Superb updateहाॅल पहुंच कर जिस सिंगल सोफे पर माॅम बैठी हुई थी , उस पर मैं बैठ गया । संजय जी डैड के पहलू में बैठे अपनी बीवी उर्वशी , बहन मधुमिता और रीतु से बातों में मशगूल थे । डैड कोई खबरिया चैनल देखने में व्यस्त थे । मैंने फिर से संजय जी की ओर नजरें फिराई । वो हकीकत में इतना सुन्दर था - वैसा ही सजा धजा था - कि फिल्म स्टार जान पड़ता था ।
मन ही मन मैं सोच रहा था , और कुढ़ भी रहा था , कि कमीना अपने खुबसूरत थोबड़े की वजह से ही कितनी औरतों का मान मर्दन कर चुका होगा । जरूर गिनती करना भी मुहाल होगा । औरतें बलिहार जाती होगी उस पर ।
औरतें उतनी खुश नहीं होती जबकि उन्हें अपनी पसंद का मर्द मिलता है जितनी वो तब खुश होती है जबकि उन्हें हर किसी की पसंद का मर्द मिलता है । और संजय जी के हर किसी की पसंद का भेद होने में क्या कसर थी ।
कभी मर्द का आकर्षण उसकी मर्दानगी में होता था , उसकी मूंछों में होता था , आज उस के जनानापन में होता है , लड़कियों जैसी लम्बे बाल रखने में होता है । पता नहीं आजकल की लड़कियों के पसन्द ऐसे लड़के क्यों होते हैं ?
वजह जरूर वियाग्रा था जो पुराने जमाने में नहीं होती थी और जो किसी को भी मर्द बना देती थी ।
वियाग्रा के अलावा मर्दाना ताकत हासिल करने में जो आधुनिक तरीके मैंने सुने थे , वो थी :
मेंढक की हडि्डयों को सुरमे जैसा बारीक पीस कर फांक जाओ ।
गधी के दूध में चिमदागड़ का खून घोलकर पियो ।
शेर के अंडकोष का ब्रेसलेट बनवा के पहनो ।
इतने तरीके तो मैंने सुनें थे , जो कि शहद में बादाम घोंट के पीने , दुध में केसर उबाल के पीने , घोंघे खाने जैसे पुरानी तरिको पर हावी थे , अभी और भी होंगे जिनकी मुझे खबर नहीं थी ।
उर्वशी गहरी लाल रंग की साड़ी पहनी हुई थी जिसमें वो हमेशा की तरह हाॅट और सेक्सी दिख रही थी ।
रीतु के बारे में कुछ भी कहना अतिश्योक्ति ही होगी । जगमग जगमग , ताजे खिली हुई कली की तरह , नेचुरल ब्यूटी ।
मधुमिता भी निहायत खुबसूरत थी और मेरी पसंद की हर चीज उसमे थोक में थी । जैसे कि लम्बा कद , छरहरा बदन । तनी हुई सुडौल भरपूर छातियां जो पुरी तरह से ढकी होने पर भी नुमायां जान पड़ती थी । करारी कमर , भारी नितम्ब । लम्बे सुडौल गोरे चिट्टे हाथ पांव , खुबसूरत नयन नक्श , लम्बे रेशमी बाल ।
एण्ड वाट नाट !
वो एक वी शेप खुले गले की स्कीवी और खुली छतरी जैसी स्कर्ट पहने थी । स्कर्ट की बेल्ट बहुत नीचे थी और स्कीवी उसके असाधारण रूप से उन्नत वक्ष की वजह से ऊंची उठी हुई थी । और यूं उसका सुडौल , जाफरान मिले मक्खन की रंगत का पेट कम से कम दस इंच नंगा था । स्कीवी का वी इतना गहरा था कि जरा सी कोशिश से गिरहवान में बहुत दूर तक झांका जा सकता था ।
इन लड़कियों को देखना नयन सुख अभिलाषियों के लिए तो लाटरी निकलने जैसा था , कोई भोग भी लगा पाया हो तो उसकी तकदीर मर्दों के लिए काबिलेरश्क थी ।
" कहां खो गए ।"
" सारी " - मैं हड़बड़ा कर बोला । मैंने देखा संजय जी मेरी ओर चेहरा किए मुस्करा रहे थे ।
" कहीं नहीं । क्या बातें हो रही है ?" - मैंने मुस्करा कर कहा ।
" बातें मैं कहां कर रहा हूं भाई... बातें तो ये औरतें कर रही है , मैं तो सिर्फ इनकी हां में हां और ना में ना मिला रहा हूं ।"- उन्होंने हंसते हुए कहा ।
" हां भाई आप तो सिर्फ पंचायती कर रहे हो... बातें कहां कर रहे हो ।"- मधुमिता ने अपनी आंखें तरेरते हुए कहा ।
तभी माॅम नाश्ता वगैरह ले कर आ गई । माॅम ने नाश्ता लगाते हुए कहा -" आप लोग खाना खा कर ही जाना ।"
" अरे नहीं आन्टी , आपको कष्ट करने की जरूरत नहीं है... इतना हैवी नाश्ता के बाद इतनी जल्दी खाना थोड़ी ही खाया जाएगा.।"- संजय जी ने माॅम को कहा ।
" नहीं नहीं... मैं कुछ नहीं सुनने वाली हूं , आप लोग पहली बार हमारे यहां आए हुए हैं खाना तो खाना ही पड़ेगा ।" माॅम ने जोर देकर कहा ।
