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रात धीरे-धीरे ढल रही थी, लेकिन दिल्ली के तंग गलियों में अब भी हर कोने में फुसफुसाहटें थीं।
हसन मिर्ज़ा अपने आलीशान ऑफिस में बैठा था — सामने उसके दो खास खबरियों का झुका हुआ सिर, और सामने उसके चहरे पर फैली हुई शिकनें।
हसन मिर्ज़ा ने धुआँ उड़ाते हुए सिगार होंठों से हटाया, गहरी सांस ली और फिर अपनी भारी आवाज़ में पूछा—
हसन मिर्ज़ा :
कौन था...?"
खबरी थोड़ा सहम कर बोला—
खबरी:
"हुजूर... नाम तो पक्का नहीं... मगर खबर है कि… पुरानी दिल्ली का एक लोकल गुंडा… रहिल नाम का… उसी के लोग देखे गए थे उस रात…"
हसन मिर्ज़ा की आँखें एक पल के लिए सिकुड़ जाती हैं… उसने सिगार को ऐश ट्रे में कुचला और धीरे से, बहुत ही नपे-तुले लहजे में कहा—
हसन मिर्ज़ा (आवाज़ ठंडी मगर गहरी):
"एक लोकल गुंडा…?
इतनी बड़ी वारदात…?
इतनी हिम्मत…?"
वो कुर्सी से उठता हैं, कमरे में टहलते हुए गहरी सोच में डूब जाता हैं… फिर धीमे मगर ज़हर भरे लहजे में बुदबुदाते हैं—
हसन मिर्ज़ा:
"नहीं...
कोई गली का आवारा कुत्ता इतना बड़ा कांड नहीं सकता…"
"उसके पीछे कोई और है…"
"कोई… जो बंदूकों से खेलने में उस्ताद है…"
"कोई… जिसके लिए ये बस खेल जैसा है.…"
फिर खिड़की के पास जाकर बोलता है... तुम सब ने कभी भड़ियों के झुण्ड को देखा है...? झुण्ड के आगे आगे उनका सरदार चलता हैं... सारे भड़िये उसे झुण्ड का नेता मानते हैं.. क्यों की वो उस झुण्ड का सबसे ताकतवर भेरिया होता है... पर ये बात सिर्फ उस सादर को ही पता होती हैं.... की उस झुण्ड मे कोई और भी है.. जो उस से भी ज्यादा ताकतवर.. खूंखार हैं.. और वो सरदार भी उसी के इसरों कर नाचता हैं....
हसन मिर्ज़ा का चेहरा अब खिड़की से आती ठंढी हवाओ को महसूस कर रहा था।
वो एक इशारा करता है… और एक आदमी झट से उसका मोबाइल पकड़ा देता है।
हसन मिर्ज़ा नंबर डायल करता है — स्क्रीन पर नाम चमकता है — "मालिका"।
फोन कुछ सेकेंड बजता है, फिर मालिका की जनानी, मगर लोभी आवाज़ सुनाई देती है—
मालिका (हलक़ी मुस्कान के साथ):
"आदाब मिर्ज़ा साहब… इतनी रात गए याद किया…?"
हसन मिर्ज़ा बिना भूमिका के सीधा मुद्दे पर आता है—
हसन मिर्ज़ा (आदेशात्मक आवाज़ में):
"मालिका… एक काम है तेरे लिए…"
"एक राहिल नाम के कुत्ते को अपने जाल में फांसना... उसे अपनी मुट्ठी मे कर.... पता लगाना हैं की मेरे सोने को कहाँ रखा हैं उसने..
"और ये भी जान… उसके पीछे किसकी छाया है…"
फोन के उस पार हल्की हँसी गूंजती है।
मालिका (धीरे से):
"राहिल...? ह्म्म्म...
ठीक हैं ... वैसे ये बात तुम मुझे यहाँ आकर भी बता सकते थे.. अकेली हूँ घर पर... बेटियां बाहर गई हैं...
हसन मिर्ज़ा:
"अभी नहीं... !"
मालिका मुस्कुराती है, फिर ठंडी आवाज़ में कहती है—
मालिका:
हसन मेरी जान....
रहिल मेरा शिकार बनेगा… और उसके साथ उसके सारे राज भी आपके कदमों में होगा…" वैसे अब सहबाज कैसा हैं...?
हसन उसकी बात सुने बिना फोन काट देता हैं...
फोन कटते ही हसन मिर्ज़ा कुर्सी पर फिर से धंस जाता है।
कमरे में गहरा सन्नाटा छा जाता है — बस उसकी आँखों में बर्फ़ीली आग जल रही थी।
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एक भारी, सन्नाटे से भरी सुबह। हवाओं में बेचैनी थी। बंगलो के ड्रॉइंग रूम में अलिना की फोन की घंटी बजती है। वो बेसब्री से फोन उठाती है। दूसरी तरफ डॉक्टर सलीम की गंभीर आवाज़ होती है।
डॉ. सलीम (धीरे, ठहरते हुए)
"मैडम... सहबाज को होश आ गया है..."
