम तक नहीं भूल सकती, जिसके कारण मेरा कारोबार, घर-परिवार सब कुछ तबाह हो गया… उसे मैं यूँ ही आसानी से कैसे भुला सकती हूँ?? सच पूछो तो मेरा मुंबई से यहाँ आने का मक़सद भी यही है. आज मेरे पास पैसा हैं, ताक़त है और सबसे बढ़कर एक ऐसा आदमी है जिसे बस एक बार इशारा करना है, वो उसके घर में घुसकर सब कुछ तबाह कर देगा.

भानु उत्साहित स्वर में बोला – तो फिर देर किस बात की मैडम?

कामिनी – मैं उसे इतनी आसानी से नहीं मारूँगी… उसे पहले अपनों के लिए तड़पना होगा… ख़ासकर उसकी उस प्यारी मोहिनी भाभी के लिए… जिसने उसे इस काबिल बनाया है… बस तुम कुछ दिन मेरे साथ रहकर मेरे आदमियों के साथ काम में हाथ बँटाओ… उन्हें समझो… अपने को उनके साथ ढालो… हम जल्दी ही इस काम को अंजाम देंगे…

फिर कामिनी ने अपने ड्राइवर को रास्ते में ही गाड़ी रोकने का इशारा किया. भानु को वहीं उतारकर अपने अड्डे का पता देकर खुद आगे बढ़ गयी. उसी शाम संजू एक छोटे से गैंग से अपने माल की वसूली करके लौट रहा था. अपने गुर्गों को उसने उनके घर भेज दिया और अकेला ही अड्डे की तरफ जा रहा था. अंधेरा घिर चुका था, शहर की ख़स्ताहाल व्यवस्था ये थी कि मैं सड़क पर भी स्ट्रीट लाइट ना के बराबर थी. इस समय उसकी बाइक एक संकरी अंधेरी गली से गुजर रही थी, कि तभी उसने अपनी बाइक की हेड लाइट में कुछ इंसानी जिस्मों को हरकत करते देखा. थोड़ा नज़दीक आने पर पता चला कि 4 लफंगे एक अकेली लड़की के साथ छेड़-छाड़ कर रहे हैं. सलीके के सलवार सूट पहनी वो लड़की यथा संभव अपने आप को उन गुण्डों से बचाने के लिए जद्दोजहद कर रही थी. जगह-जगह से उसके कपड़े फट चुके थे जहाँ से उसका दूधिया अंग दिखाई देने लगा था. वो मदद के लिए गुहार भी लगा रही थी, लेकिन वहाँ कोई सुनने वाला हो तब तो आए और अगर कोई सुन भी रहा होगा तो अपनी जान बचाने की गरज से देख कर भी अनदेखा करके खिसक लिया होगा. संजू ने उनसे कुछ दूरी पर अपनी बाइक रोकी, उसे साइड स्टैंड पर टिकाया और वहीं से उसने उन लोगों को चेतावनी देते हुए कहा.

संजू - छोड़ो उसे… क्यों परेशान कर रहे हो एक बेचारी लड़की को??

लेकिन उन गुण्डों पर उसकी बात का कोई असर होता दिखाई नहीं दिया और वो उसे लगातार उसके बदन से खिलवाड़ करने में लगे रहे. संजू को ये बात असहनीय लगी और वो लपक कर उन गुण्डों के पास जा पहुँचा. जाते ही उसने आनन-फानन में दो को पकड़ कर एक तरफ को उछाल दिया. देखते ही देखते वहाँ घमासान छिड़ गया. संजू उनपर भारी पड़ रहा था. अकेले ने उन चारों गुण्डों को दुम दबाकर भागने पर मजबूर कर दिया. जब चारों वहाँ से जान बचाकर भाग खड़े हुए तब संजू ने उस लड़की की तरफ ध्यान दिया, जो सड़क के एक अंधेरे से कोने में बैठी डर के मारे घुटनों में मुँह देकर सुबक रही थी. संजू ने धीरे से उसके कंधे पर अपना हाथ रखा. वो लड़की उसका हाथ रखते ही बुरी तरह से काँप गयी.