" आन्टी अभी टाइम बहुत ज्यादा हो गया है.. मैं प्रोमिस करती हूं अगली बार हम जरूर भोजन करके ही जाएंगेे ।"- उर्वशी ने माॅम को समझाते हुए कहा ।
" अब जैसी तुम्हारी इच्छा बेटा.. लेकिन याद रखना अगली बार बिना खाए नहीं जाने दुंगी ।"
फिर नाश्ता का कार्यक्रम चलने लगा । इसी बीच हमारी हल्की फुल्की बातें भी होती रही । मैं मधुमिता से बातें करना चाहता था लेकिन यहां सम्भव दिख नहीं रहा था ।
थोड़ी देर बाद उर्वशी ने माॅम से कहा -" आन्टी मैं चाहती हूं कि जब यहां आई हुई ही हूं तो क्यों न श्वेता के माॅम डैड से भी मिल लूं.. अगर श्वेता को मालूम हुआ कि हम यहां आकर उसके घर नहीं गये तो उसे बुरा लग सकता है ।"
" हां हां क्यों नहीं... जरूर हो आओ ।"- माॅम ने कहा ।
कुछ समय बाद रीतु उर्वशी और संजय जी और मधुमिता को लेकर चाचा के घर चली गई । माॅम जुठे बर्तन लेकर किचन चली गई । डैड तो अपने ही कार्यक्रम टीबी देखने में व्यस्त थी और मैं उपर छत पर चला गया ।
छत पर क्लासिक का सिगरेट सुलगाया और उन हसीन तरीन औरतों के बारे में सोचने लगा जिनके साथ हमबिस्तर होने का फिर मुझे गाहे-बगाहे हासिल होता रहा था ।
आप सोचते होंगे कि मैं हमेशा औरतों के बारे में ही सोचता रहता हूं । इस इल्जाम के जवाब में आपके खादिम की अर्ज है कि ये एक गलत और बेजा इल्जाम है कि मैं हमेशा औरतों के बारे में सोचता हूं - हमेशा तो मैं सोचता ही नहीं - अलबत्ता इतना तो शर्तिया कबूल करता हूं कि जब सोचता हूं तो औरतों के बारे में सोचता हूं ।
और क्या मैं अकेला सोचता हूं ।
मुझे उर्वशी और श्वेता दी के अलावा सात हसीनाओं का अभिसार सुख प्राप्त हुआ है । जिनमें एक में तो मेरा मरहूम दोस्त अजय भी शामिल था । अजय की और मेरी सोच लगभग लगभग एक समान ही थी । हमने किसी भी औरत के साथ कभी जबरन नहीं किया और ना ही कभी किसी कोठे पर गये । जिन औरतों के साथ भी हमबिस्तर हुआ वो औरतों के राजी खुशी , उनकी इच्छा के अनुसार हुआ । बलात्कार और औरतों के प्रति हिंसा का मैं सख्त विरोधी था । सेक्स के मामले में मेरा यही सोच रहा कि मियां बीवी राजी तो क्या करेगा काजी ।
मेरी सोच मधुमिता की आवाज सुनकर भंग हुई ।
" हल्लो ।"
" हल्लो " - मैं मुस्कुराता हुआ बोला -" वैलकम ! प्लीज़ ।"
" थैंक यू "- अपने मोतियों जैसे खुबसूरत दांत चमकाती वो बोली ।
" क्या बात है ! बड़ी जल्दी आ गए ।"
" सभी नहीं सिर्फ मैं आ गई । मुझे वहां बोरियत लग रही थी । यहां आई तो तुम्हारी मम्मी ने कहा छत पर हो , सो चली आई ।"
" बहुत अच्छी की ।"- मैंने चेहरे पर गोल्डन जुबली मुस्कराहट लाते हुए कहा -" मैंने तुम्हें कई बार फोन लगाया था लेकिन हर बार नो रिचेबल बताता रहा... कहीं नम्बर तो नहीं चेंज कर ली ।"
" नहीं तो । सेम नम्बर है... अभी लगा कर देखो ।"
मैंने उसको फोन लगाया फिर से वही सेम नो रिचेबल । वो मेरे करीब आई और अपनी मोबाइल नंबर चेक करने लगी । एक नम्बर गलत था । बीच के नंबरों में एक में सात की जगह आठ टाइप हो गया था । मैंने नम्बर करेक्ट किया ।
उसके इतने करीब आने से उसकी शरीर से आती हुई खुशबू मुझे मदहोश करने लगी । मैंने उसकी तरफ देखा वो मुस्कराते हुए बोली -" तुमने नम्बर ही रोंग लिख लिया था ।"
" हां ।"- मैंने मुस्करा कर कहा -" वैसे बात क्या है ! आज हजार वाट के वाल्व की तरह दमक रही हो ।"
" ठीक पहचाना । आज मैं बहुत खुश हूं ।"
" वो तो दिख रहा है । क्या बात है शादी कर रही हैैं ।"
" नो यार ।"
" तो हनीमून वजह होगा इतनी खुशी का ।"
" हनीमून ! वो तो शादी के बाद होता है । नो ।"
" नो । कभी ऐसा दकियानूसी रिवाज होता था , अब नहीं होता । अब हनीमून शादी का मोहताज नहीं रहा । वो कभी भी हो सकता है । बस हनी को कबूल होना चाहिए ।"
" क्या नानसेंस बोल रहे हो ।"
" इट्स ए मैटर आफ ओपिनियन हनी ।"
" यू आर ए सन ऑफ ए विच ।"
" दि ओरीजनल , हनी । वैरी फर्स्ट आफ दि काइंड । इस जगत प्रसिद्ध विच ने जितने सन पैदा किए , उनमें से अव्वल ।"
" मैंने क्या तुम्हरा तारीफ किया ?"
