PART 12
बिस्तर के गद्दे उन दोनों के वजन से नीचे धंस गए थे। कमरे के भीतर फैली वह हल्की नीली रोशनी अब उनके चारों तरफ एक मायावी दुनिया रच रही थी। सिद्धार्थ ने काव्या को अपनी बाहों में उठाकर जब बिस्तर के बीचों-बीच सुलाया, तो काव्या की वह काले रंग की रेशमी नाइट-स्लिप हल्की सी ऊपर खिसक गई, जिससे उसकी गोरी, सुडौल जांघों का एक बड़ा हिस्सा पूरी तरह अनावृत हो गया।
काव्या की सांसें इस वक्त किसी तेज दौड़ते हुए घोड़े की तरह चल रही थीं। उसकी आँखों में एक अजीब सी कशमकश थी—एक तरफ वह 'एथेरिया' की वो योद्धा थी जिसने सदियों से खुद पर काबू रखना सीखा था, दूसरी तरफ एक आम इंसानी औरत का वो डर था जो उसे बार-बार याद दिला रहा था कि बगल के कमरे में उसकी सगी बड़ी बहन साक्षी सो रही है। यह डर, यह झिझक, उनके इस मिलन को और भी ज्यादा रोमांचक और डरावना बना रही थी।
"सिड..." काव्या ने बहुत ही धीमी, लगभग सुबकती हुई आवाज में सिद्धार्थ का चेहरा अपने दोनों हाथों में थामते हुए कहा। "धीरे... प्लीज। दीदी अगर जाग गईं, तो मैं सच में इसी बिस्तर पर अपनी जान दे दूंगी। मुझे बहुत डर लग रहा है।"
सिद्धार्थ ने काव्या की आँखों में देखा। उन आँखों में छुपा डर और उसके साथ ही उमड़ती हुई वो बेपनाह हवस साफ नजर आ रही थी। सिद्धार्थ अब वो झेंपने वाला लड़का नहीं था। वे दोनों पहले भी कई बार इस बिस्तर पर एक-दूसरे के जिस्म की गहराइयों को नाप चुके थे, इसलिए उनके बीच अब वो शुरुआती अनजानापन नहीं था। वे दोनों एक-दूसरे की कमजोरियों से, एक-दूसरे के जिस्म के हर उस हिस्से से वाकिफ थे जहाँ छूने मात्र से ही बिजली दौड़ जाती थी।
"कोई नहीं जागेगा मौसी... आप सिर्फ मेरी हो, इस वक्त सिर्फ मेरी," सिद्धार्थ ने कहा। उसने जानबूझकर काव्या को 'मौसी' कहकर पुकारा, क्योंकि इस शब्द का इस्तेमाल इस बंद कमरे में उनके भीतर की आग को और ज्यादा भड़का देता था। उसने काव्या के दिमाग में साक्षी का ख्याल आने ही नहीं दिया। वह चाहता था कि काव्या को यही लगे कि सिद्धार्थ की पूरी दुनिया, उसकी पूरी हवस और उसका पूरा प्यार सिर्फ और सिर्फ काव्या के इर्द-गिर्द घूमता है। उसने अपने दिल के उस दूसरे कोने को, जहाँ साक्षी की मासूमियत बसी थी, बहुत ही गहराई से छुपा कर रख लिया था।
सिद्धार्थ ने बिना कोई और वक्त गंवाए काव्या की उस पतली रेशमी नाइट-स्लिप के स्ट्रैप्स को उसके कंधों से नीचे खिसका दिया। वह काला रेशमी कपड़ा सरकता हुआ काव्या की कमर के पास जा गिरा। नीली रोशनी में काव्या का वो दूध जैसा सफेद, सुडौल और गदराया हुआ बदन पूरी तरह से सिद्धार्थ के सामने था। उसकी छाती के भारी उभार उसकी तेज सांसों के साथ ऊपर-नीने हो रहे थे, और उनके ऊपर के कड़े हिस्से सिद्धार्थ को आमंत्रण दे रहे थे।
सिद्धार्थ सीधा काव्या के ऊपर आ गया। उनके जिस्मों का वो सीधा संपर्क इतना उग्र था कि काव्या के मुंह से एक सिसकी निकलने ही वाली थी कि सिद्धार्थ ने फुर्ती से अपने होंठ उसके होंठों पर रख दिए। उसने काव्या की उस आवाज को अपने मुंह के भीतर ही सोख लिया।