अलिना जैसे किसी गहरे समुंदर से बाहर आई हो। उसकी आंखें छलक जाती हैं, होंठ कांपते हैं। वो बिना कुछ बोले तुरंत खड़ी हो जाती है।
अलिना (कांपती आवाज़ में)
"मेरा बच्चा... मेरा सहबाज..."
गाड़ी की चाबी उठाती है और नौकर तक कुछ कहे बिना सीढ़ियां दौड़ती है। पूरा घर जैसे उसके कदमों की आहट से कांप उठता है। गाड़ी बेतहाशा स्पीड में अस्पताल की ओर भागती है। रियर व्यू मिरर में उसकी आंखों से बहते आंसू साफ़ दिखते हैं।
अस्पताल में डॉक्टर और नर्स पहले से खड़े होते हैं। अलिना दरवाज़ा धकेलती है और सीधे डॉक्टर के सामने आ खड़ी होती है।
अलिना (सांसें टूटी हुई)
"कैसा है मेरा बेटा? मैं उससे मिल सकती हूं?"
डॉ. सलीम (थोड़ा रुक कर)
"मैम... सहबाज होश में है... मगर—"
अलिना (तेज़ी से)
"मगर क्या डॉक्टर? साफ़-साफ़ बोलिए!"
डॉ. सलीम (गंभीर लहजे में)
"सिर पर गहरी चोट की वजह से... उसके दोनों पैरों में लकवा हो गया है। वो अब चल नहीं सकता... कम से कम अभी नहीं।"
अलिना की आंखें फटी रह जाती हैं। उसकी सांस जैसे थम जाती है। फिर वो एक कदम पीछे हटती है... और धीरे से दीवार से टिक जाती है।
अलिना (सिसकते हुए)
"नहीं... ये नहीं हो सकता... मेरा बेटा... मेरे सहबाज ... नहीं..."
वो लड़खड़ाते हुए ICU के अंदर जाती है। सहबाज का चेहरा पीला है, आंखें खुली हैं, लेकिन शरीर बेजान। अलिना उसके पास जाकर फर्श पर बैठ जाती है। उसके बाल बिखर जाते हैं, होंठ कांपते हैं, और वो धीरे से उसके पैर छूती है।
अलिना (फूट-फूट कर)
" सहबाज मेरे जान... देखो अम्मी आपके पास हैं...
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कमरे में अजीब सी खामोशी थी… मशीनों की बीप की आवाज़, सहबाज की सांसों का धीमा उतार-चढ़ाव और अलिना की आंखों से लगातार गिरते आंसू। वो उसके बेजान पैरों को बार-बार सहला रही थी… जैसे प्यार से ताक़त लौटा देगी।
अलिना (धीरे से, कांपती उंगलियों से उसका हाथ पकड़ते हुए):
"सहबाज... मेरी जान... मुझसे बात करो ना... कुछ तो बोलो..."
सहबाज चुप था। उसकी आंखें छत को घूर रही थीं, लेकिन उनमें गहरी बेचैनी तैर रही थी। फिर धीरे से उसने गर्दन मोड़ी, और बिना अलिना की तरफ देखे कहा:
सहबाज (खामोशी चीरते हुए):
"ये सब... उसनें किया है, अम्मी..."
[अलिना जैसे पत्थर की हो गई। उसे एक पल में समझ आ गया—वो 'उसने' कौन है... उसका सिखंदर। उसकी रगों में एक टीस सी दौड़ गई।]
अलिना (धीरे से, टूटते हुए):
"नहीं... बेटा... ऐसा मत सोचो..."
[सहबाज ने उसकी तरफ देखा, उसकी आंखों में गहरी चोट थी, और एक मासूम डर। फिर वो बच्चों की तरह फुसफुसाया:]
सहबाज:
"अम्मी... तुम मेरे साथ हो ना...?
मेरा साथ दोगी ना तुम...?"
[अलिना अब तक अंदर ही अंदर टूट चुकी थी। उसने कांपते हाथों से सहबाज का सिर अपनी गोद में रखा और रोते हुए बोली:]
अलिना (आंसुओं से गीली आवाज़ में):
"मेरे लाल... ज़िंदगी के हर मोड़ पर…
हर दर्द के हर साए में...
तुम्हारी अम्मी तुम्हारे साथ होगी...
कभी तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूँगी... कभी नहीं..."
[सहबाज उसकी गोद में वैसे ही चुप पड़ा रहा। फिर अलिना ने धीरे से उसके माथे पर हाथ रखा और फुसफुसाई:]
अलिना (धीरे से):
"पर सुनो...