" नहीं किया तो समझिए बिना किए हो गया । आदमी का बच्चा हो तो अव्वल हो , वरना न हो ।"
वो कुछ क्षण खामोश रही और चेहरे पर उलझन के भाव लिए अपलक मुझे देखती रही । फिर चित्ताकर्षक ढंग से मुस्कुराई । अभी वो कुछ बोलती कि हाॅल से उर्वशी की आवाज आई । हम दोनों नीचे हाल चले आए । वो लोग चाचा के घर से लौट आए थे । जाते जाते संजय जी ने मुझे और मेरी फेमिली को अपने घर आने का निमंत्रण दिया । उन्होंने अपने उस आफिस का भी ठिकाना दिया जहां वो अक्सर पाए जाते हैं ।
उनलोगो के जाने के बाद हमने कुछ समय टीबी देखने में बिताया फिर रात के डीनर के पश्चात अपने अपने कमरे में चले गए । मै अपने कमरे में प्रवेश कर अपने पहने हुए कपड़े चेंज किया और एक ढीला सा पजामा और बनियान पहन कर सिगरेट सुलगाने लगा । तभी मेरी नजर मेरे बिस्तर के बगल में पड़ी हुई कुर्सी पर पड़ी । वहां मैंने जो नाइटी माॅम और श्वेता दी के लिए खरीद कर रखी थी , गायब थी ।
nice oneदोपहर बाद जब मैं घर पहुंचा तो माॅम ने खाना लगाया । रीतु अपनी सहेली काजल से मिलने गयी थी । मैं अपने कमरे में गया । कुछ देर आराम करने करने के बाद पैराडाइज क्लब चला गया । आज कुलभूषण खन्ना नहीं आया था । वहां ड्यूटी देने के बाद मैंने कुलभूषण खन्ना के असिस्टेंट से एक दिन की छुट्टी लेकर घर आ गया । आठ बज गए थे लेकिन अभी तक रीतु आईं नहीं थी । माॅम से पूछा तो उन्होंने कहा वो नौ बजे तक लौटोगे । माॅम ने खाने के लिए पुछा तो मैंने रीतु के आने तक इन्तजार करने के लिए कहा ।
मैं अपने कमरे में गया । कपड़े बदले और छत पर टहलने लगा । तभी मुझे याद आया कि मैंने अपने ब्लेजर और पैंट तो लांड्रिंग में दिए हैं, वो तो मैं लाना ही भूल गया । मैंने रीतु को फोन लगाया और उससे पूछा वो अभी काजल के पास ही है या वहां से निकल गई है तो उसने कहा आधे घंटे में निकल रही है । मैंने उससे कहा कि आते समय रास्ते में ही जो लाउंड्री है और उससे मेरी बात करा देना और मेरी कपड़े लेती आना ।
पहले तो बड़ी आना कानी करी कि वो लांड्रिंग वाला उसके आते वक्त रास्ते में नहीं पड़ेगा , वो जगह दुर है , वो बस से नहीं आयेगी , बस से आने से कपड़े खराब हो जायेंगे , गर्मी से मेरी पोलिस उत्तर जायेगी , कैब से आयेगी , कैब के भाड़े के पैसे नहीं हैं , तब मैंने बड़ी मुश्किल से उसे कपड़े लेकर आने के लिए तैयार किया ।
रीतु को किसी बात के लिए convince कराना बड़ी टेड़ी खीर है । ये शर्तिया अपने हसबैंड को नाकों चने चबवा देगी । मैं जा कर अपने बेड पर लेट गया और पिछले दिनों के बारे में सोचने लगा ।
करीब एक आध घंटे बाद रीतु आईं और मेरे आयरन किए हुए कपड़े सलिके से बिस्तर पर रख दी । मैंने उसे देखा वो इस वक्त एक हरे रंग का सलवार सूट पहनी थी । उसके शरीर से आती वही जानी पहचानी खुशबू । हमेशा की तरह जगमग जगमग ।
" बस में तुम्हारी पालिश तो नही उतरी ।" मैंने कहा ।
" नहीं उतरी ।" वो खड़े खड़े ही बोली ।
" अंदेशा तो बहुत था तुम्हें ।"
" हां । अलबत्ता उससे ज्यादा बुरी बात हो गई ।"
" क्या ?" मैं सशंकित स्वर में बोला ।
" बस में कुछ लफंगे सवार थे ।"
" ओहो !" - मैं हमदर्दी भरे स्वर में बोला - " उन्होंने तुम्हें छेड़ा होगा , गन्दे इशारे किए होंगे , फब्तियां कसी होंगी ।"
" इससे भी बुरा किया कमीनों ने ।"
" अच्छा !" क्या किया उन्होंने ?"
" उन्होंने मुझे हर तरह से नजर अंदाज कर दिया , मेरी तरफ झांका भी नहीं , पीठ फेर ली मेरी तरफ से ।"
" यह तो वाकई बुरा किया कमीनों ने ।"
" हां न । आप यदि मुझे कैब से आने को बोले होते तो क्या होती मेरी इतनी बेइज्जती ।" " आप ..........."
उसकी बक बक शुरू हो गई थी और मैं चुपचाप उसे देखे जा रहा था । मैं जानता था कि वो कैब से ही आयी होगी लेकिन उसे तो मुझसे अपनी बक बक करनी थी । मुझे तो उसकी बक बक भी बहुत प्यारी और सेक्सी लगती थी । उसके बोलने का अंदाज , उसके लबों का हिलना, उसके हाथों का झटकना, बोलते वक्त उसके लटो का उसके गालों को चूमना । मैं तो जैसे कहीं खो गया था ।
" लगता है अभी तक आपने डीनर नहीं किया ।"
" क.. क्या कहा ? " मैं जैसे होश में आया ।
" मैंने कहा लगता है अभी तक आपने डीनर नहीं किया ।"
" कैसे जाना ?" मैं हकबकाया ।
" आंखों ही आंखों में मुझे निगल जाने की कोशिश जो कर रहे हो ।"
" सिर्फ कोशिश कर रहा हूं ।" - मैंने नकली आह भरी - " कोशिशें तो मैं और भी बहुत करता हूं लेकिन कामयाब कहां हो पाता हूं ।"
" कयी बार कोशिश में कामयाबी से ज्यादा मजा आता है ।"
" वो कैसे ?"