सिर उठाकर देखा तो संजू बोला– घबराओ नहीं… वो लोग भाग गये अब तुम्हें डरने की कोई ज़रूरत नहीं है…

लड़की उठकर उसके सीने से लिपट गयी और फूट-फूट कर रो पड़ी.

संजू ने उसकी पीठ सहलाते हुए कहा – कौन हो तुम और यहाँ क्या कर रही थी??

लड़की – मैं कोचिंग से आ रही थी, कि तभी ये गुंडे मेरे पीछे लग लिए. मैंने तेज-तेज कदम बढ़ाकर बचने की कोशिश की लेकिन यहाँ अंधेरे में आते ही उन्होंने मुझे ज़बरदस्ती पकड़ लिया और मेरे साथ….

संजू – कहाँ रहती हो??? आओ मैं तुम्हें छोड़ देता हूँ…

लड़की – मैं कुछ दूर पर एक कमरा किराए पर लेकर रहती हूँ. गांव से यहाँ पढ़ने आई थी, भगवान आपका भला करे… समय पर आकर आपने मेरी इज़्ज़त बचा ली, वरना मैं कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रहती.

संजू – चलो मैं तुम्हें तुम्हारे कमरे तक छोड़ देता हूँ.

इतना कहकर संजू अपनी बाइक पर जा बैठा, पीछे वो लड़की भी बैठ गयी. कुछ देर बाद वो एक मामूली सी बस्ती के एक कोने में बने एक छोटे से मकान के एक बाहरी साइड बने कमरे में बैठे थे.

लड़की – मैं आपको क्या कहकर बुलाऊँ??

संजू – मेरा नाम संजू है. तुम मुझे अपना भाई मान सकती हो.

लड़की – मेरा नाम निर्मला है और सच कहूँ तो आप मुझे मेरे भाई ही लगे, जिसने अपनी जान जोखिम में डाल कर आज एक अंजान लड़की की इज़्ज़त बचाकर अपने भाई होने का सबूत दिया है… वैसे आप करते क्या हैं?

संजू निर्मला के इस सवाल पर चुप रह गया. जब कुछ देर उसने कुछ नहीं बोला तो निर्मला बोली – कोई बात नहीं अगर आप नहीं बताना चाहते तो ना सही.. वैसे भी इस अंजान शहर में आपको भाई मानकर मैंने कोई तो अपना पाया है. अब काम जो भी हो उससे हमारे नये रिश्ते पर क्या फर्क पड़ना है??

संजू – ऐसी बात नहीं है निर्मला… दरअसल मैं जो करता हूँ, उसे जानकर कहीं तुम मुझसे नफ़रत ना करने लगो.. ना जाने मेरे मुँह से क्यों तुम्हारे लिए बहन शब्द निकल गया, वरना मैं तो इतना गिरा हुआ इंसान हूँ, जिसने अपनी खुद की सगी बहन को अपनी नाकामियों की बलि चढ़ा दिया.

इतना कहते-कहते संजू का गला भर आया. लाख रोकने पर भी उसकी आँखों में दो बूँद पानी की तैर गयी. निर्मला ने उसके पास जाकर अपना सिर उसके कंधे पर टिका दिया.

निर्मला हाथ से संजू की पीठ पर बड़े स्नेह से सहलाते हुए बोली – मैं ये कभी नहीं मान सकती कि तुम्हारे जैसा भाई अपनी बहन के साथ कुछ भी ग़लत कर सकता हो या किया हो. ज़रूर कुछ ऐसे हालत रहे होंगे, जिनके हाथों इंसान हमेशा मजबूर होता आया है. अगर चाहो तो अपना गम इस बहन के साथ शेयर कर सकते हो, मन हल्का हो जाएगा.

संजू ने एक लंबी साँस लेकर अपनी आप बीती उसे सुनाई, जिसे सुनकर उन दोनों की आँखें झर-झर बरसने लगी. फिर माहौल को हल्का करते हुए निर्मला बोली.