दोनों को पता था कि उन्हें कहाँ पहुंचना है। सिद्धार्थ ने अपनी जीभ काव्या के मुंह के अंदर डाल दी और उसे बुरी तरह मथने लगा। काव्या ने भी अपनी दोनों टांगें सिद्धार्थ की कमर के चारों तरफ कस लीं और अपनी पीठ को बिस्तर से ऊपर उठा दिया। उनके निचले हिस्से एक-दूसरे से इतनी बुरी तरह रगड़ खा रहे थे कि बिना किसी प्रवेश के ही दोनों का शरीर कांपने लगा था।
सिद्धार्थ ने चुंबन तोड़े बिना अपने हाथ नीचे बढ़ाए और काव्या की पैंटी को एक ही झटके में उसकी जांघों से उतार कर फर्श पर फेंक दिया। उसका अपना शरीर भी पूरी तरह से नग्न था। उसने काव्या की एक टांग को अपने कंधे पर रखा, जिससे काव्या की वो गीली चूत पूरी तरह से खुल गई। वहाँ पहले से ही रस की बूंदें चमक रही थीं।
"सिड... आआह्ह... अब और नहीं..." काव्या ने अपनी आँखें पलटते हुए सिद्धार्थ के बालों को मुट्ठी में भींच लिया।
सिद्धार्थ ने अपने शरीर का पूरा वजन आगे बढ़ाया और एक ही धक्के के साथ खुद को काव्या के अंदर पूरी गहराई तक उतार दिया।
"उम्मम्म्मम्म्म!!!" काव्या की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने अपनी पूरी ताकत से सिद्धार्थ के कंधे पर अपने दांत गड़ा दिए ताकि उसकी चीख कमरे से बाहर न जा सके। उसकी चूत की वो कसावट सिद्धार्थ के लंड को इस कदर जकड़ रही थी कि सिद्धार्थ का पूरा बदन अकड़ गया। वह कुछ पलों के लिए वहीं ठहर गया, अपनी सांसों को काबू करने की कोशिश करने लगा।
"ओह गॉड मौसी... आप इतनी तंग हो... हर बार ऐसा लगता है जैसे पहली बार कर रहा हूँ," सिद्धार्थ ने हांफते हुए काव्या के कान के पास फुसफुसाया।
काव्या ने अपनी टांगों से उसकी कमर को और कस लिया। "तो फिर... रुको मत ना... चोदो मुझे... अपनी मौसी को पूरी तरह से फाड़ दो आज..." काव्या इस वक्त लाज-शर्म की सारी हदें पार कर चुकी थी।
सिद्धार्थ ने अपनी गति बढ़ाई। उसके धक्के अब धीमे नहीं थे, वो पूरी तरह से वाइल्ड हो चुके थे। हर एक धक्के के साथ काव्या का पूरा शरीर चारपाई पर ऊपर की तरफ खिसक रहा था। कमरे में उनके शरीरों के आपस में टकराने की एक बहुत ही गीली और तेज 'थप-थप' की आवाज गूंजने लगी। काव्या अपने दोनों हाथों से बिस्तर की चादर को नोच रही थी। उसका पूरा बदन पसीने से भीग चुका था, और वो पसीना उनके जिस्मों के बीच एक चिकनाहट पैदा कर रहा था जिससे घर्षण और भी ज्यादा तीव्र हो गया था।
सिद्धार्थ ने काव्या के दोनों भारी स्तनों को अपने हाथों में लिया और उन्हें इतनी बेरहमी से मसला कि काव्या के मुंह से सिसकियों का एक बवंडर फूट पड़ा। "आह्ह... सिड... हाँ... तेज... और तेज... मर जाऊंगी मैं... आआआह्ह्ह!"
लगभग बीस मिनट की उस निरंतर और खूंखार राइड के बाद, काव्या का पूरा शरीर अचानक से थरथराने लगा। उसकी चूत के अंदर की मांसपेशियां सिद्धार्थ के लंड को बार-बार भींचने लगीं। वह अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुकी थी। "सिड!! मैं... मैं जा रही हूँ... आह्ह्ह!!"
