• If you are trying to reset your account password then don't forget to check spam folder in your mailbox. Also Mark it as "not spam" or you won't be able to click on the link.

Romance Three Idiot's

Sanju@

Well-Known Member
4,853
19,593
158
Update - 01
━━━━━━━━━━━━━━




"क्या लगता है तुझे बूम बूम फुस्स होगा?" जगन ने सड़क पर निगाहें जमाए पूछा।
"अरे! इस बार ज़रूर होगा देख लेना।" मोहन ने सिर हिला कर कहा।

"पिछली बार भी तूने यही बोला था मगर घण्टा कुछ नहीं हुआ।" संपत ने चिढ़े हुए लहजे में कहा____"साला जीप के दोनों पहिए उनके किनारे से निकल गए थे।"

"अरे! इस बार पक्का होगा रे, तेरे माल की कसम।" मोहन ने अपनी खीसें निपोर दी।
"मुझे यकीन है इस बार भी कुछ नहीं होगा और पहिए उनके बगल से छू मंतर कर के निकल जाएंगे। लिख के ले ले मेरे से।" संपत ने अपनी हथेली उसके सामने कर दी।

"भोसड़ी के तू न ज़्यादा ज्ञान न पेल समझा। अपन ने कह दिया कि इस बार होगा तो ज़रूर होगा।" मोहन ने मजबूती से सिर हिलाया।

"लंड होगा भोसड़ी के।" संपत ने खिसिया कर कहा____"साले पाँचवीं फेल तेरे भेजे में भेजा ही नहीं है। अपन ने पहले जो तरीका बताया था उसी से होगा।"

"ओए! पाँचवीं फेल किसको बोला बे?" मोहन मानों तैश में आ कर बोला____"तेरे से ज़्यादा भेजा है अपन के भेजे में। तू पांचवीं पास है तो क्या हुआ।"

"अपन पांचवीं पास है तभी कुछ होता है और इसका सबूत हज़ारो बार तुम दोनों देख चुके हो।" संपत ने मुंह बनाते हुए कहा____"हर बार अपन के ही तरीके से काम होता है। साला बात करता है...हुंह।"

"घंटा, इस बार तो अपन के तरीक़े से ही काम होगा देख लेना।" मोहन ने आँखें दिखा कर कहा।

"और अगर न हुआ तो?" संपत ने जैसे उसे ताव दिया।
"तो मेरी गांड मार लेना अब खुश?" मोहन ने मानों फ़ैसला सुना दिया।

"सुन रहा है न बे जगन?" संपत ने तीसरे की तरफ देखा____"अभी तूने भी सुना न इसने क्या बोला है? अब अगर ये अपने कहे से मुकरा तो इसकी गांड मारने में तू मेरी मदद करेगा।"

"क्यों अकेले तेरे बस का नहीं है क्या?" मोहन ब्यंग से हंस पड़ा।

"अबे दम तो बहुत है पर लौड़ा तू भाग खड़ा होता है न।" संपत ने जैसे उसे समझाते हुए कहा____"इस लिए जगन तुझे पकड़ के रखेगा ताकि मैं तेरी सड़ेली गांड में अपना मोटा लंड डाल कर तेरी गांड मार सकूं।"

"ओए! चुप करो बे भोसड़ी वालो।" जगन ने दोनों को घुड़की दी और सड़क के छोर की तरफ देखते हुए बोला____"उधर से एक जीप आ रही है। इस बार अगर गड़बड़ हुई तो माँ चोद दूंगा तुम दोनों की।"

"अबे मेरी माँ कैसे चोदेगा चिड़ी मार?" संपत जैसे नाराज़ हो गया_____"वो तो कब का मर चुकी है। और वैसे भी गड़बड़ तो इस गांडू की वजह से होगी।"

उसकी बात पर मोहन गुस्से से अभी कुछ बोलने ही वाला था कि जगन ने उसके सिर पर चपत मार कर उसे चुप करा दिया। तीनों सड़क के उस छोर की तरफ देखने लगे थे जिस तरफ से एक कार आ रही थी। जैसे जैसे वो कार क़रीब आ रही थी तीनों की धड़कनें भी बढ़ती जा रहीं थी।

"इस बार तो बूम बूम फुस्स हो के ही रहेगा देख लेना " मोहन ख़ुशी से बड़बड़ाया। उसकी बात बाकी दोनों के कानों में भी पहुंची थी लेकिन दोनों ही चुप रहे और कार पर नज़रें जमाए रहे।

इस वक्त ये तीनों सड़क से क़रीब दस फीट दूर उस तरफ थे जहां पर कुछ पेड़ पौधे थे। ज़ाहिर है तीनों ही छिपे हुए थे। जिस जगह पर ये तीनों छिपे हुए थे उसी के सामने सड़क के बीच में लोहे की दो कीलें खड़ी कर के रख दी गईं थी। वो कीलें रखने वाला पाँचवीं फेल मोहन था जबकि पाँचवीं पास यानि संपत उसके इस तरीके से पूरी तरह असहमत था। इसके पहले तीन बार कोई न कोई वाहन आ कर निकल गया था लेकिन वो नहीं हुआ था जिसके लिए सड़क पर वो कीलें खड़ी कर के रखी गईं थी। हर बार वाहन के पहिए कभी कीलों के इस तरफ से तो कभी उस तरफ से निकल जाते थे।

आम तौर पर अगर कोई लुटेरा इस तरह से किसी वाहन को लूटने का सोचता है तो वो सड़क पर या तो कई सारे पत्थर रख कर सड़क को ब्लॉक कर देता है या फिर सड़क पर एक्सीडेंट का बहाना बना कर खुद ही लेट जाता है। या फिर सड़क पर ढेर सारी कीलें डाल देता है जिससे वाहन के पहिए पंक्चर हो जाते हैं मगर यहाँ पर ऐसा नहीं था। जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि तीनों ही बुद्धि से माशा अल्ला थे और जिसके पास थोड़ी बहुत बुद्धि थी भी उसकी वो बुद्धि से हीन ब्यक्ति मान नहीं रहा था। मोहन ने सड़क के बीच में कुछ फा़सले पर सिर्फ दो कीलें रखीं थी और पूरे यकीन के साथ कह रहा था कि जो भी वाहन आएगा वो उन कीलों की वजह से ज़रूर पंक्चर हो जाएगा जबकि संपत इस बात से असहमत था। जगन ने हमेशा की तरह ये सोच कर कोई ज्ञान नहीं दिया था कि वो अनपढ़ है। उसके ज़हन में ये बात बैठी हुई थी कि वो अनपढ़ है इस लिए उसके पास कोई ज्ञान ही नहीं है। ऐसे थे ये तीनों नमूने.....!

"ओए! देख वो जीप एकदम पास आ गई है।" मोहन से रहा न गया तो मारे ख़ुशी के बोल ही पड़ा____"देखना इस बार इस जीप के पहिए मेरी डाली कीलों पर चढ़ जाएंगे और फिर बूम्ब बूम्ब....फुस्सस्सस्स हाहाहा।"

"भोसड़ी के अभी तो तू खुश हो रहा है।" संपत ने जैसे उसे चेताया_____"मगर थोड़ी ही देर में तू दहाड़ें मार के रोएगा जब मैं तेरी गांड मारुंगा।"

"अबे चल हट, मर गए अपन की गांड मारने वाले।" उसने शेख़ी से कहा____"अब तो अपन तेरी गांड मारेगा। देखना इस बार ये कार फुस्स्स हो जाएगी और फिर सबसे पहले मैं तेरी तबीयत से बजाऊंगा, लोल।"

"तुम दोनों चुप हो जाओ वरना मैं तुम दोनों के मुँह में लंड दे दूंगा।" जगन ने गुस्से से दोनों की तरफ देखा।

तभी वो कार उन कीलों के एकदम पास पहुँच गई। तीनों की धड़कनें जैसे एकदम से रुक ग‌ईं। उनके देखते ही देखते वो कार कीलों के बगल से निकल गई। कार के निकल जाने से नीचे सड़क पर थोड़ी हवा लगी जिससे दोनों कीलें सड़क पर गिर ग‌ईं। ये देख जहां मोहन की शकल बिगड़ कर रो देने वाली हो गई वहीं संपत ने झपट कर उसे दबोच लिया। उधर जगन गुस्से से मोहन को घूरे जा रहा था।

"अबे देख क्या रहा है जगन, पकड़ इस भोसड़ी वाले को।" संपत ने जगन को ज़ोर से आवाज़ लगाई____"ये चौथी बार था जब इसका तरीका काम नहीं आया। अब तो इसकी गांड मार के ही रहूंगा।"

"सही कहा तूने।" जगन ने भी झपट कर मोहन को पकड़ लिया, बोला____"अब तो मैं खुद भी इसको पेलूंगा।"

"अबे मादरचोदो, गंडमरो, छोड़ दो बे।" पाँचवीं फेल मोहन मानों गुहार लगा कर चिल्लाने लगा____"क्यों मेरी गदराई गांड के पीछे पड़े हो बे? सालो मुझ अबला पुरुष पर कुछ तो रहम करो रे।"

"भोसड़ी के तेरी वजह से चार बार हम नकाम हुए हैं।" संपत ने जबरदस्ती उसके पैंट की बेल्ट खोलते हुए कहा_____"ऊपर से खड़ी धूप में बुरा हाल हुआ सो अलग। जगन ज़ोर से पकड़ इस गांडू को। आज हम दोनों इसकी पेलाई करेंगे।"

"अबे हब्सियो, बेटीचोदो, रुक जाओ बे।" मोहन बुरी तरह छटपटाते हुए चिल्लाए जा रहा था____"मादरचोदो रहम करो बे। अपन ने सुना है गांड मरवाने में भयंकर दर्द होता है। क्या सच में मेरी गांड मार लोगे बे, छोड़ो मुझे।"

"साले दर्द होगा तभी तो तेरी अकल ठिकाने आएगी।" सम्पत उसकी पैंट पकड़ कर नीचे खींचते हुए बोला। इस वक्त वो बड़ा ही खुश दिखाई दे रहा था। ज़ाहिर है उसके मन की मुराद जो पूरी होने जा रही थी।

"अबे मादरचोदो, सबसे छोटा हूं और बिना माँ बाप का हूं इस लिए मुझे इतना सता रहे हो कमीनो।" मोहन छटपटाते हुए फिर से चीखा।

"भोसड़ी के बिना माँ बाप के तो हम दोनों भी हैं।" जगन ने एक मुक्का उसके पेट में मारा तो वो दोहरा हो कर चीख पड़ा, फिर हैरानी ज़ाहिर करते हुए बोला____"अबे तुम दोनों के भी माँ बाप मर गए? ये कब हुआ? तुम दोनों ने मुझे पहले बताया क्यों नहीं?"

"बीस सालों में ये बात लगभग लाखों बार तुझे बता चुके हैं भोसड़ी के।" सम्पत ने पैंट को खींच के उसकी टाँगों से अलग कर दी, और फिर उसके कच्छे को पकड़ते हुए बोला_____"और तू हर बार भूल जाता है, पर अब से नहीं भूलेगा।" कहने के साथ ही उसने जगन की तरफ देखते हुए कहा____"पहले तू इसकी गांड मारेगा या मैं?"

"अबे मादरचोदो, कमीनो, कुत्तो छोड़ दो बे।" संपत ने जैसे ही उसके कच्छे को पकड़ कर उतारना चाहा तो वो पूरी ताकत लगा कर खुद को छुड़ाने की कोशिश करने लगा, फिर बोला____"मेरी गांड की तरफ देखा भी तो अच्छा नहीं होगा। सालों दोनों के मुँह में हग दूंगा।"

इतना कहने के बाद उसने अज़ीब तरह से ज़ोर लगाते हुए अपने जिस्म को उठाया तो अगले ही पल फ़िज़ा में उसके पादने की ज़ोरदार आवाज़ गूँज उठी।

"तेरी माँ की चूत भोसड़ी के।" संपत जो उसके नीचे ही घुटनों के बल बैठा था उसके पादते ही उसका कच्छा छोड़ भाग कर दूर खड़ा हुआ और इधर जगन भी उसे छोड़ कर दूर हट गया। दोनों ने अपनी अपनी नांक दबा ली थी।

"लगता है बिना गांड मरवाए ही तेरी फट गई भोसड़ी के।" जगन ने एक लात उसकी पसली में मारते हुए कहा तो मोहन दर्द से कराहा और फिर जल्दी ही उठ कर अपनी पैंट पहनने लगा।

"देख लूंगा तुम दोनों को भोसड़ी वालो।" फिर उसने दोनों को घूरते हुए कहा____"किसी दिन सोते में ही तुम दोनों की गांड मार लूंगा मैं।"

"लगता है इसकी गांड मारनी ही पड़ेगी।" जगन ने संपत की तरफ देखा____"पकड़ इसको, इस बार चाहे ये पादे या हग दे लेकिन रुकना मत।"

दोनों को अपनी तरफ बढ़ते देख वो एकदम से हड़बड़ाया और सड़क की तरफ गालियां देते हुए भाग खड़ा हुआ। इधर जगन और संपत मुस्कुराते हुए सड़क की तरफ बढ़ चले।

{}{}{}{}

शाम हो चुकी थी और चारो तरफ हल्का अंधेरा छा गया था। संपत जगन और मोहन नाम के तीनों नमूने भूख से बेहाल दर दर भटकते हुए भैंसों के एक तबेले के पास पहुंचे। उन्होंने देखा तबेले में कई सारी भैंसें बंधी हुईं थी और हरी हरी किंतु कतरी हुई घांस में मोया हुआ भूसा खा रहीं थी। तबेले में एक लंबा चौड़ा तथा हट्टा कट्टा आदमी एक भैंस के पास बैठा बाल्टी में लिए पानी से उसके थनों को धो रहा था।

"काश! हम भी भैंस होते तो कितना अच्छा होता ना?" मोहन ने तबेले की तरफ ललचाई हुई दृष्टि से देखते हुए कहा____"कभी भूखे ना रहना पड़ता। साला भर पेट भूसा खाने को मिलता।"

"सही कह रहा है।" संपत ने जैसे उसकी बात का समर्थन करते हुए कहा____"और हगने के लिए भी कहीं नहीं जाना पड़ता। उन भैंसों की तरह एक ही जगह पर खड़े खड़े खाना खाते और वहीं हगते रहते। इतना ही नहीं हमें खुद नहाने की भी ज़रूरत न पड़ती, क्योंकि वो तबेले वाला आदमी हमें रोज़ अच्छे से मल मल के नहलाता।"

"सच में यार।" जगन ने मानो आह भरी____"क्या किस्मत है उन भैंसों की। काश हम भी भैंस होते तो हमारी भी किस्मत ऐसी ही मस्त होती।"

"अबे सुन मेरे भेजे में अभी अभी एक मस्त पिलान आएला है।" मोहन ने उस हट्टे कट्टे आदमी की तरफ देखते हुए कहा____"अपन लोग चुपके से तबेले में चलते हैं और भैंसों के दूध में मुंह लगा कर सारा दूध पी लेते हैं। कसम से बे मज़ा ही आ जाएगा।"

"घंटा मज़ा आ जाएगा।" संपत उसे घूरते हुए बोला____"अगर एक बार भी भैंस ने लात मार दी तो अपन लोगों का भेजा भेजे से निकल के बाहर आ जाएगा समझा?"

