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Fantasy क्या यही प्यार है

Mkapil

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पहली बात तो ये कि हमने आपको पहले ही कह दिया था कि अगर मेरी कहानी पढ़कर किसी के पुराने ज़ख्म हरे हो जाएं तो उस हरे जख्म में पेट्रोल डालकर जला देने का।😂😁😆

ये तो ब्लैकमेलिंग हैं। जो एक जुर्म है। हम भी न्यायालय जाएंगे इसके लिए:accident:
abhi tak mane jitni bhi story padhi to sirf story padh ke nikal leta tha first time ye sab bhi padha to kahna padega story se jyada mja to isme hi arha
well story start accha hai bus update time mille yahi request hai vese me jaldi kisi story me review ya comment nhi deta kuch khas story chod ke but idhr dene ka mn kiya
 
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आम्रपाली दुबे और पवन सिंह के " रात दीया बुता के पिया क्या क्या किया " से मजेदार डांस इस गाने पर होता -
" छलकता हमरो जवनियां ये राजा ,
जईसे की बलटी के पनियां हो । "
काजल राघवानी और पवन सिंह का गीत । :D

वैसे भोजपुरी गानों पर कोई भी नाचने को विवश हो जाए ।

अभिषेक और नयन दोनों के संस्कार ही अच्छे नहीं हैं बल्कि पढ़ाई में भी वे तेज है । फर्स्ट डिवीजन से पास होना कोई मामूली चीज नहीं है । रिजल्ट के टाइम लड़कों की जो मानसिक स्थिति होती है वो अभिषेक और नयन के माध्यम से बहुत ही अच्छे तरीके से दिखाया गया है ।

नयन के पिताजी के इस विचार से मैं भली-भांति सहमत हूं कि जो दुसरों की बहन बेटियों पर बुरी नजर रखता है , उसकी भी बहन बेटियां बुरी नजर से देखी जाती है ।


साइकिल पर अपने दोस्त को बैठाकर स्कूल या घुमने फिरने जाना..... बचपन की याद दिला गया ।
अभिषेक को गुपचुप बहुत पसंद है । लेकिन मुझसे ज्यादा नहीं । एक समय था जब मैं पचास से अधिक गुपचुप खा लेता था पर अभी भी कम से कम बीस पच्चीस तो खा ही लेता हूं । :D

गांवों की सबसे प्रसिद्ध मिठाई ---- जिलेबी ! हर त्योहार या किसी भी खुशी के ओकेजन में घरों में जिलेबी आता ही था । और क्या स्वादिष्ट होता था ! शायद गांवों की पानी के वजह से था ।
मेरा फेवरेट एक चाट और एक मिठाई तो हो गया । बस एक और बाकी रह गया है - रसगुल्ला । बंगाल का रसगुल्ला ।
इस खुशी के मौके पर डिनर में रसगुल्ला तो होना ही चाहिए । :loveeyed2:

बहुत ही सुन्दर लिख रही हैं माही जी । ऐसे ही गांवों की खुशबू बिखेरते रहिए ।
 

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Lazy villain
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Are mahi ji aap prayagraj. Se hai Meri kuchh achchhi buri yade hai waha se
1 -jab 18 years old ( 2017)tha tab allahabad me mts ka exam tha Mera waha aur waha log itne bade lutere ki gadi bhada doguna wasul kiye the aur khane ka dam to puchho hi mat ...
2 :- Mai 8th class Tak sochata rha ki naini se hokar Jo longitude line gujari hai wo sach me jamin par khichi gayi ..aur maje baat ye hai ki Mai bad me samajh gaya tha ki wo ek imaginary line hai but jab naini gaya to waha ke ek aadami se puchha ki Bhai yaha Kya sach me longitude Rekha khichi gayi hai😆😆
 
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Adirshi

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पहला भाग


मैं नयन, इलाहाबाद शहर के एक छोटे से गांव का रहने वाला हूँ। मेरा गांव इलाहाबाद शहर से 35 किलोमीटर दूर पड़ता है। मैं देखने मे बहुत ज्यादा आकर्षक तो नहीं हूँ। पर ठीक ठाक हूँ। चूंकि मेरे पापा किसान हैं तो मुझे खेतों में भी बचपन से काम करना पड़ता था। इसलिए मेरा शरीर गठीला हो गया था इस समय मेरी उम्र 23 वर्ष की है। ये पूरी कहानी मेरी जुबानी ही चलेगी।

मेरे पापा श्री विनोद कुमार। मुख्य पेशा किसानी है। हमारे पास 5 बीघा खेत है जिस पर पापा खेती करते हैं आप सब को तो पता है हमारे देश में किसानों की क्या स्थिति है। किसान अपना परिवार चला ले अपने बच्चों को पढ़ा ले। बस इतनी ही कमाई होती है खेती से।

मेरी माँ नैना देवी। इन्हीं के नाम पर मेरा नाम नयन रखा गया है। एक सामान्य गृहिणी। हमारी देखभाल और घर के काम के अलावा मेरी माँ ने कभी कोई ख्वाहिश नहीं रखी।

मेरी बहन काजल। थोड़ी सी सांवली, लेकिन तीखे नैन नक्श वाली लड़की। मेरा मेरी बहन के साथ बहुत लगाव था। मैं अपनी बहन से हर बात साझा करता था। हम दोनों में सामंजस्य बहुत अच्छा था। उम्र इस समय 18 वर्ष है।

अभिषेक मेरे बचपन का मित्र और लगोटिया यार। मेरे गांव से 5 किलोमीटर दूर उसका गांव था। इसके पापा ग्रामीण बैंक में प्रबंधक के पद पर थे और घर मे पुस्तैनी जमीन भी बहुत थी लगभग 25 बीघे। तो घर में पैसों की कोई कमी नहीं थी। अभिषेक बचपन से बड़ा शरारती और मस्त मौला इंसान था। इसकी उम्र इस समय मेरे ही बराबर थी यानी कि 23 वर्ष। इसके मम्मी पापा का इस कहानी में ज्यादा भूमिका नहीं है इसलिए उनका जिक्र नहीं किया।

पायल अभिषेक की बहन। देखने में बहुत ही गोरी चिट्टी लड़की है और खूबसूरत भी है। इस कहानी में पायल की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है। इसकी उम्र इस समय 20 वर्ष है।

ये थे कहानी के मुख्य पात्र। आगे और भी पात्र आएंगे कहानी में। तो उसी समय उनका जिक्र करूँगा।

तो जैसा मैंने बताया कि मैं शुरू से गांव में रहने वाला लड़का हूँ और मेरा बचपन गांव में ही बीता है मैं अपने माँ बाप का इकलौता बेटा हूँ तो लाड प्यार भी मुझे बहुत मिला है खासकर पापा से। मेरी प्रारंभिक शिक्षा गांव से 3 किलोमीटर दूर स्थित स्कूल में हुई थी इंटर तक की पढ़ाई मैंने गांव में की थी।

अभिषेक का घर मेरे घर से 5 किलोमीटर दूर था स्कूल से 2 किलोमीटर दूर। मेरी दोस्ती वहीं पर अभिषेक से हुई। मैं निम्न माध्यम वर्गीय परिवार से हूँ तो अभिषेक माध्यम उच्च वर्गीय परिवार से, लेकिन हमारे बीच कभी भी यह दीवार रोड़ा नहीं बनी।

मैं कहानी तब से शुरू कर रहा हूं जब मैं कक्षा 10 की परीक्षा दे चुका था।

जिस दिन परीक्षा का परिणाम घोषित होने वाला था मैं अपने घर में बैठा भगवान से अच्छे अंक से पास करने की प्रार्थना कर रहा था। चूंकि मैं पढ़ाई में औवल दर्जे का नहीं था। फिर भी अच्छा खासा था। उस समय तो मुझे थोड़ा डर भी लग रहा था ऊपर से जिस स्कूल में मेरी परीक्षा हुई थी वो हमारे क्षेत्र का जाना माना स्कूल था, इस स्कूल की एक खासियत ये थी कि यहाँ नकल बिल्कुल नहीं होती थी।

वैसे नकल किसी स्कूल में नहीं होनी चाहिए। लेकिन अगर पढ़ने वाला मेरे जैसा हो तो उसे थोड़ी सी उम्मीद रहती है कि थोड़ी बहुत मदद किसी भी बहाने मिल जाए तो अच्छे से बेड़ा पार हो जाए।

तो मैं कमरे में बैठा हुआ उत्तीर्ण होने के लिए आंख बंद भगवान से प्रार्थना कर रहा था।

मैं- हे भगवान तुम तो जानते हो मैं कैसे हूँ। मैंने पूरी निष्ठा और ईमानदारी से परीक्षा दी है। और नकल भी नहीं की। आपके होते हुए मैं नकल करने के बारे में सोच भी नहीं सकता। मुझे आप पर पूरा भरोसा है। मैं आप को अच्छी तरह जानता हूँ आप मुझे असफल होने ही नहीं देंगे और अच्छे अंक से पास करेंगे। फिर भी अगर आपके कोई आशंका हो या घूंस लेने से आप ऐसा करें तो मैं 10 किलो लड्डू चढ़ाऊँगा आपको। नहीं नहीं 10 किलो तो बहुत ज्यादा जो गया। मेरे पास तो इतने पैसे भी नहीं हैं। इस बार 1 किलो से काम चला लीजिए अगली बार पक्का 10 किलो लड्डू खिलाऊँगा आपको।