" कोशिश इनसान बार बार करता है । कामयाबी के बाद वो कहानी खतम हो जाती है ।"
" क्या बात है , आज तो बड़ी काबिलियत भरी बातें कर रही है ।"
" मैं अक्सर काबिलियत भरी बातें करती हूं , खास तौर से सूर्य अस्त होने के बाद ।"
" गुड । अब अपनी प्रवचन बन्द कर मुझे जोरों से भुख लगी है ।"
" तो मैंने आपको खाने से रोका है कब से खुद ही बक बक किये जा रहे हो ।" वो अपनी आंखें तरेरती हुई बोली ।
फिर खाना खाने के बाद मैं अपने कमरे में आ गया और आगरा जाने के लिए अपने बैग तैयार किया और फिर बिस्तर के हवाले हो गया ।
सुबह साढ़े आठ बजे होंगे जब मैं गाजियाबाद श्वेता दी के फ्लेट पहुंचा । जीजा अपने कमरे में आराम कर रहा था । श्वेता दी तैयार हो गई थी । उन्होंने पीले रंग की साड़ी पहनी हुई थी । बिना आस्तीन का ब्लाउज जिसमें उनके गोरी माशल भुजाएं काफी आकर्षित लग रही थी । ब्लाउज का गला v आकार का था जिसमें से उनकी cleavage कुछ हद तक नुमाइश हो रही थी । गले में मंगलसूत्र के अलावा बदन पर कुछ और भी गहने पहन रखी थी । उनका गदराया हुआ यौवन किसी भी इन्सान को घायल करने के लिए पर्याप्त था ।
मैंने नाश्ता वहीं किया फिर जीजा से इजाजत लेकर हम दोनों कार लेकर वहां से निकल गये । मैं ड्राइव कर रहा था और वो आगे वाली सीट पर मेरे बगल बैठी थी । कुछ दुर तक हम शान्त ही रहे । जब कार भीड़ भाड़ वाले एरिया से बाहर निकल मेन रोड पर आई तब श्वेता दी ने कहा ।
" अब बताओ क्या बात है "
" कैसी बात ? " मैंने नजरें स्क्रीन से हटाकर उनकी तरफ देखा ।
" जब तुम राजीव से प्रायवेट बात करने को बोल कर मुझे वहां से हटने के लिए बोले थे।"
" ओह ! वो । " मैं वापस नजरें स्क्रीन पर रखते हुए कहा - " " बता दुंगा , थोड़ी धीरज रखो ।"
" नहीं । अभी बताओ ।"
" वो काफी लम्बी कहानी है , इस वक्त कार ड्राइव करते हुए कैसे बोल सकता हूं । एक काम करते हैं वहां पहुंच कर बताता हूं । वहां अकेले में हमें काफी समय मिलेगा ।"
" ओके ।" बोलकर वो चुप हो गई । कुछ देर बाद वो एक्साइटेड हो कर बोली - " आज कितने दिनों के बाद न हम किसी पार्टी में शामिल हो रही हैं , कितना मजा आयेगा । है ना ।"
" हां । तुम्हारे शादी के बाद पहली बार ।" - मैंने मुस्कराते हुए कहा ।
" हां । जब हम छोटे थे कितने मस्ती करते थे , कितने झगड़ते थे । "- वो कहीं खोई खोई सी बोली । - " और अब जैसे लगता है मैं अपना बचपन भुल गयी हूं ।"
" अच्छा तो है , अब शादी शुदा जिंदगी की लुत्फ उठा रही हो । इतना अच्छा प्यार करने वाला पति मिला है । वैसे भी जिन्दगी का चक्र तो हमेशा बदलते रहता है ।"
" हां । " वो चुपचाप सी हो गई ।
" सब ठीक है ना ? "
" हां । सब ठीक ठाक है ।" - वो अचानक से अलग रंग में आते हुए बोली - " छोड़ो वो सब , कोई गाना वाना लगाओ । किशोर कुमार के मस्त गाने ।"
करीब एक घंटे बाद वो गाने से बोर होने लगी तो मैंने कहा अगर नींद आ रही हो तो सो जाओ । मगर उसनेे मना कर दिया । और खुद ही तरन्नुम में शायरी करने लगी -
" फिर मुझे दीदा - ए - तर याद आया ,
दिल जिगर तश्रना ए फरियाद आया ,
दम लिया था ना कयामत ने हनोज ,
फिर तेरा वक्त ए सफ़र याद आया । "
" वाह ! वाह । शायरी की तुकबंदी तो बहुत अच्छी है लेकिन मुझे समझ नहीं आया ।" मैंने उनको शाबाशी देते हुए कहा ।
वो हंसते हुए बोली - " मुझे उर्वशी ने सुनाया था पर सच कहूं तो मुझे भी इसका अर्थ नही पता ।"
" उर्वशी ऐसी भी शायरी करती है मगर मुझे तो ..." मैं अचरज से बोला ।
" क्या मुझे तो ? " वो प्रश्न सूचक दृष्टि डाली ।
" नहीं , कुछ नहीं ।"
" तुम कुछ छुपा रहे हो , मेरी कसम बोलो ।"
" मुझे तो बड़ी सिम्पल और अच्छी अच्छी शायरी भेजती हैं ।" मैंने धीरे से कहा ।
" क्या मतलब ? - वो अचरज से बोली - " उर्वशी तुम्हें शायरी मैसेज करती है ।"
" हां । इसमें अचरज की बात क्या है , तुम्हीं ने तो कराई थी हमारी जान पहचान , भुल गयी ? "
" नहीं ।" वो अभी भी शंकित नजरों से मुझे घुर रही थी - " वैसे वो क्या क्या मैसेज करती थी ? "
" अरे यार ! क्यों हलकान होती है , वहीं सिम्पल साधारण सी मैसेज ।"
" मुझे दिखाओ ।" मुझे घुरते हुए बोली ।
" ठीक है बाबा ! आगरा चल के देख लेना ।"
वो आश्वस्त नहीं हुई ।
" क्या अब भी , मेरा मतलब शादी के बाद भी मैसेज करती है ? "
" हां । अभी भी करती है । परसों ही तो किया था ।" - मैंने उसे और छेड़ते हुए कहा ।
" और तुम ? क्या तुम भी करते हो ? "
" मैं भी करता हूं ।"
अब श्वेता दी के मन मन्दिर में उथल-पुथल मच गई थी । वो काफी देर तक चुप रही फिर बोली -
" अच्छा परसों वो क्या मैसेज की थी ? "
" अरे यार ! कितनी शकी हो । मैंने कहा न आगरे में बता दुंगा ।"
" नहीं । परसो वाली मैसेज बताओ बाकी वहां बता देना ।" उसने जीद पकड़ ली ।
मैं सोचता हुआ बोला - " मुझे पुरी तरह से याद नहीं आ रहा है ।"
" कुछ तो याद होगा वहीं बताओ ।"
" ठीक है , मुझे सोचने दो ।"