"अबे ऐसा कुछ नहीं होगा।" मोहन लात खाने के डर से कांप तो गया था किंतु फिर जल्दी ही अपनी बुद्धि का दिखावा करते हुए बोला____"हम में से दो लोग भैंस के पैर पकड़ लेंगे और एक आदमी गटागट कर के जल्दी जल्दी भैंस का दूध पी लेगा। उसके बाद ऐसे ही हम तीनों एक एक कर के भैंस का दूध पी लेंगे।"

"तू न अपनी बुद्धि अपनी गांड़ में डाल ले भोसड़ी के।" संपत ने तैश में कहा____"साले तुझे अभी पता नहीं है कि भैंस में कितनी ताकत होती है। अगर हम उसका पैर पकड़ेंगे तो वो एक ही झटके में हमें उछाल कर दूर फेंक देगी। दूध तो घंटा न पी पाएंगे मगर हाथ मुंह ज़रूर तुड़वा लेंगे अपना।"

"अबे एक बार कोशिश तो करनी ही चाहिए न।" मोहन मानों अपनी बुद्धि द्वारा कही गई बात मनवाने की ज़िद करते हुए बोला____"क्या पता भैंस को हम पर तरस ही आ जाए और वो आसानी से हमें अपना दूध पिला दे।"

"चल मान लिया कि भैंस कुछ न करेगी।" संपत ने कहा_____"पर अगर तबेले के उस हट्टे कट्टे आदमी ने हमें दूध पीते देख लिया तो? लौड़े वो बिना थूक लगाए हम तीनो की गांड़ मार लेगा। दूध तो नहीं पर अपनी अपनी गांड़ फड़वाए ज़रूर यहां से जाना पड़ेगा हमें।"

संपत की बात सुन कर एक बार फिर से मोहन डर से कांप गया। इस बार उससे कुछ कहते ना बन पड़ा था। ये अलग बात है कि वो एक बार फिर से अपना दिमाग़ लगाने में मशगूल हो गया था।

"क्या हुआ चुप क्यों हो गया?" मोहन को ख़ामोश देख संपत ने मुस्कुराते हुए कहा____"गांड़ फट गई क्या तेरी?"

"बेटा दूध तो पी के ही जाएंगे यहां से।" मोहन जैसे हार मानने वाला नहीं था, बोला____"फिर चाहे अपनी गांड़ ही क्यों न फड़वानी पड़े। साला पेट में चूहे दौड़ रहे हैं। अगर कुछ खाने को न मिला तो कुछ देर में मर जाऊंगा मैं।"

"क्यों न हम उस तबेले वाले से दूध मांग लें।" काफी देर से चुप जगन ने मानों खुद राय दी____"उससे कहें कि हम भूखें हैं और हमें थोड़ा दूध दे दे।"

"तू तो चुप ही रह बे कूड़मगज।" संपत मानों चढ़ दौड़ा उस पर____"वो कोई सत्यवादी हरिश्चंद्र नहीं है जो मांगने से हमें अपना दूध दान में दे देगा।"

"एक काम करते हैं फिर।" मोहन को जैसे एक और तरकीब सूझ गई, खुशी से बोला____"हम दूध चुरा लेते हैं। जब वो आदमी भैंस का दूध बाल्टी में निकाल लेगा तो हम उसे चुरा लेंगे। पिलान मस्त है न?"

"घंटा मस्त है।" संपत ने बुरा सा मुंह बनाया____"भला हम उस हट्टे कट्टे आदमी के रहते उसका दूध कैसे चुरा लेंगे? अगर उसने दूध चुराते हुए हमें देख लिया तो समझो हम तीनों की गांड़ बिना तेल लगाए मार लेगा वो।"

"बेटीचोद तुझे तो अपन की हर बात फिजूल ही लगती है।" मोहन ने गुस्से से कहा____"खुद को अगर इतना ही हुद्धिमान समझता है तो तू ही बता कैसे हम उसका दूध पी सकेंगे?"

मोहन की बात सुन कर संपत सोचने वाली मुद्रा में आ गया। वो तबेले की तरफ देखते हुए सोच में डूब ही गया था कि तभी उसकी नज़र तबेले के बाहर अभी अभी नज़र आए एक युवक और एक औरत पर पड़ी। युवक इन तीनों की ही उमर का था जबकि वो औरत उमर में उससे काफी बड़ी थी। तबेले के बगल में अचानक ही वो दोनों जाने कहां से आ गए थे। युवक ने उस औरत को पीछे से पकड़ कर खुद से चिपका लिया और दोनों हाथों से उस औरत की बड़ी बड़ी चूचियों को मसलने लगा। ये देख संपत के जिस्म में झुरझुरी सी होने लगी। उसने फ़ौरन ही मोहन और जगन को उस तरफ देखने को कहा तो वो दोनों भी उस तरफ देखने लगे। वो औरत चूचियों के मसले जाने से मचले जा रही थी।

"इसकी मां की।" मोहन बोल पड़ा____"उधर तो कांड हो रेला है बे।"
"तुझे भी करना है क्या?" संपत ने उसके बाजू में हल्के से मुक्का मारा तो मोहन ने कहा____"मिल जाए तो कसम से मज़ा ही जाए।"

मोहन की बात पर संपत अभी कुछ बोलने ही वाला था कि तभी उसने देखा तबेले में भैंस के थन को धुल रहा आदमी उठा और कुछ दूर रखी दूसरी बाल्टी को उठा कर दीवार के पास रख दिया। हल्के अंधेरे में भी बाल्टी में भरा सफेद दूध दिख रहा था। आदमी पलट कर फिर से भैंस के पास गया और बाल्टी का पानी एक तरफ फेंक कर उसमें उस भैंस का दूध निकालने लगा।

"अबे काम बन गया।" संपत एकदम से उत्साहित सा बोल पड़ा तो बाकी दोनों चौंक पड़े और उसकी तरफ सवालिया निगाहों से देखने लगे।

"तुम दोनों ने देखा न अभी अभी वो तबेले वाला हट्टा कट्टा आदमी बाल्टी भर दूध उस दीवार के पास रख के गया है।" संपत कह रहा था____"और अब वो उस भैंस के पास जा कर उसका दूध निकाल रहा है। बस यहीं पे काम बन गया है।"

"अपनी समझ में घंटा कुछ नहीं आया।" मोहन ने झल्ला कर कहा____"साफ साफ बता ना भोसड़ी के।"

"समझ में तो तब आएगा भोसड़ी के।" संपत ने उसे घूरते हुए कहा____"जब तेरे भेजे में भेजा होगा। साला पांचवीं फेल।"

"पांचवीं फेल किसको बोला बे?" मोहन गुस्से से चढ़ दौड़ा उस पर मगर जगन ने बीच में ही रोक लिया उसे।
"तू बता तेरे दिमाग़ में क्या तरकीब है?" फिर जगन ने संपत से पूछा।

"तू तो देख ही रहा है कि इस वक्त तबेले में वो आदमी अकेला ही भैंस का दूध निकाल रहा है।" संपत जैसे समझाते हुए बोला____"और हमारी तरफ उसकी पीठ है। इधर तबेले के बगल से दीवार के उस पार वो लड़का उस औरत के साथ लगा हुआ है। यानि उसका ध्यान हमारी तरफ हो ही नहीं सकता। तो अब तरकीब यही है कि हम तीनों चुपके से वहां चलते हैं और दीवार के पास रखी दूध से भरी उस बाल्टी को उठा कर छू मंतर हो जाते हैं। ना तो तबेले वाले उस आदमी को इसका पता चल पाएगा और न ही उन दोनों को जो दीवार के पार कांड कर रहे हैं। क्या बोलता है, तरकीब मस्त है ना।"

"कोई ख़ास नहीं है।" मोहन ने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा। इस पर संपत उसकी तरफ इस अंदाज़ से देखा जैसे उसने कोई किला फतह कर लिया हो और उसके सामने उसकी बुद्धि की कोई औकात ही नहीं है।

बहरहाल, संपत के कहे अनुसार तीनों चुपके से तबेले की तरफ बढ़ चले। कुछ ही देर में वो तीनों उस बाल्टी के पास पहुंच गए। तीनों की ही धड़कनें बढ़ी हुईं थी। संपत ने जहां जगन को आस पास नज़र रखने का इशारा कर दिया था वहीं मोहन को तबेले वाले आदमी और उन दोनों की तरफ जो कांड कर रहे थे। संपत ने जैसे ही दूध से भरी बाल्टी को हाथ लगाया तो तबेले में मौजूद दो तीन भैंसों ने उसकी तरफ देखा और एकदम से रंभाने लगीं। भैंसों की आवाज़ सुन कर तीनों की ही गांड़ फट के हाथ में आ गई। उधर भैंसों के रंभाने से तबेले वाले उस आदमी ने गर्दन घुमा कर एक बार भैंसों की तरफ देखा और फिर से अपने काम में लग गया। ये देख संपत ने राहत की सांस ली और बाल्टी को उठा कर दबे पांव वापस चल पड़ा। उसके पीछे जगन और मोहन भी हलक में फंसी सांसों को लिए चल पड़े।

कुछ ही देर में तीनों तबेले से दूर आ कर एक बढ़िया सी जगह पर रुक कर सुस्ताने लगे। दूध से भरी बाल्टी तीनों के बीच रखी हुई थी जिसमें भैंस का गाढ़ा दूध झाग के साथ बाल्टी की सतह तक भरा हुआ था।

"मान गया तेरे दिमाग़ को।" जगन ने संपत की तारीफ़ करते हुए कहा____"क्या तरकीब लगाई तूने। अगर तू ऐसी तरकीब न लगाता तो आज हम तीनों भूखे ही मर जाते।"

"इतनी भी खास तरकीब नहीं थी इस चिड़ी मार की।" मोहन ने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा____"शुकर करो कि उस आदमी ने भैंसों की आवाज़ को सुन कर सिर्फ भैंसों की तरफ देखा था। अगर उसने एकदम से पीछे की तरफ ही देख लेता तो सोचो हमारा क्या हाल होता फिर।"

"जो भी हो।" जगन ने कहा____"पर ये तो सच है न कि संपत की वजह से ही इतना सारा दूध हमें पीने के लिए मिल गया है। साला दोपहर से कुछ खाने को नहीं मिला था। इस दुनिया के लोग बड़े ही ज़ालिम हैं। कोई भूखे को खाना ही नहीं देता।"

"अब ये सब छोड़ो।" संपत ने कहा____"और बाल्टी के इस दूध को पीना शुरू कर दो। उसके बाद हम फ़ौरन ही इस जगह से भाग जाएंगे। अगर तबेले वाला वो आदमी अपने दूध की खोज करते हुए इस तरफ आ गया तो लेने के देने पड़ जाएंगे।"


संपत की बात सुन कर जगन और मोहन ने सिर हिलाया और फिर एक एक कर के तीनों उस दूध को पीने लगे। इतने सालों में आज पहली बार इतना सारा दूध पीने को मिला था उन्हें। बाल्टी में इतना दूध था कि तीनों के पीने से भी खत्म न हुआ। कुछ देर तक तीनों एक दूसरे का मुंह देखते रहे उसके बाद तीनों ने थोड़ा थोड़ा कर के पूरा दूध पी लिया। पेट पूरी तरह से भर गया था अब। जिस्म में जैसे नई ताज़गी और नई जान आ गई थी। खाली बाल्टी को वहीं छोड़ तीनों भाग लिए उधर से। अभी वो कुछ ही दूर गए होंगे कि तबेले का आदमी इधर इधर निगाह दौड़ाते हुए इस तरफ आ पहुंचा। उसकी नज़र जैसे ही अपनी खाली बाल्टी पर पड़ी तो वो चौंक पड़ा और फिर अगले ही पल उसके चेहरे पर गुस्से के भाव उभर आए। गंदी गंदी गालियां बकते हुए उसने खाली बाल्टी को उठाया और वापस तबेले की तरफ बढ़ गया।

━━━━━━━━━━━━━━
बहुत ही शानदार अपडेट है ये तीनो निकम्मे और कामचोर है इन्होंने जो भी काम किया है वह मूर्खता और हास्य पूर्ण था
 

Sanju@

Well-Known Member
4,853
19,593
158
Update - 02
━━━━━━━━━━━━━━


संपत की बात सुन कर जगन और मोहन ने सिर हिलाया और फिर एक एक कर के तीनों उस दूध को पीने लगे। इतने सालों में आज पहली बार इतना सारा दूध पीने को मिला था उन्हें। बाल्टी में इतना दूध था कि तीनों के पीने से भी खत्म न हुआ। कुछ देर तक तीनों एक दूसरे का मुंह देखते रहे उसके बाद तीनों ने थोड़ा थोड़ा कर के पूरा दूध पी लिया। पेट पूरी तरह से भर गया था अब। जिस्म में जैसे नई ताज़गी और नई जान आ गई थी। खाली बाल्टी को वहीं छोड़ तीनों भाग लिए उधर से। अभी वो कुछ ही दूर गए होंगे कि तबेले का आदमी इधर इधर निगाह दौड़ाते हुए इस तरफ आ पहुंचा। उसकी नज़र जैसे ही अपनी खाली बाल्टी पर पड़ी तो वो चौंक पड़ा और फिर अगले ही पल उसके चेहरे पर गुस्से के भाव उभर आए। गंदी गंदी गालियां बकते हुए उसने खाली बाल्टी को उठाया और वापस तबेले की तरफ बढ़ गया।

अब आगे....



"अबे उधर क्या देख रहा है?" मोहन चलते चलते जब अचानक रुक गया तो संपत ने पलट कर उससे पूछा____"मार्केट में दुकानें खुल गईं होंगी। चल जल्दी देर मत कर।"

"अबे रुक जा ना थोड़ी देर।" मोहन बिना उसकी तरफ देखे ही बोला____"अपने हीरो को जी भर के देख तो लेने दे बे। साला क्या लगता है। काश! अपन भी इसकी माफिक होता।"

संपत और जगन ने देखा मोहन एक तरफ दीवार में लगे एक बड़े से पोस्टर को देखे जा रहा था। उस पोस्टर में मिथुन चक्रवर्ती की तस्वीर थी। मोहन उसी तस्वीर को बड़े मंत्र मुग्ध अंदाज़ में देखे जा रहा था। ये देख जगन और संपत ने जैसे अपना अपना सिर ही पीट लिया।

"अबे ओ मिथुन के अंध भक्त।" जगन उसके क़रीब आते ही उसके सिर पर हल्के से एक चपत लगाते हुए कहा____"भोसड़ी के अगर आज मार्केट में अपना काम न हुआ तो भूखे ही मरेंगे।"

"तो मर जाने दे ना बे।" मोहन ने कहा____"तू ज़रा अपन के हीरो को तो देख। कितना राप्चिक लगता है ये। क्या बाल हैं इसके, क्या नाचता है ये और तो और फैटिंग कितनी फाड़ू करता है बे।"

"घंटा।" संपत उसके क़रीब आ कर बोला____"पिक्चर में सब नकली होता है, ऐसा अपन ने सुना है। साला ये तो तस्वीर में इतना सुंदर दिखता है तेरे को। अपन ने सुना है कि ये भैंस की तरह करिया है।"

"भोसड़ी के झूठ बोलेगा तो जान से मार दूंगा तुझे।" अपने हीरो की बुराई सुनते ही मोहन गुस्सा हो गया, बोला____"साले सच में अंधा है क्या? दिखता नहीं अपन का हीरो अपन से भी ज़्यादा गोरा और झक्कास है। अगर वो भैंस की तरह करिया होता तो इतनी गोरी गोरी हिरोइनें क्या उसे अपने इतने क़रीब आने देतीं? साला बात करता है झूठा।"

"अच्छा चल ठीक है।" जगन ने मामला रफा दफा करने की गरज से बोला___"तू जो कह रहा है वही सही है। अब चल जल्दी, आज तुझे भी किसी न किसी की जेब साफ करनी होगी समझा?"

"बिल्कुल करेगा बाप।" मोहन ने खुशी से बोला____"आज अपन लंबा हाथ मारेगा और फिर उस पैसे से किसी झक्कास दुकान से अपने हीरो के माफिक कपड़े खरीदेगा, समझा क्या हां?"