सिद्धार्थ ने भी अपनी गति को अपनी चरम सीमा पर पहुंचा दिया। उसने लगातार पांच-छह इतने गहरे और अंधाधुंध धक्के मारे कि काव्या की चूत के अंदर एक भयंकर विस्फोट हुआ और उसका पूरा पानी बाहर आ गया। ठीक उसी सेकंड, सिद्धार्थ ने भी एक लंबी कराह के साथ अपने पूरे वीर्य को काव्या के गर्भाशय के मुहाने पर खाली कर दिया। दोनों एक-दूसरे के ऊपर निढाल होकर गिर पड़े।
करीब पंद्रह मिनट तक दोनों वैसे ही लेटे रहे, उनकी सांसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। कमरे की खिड़कियों पर उनके शरीरों की गर्मी से धुंध जम चुकी थी। लेकिन एक युवा लड़के का शरीर इतनी जल्दी शांत होने वाला नहीं था, और न ही काव्या की वो सदियों पुरानी प्यास एक बार में बुझने वाली थी।
सिद्धार्थ का लंड काव्या के अंदर ही था, जो कुछ देर शांत रहने के बाद फिर से धीरे-धीरे कड़ा होने लगा था। काव्या को अपने अंदर उस भारीपन का दोबारा अहसास हुआ, तो उसने अपनी आँखें खोलीं और सिद्धार्थ की तरफ एक मदहोश नजर से देखा।
"अभी भी पेट नहीं भरा तुम्हारा? राक्षस हो क्या तुम?" काव्या ने मुस्कुराते हुए, सिद्धार्थ के गाल पर हल्का सा थप्पड़ मारते हुए कहा।
"आपके इस बदन से मेरा पेट कभी नहीं भर सकता मौसी," सिद्धार्थ ने कहा और वह काव्या के ऊपर से हटा। उसने काव्या को अपनी तरफ घुमाया और उसे चारपाई पर उल्टा सुला दिया।
काव्या समझ गई कि सिद्धार्थ अब क्या करने वाला है। उसके मन में फिर से एक हल्का सा डर जागा। "सिड... इस पोजीशन में आवाज ज्यादा होती है... प्लीज, दीदी जाग जाएंगी।"
"मैंने कहा ना, कोई नहीं जागेगा। आप बस अपनी आवाज को कंट्रोल रखना," सिद्धार्थ ने कहा। उसने काव्या के गांड़ को अपने दोनों हाथों से पकड़ा। काव्या के वो गांड़ इतने भारी, सुडौल और गोरे थे कि नीली रोशनी में वो किसी संगमरमर के दो गोलों जैसे लग रहे थे। सिद्धार्थ ने उन पर अपने दोनों हाथों के निशान छोड़ते हुए उन्हें जोर से भींचा।
"आह... पागल... मत करो ना ऐसा," काव्या ने तकिए में अपना मुंह छुपाते हुए कहा।
सिद्धार्थ ने पीछे से अपने कड़े हो चुके लंड को काव्या की दोनों जांघों के बीच सेट किया। इस बार उसने कोई जल्दबाजी नहीं की। वह धीरे-धीरे, बहुत ही नजाकत से काव्या के पिछले हिस्से से अपनी लंड को अंदर सरकाने लगा। चूँकि वहाँ पहले से ही उनका मिला-जुला पानी लगा हुआ था, इसलिए प्रवेश बहुत ही चिकना और गहरा हुआ।
"उह्ह्ह्ह्ह... सिड..." काव्या ने तकिए को अपने दांतों से कसकर पकड़ लिया। यह पोजीशन उसके लिए बहुत ही ज्यादा गहरी और तीखी थी। सिद्धार्थ का लंड उसकी दीवारों को पूरी तरह से फैलाते हुए उसके पेट के बहुत अंदर तक छू रहा था।
सिद्धार्थ ने बहुत ही लयबद्ध तरीके से पीछे से धक्के मारना शुरू किया। हर धक्के के साथ काव्या के भारी चूतड़ सिद्धार्थ के अंडकोषों से टकरा रहे थे, जिससे एक बहुत ही मादक 'थपक-थपक' की आवाज आ रही थी। सिद्धार्थ ने आगे झुककर काव्या की नंगी पीठ पर अपने होंठ रख दिए। वह उसकी रीढ़ की हड्डी पर अपनी जीभ चला रहा था, जिससे काव्या का पूरा शरीर सिहर रहा था।
"मौसी... आपकी गांड़ बहुत मस्त है... मेरा मन करता है मैं पूरी रात इसे ही देखता रहूं," सिद्धार्थ ने उत्तेजना में बहकर कहा।
काव्या ने तकिए से मुंह हटाकर पीछे मुड़कर देखा, उसकी आँखें पूरी तरह से वासना के नशे में डूबी हुई थीं। "तो फिर देखते क्या हो... चोदो ना अपनी इस मौसी को... तुम्हारे इस डंडे ने मेरी जान निकाल दी है... आह्ह... यैस सिड... वहीं... वहीं मारो जोर से!"