वो बैठे बैठे ही पहलु बदल रही थी और मैं ड्राइव करते हुए थोड़ी सोचने की मुद्रा में आ गया ।
" अभी याद नहीं आ रहा है ।" मैंने ललाट सहलाते हुए कहा ।
" चुपचाप सीधी तरह से बताओ नहीं तो अभी गाड़ी से ढकेल दुंगी ।" वो आंखें तरेरते हुए बोली ।
" हद है यार । ठीक है याद करने की कोशिश करता हूं ।" - थोड़ी देर बाद बोला - " हां , कुछ कुछ याद आया , बोलता हूं ।"
" सुनो ।"
वो मुझे अपलक देखती रही ।
" तेरी बु...."( मैं यहां बु बोलकर अटक गया जैसे कि मैं भुल गया हूं )
वो चौंकी ।
" तेरी बुटदार चु...." ( मैं अब चु पर अटक गया )
वो इस बार अपनी आंखें फैलाई । ये देख मैं जल्दी से बोला -
" तेरी बुटदार चुनर को देख कर मेरा झां....( अब मैं झां पर अटक गया )
अब उसके चेहरे के रंग बदलने लगे थे । उसके गुस्सा होने से पहले मैंने वाक्य पुरी की -
" तेरी बुटदार चुनर को देख कर मेरा झांझर सा दिल डोल उठा ।"
अब वो थोड़ी नोर्मल हुई तो फिर आगे का लाईन बोलना शुरू किया ।
" तेरी बुटदार चुनर को देख कर मेरा झांझर सा दिल डोल उठा ।
तेरी चु....( अब फिर मैं चु पर अटक गया और याद करने का नाटक करने लगा )
वो मुझे बिना पलक झुकाए मुझे देख रही थी । मैंने उसे देखा फिर आगे का लाईन बोलना शुरू किया -
" तेरी चुन-चुन करती पायल ने मेरा लन्ड....." ( इस बार मैं लन्ड पर अटक गया )
उसके चेहरे के हाव-भाव से लग रहा था कि अब ज्वालामुखी फटने ही वाला है इसलिए मैंने जल्दी से अगले लाईन को भी पुरा किया -
" मेरा लंडन जाना रोक दिया ।" - बोलकर मैंने उसे देखा और उसे शायराना अंदाज़ में पुरी शायरी एकसाथ कहा ।
" तेरी बुटदार चुनर को देख कर , मेरा झांझर सा दिल डोल उठा ।
तेरी चुन-चुन करती पायल ने , मेरा लंडन जाना रोक दिया । "
वो मुझे गुस्से से अपनी आंखें बड़ी बड़ी करके अपलक देखे जा रही थी ।
मैंने कहा - " ऐसे क्या देख रही हो ? मैंने तो पहले ही कहा था मुझे याद नहीं आ रहा है ।...... वैसे शायरी अच्छी थी न ? "
उसने एक जोरदार का पंच मेरे बांह पर मारा ।
" अरे ! क्या करती हो ? एक्सीडेंट हो जाएगा ।" - मैंने अपने हाथ सहलाते हुए कहा ।
" मैं सब समझती हूं । तुम न ! तुम्हे ना मैं वहां जाके आगरा के पागलखाने में भर्ती करवा दुंगी । तुम पहले पहुंचो वहां ।" - उसने मुझे घुरते हुए कहा ।
" मुझे एक और याद आ गया । सुनाऊं ? " मैंने उसे छेड़ते हुए कहा ।
" जरुरत नहीं है । चुपचाप गाड़ी चलाओ । - मुझे घुरते हुए ही बोली - " और रास्ते में कहीं होटल के सामने रुकना "
" क्यों ? भुख लगी है क्या ? अरे ! कितना खाती हो यार दो ढाई घंटे पहले ही तो खाया था, मोटी हो जाओगी । जानती हो , मोटापा न अपने आप में एक गम्भीर बिमारी है । तुम्हारी ये छरहरी काया ..."
" चुप रहो " - मुझे बीच में टोकते हुए बोली - " बकवास बंद करो । मुझे बाथरूम जाना है ।"
" बाथरूम ! ... बाथरूम क्यों ? घर में नहाई नहीं थी क्या या सिर्फ हाथ मुंह धोना है ।"
" तुम ! " - वो गुस्से से देखी - " टायलेट जाना है । अब ये मत पूछना कि टायलेट क्यों जाना है ।"
" ठीक है नहीं पूछूंगा । वैसे एक बात कहूं ? "
" क्या ?"
" मैं पुछने वाला था ।"
" तुम एक नम्बर के कमीने हो ।" - कहकर फिर मेरे बगल में घुसा मारा ।
कुछ दुर जाने के पश्चात एक होटल जो ठीक ठाक ही था मिला । हम कार से उतर कर होटल की तरफ चल दिए ।
Superb updateमैं हलकान परेशान अपने रूम की सारी जगहें छान मारा लेकिन नाइटी वहां होती तो न मिलती । मुझे डर सिर्फ उन दो नाइटियो का था जो मैंने श्वेता दी के लिए खरीदी थी । और वो भी इसलिए कि वो कुछ हट कर थी । कौन ले गया ? माॅम ने या रीतु ने ? मेरे लिए दोनों में जो भी ले जाए प्रोब्लम ही थी । भले ही मेरी फेंटेसी की वो दोनों प्रथम अहम हिस्सा थी लेकिन रिश्तो के कारण आगे बढ़ने की हिम्मत मेरे में नहीं थी । मेरे मे क्या किसी मे भी नहीं हो सकती । न जाने मेरे बारे में क्या सोचेगी । ख़ैर जो होना था वो तो हो गया । रात के ग्यारह बज गए थे मैं अब उन्हें उठा कर ये तो नहीं पुछ सकता था कि नाइटी किस ने ली है । यही टेंशन पाले मैं बिस्तर पर लेट गया और निंद के हवाले हो गया ।
सुबह जब मैं नौ बजे के आसपास नीचे हाल में पहुंचा तब रीतु को वहीं सोफे पर बैठे हुए पाया । शायद माॅम किचन में थी और डैड अपने कमरे में आफिस के लिए तैयार होते रहे होंगे । मैंने रीतु से पूछा क्या उसने मेरे कमरे में से कोई कपड़े का पैकेट उठाया है तो उसने ना में सर हिलाया । फिर मैंने पूछा क्या माॅम कल मेरे कमरे में गयी थी तो उसने कहा जब हम संजय जी और उनके फेमिली को बाहर बिदा करने निकले थे तब मम्मी उपर छत पर सुखने के लिए रखी हुई कपड़े उतारने गई थी ।
मैं समझ गया नाइटी माॅम के हाथ लग गयी है । मेरा दिल जोर से लरजा । न जाने वो क्या रियेक्ट करेंगी । कहीं सभी के सामने मेरी इज्जत का फलूदा तो नहीं बना देगी । या मेरी उम्र का लिहाज करके चुप रहेंगी । या........