"बातें मत चोद।" जगन ने फिर से उसके सिर में एक चपत लगाई, बोला"____"पहले किसी की जेब तो साफ कर के दिखा।"

"अबे इसके बस का घंटा कुछ नहीं है।" संपत ने कहा____"देखना आज भी इसकी वजह से हम पकड़े जाएंगे और फिर पब्लिक अपन लोगों की गांड़ तोड़ाई करेगी।"

"तू चुप कर बे भोसड़ी के।" जगन ने संपत को घूरा____"आज ऐसा नहीं होगा। अब चलो यहां से।"

जगन की बात सुन कर न संपत ने कुछ कहा और ना ही मोहन ने। जगन इन दोनों से उमर में बड़ा था। वो ज़्यादा बोलता नहीं था लेकिन सच तो ये था कि वो दोनों को अपने सगे भाइयों जैसा प्यार करता था और ख़याल भी रखता था। अगर वो किसी बात के लिए मना कर देता था या कह देता था तो ये दोनो चुपचाप उसका कहा मान भी जाते थे।

तीनों नमूने पैदल ही मार्केट जाने वाले रास्ते की तरफ बढ़ चले। ये इनका रोज़ का ही काम था। मार्केट में भीड़ होती थी इस लिए ये लोग किसी न किसी की जेब साफ कर देते थे। ये अलग बात है कि ज़्यादातर ये अपनी हरकतों की वजह से पकड़ लिए जाते थे और फिर लोग अच्छी खासी धुनाई करते थे। बहरहाल, ये तीनों चलते हुए एक मोड़ पर मुड़ गए और अभी चार पांच क़दम ही आगे बढ़े थे कि सामने से तीन लोग आते दिखे। इन तीनों ने उन्हें देखा और उनमें से एक पर नज़र पड़ते ही इन तीनों की हवा निकल गई।

उधर से आ रहे उन तीनों की भी नज़र इन पर पड़ गई थी। कुछ पल ठिठकने के बाद उनमें से एक ने बाकी दोनों से कुछ कहा तो बाकी दोनों ने चौंकते हुए इन तीनों की तरफ देखा।

"अबे वो तो वही है न।" संपत ने जगन और मोहन की तरफ बारी बारी से देखते हुए घबराए हुए स्वर में कहा____"जो कल शाम को तबेले में भैंस का दूध निकाल रहा था?"

"अपन को क्या पता।" मोहन ने लापरवाही से कहा____"अपन ने उसका थोबड़ा थोड़े ना देखा था।"

"अबे भोसड़ी के थोबड़ा तो अपन ने भी नहीं देखा था उसका।" संपत ने खिसियाए हुए लहजे से कहा____"लेकिन उसी के जैसा हट्टा कट्टा दिख रहा है ये और सिर पर लुंगी की पगड़ी भी वैसी ही बांध रखी है।"

संपत की बात सुन कर मोहन या जगन में से कोई कुछ बोलता कि तभी तीनों ने देखा कि उधर से आने वाले वो तीनों आदमी बड़ी तेज़ी से इनकी तरफ आने के लिए दौड़ लगा चुके थे।

"अबे ये वही है।" मोहन घबरा के चीखा____"भागो बे जल्दी वरना ये लोग अपन लोगों की बिना थूक लगाए गांड़ मार लेंगे।"

मोहन का इतना कहना था कि उसके साथ जगन और संपत दोनों भी पलट कर भाग लिए। तीनों ऐसे भाग रहे थे जैसे इनके पीछे सैकड़ों भूत लगे हों। बीच बीच में पलट कर देख भी लेते थे कि पीछा करने वाले आ रहे हैं कि नहीं? मुश्किल से आधा किलो मीटर ही भाग पाए थे कि पीछे आ रहे आदमियों ने इन्हें पकड़ लिया।

"भाग कहां रहे थे मादरचोदो।" तीन में से एक ने गुस्से से कहा____"क्या सोचा था तुम लोगों ने कि बाल्टी भर दूध डकार कर पचा लोगे?"

"ब...बाल्टी....द...दूध????" मोहन मारे ख़ौफ के मिमियाया____"य...ये क्या कह रहे हैं आप?"

"ज़्यादा भोला बनने की कोशिश मत कर भोसड़ी के।" दूसरे ने गुस्से से कहा___"हमें पता चल गया है कि हमारे तबेले से बाल्टी भर दूध चुराने वाले तुम तीनों ही हरामी थे। एक आदमी ने तुम तीनों को एक जगह बाल्टी में से दूध डकारते हुए देखा था। उसी ने ये बात हमें बताई है।"

"अम्मा क़सम साहब।" संपत मारे डर के उसके पैरों में ही गिर गया, बोला____"हमने किसी का दूध नहीं चुराया।"
"लगता है गांड़ तोड़ाई करनी ही पड़ेगी तुम लोगों की।" तीसरे वाले ने सिर हिलाते हुए कहा____"तभी सच उगलोगे तुम लोग।"

कहने के साथ ही उसने बाकी दोनों को पेलाई करने का इशारा कर दिया। बस फिर क्या था, दोनों ने तबीयत से पेलना शुरू कर दिया तीनों को। वातावरण में तीनों की दर्द भरी चीखें गूंजने लगीं। जल्दी ही तीनों ने कबूल कर लिया कि इन्होंने ही उनका दूध चुराया था।

"मादरचोदो बाल्टी में पूरा पूरा आठ लीटर दूध था।" तीसरे ने गुस्से से घूरते हुए कहा____"अगर ईमानदारी से पैसे में हमसे खरीदते तो पंद्रह रुपिया के भाव में हम तुम लोगों को दे देते लेकिन तुमने चोरी किया है इस लिए अब उसका हर्ज़ाना भी भरना होगा।"

"हमें माफ़ कर दो साहब।" जगन ने हाथ जोड़ते हुए कहा____"हमारे पास पैसे नहीं थे और हम तीनों बहुत भूखे थे इस लिए जो सूझा वही कर डाला।"

"तो अब सूद समेत हर्ज़ाना भी भर भोसड़ी के।" पहले वाले ने गुस्से में कहा____"पंद्रह के भाव में आठ लीटर के दूध का एक सौ बीस रुपिया हुआ और हर्ज़ाना हुआ दो सौ रुपिया। यानि पूरे तीन सौ बीस रुपिया दे वरना तीनों को मार मार कर अधमरा कर दिया जाएगा।"

तीन सौ बीस रुपिया सुनते ही तीनों के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई। एक तो वैसे ही मार से गांड़ में दर्द होने लगा था और अब फिर से मार पड़ना तय हो गया था। तीनों ने एक एक कर के उन तीनों के पैर पकड़ लिए और रहम की भीख मांगने लगे मगर हज़ार कोशिश के बाद भी रहम न मिला उन्हें। जगन संपत और मोहन के पास पैसे के नाम पर एक आना भी नहीं था। उनकी बहुत मिन्नतों को देख कर आख़िर तीसरे वाले ने एक फ़ैसला किया।

"ठीक है।" तीसरे वाले ने कहा____"तुम लोगों पर रहम एक ही सूरत पर किया जा सकता है।"
"म..मतलब??" जगन को जैसे कुछ समझ न आया।

"मतलब ये कि तुम लोगों को हर्ज़ाना तो भरना ही पड़ेगा।" तीसरे वाले ने कहा____"अब क्योंकि तुम लोगों के पास हर्ज़ाना भरने के लिए पैसे तो हैं नहीं इस लिए अगर मुझसे रहम चाहिए तो तुम तीनों को मेरे तबेले में काम करना पड़ेगा।"

तीसरे आदमी की बात सुन कर तीनों एक दूसरे की तरफ देखने लगे। किसी के यहां काम करना या नौकरी करना इन लोगों की फितरत में ही नहीं था। उनको तो बस एक ही काम आता था और वो था अपने पेट की भूख मिटाना। इसके लिए वो हमेशा ग़लत तरीका ही अपनाते थे। ईमानदारी से कोई काम करना इन्हें दुनिया का सबसे गंदा काम लगता था।

"क्या हुआ? सांप क्यों सूंघ गया तुम लोगों को?" तीसरे वाले ने गुस्से से तीनों की तरफ देखा, फिर बोला____"काम तो तुम लोगों को करना ही पड़ेगा वरना ऐसी गांड़ तोड़ाई करूंगा कि हगते नहीं बनेगा तुम लोगों से।"

"हमें मंज़ूर है।" डर के मारे संपत जल्दी से बोल पड़ा____"हम तीनों आपके तबेले में काम करने को तैयार हैं।"

"अबे भोसड़ी के ये क्या कह रहा है तू?" मोहन धीरे से बोलते हुए उसकी तरफ गुस्से से देखा तो संपत ने भी उसी अंदाज़ में उससे कहा____"अबे इनकी बात नहीं मानेंगे तो बहुत मार पड़ेगी हमें।" कहने के साथ ही वो थोड़ा उसके कान के पास अपना मुंह ले जा कर धीरे से बोला____"फिकर मत कर, मौका मिलते ही चंपत हो लेंगे अपन लोग।"

संपत की बात सुन कर मोहन मन ही मन मुस्कुराया और फिर वो भी काम करने के लिए राज़ी हो गया। जगन तो ज़्यादातर वही करता था जो संपत निर्णय लेता था। उसके अनुसार उन तीनों में से संपत ही सबसे ज़्यादा होशियार और बुद्धिमान था। बहरहाल, तीनों नमूने जब काम करने के लिए राज़ी हो गए तो वो लोग इन्हें ले कर चल दिए।


{}{}{}{}{}

दो दिन गुज़र गए मगर वैसा न हो सका जैसा कि संपत ने मोहन से कहा था। हालाकि तीनों ही भागने की फ़िराक में थे मगर उन्हें भागने का मौका ही नहीं मिल सका। दो दिन से गांड़ तोड़ मेहनत करवाई जा रही थी तीनों से। तीनों का बुरा हाल हो गया था काम करते करते। दो वक्त का खाना मिलता तो था लेकिन भर पेट नहीं जिसके चलते तीनों को ऐसा लगने लगा था जैसे जिस्म के अंदर अब जान ही नहीं रह गई है। तीनों में से सबसे ज़्यादा कमज़ोर मोहन ही था इस लिए उसकी हालत सबसे ज़्यादा ख़राब थी मगर काम करने के सिवा दूसरा कोई चारा नहीं था।

तबेले के मालिक का नाम जोगिंदर चौधरी था। उमर भले ही उसकी पचास के आस पास थी लेकिन लंबा चौड़ा और हट्टा कट्टा था। बड़ी बड़ी मूंछें और गंजा सिर लिए जब वो तीनों को घुड़कता तो तीनों की हवा टाइट हो जाती थी। जोगिंदर के तबेले में कुल बीस भैंसें थी जिनके खाने पीने का इंतजाम और साफ सफाई की ज़िम्मेदारी अब इन तीनों नमूनों की थी। यूं तो जोगिंदर के तबेले में और भी कई लोग थे लेकिन अब उनका काम इन तीनों पर नज़र रखने का ही था। यही वजह थी कि तीनों को भागने का कोई मौका नहीं मिल रहा था। रात में भी जिस जगह ये सोते थे वहां से निकलना इनके लिए असंभव ही था। असल में तबेले के पीछे की तरफ दो तीन कमरे बने हुए थे। उन्हीं में से एक कमरे में इन तीनों को सोने के लिए कहा जाता था और जब ये तीनों उस कमरे में सोने जाते तो बाहर से कमरे को बंद कर के ताला लगा दिया जाता था। कहने का मतलब ये कि जोगिंदर हर्ज़ाने के रूप में इनकी काफी बेहतर तरीके से पेलाई कर रहा था।

सुबह सूरज निकलने से पहले ही इन्हें जगा दिया जाता था। उसके बाद नित्य क्रिया से फुर्सत होने के बाद ये तीनों तबेले में दाखिल हो जाते थे। तबेले में भैंसों का गोबर उठाना और तबेले की सफाई करना। उसके बाद भैंसों के खाने पीने का इंतजाम करना। इतने में ही दोपहर हो जाती और इनकी हालत ख़राब हो जाती। दोपहर में नहाने धोने के बाद इन्हें खाना दिया जाता जोकि इनकी खुराक़ से कम ही होता था। जोगिंदर के बाकी तीन तीन मुस्टंडे इनकी निगरानी में लगे रहते थे। उन तीनों को जोगिंदर ने बोल रखा था कि अगर ये तीनों काम करने में आनाकानी करें या भागने की कोशिश करें तो इनकी बढ़िया से कुटाई करें। सच तो ये था कि तीनों नमूनों को अपनी ज़िंदगी अब नरक सी लगने लगी थी।

"बेटीचोद काम कर कर के गांड़ का दर्द बढ़ता ही जा रहा है।" दोपहर को कमरे के अंदर बंद मोहन बाकी दोनों की तरफ देखते हुए बोला____"अगर यही हाल रहा तो कसम मरे हुए अम्मा बापू की अपन तो निपट ही जाएगा किसी दिन। ये सब इस मादरचोद संपत की वजह से होरेला है। इसी ने काम करने को हां बोला था और अपन से बोला था कि मौका मिलते ही चंपत हो जाएंगे।"

"काश! हमने उस दिन दूध न चुराया होता।" जगन ने अफसोस जताते हुए कहा____"तो आज कहीं चैन से घूम फिर रहे होते।"

"सही कहा यार।" संपत ने कहा____"अपन को नहीं पता था कि ऐसा कुछ हो जाएगा। काश! किसी ने पहले बता दिया होता तो अपन किसी का दूध चुराने का सोचता ही नहीं।"

"यहां से चंपत होने का कोई न कोई पिलान तो बनाना ही पड़ेगा भाई।" मोहन ने कहा____"वरना वो दिन दूर नहीं जब अपन तीनों लोग इधर ही काम कर कर के मर मरा जाएंगे।"

"हां संपत कुछ सोच यार।" जगन ने हताश भाव से कहा____"आख़िर कैसे इस जगह से निकलें हम?"

"फिलहाल तो चाह कर भी नहीं निकल सकते भाई।" संपत ने कहा____"तूने देखा ही है कि जोगिंदर के वो तीनों सांड अपन लोगों की निगरानी करते हैं। ऊपर से इस कमरे में भी बाहर से ताला लगा देते हैं। ऐसे में निकालना असंभव ही है।"

"अपन के दिमाग़ में एक मस्त पिलान आएला है।" मोहन ने सोचने वाले भाव से कहा___"क्यों न अपन लोग जोगिंदर के उन तीनों सांडों को अपनी तरफ मिला लें। जब वो तीनों अपनी तरफ हो जाएंगे तब अपन लोग आसानी से निकल सकते हैं।"

"तू न अपना ये पिलान गांड़ में डाल ले भोसड़ी के।" संपत ने कहा____"वो क्या तेरी अम्मा के यार हैं साले जो अपनी तरफ हो जाएंगे?"

"जुबान सम्हाल के बोल बे।" मोहन तैश में आ कर बोला____"वरना गांड़ तोड़ दूंगा तेरी।"
"तू चुप कर।" जगन ने उसे गुस्से से देखा, फिर संपत से बोला____"यहां से निकलने का कोई तो रास्ता होगा भाई। तू सोच, मुझे यकीन है तू ज़रूर कोई न कोई तरकीब निकाल लेगा।"

"अपन को लगता है कि अपन लोग यहां से तब तक नहीं निकल पाएंगे जब तक भागने का सोचेंगे।" संपत ने सोचने वाली मुद्रा बना कर कहा____"मतलब कि हमें यहां से भागने का सोचना ही नहीं चाहिए।"

"लो कर लो बात।" मोहन बोल पड़ा____"इसने तो अपनी गांड़ ही खोल कर दे दी। साला कहता है हमें यहां से निकलने का सोचना ही नहीं चाहिए। अबे गाँडू सोचेंगे नहीं तो क्या यहां हर रोज़ ऐसे ही अपनी गांड़ घिसते रहेंगे?"

"बात तो सही कह रहा है ये।" जगन ने सिर हिलाते हुए संपत की तरफ देखा____"अगर यहां से निकलेंगे नहीं तो यहीं पर पिसते रहेंगे भाई। तू भला ऐसा कैसे कह सकता है?"

"अबे तुम लोग अपन की पूरी बात तो सुन लो।" संपत ने कहा____"अपन के कहने का मतलब वो नहीं है जो तुम लोग समझ रेले हो।"

"भोसड़ी के दिमाग़ का भोसड़ा क्यों बना रहा है?" मोहन ने गुस्से में कहा____"साफ साफ बताता क्यों नहीं कि तेरा मतलब क्या है?"