ये बात हसन को मत बताना...
सिखंदर अभी बच्चा है... नादान है...
गलतियां करता है... पर दिल से बुरा नहीं है...
माफ कर दो उसे... मेरे लिए..."
[सहबाज कुछ नहीं कहता, बस अपनी पलकें मूंद लेता है। फिर बड़ी मुश्किल से फुसफुसाता है:]
सहबाज:
"मुझे किसी से कुछ नहीं चाहिए...
बस तुम...
बस तुम्हारा साथ, अम्मी..."
अलिना उसकी हथेली को अपनी हथेली में छिपा लेती है, सायद अनजाने मै उसने एक वादा कर लिया था..जैसे ये वादा कोई क़ीमती चीज़ हो। कमरे में फिर सन्नाटा छा जाता है, लेकिन अब वो सन्नाटा पहले जैसा नहीं... अब वो एक माँ और बेटे के बीच जन्मे अंधे रिश्ते की दस्तक है। अलीना आगे झुकती हैं और सहबाज के होठो पर अपना होंठ रख देती हैं... फिर बड़े प्यार से उसके बालो को सहलाती हुवी उसके होठों का रसपान करने लगती हैं... अगर कोई अनजान देखता तो बोल ही नहीं सकता था ये दोनों माँ बेटे हैं.. ऐसा लग रहा था दो प्रेमी एक दूसरे को चुम्बन दे रहे हैं.. अब दोनों के दिल मे क्या था ये तो रब ही जाने...
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कमरे में अभी भी हल्की-हल्की दवाइयों की गंध फैली है। उसके पास बैठी उसकी उंगलियों को सहला रही है, जैसे मां अपने टूटे हुए बच्चे को संभालने की कोशिश कर रही हो।
सहबाज (धीमी आवाज़ में, खोए हुए अंदाज़ में)
"अम्मी... सब ख़त्म हो गया ना?"
अलिना (आंसू रोकती हुई)
"नहीं मेरे लाल कुछ नहीं हुवा हैं दुनयाँ के सारे डॉक्टर्स को तेरी इलाज मे लगा दूंगी पर तुझे तेरे कदमो पर खड़ा कर के रहूंगी....."
तभी दरवाज़ा तेजी से खुलता है… और अंदर आता है हसन मिर्ज़ा। आंखों में बेताबी, चेहरे पर डर और होठों पर किसी तूफान की गूंज।
हसन मिर्ज़ा
"सहबाज!!!"
वो तेज़ी से उसके पास आता है, उसकी हालत देखकर एक पल को ठिठक जाता है। व्हीलचेयर में जकड़ा उसका बेटा… आंखों में खालीपन… और शरीर में हरकत तक नहीं…
हसन मिर्ज़ा (सांसें फुली हुई, कांपती आवाज़ में)
"ये… ये क्या हो गया मेरे बेटे को...? अलिना... ये... ये?"
अलिना (कठिनाई से बोलती है)
"डॉक्टरों ने कहा है… अस्थाई लकवा है… अगर अच्छे से ख्याल रखा जाए तो… शायद..."
हसन मिर्ज़ा (सहबाज की ओर झुकते हुए, उसकी ठुड्डी पकड़ कर)
"बोल … ये हाल किसने किया तेरा? किसने इतनी हिम्मत की… कौन था वो…?"
सहबाज (थोड़ी देर चुप रहता है, फिर धीरे से)
"अब्बू... छोड़ दीजिए... सब ठीक हो जाएगा..."
हसन (गुस्से से फनफनाता है)
"ठीक हो जाएगा...? ये पैर जो अब नहीं चल सकते... ये आंखों में जो मायूसी है... ये ठीक हो जाएगा...? नहीं सहबाज… मुझे नाम बता … मैं उसे ज़िंदा दफना दूंगा…"
सहबाज (चेहरा फेरते हुए, सूनी आवाज़ में)
"कुछ बातों का जवाब… चुप्पी ही होती है अब्बू…"
अलिना (धीरे से हसन के पास जाकर)
"ये वक्त बदले की नहीं... सहारे की है... " अंदर ही अंदर वो काँप रही थी... कहीं सहबाज हसन के सामने सिकंदर का नाम ना लेले..
