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Romance Three Idiot's

TheBlackBlood

शरीफ़ आदमी, मासूमियत की मूर्ति
Supreme
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Wah TheBlackBlood Shubham Bhai,

Kya mast update post ki he..............three musketeers wali movie yaad aa gayi in tino ki akal aur harkate dekhkar kar

Keep posting Bhai
Thanks Bhai,
Kahani ke teeno kirdar mand buddhi hain..bas isi baat ko zahen me rakh kar unke kuch kriya kalaap dikhane ki koshish hai...let's see what happens :D
 

TheBlackBlood

शरीफ़ आदमी, मासूमियत की मूर्ति
Supreme
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Bahut hi badhiya update diya hai TheBlackBlood bhai....
Nice and beautiful update....
Thanks
 

TheBlackBlood

शरीफ़ आदमी, मासूमियत की मूर्ति
Supreme
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:congrats: शुभम भाई
कहानी रोमैन्स से ज्यादा हास्य-व्यंग्य की लग रही है
Kya kare, haasya byangya ka koi prefix hi nahi tha. Le de ke romance hi uchit laga to chemp diya apan :D
राहजनी से लेकर दोध चुराने तक इनके कारनामे वास्तव में मूर्खतापूर्ण लगे
लेकिन ये भी है कि इंसान सबकुछ छोड़ सकता है लेकिन पेट भरने के लिए कुछ भी कर सकता है
और तब तक करता है, जब तक उसका पेट ना भर जाए
Sahi kaha, Jaise apan apni frustration mitane ke liye kuch bhi kar sakta hai :lol:
 

TheBlackBlood

शरीफ़ आदमी, मासूमियत की मूर्ति
Supreme
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ये तीन तिलंगे मुर्ख ही नही , निकम्मे , अकर्मण्य और नाकारे भी है। एक लम्बी चौड़ी सड़क पर मात्र दो किलें रखकर राहजनी कौन करता है ! वो भी इस तरह कि हवा के एक हल्के झोंके से ही किल उड़ कर गायब हो जाए।
Tabhi to unhe three Idiots naam diya gaya hai. Unki buddhi ka loha maanna chahiye aapko :D
अपनी भूख मिटाने के लिए भैंस की दूध भी चोरी करना चाहते थे। जवान मर्द है ये सब , प्रभू ने हाथ - पांव सलामत ही दिए है फिर क्यों न कोई दिहाड़ी मजदूर वाला काम ही कर लेते ! लेकिन लगता है , ये भूखे मर जाएंगे लेकिन मेहनत और इमानदारी का काम नही करेंगे।
आगे चलकर जरूर कोई ऐसा वैसा कार्य करेंगे ये सब जो इनके लिए भारी मुसीबत का वायस बन सकता है। जरूर ही ये ' आ बैल मुझे मार ' वाली हरकतें करने वाले है।
Tulsi ya sansaar me bhaanti bhaanti ke log...
Kuch madarchod, kuch bahute madarchod.. :lol1:

Baaki to aap khud hi samajhdaar hain :D
वैसे पहलवान जी बड़े ही इत्मिनान से भैंस का दूध दूह रहे है , इस बात से बेखबर की कोई इनकी धर्म पत्नी का दूध भी दूह रहा है।
Wo pahalwan ki patni nahi hai...aage pata chalega :declare:
बहुत खुबसूरत अपडेट शुभम भाई।
आउटस्टैंडिंग अपडेट।
Thanks :thank_you:
 

TheBlackBlood

शरीफ़ आदमी, मासूमियत की मूर्ति
Supreme
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Gine chune hi story hai jo best hai unme aap last vali bhi hai jo adhori hai jitne padh rahe hai jitne comment karte hai unke liye hi likh do bhai pls mujhe intrest hai padhne me bhi ek reader hu bhai please continue the story
Uske update likh raha hu, story complete hone ke baad daily ek ek update apne un readers bhaiyo ko Inbox me send karuga jo imandari se story padh kar comments ya reviews dete hain... :declare:
 

TheBlackBlood

शरीफ़ आदमी, मासूमियत की मूर्ति
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Update - 02
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संपत की बात सुन कर जगन और मोहन ने सिर हिलाया और फिर एक एक कर के तीनों उस दूध को पीने लगे। इतने सालों में आज पहली बार इतना सारा दूध पीने को मिला था उन्हें। बाल्टी में इतना दूध था कि तीनों के पीने से भी खत्म न हुआ। कुछ देर तक तीनों एक दूसरे का मुंह देखते रहे उसके बाद तीनों ने थोड़ा थोड़ा कर के पूरा दूध पी लिया। पेट पूरी तरह से भर गया था अब। जिस्म में जैसे नई ताज़गी और नई जान आ गई थी। खाली बाल्टी को वहीं छोड़ तीनों भाग लिए उधर से। अभी वो कुछ ही दूर गए होंगे कि तबेले का आदमी इधर इधर निगाह दौड़ाते हुए इस तरफ आ पहुंचा। उसकी नज़र जैसे ही अपनी खाली बाल्टी पर पड़ी तो वो चौंक पड़ा और फिर अगले ही पल उसके चेहरे पर गुस्से के भाव उभर आए। गंदी गंदी गालियां बकते हुए उसने खाली बाल्टी को उठाया और वापस तबेले की तरफ बढ़ गया।

अब आगे....



