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Incest Mukkader ka sikander

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Premkumar65

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4 साल बीत चुके थे... अलीना अब 22 साल की हो गई थी और सिकंदर 4 साल का... अलीना अब समझ गई थी की उसे एक बच्चे को पालना है... जो उसके बिना सादी किये उकसे गोद मे आ गया है.. समाज के तनो से बचने का एक ही तारीका है खुद को कामयाब बनाओ.. अलीना इस के लिए जी तोर मेहनत करने लगी.. और कुछ ही सालो मे वो एक नामी बुल्डर बन चुकी थी...उसके भाई और बाप के सपोर्ट ने उसे यहाँ तक पहुंचाया था...

अलिना के ऑफिस में फोन की घंटी बजी। "हाँ, मैं अभी आ रही हूँ।" उसने गुस्से से कहा और फोन पटक दिया।

वो जल्दी से घर पहुँची, देखा कि सिकंदर अपने कपड़े पूरे पेंट से खराब कर चुका था। रंग-बिरंगे हाथ, चेहरे पर भी पेंट के निशान। पास ही दीवार पर कुछ उल्टा-सीधा बना रखा था।

अलिना की आँखों में गुस्सा उमड़ पड़ा। "सिकंदर!" उसकी तेज़ आवाज़ से पूरा घर हिल गया।

सिकंदर डर कर कोने में दुबक गया। "मम्मा, मैंने कुछ नहीं किया…"

अलिना गुस्से में आगे बढ़ी, "ये क्या किया तूने? घर को कोई पेंट करता है क्या?"

सिकंदर की आँखों में आँसू आ गए, "मम्मा, मैंने आपके लिए हार्ट बनाया था... आप कहती हो ना कि मैं आपका शहज़ादा हूँ। तो मैंने लिखा था 'माई मम्मा, माई क्वीन'..."

अलिना ठिठक गई। उसने दीवार पर नजर डाली— टेढ़ा-मेढ़ा दिल बना था, जिस पर छोटे-छोटे अक्षरों में "माई मम्मा, माई क्वीन" लिखा था।

एक पल के लिए उसका दिल पिघल गया, लेकिन अगले ही पल वो खुद को संभालते हुए बोली, "ये सब बेकार की बातें मत कर। तू दिन-ब-दिन सर पर चढ़ता जा रहा है। जा, मुँह धो और ये सब साफ कर!"

सिकंदर मायूस हो गया। उसने धीरे से कहा, "मम्मा, आप मुझसे प्यार नहीं करतीं?"

अलिना ने कोई जवाब नहीं दिया। वो गुस्से में थी, लेकिन उसके दिल में कहीं कुछ टूट रहा था।

रात में जब सब सो चुके थे, सिकंदर अपने खिलौनों से खेल रहा था। तभी अलिना आई और उसे गोद में उठा लिया।

"मम्मा को अकेला छोड़ देगा तू?"

सिकंदर ने सिर हिलाया, "नहीं मम्मा, मैं आपको कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा।"

अलिना ने उसे सीने से लगा लिया। "पता नहीं तुझसे इतना गुस्सा क्यों आता है मुझे..."

सिकंदर ने अपनी नन्हीं हथेलियाँ उसकी गालों पर रखीं, "मम्मा, जब आप गुस्सा होती हो, तब भी आप मुझसे प्यार करती हो ना?"

अलिना की आँखों में नमी आ गई, लेकिन उसने जल्दी से उसे छुपा लिया।

"पागल है तू। सो जा अब!"

सिकंदर मुस्कुराया, "मम्मा, जब मैं बड़ा हो जाऊँगा, तब भी आप मुझे ऐसे ही गोद में लोगी?"

अलिना ने गहरी साँस ली, "अगर तू मुझसे दूर गया, तो तुझे ढूंढकर वापस लाऊँगी।"

सिकंदर हँसते हुए उसकी गोद में समा गया, और अलिना को एहसास हुआ कि जितनी नफ़रत वो सिकंदर से जताने की कोशिश करती थी, उतनी ही गहराई से वो उसे प्यार भी करती थी।

लेकिन ये रिश्ता अभी भी अधूरा था…




अलिना का रुख़ सिकंदर के लिए अजीब था। एक पल में वो उसे दूर कर देती, और दूसरे ही पल उसे सीने से लगा लेती।

एक दिन सिकंदर खेलने के दौरान गिर गया और उसके घुटने छिल गए। जैसे ही वो रोते हुए अलिना के पास पहुँचा, उसने गुस्से में कहा—

"तू गिर गया? तो क्या मैं तुझे उठाऊँ? हर वक़्त कोई तेरी देखभाल नहीं करेगा, समझा?"

सिकंदर की आँखों में आँसू थे। उसने धीरे से कहा—

"लेकिन मम्मा, जब आप रोती हो, तब मैं हमेशा आपके पास आता हूँ।"

अलिना ठिठक गई।

रात को जब सब सो चुके थे, तो उसने धीरे से सिकंदर के पास जाकर देखा। उसका छोटा सा हाथ अब भी तकिए पर पड़ा था, जैसे वो सोते हुए भी किसी को पकड़ने की कोशिश कर रहा हो।

अलिना के दिल में कुछ चुभा। उसने उसके छोटे से घुटने पर मरहम लगाया और बुदबुदाई—

"पता नहीं तुझसे इतना प्यार भी क्यों है…"

तभी सिकंदर करवट बदलकर उसकी गोद में समा गया। वो आधी नींद में बुदबुदाया—

"मम्मा, मैं अच्छा बच्चा बनूँगा… बस आप मुझसे प्यार करना बंद मत करना…"

अलिना की आँखों में आँसू आ गए। उसने उसकी पीठ सहलाई और खुद से कहा—

"सिकंदर, तू नहीं जानता… मुझे खुद नहीं पता कि तुझे प्यार करूँ या तुझसे दूर भागूँ…"

पर एक बात तो साफ थी— वो सिकंदर के बिना जी नहीं सकती थी।

ऐसे ही दिन गुजरता जा रहा था.. एक दिन

अलिना अपने कमरे में तकिए में मुँह छुपाए रो रही थी। आज उसके हाथ से एक बहुत बड़ा टेंडर निकल गया था। उसके अब्बू-अम्मी पहले ही गुस्से में थे, और अब भाई भी नाराज़ था। सबकी बातें उसे अंदर तक चुभ रही थीं।

तभी दरवाज़े के पास हल्की हलचल हुई। छोटे-छोटे कदमों की आवाज़ आई और एक नन्हा सा शरीर अलिना के बिस्तर पर चढ़ आया।

सिकंदर (मासूमियत से) – "मम्मा, तुम रो रही हो?"

अलिना (आँसू पोंछते हुए, गुस्से में) – "नहीं, धूल चली गई आँख में!"

सिकंदर (हाथ जोड़कर) – "अल्#लाह जी से बोलूँ? वो पंखा बंद कर देंगे!"

अलिना (झुंझलाकर) – "पंखे से धूल नहीं आई, मेरे नसीब में धूल थी!"

सिकंदर (सोचते हुए) – "ओह! तो अब्बू-अम्मी ने तुम्हें भी ज़मीन पर घुटनों के बल चलाया क्या?"

अलिना ने आँसू पोंछते हुए उसे घूरा। सिकंदर झट से उसके आँसू देखकर खुद भी मुँह फुलाकर रोने लगा।

अलिना (चौंककर) – "अब तुझे क्या हुआ?"

सिकंदर (सुबकते हुए) – "तुम रो रही हो ना? तो मुझे भी रोना चाहिए! टीम वर्क मम्मा!"

उसने सिकंदर को गोद में खींचकर कसकर गले लगा लिया।

अलिना (हल्की मुस्कान के साथ) – "पगले, रोने से कुछ नहीं होता।"

सिकंदर (नाक सुड़कते हुए) – "अच्छा? फिर तुम क्यों रो रही थी?"

अलिना को जवाब नहीं सूझा। उसने धीरे से सिकंदर के बालों में उंगलियाँ फेरीं और कहा—

"क्योंकि कभी-कभी, जब दिल बहुत भारी हो जाता है, तो उसे हल्का करने के लिए रोना पड़ता है।"

सिकंदर (मासूमियत से) – "तो फिर तुम हँस क्यों नहीं देती? हँसने से भी दिल हल्का हो जाता है!"

अलिना ने पहली बार दिल से हँसी। इस नन्हे से बच्चे ने उससे ज़्यादा ज़िंदगी समझ ली थी। उसने सिकंदर के गाल खींचते हुए कहा—

"अगर तू मेरे साथ है ना, तो मुझे रोने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।"

सिकंदर (चमकती आँखों से) – "तो फिर हमेशा मेरे साथ रहो ना, मम्मा!"

रात के उस अंधेरे में, जब सारी दुनिया सो रही थी, अलिना और सिकंदर की दुनिया बस एक-दूसरे के आसपास सिमट गई थी।

अलिना ने सिकंदर को अपने सीने से लगाया, उसकी नन्हीं उंगलियाँ उसके गालों पर फिर रही थीं, जैसे वो उसकी उदासी को पोंछ देना चाहता हो।

सिकंदर (मासूमियत से) – "मम्मा, क्या तुम हमेशा ऐसे ही रोती हो जब कोई तुम्हें डाँटता है?"

अलिना (हल्की मुस्कान के साथ) – "नहीं, बस कभी-कभी, जब दिल बहुत दुखी होता है।"

सिकंदर (सोचते हुए) – "फिर जब मैं बड़ा हो जाऊँगा और कोई मुझे डाँटेगा, तो मैं भी रोऊँगा?"

अलिना (चौंककर) – "नहीं! मेरा बेटा कभी नहीं रोएगा!"

सिकंदर (आँखें बड़ी करते हुए) – "तो फिर तुम क्यों रो रही थी?"

अलिना को कोई जवाब नहीं सूझा। वह सिर्फ उसे देखती रही। यह चार साल का बच्चा हर बार उसे उसकी ही बातों में फँसा देता था।

सिकंदर (शरारती अंदाज़ में) – "मम्मा, तुम बहुत गड़बड़ हो!"

अलिना (भौंहें उठाकर) – "अच्छा? और तू क्या है?"

सिकंदर (गर्व से) – "मैं सुपरहीरो हूँ! जब तुम रोती हो, तो मैं तुम्हें हँसाने के लिए आता हूँ!"





अलिना ने सिकंदर को कसकर गले लगा लिया।

अलिना (मुस्कुराते हुए) – "तू सच में मेरी सबसे बड़ी ताकत है, सिकंदर!"

सिकंदर (छाती चौड़ी करके) – "और सबसे बड़ा सर दर्द भी!"

अलिना हँसते-हँसते बिस्तर पर गिर पड़ी और सिकंदर उसके ऊपर चढ़कर खिलखिलाने लगा। उस रात, उसकी दुनिया के सारे दर्द सिकंदर की हंसी में घुल गए थे।

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सर्दियों की वो शाम, जब अलीना अपने नए बिज़नेस प्रोजेक्ट के सिलसिले में होटल के आलीशान कॉन्फ्रेंस हॉल में दाखिल हुई, तो वहाँ की रॉयल शानो-शौकत ने उसे कुछ सेकंड के लिए रोक दिया।

उसकी मुलाकात आज एक बहुत बड़े इन्वेस्टर से होने वाली थी— नवाब शेरज़ादा मीर हसन।

हॉल के एक कोने में, सिल्क के शेरवानी और काली पगड़ी में बैठे नवाब मीर हसन की शख्सियत किसी शेर से कम नहीं थी। गहरी आँखें, घनी दाढ़ी और एक ऐसा रुतबा कि पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया था। जैसे ही अलीना उनके करीब पहुँची, उन्होंने नज़र उठाकर उसकी ओर देखा।

मीर हसन (गहरी आवाज़ में) – "तो आप हैं मिस अलीना शाह?"

अलीना (प्रोफेशनल अंदाज़ में) – "जी, और आप नवाब मीर हसन। बहुत सुना है आपके बारे में।"

मीर हसन (हल्की मुस्कान के साथ) – "और मैंने भी। आप जिस तेज़ी से बिज़नेस की दुनिया में नाम कमा रही हैं, वह काबिल-ए-तारीफ है। पर आप जितनी खूबसूरत हैं, उससे कहीं ज़्यादा खतरनाक भी लगती हैं।"

अलीना (हैरान होते हुए) – "खतरनाक?"

मीर हसन (हल्का हँसते हुए) – "हाँ, क्योंकि जिस औरत में इतनी हिम्मत हो कि वो अकेले ही अपनी दुनिया बना सके, वो किसी तूफान से कम नहीं हो सकती।"

अलीना उसकी बातों से ज़रा असहज हो गई, पर उसने खुद को संयम में रखा।

अलीना (मुस्कान दबाकर) – "मैं यहाँ बिज़नेस की बात करने आई हूँ, नवाब साहब। तारीफें सुनने की आदत नहीं है मुझे।"

मीर हसन (गंभीरता से) – "और मैं सिर्फ़ उन्हीं चीज़ों की तारीफ करता हूँ, जो तारीफ के लायक होती हैं।"

दोनों की नज़रें टकराईं, जैसे एक शेरनी और एक शेर आमने-सामने खड़े हों। हॉल में मौजूद सभी लोग इस टकराव को महसूस कर सकते थे।

मीर हसन (धीरे से झुककर) – "ख़ैर, बिज़नेस की बात करते हैं। मुझे आपका प्रोजेक्ट पसंद आया, लेकिन मैं किसी ऐसे इंसान पर भरोसा नहीं करता, जिसे मैं ठीक से जानता न हूँ।"

अलीना (मजबूत लहजे में) – "तो फिर कैसे भरोसा करेंगे?"