सिद्धार्थ ने अपनी गति को दोगुना कर दिया। वह पीछे से पूरी ताकत से धक्के लगा रहा था। काव्या चारपाई के पायों को अपने हाथों से कसकर पकड़े हुए थी। उसके शरीर का हर एक अंग इस वक्त सिद्धार्थ के नियंत्रण में था। यह उनका दूसरा राउंड था, जो पहले वाले से भी ज्यादा लंबा खिंचा। सिद्धार्थ ने अपनी सांसों पर काबू रखना सीख लिया था। जब भी उसे लगता कि उसका पानी आने वाला है, वह कुछ पलों के लिए रुक जाता, काव्या की पीठ को चूमता, और फिर से शुरू हो जाता।
लगभग आधे घंटे के बाद, काव्या के सब्र का बांध फिर से टूट गया। उसकी चूत से पानी का एक और रेला छूटा, और उसके तुरंत बाद सिद्धार्थ ने भी एक गहरे धक्के के साथ अपना सारा पानी उसके अंदर छोड़ दिया। काव्या पूरी तरह से बिस्तर पर ढह गई।
रात के करीब एक बज चुके थे। कमरे का तापमान एसी चलने के बावजूद काफी गर्म था। सिद्धार्थ उठकर टेबल से पानी की बोतल लाया। उसने खुद भी पानी पिया और फिर काव्या के मुंह से बोतल लगा दी। काव्या ने गटक-गटक कर आधा पानी पी लिया। उसकी छाती अभी भी बुरी तरह हांफ रही थी।
"तुम इंसान नहीं हो सिड... कोई नहीं कह सकता कि तुम 18 साल के हो। तुमने मुझे पूरी तरह से निचोड़ दिया है," काव्या ने अपनी सूजी हुई आँखों से उसे देखते हुए कहा।
सिद्धार्थ बिस्तर पर सीधा लेट गया। "तो ठीक है, अब मैं आराम करता हूँ।"
काव्या ने उसे देखा। सिद्धार्थ का वो लंबा, कड़ा लंड अभी भी पूरी तरह से शांत नहीं हुआ था, वो उसकी जांघों पर एक भारी सांप की तरह लेटा हुआ था। काव्या के अंदर की औरत को इस बात से एक अजीब सा घमंड महसूस हुआ। ये लड़का सिर्फ मेरे लिए इतना बेकाबू रहता है। दीदी तो इसके लिए सिर्फ एक माँ हैं, लेकिन मैं इसकी असलियत हूँ। (काव्या अभी भी उसी भ्रम में जी रही थी)।
"तुम आराम करोगे? और मेरा क्या? मुझे तुमने बीच मझधार में छोड़ दिया है," काव्या ने एक शरारती मुस्कान के साथ कहा।
वह उठी और सिद्धार्थ के पैरों की तरफ से रेंगती हुई उसके ऊपर आ गई। उसने अपनी दोनों टांगें सिद्धार्थ के दोनों तरफ फैलाईं और उसके पेट के ऊपर बैठ गई। काव्या के खुले हुए लंबे बाल सिद्धार्थ के चेहरे और सीने पर बिखर गए।
"अब मैं चलाऊंगी गाड़ी... तुम बस चुपचाप पड़े रहना और देखना कि तुम्हारी मौसी तुम्हें कैसे मजा देती है," काव्या ने कहा और उसने अपने हाथों से सिद्धार्थ के उस कड़े लंड को पकड़ा। उसने उसे अपनी चूत के मुहाने पर सेट किया और बहुत ही धीरे से नीचे की तरफ बैठ गई।
"आह्ह्ह..." सिद्धार्थ के मुंह से एक गहरी कराह निकली। काव्या की चूत के अंदर की गर्मी और वो गीलापन इस वक्त एक अलग ही लेवल पर था। काव्या ने पूरा लंड एक ही बार में अपने अंदर ले लिया और सिद्धार्थ के सीने पर अपने दोनों हाथ टिका दिए।
काव्या ने धीरे-धीरे ऊपर-नीचे होना शुरू किया। वह अपनी मर्जी से गति तय कर रही थी। जब वो ऊपर उठती, तो सिद्धार्थ का लंड लगभग पूरा बाहर आ जाता, और जब वो नीचे बैठती, तो एक गहरी 'प्लॉप' की आवाज के साथ वो पूरा अंदर समा जाता।