"अबे उधर क्या देख रहा है?" मोहन चलते चलते जब अचानक रुक गया तो संपत ने पलट कर उससे पूछा____"मार्केट में दुकानें खुल गईं होंगी। चल जल्दी देर मत कर।"

"अबे रुक जा ना थोड़ी देर।" मोहन बिना उसकी तरफ देखे ही बोला____"अपने हीरो को जी भर के देख तो लेने दे बे। साला क्या लगता है। काश! अपन भी इसकी माफिक होता।"

संपत और जगन ने देखा मोहन एक तरफ दीवार में लगे एक बड़े से पोस्टर को देखे जा रहा था। उस पोस्टर में मिथुन चक्रवर्ती की तस्वीर थी। मोहन उसी तस्वीर को बड़े मंत्र मुग्ध अंदाज़ में देखे जा रहा था। ये देख जगन और संपत ने जैसे अपना अपना सिर ही पीट लिया।

"अबे ओ मिथुन के अंध भक्त।" जगन उसके क़रीब आते ही उसके सिर पर हल्के से एक चपत लगाते हुए कहा____"भोसड़ी के अगर आज मार्केट में अपना काम न हुआ तो भूखे ही मरेंगे।"

"तो मर जाने दे ना बे।" मोहन ने कहा____"तू ज़रा अपन के हीरो को तो देख। कितना राप्चिक लगता है ये। क्या बाल हैं इसके, क्या नाचता है ये और तो और फैटिंग कितनी फाड़ू करता है बे।"

"घंटा।" संपत उसके क़रीब आ कर बोला____"पिक्चर में सब नकली होता है, ऐसा अपन ने सुना है। साला ये तो तस्वीर में इतना सुंदर दिखता है तेरे को। अपन ने सुना है कि ये भैंस की तरह करिया है।"

"भोसड़ी के झूठ बोलेगा तो जान से मार दूंगा तुझे।" अपने हीरो की बुराई सुनते ही मोहन गुस्सा हो गया, बोला____"साले सच में अंधा है क्या? दिखता नहीं अपन का हीरो अपन से भी ज़्यादा गोरा और झक्कास है। अगर वो भैंस की तरह करिया होता तो इतनी गोरी गोरी हिरोइनें क्या उसे अपने इतने क़रीब आने देतीं? साला बात करता है झूठा।"

"अच्छा चल ठीक है।" जगन ने मामला रफा दफा करने की गरज से बोला___"तू जो कह रहा है वही सही है। अब चल जल्दी, आज तुझे भी किसी न किसी की जेब साफ करनी होगी समझा?"

"बिल्कुल करेगा बाप।" मोहन ने खुशी से बोला____"आज अपन लंबा हाथ मारेगा और फिर उस पैसे से किसी झक्कास दुकान से अपने हीरो के माफिक कपड़े खरीदेगा, समझा क्या हां?"

"बातें मत चोद।" जगन ने फिर से उसके सिर में एक चपत लगाई, बोला"____"पहले किसी की जेब तो साफ कर के दिखा।"

"अबे इसके बस का घंटा कुछ नहीं है।" संपत ने कहा____"देखना आज भी इसकी वजह से हम पकड़े जाएंगे और फिर पब्लिक अपन लोगों की गांड़ तोड़ाई करेगी।"

"तू चुप कर बे भोसड़ी के।" जगन ने संपत को घूरा____"आज ऐसा नहीं होगा। अब चलो यहां से।"

जगन की बात सुन कर न संपत ने कुछ कहा और ना ही मोहन ने। जगन इन दोनों से उमर में बड़ा था। वो ज़्यादा बोलता नहीं था लेकिन सच तो ये था कि वो दोनों को अपने सगे भाइयों जैसा प्यार करता था और ख़याल भी रखता था। अगर वो किसी बात के लिए मना कर देता था या कह देता था तो ये दोनो चुपचाप उसका कहा मान भी जाते थे।

तीनों नमूने पैदल ही मार्केट जाने वाले रास्ते की तरफ बढ़ चले। ये इनका रोज़ का ही काम था। मार्केट में भीड़ होती थी इस लिए ये लोग किसी न किसी की जेब साफ कर देते थे। ये अलग बात है कि ज़्यादातर ये अपनी हरकतों की वजह से पकड़ लिए जाते थे और फिर लोग अच्छी खासी धुनाई करते थे। बहरहाल, ये तीनों चलते हुए एक मोड़ पर मुड़ गए और अभी चार पांच क़दम ही आगे बढ़े थे कि सामने से तीन लोग आते दिखे। इन तीनों ने उन्हें देखा और उनमें से एक पर नज़र पड़ते ही इन तीनों की हवा निकल गई।

उधर से आ रहे उन तीनों की भी नज़र इन पर पड़ गई थी। कुछ पल ठिठकने के बाद उनमें से एक ने बाकी दोनों से कुछ कहा तो बाकी दोनों ने चौंकते हुए इन तीनों की तरफ देखा।

"अबे वो तो वही है न।" संपत ने जगन और मोहन की तरफ बारी बारी से देखते हुए घबराए हुए स्वर में कहा____"जो कल शाम को तबेले में भैंस का दूध निकाल रहा था?"