मीर हसन (हल्की मुस्कान के साथ) – "जब आप मेरे साथ एक डिनर करेंगी और मुझे अपनी कहानी सुनाएंगी।"

अलीना कुछ देर तक सोचती रही। यह आदमी न सिर्फ़ रुतबे वाला था, बल्कि उसकी शख्सियत भी किसी पहेली से कम नहीं थी। उसे पहली बार किसी से इस तरह के सवालों का सामना करना पड़ रहा था।

अलीना (गहरी साँस लेते हुए) – "अगर मेरे काम के लिए ज़रूरी है, तो ठीक है।"

मीर हसन (आँखों में चमक के साथ) – "तो फिर यह एक डील समझिए।"

घर पहुंचते ही उसकी आँखे सिकंदर को ढूंढने लगी सिकंदर आम तोर पर उसे बाहर हीं खरा मिलता था.. वो अलीना के आने का इंतज़ार करता रहता था... पर आज सिकंदर को ना देख कर वो चिढ़चड़ी होने लगी....

अलीना( भोये चढ़ाते हुवे )- सिकंदर कहाँ है...

नौकरानी- बीबी साहिबा... छोटे साहब छत पर पतंग उड़ा रहे है....

अलीना का चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था। जैसे ही उसने सुना कि सिकंदर छत पर पतंग उड़ा रहा है, उसका पारा और चढ़ गया। उसे गुस्सा इस बात पर नहीं था कि वो अब तक खेल रहा था, बल्कि इस बात पर था कि वो घर आते ही सबसे पहले सिकंदर को क्यों नहीं देख पाई!

तेज़ कदमों से सीढ़ियाँ चढ़ते हुए उसने छत का दरवाज़ा ज़ोर से खोला। सिकंदर, जो अपनी पतंग की डोर को ऊँचाई तक ले जाने में मग्न था, अचानक झटके से पलटा। उसकी आँखें चमक रही थीं, बाल बिखरे हुए थे और हाथ में पतंग की डोर थी।

अलीना (गुस्से से चिल्लाते हुए) – “सिकंदर! तू यहाँ क्या कर रहा है? रात के इस पहर पतंग उड़ा रहा है?”

सिकंदर समझ गया कि उसकी शामत आ चुकी है। उसने धीरे से पीछे हटने की कोशिश की, मगर तब तक अलीना उसके करीब पहुँच चुकी थी। उसने वहीं रखी पतली छड़ी उठाई और सिकंदर के हाथ पर मार दी।

सिकंदर (रोते हुए भागता हुआ) – "अम्मी मत मारो! अम्मी बस एक और पतंग उड़ानी थी!"

अलीना (गुस्से से डाँटते हुए) – "तुझे समझ नहीं आता? जब मैं घर आती हूँ, तो सबसे पहले तेरा चेहरा देखना चाहती हूँ! और तू यहाँ पतंगों में मस्त है! तुझे मेरी ज़रा भी परवाह नहीं है?"

सिकंदर आँखों में आँसू लिए छत के दूसरे कोने की तरफ भागा।

सिकंदर (हकलाते हुए) – "मम्मी, मैंने सोचा था आप बिज़नेस की मीटिंग से थक गई होंगी... इसलिए मैंने आपको डिस्टर्ब नहीं किया।"

अलीना (गुस्से में, छड़ी पटकते हुए) – "बहाने मत बना! अगर मैं कह रही हूँ कि तुझे सबसे पहले मेरे पास आना चाहिए, तो इसका मतलब यही है!"

सिकंदर और तेज़ रोने लगा।

सिकंदर (गिड़गिड़ाते हुए) – "मम्मी, बस एक पतंग! एक आखिरी पतंग काटनी थी!"

अलीना गुस्से से भरी हुई थी, लेकिन जैसे ही उसने सिकंदर के चेहरे को देखा, कुछ अजीब सा महसूस हुआ। उसकी छोटी-छोटी आँखों में आँसू थे, होंठ काँप रहे थे, और वो डर से सहमा हुआ था। अलीना का दिल अचानक पिघलने लगा।

उसका गुस्सा एक पल में हवा हो गया और उसके भीतर एक अलग ही एहसास दौड़ पड़ा—ये कैसा पागलपन था उसका? पहले गुस्सा, फिर प्यार... फिर गुस्सा, फिर प्यार...

उसने छड़ी दूर फेंकी और सिकंदर के पास आकर उसे अपनी बाहों में भींच लिया।

अलीना (धीमे स्वर में) – "तू जानता है ना, मैं तुझसे बहुत प्यार करती हूँ?"

सिकंदर (सिसकते हुए) – "लेकिन आप मुझे बहुत मारती भी हो मम्मी..."

अलीना हल्का सा हँसी और उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा।

अलीना (मुस्कराते हुए) – "मार इसलिए खाता है क्योंकि तू बहुत ज़िद्दी है... और तुझे पता है, तेरा मेरी नज़रों से दूर होना मुझे पसंद नहीं।"

सिकंदर अपनी माँ के सीने में मुँह छुपा लेता है और मासूमियत से कहता है –

सिकंदर (धीमे से) – "मम्मी, मैं फिर भी पतंग उड़ाऊँगा!"

अलीना फिर गुस्से से उसे देखती है, लेकिन अगले ही पल उसका गाल पकड़कर हल्के से खींच देती है।

अलीना (हँसते हुए) – "अगर फिर उड़ाई, तो छत से नीचे फेंक दूँगी तुझे!"

सिकंदर उसकी बाहों में छुपकर हँसने लगता है, और अलीना खुद भी समझ नहीं पाती कि ये गुस्सा है या बेइंतेहा मोहब्बत...

खेर डिनर की रात आ गई....



रात का माहौल बेहद शानदार था। आलीशान रेस्तरां के चारों ओर मोमबत्तियों की हल्की रोशनी थी, और बैकग्राउंड में धीमी-धीमी सुरमई धुन बज रही थी। अलीना एक खूबसूरत काले रंग की गाउन में थी, जिसने उसकी खूबसूरती को और भी निखार दिया था। वहीं, हसन मिर्ज़ा अपनी रौबदार शख्सियत के साथ बैठे थे—एक हैंडसम, चार्मिंग नवाब, जिनकी आँखों में गहरी कहानियाँ छुपी थीं।

डिनर के दौरान, हसन मिर्ज़ा ने अचानक मुस्कराते हुए कहा—

हसन (हल्की मुस्कान के साथ) – "अलीना, इतनी खूबसूरत रात में सिर्फ बातें करना तो नाइंसाफी होगी। मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे साथ एक डांस करो।"

अलीना (चौंककर, हल्का हँसते हुए) – "मैं... मैं डांस नहीं करती।"

हसन (आँखों में शरारत के साथ) – "ओह, यह तो बड़ा अन्याय हुआ! इतनी हसीन औरत, और डांस से डरती है?"

अलीना (मुस्कराते हुए) – "डरती नहीं, बस...आदत नहीं है।"

हसन (हल्के से झुकते हुए, हाथ आगे बढ़ाते हुए) – "तो फिर आदत डालनी पड़ेगी। मैं नवाब हूँ, हुक्म देना मेरा काम है। और आज मेरा हुक्म है—डांस!"

अलीना ने कुछ पल उसे देखा, फिर हल्की मुस्कान के साथ उसका हाथ थाम लिया। हसन उसे धीरे-धीरे डांस फ्लोर की ओर ले गया।

धीमी रोशनी में, संगीत की मधुर धुन पर दोनों थिरकने लगे।

हसन (उसकी कमर पर हाथ रखते हुए, धीमे स्वर में) – "तुम्हें शायद पता नहीं, लेकिन तुम्हारी आँखें किसी को भी मदहोश करने के लिए काफी हैं।"

अलीना (हल्का हँसते हुए) – "ओह! तो आप flirting भी कर सकते हैं?"

हसन (गहरी मुस्कान के साथ) – "नवाब की जबान से निकले शब्द फ़्लर्ट नहीं, शायरी कहलाते हैं।"

अलीना हल्का सा मुस्करा दी, लेकिन तभी हसन की आँखों में एक गहरी उदासी झलक पड़ी।

अलीना (नरम आवाज़ में) – "क्या हुआ?"

हसन (थोड़ा रुककर, फिर धीमी आवाज़ में) – "आज से कुछ साल पहले, इसी तरह मैंने अपनी बीवी का हाथ थामा था। वह मेरी जान थी…लेकिन अब वो इस दुनिया में नहीं रही।"

अलीना (हैरानी से) – "ओह... मुझे अफ़सोस है।"

हसन (हल्की मुस्कान के साथ, लेकिन दर्द छुपाते हुए) – "ज़िंदगी किसी के बिना नहीं रुकती, लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो भुलाए नहीं जा सकते।"

अलीना (धीमे स्वर में) – "आप उससे बहुत प्यार करते थे, है ना?"

हसन (गहरी नज़रें अलीना पर डालते हुए) – "हाँ, शायद उतना ही, जितना कोई अपनी सांसों से करता है। लेकिन जानते हो अलीना, जब कोई बिछड़ जाता है, तो उसकी यादें एक साए की तरह हमारे साथ रहती हैं...और कभी-कभी वो साया किसी और की मुस्कान में भी दिखने लगता है।"

अलीना उसकी गहरी नज़रों को पढ़ने की कोशिश करने लगी, लेकिन वह तुरंत अपनी नजरें झुका गई।

अलीना (हल्के से हँसते हुए, माहौल हल्का करते हुए) – "अगर आपकी बीवी ने आपको इतना रोमांटिक देखा होता, तो शायद वो भी आपसे और ज्यादा प्यार करने लगती।"

हसन (मुस्कुराते हुए, धीरे से उसकी उंगलियों को छूते हुए) – "शायद... लेकिन अगर वो यहाँ होती, तो मुझे तुम्हारे साथ डांस करने की इजाज़त कभी न देती।"

अलीना हल्के से हँस दी, लेकिन उसके दिल में कहीं न कहीं हसन के लिए सहानुभूति जाग उठी थी। उसे पहली बार लगा कि इस नवाब की रौबदार शख्सियत के पीछे एक टूटा हुआ दिल भी छुपा है…



धीरे-धीरे, अलीना और हसन की नज़दीकियाँ बढ़ने लगीं। अक्सर दोनों को बड़े बिज़नेस इवेंट्स में साथ देखा जाता। कभी किसी रेस्तरां में, तो कभी किसी आलीशान महल में होने वाली पार्टियों में—हर जगह उनके रिश्ते के चर्चे होने लगे थे।

सुबह की ताज़ा अख़बार में एक हेडलाइन छपी:

"नवाब हसन मिर्ज़ा और बिज़नेस टायकून अलीना—क्या ये रिश्ता महज़ बिज़नेस पार्टनरशिप है या कुछ और?"

अलीना ने अख़बार की ये लाइनें पढ़कर हल्की मुस्कान दी। उसे महसूस होने लगा था कि उसकी ज़िंदगी में फिर से ख़ुशियाँ दस्तक देने लगी हैं।

हसन का न्योता

एक दिन हसन ने अलीना को अपने महल में आमंत्रित किया।

हसन (मुस्कुराते हुए) – "आज तुम्हें किसी ख़ास शख़्स से मिलवाना है।"

अलीना (हैरानी से) – "कौन?"

हसन (हल्के से मुस्कराकर) – "मेरे बेटे से।"

अलीना (थोड़ा चौंकते हुए) – "तुम्हारा बेटा?"

हसन (गर्व से) – "हाँ, शाहबाज़ मिर्ज़ा।"



महल में दाखिल होते ही, अलीना की नज़र शाहबाज़ मिर्ज़ा पर पड़ी—एक 22 साल का नौजवान, लंबा, बेहद रौबदार और आकर्षक। उसके चेहरे पर वही नवाबी ठसक थी, जो उसके पिता में थी।

शाहबाज़ (हसन से, हल्के मज़ाकिया लहज़े में) – "अब्बा, ये कौन हैं जिनके लिए आप इतने बेचैन थे?"

हसन (मुस्कुराते हुए) – "अलीना, मेरी बहुत खास दोस्त।"

शाहबाज़ (अलीना को देखता हुआ, हल्के से मुस्कुराकर) – "तो आप ही हैं, जिनकी तस्वीरें अब्बू के साथ हर अख़बार में छप रही हैं?"

अलीना उसकी बेबाकी पर हल्का सा हंस पड़ी।

अलीना (शरारत से) – "और तुम ही वो बेटे हो, जिसकी तारीफ हसन मिर्ज़ा करते नहीं थकते?"

शाहबाज़ (हंसते हुए) – "लगता है अब्बा ने आपको मेरी अच्छाइयाँ ही बताई हैं, बुराइयाँ नहीं।"

हसन (गंभीर लहज़े में) – "क्योंकि बुराइयाँ तुम्हारे अंदर हैं ही नहीं, शाहबाज़!"

शाहबाज़ ने हल्की मुस्कान दी और फिर अलीना से बोला—

शाहबाज़ (मज़ाकिया अंदाज़ में) – "वैसे, अगर आप अब्बू की जिंदगी में आ रही हैं, तो एक शर्त है।"

अलीना (हैरानी से) – "क्या?"

शाहबाज़ (हंसते हुए) – "आपको मुझसे भी दोस्ती करनी होगी!"

