भाग ११७ - बुच्ची, इस्तेमाल के बाद
कुल १४,००० से अधिक शब्द, आठ पोस्ट्स
५० से अधिक चित्र,
बुच्ची --
भैया से मिलन के बाद
कोई दूर से भी देख के कह सकता है, ये छोरी चोदी नहीं गयी है कचरी गयी है और वो भी कस के।
एरोटिक भी
बुच्ची की चूत में अभी भी जैसे कोई मोटा लकड़ी का लंड घुसा हुआ हो, हर कदम पर चीख निकल रही थी। झिल्ली फटने वाली जगह पर भैया ने बार-बार अपना मोटा लंड रगड़ा था, अब वो जगह लाल होकर अच्छे से छिल गई थी। बुच्ची चल नहीं पा रही थी, जाँघें रगड़ती हुई लंगड़ाती चल रही थी। बार-बार रोते हुए बोली,
"कमीनी स्साली... रुक जा न... मेरी चूत फट गई है...!"
हलके गुनगुने पानी में भीगी तौलिये से उसने चार पांच बार बुच्ची की ताज़ी फ़टी बुर की सेंकाई की,
और उसी के साथ उस की पहली चुदाई की दो दो बार पूरे डिटेल में न सिर्फ दास्तान सुनी बल्कि अपनी बात भी मनवा ली।
" यार सुन, मेरी पांच दिन की छुट्टी शरू हो गयी है और मेरे सब यार एकदम पागल हो गए हैं, कुछ कर न, अब तो तेरे भाई ने इत्ती कस के तेरी कुटाई कर दी है, तू आराम से अब घोंट लेगी मेरी बिन्नो। मेरी अच्छी बुच्ची मान जा न, देख सब इत्तेदिन से तेरे पीछे पड़े हैं और अब इतना निहोरा कर रहे हैं, अच्छा वो जो झूले पे हम सब के साथ था जो ऊपर से नीचे वाले झूले पे, याद है या भूल गयी ? " शीला ने पूछा
रोमांटिक भी
रात शुरू हो चुकी थी। हल्की चाँदनी आम के पेड़ों की फुनगियों से छन-छन कर नीचे बिखर रही थी, जैसे कोई रहस्यमयी जादू जमीन पर उतर रहा हो।
बुच्ची का रास्ता भले ही पुराना था, पर आज उसका दिल अनजाने में तेजी से धड़क रहा था। वो आँख बंद करके भी घर पहुँच सकती थी, लेकिन आज आँखें बंद करने की नौबत खुद आ गई।
अचानक दो गर्म हथेलियाँ पीछे से आईं और उसकी दोनों आँखों को नरमी से ढक लिया।
बुच्ची की सांस एक पल को थम सी गई। उसका पूरा शरीर हल्का सा काँप उठा। पीछे से एक गहरी, परिचित और थोड़ी काँपती हुई आवाज आई —
"पहचान कौन?"
बुच्ची के होंठों पर एक प्यारी-सी मुस्कान खिल गई। दिल में एक मीठी-सी लहर दौड़ गई। वो जानती थी। उस छुअन को, उस गर्मी को, उस स्पर्श की लालसा को वो हजारों में भी पहचान लेती।
गप्पू...
साल भर से वो दोनों एक-दूसरे को चुपके-चुपके तड़पा रहे थे। नज़रों से, मुस्कानों से, छोटी-छोटी छेड़छाड़ से। आज वो तड़पन अब और सहन नहीं हो रही थी।
गप्पू का सीना धीरे-धीरे उसकी पीठ से सट गया। उसकी गर्म सांस बुच्ची की गर्दन पर पड़ रही थी, जिससे उसके बदन में मीठी-मीठी सिहरन दौड़ रही थी। बुच्ची ने धीरे से पीछे हटकर खुद को उसके सीने से और लिपटा लिया।
"छोड़ न..." उसने बहुत नरम, लगभग फुसफुसाती हुई आवाज में कहा। उसकी आवाज में शरारत थी, लेकिन साथ ही एक गहरी चाहत भी।
और नाच गाने वाले भी, लोकगीत भी
रीना और मीना के पास बन्ना बन्नी के गीतों का खजाना था लेकिन अब उन्होंने एक मस्ती वाला शादी का गाना शुरू किया जैसे वो आने वाली नयी दुलहिनिया की ओर से कुछ कह रही हों
टमाटर जैसे गाल बन्ना छूने न दूँगी, बन्ना छूने न दूँगी, छूने न दूँगी,
टमाटर जैसे गाल बन्ना छूने न दूँगी, टमाटर जैसे गाल बन्ना छूने न दूँगी।
थाली भरी है बन्ना खाने न दूँगी, थाली भरी है बन्ना खाने न दूँगी।
सासु रानी के पास बन्ना जाने न दूँगी, सासु रानी के पास बन्ना जाने न दूँगी।
छुटकी - होली दीदी की ससुराल में पृष्ठ १२१९
please read, like and comment . looking for your views and comments.