हसन मिर्ज़ा (कंधे झुका कर, आंखों में आँसू लिए)
"मैंने बहुत कुछ खोया है इस सियासत में... अब और नहीं सह सकता अलिना... मेरा बेटा… मेरा खून… यूं जिंदा लाश बनकर नहीं रह सकता…"
सहबाज (धीरे से, आंखें बंद करते हुए)
"बस अब्बू… जो होना था, हो गया… बस अब आप मेरे साथ रहिए… यही बहुत है…"
अलिना सहबाज के सिर पर हाथ फेरते हुए उसे अपने सीने से लगाती है… और हसन मिर्ज़ा वहीं बैठकर अपनी आंखें पोंछते हैं, अंदर ही अंदर उस आग में जलते हुए… जो नाम सहबाज ने नहीं लिया, पर जिसने उसके दिल को चीर कर रख दिया…
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धूप अपने ढलने के सफर पर थी, लेकिन मोहल्ले की गलियों में सन्नाटा पसरा हुआ था।
वो रहमत नगर जहाँ कुछ दिन पहले तक चीखें, दौड़ते क़दम, खून और खौफ़ का नज़ारा था, अब एक अजीब सी खामोशी में लिपटा था।
हसीम साहब अब फिर से अपनी चारपाई बाहर निकालने लगे थे,
ज़ोया उनके लिए पानी लाती और अली अपनी दुकान पर बैठा झाड़ू देता नज़र आता।
रुख़्सार के चेहरे पर भी अब सुकून था, वो मोहल्ले की औरतों में बैठकर बातें करने लगी थी।
राहिल और साद अब फिर से वैसी ही रौनक से घूमते नज़र आने लगे थे,
जेब में वो छोटा सा सोने का टुकड़ा लिए, जिसकी बोली लगाने के लिए वो इधर-उधर खरीददार तलाश कर रहे थे।
और इन सबसे अलग — मोहल्ले की एक छोटी सी गली में, अपनी टूटी हुई मोटरसाइकिल के सामने बैठा था सिकंदर।
नीचे बैठकर उसने मोटर का ढक्कन खोल रखा था।
कभी अपनी कमीज़ की बाँह से पसीना पोंछता,
तो कभी ज़मीन पर रखा स्पैनर उठाकर कुछ कसता।
उसके हाथों में ग्रीस था, लेकिन आंखें साफ़... ठंडी... बेज़ार।
जैसे इस मोहल्ले का शोर भी अब उसे छू नहीं सकता।
तभी दूर से आती है एक स्याह रंग की चमचमाती जीप।
Jeep breaks.
Tyres halt.
मोहल्ले के कई लोग खिड़कियों और चौखटों से झाँकते हैं।
जीप का दरवाज़ा खुलता है…
एक पैर ज़मीन पर उतरता है — सुनहरा पंजाबी जूता, जिसमें सफेद मोतियों की नाज़ुक कढ़ाई।
फिर उतरती है — अलीना मिर्ज़ा।
काली सलवार कमीज़, रेशमी दुपट्टा सिर को ढाकता हुआ। एक खूबसूरत मुस्लमान औरत... जिसके हुस्न की सुगंध ने रहमत नगर के खुसबू को फीका कर दिया था..
आंखों पर बड़ी काली ऐनक और चाल में वही रुतबा…
जिसमें सियासत की ठसक भी थी, और दर्द की छांव भी।
लोग फुसफुसाने लगे।
औरत 1:
"लो आ गयी डायन... पाता नहीं अब उस बेचारे
( सिकंदर) के साथ क्या करेगी?"
औरत 2:
"इतनी कम उम्र की लगती हैं … लगती तो मुश्किल से तीस-बत्तीस की हैं … हाँ गरीबो का खून चूसे गी तो जवानी तो हिचकोले खाये गी ही..।"
अलीना को खुद के लिए हो रहे बातो का पाता था.. अब हैं तो एक औरत ही... जान जाती हैं कौन उसके लिए क्या बोल रहा हैं
अलीना को किसी बात की परवाह नहीं थी।
वो सीधा सिकंदर की तरफ बढ़ती है।
उसकी चाल में धीमापन था… शायद दिल की धड़कनों ने अब लय तोड़ दी थी।
सिकंदर ने एक नज़र डाली… फिर वापस मोटर की तरफ झुक गया।
उसके लिए जैसे कोई आया ही नहीं।
अलीना (धीरे से, लेकिन लड़खड़ाते हुए लहजे में):
"वो... मैं... मैं कह रही थी...
मैंने जो मुलाज़िमा भेजी थी... वो... तुम्हारा ख्याल तो रख रही है ना?"
सिकंदर (बिना देखे, बेरुखी से):
"ख्याल...? मे अपना ख्याल रख सकता हूँ... आपकी मुलाज़ाम को मेने घर भेज दिया"
अलीना हड़बड़ा जाती है। उसकी हथेलियाँ काँपती हैं।एक बार फिर उसे अहसास हुवा की सिकंदर को उसकी जरूरत नहीं हैं... उसका वो पैसा जो वो अपने लाल.. अपनी छल्ले ( सिकंदर) लिए कमाई थी... अब उसके सहजादे को उसकी दौलत नहीं चाहिए.. ये बात अलीना को डरा देती हैं.. पर.. वो मांनने को तैयार नहीं थी की उसका छल्ला अब उसे अपनी दिल से दिल से निकाल चूका हैं..