अलीना हंस पड़ी, और हसन मिर्ज़ा अपने बेटे को गर्व से देखने लगे।



उस शाम, हसन मिर्ज़ा ने अलीना को अपने खूबसूरत बागीचे में ले जाकर कहा—

हसन (गंभीर होते हुए) – "अलीना, मैं जानता हूँ कि तुमने बहुत कुछ सहा है…लेकिन क्या अब अपनी ज़िंदगी को एक नया मौका दोगी?"

अलीना (धीमे स्वर में) – "मौका…कैसा मौका?"

हसन (गहरी नज़रों से देखते हुए) – "ख़ुश रहने का। प्यार करने का। फिर से जीने का।"

अलीना ने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन पहली बार उसे एहसास हुआ कि ज़िंदगी अब उसे दूसरा मौका दे रही है…
Nice update.
 

Hamantstar666

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भाई स्टोरी का रिव्युव दो... जल्दी जल्दी मे अपडेट तब दूंगा जब आप को स्टोरी पसंद आएगी हुए..
सो पलज़्ज़ज़ दो लाइन कम से कम जरूर लिखना...इस से मुझे मोटिवेशन मिलती है स्टोरी को लिखने की


---



रात के तक़रीबन दस बज चुके हैं… मोहल्ले के बीचों-बीच धरना जारी है… लोग जोश में नारे लगा रहे हैं…

“हम अपना हक़ लेकर रहेंगे!”
“बिल्डर-माफिया मुर्दाबाद!”

लोगों की भीड़ को जोया लीड कर रही है — पर इस उबाल और जोश से दूर…

पर सिकंदर के कमरे मे...अंधेरे की चुप्पी में, सिकंदर अकेला लेटा था।

कमरे में उजाला सिर्फ एक पुराना सा रेडियो कर रहा है… और उस रेडियो पर एक उदास, रूह तक चीर देने वाला गाना चल रहा है…

“याद... याद... याद...
बस याद रह जाती हैं…” (गाने की आवाज़ धीमे धीमे कमरे में भरती जाती है…)

सिकंदर की आँखें छत पर जमी हैं… लेकिन उनमें कोई रंग, कोई रौशनी नहीं बची…

आज उसका जन्मदिन है।

पर कोई मोमबत्ती नहीं, कोई केक नहीं, कोई 'हैप्पी बर्थडे बेटा' नहीं...

आज वो दिन नहीं जिस दिन वो पैदा हुआ था…
आज वो दिन है जब वो पहली बार उसने जाना था बेहोसी क्या होती है... कैसा लगता है जब कोई भूख प्यास से बेहोस होकर गिर परता है... कैसा लगता है जब किसी के टांगे कापने लगती है कमज़ोरी के मारे.. कैसा लगता है जब कोई भूखे पेट... बोरियां उठाता है... कैसा लगता है... अपनी माँ से दुथकारे जाने पर...


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फ़्लैश बैक


सुबह का वक्त…
अलीना, गुस्से में पागल होकर, सीढ़ियों से नीचे उतरती है।

अलीना (कड़क आवाज़ में):
"आज तुझे सज़ा मिलेगी, हरामजादे अब तू मेरे अलमारी से पैसे चुराने लगा... दिन व दिन तेरे करतूत बढ़ते जा रहे है.... कल ही साहबज़ ने मुझे बोला था... तू स्कूल मे लड़ाईयां करने लगा है और अब चोरी.... वो तो सुकर है सहबाज ने तुझे पैसे चुराते देख लिया नहीं तो मे बेचारे उन नौकरो पर इलज़ाम लगाती...

सिकंदर अपने हारा हुवा चेहरा लिए अपनी माँ के आंखों मे देख रहा था.... वो सायद उन आंखों मे कुछ ढूंढ़ रहा था.. पर वो उसे मिल नहीं रहा था... उसने अलीना से कुछ नहीं कहा.... कुछ कहने का कोई फ़ायदा नहीं था... अब अलीना ने उसके दिल का हाल जाना छोड़ दिया था.. अब अलीना ने उसे पराया कर दिया था

आज न तुझे खाना मिलेगा, न पानी… और पूरे दिन नौकरों के साथ बर्तन मांजेगा और जो काम नौकर करते है वो तुझे करना होगा.. यही तेरी सजा है... अलीना अपने तरफ से सिकंदर को सुधार रही थी.. पर उस बेवकूफ औरत क्या पता था की सहबाज कैसे उस से खेल रहा है.... उसके सिकंदर को उस से दूर करता जा रहा है...




---



---



सिकंदर की आंखें लाल हैं, जिस्म पर धूल है, हाथों में छाले हैं... और दिल में एक जला हुआ कोना।

सुबह से शाम हो चुकी है… लेकिन उसके पेट में एक दाना तक नहीं गया।
प्यास से होठ सूख चुके हैं, सांसों में थकावट की भारी चुप्पी है।

हवेली के बड़े से किचन में आज भी उसकी जगह नहीं थी…
उसकी थाली आज भी खाली थी…

नौकर लोग, जिन्हें वो पहले नाम से बुलाता था… आज उसी को हुक्म सुना रहे थे।



सिकंदर, बिना कोई जवाब दिए, बस सर झुकाकर काम करता रहा…
जैसे उसे किसी सवाल का हक़ ही नहीं…

उसका गला सूख रहा था… लेकिन कोई एक ग्लास पानी तक नहीं पूछता…

वो बर्तन मांजते-मांजते, किसी कोने में जाकर कभी थोड़ी देर आँखें मूँद लेता… फिर उठ कर दोबारा लग जाता…
उसकी कमर झुकती जा रही थी, कंधे जवाब दे रहे थे, पर किसी ने पूछा तक नहीं –
"तू ठीक है?"

कभी वो ही सिकंदर था जो हवेली के हर काम में सबसे आगे होता था…
पर आज किसी के लिए वो बस एक सज़ायाफ्ता नौकर था।


---



एक शानदार, बड़ी-बड़ी शीशे की खिड़कियों वाला ऑफिस…
जहाँ अलीना एक कॉन्फ्रेंस कॉल में बिज़ी है।

अलीना (प्रोफेशनल अंदाज़ में):
"Yes, Mr. Qureshi. Finalize the deal. I don’t want any more delays."

मीटिंग खत्म होती है… वो लैपटॉप बंद करती है…
एक गहरी सांस लेती है और अपनी कुर्सी से उठकर स्ट्रेच करती है।




उसका ध्यान पास टंगे कैलेंडर पर चला जाता है…

और जैसे ही उसकी निगाह उस तारीख पर जाती है —

"10 अप्रैल" —



अलीना (धीरे से फुसफुसाती है):
"10 अप्रैल...? आज... आज सिकंदर का जन्मदिन है…"

वो घरी मे समय देकती है तो 5 बज रहे थे... वो जल्दी से अपना पर्स उठाती है और ऑफिस से बाहर निकलती है रास्ते से वो एक केक और कुछ बल्लोंन और एक प्यारा सा खेलना.. लेती है.. सायद ये सिकंदर का गिफ्ट था.. अलीना अब तक नहीं समझीथी की उसके लाडले को खेलोना नहीं उकसा प्यार चाहिए...





_------------------





---



सिकंदर की हालत अब काबू से बाहर जा चुकी थी।
पेट खाली… होंठ सूखे… जिस्म काँपता हुआ… आँखों में गहराती अंधेरी थकावट.,.. उसके पैर काँप रहे थे.. क्यों की घुटनो मे जान नहीं बची थी...

हर सांस जैसे एक बोझ बन चुकी थी…
हर कदम जैसे पत्थर का हो गया था…

वो किसी तरह दीवार पकड़ कर अपने कमरे के दरवाज़े तक पहुँचता है…
दरवाज़ा भी ठीक से नहीं खोल पाता… और बेसुध होकर अंदर गिर जाता है।

ठक्..!
एक भारी आवाज़ होती है —
उसका जिस्म फर्श से टकराता है। पर मासूम के पास कोई नहीं था... जो उसे सहारा दे सके.. सायद आज उस खु*दा के आँखों मे भी आंसू आये होंगे... सायद इस लिए वो सिकंदर को अपने पास बुला लेना चाहता था..

सिकंदर अब बेहोश था … एकदम चुप… बर्फ की तरह ठंडा…

उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था, होंठ नीले, हाथ-पैर थमे हुए से…

कपड़ों में मिट्टी लगी थी, चेहरे पर थकान की दरारें थे...और दिल में अधूरी उम्मीद की खामोशी।


---

दूसरी तरफ – हवेली का बड़ा दरवाज़ा खुलता है…

अलीना, एक सजाया हुआ केक हाथ में लिए, अपने पूरे परिवार के साथ अंदर दाखिल होती है…

साथ में उसका भाई, भाभी, अम्मी और अब्बू भी हैं।
सबके चेहरों पर मुस्कान है… शायद आज वो ‘एक सरप्राइज़’ देने आए हैं…

अलीना (हल्की मुस्कराहट के साथ):
"आज उसे हँसते हुए देखूंगी..... अलीना बहुत ख़ुश थी...

जैसे ही सब सिकंदर के कमरे के पास पहुंचते हैं…

दरवाज़ा अधखुला पड़ा है… और अंदर घुप्प अंधेरा।

अलीना धीरे से अंदर झांकती है…

और अगले ही पल — उसकी चीख हवेली में गूंज उठती है…

अलीना (दहशत में):
"सिकंदर…!!!"

उसके हाथ से केक गिर जाता है…
फर्श पर "Happy Birthday लिखे शब्द भी टूट जाते हैं… जैसे उनकी तरह रिश्तों का वहम भी टूट जाता है…

अलीना दौड़कर उसके पास आती है… उसका चेहरा अपनी गोद में रख लेती है…

अलीना (थरथराती हुई):
"उठ ना … उठ … देख … अम्मी आई है… देख … अम्मी के साथ सब आए हैं…" क्या हुवा तुझे बाबू..

अम्मी, अब्बू, सब चौंक कर पास आ जाते हैं…

भाई (हक्का-बक्का):
"यार… ये तो… इसका जिस्म तो बर्फ की तरह ठंडा है…!"

भाभी (रोते हुए):
"हाय अल्ला**ह… ये क्या हो गया…?"(ये अभी अभी अपने मायके से आयी थी)

अलीना अब उसके गालों पर थपकियाँ देती है… पर कोई हरकत नहीं…हर पल के साथ अलीना की रूह उसके जिस्म को छोड़ रही थी... वो आज पहली बार अपने जिगर के टुकड़े को बेहोस देख रही थी...



---



---



अलीना ज़मीन पर बैठी सिकंदर का सिर अपनी गोद में रखे पागलों की तरह रुदन करने लगती है।
उसके हाथ कांप रहे थे… चेहरा सूजा हुआ… और दिल ऐसे धड़क रहा था जैसे किसी ने उस पर हथौड़े मार दिए हों।

तभी पीछे से हसन मिर्ज़ा और साहबाज कमरे में घबराकर दाखिल होते हैं।

हसन मिर्ज़ा (दहशत में):
"ये… ये क्या हुआ उसे…?!"

अलीना (टूटती आवाज़ में):
"पता नहीं … क्या हुवा है मेरे बच्चे को कैसे बेहोस हो गया..… कुछ बोल ही नहीं रहा…"

हसन मिर्ज़ा फोन उठाते हैं और डॉक्टर को कॉल करते हैं —
"डॉक्टर साहब… जल्दी आइए…मेरा बेटा बेहोष हो गया है… हालत बहुत ख़राब है…"

तभी कुछ नौकर-चाकर कमरे में आ जाते हैं। हसन मिर्ज़ा उन्हें घूरते हैं —
"किसी को कुछ पता है ये क्या हुआ इसे?!"

एक बूढ़ा नौकर धीरे से बोल पड़ता है —
"बीबी जी… सुबह आपने ही तो कहा था कि छोटे उस्ताद को आज ना खाना देना है… ना पानी… और पूरे घर का काम करवाना है… शायद उसी से… अचेत हो गए होंगे …"

बस…!! जैसे किसी ने अलीना के सीने में आग लगा दी हो…वो सह नहीं पायी की उसके बेटे की ये हालत उसकी वजह से हुवी है...वो अपना सुध वुद्ध खो बैठती है.. और जोर से चिल्लाती है....या अल्ला56हहहहहहहहहहह

उसके दिल मानो फट गया हो...
वो धीरे-धीरे उस नौकर की ओर मुड़ती है…
उसकी आँखों में अब आँसू नहीं —
अब उसमें माँ की टूटी हुई आत्मा थी…

और फिर…

अलीना चीख पड़ती है —
क्या कहा तूने... सुबह से इसने कुछ नहीं खाया... तुम लोगों ने मेरे बच्चे को सुबह से भूखा रखा.... पुरे दिन मेरा बचा भूखे प्यासे काम करता रहा... अल्ला22ह.....सुबह से इसके पेट मे एक दाना तक नहीं गया...

अलीना (गुस्से से कांपती हुई):
हरामजादे.... मेरे बेटे को भूखा रखा तूने...

अलीना नौकर पर झपट पड़ती है…
उसे गंदी-गंदी गालियाँ देने लगती है…

"कमीने... साले हरामखोर...हराम के जाने.... निकल यहाँ से...
तुझे अगर मेरी एक भी बात समझ नहीं आई थी तो पूछ लेता…
पर तुझे क्या… मेरा बच्चा तेरा कौन सा अपना था …क्या जाता तेरा अगर उसे एक रोटी दे देता…!!!"