मेरे इतना बोलने के बाद मेरे कानों में एक आवाज़ सुनाई पड़ी।

वत्स। मुझे लड्डू नहीं 100 रुपए दे देना। मैं तुम्हारी मनोकामना जरूर पूरी करूँगा।

मुझे ये आवाज़ एकदम भगवान की लगी इसलिए आवाज़ सुनकर मैंने अपनी आँख खोली और इधर उधर देखने लगा। तभी मुझे फिर से वो आवाज़ सुनाई पड़ी।

अरे मूर्ख। इधर उधर क्या देख रहा है। दरवाज़े की तरफ देख मैं वहीं खड़ा हूँ।

आवाज़ सुनकर मैंने दरवाज़े की तरफ देखा तो काजल के साथ-साथ पापा हाथ में खाली बोतल लिए हंसते हुए कमरे में दाखिल हुए। पापा उसी बोतल में मुंह लगाकर बोल रहे थे जिससे उनकी आवाज़ बदली बदली लग रही थी। जैसे शोले फ़िल्म में बसन्ती को पटाने के लिए अपने धरम पाजी ने किया था ठीक वैसा ही। मुझे देखते हुए पापा हंसकर बोले।

पापा- क्यों वत्स। पहचाना अपने प्रभु को। बोलो क्या कष्ट है तुमको वत्स।

इतना कहकर पापा हंसने लगे। साथ साथ काजल भी हंसने लगी। मेरे चेहरे पर भी मुस्कुराहट दौड़ गई। मैंने नाराजगी का नाटक करते हुए पापा से कहा।

मैं- क्या पापा आप भी मेरी खिंचाई कर रहे हैं। मैं यहां इतना परेशान हूँ और आपको मज़ा आ रहा है मेरी परेशानी देखकर।

पापा- अरे नहीं नयन। ऐसा कुछ नहीं है। मुझे पता है कि तू अच्छे अंकों से पास होगा। फिर इतनी परेशानी किस बात की है तुझे। तेरे परेशान होने से परिणाम तो नहीं बदल जाएगा न। चल अब ज्यादा मत सोच। सब अच्छा ही होगा।

काजल- पापा भैया तो आपकी आवाज सुनकर एकदम चौक गए थे। भैया ने सोचा भगवान इनसे बात कर रहे हैं। ही ही ही ही

मैं- तेरी जुबान बहुत तेज़ हो गई है, और इसमें सोचने वाली बात कहां से आ गई। मेरे पापा मेरे लिए भगवान से बढ़कर हैं समझी तू। चल भाग यहां से पागल।

काजल- देखो न पापा। भैया हर समय मुझे डाँटते रहते हैं। जाओ मैं आपसे बात नहीं करूंगी।

वो रूठते हुए मुझसे बोली तो मैं उसे पकड़कर अपनी गोद में उठाते हुए उसके माथे को चूमकर बोला।

मैं- अरे तू तो नाराज़ हो गई। मैं तो मज़ाक कर रहा था तेरे साथ। भला मैं अपनी प्यारी बहन को क्यों डाटूंगा। अच्छा अब तू जा पढ़ाई कर नहीं तो कल तू भी मेरी तरह ही करने लगेगी।

मेरी बात सुनकर काजल मुंह बनाती हुई बाहर चली गई। उसके जाने के बाद मैंने पापा से कहा।

मैं- पापा, मुझे बहुत बेचैनी हो रही है अपने परीक्षा परिणाम के बारे में। मैं अच्छे अंक से पास तो हो जाऊंगा न।

पापा- अरे इसमें बेचैन होने की जरूरत नहीं है और तो अच्छे अंकों से नहीं बहुत अच्छे अंकों से पास होगा। देख लेना। ये तुम्हारे इन प्रभु का आशीर्वाद है।

पापा की बात सुनकर मैं उनके गले लग गया। फिर मुझे एकाएक कुछ याद आया तो मैंने पापा से कहा।

पापा मेरे साथ तो अभिषेक का भी परीक्षा परिणाम आएगा न। मैं तो अपने चक्कर में उसे भूल ही गया था। मैं अभी उनके पास जा रहा हूँ। परिणाम आने के बाद उसे लेकर घर आऊंगा।

इतना कहकर मैंने अपनी साइकिल उठाई और अभिषेक के घर चल पड़ा। ऐसा नहीं है कि मेरे घर में बाइक नहीं है, पापा ने हीरो कंपनी की पैशन प्रो बाइक खरीदी हुई है, लेकिन मुझे साईकिल चलना बहुत पसंद है। इसके दो कारण है। एक तो पैसे की बचत होती है जो निम्न माध्यम वर्ग के लिए बहुत जरूरी है। और दूसरा कारण है अगर आप 4-5 किलोमीटर साईकिल चला लेते हैं तो आपका अलग से कसरत करने की जरूरत नहीं रहती।

बहरहाल मैं साईकिल लेकर अभिषेक के घर की तकरफ निकल गया। आज मौसम का मिज़ाज़ भी कुछ बदला बदला लग रहा था। आखिर बदले भी क्यों न आखिर आज कितने लोगों की किस्मत जो बदलने वाली थी। अभिषेक के घर पहुंच कर मैंने उसके घर का दरवाजा खटखटाया। थोड़ी देर बाद उसकी बहन पायल ने दरवाजा खोला। उस समय पायल कक्षा 8 में पढ़ती थी और उम्र लगभग 13 वर्ष की रही होगी। लेकिन वो अपनी उम्र से ज्यादा दिखती थी। मतलब उसके शरीर का भराव उसकी उम्र की लड़कियों से अधित था।

मैंने कभी भी उसे गलत नज़र से नहीं देखा था। चूंकि अभिषेक मेरा लंगोटिया मित्र था और एक भाई की तरह था तो पायल भी मेरी बहन थी। ये मैं मानता था, लेकिन पायल के मन में क्या था ये आपको आगे पता चलेगा।

बहरहाल दरवाज़ा खोलने के बाद वो मुझे एक तक ऊपर से नीचे देखने लगी। मैंने उसे इस तरख देखते हुए देखा तो मुझे लगा कि कहीं मेरे कपड़े में कुछ लगा तो नहीं है, इसलिए मैंने अपने कपड़े को देखते हुए उससे पूछा।

मैं- क्या हुआ पायल। इसे क्या देख रही हो। मैं हूँ नयन। अभिषेक का दोस्त।

पायल- कुछ नहीं भैया। बड़े दिन बाद आए आप। आइये अंदर। अभिषेक भैया अपने कमरे में हैं।

इतना कहकर वह दरवाज़े से हट गई और मैं अंदर आते हुए सीधे अभिषेक के कमरे की तरफ चल पड़ा। पायल मुझे जाते हुए पीछे से देखती रही।


इसके आगे की कहानी अगले भाग में।

kya bat hai shuruwaat hi prayagraaj se huyi hai badhiya
shaandaar update hai badhiya tarise se intro diya hai pure pariwaar aur nayan ke dost logis ka jabardast
To nayan bhai ka 10th ka result aane wala hai aur janab tension main hai waise ab result ki itni kya tension lena jo hona hai wo to hoga hi jitna exam main likha hoga utne hi marks milenge :D (waise ye baat passout hone ke baad sab bolte hai par jab hamara result aata tha tab fati padi hoti thi :shhhh: )
khair abhi to nayan babu apne mitra se milne nikle hai par yaha mujhe payal ke irade thik nahi lag rahe dekhte hai aage kya hota hai
badhiya update shandaar shuruwat :superb:
 

Adirshi

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दूसरा भाग


दरवाज़ा खटखटाने पर अभिषेक की बहन पायल ने दरवाज़ा खोला और मैं घर के अंदर चला गया। आज रविवार का दिन था।

अभिषेक के घर में उस समय उसके मम्मी पापा कहीं बाहर गए हुए थे। घर में अभिषेक और उसकी बहन पायल ही थे उस समय। मैं जब अभिषेक के कमरे के पास पहुंचा तो मुझे भोजपुरी संगीत की धुन सुनाई पड़ी। मैं जाकर उसका दरवाज़ा खोला तो वो खुल गया।

अंदर अभिषेक बुफर पर पवन सिंह की फ़िल्म का भोजपुरी गाना " रात दीया बुता के पिया क्या क्या किया" बजाए हुए था और नृत्य कर रहा था। अरे माफ करना, इसे नृत्य कहना नृत्य का अपमान होगा। दरअसल अभिषेक इस गाने पर बंदर की तरह गुलाटी मार रहा था। कभी जमीन से कूदकर बिस्तर पर चढ़ जाता और उछलने लगता तो कभी बिस्तर से जमीन में कूदकर उछालने लगता। उसे देखकर मुझे हंसी आ रही थी।

जब उसने मुझे दरवाज़े के पास देखा तो उसी तरह उछलते कूदते मेरे पास आया और मुझे पकड़कर फिर से नृत्य करने में लग गया। मैंने उससे कहा।

मैं- अबे घोंचू क्या कर रहा है ये तू पागलों की तरह।

अभिषेक- अबे देख नहीं रहा है नृत्य कर रहा हूँ। ऐसा नृत्य कभी देखा नहीं होगा तुमने।

