अलीना अपनी महंगी गाड़ी से उतरी। हवेली जैसी उसकी कोठी सोने की तरह चमक रही थी, लेकिन अंदर का सूनापन किसी उजड़े हुए किले जैसा था।
"सलाम, बेगम साहिबा!"
गुलामों की झुकी हुई नज़रें, आदर में झुके हुए सर—सब कुछ वैसा ही था, जैसा अलीना ने अपने लिए चाहा था।
लेकिन फिर भी…
वो इस आलीशान घर में अकेली थी।
अलीना किसी से कुछ कहे बिना सीधे अपने कमरे में चली गई। उसने अपने जूते उतारे, अपने भारी दुपट्टे को बिस्तर पर फेंका और खुद भी थकान से बिस्तर पर गिर पड़ी।
छत पर उसकी नज़र टिक गई।
अचानक, अतीत के दरवाज़े खुल गए।
अलीना की आँखों में आँसू थे। उसके माँ-बाप के सामने वो गिड़गिड़ा रही थी।
"अमी, अब्बू… प्लीज़ समझने की कोशिश करो… मैं रहमान से बेइंतहा मोहब्बत करती हूँ!"
अब्बू की आँखें गुस्से से लाल थीं।
"चुप कर, अलीना! तू हमें शर्मिंदा कर रही है!"
अमी ने घबराई नज़रों से उसे देखा।
"बेटा, ये तुम क्या कह रही हो? रहमान हमारे बराबर का नहीं है! उसकी औक़ात कुछ भी नहीं!"
अलीना ने अपनी माँ की गोदी में सिर रख दिया, उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
"अमी, इश्क़ औक़ात नहीं देखता…! रहमान मुझसे सच्चा प्यार करता है!"
अब्बू ने गुस्से में ज़ोर से मेज़ पर हाथ मारा।
"और तूने उस नालायक के साथ अपनी ज़िंदगी बर्बाद करने की ठान ली? बता, तेरी गोद में जो बच्चा पल रहा है, वो किसका है?"
अलीना की आँखें डर से चौड़ी हो गईं।
उसने काँपते लहज़े में जवाब दिया—
"अब्बू… ये रहमान का बच्चा है… हमारा बच्चा।"
घर में सन्नाटा छा गया।
अब्बू का चेहरा गुस्से से लाल हो गया, और उन्होंने झटके से अलीना को पकड़ लिया।
"हरामज़ादी! तूने हमारी इज़्ज़त मिट्टी में मिला दी!"
अमी ने अब्बू का हाथ पकड़कर अलीना को छुड़ाया।
"खुदा के लिए, उसे मत मारो!"
अलीना फूट-फूटकर रोने लगी।
"अब्बू, अमी… मेरी मोहब्बत को ग़लत मत समझो… मैं रहमान के बिना मर जाऊँगी!"
अब्बू ने गुस्से से दरवाज़े की तरफ इशारा किया।
"अगर तू मिर्ज़ा से इतनी मोहब्बत करती है, तो निकल जा मेरे घर से! आज से तू हमारे लिए मर चुकी है!"
अलीना की दुनिया अंधेरे में डूब गई।
उसने अपनी माँ की ओर देखा, उम्मीद थी कि वो कुछ कहेंगी…
लेकिन अमी रोते हुए भी चुप थीं।
अब्बू का फैसला आखिरी था।
अलीना को अपना घर छोड़ना पड़ा… अपनी मोहब्बत के लिए
उसकी आँखों में एक भी आँसू नहीं था।
अब वो लड़की नहीं थी जो मोहब्बत के लिए गिड़गिड़ाती थी।
अब वो अलीना रहमान थी।
जिसने दुनिया से सिर्फ़ नफरत करना सीखा था।
इश्क़, धोखा और तबाही
अलीना जब रहमान के घर पहुँची, तो उसकी सांसें तेज़ हो गईं।
उसका दिल उम्मीदों से भरा था—
"मेरा रहनान ... मेरा प्यार... मेरी दुनिया... अब सब ठीक हो जाएगा..."
लेकिन जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला, उसकी रूह काँप गई।
रहामान... वो मर्द जिसे वो अपनी जान से भी ज़्यादा चाहती थी...