सिक्न्दर को अपने सीने से लगा कर... उठ जा सिकंदर मेरे लाल... अम्मी तुझे ऐसे नहीं देख सकती.. देख अगर तू नहीं उठा तो तेरी अम्मी की जान निकल जयेगी.... नहीं देख सकती तुझे ऐसे... ए मेरे खुदा... मेरे लाल को लोटा दे मुझे...




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हवेली – रात

डॉक्टर आ चुके हैं।
सिकंदर को ड्रिप पर लगाया गया है।
डॉक्टर ने चेकअप के बाद हसन मिर्ज़ा को देखा और कहा:

डॉक्टर (नरम लहज़े में):
“ये तो साफ़ है कि बच्चा बहुत ज़्यादा कमज़ोर हो चुका है…
शरीर में पानी की भारी कमी है…
लंबे समय तक कुछ ना खाना, थकावट और भावनात्मक दबाव… यही वजह है बेहोशी की।”

डॉक्टर रुकते हैं, फिर अलीना की ओर देखते हैं…
“पर सच बताऊँ… ये सिर्फ़ जिस्मानी कमजोरी नहीं है…
इसे सदमा लगा है... आप लोग इसके आस पास ज्यादा से ज्यादा समय बिताएं

डॉक्टर चला जाता है। कमरे में फिर से सन्नाटा छा जाता है।

अलीना सिकंदर के सिरहाने बैठी है।
उसके सामने उसका वही बेटा, जो कभी उसका आँचल पकड़कर चलता था, अब बिस्तर पर बेहोश पड़ा है…
या शायद होश में होते हुए भी इस दुनिया से बेग़ाना।

अलीना (धीरे से उसके हाथ को थामती है):
“सिकंदर… बेटा… उठ जा… देख मैं तेरे पास हूँ…
मैंने बहुत गलती की है… पर अब मैं तुझे छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी…”

पर सिकंदर की पलकें हल्की सी हिलती हैं, वो आँख खोलता है…
पर उसमें कोई जज़्बात नहीं होते।

वो उठकर बैठता है… बिना कुछ कहे…

अलीना:
“कुछ तो बोल… गुस्सा कर… डाँट ले मुझे…
पर ऐसे चुप मत रह बेटा… तुझसे ये खामोशी नहीं देखी जाती…”

समय बीतने लगा सिकंदर अब किसी से बात नहीं करता था.. अलीना उसकी आवाज़ सुनने के लिए तरश गई थी... अब उसे सिकंदर की ख़ामोशी खाने लगी थी... वो औफिस से आती और सिकंदर के आगे पीछे गहने लगती.. पर वो बच्चा अब बिखर चूका था... सायद उसने ऐसा कुछ देख लिया था जो उसे नहीं देखनी चाहिए थी...



वही दुसरी तरफ... साहबाज अब अपनी हदें पार करने लगा था... वो अब अलीना से अकेले मे या सिकंदर के सामने गन्दी बातें करने लगा था.. अलीना के दिमाग मे हसन मिर्ज़ा ने भर दिया था की सहबाज से प्यारा और समझदार बचा इस दुनयाँ मे नहीं है... वो सहबाज के सवालों को उसकी मासूमयत समझती थी.. उसे लगता था की सहबाज को बचपन से ही माँ का प्यार नहीं मिला इस लिए वो मुझमे अपनी माँ को ढूंढ़ रहा है...
सहबाज उसे गलत तरीके से छूता.. पर वो उसको उसका प्यार समझती... या फिर उसे भी मज़ा आ रहा था.. ये तो रब जनता है....पर ये बात पक्की थी अलीना उसे मना नहीं करती थी....

एक दिन ऑफिस जाने से पहले अलीना सिकंदर को उसके कमरे मे मिलने आई.. उसके पीछे सहबाज भी था...अलीना ने सिकंदर को गले लगाया पर सिकंदर का वही ठंढा वार्ताब... फिर सहबाज आकर अलीना के गले लग जाता है.. वो अलीना के स्थन को हाथ लगता है अलीना उसे हटाने या डाठने के वजाहय उसके तरह मुस्कुराते हुवे देख रही थी वी ये भी भूल गई थी की सिकंदर भी उनके साथ खरा है...

सहबाज - अम्मी आपने वादा किया है.. की आप ऑफिस से आकर मुझे दुधु पिलाओगी... मेने कभी दुधु नहीं पिया है..

अलीना ( उसके बालों मे हाथ फेरते हुवे ) - पक्का वादा.. मेरा बच्चे को अम्मी की दुधु पिने का मन कर रहा है.. आज पक्का... उनके बातों से जाहिर था.. ये पहली बार नहीं हुवा है... हाँ पहली बार सिकंदर के सामने जरूर हुवा था...

तभी अलीना को आहसास होता है सिकंदर भी वही है.. वो सहबाज को अपने दे दूर करते है और आँखों से ईसारा करती है... सहबाज उसके इसारे को समझ जाता है.. और मुस्कुराते हुवे कमरे से चले जाता है... सिकंदर ये देख कर दंग रह जाता है.. अलीना उसके चेहरे को पेड़ चुकी थे.. वो समझ गई की सिकंदर को ये अच्छा नहीं लगा पर ये बेवकूफ़ औरत को लग रहा था की सिकंदर को सहबाज दे जलन हो रही है इस लिए उसका चेहरा उतर गया है.... खैर अत्तित का पन्नों पर पूर्ण विराम लगता है और सिकंदर खुद को अपने कमरे मे पाता है... उसके आँखों से आंसू की बुँदे टपक रही थी...



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| शाम का समय हो गया था| मोहल्ले के बीचों-बीच धरना | माहौल भावुक और खामोश बगावत से भरा हुआ]

कमरे की बत्तियां बुझी हुई थीं। बस एक कोने में रखा पुराना रेडियो चल रहा था, जिसकी धीमी आवाज़ में वही गाना गूंज रहा था:

"याद... याद... याद बस यादें रह जाती हैं..."

सिकंदर अब बिस्तर पर नहीं था।

सिकंदर काले कुर्ते-पायजामे में तैयार हो चुका था। उसका चेहरा शांत था… लेकिन आंखों में एक ठहरा हुआ दर्द, एक ठहरी हुई आग साफ़ झलक रही थी।

वो अपना इत्र लगाता है, , फिर खामोशी से कमरे का दरवाज़ा खोलकर बाहर निकलता है।

बाहर का दृश्य:

धरने की भीड़ में हलचल थी। लोग “इंसाफ़ दो, इंसाफ़ दो!” के नारे लगा रहे थे। ज़ोया मंच के पास खड़ी थी। रुक्सार और अली भी वहीं थे। तभी सबकी नजर सामने से आते सिकंदर पर पड़ी।

उसका चेहरा थका हुआ था, लेकिन चाल में एक अलग ही ठहराव था।

रुक्सार उसे पास बुला कर बोली बोली:

रुक्सार: “सिकंदर बेटा… कहां जा रहे हो इस वक़्त?”

सिकंदर (धीमी आवाज़ में, बहुत शांत लहजे में):
"दुआ करने… जमा मस्जिद जा रहा हूं।"

ज़ोया उसे पलभर तक देखती रही।। वो बिना कुछ कहे उसके पास आई।

ज़ोया (धीरे से):
“मुझे भी ले चलो… मैं भी दुआ मांगना चाहती हूँ.. अपने और इन लोगों की सलामती के लिए..

सिकंदर उसकी तरफ एक पल देखता रहा… फिर बिना कुछ कहे मोटरसाइकिल की चाबी निकलता है।



ज़ोया जल्दी से अपना दुपट्टा ठीक करती है। अली कुछ कहने ही वाला होता है लेकिन रुक्सार उसे आंखों से रोक देती है।

ज़ोया और सिकंदर, दोनों बिना कुछ बोले, बाइक पर सवार हो जाते हैं। सिकंदर बाइक स्टार्ट करता है। ज़ोया उसकी पीठ से हल्के से टिक जाती है।

बाइक धीरे-धीरे चल पड़ती है… मोहल्ले के रास्तों से गुजरते हुए… धरने के नारों के बीच… उस पुरानी, जानी-पहचानी मगर अब अजनबी हो चुकी अहसास के साथ


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हवेली का ड्राइंग रूम | रात का समय | सब लोग साथ बैठे हैं

हवेली में गर्मा-गर्म चाय के साथ सब बैठकर बातें कर रहे थे। हँसी-मज़ाक चल रहा था। भाभियाँ हल्की-फुल्की चुहल कर रही थीं। सहबाज सोफे पर पसरा था, और अम्मी साइड में बैठी हुई थीं।

अचानक, माहौल में हल्की-सी चुप्पी आ गई जब अलिना की भाभी से अम्मी ने यूँ ही पूछ लिया:

अम्मी:
"बहु, दोपहर में तुम कहां गई थीं? नजर ही नहीं आईं पूरे दिन..."

भाभी ने धीरे से मुस्कुराते हुए जवाब दिया:

भाभी:
"अम्मी… मस्जिद गई थी… दुआ करने। आज सिकंदर का जनमदिन था ना। अब किसी को याद रहे या न रहे, मैं तो उसे बहुत चाहती थी, बहुत… उसकी हर बात, हर आदत… सब याद है मुझे। मैं उसके जनमदिन को कैसे भूल सकती हूं?"

ये शब्द, एक तीर की तरह जाकर अलिना के सीने में धँस गए। जैसे किसी ने उसकी माँ होने की हैसियत पर तमाचा मार दिया हो।

– वो चुप है… उसकी नज़रें झुकी हुई हैं।

उसका हाथ काँप रहा था। दिल की धड़कनें तेज़ हो गई थीं। उसके कानों में सिर्फ भाभी के वो शब्द गूंज रहे थे –
"मैं उसके जनमदिन को कैसे भूल सकती हूं…"

अचानक, अलिना उठती है। हड़बड़ाहट में चाय का कप गिर जाता है, कोई कुछ पूछता उससे पहले ही वो अपने बैग की तरफ लपकती है, चाबी उठाती है और दरवाज़े की तरफ बढ़ती है।

सब चौंकते हैं। सहबाज पूछता है:
"अरे अम्मी कहां जा रही हैं इस वक़्त?"

अलिना -
"मुझे कुछ याद आ गया है… बहुत जरूरी है जाना।"


कार के अंदर | अलिना ड्राइव करते हुए | आँखों में आंसू
सड़क पर उसकी गाड़ी तेज़ चल रही थी… लेकिन उसका मन उससे भी तेज़ भाग रहा था… पीछे की तरफ, अतीत की ओर।

अलिना (अपने आप से):
"कैसे भूल गई मैं… कैसे… आज उसका जनमदिन था…







"मुझे तुझसे कुछ नहीं चाहिए मेरे खुदा… बस एक बार… एक बार मेरी औलाद मुझे देखे… शायद मुझे माफ़ कर दे… या कम से कम मेरी आँखों में देख कर नफ़रत ही कर ले… पर कुछ तो कहे… कुछ तो सुने…" अगर वो मुझे मारे पीटे... जो चाहे वो करें बस एक आकर मुझे देख ले...



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---

[सीन शुरू – ज़ामा मस्जिद के बाहर की गलियाँ | रात का वक्त]

अलिना अपनी कार से उतरती है। आसमान में हल्की सी ठंडक है, गीली मिट्टी की खुशबू फैली हुई है। मस्जिद के आसपास की तंग गलियाँ पीली लाइटों से जगमगा रही हैं। लोग इधर-उधर जा रहे हैं, बच्चे खेल रहे हैं, कुछ दुकानदार अपनी दुकानें समेट रहे हैं।

(कैमरा अलिना के चेहरे पर – उदासी और बेचैनी साफ झलक रही है।)

वो धीरे-धीरे मस्जिद की तरफ बढ़ती है, हील की हल्की-हल्की आवाज़ पत्थर की गलियों में गूंज रही है।


तभी... सामने से एक काले लिवास में एक लंबा, बेहद खूबसूरत जवान आता है… उसके घुंघराले बाल हवा में उड़ रहे होते हैं… नीली आंखें, चेहरे पर ग़ैरमामूली सुकून… रौब ऐसा कि भीड़ अपने आप रास्ता दे रही हो।

अलिना का दिल एक पल के लिए रुक जाता है… सांसें थम जाती हैं…

(धीरे से फुसफुसाती है):
"सिकंदर…?"

वो वहीं थम जाती है। नज़रों को यकीन नहीं होता… उस लड़के के चेहरे में कुछ था… कुछ जाना-पहचाना… जो सीधा उसके दिल से जुड़ता था।

वो बिना अलिना की तरफ देखे आगे बढ़ता है, और भीड़ में खो जाता है

अलिना एक झटके से पीछे मुड़ती है… उसकी नज़रों ने उसे ढूंढना चाहा… लेकिन…

(हल्की सी सिसकी लेती है):
"कहां चला गया…? क्या मेरा वहम था…?"

वो खुद को समझाती है, पर आंखें उस भीड़ में भटक रही होती हैं… शायद दिल अब भी उम्मीद में था कि एक बार फिर वो चेहरा दिख जाए।



---
अलीना दुवा करके महज़ीद से बाहर आती है तभी उसके फोन पर कल आता है....मुस्ता क़ कालिंग...

अलीना फ़ोन उठाते हुवे...- हाँ मुस्ता क़ साहब बोलिए..

CEO - मैडम गजब हो गया... सहबाज बाबू को किसी ने बहुत मारा है... वही राहिल के लोग थे..सर पर रोड लेकर मारा है हालत बहुत नाजुक है...

Continue...
 