"अपन को क्या पता।" मोहन ने लापरवाही से कहा____"अपन ने उसका थोबड़ा थोड़े ना देखा था।"

"अबे भोसड़ी के थोबड़ा तो अपन ने भी नहीं देखा था उसका।" संपत ने खिसियाए हुए लहजे से कहा____"लेकिन उसी के जैसा हट्टा कट्टा दिख रहा है ये और सिर पर लुंगी की पगड़ी भी वैसी ही बांध रखी है।"

संपत की बात सुन कर मोहन या जगन में से कोई कुछ बोलता कि तभी तीनों ने देखा कि उधर से आने वाले वो तीनों आदमी बड़ी तेज़ी से इनकी तरफ आने के लिए दौड़ लगा चुके थे।

"अबे ये वही है।" मोहन घबरा के चीखा____"भागो बे जल्दी वरना ये लोग अपन लोगों की बिना थूक लगाए गांड़ मार लेंगे।"

मोहन का इतना कहना था कि उसके साथ जगन और संपत दोनों भी पलट कर भाग लिए। तीनों ऐसे भाग रहे थे जैसे इनके पीछे सैकड़ों भूत लगे हों। बीच बीच में पलट कर देख भी लेते थे कि पीछा करने वाले आ रहे हैं कि नहीं? मुश्किल से आधा किलो मीटर ही भाग पाए थे कि पीछे आ रहे आदमियों ने इन्हें पकड़ लिया।

"भाग कहां रहे थे मादरचोदो।" तीन में से एक ने गुस्से से कहा____"क्या सोचा था तुम लोगों ने कि बाल्टी भर दूध डकार कर पचा लोगे?"

"ब...बाल्टी....द...दूध????" मोहन मारे ख़ौफ के मिमियाया____"य...ये क्या कह रहे हैं आप?"

"ज़्यादा भोला बनने की कोशिश मत कर भोसड़ी के।" दूसरे ने गुस्से से कहा___"हमें पता चल गया है कि हमारे तबेले से बाल्टी भर दूध चुराने वाले तुम तीनों ही हरामी थे। एक आदमी ने तुम तीनों को एक जगह बाल्टी में से दूध डकारते हुए देखा था। उसी ने ये बात हमें बताई है।"

"अम्मा क़सम साहब।" संपत मारे डर के उसके पैरों में ही गिर गया, बोला____"हमने किसी का दूध नहीं चुराया।"
"लगता है गांड़ तोड़ाई करनी ही पड़ेगी तुम लोगों की।" तीसरे वाले ने सिर हिलाते हुए कहा____"तभी सच उगलोगे तुम लोग।"

कहने के साथ ही उसने बाकी दोनों को पेलाई करने का इशारा कर दिया। बस फिर क्या था, दोनों ने तबीयत से पेलना शुरू कर दिया तीनों को। वातावरण में तीनों की दर्द भरी चीखें गूंजने लगीं। जल्दी ही तीनों ने कबूल कर लिया कि इन्होंने ही उनका दूध चुराया था।

"मादरचोदो बाल्टी में पूरा पूरा आठ लीटर दूध था।" तीसरे ने गुस्से से घूरते हुए कहा____"अगर ईमानदारी से पैसे में हमसे खरीदते तो पंद्रह रुपिया के भाव में हम तुम लोगों को दे देते लेकिन तुमने चोरी किया है इस लिए अब उसका हर्ज़ाना भी भरना होगा।"

"हमें माफ़ कर दो साहब।" जगन ने हाथ जोड़ते हुए कहा____"हमारे पास पैसे नहीं थे और हम तीनों बहुत भूखे थे इस लिए जो सूझा वही कर डाला।"

"तो अब सूद समेत हर्ज़ाना भी भर भोसड़ी के।" पहले वाले ने गुस्से में कहा____"पंद्रह के भाव में आठ लीटर के दूध का एक सौ बीस रुपिया हुआ और हर्ज़ाना हुआ दो सौ रुपिया। यानि पूरे तीन सौ बीस रुपिया दे वरना तीनों को मार मार कर अधमरा कर दिया जाएगा।"