वो किसी और के साथ था!वो 'कोई और' कोई लड़की थी...
अलीना को एक झटका लगा। उसकी आँखें चौड़ी हो गईं, साँसें अटक गईं।
"रहमान ... ये क्या है?" उसकी आवाज़ काँपी।रहमान ने घबराकर पीछे देखा। उसकी आँखों में पहली बार डर था।
अलीना के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसकी दुनिया, उसकी मोहब्बत—सब झूठ था!
"तू... तू मुझसे धोखा कर रहा था?"
रहमान ने अपने कपड़े संभाले, और चेहरे पर एक ज़हरीली मुस्कान ले आया।
"अब जान गई तू? हाँ, मैंने तुझे धोखा दिया। लेकिन अब तू कुछ नहीं कर सकती।"
अलीना का खून खौल उठा।
"हरामज़ादे!" वो ज़ोर से चीखी और उस पर झपट पड़ी।
उसके हाथ रहमान के गले तक पहुँचते इससे पहले ही रहमान ने उसका हाथ पकड़ लिया और ज़ोर से धक्का दिया।
अलीना ज़मीन पर गिर पड़ी।रहमान उसकी ओर झुकते हुए हँसा।
"अब तुझे सब समझ आ गया ना? लेकिन बहुत देर हो चुकी है, अलीना..."
अलीना ने नफ़रत से उसे देखा।
रहमान आगे बढ़ा और फुसफुसाया—
"तेरे पेट में मेरा बच्चा है... अब तू दुनिया को क्या बताएगी?"
"क्या कहेगी सबको? कि अलीना ने शादी से पहले किसी का बच्चा पैदा किया?"
अलीना के होश उड़ गए।
रहमान उसकी आँखों में डर देख रहा था और उसे मज़ा आ रहा था।
"अब तुझे मुझसे शादी करनी ही पड़ेगी... नहीं तो दुनिया तुझे जीने नहीं देगी।"
अलीना ने अपने पेट पर हाथ रखा।
उसके अंदर एक ज़िन्दगी पल रही थी।
लेकिन...
"नहीं!"
अलीना के दिमाग में बस एक ही बात आई—
"मैं ना तुझे छोड़ूँगी और ना इस बच्चे को!"
उसने घृणा से रहमान को देखा।
"मैं अपने शरीर से तेरी हर निशानी मिटा दूँगी!"
रहमान उसकी आँखों में पागलपन देखा।
"तू... तू ऐसा नहीं कर सकती..." उसने पहली बार घबराकर कहा।
"देखना, मैं तेरा नामो-निशान मिटा दूँगी, मिर्ज़ा!"
अलीना उठी, अपने आँसू पोंछे, और वहाँ से तेज़ी से निकल गई।
उसने कसम खाई—
"अब मेरी ज़िन्दगी में कोई मोहब्बत नहीं होगी.
मनाली की ठंडी हवाएँ तेज़ी से दौड़ रही थीं। चारों ओर घना अंधेरा था।
सुनसान सड़क पर एक गाड़ी की हेडलाइट जल रही थी।
स्टेयरिंग पर झुकी अलीना, गहरी साँसें ले रही थी। उसकी आँखों में आँसू थे, होंठ काँप रहे थे।
रात के तीन बजे...
उसने अपना हाथ अपने पेट पर रखा। वहाँ एक नन्हीं जान थी, जो नफ़रत की आग में जल रही थी।
"सिकंदर..." उसकी आवाज़ टूट गई।
"तू सुन रहा है ना? तेरी माँ को कैसे बर्बाद किया गया?"
उसकी साँसें तेज़ हो गईं।
"तेरे बाप ने मेरी मोहब्बत को धोखा बना दिया। उसने मेरी इज़्ज़त को नीलाम कर दिया। उसने मेरे जिस्म से खेला... और अब, तू..."
उसकी आँखों में जंगली पागलपन था।
"मैं तेरी परछाई भी अपने साथ नहीं रख सकती!"
अचानक, उसने अपने पेट पर घूंसे बरसाने शुरू कर दिए।
"तुझे मरना होगा, सिकंदर!"
उसके होंठ कांपने लगे, लेकिन उसका हाथ नहीं रुका।
"तू इस दुनिया में नहीं आएगा! तुझे मैं अपने साथ नहीं घसीटूंगी!"