.....या मेरी सिक्रेट फेंटेसी हकीकत में बदलने की एक कदम और आगे अग्रसर होंगी ।
डैड के आफिस जाने का समय हो गया था । माॅम किचन से नाश्ता लेकर आई और टेबल पर रख दी । मैं चुपके से उनकी तरफ देख रहा था लेकिन उनका ध्यान मेरी तरफ नहीं था । डैड के आने के बाद सब ने नाश्ता किया । फिर डैड अपने आफिस चले गए । नाश्ते के दौरान कोई बात हुई नहीं इसलिए माॅम का रवैया समझ में नहीं आया । रीतु भी आम दिनों के वनस्पति कुछ शान्त ही थी । मैंने जल्दी से नाश्ता खत्म किया और अपने रूम में चला गया ।
मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं । माॅम से बात तो करनी ही होगी । कोई दूसरा होता तो मुझे बात कर ने मे झिझक महसूस नहीं होती लेकिन यहां तो....। मुझे उन्हे न तो फोन से काॅल करके पुछने की हिम्मत हो रही थी ना ही ह्वाट्सएप के द्वारा मैसेज भेज कर की । मैंने घड़ी में टाईम देखा दस से उपर बज गए थे.. यानी रीतु कालेज चली गई होगी । मैंने कुछ सोचा और फिर माॅम से बात करने का निश्चय लिए हाॅल चला गया । माॅम हाॅल में नहीं थी । मैं उनके कमरे में गया , वो वहां भी नहीं थी । जरूर किचन में होंगी । मैं किचन के दरवाजे पर पहुंचा , माॅम दरवाजे की तरफ पीठ किए किचन की ग्रेनाइट पत्थर की बनी सेल्फ को साफ कर रही थी । वो ग्रे कलर की साड़ी पहनी हुई थी और ब्लाऊज़ भी फुल बांह वाली और साड़ी का मेचिंग था । साड़ी के पल्लू को अपने कमर में फंसा कर रखी थी । जिससे कमर का कुछ हिस्सा खुला हुआ था । वो काम करते हुए भी काफी अच्छी दिख रही थी । भले ही वो 43 साल की हो गई हो लेकिन उनके शरीर के रख रखाव , शरीर का मेनटेनेंस और शारीरिक श्रम उन्हें 34.35 से ज्यादा शो नहीं दिखाता था। परफेक्ट हाईट , माशल गदराया हुआ शरीर , भारी नितम्ब , हल्की मोटी भुजाएं , मोटी जांघें , पेट पर थोड़ी चर्बी ( जो मेच्योर औरतों को और भी नाकाबिले तारीख सेक्सी बनाते हैं ) , बड़े बड़े गिरिवर की चोटियों की तरह वक्ष , तीखे नैन-नक्श , गुलाबी रंगत लिए रसीले होंठ , कमर से भी नीचे आते स्याह काले बाल किसी भी मर्द को हाइपनोटाइजम कर सकते थे । पता नहीं कैसे डैड के किस्मत में वो मिल गयी जबकि डैड उनके मुकाबले कहीं पर भी नहीं थे । पुराने जमाने में शादियां ज्यादातर अरेंज मैरिज और लड़की और लड़के देखे होती थी । डैड सच में बहुत खुशनसीब थे ।
मैं किचन में दाखिल हुआ और पीछे से माॅम के गले में बाहें का हार डाल अपने चेहरे को उनकी कन्धों पर रख दिया ।
" क्या कर रही हो माॅम ।" मैंने चापलूसी भरे स्वर में कहा ।
" दिख नहीं रहा है क्या कर रही हूं ।" माॅम बिना मुड़े स्लैब को साफ करते हुए बोली ।
" सच में आप को बहुत काम करना पड़ता है , उपर से इतनी गर्मी क्यों नहीं एक दाई रख लेती हो ।"
" दाई से तो अच्छा है कि क्यों न बहु ही ले आऊं ।"
" बहु ! मतलब मेरी आजादी छीनना चाहती हो.. मेरे पैरों में बेड़ियां डालना चाहती हो ।"
" बहु आने से तेरी आजादी छीन जाएगी ।"
" और नहीं तो क्या । अभी तो मेरे हंसने खाने , मौज मस्ती के दिन हैं । अभी थोड़ी न किसी बंधन में बंधना है ।"
" तेरे डैड की शादी तुम से भी कम उम्र में हो गई थी ।"
" वो जमाना अलग था माॅम । इस जमाने में जब तक लड़का अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो जाता है तब तक वो इस लफड़े से दूर ही रहता है ।"
" मैं क्या कहूं , आज के जमाने में शादी ब्याह जबरदस्ती भी तो नहीं की जा सकती । वैसे तो मैं भी ये मानती हूं कि जब तक लड़का और लड़की अपने पैरों पर खड़े न हो जाए और अपने खर्चों का बोझ उठाने लायक़ न हो जाए तब तक शादी नहीं करनी चाहिए । भले ही लड़का जिन्दगी भर कुंवारा रहे ।"
" क्या बोल रही हो माॅम ? चार पांच साल की बात अलग है जिन्दगी भर मैं कुंवारा नहीं रहने वाला , भले ही मैं कमाऊं या न कमाऊं । मैं कहे देता हूं ।" - मैंने मजाक करते हुए कहा ।
" इसीलिए तो बोल रही थी कि शादी कर ले ।"- माॅम ने हंसते हुए कहा ।
" कर लेंगे माॅम... सही समय पर वो भी कर लेंगे ।"
मैं माॅम से नाईटी वाली बात कहना चाहता था लेकिन समझ नहीं आ रहा था कि कैसे कहूं । अभी थोड़ा मुड ठीक है तो पुछ ही लेता हुं । थोड़ा झिझकते हुए मैं माॅम की कन्धों पर अपने चेहरे की हल्के से दबाते हुए कहा -
" माॅम व..वो.. वो नाइटी...."
" अच्छी है ।"- माॅम वैसे ही काम करती हुई बोली ।
मैं चौंका । अच्छी है का मतलब क्या हुआ । उनके कहने का तात्पर्य क्या है कि वो दो अधनंगी और उनमें भी एक लगभग लगभग नंगी दिखने वाली नाइटी भी अच्छी है ।
" आपने देखी ।"- मैंने बड़ी मुश्किल से अपने स्वर को संतुलित रखते हुए कहा ।
" हां ।"
मैं उनसे अलग हो कर उनके बगल में खड़ा हो गया । मैं क्या बोलूं कुछ समझ नहीं आ रहा था ।
" माॅम ।" मैंने धीरे से कहा ।
" हूं !"
" माॅम ! वो नाइटी...म..मेरा मतलब..."
" क्या हुआ बोलो ना ।"
मैंने हिम्मत करके कहा -" माॅम उनमें से दो नाइटी दुसरे की है ।"
" वो तो मैं भी समझ रही हूं.. वो नाइटी तु मेरे लिए तो नहीं लाया हो सकता है... कौन है ?"
" क्या मतलब ?"