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Nhi bhai wo to hai albela dusre site me mr. Parfect write likh raha tha ye sirf dusro ki story ko es site par copy karta hai abhi jo ye mukkder ka sikandar likh raha hai ye bhi pakistani writer ka hai abhi us site par update nhi aaya hai to yaha bhi update nhi aaya na hi kisi comment ka jwab dega
Abe bhai tu dimag se padel hai kyaa....? Story post kerne ke date ko he dekh leta ke kisne phele uplode kiya hai ...log iska copy kerten hai ..jaker dekh le iske kitne story's hai kuch to paid hai wo bhi copy hai kyaa ....thora to dimag laga ...aur ager tujhe story pasand nhi aa rahe to mat padh ya jaker uss pakistani writer ke story padh ....ye banda thora sanki hai ..ye likhna bund ker dega iss liye plzzz bhai .jaa yahan se
 
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भाई स्टोरी का रिव्युव दो... जल्दी जल्दी मे अपडेट तब दूंगा जब आप को स्टोरी पसंद आएगी हुए..
सो पलज़्ज़ज़ दो लाइन कम से कम जरूर लिखना...इस से मुझे मोटिवेशन मिलती है स्टोरी को लिखने की


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रात के तक़रीबन दस बज चुके हैं… मोहल्ले के बीचों-बीच धरना जारी है… लोग जोश में नारे लगा रहे हैं…

“हम अपना हक़ लेकर रहेंगे!”
“बिल्डर-माफिया मुर्दाबाद!”

लोगों की भीड़ को जोया लीड कर रही है — पर इस उबाल और जोश से दूर…

पर सिकंदर के कमरे मे...अंधेरे की चुप्पी में, सिकंदर अकेला लेटा था।

कमरे में उजाला सिर्फ एक पुराना सा रेडियो कर रहा है… और उस रेडियो पर एक उदास, रूह तक चीर देने वाला गाना चल रहा है…

“याद... याद... याद...
बस याद रह जाती हैं…” (गाने की आवाज़ धीमे धीमे कमरे में भरती जाती है…)

सिकंदर की आँखें छत पर जमी हैं… लेकिन उनमें कोई रंग, कोई रौशनी नहीं बची…

आज उसका जन्मदिन है।

पर कोई मोमबत्ती नहीं, कोई केक नहीं, कोई 'हैप्पी बर्थडे बेटा' नहीं...

आज वो दिन नहीं जिस दिन वो पैदा हुआ था…
आज वो दिन है जब वो पहली बार उसने जाना था बेहोसी क्या होती है... कैसा लगता है जब कोई भूख प्यास से बेहोस होकर गिर परता है... कैसा लगता है जब किसी के टांगे कापने लगती है कमज़ोरी के मारे.. कैसा लगता है जब कोई भूखे पेट... बोरियां उठाता है... कैसा लगता है... अपनी माँ से दुथकारे जाने पर...


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फ़्लैश बैक


सुबह का वक्त…
अलीना, गुस्से में पागल होकर, सीढ़ियों से नीचे उतरती है।

अलीना (कड़क आवाज़ में):
"आज तुझे सज़ा मिलेगी, हरामजादे अब तू मेरे अलमारी से पैसे चुराने लगा... दिन व दिन तेरे करतूत बढ़ते जा रहे है.... कल ही साहबज़ ने मुझे बोला था... तू स्कूल मे लड़ाईयां करने लगा है और अब चोरी.... वो तो सुकर है सहबाज ने तुझे पैसे चुराते देख लिया नहीं तो मे बेचारे उन नौकरो पर इलज़ाम लगाती...

सिकंदर अपने हारा हुवा चेहरा लिए अपनी माँ के आंखों मे देख रहा था.... वो सायद उन आंखों मे कुछ ढूंढ़ रहा था.. पर वो उसे मिल नहीं रहा था... उसने अलीना से कुछ नहीं कहा.... कुछ कहने का कोई फ़ायदा नहीं था... अब अलीना ने उसके दिल का हाल जाना छोड़ दिया था.. अब अलीना ने उसे पराया कर दिया था

आज न तुझे खाना मिलेगा, न पानी… और पूरे दिन नौकरों के साथ बर्तन मांजेगा और जो काम नौकर करते है वो तुझे करना होगा.. यही तेरी सजा है... अलीना अपने तरफ से सिकंदर को सुधार रही थी.. पर उस बेवकूफ औरत क्या पता था की सहबाज कैसे उस से खेल रहा है.... उसके सिकंदर को उस से दूर करता जा रहा है...




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सिकंदर की आंखें लाल हैं, जिस्म पर धूल है, हाथों में छाले हैं... और दिल में एक जला हुआ कोना।

सुबह से शाम हो चुकी है… लेकिन उसके पेट में एक दाना तक नहीं गया।
प्यास से होठ सूख चुके हैं, सांसों में थकावट की भारी चुप्पी है।

हवेली के बड़े से किचन में आज भी उसकी जगह नहीं थी…
उसकी थाली आज भी खाली थी…

नौकर लोग, जिन्हें वो पहले नाम से बुलाता था… आज उसी को हुक्म सुना रहे थे।



सिकंदर, बिना कोई जवाब दिए, बस सर झुकाकर काम करता रहा…
जैसे उसे किसी सवाल का हक़ ही नहीं…

उसका गला सूख रहा था… लेकिन कोई एक ग्लास पानी तक नहीं पूछता…

वो बर्तन मांजते-मांजते, किसी कोने में जाकर कभी थोड़ी देर आँखें मूँद लेता… फिर उठ कर दोबारा लग जाता…
उसकी कमर झुकती जा रही थी, कंधे जवाब दे रहे थे, पर किसी ने पूछा तक नहीं –
"तू ठीक है?"

कभी वो ही सिकंदर था जो हवेली के हर काम में सबसे आगे होता था…
पर आज किसी के लिए वो बस एक सज़ायाफ्ता नौकर था।


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एक शानदार, बड़ी-बड़ी शीशे की खिड़कियों वाला ऑफिस…
जहाँ अलीना एक कॉन्फ्रेंस कॉल में बिज़ी है।

अलीना (प्रोफेशनल अंदाज़ में):
"Yes, Mr. Qureshi. Finalize the deal. I don’t want any more delays."

मीटिंग खत्म होती है… वो लैपटॉप बंद करती है…
एक गहरी सांस लेती है और अपनी कुर्सी से उठकर स्ट्रेच करती है।




उसका ध्यान पास टंगे कैलेंडर पर चला जाता है…

और जैसे ही उसकी निगाह उस तारीख पर जाती है —

"10 अप्रैल" —



अलीना (धीरे से फुसफुसाती है):
"10 अप्रैल...? आज... आज सिकंदर का जन्मदिन है…"

वो घरी मे समय देकती है तो 5 बज रहे थे... वो जल्दी से अपना पर्स उठाती है और ऑफिस से बाहर निकलती है रास्ते से वो एक केक और कुछ बल्लोंन और एक प्यारा सा खेलना.. लेती है.. सायद ये सिकंदर का गिफ्ट था.. अलीना अब तक नहीं समझीथी की उसके लाडले को खेलोना नहीं उकसा प्यार चाहिए...





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सिकंदर की हालत अब काबू से बाहर जा चुकी थी।
पेट खाली… होंठ सूखे… जिस्म काँपता हुआ… आँखों में गहराती अंधेरी थकावट.,.. उसके पैर काँप रहे थे.. क्यों की घुटनो मे जान नहीं बची थी...

हर सांस जैसे एक बोझ बन चुकी थी…
हर कदम जैसे पत्थर का हो गया था…

वो किसी तरह दीवार पकड़ कर अपने कमरे के दरवाज़े तक पहुँचता है…
दरवाज़ा भी ठीक से नहीं खोल पाता… और बेसुध होकर अंदर गिर जाता है।

ठक्..!
एक भारी आवाज़ होती है —
उसका जिस्म फर्श से टकराता है। पर मासूम के पास कोई नहीं था... जो उसे सहारा दे सके.. सायद आज उस खु*दा के आँखों मे भी आंसू आये होंगे... सायद इस लिए वो सिकंदर को अपने पास बुला लेना चाहता था..

सिकंदर अब बेहोश था … एकदम चुप… बर्फ की तरह ठंडा…

उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था, होंठ नीले, हाथ-पैर थमे हुए से…

कपड़ों में मिट्टी लगी थी, चेहरे पर थकान की दरारें थे...और दिल में अधूरी उम्मीद की खामोशी।


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दूसरी तरफ – हवेली का बड़ा दरवाज़ा खुलता है…

अलीना, एक सजाया हुआ केक हाथ में लिए, अपने पूरे परिवार के साथ अंदर दाखिल होती है…

साथ में उसका भाई, भाभी, अम्मी और अब्बू भी हैं।
सबके चेहरों पर मुस्कान है… शायद आज वो ‘एक सरप्राइज़’ देने आए हैं…

अलीना (हल्की मुस्कराहट के साथ):
"आज उसे हँसते हुए देखूंगी..... अलीना बहुत ख़ुश थी...

जैसे ही सब सिकंदर के कमरे के पास पहुंचते हैं…

दरवाज़ा अधखुला पड़ा है… और अंदर घुप्प अंधेरा।

अलीना धीरे से अंदर झांकती है…

और अगले ही पल — उसकी चीख हवेली में गूंज उठती है…

अलीना (दहशत में):
"सिकंदर…!!!"

उसके हाथ से केक गिर जाता है…
फर्श पर "Happy Birthday लिखे शब्द भी टूट जाते हैं… जैसे उनकी तरह रिश्तों का वहम भी टूट जाता है…

अलीना दौड़कर उसके पास आती है… उसका चेहरा अपनी गोद में रख लेती है…

अलीना (थरथराती हुई):
"उठ ना … उठ … देख … अम्मी आई है… देख … अम्मी के साथ सब आए हैं…" क्या हुवा तुझे बाबू..

अम्मी, अब्बू, सब चौंक कर पास आ जाते हैं…

भाई (हक्का-बक्का):
"यार… ये तो… इसका जिस्म तो बर्फ की तरह ठंडा है…!"

भाभी (रोते हुए):
"हाय अल्ला**ह… ये क्या हो गया…?"(ये अभी अभी अपने मायके से आयी थी)

अलीना अब उसके गालों पर थपकियाँ देती है… पर कोई हरकत नहीं…हर पल के साथ अलीना की रूह उसके जिस्म को छोड़ रही थी... वो आज पहली बार अपने जिगर के टुकड़े को बेहोस देख रही थी...



---



---



अलीना ज़मीन पर बैठी सिकंदर का सिर अपनी गोद में रखे पागलों की तरह रुदन करने लगती है।
उसके हाथ कांप रहे थे… चेहरा सूजा हुआ… और दिल ऐसे धड़क रहा था जैसे किसी ने उस पर हथौड़े मार दिए हों।

तभी पीछे से हसन मिर्ज़ा और साहबाज कमरे में घबराकर दाखिल होते हैं।

हसन मिर्ज़ा (दहशत में):
"ये… ये क्या हुआ उसे…?!"

अलीना (टूटती आवाज़ में):
"पता नहीं … क्या हुवा है मेरे बच्चे को कैसे बेहोस हो गया..… कुछ बोल ही नहीं रहा…"

हसन मिर्ज़ा फोन उठाते हैं और डॉक्टर को कॉल करते हैं —
"डॉक्टर साहब… जल्दी आइए…मेरा बेटा बेहोष हो गया है… हालत बहुत ख़राब है…"

तभी कुछ नौकर-चाकर कमरे में आ जाते हैं। हसन मिर्ज़ा उन्हें घूरते हैं —
"किसी को कुछ पता है ये क्या हुआ इसे?!"

एक बूढ़ा नौकर धीरे से बोल पड़ता है —
"बीबी जी… सुबह आपने ही तो कहा था कि छोटे उस्ताद को आज ना खाना देना है… ना पानी… और पूरे घर का काम करवाना है… शायद उसी से… अचेत हो गए होंगे …"

बस…!! जैसे किसी ने अलीना के सीने में आग लगा दी हो…वो सह नहीं पायी की उसके बेटे की ये हालत उसकी वजह से हुवी है...वो अपना सुध वुद्ध खो बैठती है.. और जोर से चिल्लाती है....या अल्ला56हहहहहहहहहहह

उसके दिल मानो फट गया हो...
वो धीरे-धीरे उस नौकर की ओर मुड़ती है…
उसकी आँखों में अब आँसू नहीं —
अब उसमें माँ की टूटी हुई आत्मा थी…

और फिर…

अलीना चीख पड़ती है —
क्या कहा तूने... सुबह से इसने कुछ नहीं खाया... तुम लोगों ने मेरे बच्चे को सुबह से भूखा रखा.... पुरे दिन मेरा बचा भूखे प्यासे काम करता रहा... अल्ला22ह.....सुबह से इसके पेट मे एक दाना तक नहीं गया...

अलीना (गुस्से से कांपती हुई):
हरामजादे.... मेरे बेटे को भूखा रखा तूने...

अलीना नौकर पर झपट पड़ती है…
उसे गंदी-गंदी गालियाँ देने लगती है…

"कमीने... साले हरामखोर...हराम के जाने.... निकल यहाँ से...
तुझे अगर मेरी एक भी बात समझ नहीं आई थी तो पूछ लेता…
पर तुझे क्या… मेरा बच्चा तेरा कौन सा अपना था …क्या जाता तेरा अगर उसे एक रोटी दे देता…!!!"

सिक्न्दर को अपने सीने से लगा कर... उठ जा सिकंदर मेरे लाल... अम्मी तुझे ऐसे नहीं देख सकती.. देख अगर तू नहीं उठा तो तेरी अम्मी की जान निकल जयेगी.... नहीं देख सकती तुझे ऐसे... ए मेरे खुदा... मेरे लाल को लोटा दे मुझे...