उसके चेहरे पर आँसुओं की धार थी, लेकिन उसका क्रोध ज़्यादा गहरा था।
वो ज़ोर से चीखी—
"मर जा सिकंदर... मर जा!!"
उसके हाथ झटके से रुक गए।
उसका शरीर काँप रहा था।
"क्यों नहीं मर रहा तू?"
उसकी आँखों में पागलपन का तूफान था।
अचानक, उसके पेट के अंदर हलचल हुई।
उसका दिल ज़ोर से धड़क उठा।
वो बुत बन गई।
"तू... तू जिंदा है?"
एक गहरी खामोशी छा गई।
उसने अपने पेट पर हाथ रखा... और फिर ज़ोर से रो पड़ी।
"तू मेरी कोख में जिंदा है, सिकंदर..."
उसने पहली बार महसूस किया कि वो एक माँ थी।
"पर मैं माँ नहीं बन सकती... मैं नहीं बन सकती..."****"नहीं!"
वो फिर से गाड़ी स्टार्ट करने लगी।
"इस बच्चे को खत्म करना होगा!"
उसकी आँखों में आँसू थे... लेकिन अब उसकी आँखों में एक और चीज़ थी—
, दर्द और नफ़रत का नशा।
तभी उसकी गारी एक पेड़ से टकरा गई
अस्पताल का सफ़ेद कमरा... धुंधली रोशनी... और अलीना की टूटी हुई साँसें।
उसकी पलकें भारी थीं, सिर दर्द से फटा जा रहा था। जैसे ही उसने आँखें खोलीं, एक अजीब सा सन्नाटा उसके कानों में गूंजा।
"अलीना... मेरी बच्ची!" उसकी माँ, फातिमा, रोती हुई उसके सिर पर हाथ फेर रही थीं।
अलीना की नज़र चारों ओर घूमी। उसके पिता, उसका भाई, उसकी भाभी... सब वहीं थे।
"ये... मैं कहाँ हूँ?" उसकी आवाज़ धीमी और कांपती हुई थी।
तभी डॉक्टर अंदर आया। उसके चेहरे पर एक गंभीर भाव था।
"मिस अलीना, आपको होश आ गया, ये बहुत अच्छी बात है।"
अलीना दर्द से कराह उठी, लेकिन अचानक उसे कुछ याद आया।
"मेरा... बच्चा?"
कमरा एक पल के लिए पूरी तरह खामोश हो गया।
डॉक्टर ने गहरी सांस ली।
"आपका बेटा... समय से पहले पैदा हुआ है। वह सिर्फ़ सात महीने का है, इसलिए उसकी हालत बहुत नाज़ुक है।"
अलीना की आँखों में जंगली बेचैनी थी।
"नहीं... नहीं, ये नहीं हो सकता!"
डॉक्टर की आवाज़ गहरी थी—
"मगर... उस बच्चे में जीने की ज़बरदस्त चाहत है, मिस अलीना। उसने दुनिया छोड़ने से इंकार कर दिया।"
अलीना का शरीर जम सा गया।
"क्या मतलब?"
"मतलब ये कि आपका बेटा मरना नहीं चाहता, मिस अलीना। उसने हार नहीं मानी। वह जीना चाहता है!"
अलीना का दिल ज़ोर से धड़क उठा।
"तू मेरी कोख में भी जिंदा रहना चाहता था... और अब भी?" उसकी आँखों में आँसू थे।
उसकी माँ ने उसका हाथ थामा।
"अलीना, ये अ23लाह का करिश्मा है। ये बच्चा तुझे सबक देने आया है।"
अलीना कांपते हुए बोली—
"मैंने उसे मारने की कोशिश की थी, अम्मी... मैंने उसे चाहा ही नहीं था... फिर भी वो ज़िंदा है?"
डॉक्टर की आवाज़ भारी थी—
"वो सिर्फ़ जिंदा नहीं है, मिस अलीना, वो लड़ रहा है।"
अलीना की आँखों से आँसू गिर पड़े।
"मैंने उसे कभी चाहा ही नहीं था..."