" कौन है वो जिसके लिए वो लाया है ।"
मैं क्या बोलूं । श्वेता दी का नाम तो हरगिज नहीं ले सकता था । किसका नाम लूं ।
" माॅम वो मेरा नहीं है । मेरे एक दोस्त का है ।"- मैंने झुठ बोला ।
" दोस्त मतलब गर्लफ्रेंड ।"
" नो माॅम । मेरे कालेज के एक मेल फ्रेंड का है । उसने अपनी गर्लफ्रेंड को गिफ्ट देने के लिए मुझे लाने को कहा था ।"
" झुठ मत बोलो । तुम्हारा अमर के अलावा कोई दूसरा जिगरी मेल दोस्त था ही नहीं , ये मुझे अच्छी तरह से पता है । हां अगर तुम नहीं बताना चाहते तो बात अलग है ।"
मैं कुछ देर असमंजस की स्थिति में खड़ा रहा । सोच रहा था क्या बोलूं क्या न बोलूं । फिर मैंने कुछ डिसाइड किया ।
" साॅरी साॅरी माॅम । वो मैं आपको क्या बोलूं एक्चुअल में वो.. वो मेरी एक ग.. गर्लफ्रेंड का है ।" मैंने हिम्मत करके कहा ।
" कौन है वो । क्या मैं जानती हूं उसे ।"
माॅम ने ना तो नाइटी पर कोई नाराजगी जताई और ना ही गर्लफ्रेंड पर । इसलिए मेरी हिम्मत बढ़ी ।
" हां ।" - मैंने कहा ।
" मैं जानती हूं ?" - माॅम इस बार मेरी तरफ पलटते हुए आश्चर्य से बोली ।
" हां ।"- मैंने थोड़ा शरमाते हुए कहा ।
" कौन है ।"
" नहीं । मैं नहीं बता सकता ।"
" क्यों नहीं बता सकते । "
" क्या बताऊं ? वो.. वो फ्रेंडशिप बस सिर्फ टाइम पास है ।"
" ओह ! मतलब कोई लव शव का चक्कर नहीं है । बस सिर्फ दिलजोई है ।"
" हूं ।"
उन्होंने मुझे कुछ देर तक एक टक देखा फिर कहा -" वो जो तुम्हारी गर्लफ्रेंड है क्या वो भी ये जानती है कि ये सब कोई लव शव का मैटर नहीं बल्कि मौज मस्ती का मामला है ।"
" हूं ।"
माॅम ने इस बार कुछ नहीं बोला । वो किचन में बनी वास वेसिन चली गई और अपनी हाथों को धोने लगी । हाथ धोने के बाद दरवाजे पर टंगी एक तौलिये से अपने हाथ को पोंछने लगी । वो अपने हाथ पोछते हुए बोली -" कौन है वो लड़की ।"
" आप जान कर क्या करोगी ? और अगर मैंने आप को उसके बारे में बता दिया और उसे पता चला कि मैंने आपको उसके बारे में बता दिया है तो आपके साथ साथ वो भी नाराज होगी ।"
" उसे कैसे पता चलेगा ? हां यदि तुम खुद ही उसे बता दोगे तो बात अलग है ।"
" मैं नहीं बताऊंगा । लेकिन आप उस का नाम सुनकर भड़क उठी तो ?"
" मैं तुम्हें जोर तो दे सकती नहीं । आखिर तुम एक जवान और मेच्योर लड़के हो । और हमारे यहां कहा जाता है कि जब लड़के का कद बाप के कन्धे तक और बाप का जुता बेटे को आने लगे तो बेटा अपने बाप का दोस्त और मां का सहारा की तरह का हो जाता है । यदि तुम्हें लगता है कि तुम मुझसे शेयर कर सकते हो तो मुझे कोई आपत्ती नही है ।"
" ओके । मैं आपसे झूठ नहीं बोलूंगा । लेकिन सबसे पहले तो आप प्रोमिस करो कि ये बात डैड को नहीं बताएगी । और दूसरी आप नाराज़ नहीं होंगी ।"
" नहीं बताऊंगी तुम्हारे डैड को । अब बताओ ।"
" आप नाराज़ भी नहीं होगी ।"
" ओके । नाराज नहीं हूंगी ।"
" ये मैं आपको रूबरू नहीं बल्कि आपके ह्वाट्सएप नम्बर पर बताऊंगा । आप के ह्वाट्सएप नम्बर पर उस का नाम भेज दुंगा ।"
माॅम कुछ नहीं बोली । वो मुझे अपलक देखती रही ।
" ओके ।"- मैंने माॅम से कहा ।
" ओके ।"- माॅम सहमति में अपनी सर हिलाई ।
मैंने अपने पैंट के पाकेट से पन्द्रह हजार रुपए निकाल कर माॅम को दे दिया फिर बोला -" माॅम कल मुझे पहली सेलरी मिली थी । संजय जी और उनके परिवार के आने से कल मैं दे नहीं पाया था ।"
" तेरा भी तो खर्चा है ना , अपने पास रख अपनी खर्चा पानी निकालना इन पैसों से.. मेरे पास तो तेरे डैड के दिए हुए पैसे रहते ही हैं ।"
" मेरा इतना भी खर्चा नहीं है माॅम । वैसे भी शुरू से खर्चों का पैसा तो आप ही देती हो.. मुझे जब जरूरत होगी तब मांग लुंगा । और वैसे भी बेटे के हर चीज पर मां का अधिकार सबसे अधिक होता है। रूपया पैसा आप से बड़ी चीज थोड़ी न है ।"
" कभी कभी तो बड़ी सयानी सयानी बातें करता है , काफी अच्छी अच्छी और कभी कुछ विचित्र तरह की हरकतें करता है । मुझे तो तु एक पहेली जैसा लगता है जिसे मैं भी समझ ना पाऊं ।"
" मैं तो एक खुली किताब हूं जिसे हर कोई आसानी से पढ़ सकता है । एक दम सिम्पल ।"
" हां हां वो तो नाइटी देख कर ही समझ में आ रहा है ।" माॅम ने मुस्कुराते हुए कहा ।
" देखो अगर छेड़ोगी तो अपून तुम्हें कुछ नहीं बताने वाला ।"- मै झुठ मुठ का गुस्सा करते हुए बोला ।
" अच्छा अच्छा अब कुछ नहीं बोलूंगी ।" वो पूर्ववत मुस्कराते हुए बोली ।
" आज कालेज नहीं जाना है क्या ?"