---24455577

हवेली – रात

डॉक्टर आ चुके हैं।
सिकंदर को ड्रिप पर लगाया गया है।
डॉक्टर ने चेकअप के बाद हसन मिर्ज़ा को देखा और कहा:

डॉक्टर (नरम लहज़े में):
“ये तो साफ़ है कि बच्चा बहुत ज़्यादा कमज़ोर हो चुका है…
शरीर में पानी की भारी कमी है…
लंबे समय तक कुछ ना खाना, थकावट और भावनात्मक दबाव… यही वजह है बेहोशी की।”

डॉक्टर रुकते हैं, फिर अलीना की ओर देखते हैं…
“पर सच बताऊँ… ये सिर्फ़ जिस्मानी कमजोरी नहीं है…
इसे सदमा लगा है... आप लोग इसके आस पास ज्यादा से ज्यादा समय बिताएं

डॉक्टर चला जाता है। कमरे में फिर से सन्नाटा छा जाता है।

अलीना सिकंदर के सिरहाने बैठी है।
उसके सामने उसका वही बेटा, जो कभी उसका आँचल पकड़कर चलता था, अब बिस्तर पर बेहोश पड़ा है…
या शायद होश में होते हुए भी इस दुनिया से बेग़ाना।

अलीना (धीरे से उसके हाथ को थामती है):
“सिकंदर… बेटा… उठ जा… देख मैं तेरे पास हूँ…
मैंने बहुत गलती की है… पर अब मैं तुझे छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी…”

पर सिकंदर की पलकें हल्की सी हिलती हैं, वो आँख खोलता है…
पर उसमें कोई जज़्बात नहीं होते।

वो उठकर बैठता है… बिना कुछ कहे…

अलीना:
“कुछ तो बोल… गुस्सा कर… डाँट ले मुझे…
पर ऐसे चुप मत रह बेटा… तुझसे ये खामोशी नहीं देखी जाती…”

समय बीतने लगा सिकंदर अब किसी से बात नहीं करता था.. अलीना उसकी आवाज़ सुनने के लिए तरश गई थी... अब उसे सिकंदर की ख़ामोशी खाने लगी थी... वो औफिस से आती और सिकंदर के आगे पीछे गहने लगती.. पर वो बच्चा अब बिखर चूका था... सायद उसने ऐसा कुछ देख लिया था जो उसे नहीं देखनी चाहिए थी...



वही दुसरी तरफ... साहबाज अब अपनी हदें पार करने लगा था... वो अब अलीना से अकेले मे या सिकंदर के सामने गन्दी बातें करने लगा था.. अलीना के दिमाग मे हसन मिर्ज़ा ने भर दिया था की सहबाज से प्यारा और समझदार बचा इस दुनयाँ मे नहीं है... वो सहबाज के सवालों को उसकी मासूमयत समझती थी.. उसे लगता था की सहबाज को बचपन से ही माँ का प्यार नहीं मिला इस लिए वो मुझमे अपनी माँ को ढूंढ़ रहा है...
सहबाज उसे गलत तरीके से छूता.. पर वो उसको उसका प्यार समझती... या फिर उसे भी मज़ा आ रहा था.. ये तो रब जनता है....पर ये बात पक्की थी अलीना उसे मना नहीं करती थी....

एक दिन ऑफिस जाने से पहले अलीना सिकंदर को उसके कमरे मे मिलने आई.. उसके पीछे सहबाज भी था...अलीना ने सिकंदर को गले लगाया पर सिकंदर का वही ठंढा वार्ताब... फिर सहबाज आकर अलीना के गले लग जाता है.. वो अलीना के स्थन को हाथ लगता है अलीना उसे हटाने या डाठने के वजाहय उसके तरह मुस्कुराते हुवे देख रही थी वी ये भी भूल गई थी की सिकंदर भी उनके साथ खरा है...

सहबाज - अम्मी आपने वादा किया है.. की आप ऑफिस से आकर मुझे दुधु पिलाओगी... मेने कभी दुधु नहीं पिया है..

अलीना ( उसके बालों मे हाथ फेरते हुवे ) - पक्का वादा.. मेरा बच्चे को अम्मी की दुधु पिने का मन कर रहा है.. आज पक्का... उनके बातों से जाहिर था.. ये पहली बार नहीं हुवा है... हाँ पहली बार सिकंदर के सामने जरूर हुवा था...

तभी अलीना को आहसास होता है सिकंदर भी वही है.. वो सहबाज को अपने दे दूर करते है और आँखों से ईसारा करती है... सहबाज उसके इसारे को समझ जाता है.. और मुस्कुराते हुवे कमरे से चले जाता है... सिकंदर ये देख कर दंग रह जाता है.. अलीना उसके चेहरे को पेड़ चुकी थे.. वो समझ गई की सिकंदर को ये अच्छा नहीं लगा पर ये बेवकूफ़ औरत को लग रहा था की सिकंदर को सहबाज दे जलन हो रही है इस लिए उसका चेहरा उतर गया है.... खैर अत्तित का पन्नों पर पूर्ण विराम लगता है और सिकंदर खुद को अपने कमरे मे पाता है... उसके आँखों से आंसू की बुँदे टपक रही थी...



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---

| शाम का समय हो गया था| मोहल्ले के बीचों-बीच धरना | माहौल भावुक और खामोश बगावत से भरा हुआ]

कमरे की बत्तियां बुझी हुई थीं। बस एक कोने में रखा पुराना रेडियो चल रहा था, जिसकी धीमी आवाज़ में वही गाना गूंज रहा था:

"याद... याद... याद बस यादें रह जाती हैं..."

सिकंदर अब बिस्तर पर नहीं था।

सिकंदर काले कुर्ते-पायजामे में तैयार हो चुका था। उसका चेहरा शांत था… लेकिन आंखों में एक ठहरा हुआ दर्द, एक ठहरी हुई आग साफ़ झलक रही थी।

वो अपना इत्र लगाता है, , फिर खामोशी से कमरे का दरवाज़ा खोलकर बाहर निकलता है।

बाहर का दृश्य:

धरने की भीड़ में हलचल थी। लोग “इंसाफ़ दो, इंसाफ़ दो!” के नारे लगा रहे थे। ज़ोया मंच के पास खड़ी थी। रुक्सार और अली भी वहीं थे। तभी सबकी नजर सामने से आते सिकंदर पर पड़ी।

उसका चेहरा थका हुआ था, लेकिन चाल में एक अलग ही ठहराव था।

रुक्सार उसे पास बुला कर बोली बोली:

रुक्सार: “सिकंदर बेटा… कहां जा रहे हो इस वक़्त?”

सिकंदर (धीमी आवाज़ में, बहुत शांत लहजे में):
"दुआ करने… जमा मस्जिद जा रहा हूं।"

ज़ोया उसे पलभर तक देखती रही।। वो बिना कुछ कहे उसके पास आई।

ज़ोया (धीरे से):
“मुझे भी ले चलो… मैं भी दुआ मांगना चाहती हूँ.. अपने और इन लोगों की सलामती के लिए..

सिकंदर उसकी तरफ एक पल देखता रहा… फिर बिना कुछ कहे मोटरसाइकिल की चाबी निकलता है।



ज़ोया जल्दी से अपना दुपट्टा ठीक करती है। अली कुछ कहने ही वाला होता है लेकिन रुक्सार उसे आंखों से रोक देती है।

ज़ोया और सिकंदर, दोनों बिना कुछ बोले, बाइक पर सवार हो जाते हैं। सिकंदर बाइक स्टार्ट करता है। ज़ोया उसकी पीठ से हल्के से टिक जाती है।

बाइक धीरे-धीरे चल पड़ती है… मोहल्ले के रास्तों से गुजरते हुए… धरने के नारों के बीच… उस पुरानी, जानी-पहचानी मगर अब अजनबी हो चुकी अहसास के साथ


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हवेली का ड्राइंग रूम | रात का समय | सब लोग साथ बैठे हैं

हवेली में गर्मा-गर्म चाय के साथ सब बैठकर बातें कर रहे थे। हँसी-मज़ाक चल रहा था। भाभियाँ हल्की-फुल्की चुहल कर रही थीं। सहबाज सोफे पर पसरा था, और अम्मी साइड में बैठी हुई थीं।

अचानक, माहौल में हल्की-सी चुप्पी आ गई जब अलिना की भाभी से अम्मी ने यूँ ही पूछ लिया:

अम्मी:
"बहु, दोपहर में तुम कहां गई थीं? नजर ही नहीं आईं पूरे दिन..."

भाभी ने धीरे से मुस्कुराते हुए जवाब दिया:

भाभी:
"अम्मी… मस्जिद गई थी… दुआ करने। आज सिकंदर का जनमदिन था ना। अब किसी को याद रहे या न रहे, मैं तो उसे बहुत चाहती थी, बहुत… उसकी हर बात, हर आदत… सब याद है मुझे। मैं उसके जनमदिन को कैसे भूल सकती हूं?"

ये शब्द, एक तीर की तरह जाकर अलिना के सीने में धँस गए। जैसे किसी ने उसकी माँ होने की हैसियत पर तमाचा मार दिया हो।

– वो चुप है… उसकी नज़रें झुकी हुई हैं।

उसका हाथ काँप रहा था। दिल की धड़कनें तेज़ हो गई थीं। उसके कानों में सिर्फ भाभी के वो शब्द गूंज रहे थे –
"मैं उसके जनमदिन को कैसे भूल सकती हूं…"

अचानक, अलिना उठती है। हड़बड़ाहट में चाय का कप गिर जाता है, कोई कुछ पूछता उससे पहले ही वो अपने बैग की तरफ लपकती है, चाबी उठाती है और दरवाज़े की तरफ बढ़ती है।

सब चौंकते हैं। सहबाज पूछता है:
"अरे अम्मी कहां जा रही हैं इस वक़्त?"

अलिना -
"मुझे कुछ याद आ गया है… बहुत जरूरी है जाना।"


कार के अंदर | अलिना ड्राइव करते हुए | आँखों में आंसू
सड़क पर उसकी गाड़ी तेज़ चल रही थी… लेकिन उसका मन उससे भी तेज़ भाग रहा था… पीछे की तरफ, अतीत की ओर।

अलिना (अपने आप से):
"कैसे भूल गई मैं… कैसे… आज उसका जनमदिन था…







"मुझे तुझसे कुछ नहीं चाहिए मेरे खुदा… बस एक बार… एक बार मेरी औलाद मुझे देखे… शायद मुझे माफ़ कर दे… या कम से कम मेरी आँखों में देख कर नफ़रत ही कर ले… पर कुछ तो कहे… कुछ तो सुने…" अगर वो मुझे मारे पीटे... जो चाहे वो करें बस एक आकर मुझे देख ले...



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---

[सीन शुरू – ज़ामा मस्जिद के बाहर की गलियाँ | रात का वक्त]

अलिना अपनी कार से उतरती है। आसमान में हल्की सी ठंडक है, गीली मिट्टी की खुशबू फैली हुई है। मस्जिद के आसपास की तंग गलियाँ पीली लाइटों से जगमगा रही हैं। लोग इधर-उधर जा रहे हैं, बच्चे खेल रहे हैं, कुछ दुकानदार अपनी दुकानें समेट रहे हैं।

(कैमरा अलिना के चेहरे पर – उदासी और बेचैनी साफ झलक रही है।)

वो धीरे-धीरे मस्जिद की तरफ बढ़ती है, हील की हल्की-हल्की आवाज़ पत्थर की गलियों में गूंज रही है।


तभी... सामने से एक काले लिवास में एक लंबा, बेहद खूबसूरत जवान आता है… उसके घुंघराले बाल हवा में उड़ रहे होते हैं… नीली आंखें, चेहरे पर ग़ैरमामूली सुकून… रौब ऐसा कि भीड़ अपने आप रास्ता दे रही हो।

अलिना का दिल एक पल के लिए रुक जाता है… सांसें थम जाती हैं…

(धीरे से फुसफुसाती है):
"सिकंदर…?"

वो वहीं थम जाती है। नज़रों को यकीन नहीं होता… उस लड़के के चेहरे में कुछ था… कुछ जाना-पहचाना… जो सीधा उसके दिल से जुड़ता था।

वो बिना अलिना की तरफ देखे आगे बढ़ता है, और भीड़ में खो जाता है

अलिना एक झटके से पीछे मुड़ती है… उसकी नज़रों ने उसे ढूंढना चाहा… लेकिन…

(हल्की सी सिसकी लेती है):
"कहां चला गया…? क्या मेरा वहम था…?"

वो खुद को समझाती है, पर आंखें उस भीड़ में भटक रही होती हैं… शायद दिल अब भी उम्मीद में था कि एक बार फिर वो चेहरा दिख जाए।



---
अलीना दुवा करके महज़ीद से बाहर आती है तभी उसके फोन पर कल आता है....मुस्ता क़ कालिंग...

अलीना फ़ोन उठाते हुवे...- हाँ मुस्ता क़ साहब बोलिए..

CEO - मैडम गजब हो गया... सहबाज बाबू को किसी ने बहुत मारा है... वही राहिल के लोग थे..सर पर रोड लेकर मारा है हालत बहुत नाजुक है...

Continue...
Bhai ab maza aayega, sikander ab apane baap ko dund laye bas tab aur maza aayega kyoki Alina ne kha tha sikander par apne baap ka saya bhi nhi padne di h .par jab usse pta chale ki sikander apne baap ke sath h tab. Hasan mirza ki sab kuch chin le usse bada guroor h apne nawab hone ka .uspe attack kar ke uska khas angoti le le jaise hasan ne sikander se uski maa ko china h.
 