उसके पिता पहली बार बोले—
"मगर वो तुझे चाहता है, अलीना।"
कमरे में गहरी खामोशी छा गई।
अलीना की आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा।
उसने सिर्फ़ एक बात कही—
"मुझे... मेरे बेटे के पास ले चलो..."
और फिर उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
अस्पताल का आईसीयू… धीमी-धीमी बीप की आवाज़ें… मशीनों में उलझा हुआ एक नन्हा सा जिस्म…
सफ़ेद कपड़ों में लिपटा हुआ, कांच के पीछे रखा गया वह नन्हा सा बच्चा, जो अभी पूरी तरह इस दुनिया के लिए तैयार नहीं था। मगर फिर भी… उसकी छोटी-छोटी उंगलियाँ हर बार हिल रही थीं… उसकी नन्ही सी छाती मुश्किल से ऊपर-नीचे हो रही थी, मगर वह सांस लेना नहीं छोड़ रहा था।
"नहीं... नहीं, ये नहीं हो सकता!!" अलीना ने अपने बालों को मुट्ठी में भींच लिया।
उसके भीतर से अजीब सी बेचैनी उठने लगी।
"अम्मी, ये मर क्यों नहीं रहा?! इसको मरना चाहिए था, ना?! क्यों लड़ रहा है ये?!" उसकी आँखें लाल थीं, हाथ काँप रहे थे।
उसकी माँ ने डरते हुए उसे थामने की कोशिश की—
"अलीना, खुदा के लिए होश में आ!"
"नहीं अम्मी! ये बच्चा नहीं है! ये सज़ा है मेरी! ये याद दिलाने आया है कि मैं धोखा खा चुकी हूँ, कि मैं टूटी हुई हूँ! इसको मरना चाहिए था, अम्मी!! मर जाना चाहिए था!!!"
अलीना घुटनों के बल ज़मीन पर बैठ गई।
"अल23लाह.. अ**ल्ला जी, आप मुझसे इतनी नफरत क्यों करते हैं? मैंने इस बच्चे को अपनी कोख में मारने की कोशिश की थी, मैंने गाड़ी तेज़ चलाई थी ताकि ये दुनिया में ना आए… फिर भी इसने मुझे हरा दिया? फिर भी इसने जीने का फैसला किया? क्यों? क्यूं, अ**ल्लाह जी?!!"
नर्सें सहम गईं। डॉक्टर चुप हो गया। उसके पिता ने एक लंबी सांस ली, मगर बोले कुछ नहीं।
मगर आईसीयू के कांच के दूसरी तरफ़, वह बच्चा अपनी सांसों के लिए लड़ रहा था।
"देख रही हो, अलीना?" उसके पिता की आवाज़ भारी थी। "वो हार नहीं मान रहा।"
"मुझे इसकी ज़रूरत नहीं है!!!" अलीना ने ज़मीन पर हाथ मारा।
डॉक्टर ने धीरे से कहा—
"मगर इस बच्चे को तुम्हारी ज़रूरत है, मिस अलीना।"
एक पल के लिए सब खामोश हो गए।
अलीना की आँखों से आँसू बहने लगे।
"इसको मेरी नहीं… मेरी मौत की ज़रूरत थी…" वह फुसफुसाई।
तभी कांच के उस पार, वह नन्ही सी जान अपनी छोटी-छोटी मुट्ठियाँ हल्का सा हिला गई… जैसे वह कह रहा हो—
"नहीं अम्मी… मुझे तुम्हारी ज़रूरत है।"
अस्पताल के आईसीयू में दर्द और चीख़ों का साया था…
"नहीं… नहीं… ये नहीं हो सकता!!!"उस 18 साल की मासूम लड़की अलीना ने अपने सिर को दोनों हाथों से पकड़ लिया, उसकी आँखों में खून उतर आया था। उसके हलक से सिर्फ एक ही नाम निकल रहा था—
"सिकंदर…"
आईसीयू के कांच के उस पार, मशीनों से जुड़ा वह नन्हा सा बच्चा, साँसों के लिए लड़ रहा था… उसकी नाज़ुक पलकों के नीचे हल्की-हल्की नीली नसें झलक रही थीं… मगर वह हार मानने को तैयार नहीं था।
"नहीं… नहीं… सिकंदर को नहीं जीना चाहिए!!!"