अलीना (धीरे से):
"अच्छा छोड़ो ये सब... तुम्हारे लिए कुछ लायी हूँ... चलो ना देखती हूँ..?"
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सिकंदर अपनी मोटरसाइकिल पर बैठ, धीरे-धीरे मोहल्ले के नुक्कड़ की तरफ निकलने ही वाला था,
कि पीछे से एक आवाज़ फिर गूंजती है — "सिकंदर... एक मिनट... सिर्फ एक... सुन ना"
वो मुड़ता है।
अलीना वहीं खड़ी है, जीप के पास।
उसका दुपट्टा अब थोड़ा सरक चुका है, आंखों से ऐनक हटा चुकी है… और अब चेहरा पूरी तरह दिख रहा है —
एक टूटी हुई मां, जो फिर से कुछ देने आई है, और शायद फिर से ठुकराने के लिए तैयार भी।
अलीना (आहिस्ता से):
"वो.. वो.. बोल रही की.... ये जीप खरीदी है मेने... त.. तो.. तू इसे चला....... जब पैसे होंगे तो दे देना....!
मुझे लगा अब तु अस्पताल से आ चुका है,
तो… तो कम से कम आने-जाने में तकलीफ ना हो…
मै तुम्हारी हैसियत का मज़ाक नहीं बना रही... बस बोल रही हूँ.. ले लेता तो अच्छा होता.."
हर एक शब्द अलीना सोच समझ कर चुन रही थी.. जिससे सिकंदर को उसपर गुस्सा ना आये...कितनी कमज़ोर पर जाती थी वी सिकंदर के सामने..
सिकंदर उसकी आंखों में सीधा देखता है — फिर जीप की तरफ।
तेरी हाथ लगाए गयी हर चीज मेरे लिए हराम है.. मै उस पर थूकू भी ना...
अलीना दर्द से तड़प जाती हैं.. उसका कलेगा फट जाता हैं...वही फफ़क़ कर रोने लगती हैं... सिकंदर की बातें उसके दिल को कचोट कर रख देती हैं..
" अम्मी हूँ तेरी … सब कुछ तो तेरा ही हैं..
कभी तो समझ मेरा दिल…"
सिकंदर:
"दिल...?
जिसे कभी मेरे रोने की आवाज़ भी सुनाई नहीं दी…
अब उसका ज़िक्र मत कर। मुझे बहुत काम हैं चल निकल यहाँ से... जा तेरा भतार तेरा इंतज़ार कर रहा होगा..."
वो मोटरसाइकिल घुमा लेता है और चलने लगता है।
अलीना की आंखें भर आती हैं।
लेकिन इस बार वो खामोश नहीं रहती…
वो उसके पीछे चल देती है।
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कुछ देर बाद
पुराना, टूटा हुआ लकड़ी का दरवाज़ा...
भीतर एक कमरा — छोटा, सीलन भरा, …
एक कोना।... छोटी सी अलमारी ,
दूसरे कोने में एक बिस्तर — उस पर सिकंदर लेटा है, किताब पढ़ते हुए।
छत का पंखा घिसघिस की आवाज़ कर रहा है।
एक बल्ब —
चारों तरफ गरीबी की कहानी बिखरी है — लेकिन सिकंदर की आंखें स्थिर हैं… जैसे उसे कोई फर्क ही नहीं।
तभी दरवाज़ा धीमे से खुलता है।
अलीना अंदर आती है…
उसकी आंखें कमरे को देखती हैं —
एक पल के लिए ठिठक जाती है.. इस से कई गुना अच्छी तो उसके नौकरो के कमरे थे...उसका दिल फटने लगता है…पर फिर उसे बिस्तर पर लेता उसका सहज़ादा दीखता है... और अलीना के होठों पर फीकी पर मुस्कान तैर जाती हैं...
अलीना (धीरे से):
"यही है तुम्हारा घर…?"
सिकंदर किताब से नजर हटाए बिना:
"हाँ… और बहुत है मेरे लिए।
जैसा भी हैं मेरा अपना हैं..और तू क्यों आयी यहाँ... मै तुझसे उलझना नहीं चाहता... मुझे और भी काम हैं तू मुझे परेशान मत किया कर.. ।"
अलीना की सांसें भारी हो जाती हैं। वो सिकंदर की बातों को अनसुना कर देती हैं...
वो अंदर आ जाती है, बिस्तर के पास बैठती है, किताब छूने की कोशिश करती है।
अलीना (बहुत धीमे लहजे में):
"सुन ना... खाना खाया तूने...?