मैं- सही बोला तुमने। ऐसा नृत्य मैं अपने जीवन में पहली बार देख रहा हूँ। अबे घोंचू तू इसे नृत्य बोलता है। बंदर की तरह उछल रहा है। अगर इस गाने को आम्रपाली दुबे और पवन सिंह देख लें न तो वो दोनों अभिनय करना ही बंद कर दे तेरी प्रतिभा को देखकर और गलती से अगर बंदरों ने देख लिया तो वो तो बहुत खुश हो जाएंगे और तुझे अपने साथ ले जाएंगे।

अभिषेक- अबे तुझसे मेरी कोई खुशी बर्दास्त क्यों नहीं होती। जब भी मैं कुछ अच्छा करने की कोशिश करता हूँ तू बीच में टपक पड़ता है। अरे कम से कम प्रोत्साहित नहीं कर सकता मुझे तो हतोत्साहित तो मत किया कर।

मैं- अरे तू तो नाराज़ हो गया। चल आजा। तुझे खुश करता हूँ।

इतना कहकर मैंने अपना मोबाइल बुफेर से जोड़ा और करन अर्जुन फ़िल्म (अरे वही फ़िल्म जिसमे मेरे करन अर्जुन आएंगे कहती है दोनों की माँ) का "मुझको राणा जी माफ़ करना गलती म्हारे से हो गई" चालू कर दिया और अभिषेक से बोला।

मैं- चल आजा मेरे जिगर के छल्ले। शमा रंगीन बनाते हैं।

उसके बाद मैंने और अभिषेक ने मिलकर इस गाने पर जो कमर लचकाई की बस पूछिये ही मत, यहाँ भी कमर तो सिर्फ मेरी लचक रही थी। अभिषेक का तो पूरा शरीर लचक रहा था। गाना खत्म होते ही हम दोनों धड़ाम से बिस्तर पर बैठ गए और जोर जोर से हँसने लगे। थोड़ी देर बाद जब हमारी हंसी रुकी तो मैंने अभिषेक से पूछा।

मैं- अच्छा ये बता। तू इतना नाच किस खुशी में रहा है। अभी तो परीक्षा का परिणाम भी नहीं आया है। जिससे लगे कि उसी की खुशी मना रहा है।

अभिषेक- देख भाई। परीक्षा का परिणाम आये उससे पहले ही खुशी मना ले रहा हूँ । क्या पता बाद में मौका मिले या न मिले।

मैं- मतलब। तू कहना क्या चाहता है।

अभिषेक- देख भाई। इस बार बोर्ड की परीक्षा दी है। और आज परिणाम आ रहा है तो सुबह से मैं बहुत नरवस हूँ। एक डर से लग रहा था। तो उसी डर को दूर करने के लिए मैंने सोचा कि कुछ ऐसा किया जाए के डर भी दूर हो जाए और मज़ा भी आए। तो मुझे ये आईडिया बहुत सही लगा। और परिणाम आने से पहले खुशी भी मना ली। क्या पता मैं लटक गया तो, इसलिए मैंने ये नृत्य करने की सोची।

मैं- क्या बात है भाई। तू तो बहुत दूर की सोचता है। और वैसे भी तुझे किस बात का डर है। कक्षा नर्सरी से लेकर कक्षा नौ तक तू हमेशा प्रथम आता रहा है। तो इसमें भी प्रथम ही आएगा। डर तो मुझे भी लग रहा है। लेकिन सच में तेरे आईडिया बहुत अच्छा था। डांस करके तो मेरा सारा डर चला गया है।

अभिषेक- भाई। अगर मैं प्रथम आता था तो तू भी तो मेरे पीछे ही रहता था। तेरा भी परिणाम अच्छा ही आएगा। बहुत अच्छा आएगा।

फिर हम दोनों बैठे अपने परीक्षा के परिणाम के बारे में इधर उधर की बातें करते रहे। इसी तरह अभिषेक के यहां बैठे बैठे शाम को 4.30 बज गए। परीक्षा का परिणाम किसी भी वक्त घोषित हो सकता था। मैं और अभिषेक मोबाइल में ही वेबसाइट खोलकर बैठे हुए थे। जैसे ही परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ। मैंने मोबाइल अभिषेक को पकड़ते हुए कहा।

मैं- ले भाई तू ही देख कर बता। मेरी तो हिम्मत जवाब दे रही है।

अभिषेक- चूतिये। तू हमेशा फट्टू ही रहेगा। बात तो ऐसे कर रहा है जैसे किसी लड़की को देखने जा रहा है। अरे परीक्षा का परिणाम देखना है। किसी लड़की से बात नहीं करनी है।

वैसे अभिषेक ने सच ही कहा था लड़कियों के मामले में मैं बहुत फट्टू किस्म का था, लड़कियों से बात करने में मुझे डर से लगता था। अगर कोई लड़की मुझसे 1-2 मिनट भी बात कर लेती थी तो मेरे पैर कांपने लगते थे। मेरा रक्तचाप बढ़ जाता था। मेरे शरीर से पसीने छूटने लगते थे। इसका कारण था मेरे पापा के अच्छे संस्कार। वो तो मुझसे बस इतना ही हमेशा कहते थे कि लड़कियों/महिलाओं का हमेशा सम्मान करना चाहिए। उनके साथ अभद्रता और जोर जबरदस्ती करने वाला सच्चा मर्द नहीं होता। याद रखना बेटा जो दूसरों की बहन-बेटियों पर बुरी नजर रखता है। उसकी भी बहन- बेटियां बुरी नजर से ही देखी जाती हैं।

बस पापा की इस बात को मैंने कुछ ज्यादा ही गंभीरता से ले लिया। जिससे मुझे लड़कियों में रुचि न के बराबर रह गई थी। यही कारण है कि कक्षा 10 तक की पढ़ाई के दौरान मैंने किसी भी लड़की को उस नजर से नहीं देखा। इसका मतलब ये नहीं कि मैं गे हूँ।🤣🤣 इसके बिल्कुल उलट अभिषेक हमेशा हंसी मजाक करता रहता था कक्षा की लड़कियों के साथ मगर अभी तक किसी के साथ उसका चक्कर नहीं चला था। वो भी अधिकतर अपने आपको प्यार मोहब्बत के चक्करों से खुद को दूर रखता था।

बहरहाल अभिषेक की बात सुनकर मैंने अभिषेक से कहा।

मैं- अब तू ज्यादा प्रधान मत बन और चुपचाप देख कर बता कि मैं पास हुआ या नहीं।

अभिषेक- नहीं पहले मैं अपना देखूंगा। उसके बाद तुम्हारा।

मैं- (हाथ जोड़कर) ठीक है मेरे बाप। जैसा तुझे सही लगे।

उसके बाद अभिषेक ने अपना परिणाम देखा और खुशी से बिस्तर पर उछल पड़ा और जोर से चिल्लाया।

अभिषेक- हुर्रे। अरे घोंचू मैं प्रथम श्रेणी से पास हो गया।

मैं- अब अगर तेरा उछलना कूदना हो गया हो तो मेरा भी देख ले भाई।

उसके बाद अभिषेक ने मेरा परिणाम देखना शुरू किया, लेकिन उसे मेरा अनुक्रमांक मिल ही नहीं रहा था। वो मुझसे बोला।

अभिषेक- भाई तेरा अनुक्रमांक तो दिख ही नहीं रहा है यहां पर। लगता है तू फेल हो गया भाई।

अभिषेक की बात सुनकर मेरा चेहरा उतर गया। मैं रुंआसा जैसा हो गया। मैंने तुरन्त उससे मोबाइल छीन लिया और अपना अनुक्रमांक सर्च किया। तो उसमें प्रथम श्रेणी लिखा हुआ परिणाम नजर आ रहा था। मैंने दोबारा सर्च किया तो वैसा ही प्रथम श्रेणी परिणाम दिखा रहा था। जब मैंने अभिषेक की तरफ देखा तो वो मंद मंद मुस्कुरा रहा था। मैं समझ गया कि इसने मेरी फिरकी ली है जान बूझकर। मैं उसकी तरफ आंखे दिखाकर बोला।

मैं- कमीने। तूने तो मुझे डरा ही दिया था। तुझे पता है ये सुनकर की मैं फेल हो गया। मेरी तो जान ही निकल गई थी। रुक तुझे बताता हूँ अभी।

इतना कहकर मैं अभिषेक के ऊपर कूद गया और खुशी से उसके गले लग गया। हम दोनों वक दूसरे से लिपट हुए बिस्टेर पर अलटने पलटने लगे।इतने में पायल ने कमरे में प्रवेश किया और हम दोनों को ऐसे एक दूसरे के ऊपर लेते हुए देखकर कहा।

पायल- क्या हो रहा है ये सब। किस बात पर एक दूसरे से प्रेमियों की तरह चिपटे हुए हो आप दोनों

उसकी बात सुनकर हम दोनों एक दूसरे से अलग हो गए। अभिषेक जल्दी से उठकर उसके पास गया और पायल को बाहों में भरकर बोला।

अभिषेक- तुझे पता है मैं प्रथम श्रेणी में पास हो गया। और नयन भी प्रथम श्रेणी में पास हुआ है।