"लौड़े गांड़ से नहीं ध्यान से सुन।" संपत ने उसे घूरते हुए कहा____"जोगिंदर ने अपने तीनों सांडों को अपन लोगों की निगरानी में इस लिए लगा रखा है क्योंकि उसे अच्छी तरह मालूम है कि अपन लोग इधर से चंपत हो जाएंगे। यानि अपन लोगों को उसे यकीन दिलाना होगा कि अपन लोग इधर से चंपत होने का सोचते भी नहीं हैं।"

"अबे लौड़े पर इससे होगा क्या?" मोहन पूछे बगैर न रह सका।
"जब उसे यकीन हो जाएगा तो वो अपने सांडों को अपन लोगों की निगरानी में नहीं लगाएगा।" संपत ने कहा____"और ऐसा भी हो सकता है कि वो अपन लोगों को इस तरह से कमरे में भी न बंद करे। सोच जब ऐसा हो जाएगा तो अपन लोगों के लिए इधर से चंपत हो जाना कितना आसान हो जाएगा।"

"वाह! क्या बात कही है तूने।" जगन उसकी पीठ ठोकते हुए बोला____"पर अपन की समझ में ये नहीं आ रहा कि अपन लोग जोगिंदर को यकीन कैसे दिलाएंगे और क्या वो सच में यकीन करेगा?"

"करना ही पड़ेगा भाई।" संपत ने कहा____"लेकिन उसके लिए अपन लोगों को भी पूरी ईमानदारी से काम करना होगा।"

"अब क्या ईमानदारी दिखाने के लिए उसके सामने अपनी गांड़ ही खोल कर रख दें?" मोहन ने उसे घूरा____"अबे लौड़े कहीं तू सच में उससे गांड़ तो नहीं मरवाने का सोच रहा?"

"बेटीचोद, तुझे तो हर वक्त यही सूझता है।" संपत ने उसे हल्के से एक मुक्कर मारा, फिर बोला____"अपन के कहने का मतलब है कि अब से हम बिना किसी के कहे हर वो काम करेंगे जो इस तबेले में होता है। अभी तक तो हम अपनी मर्ज़ी से कुछ कर ही नहीं रहे थे बल्कि इन लोगों के ज़ोर देने पर ही मजबूरी में कर रहे थे। इस लिए अब से अपन लोगों को किसी को कुछ कहने का मौका ही नहीं देना है। ये समझ ले कि अब से अपन लोग को इस तबेले को अपना ही तबेला समझना है और जी जान लगा के हर काम करना है।"

"तू ही कर साले।" मोहन बीच में ही नाराज़ हो कर बोल पड़ा____"अपन के बस का नहीं है अब काम करना। साला दो दिन से काम कर कर के गांड़ का बुरा हाल हो गया है।"

"इस चिंदी चोर को तू ही समझा बे जगन।" संपत ने शिकायती लहजे में जगन को देखा____"अगर इसने काम करने में ईमानदारी नहीं दिखाई तो घंटा अपन लोग यहां से नहीं निकल पाएंगे।"

"मुझे खुद कुछ समझ में नहीं आ रहा लौड़ा।" जगन ने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा____"भला ईमानदारी से काम कर के हम कैसे यहां से निकल सकेंगे?"

"तू साले शून्य बुद्धि ही रहेगा।" संपत जगन को झिड़कते हुए बोला____"कभी तो अकल लगाया कर गधे।"
"गधा मत बोल बे।" जगन ने गुस्से से देखा उसे____"वरना गांड़ में लंड दे दूंगा।"

"अपन के भेजे में एक और मस्त पिलान आएला है।" मोहन तपाक से बोला____"अपन लोग उस मुछाड़िए जोगिंदर को बोल देते हैं कि हम बीमार हैं। अपन लोगों को बीमार देख वो अपन लोगों को यहां से हस्पताल ले जाएगा। बस, अपन लोग उधर से ही चंपत हो जाएंगे। पिलान मस्त है ना?"

"घंटा मस्त है।" संपत ने कहा____"अपन लोग अगर उसको बोलेंगे कि हम बीमार हैं तो वो समझ जाएगा कि अपन लोग काम न करने के लिए बहाना बना रहे हैं। उसके बाद वो अपने तीनों सांडों के द्वारा ही हमारा इलाज़ करवाएगा।"

"ये भी ठीक कहा तूने।" जगन ने सिर हिलाया____"मादरचोद बड़ी तगड़ी मुसीबत में फंस गएले हैं अपन लोग।"

"यहां से निकलने का बस एक वही उपाय है जो अपन ने बताया है।" संपत ने कहा____"अपन लोगों को पूरी ईमानदारी से काम करना होगा और जब जोगिंदर को हम पर भरोसा हो जाएगा तो वो हम पर नज़र रखवाना बंद करवा देगा। बस तभी अपन लोग यहां से खिसक सकते हैं वरना ऐसे ही गांड़ घिसते रहेंगे यहां।"

"पर ये भी तो सोच बे कि अपन लोग काम कैसे कर पाएंगे?" मोहन ने कहा___"यहां तो दो दिन में ही गांड़ दर्द करने लगी है। आगे और अभी कितना काम करना पड़ेगा जिससे उस जोगिंदर को हम पर यकीन हो जाए?"

"अब ये तो उसकी समझदारी पर है बे।" संपत ने कहा____"अगर अपन लोग पूरे मन से काम करते हुए उसे दिखाएंगे तो संभव है कि उसे जल्दी ही अपन लोगों पर यकीन हो जाए।"

"फिर तो अपन अभी से पूरे मन से काम करने का सोच लेता है।" जगन ने जैसे अपना फैसला सुनाया____"मां चुदाए गांड़ का दर्द, अब तो अपन गांड़ से गू निकलने तक काम करेगा।" कहने के साथ ही उसने मोहन की तरफ देखा और कहा____"और तू भी मन लगा कर काम करेगा वरना जोगिंदर के मुस्टंडों से पहले मैं तेरी गांड़ तोड़ दूंगा, समझा?"

"समझ गया बाप।" मोहन ने सिर हिलाया____"तुम लोग तो साले मेरी गदराई हुई गांड़ के ही पीछे पड़े रहते हो।"

फ़ैसला हो चुका था। कमरे में दो घंटे आराम करने के बाद जगन ने दोनों को उठने को कहा और खुद दरवाज़े की तरफ बढ़ चला। उसने दरवाज़े को थपथपाते हुए आवाज़ लगाई तो कुछ ही देर में दरवाज़ा खुला। दरवाज़े के बाहर तीनों सांड लट्ठ लिए किसी जिन्न की तरह प्रगट हो गए। जगन उन्हें देख कर पहले तो सकपकाया फिर एकदम से तन कर खड़ा हो गया।

"ऐसे दीदे फाड़ के क्या देख रेले हो तुम लोग?" जगन ने बिना ख़ौफ खाए कहा___"एक तरफ हटो अपन लोगों को तबेले में काम करने जाना है।"

जगन की बात सुन कर तीनों के चेहरों पर चौकने वाले भाव उभरे। तीनों ने एक दूसरे की तरफ देखा और फिर जगन को देखते हुए उनमें से एक ने कहा____"दिमाग़ तो ठिकाने पर है न तेरा? इस वक्त तबेले में कौन सा काम करने जा रहा है तू? अंदर जा, चार बजे हम खुद उठाने आएंगे।"

"अंदर टाइम पास नहीं हो रहा भाई।" जगन के पीछे से निकल कर संपत ने कहा____"तबेले में कुछ न कुछ काम करेंगे तो टाइम भी पास हो जाएगा। वैसे भी हम यहां काम करने ही तो आए हैं तो काम करने दो ना हमें।"

संपत की बात सुन कर वो तीनों गौर से संपत जगन और मोहन का चेहरा देखने लगे। इधर इन तीनों की धड़कनें ये सोच कर तेज़ हो गईं थी कि अगर तीनों सांडों ने मना कर दिया तो पिलान ख़राब हो जाएगा।

"ठीक है।" दूसरे ने कहा____"तुम में से दो लोग तबेले की सफाई करने चलो और एक आदमी बर्तन धोने जाएगा।"

उसकी बात सुन कर तीनों खुश हो गए। कुछ ही देर में जगन और संपत को तबेले में पहुंचा दिया गया और मोहन को लिए एक आदमी पानी की टंकी के पास पहुंच गया। तबेले के बाई तरफ ट्यूब वेल था और एक बड़ा सा झोपड़ा भी था। झोपड़े के आस पास कुछ पेड़ पौधे लगे हुए थे जिसकी छांव फैली हुई थी।

"झोपड़े के अंदर दूध के बड़े बड़े कनस्तर रखे हुए हैं।" मोहन को देखते हुए तीन सांडों में से एक ने कहा____"उन्हें धुलने का काम यूं तो हर रोज कमला का है लेकिन अब से तू धोएगा, समझा?"

"क..कमला कौन?" मोहन पूछे बगैर न रह सका था।
"अबे कमला एक औरत है।" उसने मोहन को घूरते हुए कहा____"और वो भी तेरी तरह यहां काम करने आती है। उसके साथ उसकी जेठानी का एक लड़का भी यहां काम करता है।"

मुस्टंडे की बात सुन कर मोहन की आंखों के सामने तीन दिन पहले का वो दृश्य घूम गया जो उसने देखा था। उसने मन ही मन सोचा शायद कमला वही औरत है जो उस दिन एक लड़के के साथ अपनी चूचियां दबवाते हुए मज़े कर रही थी। ये सोचते ही उसके मन में खुशी के लड्डू फूट पड़े और उसके होठों पर मुस्कान उभर आई।

"ज़्यादा खुश मत हो।" उसकी मुस्कान देख उस मुस्टंडे ने कहा____"वो तेरे जैसे लंगूर को घांस नहीं डालने वाली। वो तो हमारे मालिक जोगिंदर चौधरी की रण्डी है।"

"फिर तो उसने तुम्हें भी घांस नहीं डाला होगा।" मोहन बेझिझक बोल उठा____"भला कोई औरत मालिक के नौकरों को क्यों घांस डालेगी जब मालिक ही उसका खासम खास बना हुआ हो।"

"मुझे उसकी घांस से मतलब भी नहीं है लौड़े।" उसने मुस्कुराते हुए कहा____"मैं तो उसकी बेटी की मलाई खाता हूं जो उससे कहीं ज़्यादा करारी माल है।"

"वाह! गुरु तुम तो काफी पहुंचे हुए हरामी हो बे।" मोहन को जाने क्या सूझा कि वो एकदम से उसके पैरों में ही बैठ गया, फिर उसका पैर पकड़ के बोला____"अपन को अपना चेला बना लो गुरु और थोड़ा बहुत अपन को भी मलाई खाने का सुख दे दो।"

"मलाई खाने के लिए पहले सेवा करनी पड़ती है लौड़े।" मोहन के मुख से अपने लिए गुरु शब्द सुन कर वो मुस्टंडा मन ही मन बड़ा खुश हुआ था किंतु अपनी खुशी को दबाते हुए बोला____"मुफ्त में कहीं कुछ नही मिलता, समझा?"

"समझ गया गुरु।" मोहन ने सिर हिलाया____"बस तुम हुकुम करो, अपन सेवा करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा। पर पहले तुम अपन को अपना चेला बना लो गुरु।"

"अच्छा ठीक है ठीक है।" वो मन ही मन गदगद होते हुए बोला____"मैं तुझे अपना चेला बना लेता हूं लेकिन ख़बरदार ये बात तू किसी को नहीं बताएगा वरना गांड़ तोड़ दूंगा तेरी।"

"अपनी मरी हुई अम्मा की क़सम गुरु।" मोहन तपाक से बोला____"अपन अख्खा लाइफ में कभी ये बात किसी को नहीं बताएगा। बस तुम गुरु अपने इस चेले पर अपनी कृपा बनाए रखना।"

"बिल्कुल।" मुस्टंडे ने कहा____"अब चल तू अपना काम कर और हां इधर से भागने का सोचना भी मत वरना समझ गया न?"

"अबे क्या बता करते हो गुरु।" मोहन ने इस तरह मुंह बनाया जैसे उसने उसकी तौहीन कर दी हो, बोला____"अब तो अपन कहीं नहीं जाएगा कसम से। अपन को पता ही नहीं था कि इधर तुम अपन के गुरु बन जाओगे और किसी करारी माल की मलाई खिलाओगे वरना पहले ही आ जाता इधर।"

"मुझे तुझ पर भरोसा तो नहीं है।" उसने मोहन की तरफ देखते हुए कहा____"लेकिन तुझे एक मौका देता हूं मैं। अगर तू सच में मेरे भरोसे पर खरा उतरा तो यकीन रख हर रोज़ तुझे मलाई खाने को मिलेगी।"

"अबे भरोसा रखो गुरु।" मोहन ने कहा____"अपन अब कहीं नहीं जाने वाला। अब तो अपन अपने गुरु के चरणों में ही रहेगा।"

"चल अब बातें मत बना और काम कर।" उसने मुस्कुराते हुए कहा____"कुछ देर में कमला भी आ जाएगी। उसके आने से पहले तुझे सारे बर्तन धो डालने हैं।"

मोहन ने सहमति में सिर हिलाया और झोपड़े के अंदर चला गया। इधर वो मुस्टंडा मन ही मन जाने क्या सोचते हुए पलटा और चला गया। अभी वो कुछ ही दूर गया होगा कि तभी मोहन झट से झोपड़े के दरवाज़े के पास आया और धीमें से बोला____"तू और अपन का गुरु? अबे चल हट।"



━━━━━━━━━━━━━━
बहुत ही शानदार अपडेट है जोगिंदर ने इनको ज्यादा भारी काम भी नही दिया फिर भी इनकी नानी मर गई है तीनो के तीनो फट्टू और बाते बनाने हैं इनसे होता कुछ नही है प्लान तो ऐसे ऐसे बनाते हैं कि इनके प्लान सुनकर हंसी आती है
 

core123

New Member
51
53
18
Bahut hi badhiya
 
  • Like
Reactions: TheBlackBlood

Thakur

असला हम भी रखते है पहलवान 😼
Prime
3,257
6,782
159
Prologue
━━━━━━━━━━━━

तीन ऐसे नमूनों की कहानी जिनका खुद इनके अलावा इस दुनिया में कोई भी अपना नहीं था। क़रीब पन्द्रह साल की उम्र में तीनों के माता पिता स्वर्ग सिधार गए थे। तब से ये तीनों दुनिया की ठोकरों के सहारे ही बड़े हुए। तीनों में से दो तो स्कूल का मुँह देख चुके थे मगर जगन पूरी तरह से अनपढ़ था। ये अलग बात है कि वो बाकी दोनों से उम्र में दो साल बड़ा था। जहां संपत पाँचवीं पास था तो वहीं मोहन पाँचवीं फेल। संपत को अपने पाँचवीं पास होने का बड़ा ही गर्व था और वो खुद को बाकी दोनों से होशियार और बुद्धिमान समझता था जबकि मोहन हमेशा उसके पांचवी पास होने की वजह से उससे चिढ़ता था और हमेशा उसकी होशियारी और बुद्धिमानी पर सवाल खड़ा करता रहता था। दोनों आपस में झगड़ भी पड़ते थे जिस पर जगन ही बीच बचाव करता था।

ऊपर वाले ने तीनों के सिर से माता पिता का साया तो छीना ही लेकिन सबसे बड़ी कमी ये भी कर दी थी कि तीनों का ही दिमाग़ दुनिया और दुनिया वालों के हिसाब से नहीं चलता था। कम से कम शुरुआत में तो ऐसा ही था मगर बढ़ती उम्र के साथ जब दुनिया की ठोकरों में आए तो दुनियादारी की थोड़ी बहुत समझ भी आई। ये अलग बात है कि ये समझ आम ब्यक्तियों के मुकाबले कम ही थी।

तीनों का आपस में चाहे जितना ही झगड़ा हो जाए लेकिन तीनों एक दूसरे के बिना रहते भी नहीं थे। तीनों की हरकतें और उनका बुद्धि से हीन शो कराने की वजह से कोई इनसे दोस्ती नहीं करता था। बड़ी विचित्र बात थी कि इतनी खामियों के बाद भी तीनों कभी कभी ऐसे काम भी कर गुज़रते थे जिसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था। बड़े अज़ीब किस्म के थे तीनों, क्योंकि इनके अपने जीवन का कोई ख़ास उद्देश्य ही नहीं था। क्या सही है और क्या ग़लत इससे इन्हें कोई मतलब नहीं था। सब कुछ इनके मूड पर ही निर्भर करता था। जो मन में आता था कर ड़ालते थे, फिर चाहे भले ही उसके नतीजे इनके लिए हानिकारक ही क्यों न हों।

अपनी बीस साल की उम्र में ये तीनों क‌ई शहरों में अपने ठिकाने बदल चुके थे और हर जगह अपनी छाप छोड़ चुके थे। अपनी जीविका चलाने के लिए कहीं नौकरी करना इन्हें पसंद ही नहीं था इस लिए पेट भरने के लिए ज़्यादातर ये तीनों नंबर दो के काम करते थे। यूं तो कभी पुलिस के हाथों पकड़े नहीं गए लेकिन अगर किसी वजह से किसी के द्वारा पकड़े भी गए तो इन लोगों ने अपनी हरकतों से ऐसा ज़ाहिर किया जैसे ये दुनिया के कितने बड़े मासूम हैं और मज़े की बात ये है कि लोगों ने भोला और नादान समझ कर इन्हें छोड़ भी दिया।


कहते हैं ऊपर वाला सबको देखता है और हर इंसान के लिए कुछ न कुछ सोचे हुए होता है जिसके चलते इंसान अपने जीवन पथ पर आगे बढ़ता रहता है। बहरहाल ये कहानी इन तीनों नमूनों के इर्द गिर्द ही घूमती है। हर मुसीबत से बच निकलने वाले ये नमूने एक दिन एक ऐसी मुसीबत में फंस गए जहां से निकलना इनके लिए बेहद ही मुश्किल हो गया था और फिर इनके साथ क्या हुआ....ये कहानी में पता चलेगा।
:congrats: . for new story.
 