अलीना ज़मीन पर घुटनों के बल गिर पड़ी, उसके हाथ काँप रहे थे, चेहरा आंसुओं से भीग चुका था।
"अ232लाह जी… सिकंदर को मार दो!!! मैंने इसको दुनिया में लाने का फैसला नहीं किया था! मैंने इसको अपनाने का इरादा नहीं किया था!! फिर भी क्यों, क्यों अ23लाह जी?!!!"
चारों तरफ़ सन्नाटा था… नर्सें चुप थीं… डॉक्टर चुप था… लेकिन उसकी चीखें पूरे अस्पताल में गूंज रही थीं।
"सिकंदर को मरना होगा, अ23लाह जी! सिकंदर को मरना चाहिए था!! इसको दुनिया में नहीं आना था!! अ23लाह जी, मेरी सुन लो!!! सिकंदर को खत्म कर दो, इसे खत्म कर दो!!!"
वह फर्श पर अपना सिर पटकने लगी। उसके नाखून खुद के ही हाथों में धंस चुके थे।
"मुझे इसकी सूरत नहीं देखनी, मुझे इसकी साँसों की आवाज़ नहीं सुननी! मुझे सिकंदर नहीं चाहिए!!!"
डॉक्टर ने नर्स की तरफ़ इशारा किया।
"इसका ब्लड प्रेशर खतरनाक तरीके से बढ़ रहा है… हमें इसे शांत करना होगा…"
नर्स ने कांपते हाथों से सिरिंज उठाई।
लेकिन अलीना अभी भी चीख़ रही थी।
"नहीं… नहीं… सिकंदर को खत्म कर दो!!! सिकंदर को जला दो, मिटा दो, मार दो!!! अल234लाह जी, मेरी सुन लो, मेरी सुन लो!!!"
अचानक, डॉक्टर ने उसके हाथ को पकड़कर उसे रोका और नर्स ने जल्दी से उसे बेहोशी का इंजेक्शन लगा दिया।
"नहीं… नहीं… सिकंदर… सिकंदर… सिक—"
उसकी आवाज़ धीमी होने लगी।
"सिकंदर… मर जाना चाहिए था… सिकंदर को…"
उसकी आँखें बंद हो गईं।
कमरे में अब सिर्फ मशीनों की बीप की आवाज़ थी।
आईसीयू के उस पार, नन्हा सिकंदर अभी भी साँसों की लड़ाई लड़ रहा था… और इस पार, उसकी माँ बेहोश पड़ी थी..... पर अब होस मे आ रही थी
अलिना की पलकें धीरे-धीरे खुलीं। बेहोशी की हालत से बाहर आते ही उसके दिमाग में एक भारीपन महसूस हुआ। उसके चारों तरफ सफेद दीवारें थीं, और हल्की-हल्की दवाइयों की गंध उसके नथुनों में घुस रही थी।
तभी एक नर्स ने उसके पास आकर कहा—
"मिस अलिना, आपको होश आ गया। डॉक्टर को बुलाती हूँ।"
अलिना ने कुछ नहीं कहा। उसका दिल बहुत धीमे-धीमे धड़क रहा था, जैसे किसी गहरे कुएं में गिरा हो।
तभी दरवाजा खुला और डॉक्टर अंदर आया। उसके हाथों में एक छोटा सा सफेद कपड़े में लिपटा हुआ नन्हा बच्चा था। वह बहुत ही नाजुक था, मानो उसकी सांसें अभी भी ज़िन्दगी से लड़ रही हों।
"आपका बेटा, मिस अलिना..." डॉक्टर ने धीरे से कहा और बच्चे को अलिना की ओर बढ़ाया।
अलिना ने घृणा से उसे देखा।
"मेरा बेटा? ये मेरा बेटा नहीं है..." उसकी आवाज़ सख्त थी, लेकिन उसमें कुछ टूटने की आहट थी।
उसकी अम्मी, जो वहीं पास खड़ी थीं, ने उसकी ओर देखा। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि सिर्फ दर्द था।
"अलिना, इसे गोद में लो... माँ बनो..."
अलिना का दिल काँपा। लेकिन अगले ही पल उसकी आँखों में वही नफरत लौट आई।
"नहीं! मैं इसे गोद में नहीं लूंगी... मैं इसकी माँ नहीं हूँ। एक माँ अपने बच्चे को प्यार करती है, और मैं इससे नफरत करती हूँ! मैं इसे दूध नहीं पिलाऊंगी!"