अभिषेक की बात सुनकर पायल उससे लिपट गई और उसके गाल को चूमते हुए बोली।

पायल- मुझे पता था आप जरूर प्रथम श्रेणी में पास होंगे।

फिर पायल अभिषेक को छोड़कर मेरे पास आई और मुझसे लिपटकर मेरे गालों पर दांत गड़ा दिए जिससे मेरे मुंह से आह की आवाज़ निकल गई। अभिषेक ये देखकर हंसने लगा पायल भी हंसने लगी। मैंने पायल को अपने से दूर करते हुए कहा।

मैं- क्या करती है पायल। कोई इतनी जोर से काटता है क्या। देख निशान बन गया है तेरे दांतों का। अगर पापा ने देख लिया तो सोचेंगे मेरा किसी के साथ चक्कर है।

पायल- अरे भैया ये तो ख़ुशी में हो गया। और वैसे भी चाचा को पता है आप कैसे हो लड़कियों के मामले में। वो अभिषेक भैया क्या बोलते हैं आपको। हां फट्टू। तो चाचा जी भी जानते हैं कि उनका बेटा लड़कियों के मामले में फट्टू है।

इतना कहकर पायल जोर जोर से हंसने लगी। अभिषेक भी उनके साथ हंसने लगा। मेरे चेहरे पर भी मुस्कुराहट आ गई। मैंने पायल से कहा।

मैं- तू किसी दिन मेरे हाथों पीटने वाली है सच में। चल भाग यहां से नहीं तो आज ही पिट जाएगी। और तू साले मेरी ये बात इसे बताने की क्या जरूरत थी।

अभिषेक- क्या हुआ जो बता दिया तो। कोई दुश्मन थोड़ी ही है। बहन है अपनी। समझ।

मैं- और बहन ही सबसे ज्यादा फिरकी लेती है चुतिये।

अभी हम बात कर ही रहे थे कि अभिषेक के मम्मी पापा भी आ गए। हम दोनों ने अपने परीक्षा के परिणाम के बारे में बताया तो वो बहुत खुश हुए और बोले।

अभिषेक पापा- मुझे पता था मेरे बच्चे प्रथम श्रेणी में जरूर पास होंगे। ये लो मैं तुम दोनों के लिए कपड़े लाया हूँ। पास होने की खुशी में।

मैं- लेकिन चाचा जी आपको लगता था कि हम प्रथम श्रेणी में पास होंगे।

अभिषेक पापा- अरे मुझे पूरा यकीन था कि तुम दोनों प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होंगे।

उसके बाद हम दोनों ने उनके और अभिषेक की मम्मी के पैर छुवे और चाचा को बोलकर अभिषेक के साथ अपने घर के लिए निकल पड़ा।


इसके आगे की कहानी अगले भाग में।

acha tareeka hai mind divert karne ka nacho BC
to dono dosto ka result aa hi gaya aur dono badhiya tarike se bole to first class main paas ho gaye hai :congrats: nayan aur abhishek
shandar update
 

Adirshi

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तीसरा भाग


अभिषेक के पापा मुझे बहुत मानते थे। उनके लिए मैं और अभिषेक उनके बेटे जैसे थे, लेकिन अभिषेक की मम्मी को इसी बात से गुस्सा था कि वो मुझ जैसे निम्न माध्यम वर्ग के लड़के को इतना स्नेह क्यों करते हैं। इसका कारण ये था कि अभिषेक की मम्मी एक उच्च वर्गीय परिवार से संबंध रखती थी और अधिकतर अमीर लोगों का दिल और भावनाए बहुत संकीर्ण होती हैं।

उन्होंने अभिषेक से भी कई बार कहा था कि अभिषेक का मेरे साथ दोस्ती में अभिषेक का कोई लाभ नहीं है। लेकिन अभिषेक उनकी बात कभी नहीं मानी। यही कारण था कि वो मुझको बिल्कुल पसंद नहीं करती थी। अभिषेक के पापा की वजह से वो खुलकर कभी ये बात बोल नहीं पाती थी, क्योंकि अभिषेक के पापा थोड़ा सख्त मिज़ाज़ के थे और तुरंत ही प्रतिक्रिया दे देते थे। अभिषेक ने कई बात मुझे ये बात बताई जब कभी उसका मूड खराब होता था। मुझे ये जानकर बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता था, लेकिन मैं चाचा और अभिषेक के लिए उनके घर चला जाता था।

बहरहाल मैं और अभिषेक उनसे अनुमति लेकर मेरे घर जाने के लिए निकल आए थे। वो भी अपनी साईकिल बाहर निकाल लाया। वैसे अभिषेक के घर में दो बाइक थी। उसे कहीं भी जाना होता तो वो बाइक से ही जाता था, लेकिन जब मेरे साथ चलना होता था तो हमेशा साईकल से ही चलता था। स्कूल भी वो साइकिल से ही आता था।

जब मैंने उसे साईकल निकालते देखा तो मैंने उससे कहा।

मैं- साईकल क्यों बाहर निकाल रहा है। आ जा इसी से दोनों लोग चलते हैं। बहुत मज़ा आएगा।

अभिषेक- फिर मैं वापस कैसे आऊंगा।

मैं- वैसे भी आज तू वापस आ नहीं पाएगा। पापा और काजल तुझे आने ही नहीं देंगे। मैं तुझे कल छोड़ दूंगा घर। चल अब जल्दी कर नहीं तो रात हो जाएगी।

फिर मैं साईकल चलाने लगा और अभिषेक उछलकर आगे डंडे पर बैठ गया। फिर हम दोनो बातचीत करते हुए आने लगे। 2 किलोमीटर तक साईकिल चलाने के बाद मैंने अभिषेक से साईकिल चलाने के लिए कहा। अभिषेक साईकिल चलाने लगा। मैं डंडे पर बैठ गया और एक पांव से पैडिल पर मारने लगा जिससे साइकिल की गति तेज हो गई।

मेरे घर से 500 मीटर पहले ही एक छोटा सा बाजार पड़ता है। जो हफ्ते में 3 दिन लगता है। उस दिन बाजार था तो वहां पर गोलगप्पे और टिकिया का ठेला लगा हुआ था। अभिषेक ने साईकिल रोक दी और बोला।

अभिषेक- देख भाई। मुझे तो तलब हो रही है गोलगप्पे खाने ने। तुझे भी खाना है तो आ जा।

मैं- अबे तुझे लड़कियों वाली आदत कब से पड़ गई।

अभिषेक- लड़कियों वाली आदत मतलब। तू कहना क्या चाहता है।

मैं- मतलब ये कि उन्हें ही गोलगप्पे ज्यादा पसंद होते हैं। देखता नहीं गोलगप्पे (गुपचुप, फुलकी) की दुकान पर कितनी भीड़ होती है लड़कियों की। चाहे वो खाना खा कर ही घर से निकलें, लेकिन अगर गोलगप्पे का ठेला दिख गया तो उनको फिर भूख लग जाती है। तेरा हाल भी उसी तरह है।

अभिषेक- देख भाई। पहली बात ये कि मैं कोई खाना वाना खा कर नहीं निकला हूँ। और दूसरी बात जब भूख लगती है तो कुछ भी अच्छा दिखे तो खाने में लड़का, लड़की नहीं देखा जाता। अरे मैं तुझसे बात ही क्यों कर रहा हूँ। तुझे खाना है तो आ नहीं तो मैं जा रहा हूं। साला तुझे भाषण देने के चक्कर में भूख और तेज़ हो गई है।

इतना कहकर अभिषेक गोलगप्पे के ठेले के पास पहुँच गया। वहाँ कुछ लड़कियां पहले ही गोलगप्पे खा रही थी। अभिषेक जाकर उनके बगल खड़ा हो गया। मैं भी मन मारकर ठेले के पास पहुँच गया।

अब यहां पर अभिषेक की हालत देखने लायक थी। जब लड़की गोलगप्पा उठती और अपने मुंह में डालती तो अभिषेक इस दौरान हुई उनको पूरी क्रिया को देखता और अपने होंठों पर जीभ फिरता। जब उसने दो चार बार ऐसा किया तो मैंने उससे कहा।

मैं- क्या कर रहा है यार तू। कहीं बीच बाजार मरवा न देना तुम।

अभिषेक- मैं क्या करूँ यार। बहुत भूख लगी है और मुंह में पानी आ रहा है और ये लड़कियाँ पता नहीं कितने जन्मों की भूखी हैं कि खाये ही जा रही हैं। जिनको नज़र नहीं आ रहा है कि दो शरीफ लड़के कब से गोलगप्पे खाने के लिए खड़े हैं।

मैं- मैंने तुझसे पहले ही कहा था कि लड़कियों का मनपसंद होता है गोलगप्पा। चल कहीं और चलते हैं कुछ और खाते हैं।

अभिषेक मेरी बात अनसुना कर दिया और कुछ देर इंतज़ार करने के बाद आखिरकार वो बोल ही पड़ा।

अभिषेक- लगता है तुम लोग कई दिन की भूखी प्यासी हो। कब से देख रहा हूँ गोलगप्पे खाए पड़ी हो। मुझे लगता है पूरा ठेला खाकर ही मानोगी तुम लोग।

अभिषेक की बात सुनकर उन लड़कियों ने उसे घूरकर देखा तो अभिषेक अपने दांत निकालकर हंसने लगा। आखिरकार वो लड़कियाँ गोलगप्पे खाकर चली गई। उनके जाने के बाद मैंने अभिषेक से कहा।