तीन सौ बीस रुपिया सुनते ही तीनों के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई। एक तो वैसे ही मार से गांड़ में दर्द होने लगा था और अब फिर से मार पड़ना तय हो गया था। तीनों ने एक एक कर के उन तीनों के पैर पकड़ लिए और रहम की भीख मांगने लगे मगर हज़ार कोशिश के बाद भी रहम न मिला उन्हें। जगन संपत और मोहन के पास पैसे के नाम पर एक आना भी नहीं था। उनकी बहुत मिन्नतों को देख कर आख़िर तीसरे वाले ने एक फ़ैसला किया।

"ठीक है।" तीसरे वाले ने कहा____"तुम लोगों पर रहम एक ही सूरत पर किया जा सकता है।"
"म..मतलब??" जगन को जैसे कुछ समझ न आया।

"मतलब ये कि तुम लोगों को हर्ज़ाना तो भरना ही पड़ेगा।" तीसरे वाले ने कहा____"अब क्योंकि तुम लोगों के पास हर्ज़ाना भरने के लिए पैसे तो हैं नहीं इस लिए अगर मुझसे रहम चाहिए तो तुम तीनों को मेरे तबेले में काम करना पड़ेगा।"

तीसरे आदमी की बात सुन कर तीनों एक दूसरे की तरफ देखने लगे। किसी के यहां काम करना या नौकरी करना इन लोगों की फितरत में ही नहीं था। उनको तो बस एक ही काम आता था और वो था अपने पेट की भूख मिटाना। इसके लिए वो हमेशा ग़लत तरीका ही अपनाते थे। ईमानदारी से कोई काम करना इन्हें दुनिया का सबसे गंदा काम लगता था।

"क्या हुआ? सांप क्यों सूंघ गया तुम लोगों को?" तीसरे वाले ने गुस्से से तीनों की तरफ देखा, फिर बोला____"काम तो तुम लोगों को करना ही पड़ेगा वरना ऐसी गांड़ तोड़ाई करूंगा कि हगते नहीं बनेगा तुम लोगों से।"

"हमें मंज़ूर है।" डर के मारे संपत जल्दी से बोल पड़ा____"हम तीनों आपके तबेले में काम करने को तैयार हैं।"

"अबे भोसड़ी के ये क्या कह रहा है तू?" मोहन धीरे से बोलते हुए उसकी तरफ गुस्से से देखा तो संपत ने भी उसी अंदाज़ में उससे कहा____"अबे इनकी बात नहीं मानेंगे तो बहुत मार पड़ेगी हमें।" कहने के साथ ही वो थोड़ा उसके कान के पास अपना मुंह ले जा कर धीरे से बोला____"फिकर मत कर, मौका मिलते ही चंपत हो लेंगे अपन लोग।"

संपत की बात सुन कर मोहन मन ही मन मुस्कुराया और फिर वो भी काम करने के लिए राज़ी हो गया। जगन तो ज़्यादातर वही करता था जो संपत निर्णय लेता था। उसके अनुसार उन तीनों में से संपत ही सबसे ज़्यादा होशियार और बुद्धिमान था। बहरहाल, तीनों नमूने जब काम करने के लिए राज़ी हो गए तो वो लोग इन्हें ले कर चल दिए।


{}{}{}{}{}

दो दिन गुज़र गए मगर वैसा न हो सका जैसा कि संपत ने मोहन से कहा था। हालाकि तीनों ही भागने की फ़िराक में थे मगर उन्हें भागने का मौका ही नहीं मिल सका। दो दिन से गांड़ तोड़ मेहनत करवाई जा रही थी तीनों से। तीनों का बुरा हाल हो गया था काम करते करते। दो वक्त का खाना मिलता तो था लेकिन भर पेट नहीं जिसके चलते तीनों को ऐसा लगने लगा था जैसे जिस्म के अंदर अब जान ही नहीं रह गई है। तीनों में से सबसे ज़्यादा कमज़ोर मोहन ही था इस लिए उसकी हालत सबसे ज़्यादा ख़राब थी मगर काम करने के सिवा दूसरा कोई चारा नहीं था।

तबेले के मालिक का नाम जोगिंदर चौधरी था। उमर भले ही उसकी पचास के आस पास थी लेकिन लंबा चौड़ा और हट्टा कट्टा था। बड़ी बड़ी मूंछें और गंजा सिर लिए जब वो तीनों को घुड़कता तो तीनों की हवा टाइट हो जाती थी। जोगिंदर के तबेले में कुल बीस भैंसें थी जिनके खाने पीने का इंतजाम और साफ सफाई की ज़िम्मेदारी अब इन तीनों नमूनों की थी। यूं तो जोगिंदर के तबेले में और भी कई लोग थे लेकिन अब उनका काम इन तीनों पर नज़र रखने का ही था। यही वजह थी कि तीनों को भागने का कोई मौका नहीं मिल रहा था। रात में भी जिस जगह ये सोते थे वहां से निकलना इनके लिए असंभव ही था। असल में तबेले के पीछे की तरफ दो तीन कमरे बने हुए थे। उन्हीं में से एक कमरे में इन तीनों को सोने के लिए कहा जाता था और जब ये तीनों उस कमरे में सोने जाते तो बाहर से कमरे को बंद कर के ताला लगा दिया जाता था। कहने का मतलब ये कि जोगिंदर हर्ज़ाने के रूप में इनकी काफी बेहतर तरीके से पेलाई कर रहा था।