सिकंदर किताब बंद करता है, धीरे से उसकी तरफ देखता है — वो अलीना के यहाँ होने से परेशान था.. पर अभी उसे उस सोने को बेचना था... तो अभी वो कोई और लड़ाई मोल नहीं ले सकता था...
सिकंदर - नहीं...
अलीना - मै खाना बना दू.....बिरयानी तुम्हारी फेवरेट
सिकंदर अचानक पिस्टल निकाल कर अलीना को धक्का देकर दीवाल से लगाता हुवा पिस्टल उसके काँपत्ति पर तान देता हैं"... हरामजादी... खेल रही हैं मुझसे... तुझे मज़ाक लग रहा है ये सब... हलके मै ले रही हैं मुझे...
अलीना डर से आवाक रह जाती हैं... जिस्म मे सिंहरण दौड़ जाती हैं.... फिर खुद को सँभालते हुवे..
."मेरी जान रुक क्यों गया... चला गोली.. मार डाल अपनी अम्मी को..अगर इसी से तेरे रूह को शांति मिलेगी.. तो अलीना की 100 जान कुर्बान मेरे चाँद...
सिकंदर उसकी तरफ देखता है… आंखों में गुस्सा नहीं… एक अजीब सी उदासी।
सिकंदर (बहुत धीमे, थके हुए लहजे में):
"कभी नहीं सोचा था... इतनी बदचलन बेहयाह होगी तू... तू किसी बाजारू औरत से कम नहीं हैं.. बस इस दौलत ने तेरे जिस्म को ढक रखा हैं....
अलीना:
अलीना बस मुस्कुराती हुवी बड़े प्यार से उसकी आँखों मे देख रही थी... उसके आंसुवों से भींगे चेहरे पर सिर्फ मुस्कान थी... जो सिर्फ उस नीले आँखों वाले के अलीना से बात करने से आयी थी...
अलीना खामोश खड़ी है।
उसकी आंखों से आंसू लगातार गिर रहे हैं…
वो कमरे की सीलन को नहीं, अपने दिल की सीलन को महसूस कर रही है।
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सिकंदर के कमरे से निकलती अलीना के भारी हो गये थे..
सूरज की पीली रौशनी अब थोड़ी सुर्ख होने लगी थी …
गली के नुक्कड़ पर पहुंचते ही सामने से ज़ोया आ रही थी, बाज़ार से लौटती हुई।
अलीना थमती है।
ज़ोया भी रुकती है।
कुछ पल दोनों के बीच चुप्पी छा जाती है।
अलीना (भीगी आवाज़ में):
".. एक मिनट... मुझे तुमसे कुछ कहना है…"
ज़ोया (आदब से):
"जी... फरमाइए..।"
अलीना ने अपना चेहरा फेर लिया... जैसे लहजे में कुछ काँप रहा हो। फिर खुद को समेटकर बोलती है:
अलीना:
"सहबाज... उसे लकवा मार गया है…
कल रात… उसके आधे जिस्म ने काम करना बंद कर दिया…
डॉक्टर ने कहा है कि शायद अब वो कभी ठीक न हो पाए…"
ज़ोया की आंखें फैल जाती हैं — वो अवाक़ सी रह जाती है।
ज़ोया:
"क्या…?"
अलीना (टूटते हुए):
"हाँ…
शायद… शायद अल्लाह ने उसके गुनाहों की सजा इसी दुनिया में दे दी…
जो दर्द उसने तुझे दिया… आज वही दर्द उसकी रगों में ठहर गया है।
वो अब सिर्फ देख सकता है… बोल सकता है… मगर चल नहीं सकता…"
ज़ोया कुछ नहीं कहती, बस सुनती है। अलीना अब और करीब आती है, हाथ जोड़ लेती है।
अलीना:
"मैं अम्मी हूँ… और तू भी बेटी जैसी ही लगती है।
तुझसे इल्तिज़ा करती हूँ… एक बार… बस एक बार उससे मिल ले…
मिलकर उसे माफ़ी दे दे...…
वो अब भी खुद को कोस रहा है।
तेरी एक नज़र… एक लफ्ज़ की ज़रूरत है उसे…
ताकि सुकून के दो आंसू रो सके।"
ज़ोया की आंखें अब भीगी हुई हैं।
उसने खुद को बहुत मज़बूत कर लिया था…
लेकिन एक माँ के आंसू उसे पिघला देते थे।अभी अभी सिकंदर से फिर से धुथकारे जाने पर...उसे अंदर भावनाओ का समंदर उमड़ परा था..
ज़ोया (धीरे से):
"अच्छा…
मैं मिलूंगी…
पर सिर्फ इंसानियत की वजह से…
जो कुछ मेने झेला, वो माफ करने लायक नहीं…
लेकिन शायद उसकी हालत ने उसकी सज़ा मुकम्मल कर दी है।"
अलीना - सुक्रिया मेरी बच्ची... वैसे गुनहगार तो तेरी मै भी हूँ.. पर मेने इसे भी कई बड़ा गुनाह किया हैं... जिसकी सजा अल्ला**ह अब सायद कबर तक पंहुचा कर ही माने..