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बुच्ची --
भैया से मिलन के बाद
कोई दूर से भी देख के कह सकता है, ये छोरी चोदी नहीं गयी है कचरी गयी है और वो भी कस के।
एरोटिक भी
बुच्ची की चूत में अभी भी जैसे कोई मोटा लकड़ी का लंड घुसा हुआ हो, हर कदम पर चीख निकल रही थी। झिल्ली फटने वाली जगह पर भैया ने बार-बार अपना मोटा लंड रगड़ा था, अब वो जगह लाल होकर अच्छे से छिल गई थी। बुच्ची चल नहीं पा रही थी, जाँघें रगड़ती हुई लंगड़ाती चल रही थी। बार-बार रोते हुए बोली,
"कमीनी स्साली... रुक जा न... मेरी चूत फट गई है...!"
हलके गुनगुने पानी में भीगी तौलिये से उसने चार पांच बार बुच्ची की ताज़ी फ़टी बुर की सेंकाई की,
और उसी के साथ उस की पहली चुदाई की दो दो बार पूरे डिटेल में न सिर्फ दास्तान सुनी बल्कि अपनी बात भी मनवा ली।
" यार सुन, मेरी पांच दिन की छुट्टी शरू हो गयी है और मेरे सब यार एकदम पागल हो गए हैं, कुछ कर न, अब तो तेरे भाई ने इत्ती कस के तेरी कुटाई कर दी है, तू आराम से अब घोंट लेगी मेरी बिन्नो। मेरी अच्छी बुच्ची मान जा न, देख सब इत्तेदिन से तेरे पीछे पड़े हैं और अब इतना निहोरा कर रहे हैं, अच्छा वो जो झूले पे हम सब के साथ था जो ऊपर से नीचे वाले झूले पे, याद है या भूल गयी ? " शीला ने पूछा
रोमांटिक भी
रात शुरू हो चुकी थी। हल्की चाँदनी आम के पेड़ों की फुनगियों से छन-छन कर नीचे बिखर रही थी, जैसे कोई रहस्यमयी जादू जमीन पर उतर रहा हो।
बुच्ची का रास्ता भले ही पुराना था, पर आज उसका दिल अनजाने में तेजी से धड़क रहा था। वो आँख बंद करके भी घर पहुँच सकती थी, लेकिन आज आँखें बंद करने की नौबत खुद आ गई।
अचानक दो गर्म हथेलियाँ पीछे से आईं और उसकी दोनों आँखों को नरमी से ढक लिया।
बुच्ची की सांस एक पल को थम सी गई। उसका पूरा शरीर हल्का सा काँप उठा। पीछे से एक गहरी, परिचित और थोड़ी काँपती हुई आवाज आई —
"पहचान कौन?"
बुच्ची के होंठों पर एक प्यारी-सी मुस्कान खिल गई। दिल में एक मीठी-सी लहर दौड़ गई। वो जानती थी। उस छुअन को, उस गर्मी को, उस स्पर्श की लालसा को वो हजारों में भी पहचान लेती।
गप्पू...
साल भर से वो दोनों एक-दूसरे को चुपके-चुपके तड़पा रहे थे। नज़रों से, मुस्कानों से, छोटी-छोटी छेड़छाड़ से। आज वो तड़पन अब और सहन नहीं हो रही थी।
गप्पू का सीना धीरे-धीरे उसकी पीठ से सट गया। उसकी गर्म सांस बुच्ची की गर्दन पर पड़ रही थी, जिससे उसके बदन में मीठी-मीठी सिहरन दौड़ रही थी। बुच्ची ने धीरे से पीछे हटकर खुद को उसके सीने से और लिपटा लिया।
"छोड़ न..." उसने बहुत नरम, लगभग फुसफुसाती हुई आवाज में कहा। उसकी आवाज में शरारत थी, लेकिन साथ ही एक गहरी चाहत भी।
और नाच गाने वाले भी, लोकगीत भी
रीना और मीना के पास बन्ना बन्नी के गीतों का खजाना था लेकिन अब उन्होंने एक मस्ती वाला शादी का गाना शुरू किया जैसे वो आने वाली नयी दुलहिनिया की ओर से कुछ कह रही हों
टमाटर जैसे गाल बन्ना छूने न दूँगी, बन्ना छूने न दूँगी, छूने न दूँगी,
टमाटर जैसे गाल बन्ना छूने न दूँगी, टमाटर जैसे गाल बन्ना छूने न दूँगी।
थाली भरी है बन्ना खाने न दूँगी, थाली भरी है बन्ना खाने न दूँगी।
सासु रानी के पास बन्ना जाने न दूँगी, सासु रानी के पास बन्ना जाने न दूँगी।
छुटकी - होली दीदी की ससुराल में पृष्ठ १२१९
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