सुबह सूरज निकलने से पहले ही इन्हें जगा दिया जाता था। उसके बाद नित्य क्रिया से फुर्सत होने के बाद ये तीनों तबेले में दाखिल हो जाते थे। तबेले में भैंसों का गोबर उठाना और तबेले की सफाई करना। उसके बाद भैंसों के खाने पीने का इंतजाम करना। इतने में ही दोपहर हो जाती और इनकी हालत ख़राब हो जाती। दोपहर में नहाने धोने के बाद इन्हें खाना दिया जाता जोकि इनकी खुराक़ से कम ही होता था। जोगिंदर के बाकी तीन तीन मुस्टंडे इनकी निगरानी में लगे रहते थे। उन तीनों को जोगिंदर ने बोल रखा था कि अगर ये तीनों काम करने में आनाकानी करें या भागने की कोशिश करें तो इनकी बढ़िया से कुटाई करें। सच तो ये था कि तीनों नमूनों को अपनी ज़िंदगी अब नरक सी लगने लगी थी।

"बेटीचोद काम कर कर के गांड़ का दर्द बढ़ता ही जा रहा है।" दोपहर को कमरे के अंदर बंद मोहन बाकी दोनों की तरफ देखते हुए बोला____"अगर यही हाल रहा तो कसम मरे हुए अम्मा बापू की अपन तो निपट ही जाएगा किसी दिन। ये सब इस मादरचोद संपत की वजह से होरेला है। इसी ने काम करने को हां बोला था और अपन से बोला था कि मौका मिलते ही चंपत हो जाएंगे।"

"काश! हमने उस दिन दूध न चुराया होता।" जगन ने अफसोस जताते हुए कहा____"तो आज कहीं चैन से घूम फिर रहे होते।"

"सही कहा यार।" संपत ने कहा____"अपन को नहीं पता था कि ऐसा कुछ हो जाएगा। काश! किसी ने पहले बता दिया होता तो अपन किसी का दूध चुराने का सोचता ही नहीं।"

"यहां से चंपत होने का कोई न कोई पिलान तो बनाना ही पड़ेगा भाई।" मोहन ने कहा____"वरना वो दिन दूर नहीं जब अपन तीनों लोग इधर ही काम कर कर के मर मरा जाएंगे।"

"हां संपत कुछ सोच यार।" जगन ने हताश भाव से कहा____"आख़िर कैसे इस जगह से निकलें हम?"

"फिलहाल तो चाह कर भी नहीं निकल सकते भाई।" संपत ने कहा____"तूने देखा ही है कि जोगिंदर के वो तीनों सांड अपन लोगों की निगरानी करते हैं। ऊपर से इस कमरे में भी बाहर से ताला लगा देते हैं। ऐसे में निकालना असंभव ही है।"

"अपन के दिमाग़ में एक मस्त पिलान आएला है।" मोहन ने सोचने वाले भाव से कहा___"क्यों न अपन लोग जोगिंदर के उन तीनों सांडों को अपनी तरफ मिला लें। जब वो तीनों अपनी तरफ हो जाएंगे तब अपन लोग आसानी से निकल सकते हैं।"

"तू न अपना ये पिलान गांड़ में डाल ले भोसड़ी के।" संपत ने कहा____"वो क्या तेरी अम्मा के यार हैं साले जो अपनी तरफ हो जाएंगे?"

"जुबान सम्हाल के बोल बे।" मोहन तैश में आ कर बोला____"वरना गांड़ तोड़ दूंगा तेरी।"
"तू चुप कर।" जगन ने उसे गुस्से से देखा, फिर संपत से बोला____"यहां से निकलने का कोई तो रास्ता होगा भाई। तू सोच, मुझे यकीन है तू ज़रूर कोई न कोई तरकीब निकाल लेगा।"

"अपन को लगता है कि अपन लोग यहां से तब तक नहीं निकल पाएंगे जब तक भागने का सोचेंगे।" संपत ने सोचने वाली मुद्रा बना कर कहा____"मतलब कि हमें यहां से भागने का सोचना ही नहीं चाहिए।"

"लो कर लो बात।" मोहन बोल पड़ा____"इसने तो अपनी गांड़ ही खोल कर दे दी। साला कहता है हमें यहां से निकलने का सोचना ही नहीं चाहिए। अबे गाँडू सोचेंगे नहीं तो क्या यहां हर रोज़ ऐसे ही अपनी गांड़ घिसते रहेंगे?"