मैं- साले तू एक दिन बहुत पिटेगा। तुझे कितनी बार मना किया है कि ऐसे कोई भी बात मत बोला कर खासकर लड़कियों को, लेकिन तू है कि मेरी बात सुनता ही नहीं। जब मार पड़ेगी तो मुझसे मत कहना कि मैंने तुझे आगाह नहीं किया।

अभिषेक- कुछ नहीं होगा यार। कौन सा मैं उनको छेड़ रहा था। मैं तो बस कम खाने के लिए बोल रहा था। अच्छा अब ज्यादा बातें नहीं। गोलगप्पे वाले भैया। हमे भी गोलगप्पे खिलाइए।


फिर शुरू हुआ गोलगप्पे खाने का सिलसिला जो जाकर 70 ₹ पर खत्म हुआ। जिसमें से 10 ₹ का गोलगप्पा मैंने खाया था बाकी के 60 ₹ का गोलगप्पा अभिषेक ने खाया था। उसने गोलगप्पे खाकर एक लंबी डकार ली और अपने हाथ अपनी शर्ट में पोछ कर मुझसे बोला।

अभिषेक- हां। अब लग रहा है कि पेट में कुछ गया है।

मैं- कुछ गया है। भुक्खड़, अगर कुछ देर और खाता तो उसका पूरा ठेला खा डालता तू। कोई इतना खाता है क्या, ऐसा लग रहा था जैसे जन्मों का भूखा है तू।

अभिषेक- जब भूख लगी थी तो क्या करूँ मैं। अब ज्यादा बकचोदी मत कर। तुझे तो मेरे हर चीज से परेशानी है। अब जल्दी से पैसे दे और घर चल। आज कुछ अच्छा बनवाऊंगा खाने के लिए चाची से।

मैं- तू सच में पेटू है। अभी भी तेरा पेट नहीं भरा।

मैंने ये बात मुस्कुराते हुए बोली थी जिसे सुनकर क़र अभिषेक भी मुस्कुराने लगा। फिर मैं गोलगप्पे वाले को पैसे देकर वहां से चल दिया। बाजार पर होने पर मैं साईकिल की सीट पर बैठ गया और साईकिल आगे बढ़ा दी। अभिषेक उछलकर आगे डंडे पर बैठा तभी एक धमाका हुआ।

धड़ाम...... फुस्स सससससस....

उसके उछलकर बैठने से साईकिल का टायर पंचर हो गया। (वैसे टायर पंचर नहीं होता पंचर तो ट्यूब होती है, लेकिन गांव में इसे टायर पंचर ही बोलते हैं) और साईकिल तुरन्त रुक गई। मैं साईकिल स्टैंड पर खड़ीकर अगला टायर देखा तो वो फट गया था। मैं अभिषेक को देखने लगा। वो भी मुझे देख रहा था। मैंने उससे कहा।

मैं- ये सब तेरी वजह से ही हुआ है।

अभिषेक- मेरी वजह से? मैंने क्या किया है।

मैं- तुझे ही बड़ी भूख लगी थी न। और खाया भी तो कितना ठूंस ठूंस कर। फिर भी तेरा पेट नहीं भरा। अभी और खाने की बात कर रहा है। ना तू इतना ज्यादा खाता, न तेरा वजन बढ़ता और न ही टायर पंचर होता।

अभिषेक- देख नयन। अब कुछ ज्यादा ही बोल रहा है तू। मेरे गोलगप्पे खाने से कुछ नहीं हुआ समझे। ये तो टायर कमजोर था साइकिल का। इसलिए फट गया। और इसके लिए तू मुझे मत बोल। अपने आप को देख मुझसे ज्यादा वजन तो तेरा है।

उसकी बात सुनकर मैं चुप हो गया। क्योंकि उसने बात एकदम सही बोली थी। मेरा वजन उससे 2-4 किलो ज्यादा ही था। फिर हम दोनों बात करते हुए पैदल ही साईकिल को घसीटते हुए अपने घर की तरफ चल दिये। जब मैं घर पहुँचा तो पापा और काजल दुआर(घर के सामने की खाली जगह) में चारपाई/खटिया डाले बैठे हुए मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। अभिषेक तुरंत जाकर पापा के पांव छू लिया और खटिया पर बैठ गया। उसे देखकर काजल ने कहा।

काजल- भैया आज आपका भी परिणाम आया होगा न। क्या हुआ बताओ न।

अभिषेक- वो सब बाद में बताऊंगा। पहले ये मिठाई खा और ये कपड़े रख जो पापा ने तेरे लिए भेजे हैं।

इतना कहकर अभिषेक ने मिठाई का डिब्बा, जो वह घर से लाया था निकालकर काजल को दे दिया साथ में कपड़े का बैग भी दे दिया तब तक मैं भी आकर पापा के पांव स्पर्श किया और उनकी बगल में बैठ गया। अभिषेक ने कहा।

अभिषेक- आपको पता है चाचा जी। मैं और नयन दोनों प्रथम श्रेणी में पास हुए हैं। अभी तक अंक नहीं देखा है। वो आपके सामने देखेंगे।

तबतक मेरी अम्मा भी घर से बाहर आ गई। पापा ने उन्हें देखते हुए कहा।

पापा- अरे सुनती हो भाग्यवान। दोनों बच्चे प्रथम श्रेणी में पास हुए हैं। जाओ इनके खाने लिए मैंने जो जलेबी लाई है उसे ले आओ।

अभिषेक- अरे वाह चाचा जी। आपने बहुत अच्छा किया। मेरे मुंह में पानी आ गया। जल्दी लेकर आइये चाची जी।

मैं- तू कितना बड़ा पेटू है अभिषेक। तेरे मुंह में तो हर खाने वाली चीज को देखकर पानी आ जाता है। अभी आधे घंटे पहले भरपेट गोलगप्पे खाकर आ रहा है। और फिर से तुझे भूख लग गई।


अभिषेक- इतनी दूर पैदल चलवाया तुमने। जो खाया था वो पच गया सब। अब पेट खाली हो गया है तो भूख तो लगेगी ही न और हां चाची जी। आज हम दोनों के पास होने की खुशी में कुछ अच्छा सा बनाइये खाने के लिए।

मम्मी- हां क्यों नहीं मेरे बच्चे पास हुए हैं।

उसके बाद मां एक थाली में जलेबी निकाल कर ले आई। हम सब मिलकर जलेबी खाने लगे और इधर उधर की बातें करने लगे। बातों बातों में मैंने सबको आधे घंटे पहले बाजार वाली कहानी बता दी कि कैसे अभिषेक ने गोलगप्पे खाते हुए लड़कियों को देख रहा था और कैसे इसके मुंह में पानी आ रहा था और कैसे साईकिल पंचर हो गई वगैरह वगैरह। जिसे सुनकर सब हंसने लगे।

इसके आगे की कहानी अगले भाग में।

golgappe main gender ka scene kaha se aa gaya nayan babu :sigh: golgappe to ladko ko bhi equally ache lagte hai bas fark itna hai ke ladke limit main khate hai ladkiya unlimited :D
waise abhishek bhai op kya bola hai un ladkiyo ko gazab :lol1:
badhiya Update
 

Sanju@

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तीसरा भाग


अभिषेक के पापा मुझे बहुत मानते थे। उनके लिए मैं और अभिषेक उनके बेटे जैसे थे, लेकिन अभिषेक की मम्मी को इसी बात से गुस्सा था कि वो मुझ जैसे निम्न माध्यम वर्ग के लड़के को इतना स्नेह क्यों करते हैं। इसका कारण ये था कि अभिषेक की मम्मी एक उच्च वर्गीय परिवार से संबंध रखती थी और अधिकतर अमीर लोगों का दिल और भावनाए बहुत संकीर्ण होती हैं।

उन्होंने अभिषेक से भी कई बार कहा था कि अभिषेक का मेरे साथ दोस्ती में अभिषेक का कोई लाभ नहीं है। लेकिन अभिषेक उनकी बात कभी नहीं मानी। यही कारण था कि वो मुझको बिल्कुल पसंद नहीं करती थी। अभिषेक के पापा की वजह से वो खुलकर कभी ये बात बोल नहीं पाती थी, क्योंकि अभिषेक के पापा थोड़ा सख्त मिज़ाज़ के थे और तुरंत ही प्रतिक्रिया दे देते थे। अभिषेक ने कई बात मुझे ये बात बताई जब कभी उसका मूड खराब होता था। मुझे ये जानकर बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता था, लेकिन मैं चाचा और अभिषेक के लिए उनके घर चला जाता था।

बहरहाल मैं और अभिषेक उनसे अनुमति लेकर मेरे घर जाने के लिए निकल आए थे। वो भी अपनी साईकिल बाहर निकाल लाया। वैसे अभिषेक के घर में दो बाइक थी। उसे कहीं भी जाना होता तो वो बाइक से ही जाता था, लेकिन जब मेरे साथ चलना होता था तो हमेशा साईकल से ही चलता था। स्कूल भी वो साइकिल से ही आता था।

जब मैंने उसे साईकल निकालते देखा तो मैंने उससे कहा।

मैं- साईकल क्यों बाहर निकाल रहा है। आ जा इसी से दोनों लोग चलते हैं। बहुत मज़ा आएगा।

अभिषेक- फिर मैं वापस कैसे आऊंगा।

मैं- वैसे भी आज तू वापस आ नहीं पाएगा। पापा और काजल तुझे आने ही नहीं देंगे। मैं तुझे कल छोड़ दूंगा घर। चल अब जल्दी कर नहीं तो रात हो जाएगी।