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Naik

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भाई स्टोरी का रिव्युव दो... जल्दी जल्दी मे अपडेट तब दूंगा जब आप को स्टोरी पसंद आएगी हुए..
सो पलज़्ज़ज़ दो लाइन कम से कम जरूर लिखना...इस से मुझे मोटिवेशन मिलती है स्टोरी को लिखने की


---



रात के तक़रीबन दस बज चुके हैं… मोहल्ले के बीचों-बीच धरना जारी है… लोग जोश में नारे लगा रहे हैं…

“हम अपना हक़ लेकर रहेंगे!”
“बिल्डर-माफिया मुर्दाबाद!”

लोगों की भीड़ को जोया लीड कर रही है — पर इस उबाल और जोश से दूर…

पर सिकंदर के कमरे मे...अंधेरे की चुप्पी में, सिकंदर अकेला लेटा था।

कमरे में उजाला सिर्फ एक पुराना सा रेडियो कर रहा है… और उस रेडियो पर एक उदास, रूह तक चीर देने वाला गाना चल रहा है…

“याद... याद... याद...
बस याद रह जाती हैं…” (गाने की आवाज़ धीमे धीमे कमरे में भरती जाती है…)

सिकंदर की आँखें छत पर जमी हैं… लेकिन उनमें कोई रंग, कोई रौशनी नहीं बची…

आज उसका जन्मदिन है।

पर कोई मोमबत्ती नहीं, कोई केक नहीं, कोई 'हैप्पी बर्थडे बेटा' नहीं...

आज वो दिन नहीं जिस दिन वो पैदा हुआ था…
आज वो दिन है जब वो पहली बार उसने जाना था बेहोसी क्या होती है... कैसा लगता है जब कोई भूख प्यास से बेहोस होकर गिर परता है... कैसा लगता है जब किसी के टांगे कापने लगती है कमज़ोरी के मारे.. कैसा लगता है जब कोई भूखे पेट... बोरियां उठाता है... कैसा लगता है... अपनी माँ से दुथकारे जाने पर...


---
फ़्लैश बैक


सुबह का वक्त…
अलीना, गुस्से में पागल होकर, सीढ़ियों से नीचे उतरती है।

अलीना (कड़क आवाज़ में):
"आज तुझे सज़ा मिलेगी, हरामजादे अब तू मेरे अलमारी से पैसे चुराने लगा... दिन व दिन तेरे करतूत बढ़ते जा रहे है.... कल ही साहबज़ ने मुझे बोला था... तू स्कूल मे लड़ाईयां करने लगा है और अब चोरी.... वो तो सुकर है सहबाज ने तुझे पैसे चुराते देख लिया नहीं तो मे बेचारे उन नौकरो पर इलज़ाम लगाती...

सिकंदर अपने हारा हुवा चेहरा लिए अपनी माँ के आंखों मे देख रहा था.... वो सायद उन आंखों मे कुछ ढूंढ़ रहा था.. पर वो उसे मिल नहीं रहा था... उसने अलीना से कुछ नहीं कहा.... कुछ कहने का कोई फ़ायदा नहीं था... अब अलीना ने उसके दिल का हाल जाना छोड़ दिया था.. अब अलीना ने उसे पराया कर दिया था

आज न तुझे खाना मिलेगा, न पानी… और पूरे दिन नौकरों के साथ बर्तन मांजेगा और जो काम नौकर करते है वो तुझे करना होगा.. यही तेरी सजा है... अलीना अपने तरफ से सिकंदर को सुधार रही थी.. पर उस बेवकूफ औरत क्या पता था की सहबाज कैसे उस से खेल रहा है.... उसके सिकंदर को उस से दूर करता जा रहा है...




---



---



सिकंदर की आंखें लाल हैं, जिस्म पर धूल है, हाथों में छाले हैं... और दिल में एक जला हुआ कोना।

सुबह से शाम हो चुकी है… लेकिन उसके पेट में एक दाना तक नहीं गया।
प्यास से होठ सूख चुके हैं, सांसों में थकावट की भारी चुप्पी है।

हवेली के बड़े से किचन में आज भी उसकी जगह नहीं थी…
उसकी थाली आज भी खाली थी…

नौकर लोग, जिन्हें वो पहले नाम से बुलाता था… आज उसी को हुक्म सुना रहे थे।



सिकंदर, बिना कोई जवाब दिए, बस सर झुकाकर काम करता रहा…
जैसे उसे किसी सवाल का हक़ ही नहीं…

उसका गला सूख रहा था… लेकिन कोई एक ग्लास पानी तक नहीं पूछता…

वो बर्तन मांजते-मांजते, किसी कोने में जाकर कभी थोड़ी देर आँखें मूँद लेता… फिर उठ कर दोबारा लग जाता…
उसकी कमर झुकती जा रही थी, कंधे जवाब दे रहे थे, पर किसी ने पूछा तक नहीं –
"तू ठीक है?"

कभी वो ही सिकंदर था जो हवेली के हर काम में सबसे आगे होता था…
पर आज किसी के लिए वो बस एक सज़ायाफ्ता नौकर था।


---



एक शानदार, बड़ी-बड़ी शीशे की खिड़कियों वाला ऑफिस…
जहाँ अलीना एक कॉन्फ्रेंस कॉल में बिज़ी है।

अलीना (प्रोफेशनल अंदाज़ में):
"Yes, Mr. Qureshi. Finalize the deal. I don’t want any more delays."

मीटिंग खत्म होती है… वो लैपटॉप बंद करती है…
एक गहरी सांस लेती है और अपनी कुर्सी से उठकर स्ट्रेच करती है।




उसका ध्यान पास टंगे कैलेंडर पर चला जाता है…

और जैसे ही उसकी निगाह उस तारीख पर जाती है —

"10 अप्रैल" —



अलीना (धीरे से फुसफुसाती है):
"10 अप्रैल...? आज... आज सिकंदर का जन्मदिन है…"

वो घरी मे समय देकती है तो 5 बज रहे थे... वो जल्दी से अपना पर्स उठाती है और ऑफिस से बाहर निकलती है रास्ते से वो एक केक और कुछ बल्लोंन और एक प्यारा सा खेलना.. लेती है.. सायद ये सिकंदर का गिफ्ट था.. अलीना अब तक नहीं समझीथी की उसके लाडले को खेलोना नहीं उकसा प्यार चाहिए...





_------------------





---



सिकंदर की हालत अब काबू से बाहर जा चुकी थी।
पेट खाली… होंठ सूखे… जिस्म काँपता हुआ… आँखों में गहराती अंधेरी थकावट.,.. उसके पैर काँप रहे थे.. क्यों की घुटनो मे जान नहीं बची थी...

हर सांस जैसे एक बोझ बन चुकी थी…
हर कदम जैसे पत्थर का हो गया था…

वो किसी तरह दीवार पकड़ कर अपने कमरे के दरवाज़े तक पहुँचता है…
दरवाज़ा भी ठीक से नहीं खोल पाता… और बेसुध होकर अंदर गिर जाता है।

ठक्..!
एक भारी आवाज़ होती है —
उसका जिस्म फर्श से टकराता है। पर मासूम के पास कोई नहीं था... जो उसे सहारा दे सके.. सायद आज उस खु*दा के आँखों मे भी आंसू आये होंगे... सायद इस लिए वो सिकंदर को अपने पास बुला लेना चाहता था..

सिकंदर अब बेहोश था … एकदम चुप… बर्फ की तरह ठंडा…

उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था, होंठ नीले, हाथ-पैर थमे हुए से…

कपड़ों में मिट्टी लगी थी, चेहरे पर थकान की दरारें थे...और दिल में अधूरी उम्मीद की खामोशी।


---

दूसरी तरफ – हवेली का बड़ा दरवाज़ा खुलता है…

अलीना, एक सजाया हुआ केक हाथ में लिए, अपने पूरे परिवार के साथ अंदर दाखिल होती है…

साथ में उसका भाई, भाभी, अम्मी और अब्बू भी हैं।
सबके चेहरों पर मुस्कान है… शायद आज वो ‘एक सरप्राइज़’ देने आए हैं…

अलीना (हल्की मुस्कराहट के साथ):
"आज उसे हँसते हुए देखूंगी..... अलीना बहुत ख़ुश थी...

जैसे ही सब सिकंदर के कमरे के पास पहुंचते हैं…

दरवाज़ा अधखुला पड़ा है… और अंदर घुप्प अंधेरा।

अलीना धीरे से अंदर झांकती है…

और अगले ही पल — उसकी चीख हवेली में गूंज उठती है…

अलीना (दहशत में):
"सिकंदर…!!!"

उसके हाथ से केक गिर जाता है…
फर्श पर "Happy Birthday लिखे शब्द भी टूट जाते हैं… जैसे उनकी तरह रिश्तों का वहम भी टूट जाता है…

अलीना दौड़कर उसके पास आती है… उसका चेहरा अपनी गोद में रख लेती है…

अलीना (थरथराती हुई):
"उठ ना … उठ … देख … अम्मी आई है… देख … अम्मी के साथ सब आए हैं…" क्या हुवा तुझे बाबू..

अम्मी, अब्बू, सब चौंक कर पास आ जाते हैं…

भाई (हक्का-बक्का):
"यार… ये तो… इसका जिस्म तो बर्फ की तरह ठंडा है…!"

भाभी (रोते हुए):
"हाय अल्ला**ह… ये क्या हो गया…?"(ये अभी अभी अपने मायके से आयी थी)

अलीना अब उसके गालों पर थपकियाँ देती है… पर कोई हरकत नहीं…हर पल के साथ अलीना की रूह उसके जिस्म को छोड़ रही थी... वो आज पहली बार अपने जिगर के टुकड़े को बेहोस देख रही थी...



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अलीना ज़मीन पर बैठी सिकंदर का सिर अपनी गोद में रखे पागलों की तरह रुदन करने लगती है।
उसके हाथ कांप रहे थे… चेहरा सूजा हुआ… और दिल ऐसे धड़क रहा था जैसे किसी ने उस पर हथौड़े मार दिए हों।

तभी पीछे से हसन मिर्ज़ा और साहबाज कमरे में घबराकर दाखिल होते हैं।

हसन मिर्ज़ा (दहशत में):
"ये… ये क्या हुआ उसे…?!"

अलीना (टूटती आवाज़ में):
"पता नहीं … क्या हुवा है मेरे बच्चे को कैसे बेहोस हो गया..… कुछ बोल ही नहीं रहा…"

हसन मिर्ज़ा फोन उठाते हैं और डॉक्टर को कॉल करते हैं —
"डॉक्टर साहब… जल्दी आइए…मेरा बेटा बेहोष हो गया है… हालत बहुत ख़राब है…"

तभी कुछ नौकर-चाकर कमरे में आ जाते हैं। हसन मिर्ज़ा उन्हें घूरते हैं —
"किसी को कुछ पता है ये क्या हुआ इसे?!"

एक बूढ़ा नौकर धीरे से बोल पड़ता है —
"बीबी जी… सुबह आपने ही तो कहा था कि छोटे उस्ताद को आज ना खाना देना है… ना पानी… और पूरे घर का काम करवाना है… शायद उसी से… अचेत हो गए होंगे …"

बस…!! जैसे किसी ने अलीना के सीने में आग लगा दी हो…वो सह नहीं पायी की उसके बेटे की ये हालत उसकी वजह से हुवी है...वो अपना सुध वुद्ध खो बैठती है.. और जोर से चिल्लाती है....या अल्ला56हहहहहहहहहहह

उसके दिल मानो फट गया हो...
वो धीरे-धीरे उस नौकर की ओर मुड़ती है…
उसकी आँखों में अब आँसू नहीं —
अब उसमें माँ की टूटी हुई आत्मा थी…

और फिर…

अलीना चीख पड़ती है —
क्या कहा तूने... सुबह से इसने कुछ नहीं खाया... तुम लोगों ने मेरे बच्चे को सुबह से भूखा रखा.... पुरे दिन मेरा बचा भूखे प्यासे काम करता रहा... अल्ला22ह.....सुबह से इसके पेट मे एक दाना तक नहीं गया...

अलीना (गुस्से से कांपती हुई):
हरामजादे.... मेरे बेटे को भूखा रखा तूने...

अलीना नौकर पर झपट पड़ती है…
उसे गंदी-गंदी गालियाँ देने लगती है…

"कमीने... साले हरामखोर...हराम के जाने.... निकल यहाँ से...
तुझे अगर मेरी एक भी बात समझ नहीं आई थी तो पूछ लेता…
पर तुझे क्या… मेरा बच्चा तेरा कौन सा अपना था …क्या जाता तेरा अगर उसे एक रोटी दे देता…!!!"

सिक्न्दर को अपने सीने से लगा कर... उठ जा सिकंदर मेरे लाल... अम्मी तुझे ऐसे नहीं देख सकती.. देख अगर तू नहीं उठा तो तेरी अम्मी की जान निकल जयेगी.... नहीं देख सकती तुझे ऐसे... ए मेरे खुदा... मेरे लाल को लोटा दे मुझे...