"बात तो सही कह रहा है ये।" जगन ने सिर हिलाते हुए संपत की तरफ देखा____"अगर यहां से निकलेंगे नहीं तो यहीं पर पिसते रहेंगे भाई। तू भला ऐसा कैसे कह सकता है?"

"अबे तुम लोग अपन की पूरी बात तो सुन लो।" संपत ने कहा____"अपन के कहने का मतलब वो नहीं है जो तुम लोग समझ रेले हो।"

"भोसड़ी के दिमाग़ का भोसड़ा क्यों बना रहा है?" मोहन ने गुस्से में कहा____"साफ साफ बताता क्यों नहीं कि तेरा मतलब क्या है?"

"लौड़े गांड़ से नहीं ध्यान से सुन।" संपत ने उसे घूरते हुए कहा____"जोगिंदर ने अपने तीनों सांडों को अपन लोगों की निगरानी में इस लिए लगा रखा है क्योंकि उसे अच्छी तरह मालूम है कि अपन लोग इधर से चंपत हो जाएंगे। यानि अपन लोगों को उसे यकीन दिलाना होगा कि अपन लोग इधर से चंपत होने का सोचते भी नहीं हैं।"

"अबे लौड़े पर इससे होगा क्या?" मोहन पूछे बगैर न रह सका।
"जब उसे यकीन हो जाएगा तो वो अपने सांडों को अपन लोगों की निगरानी में नहीं लगाएगा।" संपत ने कहा____"और ऐसा भी हो सकता है कि वो अपन लोगों को इस तरह से कमरे में भी न बंद करे। सोच जब ऐसा हो जाएगा तो अपन लोगों के लिए इधर से चंपत हो जाना कितना आसान हो जाएगा।"

"वाह! क्या बात कही है तूने।" जगन उसकी पीठ ठोकते हुए बोला____"पर अपन की समझ में ये नहीं आ रहा कि अपन लोग जोगिंदर को यकीन कैसे दिलाएंगे और क्या वो सच में यकीन करेगा?"

"करना ही पड़ेगा भाई।" संपत ने कहा____"लेकिन उसके लिए अपन लोगों को भी पूरी ईमानदारी से काम करना होगा।"

"अब क्या ईमानदारी दिखाने के लिए उसके सामने अपनी गांड़ ही खोल कर रख दें?" मोहन ने उसे घूरा____"अबे लौड़े कहीं तू सच में उससे गांड़ तो नहीं मरवाने का सोच रहा?"

"बेटीचोद, तुझे तो हर वक्त यही सूझता है।" संपत ने उसे हल्के से एक मुक्कर मारा, फिर बोला____"अपन के कहने का मतलब है कि अब से हम बिना किसी के कहे हर वो काम करेंगे जो इस तबेले में होता है। अभी तक तो हम अपनी मर्ज़ी से कुछ कर ही नहीं रहे थे बल्कि इन लोगों के ज़ोर देने पर ही मजबूरी में कर रहे थे। इस लिए अब से अपन लोगों को किसी को कुछ कहने का मौका ही नहीं देना है। ये समझ ले कि अब से अपन लोग को इस तबेले को अपना ही तबेला समझना है और जी जान लगा के हर काम करना है।"

"तू ही कर साले।" मोहन बीच में ही नाराज़ हो कर बोल पड़ा____"अपन के बस का नहीं है अब काम करना। साला दो दिन से काम कर कर के गांड़ का बुरा हाल हो गया है।"

"इस चिंदी चोर को तू ही समझा बे जगन।" संपत ने शिकायती लहजे में जगन को देखा____"अगर इसने काम करने में ईमानदारी नहीं दिखाई तो घंटा अपन लोग यहां से नहीं निकल पाएंगे।"

"मुझे खुद कुछ समझ में नहीं आ रहा लौड़ा।" जगन ने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा____"भला ईमानदारी से काम कर के हम कैसे यहां से निकल सकेंगे?"

"तू साले शून्य बुद्धि ही रहेगा।" संपत जगन को झिड़कते हुए बोला____"कभी तो अकल लगाया कर गधे।"
"गधा मत बोल बे।" जगन ने गुस्से से देखा उसे____"वरना गांड़ में लंड दे दूंगा।"

"अपन के भेजे में एक और मस्त पिलान आएला है।" मोहन तपाक से बोला____"अपन लोग उस मुछाड़िए जोगिंदर को बोल देते हैं कि हम बीमार हैं। अपन लोगों को बीमार देख वो अपन लोगों को यहां से हस्पताल ले जाएगा। बस, अपन लोग उधर से ही चंपत हो जाएंगे। पिलान मस्त है ना?"