" जाना है न । ओके मैं निकलता हूं माॅम ।" कहकर मैंने माॅम को हग किया । वो भी अपनी बाहों से मुझे थोड़ी कसती हुई लिपट गई ।
फिर वहां से मैं कालेज के लिए निकल गया । कालेज पहुंचने पर मालूम हुआ कि आज कुछ खास पढ़ई नहीं है तो मैं वापस घर लौट पड़ा । मैं घर पहुंचने ही वाला था कि याद आया और मैंने बाइक रोक दी ।
घर में अभी कोई भी नहीं होगा , अगर माॅम ने फिर वही सवाल दुहराया कि वो लड़की कौन थी तो मैं क्या कहूंगा.. मैंने मैसेज भी तो नहीं किया था। मैं सोचने लगा किसका नाम लिखूं जिसे वो भी जानती है । ऐसी भी बात नहीं थी कि उनके जान पहचान युवतियों में से किसी के साथ सेक्स नहीं किया था , उनकी जान पहचान की औरतों में मैं दो के साथ सेक्स कर चुका था । कुछ देर तक माथापच्ची के बाद और कुछ सोचकर एक नाम मैंने माॅम को ह्वाट्सएप कर दिया ।
मैं माॅम को ह्वाट्सएप कर रहा था कि मेरी नज़र चाची पर पड़ी । वो अपने दरवाजे के बाजू में कचरे के डिब्बे में कुड़ा फेक रही थी । उन्होंने मुझे देखा और वहीं से जरा जोर से बोली ।
" तु यहां क्या कर रहा है... कालेज नहीं गया ?"
मैंने माॅम को ह्वाट्सएप कर के अपनी बाइक उनके घर के सामने खड़ा कर दिया और नीचे उतर कर बोला - " गया था चाची लेकिन मुझे लगा कि शायद मेरी रूपसी रूपाली चाची को मेरी जरूरत है इसलिए वापस आ गया ।"
" नौटंकी बाज... मैं सब जानती हूं तेरी तिकड़म फितरत को... जरूर किसी चक्कर में होगा ...ये बता यहां क्या कर रहा है..किसको मैसेज कर रहा है ।"
" ऐसे न बोलो चाची जान... मैं तिकड़म करता हूं ?... और करता भी हुंगा तो वनली एंड वनली अपनी रूप की रानी रूपाली चाची को... अब आप ही बताओ क्या मैं अपने प्यारी सी चाची को भी..न करूं तो भला किसे करूं ।"- मैंने चाची को छेड़ते हुए कहा -" वैसे ये मेरी प्यारी..किसी सियासत की महारानी जैसी चाची इस भरी दोपहरी में ये कौन सा काम लेकर बैठ गई है... अपने इस ग़ुलाम को कहती , में नतमस्तक आपकी सेवा में हाजिर हो गया होता ।"
चाची हंसते हुए बोली - बक-बक बंद कर..चल अन्दर चल ।"
मैंने चाची को मुस्कराते हुए देखा फिर अपनी बाइक उनके घर के सामने खड़ी कर दी। मैं चाची के साथ उनके घर में चला गया । घर में प्रवेश करते ही चाची ने मेन दरवाजा बंद कर दिया । घर में चाची के अलावा कोई नहीं था । चाचा ड्यूटी पर गए थे और राहुल अपने स्कूल ।
चाची के बारे में जैसा कि पहले मैंने कहा था वो बिल्कुल विद्या बालन की यादें ताजा करा देती हैं... हूबहू वैसा शरीर और वैसा ही उनका चेहरा... वैसा ही होंठ... वैसा ही हाईट । मेरा मरहूम दोस्त अजय का कहना था कि यदि मैं कभी शादी करूंगा तो वो बिल्कुल विद्या बालन जैसी होनी चाहिए... और अगर कहीं उन्नीस बीस हो भी तो वो कम से कम चाची की तरह तो बिल्कुल ही होनी चाहिए ।
चाची उस वक्त एक फुल गहरे ब्लू रंग की नाइटी पहन रखी थी । नाइटी के अन्दर उनका सफेद रंग का ब्रा स्पष्ट दिखाई दे रहा था जिससे ये स्पष्ट समझ में आ रहा था कि उनके उरोज कितने बड़े बड़े हैं । नीचे पैन्टी पहनी थी या नहीं , ये नहीं दिख रहा था । नाइटी में भी वो गजब की सेक्सी लग रही थी ।
" क्या खाएगा ?... पास्ता खाएगा या हलवा बनाऊ ?"- ड्राइंगरुम में सोफे पर बैठते हुए चाची ने कहा ।
" सुजी का हलवा ।" - मैं चाची के बगल में बैठते हुए बोला ।
" ठीक है...तु बैठ मैं दो मिनट में नहा कर आ रही हूं ।" - चाची उठते हुए बोली ।
" दो मिनट में... दो मिनट तो आपको कपड़े उतारने में ही लग जाएंगे ।"
" अच्छा पांच मिनट में ।"- चाची ने हंसते हुए कहा ।
" वैसे तो पांच मिनट में भी नहीं होने वाला है... फिर भी जाओ , मैं यहीं बैठे बैठे सेकेंड , मिनट , घंटा मिला रहा हूं ।"
" तुझे क्या लगता है मैं घंटों नहा रही हुंगी ।"
" मुझे तो लगता है कि औरतों को नहाने में काफी समय लगता है ।"
" बड़ एक्सपिरियंस है तुझे लड़कियों के नहाने को लेकर ।"
" थोड़ा बहुत तो है ।"- मैंने मुस्कराते हुए कहा ।
" जरूर कोई छोकरी पटा रखी होगी...ये तो मुझे शुरू से ही शक था ।"
" चाची नहाने वाली बात को लेकर छोकरी पटाने की जरूरत क्यों पड़ेगी ?.. लड़कियों को नहाने में देर लगती ही है ये तो तुम भी जानती होगी... जानती हो न ?"
" तेरे चक्कर में रहूंगी तो दिन भर बिना नहाए रह जाऊंगी...तु बैठ मैं एक घंटे में आ रही हूं ।"- बोलकर चाची बाथरूम जाने के लिए आगे बड़ी ।
" क्या एक घंटे में ?"- मैंने चिल्लाते हुए कहा ।
" हां । एक घंटे में । तु ही तो बोल रहा था... मैं चली ।" - चाची हंसते हुए बोली और बाथरूम में घुस गई ।
चाची के बाथरूम जाने के बाद मैंने काजल को ह्वाट्सएप किया