Thakur

असला हम भी रखते है पहलवान 😼
Prime
3,257
6,782
159
Update - 01
━━━━━━━━━━━━━━




"क्या लगता है तुझे बूम बूम फुस्स होगा?" जगन ने सड़क पर निगाहें जमाए पूछा।
"अरे! इस बार ज़रूर होगा देख लेना।" मोहन ने सिर हिला कर कहा।

"पिछली बार भी तूने यही बोला था मगर घण्टा कुछ नहीं हुआ।" संपत ने चिढ़े हुए लहजे में कहा____"साला जीप के दोनों पहिए उनके किनारे से निकल गए थे।"

"अरे! इस बार पक्का होगा रे, तेरे माल की कसम।" मोहन ने अपनी खीसें निपोर दी।
"मुझे यकीन है इस बार भी कुछ नहीं होगा और पहिए उनके बगल से छू मंतर कर के निकल जाएंगे। लिख के ले ले मेरे से।" संपत ने अपनी हथेली उसके सामने कर दी।

"भोसड़ी के तू न ज़्यादा ज्ञान न पेल समझा। अपन ने कह दिया कि इस बार होगा तो ज़रूर होगा।" मोहन ने मजबूती से सिर हिलाया।

"लंड होगा भोसड़ी के।" संपत ने खिसिया कर कहा____"साले पाँचवीं फेल तेरे भेजे में भेजा ही नहीं है। अपन ने पहले जो तरीका बताया था उसी से होगा।"

"ओए! पाँचवीं फेल किसको बोला बे?" मोहन मानों तैश में आ कर बोला____"तेरे से ज़्यादा भेजा है अपन के भेजे में। तू पांचवीं पास है तो क्या हुआ।"

"अपन पांचवीं पास है तभी कुछ होता है और इसका सबूत हज़ारो बार तुम दोनों देख चुके हो।" संपत ने मुंह बनाते हुए कहा____"हर बार अपन के ही तरीके से काम होता है। साला बात करता है...हुंह।"

"घंटा, इस बार तो अपन के तरीक़े से ही काम होगा देख लेना।" मोहन ने आँखें दिखा कर कहा।

"और अगर न हुआ तो?" संपत ने जैसे उसे ताव दिया।
"तो मेरी गांड मार लेना अब खुश?" मोहन ने मानों फ़ैसला सुना दिया।

"सुन रहा है न बे जगन?" संपत ने तीसरे की तरफ देखा____"अभी तूने भी सुना न इसने क्या बोला है? अब अगर ये अपने कहे से मुकरा तो इसकी गांड मारने में तू मेरी मदद करेगा।"

"क्यों अकेले तेरे बस का नहीं है क्या?" मोहन ब्यंग से हंस पड़ा।

"अबे दम तो बहुत है पर लौड़ा तू भाग खड़ा होता है न।" संपत ने जैसे उसे समझाते हुए कहा____"इस लिए जगन तुझे पकड़ के रखेगा ताकि मैं तेरी सड़ेली गांड में अपना मोटा लंड डाल कर तेरी गांड मार सकूं।"

"ओए! चुप करो बे भोसड़ी वालो।" जगन ने दोनों को घुड़की दी और सड़क के छोर की तरफ देखते हुए बोला____"उधर से एक जीप आ रही है। इस बार अगर गड़बड़ हुई तो माँ चोद दूंगा तुम दोनों की।"

"अबे मेरी माँ कैसे चोदेगा चिड़ी मार?" संपत जैसे नाराज़ हो गया_____"वो तो कब का मर चुकी है। और वैसे भी गड़बड़ तो इस गांडू की वजह से होगी।"

उसकी बात पर मोहन गुस्से से अभी कुछ बोलने ही वाला था कि जगन ने उसके सिर पर चपत मार कर उसे चुप करा दिया। तीनों सड़क के उस छोर की तरफ देखने लगे थे जिस तरफ से एक कार आ रही थी। जैसे जैसे वो कार क़रीब आ रही थी तीनों की धड़कनें भी बढ़ती जा रहीं थी।

"इस बार तो बूम बूम फुस्स हो के ही रहेगा देख लेना " मोहन ख़ुशी से बड़बड़ाया। उसकी बात बाकी दोनों के कानों में भी पहुंची थी लेकिन दोनों ही चुप रहे और कार पर नज़रें जमाए रहे।

इस वक्त ये तीनों सड़क से क़रीब दस फीट दूर उस तरफ थे जहां पर कुछ पेड़ पौधे थे। ज़ाहिर है तीनों ही छिपे हुए थे। जिस जगह पर ये तीनों छिपे हुए थे उसी के सामने सड़क के बीच में लोहे की दो कीलें खड़ी कर के रख दी गईं थी। वो कीलें रखने वाला पाँचवीं फेल मोहन था जबकि पाँचवीं पास यानि संपत उसके इस तरीके से पूरी तरह असहमत था। इसके पहले तीन बार कोई न कोई वाहन आ कर निकल गया था लेकिन वो नहीं हुआ था जिसके लिए सड़क पर वो कीलें खड़ी कर के रखी गईं थी। हर बार वाहन के पहिए कभी कीलों के इस तरफ से तो कभी उस तरफ से निकल जाते थे।

आम तौर पर अगर कोई लुटेरा इस तरह से किसी वाहन को लूटने का सोचता है तो वो सड़क पर या तो कई सारे पत्थर रख कर सड़क को ब्लॉक कर देता है या फिर सड़क पर एक्सीडेंट का बहाना बना कर खुद ही लेट जाता है। या फिर सड़क पर ढेर सारी कीलें डाल देता है जिससे वाहन के पहिए पंक्चर हो जाते हैं मगर यहाँ पर ऐसा नहीं था। जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि तीनों ही बुद्धि से माशा अल्ला थे और जिसके पास थोड़ी बहुत बुद्धि थी भी उसकी वो बुद्धि से हीन ब्यक्ति मान नहीं रहा था। मोहन ने सड़क के बीच में कुछ फा़सले पर सिर्फ दो कीलें रखीं थी और पूरे यकीन के साथ कह रहा था कि जो भी वाहन आएगा वो उन कीलों की वजह से ज़रूर पंक्चर हो जाएगा जबकि संपत इस बात से असहमत था। जगन ने हमेशा की तरह ये सोच कर कोई ज्ञान नहीं दिया था कि वो अनपढ़ है। उसके ज़हन में ये बात बैठी हुई थी कि वो अनपढ़ है इस लिए उसके पास कोई ज्ञान ही नहीं है। ऐसे थे ये तीनों नमूने.....!

"ओए! देख वो जीप एकदम पास आ गई है।" मोहन से रहा न गया तो मारे ख़ुशी के बोल ही पड़ा____"देखना इस बार इस जीप के पहिए मेरी डाली कीलों पर चढ़ जाएंगे और फिर बूम्ब बूम्ब....फुस्सस्सस्स हाहाहा।"

"भोसड़ी के अभी तो तू खुश हो रहा है।" संपत ने जैसे उसे चेताया_____"मगर थोड़ी ही देर में तू दहाड़ें मार के रोएगा जब मैं तेरी गांड मारुंगा।"

"अबे चल हट, मर गए अपन की गांड मारने वाले।" उसने शेख़ी से कहा____"अब तो अपन तेरी गांड मारेगा। देखना इस बार ये कार फुस्स्स हो जाएगी और फिर सबसे पहले मैं तेरी तबीयत से बजाऊंगा, लोल।"

"तुम दोनों चुप हो जाओ वरना मैं तुम दोनों के मुँह में लंड दे दूंगा।" जगन ने गुस्से से दोनों की तरफ देखा।

तभी वो कार उन कीलों के एकदम पास पहुँच गई। तीनों की धड़कनें जैसे एकदम से रुक ग‌ईं। उनके देखते ही देखते वो कार कीलों के बगल से निकल गई। कार के निकल जाने से नीचे सड़क पर थोड़ी हवा लगी जिससे दोनों कीलें सड़क पर गिर ग‌ईं। ये देख जहां मोहन की शकल बिगड़ कर रो देने वाली हो गई वहीं संपत ने झपट कर उसे दबोच लिया। उधर जगन गुस्से से मोहन को घूरे जा रहा था।

"अबे देख क्या रहा है जगन, पकड़ इस भोसड़ी वाले को।" संपत ने जगन को ज़ोर से आवाज़ लगाई____"ये चौथी बार था जब इसका तरीका काम नहीं आया। अब तो इसकी गांड मार के ही रहूंगा।"

"सही कहा तूने।" जगन ने भी झपट कर मोहन को पकड़ लिया, बोला____"अब तो मैं खुद भी इसको पेलूंगा।"

"अबे मादरचोदो, गंडमरो, छोड़ दो बे।" पाँचवीं फेल मोहन मानों गुहार लगा कर चिल्लाने लगा____"क्यों मेरी गदराई गांड के पीछे पड़े हो बे? सालो मुझ अबला पुरुष पर कुछ तो रहम करो रे।"

"भोसड़ी के तेरी वजह से चार बार हम नकाम हुए हैं।" संपत ने जबरदस्ती उसके पैंट की बेल्ट खोलते हुए कहा_____"ऊपर से खड़ी धूप में बुरा हाल हुआ सो अलग। जगन ज़ोर से पकड़ इस गांडू को। आज हम दोनों इसकी पेलाई करेंगे।"

"अबे हब्सियो, बेटीचोदो, रुक जाओ बे।" मोहन बुरी तरह छटपटाते हुए चिल्लाए जा रहा था____"मादरचोदो रहम करो बे। अपन ने सुना है गांड मरवाने में भयंकर दर्द होता है। क्या सच में मेरी गांड मार लोगे बे, छोड़ो मुझे।"

"साले दर्द होगा तभी तो तेरी अकल ठिकाने आएगी।" सम्पत उसकी पैंट पकड़ कर नीचे खींचते हुए बोला। इस वक्त वो बड़ा ही खुश दिखाई दे रहा था। ज़ाहिर है उसके मन की मुराद जो पूरी होने जा रही थी।

"अबे मादरचोदो, सबसे छोटा हूं और बिना माँ बाप का हूं इस लिए मुझे इतना सता रहे हो कमीनो।" मोहन छटपटाते हुए फिर से चीखा।

"भोसड़ी के बिना माँ बाप के तो हम दोनों भी हैं।" जगन ने एक मुक्का उसके पेट में मारा तो वो दोहरा हो कर चीख पड़ा, फिर हैरानी ज़ाहिर करते हुए बोला____"अबे तुम दोनों के भी माँ बाप मर गए? ये कब हुआ? तुम दोनों ने मुझे पहले बताया क्यों नहीं?"

"बीस सालों में ये बात लगभग लाखों बार तुझे बता चुके हैं भोसड़ी के।" सम्पत ने पैंट को खींच के उसकी टाँगों से अलग कर दी, और फिर उसके कच्छे को पकड़ते हुए बोला_____"और तू हर बार भूल जाता है, पर अब से नहीं भूलेगा।" कहने के साथ ही उसने जगन की तरफ देखते हुए कहा____"पहले तू इसकी गांड मारेगा या मैं?"

"अबे मादरचोदो, कमीनो, कुत्तो छोड़ दो बे।" संपत ने जैसे ही उसके कच्छे को पकड़ कर उतारना चाहा तो वो पूरी ताकत लगा कर खुद को छुड़ाने की कोशिश करने लगा, फिर बोला____"मेरी गांड की तरफ देखा भी तो अच्छा नहीं होगा। सालों दोनों के मुँह में हग दूंगा।"

इतना कहने के बाद उसने अज़ीब तरह से ज़ोर लगाते हुए अपने जिस्म को उठाया तो अगले ही पल फ़िज़ा में उसके पादने की ज़ोरदार आवाज़ गूँज उठी।

"तेरी माँ की चूत भोसड़ी के।" संपत जो उसके नीचे ही घुटनों के बल बैठा था उसके पादते ही उसका कच्छा छोड़ भाग कर दूर खड़ा हुआ और इधर जगन भी उसे छोड़ कर दूर हट गया। दोनों ने अपनी अपनी नांक दबा ली थी।

"लगता है बिना गांड मरवाए ही तेरी फट गई भोसड़ी के।" जगन ने एक लात उसकी पसली में मारते हुए कहा तो मोहन दर्द से कराहा और फिर जल्दी ही उठ कर अपनी पैंट पहनने लगा।

"देख लूंगा तुम दोनों को भोसड़ी वालो।" फिर उसने दोनों को घूरते हुए कहा____"किसी दिन सोते में ही तुम दोनों की गांड मार लूंगा मैं।"

"लगता है इसकी गांड मारनी ही पड़ेगी।" जगन ने संपत की तरफ देखा____"पकड़ इसको, इस बार चाहे ये पादे या हग दे लेकिन रुकना मत।"

दोनों को अपनी तरफ बढ़ते देख वो एकदम से हड़बड़ाया और सड़क की तरफ गालियां देते हुए भाग खड़ा हुआ। इधर जगन और संपत मुस्कुराते हुए सड़क की तरफ बढ़ चले।

{}{}{}{}

शाम हो चुकी थी और चारो तरफ हल्का अंधेरा छा गया था। संपत जगन और मोहन नाम के तीनों नमूने भूख से बेहाल दर दर भटकते हुए भैंसों के एक तबेले के पास पहुंचे। उन्होंने देखा तबेले में कई सारी भैंसें बंधी हुईं थी और हरी हरी किंतु कतरी हुई घांस में मोया हुआ भूसा खा रहीं थी। तबेले में एक लंबा चौड़ा तथा हट्टा कट्टा आदमी एक भैंस के पास बैठा बाल्टी में लिए पानी से उसके थनों को धो रहा था।

"काश! हम भी भैंस होते तो कितना अच्छा होता ना?" मोहन ने तबेले की तरफ ललचाई हुई दृष्टि से देखते हुए कहा____"कभी भूखे ना रहना पड़ता। साला भर पेट भूसा खाने को मिलता।"

"सही कह रहा है।" संपत ने जैसे उसकी बात का समर्थन करते हुए कहा____"और हगने के लिए भी कहीं नहीं जाना पड़ता। उन भैंसों की तरह एक ही जगह पर खड़े खड़े खाना खाते और वहीं हगते रहते। इतना ही नहीं हमें खुद नहाने की भी ज़रूरत न पड़ती, क्योंकि वो तबेले वाला आदमी हमें रोज़ अच्छे से मल मल के नहलाता।"

"सच में यार।" जगन ने मानो आह भरी____"क्या किस्मत है उन भैंसों की। काश हम भी भैंस होते तो हमारी भी किस्मत ऐसी ही मस्त होती।"

"अबे सुन मेरे भेजे में अभी अभी एक मस्त पिलान आएला है।" मोहन ने उस हट्टे कट्टे आदमी की तरफ देखते हुए कहा____"अपन लोग चुपके से तबेले में चलते हैं और भैंसों के दूध में मुंह लगा कर सारा दूध पी लेते हैं। कसम से बे मज़ा ही आ जाएगा।"

"घंटा मज़ा आ जाएगा।" संपत उसे घूरते हुए बोला____"अगर एक बार भी भैंस ने लात मार दी तो अपन लोगों का भेजा भेजे से निकल के बाहर आ जाएगा समझा?"