"घंटा मस्त है।" संपत ने कहा____"अपन लोग अगर उसको बोलेंगे कि हम बीमार हैं तो वो समझ जाएगा कि अपन लोग काम न करने के लिए बहाना बना रहे हैं। उसके बाद वो अपने तीनों सांडों के द्वारा ही हमारा इलाज़ करवाएगा।"

"ये भी ठीक कहा तूने।" जगन ने सिर हिलाया____"मादरचोद बड़ी तगड़ी मुसीबत में फंस गएले हैं अपन लोग।"

"यहां से निकलने का बस एक वही उपाय है जो अपन ने बताया है।" संपत ने कहा____"अपन लोगों को पूरी ईमानदारी से काम करना होगा और जब जोगिंदर को हम पर भरोसा हो जाएगा तो वो हम पर नज़र रखवाना बंद करवा देगा। बस तभी अपन लोग यहां से खिसक सकते हैं वरना ऐसे ही गांड़ घिसते रहेंगे यहां।"

"पर ये भी तो सोच बे कि अपन लोग काम कैसे कर पाएंगे?" मोहन ने कहा___"यहां तो दो दिन में ही गांड़ दर्द करने लगी है। आगे और अभी कितना काम करना पड़ेगा जिससे उस जोगिंदर को हम पर यकीन हो जाए?"

"अब ये तो उसकी समझदारी पर है बे।" संपत ने कहा____"अगर अपन लोग पूरे मन से काम करते हुए उसे दिखाएंगे तो संभव है कि उसे जल्दी ही अपन लोगों पर यकीन हो जाए।"

"फिर तो अपन अभी से पूरे मन से काम करने का सोच लेता है।" जगन ने जैसे अपना फैसला सुनाया____"मां चुदाए गांड़ का दर्द, अब तो अपन गांड़ से गू निकलने तक काम करेगा।" कहने के साथ ही उसने मोहन की तरफ देखा और कहा____"और तू भी मन लगा कर काम करेगा वरना जोगिंदर के मुस्टंडों से पहले मैं तेरी गांड़ तोड़ दूंगा, समझा?"

"समझ गया बाप।" मोहन ने सिर हिलाया____"तुम लोग तो साले मेरी गदराई हुई गांड़ के ही पीछे पड़े रहते हो।"

फ़ैसला हो चुका था। कमरे में दो घंटे आराम करने के बाद जगन ने दोनों को उठने को कहा और खुद दरवाज़े की तरफ बढ़ चला। उसने दरवाज़े को थपथपाते हुए आवाज़ लगाई तो कुछ ही देर में दरवाज़ा खुला। दरवाज़े के बाहर तीनों सांड लट्ठ लिए किसी जिन्न की तरह प्रगट हो गए। जगन उन्हें देख कर पहले तो सकपकाया फिर एकदम से तन कर खड़ा हो गया।

"ऐसे दीदे फाड़ के क्या देख रेले हो तुम लोग?" जगन ने बिना ख़ौफ खाए कहा___"एक तरफ हटो अपन लोगों को तबेले में काम करने जाना है।"

जगन की बात सुन कर तीनों के चेहरों पर चौकने वाले भाव उभरे। तीनों ने एक दूसरे की तरफ देखा और फिर जगन को देखते हुए उनमें से एक ने कहा____"दिमाग़ तो ठिकाने पर है न तेरा? इस वक्त तबेले में कौन सा काम करने जा रहा है तू? अंदर जा, चार बजे हम खुद उठाने आएंगे।"

"अंदर टाइम पास नहीं हो रहा भाई।" जगन के पीछे से निकल कर संपत ने कहा____"तबेले में कुछ न कुछ काम करेंगे तो टाइम भी पास हो जाएगा। वैसे भी हम यहां काम करने ही तो आए हैं तो काम करने दो ना हमें।"

संपत की बात सुन कर वो तीनों गौर से संपत जगन और मोहन का चेहरा देखने लगे। इधर इन तीनों की धड़कनें ये सोच कर तेज़ हो गईं थी कि अगर तीनों सांडों ने मना कर दिया तो पिलान ख़राब हो जाएगा।

"ठीक है।" दूसरे ने कहा____"तुम में से दो लोग तबेले की सफाई करने चलो और एक आदमी बर्तन धोने जाएगा।"

उसकी बात सुन कर तीनों खुश हो गए। कुछ ही देर में जगन और संपत को तबेले में पहुंचा दिया गया और मोहन को लिए एक आदमी पानी की टंकी के पास पहुंच गया। तबेले के बाई तरफ ट्यूब वेल था और एक बड़ा सा झोपड़ा भी था। झोपड़े के आस पास कुछ पेड़ पौधे लगे हुए थे जिसकी छांव फैली हुई थी।

"झोपड़े के अंदर दूध के बड़े बड़े कनस्तर रखे हुए हैं।" मोहन को देखते हुए तीन सांडों में से एक ने कहा____"उन्हें धुलने का काम यूं तो हर रोज कमला का है लेकिन अब से तू धोएगा, समझा?"