फिर मैं साईकल चलाने लगा और अभिषेक उछलकर आगे डंडे पर बैठ गया। फिर हम दोनो बातचीत करते हुए आने लगे। 2 किलोमीटर तक साईकिल चलाने के बाद मैंने अभिषेक से साईकिल चलाने के लिए कहा। अभिषेक साईकिल चलाने लगा। मैं डंडे पर बैठ गया और एक पांव से पैडिल पर मारने लगा जिससे साइकिल की गति तेज हो गई।

मेरे घर से 500 मीटर पहले ही एक छोटा सा बाजार पड़ता है। जो हफ्ते में 3 दिन लगता है। उस दिन बाजार था तो वहां पर गोलगप्पे और टिकिया का ठेला लगा हुआ था। अभिषेक ने साईकिल रोक दी और बोला।

अभिषेक- देख भाई। मुझे तो तलब हो रही है गोलगप्पे खाने ने। तुझे भी खाना है तो आ जा।

मैं- अबे तुझे लड़कियों वाली आदत कब से पड़ गई।

अभिषेक- लड़कियों वाली आदत मतलब। तू कहना क्या चाहता है।

मैं- मतलब ये कि उन्हें ही गोलगप्पे ज्यादा पसंद होते हैं। देखता नहीं गोलगप्पे (गुपचुप, फुलकी) की दुकान पर कितनी भीड़ होती है लड़कियों की। चाहे वो खाना खा कर ही घर से निकलें, लेकिन अगर गोलगप्पे का ठेला दिख गया तो उनको फिर भूख लग जाती है। तेरा हाल भी उसी तरह है।

अभिषेक- देख भाई। पहली बात ये कि मैं कोई खाना वाना खा कर नहीं निकला हूँ। और दूसरी बात जब भूख लगती है तो कुछ भी अच्छा दिखे तो खाने में लड़का, लड़की नहीं देखा जाता। अरे मैं तुझसे बात ही क्यों कर रहा हूँ। तुझे खाना है तो आ नहीं तो मैं जा रहा हूं। साला तुझे भाषण देने के चक्कर में भूख और तेज़ हो गई है।

इतना कहकर अभिषेक गोलगप्पे के ठेले के पास पहुँच गया। वहाँ कुछ लड़कियां पहले ही गोलगप्पे खा रही थी। अभिषेक जाकर उनके बगल खड़ा हो गया। मैं भी मन मारकर ठेले के पास पहुँच गया।

अब यहां पर अभिषेक की हालत देखने लायक थी। जब लड़की गोलगप्पा उठती और अपने मुंह में डालती तो अभिषेक इस दौरान हुई उनको पूरी क्रिया को देखता और अपने होंठों पर जीभ फिरता। जब उसने दो चार बार ऐसा किया तो मैंने उससे कहा।

मैं- क्या कर रहा है यार तू। कहीं बीच बाजार मरवा न देना तुम।

अभिषेक- मैं क्या करूँ यार। बहुत भूख लगी है और मुंह में पानी आ रहा है और ये लड़कियाँ पता नहीं कितने जन्मों की भूखी हैं कि खाये ही जा रही हैं। जिनको नज़र नहीं आ रहा है कि दो शरीफ लड़के कब से गोलगप्पे खाने के लिए खड़े हैं।

मैं- मैंने तुझसे पहले ही कहा था कि लड़कियों का मनपसंद होता है गोलगप्पा। चल कहीं और चलते हैं कुछ और खाते हैं।

अभिषेक मेरी बात अनसुना कर दिया और कुछ देर इंतज़ार करने के बाद आखिरकार वो बोल ही पड़ा।

अभिषेक- लगता है तुम लोग कई दिन की भूखी प्यासी हो। कब से देख रहा हूँ गोलगप्पे खाए पड़ी हो। मुझे लगता है पूरा ठेला खाकर ही मानोगी तुम लोग।

अभिषेक की बात सुनकर उन लड़कियों ने उसे घूरकर देखा तो अभिषेक अपने दांत निकालकर हंसने लगा। आखिरकार वो लड़कियाँ गोलगप्पे खाकर चली गई। उनके जाने के बाद मैंने अभिषेक से कहा।

मैं- साले तू एक दिन बहुत पिटेगा। तुझे कितनी बार मना किया है कि ऐसे कोई भी बात मत बोला कर खासकर लड़कियों को, लेकिन तू है कि मेरी बात सुनता ही नहीं। जब मार पड़ेगी तो मुझसे मत कहना कि मैंने तुझे आगाह नहीं किया।

अभिषेक- कुछ नहीं होगा यार। कौन सा मैं उनको छेड़ रहा था। मैं तो बस कम खाने के लिए बोल रहा था। अच्छा अब ज्यादा बातें नहीं। गोलगप्पे वाले भैया। हमे भी गोलगप्पे खिलाइए।


फिर शुरू हुआ गोलगप्पे खाने का सिलसिला जो जाकर 70 ₹ पर खत्म हुआ। जिसमें से 10 ₹ का गोलगप्पा मैंने खाया था बाकी के 60 ₹ का गोलगप्पा अभिषेक ने खाया था। उसने गोलगप्पे खाकर एक लंबी डकार ली और अपने हाथ अपनी शर्ट में पोछ कर मुझसे बोला।

अभिषेक- हां। अब लग रहा है कि पेट में कुछ गया है।

मैं- कुछ गया है। भुक्खड़, अगर कुछ देर और खाता तो उसका पूरा ठेला खा डालता तू। कोई इतना खाता है क्या, ऐसा लग रहा था जैसे जन्मों का भूखा है तू।

अभिषेक- जब भूख लगी थी तो क्या करूँ मैं। अब ज्यादा बकचोदी मत कर। तुझे तो मेरे हर चीज से परेशानी है। अब जल्दी से पैसे दे और घर चल। आज कुछ अच्छा बनवाऊंगा खाने के लिए चाची से।

मैं- तू सच में पेटू है। अभी भी तेरा पेट नहीं भरा।

मैंने ये बात मुस्कुराते हुए बोली थी जिसे सुनकर क़र अभिषेक भी मुस्कुराने लगा। फिर मैं गोलगप्पे वाले को पैसे देकर वहां से चल दिया। बाजार पर होने पर मैं साईकिल की सीट पर बैठ गया और साईकिल आगे बढ़ा दी। अभिषेक उछलकर आगे डंडे पर बैठा तभी एक धमाका हुआ।

धड़ाम...... फुस्स सससससस....

उसके उछलकर बैठने से साईकिल का टायर पंचर हो गया। (वैसे टायर पंचर नहीं होता पंचर तो ट्यूब होती है, लेकिन गांव में इसे टायर पंचर ही बोलते हैं) और साईकिल तुरन्त रुक गई। मैं साईकिल स्टैंड पर खड़ीकर अगला टायर देखा तो वो फट गया था। मैं अभिषेक को देखने लगा। वो भी मुझे देख रहा था। मैंने उससे कहा।

मैं- ये सब तेरी वजह से ही हुआ है।

अभिषेक- मेरी वजह से? मैंने क्या किया है।

मैं- तुझे ही बड़ी भूख लगी थी न। और खाया भी तो कितना ठूंस ठूंस कर। फिर भी तेरा पेट नहीं भरा। अभी और खाने की बात कर रहा है। ना तू इतना ज्यादा खाता, न तेरा वजन बढ़ता और न ही टायर पंचर होता।

अभिषेक- देख नयन। अब कुछ ज्यादा ही बोल रहा है तू। मेरे गोलगप्पे खाने से कुछ नहीं हुआ समझे। ये तो टायर कमजोर था साइकिल का। इसलिए फट गया। और इसके लिए तू मुझे मत बोल। अपने आप को देख मुझसे ज्यादा वजन तो तेरा है।

उसकी बात सुनकर मैं चुप हो गया। क्योंकि उसने बात एकदम सही बोली थी। मेरा वजन उससे 2-4 किलो ज्यादा ही था। फिर हम दोनों बात करते हुए पैदल ही साईकिल को घसीटते हुए अपने घर की तरफ चल दिये। जब मैं घर पहुँचा तो पापा और काजल दुआर(घर के सामने की खाली जगह) में चारपाई/खटिया डाले बैठे हुए मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। अभिषेक तुरंत जाकर पापा के पांव छू लिया और खटिया पर बैठ गया। उसे देखकर काजल ने कहा।

काजल- भैया आज आपका भी परिणाम आया होगा न। क्या हुआ बताओ न।

अभिषेक- वो सब बाद में बताऊंगा। पहले ये मिठाई खा और ये कपड़े रख जो पापा ने तेरे लिए भेजे हैं।

इतना कहकर अभिषेक ने मिठाई का डिब्बा, जो वह घर से लाया था निकालकर काजल को दे दिया साथ में कपड़े का बैग भी दे दिया तब तक मैं भी आकर पापा के पांव स्पर्श किया और उनकी बगल में बैठ गया। अभिषेक ने कहा।

अभिषेक- आपको पता है चाचा जी। मैं और नयन दोनों प्रथम श्रेणी में पास हुए हैं। अभी तक अंक नहीं देखा है। वो आपके सामने देखेंगे।