"अलिना!! ये क्या कह रही हो?" उसकी अम्मी की आँखों में आँसू आ गए।
अलिना की आँखें उस नन्हे बच्चे पर जमी हुई थीं। वह बहुत कमजोर था, लेकिन उसकी छोटी-छोटी मुठ्ठियां कसकर बंद थीं। वह जीना चाहता था।
अलिना कांप रही थी, लेकिन अपनी नफरत पर काबू रखते हुए बोली—
"मैं तुझे कभी अपना दूध नहीं पिलाऊंगी! एक माँ तुझे सीने से लगाकर तुझसे प्यार करती, लेकिन मैं तुझसे नफरत करती हूँ, सिकंदर!"
"तू नहीं जी पाएगा! तुझे नहीं जीना चाहिए! तेरा जन्म ही एक गलती था!"
बच्चे ने हल्की-सी करवट ली, उसकी साँसे तेज़ चल रही थीं। नर्स उसे अलिना की गोद में रखने लगी, लेकिन अलिना ने झटके से मुंह फेर लिया।
तभी उसकी अम्मी ने सख्ती से कहा—
"अगर तू इसे दूध नहीं पिलाएगी, तो ये मर जाएगा, अलिना!"
अलिना के दिल में एक झटका लगा।
मर जाएगा?
एक अजीब-सा दर्द उसके सीने में उठा। उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे। उसने कांपते हुए अपने हाथ बढ़ाए और बच्चे को गोद में ले लिया।
"क्यों आया तू मेरी ज़िन्दगी में...? क्यों नहीं मर गया तू वहीं, जहाँ तेरा जन्म हुआ था...?"
लेकिन बच्चा कुछ नहीं बोला। वह सिर्फ उसकी छाती से लग गया, और उसी पल अलिना का दिल तेज़ी से धड़क उठा।
"तू... तू जीना चाहता है? इतनी मजबूती से मेरी उंगलियां पकड़ रखी हैं तूने?"
उसके अंदर कहीं कोई दीवार गिर रही थी।
धीरे-धीरे उसने सिकंदर को अपने सीने से लगाया और कांपते हाथों से उसके मुँह से कपड़ा हटाया।
"मैं तुझे दूध नहीं पिलाऊंगी... नहीं पिलाऊंगी..."
लेकिन अगले ही पल उसकी ममता उसकी नफरत पर हावी हो गई।
अलिना ने रोते हुए अपने आँचल को ठीक किया और पहली बार सिकंदर को अपने दूध का एक बूंद पिलाया।
उसके आँसू उसके चेहरे से गिरते रहे, लेकिन उस छोटे से बच्चे ने जैसे अपनी माँ की नफरत को पी लिया हो।
सिकंदर ने हल्का-सा करवट बदला और धीरे-धीरे दूध पीने लगा। उसकी साँसे अब स्थिर हो रही थीं, जैसे वह अलिना के सीने से जुड़कर अपनी ज़िन्दगी की जंग जीत रहा हो।
"नफरत करती हूँ तुझसे... लेकिन फिर भी... तू मेरी ज़िन्दगी से जुड़ गया, सिकंदर..."
उस रात अलिना ने पहली बार एक माँ और एक औरत के बीच की जंग को महसूस किया।
अलिना ने सिकंदर को दूध पिलाया था, लेकिन उसका दिल अब भी भारी था। उसके अंदर जो नफरत पल रही थी, वह उस मासूम के स्पर्श से कांप उठी थी। क्या वो इस नफरत को ममता में बदलने देगी? या फिर ये बस एक पल की कमजोरी थी?