"क..कमला कौन?" मोहन पूछे बगैर न रह सका था।
"अबे कमला एक औरत है।" उसने मोहन को घूरते हुए कहा____"और वो भी तेरी तरह यहां काम करने आती है। उसके साथ उसकी जेठानी का एक लड़का भी यहां काम करता है।"

मुस्टंडे की बात सुन कर मोहन की आंखों के सामने तीन दिन पहले का वो दृश्य घूम गया जो उसने देखा था। उसने मन ही मन सोचा शायद कमला वही औरत है जो उस दिन एक लड़के के साथ अपनी चूचियां दबवाते हुए मज़े कर रही थी। ये सोचते ही उसके मन में खुशी के लड्डू फूट पड़े और उसके होठों पर मुस्कान उभर आई।

"ज़्यादा खुश मत हो।" उसकी मुस्कान देख उस मुस्टंडे ने कहा____"वो तेरे जैसे लंगूर को घांस नहीं डालने वाली। वो तो हमारे मालिक जोगिंदर चौधरी की रण्डी है।"

"फिर तो उसने तुम्हें भी घांस नहीं डाला होगा।" मोहन बेझिझक बोल उठा____"भला कोई औरत मालिक के नौकरों को क्यों घांस डालेगी जब मालिक ही उसका खासम खास बना हुआ हो।"

"मुझे उसकी घांस से मतलब भी नहीं है लौड़े।" उसने मुस्कुराते हुए कहा____"मैं तो उसकी बेटी की मलाई खाता हूं जो उससे कहीं ज़्यादा करारी माल है।"

"वाह! गुरु तुम तो काफी पहुंचे हुए हरामी हो बे।" मोहन को जाने क्या सूझा कि वो एकदम से उसके पैरों में ही बैठ गया, फिर उसका पैर पकड़ के बोला____"अपन को अपना चेला बना लो गुरु और थोड़ा बहुत अपन को भी मलाई खाने का सुख दे दो।"

"मलाई खाने के लिए पहले सेवा करनी पड़ती है लौड़े।" मोहन के मुख से अपने लिए गुरु शब्द सुन कर वो मुस्टंडा मन ही मन बड़ा खुश हुआ था किंतु अपनी खुशी को दबाते हुए बोला____"मुफ्त में कहीं कुछ नही मिलता, समझा?"

"समझ गया गुरु।" मोहन ने सिर हिलाया____"बस तुम हुकुम करो, अपन सेवा करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा। पर पहले तुम अपन को अपना चेला बना लो गुरु।"

"अच्छा ठीक है ठीक है।" वो मन ही मन गदगद होते हुए बोला____"मैं तुझे अपना चेला बना लेता हूं लेकिन ख़बरदार ये बात तू किसी को नहीं बताएगा वरना गांड़ तोड़ दूंगा तेरी।"

"अपनी मरी हुई अम्मा की क़सम गुरु।" मोहन तपाक से बोला____"अपन अख्खा लाइफ में कभी ये बात किसी को नहीं बताएगा। बस तुम गुरु अपने इस चेले पर अपनी कृपा बनाए रखना।"

"बिल्कुल।" मुस्टंडे ने कहा____"अब चल तू अपना काम कर और हां इधर से भागने का सोचना भी मत वरना समझ गया न?"

"अबे क्या बता करते हो गुरु।" मोहन ने इस तरह मुंह बनाया जैसे उसने उसकी तौहीन कर दी हो, बोला____"अब तो अपन कहीं नहीं जाएगा कसम से। अपन को पता ही नहीं था कि इधर तुम अपन के गुरु बन जाओगे और किसी करारी माल की मलाई खिलाओगे वरना पहले ही आ जाता इधर।"

"मुझे तुझ पर भरोसा तो नहीं है।" उसने मोहन की तरफ देखते हुए कहा____"लेकिन तुझे एक मौका देता हूं मैं। अगर तू सच में मेरे भरोसे पर खरा उतरा तो यकीन रख हर रोज़ तुझे मलाई खाने को मिलेगी।"

"अबे भरोसा रखो गुरु।" मोहन ने कहा____"अपन अब कहीं नहीं जाने वाला। अब तो अपन अपने गुरु के चरणों में ही रहेगा।"

"चल अब बातें मत बना और काम कर।" उसने मुस्कुराते हुए कहा____"कुछ देर में कमला भी आ जाएगी। उसके आने से पहले तुझे सारे बर्तन धो डालने हैं।"

मोहन ने सहमति में सिर हिलाया और झोपड़े के अंदर चला गया। इधर वो मुस्टंडा मन ही मन जाने क्या सोचते हुए पलटा और चला गया। अभी वो कुछ ही दूर गया होगा कि तभी मोहन झट से झोपड़े के दरवाज़े के पास आया और धीमें से बोला____"तू और अपन का गुरु? अबे चल हट।"



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Rajit singh
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Uske update likh raha hu, story complete hone ke baad daily ek ek update apne un readers bhaiyo ko Inbox me send karuga jo imandari se story padh kar comments ya reviews dete hain... :declare:
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