"अबे ऐसा कुछ नहीं होगा।" मोहन लात खाने के डर से कांप तो गया था किंतु फिर जल्दी ही अपनी बुद्धि का दिखावा करते हुए बोला____"हम में से दो लोग भैंस के पैर पकड़ लेंगे और एक आदमी गटागट कर के जल्दी जल्दी भैंस का दूध पी लेगा। उसके बाद ऐसे ही हम तीनों एक एक कर के भैंस का दूध पी लेंगे।"

"तू न अपनी बुद्धि अपनी गांड़ में डाल ले भोसड़ी के।" संपत ने तैश में कहा____"साले तुझे अभी पता नहीं है कि भैंस में कितनी ताकत होती है। अगर हम उसका पैर पकड़ेंगे तो वो एक ही झटके में हमें उछाल कर दूर फेंक देगी। दूध तो घंटा न पी पाएंगे मगर हाथ मुंह ज़रूर तुड़वा लेंगे अपना।"

"अबे एक बार कोशिश तो करनी ही चाहिए न।" मोहन मानों अपनी बुद्धि द्वारा कही गई बात मनवाने की ज़िद करते हुए बोला____"क्या पता भैंस को हम पर तरस ही आ जाए और वो आसानी से हमें अपना दूध पिला दे।"

"चल मान लिया कि भैंस कुछ न करेगी।" संपत ने कहा_____"पर अगर तबेले के उस हट्टे कट्टे आदमी ने हमें दूध पीते देख लिया तो? लौड़े वो बिना थूक लगाए हम तीनो की गांड़ मार लेगा। दूध तो नहीं पर अपनी अपनी गांड़ फड़वाए ज़रूर यहां से जाना पड़ेगा हमें।"

संपत की बात सुन कर एक बार फिर से मोहन डर से कांप गया। इस बार उससे कुछ कहते ना बन पड़ा था। ये अलग बात है कि वो एक बार फिर से अपना दिमाग़ लगाने में मशगूल हो गया था।

"क्या हुआ चुप क्यों हो गया?" मोहन को ख़ामोश देख संपत ने मुस्कुराते हुए कहा____"गांड़ फट गई क्या तेरी?"

"बेटा दूध तो पी के ही जाएंगे यहां से।" मोहन जैसे हार मानने वाला नहीं था, बोला____"फिर चाहे अपनी गांड़ ही क्यों न फड़वानी पड़े। साला पेट में चूहे दौड़ रहे हैं। अगर कुछ खाने को न मिला तो कुछ देर में मर जाऊंगा मैं।"

"क्यों न हम उस तबेले वाले से दूध मांग लें।" काफी देर से चुप जगन ने मानों खुद राय दी____"उससे कहें कि हम भूखें हैं और हमें थोड़ा दूध दे दे।"

"तू तो चुप ही रह बे कूड़मगज।" संपत मानों चढ़ दौड़ा उस पर____"वो कोई सत्यवादी हरिश्चंद्र नहीं है जो मांगने से हमें अपना दूध दान में दे देगा।"

"एक काम करते हैं फिर।" मोहन को जैसे एक और तरकीब सूझ गई, खुशी से बोला____"हम दूध चुरा लेते हैं। जब वो आदमी भैंस का दूध बाल्टी में निकाल लेगा तो हम उसे चुरा लेंगे। पिलान मस्त है न?"

"घंटा मस्त है।" संपत ने बुरा सा मुंह बनाया____"भला हम उस हट्टे कट्टे आदमी के रहते उसका दूध कैसे चुरा लेंगे? अगर उसने दूध चुराते हुए हमें देख लिया तो समझो हम तीनों की गांड़ बिना तेल लगाए मार लेगा वो।"

"बेटीचोद तुझे तो अपन की हर बात फिजूल ही लगती है।" मोहन ने गुस्से से कहा____"खुद को अगर इतना ही हुद्धिमान समझता है तो तू ही बता कैसे हम उसका दूध पी सकेंगे?"

मोहन की बात सुन कर संपत सोचने वाली मुद्रा में आ गया। वो तबेले की तरफ देखते हुए सोच में डूब ही गया था कि तभी उसकी नज़र तबेले के बाहर अभी अभी नज़र आए एक युवक और एक औरत पर पड़ी। युवक इन तीनों की ही उमर का था जबकि वो औरत उमर में उससे काफी बड़ी थी। तबेले के बगल में अचानक ही वो दोनों जाने कहां से आ गए थे। युवक ने उस औरत को पीछे से पकड़ कर खुद से चिपका लिया और दोनों हाथों से उस औरत की बड़ी बड़ी चूचियों को मसलने लगा। ये देख संपत के जिस्म में झुरझुरी सी होने लगी। उसने फ़ौरन ही मोहन और जगन को उस तरफ देखने को कहा तो वो दोनों भी उस तरफ देखने लगे। वो औरत चूचियों के मसले जाने से मचले जा रही थी।

"इसकी मां की।" मोहन बोल पड़ा____"उधर तो कांड हो रेला है बे।"
"तुझे भी करना है क्या?" संपत ने उसके बाजू में हल्के से मुक्का मारा तो मोहन ने कहा____"मिल जाए तो कसम से मज़ा ही जाए।"

मोहन की बात पर संपत अभी कुछ बोलने ही वाला था कि तभी उसने देखा तबेले में भैंस के थन को धुल रहा आदमी उठा और कुछ दूर रखी दूसरी बाल्टी को उठा कर दीवार के पास रख दिया। हल्के अंधेरे में भी बाल्टी में भरा सफेद दूध दिख रहा था। आदमी पलट कर फिर से भैंस के पास गया और बाल्टी का पानी एक तरफ फेंक कर उसमें उस भैंस का दूध निकालने लगा।

"अबे काम बन गया।" संपत एकदम से उत्साहित सा बोल पड़ा तो बाकी दोनों चौंक पड़े और उसकी तरफ सवालिया निगाहों से देखने लगे।

"तुम दोनों ने देखा न अभी अभी वो तबेले वाला हट्टा कट्टा आदमी बाल्टी भर दूध उस दीवार के पास रख के गया है।" संपत कह रहा था____"और अब वो उस भैंस के पास जा कर उसका दूध निकाल रहा है। बस यहीं पे काम बन गया है।"

"अपनी समझ में घंटा कुछ नहीं आया।" मोहन ने झल्ला कर कहा____"साफ साफ बता ना भोसड़ी के।"

"समझ में तो तब आएगा भोसड़ी के।" संपत ने उसे घूरते हुए कहा____"जब तेरे भेजे में भेजा होगा। साला पांचवीं फेल।"

"पांचवीं फेल किसको बोला बे?" मोहन गुस्से से चढ़ दौड़ा उस पर मगर जगन ने बीच में ही रोक लिया उसे।
"तू बता तेरे दिमाग़ में क्या तरकीब है?" फिर जगन ने संपत से पूछा।

"तू तो देख ही रहा है कि इस वक्त तबेले में वो आदमी अकेला ही भैंस का दूध निकाल रहा है।" संपत जैसे समझाते हुए बोला____"और हमारी तरफ उसकी पीठ है। इधर तबेले के बगल से दीवार के उस पार वो लड़का उस औरत के साथ लगा हुआ है। यानि उसका ध्यान हमारी तरफ हो ही नहीं सकता। तो अब तरकीब यही है कि हम तीनों चुपके से वहां चलते हैं और दीवार के पास रखी दूध से भरी उस बाल्टी को उठा कर छू मंतर हो जाते हैं। ना तो तबेले वाले उस आदमी को इसका पता चल पाएगा और न ही उन दोनों को जो दीवार के पार कांड कर रहे हैं। क्या बोलता है, तरकीब मस्त है ना।"

"कोई ख़ास नहीं है।" मोहन ने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा। इस पर संपत उसकी तरफ इस अंदाज़ से देखा जैसे उसने कोई किला फतह कर लिया हो और उसके सामने उसकी बुद्धि की कोई औकात ही नहीं है।

बहरहाल, संपत के कहे अनुसार तीनों चुपके से तबेले की तरफ बढ़ चले। कुछ ही देर में वो तीनों उस बाल्टी के पास पहुंच गए। तीनों की ही धड़कनें बढ़ी हुईं थी। संपत ने जहां जगन को आस पास नज़र रखने का इशारा कर दिया था वहीं मोहन को तबेले वाले आदमी और उन दोनों की तरफ जो कांड कर रहे थे। संपत ने जैसे ही दूध से भरी बाल्टी को हाथ लगाया तो तबेले में मौजूद दो तीन भैंसों ने उसकी तरफ देखा और एकदम से रंभाने लगीं। भैंसों की आवाज़ सुन कर तीनों की ही गांड़ फट के हाथ में आ गई। उधर भैंसों के रंभाने से तबेले वाले उस आदमी ने गर्दन घुमा कर एक बार भैंसों की तरफ देखा और फिर से अपने काम में लग गया। ये देख संपत ने राहत की सांस ली और बाल्टी को उठा कर दबे पांव वापस चल पड़ा। उसके पीछे जगन और मोहन भी हलक में फंसी सांसों को लिए चल पड़े।

कुछ ही देर में तीनों तबेले से दूर आ कर एक बढ़िया सी जगह पर रुक कर सुस्ताने लगे। दूध से भरी बाल्टी तीनों के बीच रखी हुई थी जिसमें भैंस का गाढ़ा दूध झाग के साथ बाल्टी की सतह तक भरा हुआ था।

"मान गया तेरे दिमाग़ को।" जगन ने संपत की तारीफ़ करते हुए कहा____"क्या तरकीब लगाई तूने। अगर तू ऐसी तरकीब न लगाता तो आज हम तीनों भूखे ही मर जाते।"

"इतनी भी खास तरकीब नहीं थी इस चिड़ी मार की।" मोहन ने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा____"शुकर करो कि उस आदमी ने भैंसों की आवाज़ को सुन कर सिर्फ भैंसों की तरफ देखा था। अगर उसने एकदम से पीछे की तरफ ही देख लेता तो सोचो हमारा क्या हाल होता फिर।"

"जो भी हो।" जगन ने कहा____"पर ये तो सच है न कि संपत की वजह से ही इतना सारा दूध हमें पीने के लिए मिल गया है। साला दोपहर से कुछ खाने को नहीं मिला था। इस दुनिया के लोग बड़े ही ज़ालिम हैं। कोई भूखे को खाना ही नहीं देता।"

"अब ये सब छोड़ो।" संपत ने कहा____"और बाल्टी के इस दूध को पीना शुरू कर दो। उसके बाद हम फ़ौरन ही इस जगह से भाग जाएंगे। अगर तबेले वाला वो आदमी अपने दूध की खोज करते हुए इस तरफ आ गया तो लेने के देने पड़ जाएंगे।"


संपत की बात सुन कर जगन और मोहन ने सिर हिलाया और फिर एक एक कर के तीनों उस दूध को पीने लगे। इतने सालों में आज पहली बार इतना सारा दूध पीने को मिला था उन्हें। बाल्टी में इतना दूध था कि तीनों के पीने से भी खत्म न हुआ। कुछ देर तक तीनों एक दूसरे का मुंह देखते रहे उसके बाद तीनों ने थोड़ा थोड़ा कर के पूरा दूध पी लिया। पेट पूरी तरह से भर गया था अब। जिस्म में जैसे नई ताज़गी और नई जान आ गई थी। खाली बाल्टी को वहीं छोड़ तीनों भाग लिए उधर से। अभी वो कुछ ही दूर गए होंगे कि तबेले का आदमी इधर इधर निगाह दौड़ाते हुए इस तरफ आ पहुंचा। उसकी नज़र जैसे ही अपनी खाली बाल्टी पर पड़ी तो वो चौंक पड़ा और फिर अगले ही पल उसके चेहरे पर गुस्से के भाव उभर आए। गंदी गंदी गालियां बकते हुए उसने खाली बाल्टी को उठाया और वापस तबेले की तरफ बढ़ गया।

━━━━━━━━━━━━━━
Shuruaat gajab he aur inki low grade planning ke kya he kehne :bow:
Kher he Shubham bhai jab aap ko lage ab sahi he tab Pyar ka sabut start karna :approve: yu to me jab likhta hu tab 10-12 review/comments ko enough samaz ke next update deta hu par har kisi ka apna apna expectation he view he. Keep rocking
 

Thakur

असला हम भी रखते है पहलवान 😼
Prime
3,257
6,782
159
Update - 02
━━━━━━━━━━━━━━


संपत की बात सुन कर जगन और मोहन ने सिर हिलाया और फिर एक एक कर के तीनों उस दूध को पीने लगे। इतने सालों में आज पहली बार इतना सारा दूध पीने को मिला था उन्हें। बाल्टी में इतना दूध था कि तीनों के पीने से भी खत्म न हुआ। कुछ देर तक तीनों एक दूसरे का मुंह देखते रहे उसके बाद तीनों ने थोड़ा थोड़ा कर के पूरा दूध पी लिया। पेट पूरी तरह से भर गया था अब। जिस्म में जैसे नई ताज़गी और नई जान आ गई थी। खाली बाल्टी को वहीं छोड़ तीनों भाग लिए उधर से। अभी वो कुछ ही दूर गए होंगे कि तबेले का आदमी इधर इधर निगाह दौड़ाते हुए इस तरफ आ पहुंचा। उसकी नज़र जैसे ही अपनी खाली बाल्टी पर पड़ी तो वो चौंक पड़ा और फिर अगले ही पल उसके चेहरे पर गुस्से के भाव उभर आए। गंदी गंदी गालियां बकते हुए उसने खाली बाल्टी को उठाया और वापस तबेले की तरफ बढ़ गया।

अब आगे....



"अबे उधर क्या देख रहा है?" मोहन चलते चलते जब अचानक रुक गया तो संपत ने पलट कर उससे पूछा____"मार्केट में दुकानें खुल गईं होंगी। चल जल्दी देर मत कर।"

"अबे रुक जा ना थोड़ी देर।" मोहन बिना उसकी तरफ देखे ही बोला____"अपने हीरो को जी भर के देख तो लेने दे बे। साला क्या लगता है। काश! अपन भी इसकी माफिक होता।"

संपत और जगन ने देखा मोहन एक तरफ दीवार में लगे एक बड़े से पोस्टर को देखे जा रहा था। उस पोस्टर में मिथुन चक्रवर्ती की तस्वीर थी। मोहन उसी तस्वीर को बड़े मंत्र मुग्ध अंदाज़ में देखे जा रहा था। ये देख जगन और संपत ने जैसे अपना अपना सिर ही पीट लिया।

"अबे ओ मिथुन के अंध भक्त।" जगन उसके क़रीब आते ही उसके सिर पर हल्के से एक चपत लगाते हुए कहा____"भोसड़ी के अगर आज मार्केट में अपना काम न हुआ तो भूखे ही मरेंगे।"

"तो मर जाने दे ना बे।" मोहन ने कहा____"तू ज़रा अपन के हीरो को तो देख। कितना राप्चिक लगता है ये। क्या बाल हैं इसके, क्या नाचता है ये और तो और फैटिंग कितनी फाड़ू करता है बे।"

"घंटा।" संपत उसके क़रीब आ कर बोला____"पिक्चर में सब नकली होता है, ऐसा अपन ने सुना है। साला ये तो तस्वीर में इतना सुंदर दिखता है तेरे को। अपन ने सुना है कि ये भैंस की तरह करिया है।"

"भोसड़ी के झूठ बोलेगा तो जान से मार दूंगा तुझे।" अपने हीरो की बुराई सुनते ही मोहन गुस्सा हो गया, बोला____"साले सच में अंधा है क्या? दिखता नहीं अपन का हीरो अपन से भी ज़्यादा गोरा और झक्कास है। अगर वो भैंस की तरह करिया होता तो इतनी गोरी गोरी हिरोइनें क्या उसे अपने इतने क़रीब आने देतीं? साला बात करता है झूठा।"

"अच्छा चल ठीक है।" जगन ने मामला रफा दफा करने की गरज से बोला___"तू जो कह रहा है वही सही है। अब चल जल्दी, आज तुझे भी किसी न किसी की जेब साफ करनी होगी समझा?"