उसके आँसू लगातार गिर रहे थे, लेकिन उसने उन्हें पोंछने की कोशिश नहीं की। उसका दिल धड़क रहा था, पर दिमाग शोर मचा रहा था—
"ये वही बच्चा है, जो तेरी जिंदगी बर्बाद कर देगा।"
"ये वही बच्चा है, जो तुझे याद दिलाएगा कि तुझे कैसे धोखा मिला था।"
"ये तेरा दुश्मन है, अलिना।"
लेकिन उसके सीने से लगा सिकंदर एक मासूम जान था। उसके छोटे-छोटे हाथ उसकी उंगलियों को पकड़ने की कोशिश कर रहे थे, जैसे वो अपनी माँ को अपनी दुनिया बना लेना चाहता हो।
अलिना ने जल्दी से उसे नर्स को वापस सौंप दिया।
"इसे ले जाओ।" उसकी आवाज़ में ठंडापन था।
"लेकिन मैम, ये अभी बहुत कमजोर है। इसकी माँ को इसके पास रहना चाहिए।" नर्स ने हिम्मत करके कहा।
अलिना ने गहरी सांस ली और नर्स को घूरते हुए कहा—
"इसकी माँ मर चुकी है।"
"लेकिन मैम..."
"मैंने कहा, इसे ले जाओ।"
नर्स घबरा गई और जल्दी से सिकंदर को लेकर चली गई।
अलिना की अम्मी ने उसकी ओर देखा। उनके चेहरे पर नाराजगी, दुःख और दर्द था।
"तू क्यों इतनी पत्थर दिल हो गई है, अलिना?"
अलिना हँस पड़ी, लेकिन उसकी हँसी में दर्द था।
"पत्थर दिल? अम्मी, मेरी ज़िन्दगी में जब प्यार था, तब आपने मुझे घर से निकाल दिया था। जब मैं गिरी, तो कोई नहीं था उठाने वाला। जब मुझे सहारे की ज़रूरत थी, तब मैंने खुद को संभाला। और अब, जब मैं पत्थर बन गई हूँ, तो आप पूछ रही हैं क्यों?"
उसकी अम्मी की आँखें भीग गईं।
"बेटा, सिकंदर तेरा बेटा है। तू चाहे जितना नफरत कर ले, लेकिन एक दिन तुझे एहसास होगा कि ये बच्चा तेरी जान है..."
अलिना ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया।
लेकिन सच तो ये था कि उसके दिल में जो जंग चल रही थी, वो अभी खत्म नहीं हुई थी।
इसी बीच, सिकंदर को ICU में ले जाया गया। वो बहुत कमजोर था। डॉक्टर लगातार उसकी स्थिति को मॉनिटर कर रहे थे।
एक डॉक्टर ने धीरे से कहा—
"ये बच्चा जिंदा रहने की पूरी कोशिश कर रहा है। इसे शायद एहसास है कि इसे अपनी माँ के लिए जीना होगा।"
"लेकिन अगर इसे माँ का प्यार नहीं मिला, तो ये ज्यादा दिनों तक नहीं टिकेगा..." दूसरे डॉक्टर ने कहा।
छोटे-छोटे तारों से जुड़ा हुआ, ऑक्सीजन मास्क से सांसें लेते हुए सिकंदर इस दुनिया में अपनी जगह बना लेना चाहता था।
और शायद... किसी दिन वो अपनी माँ के पत्थर दिल को पिघला देगा।
आईसीयू के कमरे में सन्नाटा था। मॉनिटर पर सिकंदर की नाज़ुक धड़कनें धीमी होती जा रही थीं। डॉक्टरों ने उसे बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन एक माँ के दूध के बिना वो कब तक जिंदा रह सकता था?
"हम...हम उसे नहीं बचा पाए।" डॉक्टर ने गहरी सांस लेते हुए कहा।
अलिना के परिवार वालों ने एक-दूसरे को देखा। उनके चेहरों पर दुःख था, लेकिन उनके लिए अलिना ज़्यादा अज़ीज़ थी।
अलिना के चेहरे पर कुछ पल के लिए एक अजीब-सी शांति आई। उसके दिल में एक अजीब-सा सुकून उतरा। "ख़त्म हो गया सब।"
लेकिन अगले ही पल, जैसे ही उसने सिकंदर के छोटे-छोटे ठंडे हाथों को देखा, उसका दिल किसी ने मुट्ठी में जकड़ लिया।
"सिकंदर...?" उसकी आवाज़ में कंपन था।
उसने धीरे से सिकंदर के नन्हें जिस्म को अपनी गोद में उठाया। एक निःशब्द झटका उसकी आत्मा को लगा।
"चला गया तू...?" उसकी आवाज़ कांप रही थी, "जा मेरे शहज़ादे, जा... वहाँ अ232लाह के पास मेरा इंतजार करना। जब मैं आउंगी, फिर माँ तेरे पास हमेशा-हमेशा के लिए रहेगी..."