सिद्धार्थ ने नीचे से काव्या की पतली कमर को अपने हाथों से पकड़ लिया और उसे ऊपर-नीचे होने में मदद करने लगा। ऊपर से काव्या के दोनों भारी स्तन हवा में लहरा रहे थे। सिद्धार्थ ने अपने सिर को थोड़ा उठाया और बारी-बारी से उसके दोनों स्तनों को अपने मुंह में भरकर चूसने लगा।
"ओह्ह... सिड... हाए री मम्मी... ये बहुत अच्छा है... आह्ह... चूसो उन्हें... और तेज धक्के मारो नीचे से... हाँ बाबू... ऐसे ही..." काव्या अब पूरी तरह से इस राइड के मजे ले रही थी।
कमरे का सन्नाटा उनकी इस उग्र चोदामारी से पूरी तरह टूट चुका था। काव्या की चूड़ियों की छन-छन और उनके जिस्मों की आवाजें एक अजीब सा संगीत रच रही थीं। काव्या ने अपनी गति को और तेज कर दिया। वह किसी अनुभवी घुड़सवार की तरह सिद्धार्थ के ऊपर कूद रही थी। सिद्धार्थ का पूरा शरीर इस सुख से कांप रहा था।
यह उनका तीसरा राउंड था, जो पूरी तरह से काव्या के नियंत्रण में था। लगभग पच्चीस मिनट की इस राइड के बाद, काव्या ने एक बहुत ही तीखी चीख मारी और सिद्धार्थ के सीने पर पूरी तरह से गिर पड़ी। उसकी चूत ने सिद्धार्थ के लंड को इतनी जोर से भींचा कि सिद्धार्थ भी खुद को रोक नहीं पाया और उसका पानी भी एक फव्वारे की तरह काव्या के अंदर छूट गया।
रात के तीन बज रहे थे। यह वो वक्त था जब इंसान का दिमाग पूरी तरह से सो जाता है और सिर्फ उसका आदिम शरीर काम करता है। इतने थकावट भरे तीन राउंड्स के बाद भी, उन दोनों के भीतर की आग पूरी तरह शांत नहीं हुई थी। जवानी का नशा और प्रेम का वो रोमांच उन्हें बार-बार एक-दूसरे की तरफ खींच रहा था।
सिद्धार्थ ने इस बार काव्या को बिस्तर के किनारे पर लाकर खड़ा कर दिया। काव्या के पैर जमीन पर थे, लेकिन उसका आधा शरीर बिस्तर पर झुका हुआ था। सिद्धार्थ उसके पीछे खड़ा था।
"सिड... अब और ताकत नहीं है मेरे पैरों में... मैं गिर जाऊंगी," काव्या ने हांफते हुए कहा। उसकी आवाज में अब एक गहरी थकावट थी, लेकिन उसकी आँखों की वासना अभी भी वैसी ही थी।
"मैं हूँ ना मौसी... गिरने नहीं दूंगा," सिद्धार्थ ने पीछे से उसकी कमर को इतनी जोर से पकड़ा कि उसकी उंगलियों के निशान काव्या की गोरी त्वचा पर छप गए।
उसने बिना कोई भूमिका बनाए, पीछे से एक ही झटके में अपनी लंड को काव्या के अंदर डाल दिया। चूँकि काव्या का शरीर पहले से ही पूरी तरह से खुला हुआ और गीला था, इसलिए लंड बिना किसी रुकावट के पूरा अंदर चला गया।
"आआआआह्ह्ह्ह!!" काव्या ने बिस्तर की चादर को अपने दोनों हाथों से जकड़ लिया। । वह बिना रुके, लगातार बहुत ही तेज और गहरे धक्के मार रहा था।
काव्या का पूरा शरीर हर धक्के के साथ आगे की तरफ हिल रहा था। उसके मुंह से अब लगातार "आह... उम्म... सिड... जानू... मम्म... मम्मी..." की आवाजें निकल रही थीं। वह भूल चुकी थी कि बगल के कमरे में साक्षी है। उसे इस वक्त सिर्फ और सिर्फ सिद्धार्थ का वो भारी और कड़ा लंड महसूस हो रहा था जो उसके वजूद को चीरता हुआ अंदर जा रहा था।