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कमरे में हल्की रौशनी है।
दीवार के साथ एक बेड पड़ा है — उस पर सहबाज आधा शरीर बेजान लिए लेटा है।
उसके एक हाथ में ड्रिप लगी है, चेहरा ज़र्द पड़ा है, आंखें पथराई हुई हैं।
वो कमरे की दीवार को घूर रहा है — जैसे ज़िंदगी अब उसके पास नहीं, बस सामने से गुजर रही है।
तभी दरवाज़ा खुलता है — ज़ोया अंदर आती है।
सहबाज की आंखें उसकी तरफ घूमती हैं।
वो कुछ पल कुछ समझ नहीं पाता, फिर होंठ कांपते हैं…
सहबाज (कमज़ोर आवाज़ में):
"त.. तुम …?"
ज़ोया चुप रहती है। उसके चेहरे पर कोई नफ़रत नहीं — एक शांत ठंडक है।
वो बेड के पास आकर खड़ी होती है।
सहबाज (रोते हुए):
"मुझे माफ कर दो …
मैंने तुम्हें बहुत तकलीफ दी… बहुत…
मैंने जो किया, उसका कोई बहाना नहीं…
अब तो मेरी आधी रूह भी मेरी दुश्मन बन गई है…
बस एक बार… कह दो… कि माफ किया…"
ज़ोया की आंखें भर आईं, पर उसने खुद को काबू में रखा।
ज़ोया:
"मैं तुम्हे माफ कर चुकी हूँ …
मै किसी से बैर नहीं रखती... मेरा रब मुझे इसकी इज़ाज़त नहीं देता...
सहबाज की आंखों से आंसू बहते हैं।
वो अपने एक काम करने वाले हाथ से ज़ोया का हाथ थामने की कोशिश करता है।
सहबाज:
"क्या… हम दोस्त बन सकते हैं…
बस दोस्त…?"
ज़ोया थोड़ी देर तक उसे देखती है… फिर हौले से सिर हिला देती है।
ज़ोया (धीरे से):
"हां… हम दोस्त रहेंगे…
लेकिन वो दोस्त…
जो एक-दूसरे को कभी तकलीफ नहीं देंगे।"
कमरे में सन्नाटा है — मगर अब वो सन्नाटा बोझ नहीं है…
बल्कि एक नई शुरुआत का इशारा करता है।
सहबाज मुस्कुरा देता है — आंखों में सुकून लिए।
और ज़ोया… उसके चेहरे पर भी एक राहत है।
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ज़ोया और सहबाज के बीच वो दिल छू लेने वाली बातचीत बस खत्म ही हुई थी कि…
ज़ोया की जेब में रखे फोन की घंटी बज उठती है।
**स्क्रीन पर नाम चमकता है: "Sikandar Calling…"
ज़ोया का चेहरा पलभर को फक पड़ जाता है।
जैसे उसकी बेवफाई पकड़ी गयी हो।
जैसे उसका कोई ऐसा राज़ खुल गया हो, जो शायद नहीं खुलना चाहिए था।
पर फिर… वो खुद को संभालती है, गहरी सांस लेती है, और कॉल रिसीव करती है।
ज़ोया (धीरे और नर्म आवाज़ में):
"हेलो…"
सिकंदर (धीमे मगर शिकायती लहजे में):
"कहाँ हो ज़ोया…?
मैं तो आज तुम्हें खाने पे ले जाने वाला था… याद है ना?"
ज़ोया एक पल को नजरें झुका लेती है, अलिना की आंखें उस पर गड़ी हैं।
सहबाज भी फोन की आवाज़ सुन रहा है — उसके होठों कर वहीं जानी पहचानी मुस्कान आ जाती हैं।
ज़ोया (थोड़ा रुककर):
"वो.. वो..हाँ… मुझे याद है…
बस… मैं अपनी एक सहेली से मिलने आई हूँ… थोड़ी तबीयत ख़राब थी उसकी।"
सिकंदर (थोड़ी खामोशी के बाद):
"ठीक है…
फिर जब फुर्सत मिले, तो बताना।"
ज़ोया (तड़प कर... जिसे सिकंदर को नहीं वो खुद को झूठ बोल रही हो):
"ठीक हैं... अच्छा सुनो ना.... तुम मेरी जान हो.. बहुत प्यार करती हूँ तुमसे.."
सिकंदर - जनता हूँ...