उसके आँसू सिकंदर की बंद पलकों पर गिर रहे थे। उसे लग रहा था जैसे सिकंदर उससे कुछ कह रहा हो।
"माँ... मैं तुझे इस दुनिया से बचाने आया था... मैंने अपनी पूरी जान लगा दी माँ... ताकि मैं तेरे ज़ख्मों पर मरहम लगाने के क़ाबिल बन सकूँ... पर तूने ही मेरे साथ धोखा किया..."
अलिना का पूरा शरीर सिहर उठा। उसकी सिसकियाँ पूरे कमरे में गूंज रही थीं।
"तेरा सिकंदर अब हार मानता है, माँ..."
अलिना की साँसें तेज़ हो गईं। "नहीं, नहीं... ये सच नहीं हो सकता!"
वो पागलों की तरह सिकंदर का चेहरा देखने लगी। अचानक, उसने महसूस किया कि सिकंदर की पलकों में हल्की-सी हरकत हुई।
"डॉक्टर!" वो चीख पड़ी, "ये ज़िंदा है! सिकंदर ज़िंदा है!"
कमरे में अफरातफरी मच गई। डॉक्टर तुरंत दौड़ पड़े।
"लेकिन ये कैसे हो सकता है?" एक नर्स ने हैरानी से कहा।
"ममता... माँ की ममता ने इसे वापस बुला लिया।" डॉक्टर ने गहरी सांस लेते हुए कहा।
अलिना की आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। अब वो हार मानने लगी थी— अपने ही बेटे से।
अब उसे समझ आ चुका था... नफ़रत और दर्द जितना भी गहरा क्यों न हो, ममता हमेशा उससे जीत जाती है।
डॉक्टरों की पूरी टीम दौड़ पड़ी। सिकंदर को ऑक्सीजन सपोर्ट पर डाला गया। उसकी नन्हीं-नन्हीं साँसें अभी भी लड़ रही थीं, जैसे किसी ने उसे वापस बुला लिया हो।
अलिना की आँखें सिकंदर के चेहरे पर टिकी थीं। "ये कैसे हो सकता है?" उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
डॉक्टर ने सिकंदर की जाँच की और चौंकते हुए कहा, "ये किसी चमत्कार से कम नहीं! बच्चे के शरीर में अभी भी जान बाकी है। जल्दी से इसे आईसीयू में शिफ्ट करो!"
अलिना वहीं ज़मीन पर गिर पड़ी। उसका पूरा शरीर काँप रहा था।
"नहीं! इसे मर जाना चाहिए था... ये ज़िंदा क्यों है?" उसकी आवाज़ कांप रही थी, "अ323लाह, तूने इसे वापस क्यों भेज दिया?"
लेकिन उसकी आँखों से गिरते आँसू कुछ और ही बयां कर रहे थे।
"बेटा... तूने इतनी कोशिश की जीने की?"
"तेरी माँ ही तेरा क़त्ल करने चली थी और तू फिर भी इस दुनिया में आना चाहता था?"
"क्यों? आखिर क्यों सिकंदर?"
उसके अंदर एक अजीब-सी जंग छिड़ चुकी थी।
उसने सिकंदर को अपनी गोद में उठाया। उसकी नन्हीं उंगलियाँ अब भी ठंडी थीं।
"जा मेरे शहज़ादे... अगर तू जिंदा रहना चाहता है तो जी ले... मैं तुझे अब नहीं रोकूंगी।"
उसी वक़्त सिकंदर की हल्की-हल्की साँसे चलने लगीं। नर्सें उसे आईसीयू में लेकर भागीं।
"अलिना, अब भी वक़्त है!" उसकी अम्मी ने कहा, "तू माँ बन जा। सिकंदर तेरा है!"
लेकिन अलिना अभी भी लड़ रही थी— अपने अंदर की नफ़रत से, अपनी ही ममता से।
अब सवाल ये था— क्या वो सच में सिकंदर को अपनाने के लिए तैयार थी?