सिद्धार्थ ने पीछे से काव्या के बालों को अपनी मुट्ठी में जकड़ लिया और उसका सिर पीछे की तरफ खींचा। उसने काव्या के होठों को फिर से अपने मुंह में भर लिया। यह किस बहुत ही रफ (खुरदरा) था। सिद्धार्थ ने काव्या के होठों को काटना शुरू कर दिया। काव्या को थोड़ा दर्द हो रहा था, लेकिन वो दर्द इस वक्त उसे एक अलग ही नशा दे रहा था।
यह राउंड लगभग बीस मिनट तक चला, जहाँ सिद्धार्थ ने बिना रुके काव्या को एक बेदर्दी के साथ चोदा। अंत में, दोनों एक साथ, एक ही पल में चिल्लाते हुए बिस्तर पर गिर पड़े। उनका पानी एक बार फिर से एक-दूसरे के अंदर समा गया।
सुबह के करीब साढ़े चार बज रहे थे। हवेली के बाहर आसमान का रंग अब गहरे काले से हल्का नीला होने लगा था। पक्षियों की चहचहाहट बहुत ही धीमी आवाज में शुरू हो चुकी थी। यह रात का आखिरी पहर था, और दोनों जानते थे कि कुछ ही देर में सुबह हो जाएगी, दरवाजा खोलना पड़ेगा, और उन्हें फिर से 'मौसी' और 'भांजे' का नाटक करना पड़ेगा।
इस बात के अहसास ने उनके अंदर एक आखिरी, बहुत ही गहरी और उदास तड़प पैदा कर दी थी।
काव्या सिद्धार्थ की बाहों में सीधी लेटी हुई थी। उसका पूरा शरीर टूट चुका था, उसकी जांघों के बीच एक हल्की सी सूजन और जलन थी, लेकिन उसका दिल अभी भी सिद्धार्थ के लिए धड़क रहा था।
"सिड... सुबह होने वाली है," काव्या ने बहुत ही धीमी आवाज में सिद्धार्थ के सीने पर अपनी उंगली फिराते हुए कहा।
"मुझे पता है मौसी..." सिद्धार्थ ने कहा।
"दूर मत जाना मेरे से... कभी नहीं," काव्या ने कहा और उसने खुद सिद्धार्थ को अपने ऊपर खींच लिया।
यह पूरी तरह से एक-दूसरे में समा जाने का, एक-दूसरे को महसूस करने का एक बहुत ही धीमा और गहरा सेशन था।
सिद्धार्थ ने बहुत ही कोमलता से लंड को काव्या के अंदर उतारा। काव्या की आँखों से इस बार दर्द के नहीं, बल्कि एक बहुत ही गहरे और आत्मिक सुख के आंसू निकल आए। सिद्धार्थ ने बहुत ही धीमे-धीमे, हर एक धक्के को महसूस करते हुए गति शुरू की। काव्या ने उसकी पीठ को बहुत ही प्यार से सहलाया।
"आई लव यू सिड... तुमसे बहुत प्यार करती हूँ मैं... चाहे कुछ भी हो जाए, मुझे कभी मत छोड़ना," काव्या ने सिद्धार्थ के कानों में फुसफुसाया।
"मैं कभी नहीं छोड़ूँगा मौसी... आप मेरी हो," सिद्धार्थ ने कहा।
वे दोनों करीब चालीस मिनट तक इसी धीमी और मदहोश कर देने वाली गति में एक-दूसरे से जुड़े रहे। भोर की हल्की सुनहरी किरणें जब खिड़की के पर्दों से छनकर उनके पसीने से भीगे हुए, नग्न शरीरों पर पड़ीं, तब जाकर उन दोनों का वो आखिरी और सबसे गहरा डिस्चार्ज हुआ।
सिद्धार्थ पूरी तरह से काव्या के ऊपर ढह गया। काव्या ने उसे अपनी बाहों में पूरी मजबूती से जकड़ लिया। कमरे में अब सिर्फ उनकी शांत होती सांसों की आवाज थी। वे दोनों एक-दूसरे में इस कदर उलझे हुए थे कि कोई नहीं कह सकता था कि ये दुनिया की नजरों में मौसी और भांजे हैं। वे दोनों गहरी, थकावट भरी लेकिन एक परम संतुष्ट नींद के आगोश में चले गए, यह जाने बिना कि इस बंद कमरे के बाहर, हवेली की रसोई में साक्षी अब जाग चुकी थी और चाय बनाने की तैयारी कर रही थी।