"बिल्कुल करेगा बाप।" मोहन ने खुशी से बोला____"आज अपन लंबा हाथ मारेगा और फिर उस पैसे से किसी झक्कास दुकान से अपने हीरो के माफिक कपड़े खरीदेगा, समझा क्या हां?"

"बातें मत चोद।" जगन ने फिर से उसके सिर में एक चपत लगाई, बोला"____"पहले किसी की जेब तो साफ कर के दिखा।"

"अबे इसके बस का घंटा कुछ नहीं है।" संपत ने कहा____"देखना आज भी इसकी वजह से हम पकड़े जाएंगे और फिर पब्लिक अपन लोगों की गांड़ तोड़ाई करेगी।"

"तू चुप कर बे भोसड़ी के।" जगन ने संपत को घूरा____"आज ऐसा नहीं होगा। अब चलो यहां से।"

जगन की बात सुन कर न संपत ने कुछ कहा और ना ही मोहन ने। जगन इन दोनों से उमर में बड़ा था। वो ज़्यादा बोलता नहीं था लेकिन सच तो ये था कि वो दोनों को अपने सगे भाइयों जैसा प्यार करता था और ख़याल भी रखता था। अगर वो किसी बात के लिए मना कर देता था या कह देता था तो ये दोनो चुपचाप उसका कहा मान भी जाते थे।

तीनों नमूने पैदल ही मार्केट जाने वाले रास्ते की तरफ बढ़ चले। ये इनका रोज़ का ही काम था। मार्केट में भीड़ होती थी इस लिए ये लोग किसी न किसी की जेब साफ कर देते थे। ये अलग बात है कि ज़्यादातर ये अपनी हरकतों की वजह से पकड़ लिए जाते थे और फिर लोग अच्छी खासी धुनाई करते थे। बहरहाल, ये तीनों चलते हुए एक मोड़ पर मुड़ गए और अभी चार पांच क़दम ही आगे बढ़े थे कि सामने से तीन लोग आते दिखे। इन तीनों ने उन्हें देखा और उनमें से एक पर नज़र पड़ते ही इन तीनों की हवा निकल गई।

उधर से आ रहे उन तीनों की भी नज़र इन पर पड़ गई थी। कुछ पल ठिठकने के बाद उनमें से एक ने बाकी दोनों से कुछ कहा तो बाकी दोनों ने चौंकते हुए इन तीनों की तरफ देखा।

"अबे वो तो वही है न।" संपत ने जगन और मोहन की तरफ बारी बारी से देखते हुए घबराए हुए स्वर में कहा____"जो कल शाम को तबेले में भैंस का दूध निकाल रहा था?"

"अपन को क्या पता।" मोहन ने लापरवाही से कहा____"अपन ने उसका थोबड़ा थोड़े ना देखा था।"

"अबे भोसड़ी के थोबड़ा तो अपन ने भी नहीं देखा था उसका।" संपत ने खिसियाए हुए लहजे से कहा____"लेकिन उसी के जैसा हट्टा कट्टा दिख रहा है ये और सिर पर लुंगी की पगड़ी भी वैसी ही बांध रखी है।"

संपत की बात सुन कर मोहन या जगन में से कोई कुछ बोलता कि तभी तीनों ने देखा कि उधर से आने वाले वो तीनों आदमी बड़ी तेज़ी से इनकी तरफ आने के लिए दौड़ लगा चुके थे।

"अबे ये वही है।" मोहन घबरा के चीखा____"भागो बे जल्दी वरना ये लोग अपन लोगों की बिना थूक लगाए गांड़ मार लेंगे।"

मोहन का इतना कहना था कि उसके साथ जगन और संपत दोनों भी पलट कर भाग लिए। तीनों ऐसे भाग रहे थे जैसे इनके पीछे सैकड़ों भूत लगे हों। बीच बीच में पलट कर देख भी लेते थे कि पीछा करने वाले आ रहे हैं कि नहीं? मुश्किल से आधा किलो मीटर ही भाग पाए थे कि पीछे आ रहे आदमियों ने इन्हें पकड़ लिया।

"भाग कहां रहे थे मादरचोदो।" तीन में से एक ने गुस्से से कहा____"क्या सोचा था तुम लोगों ने कि बाल्टी भर दूध डकार कर पचा लोगे?"

"ब...बाल्टी....द...दूध????" मोहन मारे ख़ौफ के मिमियाया____"य...ये क्या कह रहे हैं आप?"

"ज़्यादा भोला बनने की कोशिश मत कर भोसड़ी के।" दूसरे ने गुस्से से कहा___"हमें पता चल गया है कि हमारे तबेले से बाल्टी भर दूध चुराने वाले तुम तीनों ही हरामी थे। एक आदमी ने तुम तीनों को एक जगह बाल्टी में से दूध डकारते हुए देखा था। उसी ने ये बात हमें बताई है।"

"अम्मा क़सम साहब।" संपत मारे डर के उसके पैरों में ही गिर गया, बोला____"हमने किसी का दूध नहीं चुराया।"
"लगता है गांड़ तोड़ाई करनी ही पड़ेगी तुम लोगों की।" तीसरे वाले ने सिर हिलाते हुए कहा____"तभी सच उगलोगे तुम लोग।"

कहने के साथ ही उसने बाकी दोनों को पेलाई करने का इशारा कर दिया। बस फिर क्या था, दोनों ने तबीयत से पेलना शुरू कर दिया तीनों को। वातावरण में तीनों की दर्द भरी चीखें गूंजने लगीं। जल्दी ही तीनों ने कबूल कर लिया कि इन्होंने ही उनका दूध चुराया था।

"मादरचोदो बाल्टी में पूरा पूरा आठ लीटर दूध था।" तीसरे ने गुस्से से घूरते हुए कहा____"अगर ईमानदारी से पैसे में हमसे खरीदते तो पंद्रह रुपिया के भाव में हम तुम लोगों को दे देते लेकिन तुमने चोरी किया है इस लिए अब उसका हर्ज़ाना भी भरना होगा।"

"हमें माफ़ कर दो साहब।" जगन ने हाथ जोड़ते हुए कहा____"हमारे पास पैसे नहीं थे और हम तीनों बहुत भूखे थे इस लिए जो सूझा वही कर डाला।"

"तो अब सूद समेत हर्ज़ाना भी भर भोसड़ी के।" पहले वाले ने गुस्से में कहा____"पंद्रह के भाव में आठ लीटर के दूध का एक सौ बीस रुपिया हुआ और हर्ज़ाना हुआ दो सौ रुपिया। यानि पूरे तीन सौ बीस रुपिया दे वरना तीनों को मार मार कर अधमरा कर दिया जाएगा।"

तीन सौ बीस रुपिया सुनते ही तीनों के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई। एक तो वैसे ही मार से गांड़ में दर्द होने लगा था और अब फिर से मार पड़ना तय हो गया था। तीनों ने एक एक कर के उन तीनों के पैर पकड़ लिए और रहम की भीख मांगने लगे मगर हज़ार कोशिश के बाद भी रहम न मिला उन्हें। जगन संपत और मोहन के पास पैसे के नाम पर एक आना भी नहीं था। उनकी बहुत मिन्नतों को देख कर आख़िर तीसरे वाले ने एक फ़ैसला किया।

"ठीक है।" तीसरे वाले ने कहा____"तुम लोगों पर रहम एक ही सूरत पर किया जा सकता है।"
"म..मतलब??" जगन को जैसे कुछ समझ न आया।

"मतलब ये कि तुम लोगों को हर्ज़ाना तो भरना ही पड़ेगा।" तीसरे वाले ने कहा____"अब क्योंकि तुम लोगों के पास हर्ज़ाना भरने के लिए पैसे तो हैं नहीं इस लिए अगर मुझसे रहम चाहिए तो तुम तीनों को मेरे तबेले में काम करना पड़ेगा।"

तीसरे आदमी की बात सुन कर तीनों एक दूसरे की तरफ देखने लगे। किसी के यहां काम करना या नौकरी करना इन लोगों की फितरत में ही नहीं था। उनको तो बस एक ही काम आता था और वो था अपने पेट की भूख मिटाना। इसके लिए वो हमेशा ग़लत तरीका ही अपनाते थे। ईमानदारी से कोई काम करना इन्हें दुनिया का सबसे गंदा काम लगता था।

"क्या हुआ? सांप क्यों सूंघ गया तुम लोगों को?" तीसरे वाले ने गुस्से से तीनों की तरफ देखा, फिर बोला____"काम तो तुम लोगों को करना ही पड़ेगा वरना ऐसी गांड़ तोड़ाई करूंगा कि हगते नहीं बनेगा तुम लोगों से।"

"हमें मंज़ूर है।" डर के मारे संपत जल्दी से बोल पड़ा____"हम तीनों आपके तबेले में काम करने को तैयार हैं।"

"अबे भोसड़ी के ये क्या कह रहा है तू?" मोहन धीरे से बोलते हुए उसकी तरफ गुस्से से देखा तो संपत ने भी उसी अंदाज़ में उससे कहा____"अबे इनकी बात नहीं मानेंगे तो बहुत मार पड़ेगी हमें।" कहने के साथ ही वो थोड़ा उसके कान के पास अपना मुंह ले जा कर धीरे से बोला____"फिकर मत कर, मौका मिलते ही चंपत हो लेंगे अपन लोग।"

संपत की बात सुन कर मोहन मन ही मन मुस्कुराया और फिर वो भी काम करने के लिए राज़ी हो गया। जगन तो ज़्यादातर वही करता था जो संपत निर्णय लेता था। उसके अनुसार उन तीनों में से संपत ही सबसे ज़्यादा होशियार और बुद्धिमान था। बहरहाल, तीनों नमूने जब काम करने के लिए राज़ी हो गए तो वो लोग इन्हें ले कर चल दिए।


{}{}{}{}{}

दो दिन गुज़र गए मगर वैसा न हो सका जैसा कि संपत ने मोहन से कहा था। हालाकि तीनों ही भागने की फ़िराक में थे मगर उन्हें भागने का मौका ही नहीं मिल सका। दो दिन से गांड़ तोड़ मेहनत करवाई जा रही थी तीनों से। तीनों का बुरा हाल हो गया था काम करते करते। दो वक्त का खाना मिलता तो था लेकिन भर पेट नहीं जिसके चलते तीनों को ऐसा लगने लगा था जैसे जिस्म के अंदर अब जान ही नहीं रह गई है। तीनों में से सबसे ज़्यादा कमज़ोर मोहन ही था इस लिए उसकी हालत सबसे ज़्यादा ख़राब थी मगर काम करने के सिवा दूसरा कोई चारा नहीं था।

तबेले के मालिक का नाम जोगिंदर चौधरी था। उमर भले ही उसकी पचास के आस पास थी लेकिन लंबा चौड़ा और हट्टा कट्टा था। बड़ी बड़ी मूंछें और गंजा सिर लिए जब वो तीनों को घुड़कता तो तीनों की हवा टाइट हो जाती थी। जोगिंदर के तबेले में कुल बीस भैंसें थी जिनके खाने पीने का इंतजाम और साफ सफाई की ज़िम्मेदारी अब इन तीनों नमूनों की थी। यूं तो जोगिंदर के तबेले में और भी कई लोग थे लेकिन अब उनका काम इन तीनों पर नज़र रखने का ही था। यही वजह थी कि तीनों को भागने का कोई मौका नहीं मिल रहा था। रात में भी जिस जगह ये सोते थे वहां से निकलना इनके लिए असंभव ही था। असल में तबेले के पीछे की तरफ दो तीन कमरे बने हुए थे। उन्हीं में से एक कमरे में इन तीनों को सोने के लिए कहा जाता था और जब ये तीनों उस कमरे में सोने जाते तो बाहर से कमरे को बंद कर के ताला लगा दिया जाता था। कहने का मतलब ये कि जोगिंदर हर्ज़ाने के रूप में इनकी काफी बेहतर तरीके से पेलाई कर रहा था।

सुबह सूरज निकलने से पहले ही इन्हें जगा दिया जाता था। उसके बाद नित्य क्रिया से फुर्सत होने के बाद ये तीनों तबेले में दाखिल हो जाते थे। तबेले में भैंसों का गोबर उठाना और तबेले की सफाई करना। उसके बाद भैंसों के खाने पीने का इंतजाम करना। इतने में ही दोपहर हो जाती और इनकी हालत ख़राब हो जाती। दोपहर में नहाने धोने के बाद इन्हें खाना दिया जाता जोकि इनकी खुराक़ से कम ही होता था। जोगिंदर के बाकी तीन तीन मुस्टंडे इनकी निगरानी में लगे रहते थे। उन तीनों को जोगिंदर ने बोल रखा था कि अगर ये तीनों काम करने में आनाकानी करें या भागने की कोशिश करें तो इनकी बढ़िया से कुटाई करें। सच तो ये था कि तीनों नमूनों को अपनी ज़िंदगी अब नरक सी लगने लगी थी।

"बेटीचोद काम कर कर के गांड़ का दर्द बढ़ता ही जा रहा है।" दोपहर को कमरे के अंदर बंद मोहन बाकी दोनों की तरफ देखते हुए बोला____"अगर यही हाल रहा तो कसम मरे हुए अम्मा बापू की अपन तो निपट ही जाएगा किसी दिन। ये सब इस मादरचोद संपत की वजह से होरेला है। इसी ने काम करने को हां बोला था और अपन से बोला था कि मौका मिलते ही चंपत हो जाएंगे।"

"काश! हमने उस दिन दूध न चुराया होता।" जगन ने अफसोस जताते हुए कहा____"तो आज कहीं चैन से घूम फिर रहे होते।"

"सही कहा यार।" संपत ने कहा____"अपन को नहीं पता था कि ऐसा कुछ हो जाएगा। काश! किसी ने पहले बता दिया होता तो अपन किसी का दूध चुराने का सोचता ही नहीं।"

"यहां से चंपत होने का कोई न कोई पिलान तो बनाना ही पड़ेगा भाई।" मोहन ने कहा____"वरना वो दिन दूर नहीं जब अपन तीनों लोग इधर ही काम कर कर के मर मरा जाएंगे।"

"हां संपत कुछ सोच यार।" जगन ने हताश भाव से कहा____"आख़िर कैसे इस जगह से निकलें हम?"

"फिलहाल तो चाह कर भी नहीं निकल सकते भाई।" संपत ने कहा____"तूने देखा ही है कि जोगिंदर के वो तीनों सांड अपन लोगों की निगरानी करते हैं। ऊपर से इस कमरे में भी बाहर से ताला लगा देते हैं। ऐसे में निकालना असंभव ही है।"

"अपन के दिमाग़ में एक मस्त पिलान आएला है।" मोहन ने सोचने वाले भाव से कहा___"क्यों न अपन लोग जोगिंदर के उन तीनों सांडों को अपनी तरफ मिला लें। जब वो तीनों अपनी तरफ हो जाएंगे तब अपन लोग आसानी से निकल सकते हैं।"

"तू न अपना ये पिलान गांड़ में डाल ले भोसड़ी के।" संपत ने कहा____"वो क्या तेरी अम्मा के यार हैं साले जो अपनी तरफ हो जाएंगे?"