तबतक मेरी अम्मा भी घर से बाहर आ गई। पापा ने उन्हें देखते हुए कहा।

पापा- अरे सुनती हो भाग्यवान। दोनों बच्चे प्रथम श्रेणी में पास हुए हैं। जाओ इनके खाने लिए मैंने जो जलेबी लाई है उसे ले आओ।

अभिषेक- अरे वाह चाचा जी। आपने बहुत अच्छा किया। मेरे मुंह में पानी आ गया। जल्दी लेकर आइये चाची जी।

मैं- तू कितना बड़ा पेटू है अभिषेक। तेरे मुंह में तो हर खाने वाली चीज को देखकर पानी आ जाता है। अभी आधे घंटे पहले भरपेट गोलगप्पे खाकर आ रहा है। और फिर से तुझे भूख लग गई।


अभिषेक- इतनी दूर पैदल चलवाया तुमने। जो खाया था वो पच गया सब। अब पेट खाली हो गया है तो भूख तो लगेगी ही न और हां चाची जी। आज हम दोनों के पास होने की खुशी में कुछ अच्छा सा बनाइये खाने के लिए।

मम्मी- हां क्यों नहीं मेरे बच्चे पास हुए हैं।

उसके बाद मां एक थाली में जलेबी निकाल कर ले आई। हम सब मिलकर जलेबी खाने लगे और इधर उधर की बातें करने लगे। बातों बातों में मैंने सबको आधे घंटे पहले बाजार वाली कहानी बता दी कि कैसे अभिषेक ने गोलगप्पे खाते हुए लड़कियों को देख रहा था और कैसे इसके मुंह में पानी आ रहा था और कैसे साईकिल पंचर हो गई वगैरह वगैरह। जिसे सुनकर सब हंसने लगे।

इसके आगे की कहानी अगले भाग में।

Amazing update
Lovely update♥️❤️❤️❤️❤️

waiting next update
 

Vk248517

I love Fantasy and Sci-fiction story.
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दूसरा भाग


दरवाज़ा खटखटाने पर अभिषेक की बहन पायल ने दरवाज़ा खोला और मैं घर के अंदर चला गया। आज रविवार का दिन था।

अभिषेक के घर में उस समय उसके मम्मी पापा कहीं बाहर गए हुए थे। घर में अभिषेक और उसकी बहन पायल ही थे उस समय। मैं जब अभिषेक के कमरे के पास पहुंचा तो मुझे भोजपुरी संगीत की धुन सुनाई पड़ी। मैं जाकर उसका दरवाज़ा खोला तो वो खुल गया।

अंदर अभिषेक बुफर पर पवन सिंह की फ़िल्म का भोजपुरी गाना " रात दीया बुता के पिया क्या क्या किया" बजाए हुए था और नृत्य कर रहा था। अरे माफ करना, इसे नृत्य कहना नृत्य का अपमान होगा। दरअसल अभिषेक इस गाने पर बंदर की तरह गुलाटी मार रहा था। कभी जमीन से कूदकर बिस्तर पर चढ़ जाता और उछलने लगता तो कभी बिस्तर से जमीन में कूदकर उछालने लगता। उसे देखकर मुझे हंसी आ रही थी।

जब उसने मुझे दरवाज़े के पास देखा तो उसी तरह उछलते कूदते मेरे पास आया और मुझे पकड़कर फिर से नृत्य करने में लग गया। मैंने उससे कहा।

मैं- अबे घोंचू क्या कर रहा है ये तू पागलों की तरह।

अभिषेक- अबे देख नहीं रहा है नृत्य कर रहा हूँ। ऐसा नृत्य कभी देखा नहीं होगा तुमने।

मैं- सही बोला तुमने। ऐसा नृत्य मैं अपने जीवन में पहली बार देख रहा हूँ। अबे घोंचू तू इसे नृत्य बोलता है। बंदर की तरह उछल रहा है। अगर इस गाने को आम्रपाली दुबे और पवन सिंह देख लें न तो वो दोनों अभिनय करना ही बंद कर दे तेरी प्रतिभा को देखकर और गलती से अगर बंदरों ने देख लिया तो वो तो बहुत खुश हो जाएंगे और तुझे अपने साथ ले जाएंगे।

अभिषेक- अबे तुझसे मेरी कोई खुशी बर्दास्त क्यों नहीं होती। जब भी मैं कुछ अच्छा करने की कोशिश करता हूँ तू बीच में टपक पड़ता है। अरे कम से कम प्रोत्साहित नहीं कर सकता मुझे तो हतोत्साहित तो मत किया कर।

मैं- अरे तू तो नाराज़ हो गया। चल आजा। तुझे खुश करता हूँ।

इतना कहकर मैंने अपना मोबाइल बुफेर से जोड़ा और करन अर्जुन फ़िल्म (अरे वही फ़िल्म जिसमे मेरे करन अर्जुन आएंगे कहती है दोनों की माँ) का "मुझको राणा जी माफ़ करना गलती म्हारे से हो गई" चालू कर दिया और अभिषेक से बोला।

मैं- चल आजा मेरे जिगर के छल्ले। शमा रंगीन बनाते हैं।

उसके बाद मैंने और अभिषेक ने मिलकर इस गाने पर जो कमर लचकाई की बस पूछिये ही मत, यहाँ भी कमर तो सिर्फ मेरी लचक रही थी। अभिषेक का तो पूरा शरीर लचक रहा था। गाना खत्म होते ही हम दोनों धड़ाम से बिस्तर पर बैठ गए और जोर जोर से हँसने लगे। थोड़ी देर बाद जब हमारी हंसी रुकी तो मैंने अभिषेक से पूछा।

मैं- अच्छा ये बता। तू इतना नाच किस खुशी में रहा है। अभी तो परीक्षा का परिणाम भी नहीं आया है। जिससे लगे कि उसी की खुशी मना रहा है।

अभिषेक- देख भाई। परीक्षा का परिणाम आये उससे पहले ही खुशी मना ले रहा हूँ । क्या पता बाद में मौका मिले या न मिले।

मैं- मतलब। तू कहना क्या चाहता है।

अभिषेक- देख भाई। इस बार बोर्ड की परीक्षा दी है। और आज परिणाम आ रहा है तो सुबह से मैं बहुत नरवस हूँ। एक डर से लग रहा था। तो उसी डर को दूर करने के लिए मैंने सोचा कि कुछ ऐसा किया जाए के डर भी दूर हो जाए और मज़ा भी आए। तो मुझे ये आईडिया बहुत सही लगा। और परिणाम आने से पहले खुशी भी मना ली। क्या पता मैं लटक गया तो, इसलिए मैंने ये नृत्य करने की सोची।

मैं- क्या बात है भाई। तू तो बहुत दूर की सोचता है। और वैसे भी तुझे किस बात का डर है। कक्षा नर्सरी से लेकर कक्षा नौ तक तू हमेशा प्रथम आता रहा है। तो इसमें भी प्रथम ही आएगा। डर तो मुझे भी लग रहा है। लेकिन सच में तेरे आईडिया बहुत अच्छा था। डांस करके तो मेरा सारा डर चला गया है।

अभिषेक- भाई। अगर मैं प्रथम आता था तो तू भी तो मेरे पीछे ही रहता था। तेरा भी परिणाम अच्छा ही आएगा। बहुत अच्छा आएगा।

फिर हम दोनों बैठे अपने परीक्षा के परिणाम के बारे में इधर उधर की बातें करते रहे। इसी तरह अभिषेक के यहां बैठे बैठे शाम को 4.30 बज गए। परीक्षा का परिणाम किसी भी वक्त घोषित हो सकता था। मैं और अभिषेक मोबाइल में ही वेबसाइट खोलकर बैठे हुए थे। जैसे ही परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ। मैंने मोबाइल अभिषेक को पकड़ते हुए कहा।

मैं- ले भाई तू ही देख कर बता। मेरी तो हिम्मत जवाब दे रही है।

अभिषेक- चूतिये। तू हमेशा फट्टू ही रहेगा। बात तो ऐसे कर रहा है जैसे किसी लड़की को देखने जा रहा है। अरे परीक्षा का परिणाम देखना है। किसी लड़की से बात नहीं करनी है।

वैसे अभिषेक ने सच ही कहा था लड़कियों के मामले में मैं बहुत फट्टू किस्म का था, लड़कियों से बात करने में मुझे डर से लगता था। अगर कोई लड़की मुझसे 1-2 मिनट भी बात कर लेती थी तो मेरे पैर कांपने लगते थे। मेरा रक्तचाप बढ़ जाता था। मेरे शरीर से पसीने छूटने लगते थे। इसका कारण था मेरे पापा के अच्छे संस्कार। वो तो मुझसे बस इतना ही हमेशा कहते थे कि लड़कियों/महिलाओं का हमेशा सम्मान करना चाहिए। उनके साथ अभद्रता और जोर जबरदस्ती करने वाला सच्चा मर्द नहीं होता। याद रखना बेटा जो दूसरों की बहन-बेटियों पर बुरी नजर रखता है। उसकी भी बहन- बेटियां बुरी नजर से ही देखी जाती हैं।