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हवेली – रात

डॉक्टर आ चुके हैं।
सिकंदर को ड्रिप पर लगाया गया है।
डॉक्टर ने चेकअप के बाद हसन मिर्ज़ा को देखा और कहा:

डॉक्टर (नरम लहज़े में):
“ये तो साफ़ है कि बच्चा बहुत ज़्यादा कमज़ोर हो चुका है…
शरीर में पानी की भारी कमी है…
लंबे समय तक कुछ ना खाना, थकावट और भावनात्मक दबाव… यही वजह है बेहोशी की।”

डॉक्टर रुकते हैं, फिर अलीना की ओर देखते हैं…
“पर सच बताऊँ… ये सिर्फ़ जिस्मानी कमजोरी नहीं है…
इसे सदमा लगा है... आप लोग इसके आस पास ज्यादा से ज्यादा समय बिताएं

डॉक्टर चला जाता है। कमरे में फिर से सन्नाटा छा जाता है।

अलीना सिकंदर के सिरहाने बैठी है।
उसके सामने उसका वही बेटा, जो कभी उसका आँचल पकड़कर चलता था, अब बिस्तर पर बेहोश पड़ा है…
या शायद होश में होते हुए भी इस दुनिया से बेग़ाना।

अलीना (धीरे से उसके हाथ को थामती है):
“सिकंदर… बेटा… उठ जा… देख मैं तेरे पास हूँ…
मैंने बहुत गलती की है… पर अब मैं तुझे छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी…”

पर सिकंदर की पलकें हल्की सी हिलती हैं, वो आँख खोलता है…
पर उसमें कोई जज़्बात नहीं होते।

वो उठकर बैठता है… बिना कुछ कहे…

अलीना:
“कुछ तो बोल… गुस्सा कर… डाँट ले मुझे…
पर ऐसे चुप मत रह बेटा… तुझसे ये खामोशी नहीं देखी जाती…”

समय बीतने लगा सिकंदर अब किसी से बात नहीं करता था.. अलीना उसकी आवाज़ सुनने के लिए तरश गई थी... अब उसे सिकंदर की ख़ामोशी खाने लगी थी... वो औफिस से आती और सिकंदर के आगे पीछे गहने लगती.. पर वो बच्चा अब बिखर चूका था... सायद उसने ऐसा कुछ देख लिया था जो उसे नहीं देखनी चाहिए थी...



वही दुसरी तरफ... साहबाज अब अपनी हदें पार करने लगा था... वो अब अलीना से अकेले मे या सिकंदर के सामने गन्दी बातें करने लगा था.. अलीना के दिमाग मे हसन मिर्ज़ा ने भर दिया था की सहबाज से प्यारा और समझदार बचा इस दुनयाँ मे नहीं है... वो सहबाज के सवालों को उसकी मासूमयत समझती थी.. उसे लगता था की सहबाज को बचपन से ही माँ का प्यार नहीं मिला इस लिए वो मुझमे अपनी माँ को ढूंढ़ रहा है...
सहबाज उसे गलत तरीके से छूता.. पर वो उसको उसका प्यार समझती... या फिर उसे भी मज़ा आ रहा था.. ये तो रब जनता है....पर ये बात पक्की थी अलीना उसे मना नहीं करती थी....

एक दिन ऑफिस जाने से पहले अलीना सिकंदर को उसके कमरे मे मिलने आई.. उसके पीछे सहबाज भी था...अलीना ने सिकंदर को गले लगाया पर सिकंदर का वही ठंढा वार्ताब... फिर सहबाज आकर अलीना के गले लग जाता है.. वो अलीना के स्थन को हाथ लगता है अलीना उसे हटाने या डाठने के वजाहय उसके तरह मुस्कुराते हुवे देख रही थी वी ये भी भूल गई थी की सिकंदर भी उनके साथ खरा है...

सहबाज - अम्मी आपने वादा किया है.. की आप ऑफिस से आकर मुझे दुधु पिलाओगी... मेने कभी दुधु नहीं पिया है..

अलीना ( उसके बालों मे हाथ फेरते हुवे ) - पक्का वादा.. मेरा बच्चे को अम्मी की दुधु पिने का मन कर रहा है.. आज पक्का... उनके बातों से जाहिर था.. ये पहली बार नहीं हुवा है... हाँ पहली बार सिकंदर के सामने जरूर हुवा था...

तभी अलीना को आहसास होता है सिकंदर भी वही है.. वो सहबाज को अपने दे दूर करते है और आँखों से ईसारा करती है... सहबाज उसके इसारे को समझ जाता है.. और मुस्कुराते हुवे कमरे से चले जाता है... सिकंदर ये देख कर दंग रह जाता है.. अलीना उसके चेहरे को पेड़ चुकी थे.. वो समझ गई की सिकंदर को ये अच्छा नहीं लगा पर ये बेवकूफ़ औरत को लग रहा था की सिकंदर को सहबाज दे जलन हो रही है इस लिए उसका चेहरा उतर गया है.... खैर अत्तित का पन्नों पर पूर्ण विराम लगता है और सिकंदर खुद को अपने कमरे मे पाता है... उसके आँखों से आंसू की बुँदे टपक रही थी...



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| शाम का समय हो गया था| मोहल्ले के बीचों-बीच धरना | माहौल भावुक और खामोश बगावत से भरा हुआ]

कमरे की बत्तियां बुझी हुई थीं। बस एक कोने में रखा पुराना रेडियो चल रहा था, जिसकी धीमी आवाज़ में वही गाना गूंज रहा था:

"याद... याद... याद बस यादें रह जाती हैं..."

सिकंदर अब बिस्तर पर नहीं था।

सिकंदर काले कुर्ते-पायजामे में तैयार हो चुका था। उसका चेहरा शांत था… लेकिन आंखों में एक ठहरा हुआ दर्द, एक ठहरी हुई आग साफ़ झलक रही थी।

वो अपना इत्र लगाता है, , फिर खामोशी से कमरे का दरवाज़ा खोलकर बाहर निकलता है।

बाहर का दृश्य:

धरने की भीड़ में हलचल थी। लोग “इंसाफ़ दो, इंसाफ़ दो!” के नारे लगा रहे थे। ज़ोया मंच के पास खड़ी थी। रुक्सार और अली भी वहीं थे। तभी सबकी नजर सामने से आते सिकंदर पर पड़ी।

उसका चेहरा थका हुआ था, लेकिन चाल में एक अलग ही ठहराव था।

रुक्सार उसे पास बुला कर बोली बोली:

रुक्सार: “सिकंदर बेटा… कहां जा रहे हो इस वक़्त?”

सिकंदर (धीमी आवाज़ में, बहुत शांत लहजे में):
"दुआ करने… जमा मस्जिद जा रहा हूं।"

ज़ोया उसे पलभर तक देखती रही।। वो बिना कुछ कहे उसके पास आई।

ज़ोया (धीरे से):
“मुझे भी ले चलो… मैं भी दुआ मांगना चाहती हूँ.. अपने और इन लोगों की सलामती के लिए..

सिकंदर उसकी तरफ एक पल देखता रहा… फिर बिना कुछ कहे मोटरसाइकिल की चाबी निकलता है।



ज़ोया जल्दी से अपना दुपट्टा ठीक करती है। अली कुछ कहने ही वाला होता है लेकिन रुक्सार उसे आंखों से रोक देती है।

ज़ोया और सिकंदर, दोनों बिना कुछ बोले, बाइक पर सवार हो जाते हैं। सिकंदर बाइक स्टार्ट करता है। ज़ोया उसकी पीठ से हल्के से टिक जाती है।

बाइक धीरे-धीरे चल पड़ती है… मोहल्ले के रास्तों से गुजरते हुए… धरने के नारों के बीच… उस पुरानी, जानी-पहचानी मगर अब अजनबी हो चुकी अहसास के साथ


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हवेली का ड्राइंग रूम | रात का समय | सब लोग साथ बैठे हैं

हवेली में गर्मा-गर्म चाय के साथ सब बैठकर बातें कर रहे थे। हँसी-मज़ाक चल रहा था। भाभियाँ हल्की-फुल्की चुहल कर रही थीं। सहबाज सोफे पर पसरा था, और अम्मी साइड में बैठी हुई थीं।

अचानक, माहौल में हल्की-सी चुप्पी आ गई जब अलिना की भाभी से अम्मी ने यूँ ही पूछ लिया:

अम्मी:
"बहु, दोपहर में तुम कहां गई थीं? नजर ही नहीं आईं पूरे दिन..."

भाभी ने धीरे से मुस्कुराते हुए जवाब दिया:

भाभी:
"अम्मी… मस्जिद गई थी… दुआ करने। आज सिकंदर का जनमदिन था ना। अब किसी को याद रहे या न रहे, मैं तो उसे बहुत चाहती थी, बहुत… उसकी हर बात, हर आदत… सब याद है मुझे। मैं उसके जनमदिन को कैसे भूल सकती हूं?"

ये शब्द, एक तीर की तरह जाकर अलिना के सीने में धँस गए। जैसे किसी ने उसकी माँ होने की हैसियत पर तमाचा मार दिया हो।

– वो चुप है… उसकी नज़रें झुकी हुई हैं।

उसका हाथ काँप रहा था। दिल की धड़कनें तेज़ हो गई थीं। उसके कानों में सिर्फ भाभी के वो शब्द गूंज रहे थे –
"मैं उसके जनमदिन को कैसे भूल सकती हूं…"

अचानक, अलिना उठती है। हड़बड़ाहट में चाय का कप गिर जाता है, कोई कुछ पूछता उससे पहले ही वो अपने बैग की तरफ लपकती है, चाबी उठाती है और दरवाज़े की तरफ बढ़ती है।

सब चौंकते हैं। सहबाज पूछता है:
"अरे अम्मी कहां जा रही हैं इस वक़्त?"

अलिना -
"मुझे कुछ याद आ गया है… बहुत जरूरी है जाना।"


कार के अंदर | अलिना ड्राइव करते हुए | आँखों में आंसू
सड़क पर उसकी गाड़ी तेज़ चल रही थी… लेकिन उसका मन उससे भी तेज़ भाग रहा था… पीछे की तरफ, अतीत की ओर।

अलिना (अपने आप से):
"कैसे भूल गई मैं… कैसे… आज उसका जनमदिन था…







"मुझे तुझसे कुछ नहीं चाहिए मेरे खुदा… बस एक बार… एक बार मेरी औलाद मुझे देखे… शायद मुझे माफ़ कर दे… या कम से कम मेरी आँखों में देख कर नफ़रत ही कर ले… पर कुछ तो कहे… कुछ तो सुने…" अगर वो मुझे मारे पीटे... जो चाहे वो करें बस एक आकर मुझे देख ले...



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[सीन शुरू – ज़ामा मस्जिद के बाहर की गलियाँ | रात का वक्त]

अलिना अपनी कार से उतरती है। आसमान में हल्की सी ठंडक है, गीली मिट्टी की खुशबू फैली हुई है। मस्जिद के आसपास की तंग गलियाँ पीली लाइटों से जगमगा रही हैं। लोग इधर-उधर जा रहे हैं, बच्चे खेल रहे हैं, कुछ दुकानदार अपनी दुकानें समेट रहे हैं।

(कैमरा अलिना के चेहरे पर – उदासी और बेचैनी साफ झलक रही है।)

वो धीरे-धीरे मस्जिद की तरफ बढ़ती है, हील की हल्की-हल्की आवाज़ पत्थर की गलियों में गूंज रही है।


तभी... सामने से एक काले लिवास में एक लंबा, बेहद खूबसूरत जवान आता है… उसके घुंघराले बाल हवा में उड़ रहे होते हैं… नीली आंखें, चेहरे पर ग़ैरमामूली सुकून… रौब ऐसा कि भीड़ अपने आप रास्ता दे रही हो।

अलिना का दिल एक पल के लिए रुक जाता है… सांसें थम जाती हैं…

(धीरे से फुसफुसाती है):
"सिकंदर…?"

वो वहीं थम जाती है। नज़रों को यकीन नहीं होता… उस लड़के के चेहरे में कुछ था… कुछ जाना-पहचाना… जो सीधा उसके दिल से जुड़ता था।

वो बिना अलिना की तरफ देखे आगे बढ़ता है, और भीड़ में खो जाता है

अलिना एक झटके से पीछे मुड़ती है… उसकी नज़रों ने उसे ढूंढना चाहा… लेकिन…

(हल्की सी सिसकी लेती है):
"कहां चला गया…? क्या मेरा वहम था…?"

वो खुद को समझाती है, पर आंखें उस भीड़ में भटक रही होती हैं… शायद दिल अब भी उम्मीद में था कि एक बार फिर वो चेहरा दिख जाए।



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अलीना दुवा करके महज़ीद से बाहर आती है तभी उसके फोन पर कल आता है....मुस्ता क़ कालिंग...

अलीना फ़ोन उठाते हुवे...- हाँ मुस्ता क़ साहब बोलिए..

CEO - मैडम गजब हो गया... सहबाज बाबू को किसी ने बहुत मारा है... वही राहिल के लोग थे..सर पर रोड लेकर मारा है हालत बहुत नाजुक है...

Continue...
Bahot badhiya shaandar update
Bhabi ki jali kati ya fir taana Marne se sahi Alina ko yaad tow aaya ki aaj uske jigar ke tukde Janam din h or ooper wala bhi shayad chahta h ki dono maa beta me Jo huwa ho sab khatam ho jaye tabhi uski Dua sun li or jama masjid me sikandar ki jhalak hi dikhwa di
Shehbaz ki pitayi ho gayi bada ghamad tha nawab ko apne beta per ki woh sab sambhal lega
Baherhal intizar rahega Shehbaz ke pitne wala scene detail se padhne ka
Bahot badhiya likh rehe ho aaj hi saare update padhe bahot behtareen kahani jaa Rahi h
 
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