कॉल कट होता है।
सहबाज की ओर नज़र जाती है —
उसके होंठों पर एक बेहद हल्की, मगर सच्ची मुस्कान तैर जाती है।
सहबाज (धीरे से, कांपती आवाज़ में):
"झूठ… मगर… कितना खूबसूरत झूठ था ये…
ज़ोया उसकी तरफ देखती है — उसके चेहरे पर अफसोस पछतावा झलक रही थी।
ज़ोया:
"हर सच ज़रूरी नहीं होता…
कुछ झूठ रिश्तों को टूटने से बचाते हैं…
और कुछ… टूटे दिलों को मरने से रोकते हैं।"
तभी उनकी नजर सामने खड़ी अलीना पर पड़ती है…
जो चुपचाप सब सुन रही थी।
उसका चेहरा बहुत कुछ बयां कर रहा था — वो मुस्कुरा भी रही थी… और उसकी आंखों में नमी भी थी।
अलीना (धीरे से, ज़ोया की तरफ बढ़ती हुई):
"कभी-कभी…
हम माँएं अपने बच्चों के लिए सच से बड़ी लड़ाई लड़ती हैं…
तुमने आज जो किया, वो शायद मेरी दुनिया की सबसे बड़ी रहमत थी।
ज़ोया उसे देखती है — अब उनके बीच कोई दीवार नहीं बची।
"अब आराम करो… दोस्त।
मैं फिर मिलूंगी…
जब दिल चाहेगा, बेझिझक बात कर लेना।"
ज़ोया अब कमरे से बाहर निकलने लगती है,
और अलीना उसके पीछे चल देती है —
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राहिल अपनी बाइक पर था, जा ही रहा था कि एक कोने में खलबली दिखी।
काले शीशों वाली सफेद SUV कार खड़ी थी।
गाड़ी के चारों ओर कुछ लोकल लड़के हल्ला मचा रहे थे।
कभी बोनट पर लात, कभी विंडशील्ड पर हाथ— जैसे सड़क की कोई लड़ाई वहीं आकर फूट पड़ी थी।
अंदर बैठी थी मलिका — बड़ी नजाकत और गुस्से में,
पलकों पर ऐटीट्यूड और होंठों पर गुस्सा।
ड्राइवर बाहर आकर समझा रहा था — पर वो लौंडे कहां सुनने वाले थे।
राहिल (बाइक रोकते हुए, खुद से बड़बड़ाता है):
"अबे ओ चिलगोजों की फौज! क्या कर रहा हैं बे?"
(बाइक खड़ी करता है, कॉलर सीधा करता है और सीधा उन लड़कों के बीच पहुंचता है)
राहिल (तेवर में):
"चाचा की बारात समझ रखी है?
शराफत से हटो नहीं तो कान के निचे लगूंगा, चोध्या जाओगे"
लड़के- राहिल भाई जाओ हमारे मामले मे मत पड़ो..
राहिल (मुस्कुरा कर):
"अबे तेरे जैसे दो को तो मैं रजाई में लपेट के डोसा बना दूँ।
चल निकल यार, मैडम जी को परेशान मत कर!"
थोड़ी देर की बहस के बाद लड़के भागते हैं।
राहिल मुड़ता है और गाड़ी की खिड़की पर दस्तक देता है।
खिड़की नीचे होती है और… सामने है मलिका बेगम, उनके साथ दोनों बेटियाँ — ईरा और सुहाना।
मलिका (नज़ाकत से):
"ओ.. तो तुम हो...
राहिल:
मैडम जी लगता हैं आपका और मेरा कोई बहुत गहरा रिस्ता है... साला हर बार आपके दर्सन हो जाती हैं..
ईरा (चश्मा उतारते हुए, sarcastically):
"ग्रेट. एक और रोडसाइड फलसफार."
राहिल (हंसते हुए):
"फलसफार? नहीं मैडम, असली वाला गुंडा हूं …
अब आप तो जानती ही होगी.. "
सुहाना (हंसते हुए):
"संस्कार वाले गुंडे? क्या नया नेटफ्लिक्स केटेगरी हैं?"
मलिका (मुस्कुराते हुए):
"तुम्हारा स्टाइल थोड़ा अलग है…
Security Guard बनोगे मेरे लिए?"
राहिल (आंख मारते हुए):
"सिक्योरिटी गार्ड या बॉडीगार्ड?
क्युकि सलमान भाई वाली एंट्री तोह फ्री में दूंगा, लेकिन माँ कसम लॉयल्टी फुल HD मिलेगी!"
ईरा (आंखें घुमाते हुए):
"मोम प्लीज, इस बन्दे ने तोह पहले ही मुझे बोर कर दिया …
मुझे डाउट हैं ये gun चलाने के बजाये लड़कियों से जुतिया खाता होगा!"
राहिल:
"मैडम, gun भी चलता हूँ, और डायलाग भी …