निर्मला - आज से ये बहन हमेशा अपने भाई के साथ खड़ी होगी. अब तुम अपने आपको अकेला मत समझना भाई. मुझे तुम्हारे इन कामों से कोई गिला नहीं है. मैं बस ये चाहूँगी कि हो सके तो मुझे भी ऐसे हालातों से लड़ने लायक बना दो, जिससे फिर एक बार अपनी बहन को हालातों की वजह से खोना ना पड़े. चार पैसे कमाने के लिए कोई भी काम ग़लत नहीं होता. ग़लत होता है सही के साथ ग़लत करना. अगर तुम चाहो तो मैं भी तुम्हारे इस काम में हाथ बँटाना चाहूँगी. जिससे तुम्हें ये ना लगे कि तुम कुछ ग़लत करते हो.

कुछ देर तक उसे संजू ये सब ना करने की सलाह देता रहा.

फिर जब निर्मला ने कहा कि अगर तुम समझते हो कि ये काम मेरे लिए ग़लत है, तो फिर तुम भी छोड़ दो.

निर्मला के तर्क सुनकर संजू को झुकना ही पड़ा और उसे अपने साथ शामिल करने का प्रॉमिस करके वो वहाँ से चला गया.

दूसरे दिन लीना ने भानु को अपने गैंग के मेन लोगों से मिलवाया. युसुफ उससे पहले ही मिल चुका था, लेकिन संजू आज ही मिला था. भानु की अहमियत लीना के लिए अपने से ज़्यादा देखकर संजू को कुछ अट-पटा सा लगा, लेकिन अपने में मस्त रहने वाला संजू इस बात को नजरंदाज कर गया. बहरहाल कुछ दिन और ऐसे ही निकल गये. इस बीच संजू निर्मला को कुछ लड़ाई के दाँव-पेंच सिखाने लगा. फिर एक दिन उसने उसे लीना से भी मिलवाया और उसकी इच्छा उसे बताई. लीना को स्टूडेंट्स की तो वैसे ही ज़रूरत रहती थी, क्योंकि सबसे ज़्यादा ड्रग्स सप्लाई कालेज में ही होती है. तो भला उसे क्या एतराज हो सकता था, लिहाजा निर्मला और संजू ज़्यादातर साथ-साथ रहने लगे. दोनों एक दूसरे की बहुत इज़्ज़त करते थे. दोनों में भाई-बहन का पाक रिश्ता था. दोनों के बीच किस तरह का रिश्ता है ये बात संजू ने अपने बाकी साथियों को भी बता दी थी. फिर भला उसके गैंग में किसकी मज़ाल जो उसे गंदी नज़र से देख भी सके. धीरे-धीरे निर्मला के और दोस्त भी उसके साथ आ गये और धंधे में संजू का हाथ बंटाने लगे.

धंधे की बातों के अलावा लीना उर्फ कामिनी और भानु के बीच अकसर ये बातें होती रहती थी कि कैसे और किस तरह से अंकुश से कुछ इस तरह से बदला लिया जाए कि वो जिंदा रहते हुए भी तिल-तिल कर मरे??

उधर इन सारी साज़िशों से दूर शर्मा फैमिली में खुशियों की नित नई कहानियाँ जनम लेती रहती थी. सब लोग मिल-जुलकर शहर वाले बंगले में रहने लगे थे. हफ्ते में एक-दो बार छाया और एसएसपी कृष्ण कांत आकर परिवार के साथ समय बिताते थे. वहीं पापा महीने में एक-दो बार गांव जाकर दोनों चाचियों के साथ समय व्यतीत कर लेते थे. मैं भी कभी कभार छोटी चाची से मिलने चला जाता था, वो भी अपने बेटे को मिलने चाचा के साथ शहर आ जाती थी. मोहिनी भाभी और निशा दोनों बहनें मेरे लिए कभी-कभी जन्नत भरा माहौल पैदा कर देती. कुल मिलाकर कुछ किलोमीटर की दूरियाँ भी हम सबके बीच ना के बराबर ही थी.
Beautiful update
 
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