"जुबान सम्हाल के बोल बे।" मोहन तैश में आ कर बोला____"वरना गांड़ तोड़ दूंगा तेरी।"
"तू चुप कर।" जगन ने उसे गुस्से से देखा, फिर संपत से बोला____"यहां से निकलने का कोई तो रास्ता होगा भाई। तू सोच, मुझे यकीन है तू ज़रूर कोई न कोई तरकीब निकाल लेगा।"

"अपन को लगता है कि अपन लोग यहां से तब तक नहीं निकल पाएंगे जब तक भागने का सोचेंगे।" संपत ने सोचने वाली मुद्रा बना कर कहा____"मतलब कि हमें यहां से भागने का सोचना ही नहीं चाहिए।"

"लो कर लो बात।" मोहन बोल पड़ा____"इसने तो अपनी गांड़ ही खोल कर दे दी। साला कहता है हमें यहां से निकलने का सोचना ही नहीं चाहिए। अबे गाँडू सोचेंगे नहीं तो क्या यहां हर रोज़ ऐसे ही अपनी गांड़ घिसते रहेंगे?"

"बात तो सही कह रहा है ये।" जगन ने सिर हिलाते हुए संपत की तरफ देखा____"अगर यहां से निकलेंगे नहीं तो यहीं पर पिसते रहेंगे भाई। तू भला ऐसा कैसे कह सकता है?"

"अबे तुम लोग अपन की पूरी बात तो सुन लो।" संपत ने कहा____"अपन के कहने का मतलब वो नहीं है जो तुम लोग समझ रेले हो।"

"भोसड़ी के दिमाग़ का भोसड़ा क्यों बना रहा है?" मोहन ने गुस्से में कहा____"साफ साफ बताता क्यों नहीं कि तेरा मतलब क्या है?"

"लौड़े गांड़ से नहीं ध्यान से सुन।" संपत ने उसे घूरते हुए कहा____"जोगिंदर ने अपने तीनों सांडों को अपन लोगों की निगरानी में इस लिए लगा रखा है क्योंकि उसे अच्छी तरह मालूम है कि अपन लोग इधर से चंपत हो जाएंगे। यानि अपन लोगों को उसे यकीन दिलाना होगा कि अपन लोग इधर से चंपत होने का सोचते भी नहीं हैं।"

"अबे लौड़े पर इससे होगा क्या?" मोहन पूछे बगैर न रह सका।
"जब उसे यकीन हो जाएगा तो वो अपने सांडों को अपन लोगों की निगरानी में नहीं लगाएगा।" संपत ने कहा____"और ऐसा भी हो सकता है कि वो अपन लोगों को इस तरह से कमरे में भी न बंद करे। सोच जब ऐसा हो जाएगा तो अपन लोगों के लिए इधर से चंपत हो जाना कितना आसान हो जाएगा।"

"वाह! क्या बात कही है तूने।" जगन उसकी पीठ ठोकते हुए बोला____"पर अपन की समझ में ये नहीं आ रहा कि अपन लोग जोगिंदर को यकीन कैसे दिलाएंगे और क्या वो सच में यकीन करेगा?"

"करना ही पड़ेगा भाई।" संपत ने कहा____"लेकिन उसके लिए अपन लोगों को भी पूरी ईमानदारी से काम करना होगा।"

"अब क्या ईमानदारी दिखाने के लिए उसके सामने अपनी गांड़ ही खोल कर रख दें?" मोहन ने उसे घूरा____"अबे लौड़े कहीं तू सच में उससे गांड़ तो नहीं मरवाने का सोच रहा?"

"बेटीचोद, तुझे तो हर वक्त यही सूझता है।" संपत ने उसे हल्के से एक मुक्कर मारा, फिर बोला____"अपन के कहने का मतलब है कि अब से हम बिना किसी के कहे हर वो काम करेंगे जो इस तबेले में होता है। अभी तक तो हम अपनी मर्ज़ी से कुछ कर ही नहीं रहे थे बल्कि इन लोगों के ज़ोर देने पर ही मजबूरी में कर रहे थे। इस लिए अब से अपन लोगों को किसी को कुछ कहने का मौका ही नहीं देना है। ये समझ ले कि अब से अपन लोग को इस तबेले को अपना ही तबेला समझना है और जी जान लगा के हर काम करना है।"

"तू ही कर साले।" मोहन बीच में ही नाराज़ हो कर बोल पड़ा____"अपन के बस का नहीं है अब काम करना। साला दो दिन से काम कर कर के गांड़ का बुरा हाल हो गया है।"

"इस चिंदी चोर को तू ही समझा बे जगन।" संपत ने शिकायती लहजे में जगन को देखा____"अगर इसने काम करने में ईमानदारी नहीं दिखाई तो घंटा अपन लोग यहां से नहीं निकल पाएंगे।"

"मुझे खुद कुछ समझ में नहीं आ रहा लौड़ा।" जगन ने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा____"भला ईमानदारी से काम कर के हम कैसे यहां से निकल सकेंगे?"

"तू साले शून्य बुद्धि ही रहेगा।" संपत जगन को झिड़कते हुए बोला____"कभी तो अकल लगाया कर गधे।"
"गधा मत बोल बे।" जगन ने गुस्से से देखा उसे____"वरना गांड़ में लंड दे दूंगा।"

"अपन के भेजे में एक और मस्त पिलान आएला है।" मोहन तपाक से बोला____"अपन लोग उस मुछाड़िए जोगिंदर को बोल देते हैं कि हम बीमार हैं। अपन लोगों को बीमार देख वो अपन लोगों को यहां से हस्पताल ले जाएगा। बस, अपन लोग उधर से ही चंपत हो जाएंगे। पिलान मस्त है ना?"

"घंटा मस्त है।" संपत ने कहा____"अपन लोग अगर उसको बोलेंगे कि हम बीमार हैं तो वो समझ जाएगा कि अपन लोग काम न करने के लिए बहाना बना रहे हैं। उसके बाद वो अपने तीनों सांडों के द्वारा ही हमारा इलाज़ करवाएगा।"

"ये भी ठीक कहा तूने।" जगन ने सिर हिलाया____"मादरचोद बड़ी तगड़ी मुसीबत में फंस गएले हैं अपन लोग।"

"यहां से निकलने का बस एक वही उपाय है जो अपन ने बताया है।" संपत ने कहा____"अपन लोगों को पूरी ईमानदारी से काम करना होगा और जब जोगिंदर को हम पर भरोसा हो जाएगा तो वो हम पर नज़र रखवाना बंद करवा देगा। बस तभी अपन लोग यहां से खिसक सकते हैं वरना ऐसे ही गांड़ घिसते रहेंगे यहां।"

"पर ये भी तो सोच बे कि अपन लोग काम कैसे कर पाएंगे?" मोहन ने कहा___"यहां तो दो दिन में ही गांड़ दर्द करने लगी है। आगे और अभी कितना काम करना पड़ेगा जिससे उस जोगिंदर को हम पर यकीन हो जाए?"

"अब ये तो उसकी समझदारी पर है बे।" संपत ने कहा____"अगर अपन लोग पूरे मन से काम करते हुए उसे दिखाएंगे तो संभव है कि उसे जल्दी ही अपन लोगों पर यकीन हो जाए।"

"फिर तो अपन अभी से पूरे मन से काम करने का सोच लेता है।" जगन ने जैसे अपना फैसला सुनाया____"मां चुदाए गांड़ का दर्द, अब तो अपन गांड़ से गू निकलने तक काम करेगा।" कहने के साथ ही उसने मोहन की तरफ देखा और कहा____"और तू भी मन लगा कर काम करेगा वरना जोगिंदर के मुस्टंडों से पहले मैं तेरी गांड़ तोड़ दूंगा, समझा?"

"समझ गया बाप।" मोहन ने सिर हिलाया____"तुम लोग तो साले मेरी गदराई हुई गांड़ के ही पीछे पड़े रहते हो।"

फ़ैसला हो चुका था। कमरे में दो घंटे आराम करने के बाद जगन ने दोनों को उठने को कहा और खुद दरवाज़े की तरफ बढ़ चला। उसने दरवाज़े को थपथपाते हुए आवाज़ लगाई तो कुछ ही देर में दरवाज़ा खुला। दरवाज़े के बाहर तीनों सांड लट्ठ लिए किसी जिन्न की तरह प्रगट हो गए। जगन उन्हें देख कर पहले तो सकपकाया फिर एकदम से तन कर खड़ा हो गया।

"ऐसे दीदे फाड़ के क्या देख रेले हो तुम लोग?" जगन ने बिना ख़ौफ खाए कहा___"एक तरफ हटो अपन लोगों को तबेले में काम करने जाना है।"

जगन की बात सुन कर तीनों के चेहरों पर चौकने वाले भाव उभरे। तीनों ने एक दूसरे की तरफ देखा और फिर जगन को देखते हुए उनमें से एक ने कहा____"दिमाग़ तो ठिकाने पर है न तेरा? इस वक्त तबेले में कौन सा काम करने जा रहा है तू? अंदर जा, चार बजे हम खुद उठाने आएंगे।"

"अंदर टाइम पास नहीं हो रहा भाई।" जगन के पीछे से निकल कर संपत ने कहा____"तबेले में कुछ न कुछ काम करेंगे तो टाइम भी पास हो जाएगा। वैसे भी हम यहां काम करने ही तो आए हैं तो काम करने दो ना हमें।"

संपत की बात सुन कर वो तीनों गौर से संपत जगन और मोहन का चेहरा देखने लगे। इधर इन तीनों की धड़कनें ये सोच कर तेज़ हो गईं थी कि अगर तीनों सांडों ने मना कर दिया तो पिलान ख़राब हो जाएगा।

"ठीक है।" दूसरे ने कहा____"तुम में से दो लोग तबेले की सफाई करने चलो और एक आदमी बर्तन धोने जाएगा।"

उसकी बात सुन कर तीनों खुश हो गए। कुछ ही देर में जगन और संपत को तबेले में पहुंचा दिया गया और मोहन को लिए एक आदमी पानी की टंकी के पास पहुंच गया। तबेले के बाई तरफ ट्यूब वेल था और एक बड़ा सा झोपड़ा भी था। झोपड़े के आस पास कुछ पेड़ पौधे लगे हुए थे जिसकी छांव फैली हुई थी।

"झोपड़े के अंदर दूध के बड़े बड़े कनस्तर रखे हुए हैं।" मोहन को देखते हुए तीन सांडों में से एक ने कहा____"उन्हें धुलने का काम यूं तो हर रोज कमला का है लेकिन अब से तू धोएगा, समझा?"

"क..कमला कौन?" मोहन पूछे बगैर न रह सका था।
"अबे कमला एक औरत है।" उसने मोहन को घूरते हुए कहा____"और वो भी तेरी तरह यहां काम करने आती है। उसके साथ उसकी जेठानी का एक लड़का भी यहां काम करता है।"

मुस्टंडे की बात सुन कर मोहन की आंखों के सामने तीन दिन पहले का वो दृश्य घूम गया जो उसने देखा था। उसने मन ही मन सोचा शायद कमला वही औरत है जो उस दिन एक लड़के के साथ अपनी चूचियां दबवाते हुए मज़े कर रही थी। ये सोचते ही उसके मन में खुशी के लड्डू फूट पड़े और उसके होठों पर मुस्कान उभर आई।

"ज़्यादा खुश मत हो।" उसकी मुस्कान देख उस मुस्टंडे ने कहा____"वो तेरे जैसे लंगूर को घांस नहीं डालने वाली। वो तो हमारे मालिक जोगिंदर चौधरी की रण्डी है।"

"फिर तो उसने तुम्हें भी घांस नहीं डाला होगा।" मोहन बेझिझक बोल उठा____"भला कोई औरत मालिक के नौकरों को क्यों घांस डालेगी जब मालिक ही उसका खासम खास बना हुआ हो।"

"मुझे उसकी घांस से मतलब भी नहीं है लौड़े।" उसने मुस्कुराते हुए कहा____"मैं तो उसकी बेटी की मलाई खाता हूं जो उससे कहीं ज़्यादा करारी माल है।"

"वाह! गुरु तुम तो काफी पहुंचे हुए हरामी हो बे।" मोहन को जाने क्या सूझा कि वो एकदम से उसके पैरों में ही बैठ गया, फिर उसका पैर पकड़ के बोला____"अपन को अपना चेला बना लो गुरु और थोड़ा बहुत अपन को भी मलाई खाने का सुख दे दो।"

"मलाई खाने के लिए पहले सेवा करनी पड़ती है लौड़े।" मोहन के मुख से अपने लिए गुरु शब्द सुन कर वो मुस्टंडा मन ही मन बड़ा खुश हुआ था किंतु अपनी खुशी को दबाते हुए बोला____"मुफ्त में कहीं कुछ नही मिलता, समझा?"

"समझ गया गुरु।" मोहन ने सिर हिलाया____"बस तुम हुकुम करो, अपन सेवा करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा। पर पहले तुम अपन को अपना चेला बना लो गुरु।"

"अच्छा ठीक है ठीक है।" वो मन ही मन गदगद होते हुए बोला____"मैं तुझे अपना चेला बना लेता हूं लेकिन ख़बरदार ये बात तू किसी को नहीं बताएगा वरना गांड़ तोड़ दूंगा तेरी।"

"अपनी मरी हुई अम्मा की क़सम गुरु।" मोहन तपाक से बोला____"अपन अख्खा लाइफ में कभी ये बात किसी को नहीं बताएगा। बस तुम गुरु अपने इस चेले पर अपनी कृपा बनाए रखना।"

"बिल्कुल।" मुस्टंडे ने कहा____"अब चल तू अपना काम कर और हां इधर से भागने का सोचना भी मत वरना समझ गया न?"

"अबे क्या बता करते हो गुरु।" मोहन ने इस तरह मुंह बनाया जैसे उसने उसकी तौहीन कर दी हो, बोला____"अब तो अपन कहीं नहीं जाएगा कसम से। अपन को पता ही नहीं था कि इधर तुम अपन के गुरु बन जाओगे और किसी करारी माल की मलाई खिलाओगे वरना पहले ही आ जाता इधर।"

"मुझे तुझ पर भरोसा तो नहीं है।" उसने मोहन की तरफ देखते हुए कहा____"लेकिन तुझे एक मौका देता हूं मैं। अगर तू सच में मेरे भरोसे पर खरा उतरा तो यकीन रख हर रोज़ तुझे मलाई खाने को मिलेगी।"

"अबे भरोसा रखो गुरु।" मोहन ने कहा____"अपन अब कहीं नहीं जाने वाला। अब तो अपन अपने गुरु के चरणों में ही रहेगा।"

"चल अब बातें मत बना और काम कर।" उसने मुस्कुराते हुए कहा____"कुछ देर में कमला भी आ जाएगी। उसके आने से पहले तुझे सारे बर्तन धो डालने हैं।"

मोहन ने सहमति में सिर हिलाया और झोपड़े के अंदर चला गया। इधर वो मुस्टंडा मन ही मन जाने क्या सोचते हुए पलटा और चला गया। अभी वो कुछ ही दूर गया होगा कि तभी मोहन झट से झोपड़े के दरवाज़े के पास आया और धीमें से बोला____"तू और अपन का गुरु? अबे चल हट।"



━━━━━━━━━━━━━━
:rolrun: gajab he matlab pakade gaye to sahi se pel diya Choudhary ne upar se fokat ke majdur bhi mil gaye. Par story he romance genre ki to humko bski characters ka intezar he.
 

TheBlackBlood

शरीफ़ आदमी, मासूमियत की मूर्ति
Supreme
79,769
117,244
354
Ye to teeno hi fattu aur badhbole hai 😁 karna bhi hai but fatti bhi hai chodna bhi hai par darte bhi hai kaand karna bhi hai lekin dar bhi hai

Keel vaala kissa sunn ke aankh me se aansu aagaye its funn update jab usne gas nikali aankhon samne puri film chal gayi mast update
Bachche hain abhi, dhire dhire akal aa jayegi, thanks
 

TheBlackBlood

शरीफ़ आदमी, मासूमियत की मूर्ति
Supreme
79,769
117,244
354
Dimag to acha lagaya per inki kismat inka sath deti hai ya phir Pehelwaan phir se inki dhulai karega ab to kamla ka scene dekhne main maza aayega ya phir uski beti ke sath
Lajawaab update
Let's see what happens :D
Thanks
 
Top