बस पापा की इस बात को मैंने कुछ ज्यादा ही गंभीरता से ले लिया। जिससे मुझे लड़कियों में रुचि न के बराबर रह गई थी। यही कारण है कि कक्षा 10 तक की पढ़ाई के दौरान मैंने किसी भी लड़की को उस नजर से नहीं देखा। इसका मतलब ये नहीं कि मैं गे हूँ।🤣🤣 इसके बिल्कुल उलट अभिषेक हमेशा हंसी मजाक करता रहता था कक्षा की लड़कियों के साथ मगर अभी तक किसी के साथ उसका चक्कर नहीं चला था। वो भी अधिकतर अपने आपको प्यार मोहब्बत के चक्करों से खुद को दूर रखता था।

बहरहाल अभिषेक की बात सुनकर मैंने अभिषेक से कहा।

मैं- अब तू ज्यादा प्रधान मत बन और चुपचाप देख कर बता कि मैं पास हुआ या नहीं।

अभिषेक- नहीं पहले मैं अपना देखूंगा। उसके बाद तुम्हारा।

मैं- (हाथ जोड़कर) ठीक है मेरे बाप। जैसा तुझे सही लगे।

उसके बाद अभिषेक ने अपना परिणाम देखा और खुशी से बिस्तर पर उछल पड़ा और जोर से चिल्लाया।

अभिषेक- हुर्रे। अरे घोंचू मैं प्रथम श्रेणी से पास हो गया।

मैं- अब अगर तेरा उछलना कूदना हो गया हो तो मेरा भी देख ले भाई।

उसके बाद अभिषेक ने मेरा परिणाम देखना शुरू किया, लेकिन उसे मेरा अनुक्रमांक मिल ही नहीं रहा था। वो मुझसे बोला।

अभिषेक- भाई तेरा अनुक्रमांक तो दिख ही नहीं रहा है यहां पर। लगता है तू फेल हो गया भाई।

अभिषेक की बात सुनकर मेरा चेहरा उतर गया। मैं रुंआसा जैसा हो गया। मैंने तुरन्त उससे मोबाइल छीन लिया और अपना अनुक्रमांक सर्च किया। तो उसमें प्रथम श्रेणी लिखा हुआ परिणाम नजर आ रहा था। मैंने दोबारा सर्च किया तो वैसा ही प्रथम श्रेणी परिणाम दिखा रहा था। जब मैंने अभिषेक की तरफ देखा तो वो मंद मंद मुस्कुरा रहा था। मैं समझ गया कि इसने मेरी फिरकी ली है जान बूझकर। मैं उसकी तरफ आंखे दिखाकर बोला।

मैं- कमीने। तूने तो मुझे डरा ही दिया था। तुझे पता है ये सुनकर की मैं फेल हो गया। मेरी तो जान ही निकल गई थी। रुक तुझे बताता हूँ अभी।

इतना कहकर मैं अभिषेक के ऊपर कूद गया और खुशी से उसके गले लग गया। हम दोनों वक दूसरे से लिपट हुए बिस्टेर पर अलटने पलटने लगे।इतने में पायल ने कमरे में प्रवेश किया और हम दोनों को ऐसे एक दूसरे के ऊपर लेते हुए देखकर कहा।

पायल- क्या हो रहा है ये सब। किस बात पर एक दूसरे से प्रेमियों की तरह चिपटे हुए हो आप दोनों

उसकी बात सुनकर हम दोनों एक दूसरे से अलग हो गए। अभिषेक जल्दी से उठकर उसके पास गया और पायल को बाहों में भरकर बोला।

अभिषेक- तुझे पता है मैं प्रथम श्रेणी में पास हो गया। और नयन भी प्रथम श्रेणी में पास हुआ है।

अभिषेक की बात सुनकर पायल उससे लिपट गई और उसके गाल को चूमते हुए बोली।

पायल- मुझे पता था आप जरूर प्रथम श्रेणी में पास होंगे।

फिर पायल अभिषेक को छोड़कर मेरे पास आई और मुझसे लिपटकर मेरे गालों पर दांत गड़ा दिए जिससे मेरे मुंह से आह की आवाज़ निकल गई। अभिषेक ये देखकर हंसने लगा पायल भी हंसने लगी। मैंने पायल को अपने से दूर करते हुए कहा।

मैं- क्या करती है पायल। कोई इतनी जोर से काटता है क्या। देख निशान बन गया है तेरे दांतों का। अगर पापा ने देख लिया तो सोचेंगे मेरा किसी के साथ चक्कर है।

पायल- अरे भैया ये तो ख़ुशी में हो गया। और वैसे भी चाचा को पता है आप कैसे हो लड़कियों के मामले में। वो अभिषेक भैया क्या बोलते हैं आपको। हां फट्टू। तो चाचा जी भी जानते हैं कि उनका बेटा लड़कियों के मामले में फट्टू है।

इतना कहकर पायल जोर जोर से हंसने लगी। अभिषेक भी उनके साथ हंसने लगा। मेरे चेहरे पर भी मुस्कुराहट आ गई। मैंने पायल से कहा।

मैं- तू किसी दिन मेरे हाथों पीटने वाली है सच में। चल भाग यहां से नहीं तो आज ही पिट जाएगी। और तू साले मेरी ये बात इसे बताने की क्या जरूरत थी।

अभिषेक- क्या हुआ जो बता दिया तो। कोई दुश्मन थोड़ी ही है। बहन है अपनी। समझ।

मैं- और बहन ही सबसे ज्यादा फिरकी लेती है चुतिये।

अभी हम बात कर ही रहे थे कि अभिषेक के मम्मी पापा भी आ गए। हम दोनों ने अपने परीक्षा के परिणाम के बारे में बताया तो वो बहुत खुश हुए और बोले।

अभिषेक पापा- मुझे पता था मेरे बच्चे प्रथम श्रेणी में जरूर पास होंगे। ये लो मैं तुम दोनों के लिए कपड़े लाया हूँ। पास होने की खुशी में।

मैं- लेकिन चाचा जी आपको लगता था कि हम प्रथम श्रेणी में पास होंगे।

अभिषेक पापा- अरे मुझे पूरा यकीन था कि तुम दोनों प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होंगे।

उसके बाद हम दोनों ने उनके और अभिषेक की मम्मी के पैर छुवे और चाचा को बोलकर अभिषेक के साथ अपने घर के लिए निकल पड़ा।


इसके आगे की कहानी अगले भाग में।

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I love Fantasy and Sci-fiction story.
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तीसरा भाग


अभिषेक के पापा मुझे बहुत मानते थे। उनके लिए मैं और अभिषेक उनके बेटे जैसे थे, लेकिन अभिषेक की मम्मी को इसी बात से गुस्सा था कि वो मुझ जैसे निम्न माध्यम वर्ग के लड़के को इतना स्नेह क्यों करते हैं। इसका कारण ये था कि अभिषेक की मम्मी एक उच्च वर्गीय परिवार से संबंध रखती थी और अधिकतर अमीर लोगों का दिल और भावनाए बहुत संकीर्ण होती हैं।

उन्होंने अभिषेक से भी कई बार कहा था कि अभिषेक का मेरे साथ दोस्ती में अभिषेक का कोई लाभ नहीं है। लेकिन अभिषेक उनकी बात कभी नहीं मानी। यही कारण था कि वो मुझको बिल्कुल पसंद नहीं करती थी। अभिषेक के पापा की वजह से वो खुलकर कभी ये बात बोल नहीं पाती थी, क्योंकि अभिषेक के पापा थोड़ा सख्त मिज़ाज़ के थे और तुरंत ही प्रतिक्रिया दे देते थे। अभिषेक ने कई बात मुझे ये बात बताई जब कभी उसका मूड खराब होता था। मुझे ये जानकर बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता था, लेकिन मैं चाचा और अभिषेक के लिए उनके घर चला जाता था।

बहरहाल मैं और अभिषेक उनसे अनुमति लेकर मेरे घर जाने के लिए निकल आए थे। वो भी अपनी साईकिल बाहर निकाल लाया। वैसे अभिषेक के घर में दो बाइक थी। उसे कहीं भी जाना होता तो वो बाइक से ही जाता था, लेकिन जब मेरे साथ चलना होता था तो हमेशा साईकल से ही चलता था। स्कूल भी वो साइकिल से ही आता था।

जब मैंने उसे साईकल निकालते देखा तो मैंने उससे कहा।

मैं- साईकल क्यों बाहर निकाल रहा है। आ जा इसी से दोनों लोग चलते हैं। बहुत मज़ा आएगा।

अभिषेक- फिर मैं वापस कैसे आऊंगा।

मैं- वैसे भी आज तू वापस आ नहीं पाएगा। पापा और काजल तुझे आने ही नहीं देंगे। मैं तुझे कल छोड़ दूंगा घर। चल अब जल्दी कर नहीं तो रात हो जाएगी।

फिर मैं साईकल चलाने लगा और अभिषेक उछलकर आगे डंडे पर बैठ गया। फिर हम दोनो बातचीत करते हुए आने लगे। 2 किलोमीटर तक साईकिल चलाने के बाद मैंने अभिषेक से साईकिल चलाने के लिए कहा। अभिषेक साईकिल चलाने लगा। मैं डंडे पर बैठ गया और एक पांव से पैडिल पर मारने लगा जिससे साइकिल की गति तेज हो गई।

मेरे घर से 500 मीटर पहले ही एक छोटा सा बाजार पड़ता है। जो हफ्ते में 3 दिन लगता है। उस दिन बाजार था तो वहां पर गोलगप्पे और टिकिया का ठेला लगा हुआ था। अभिषेक ने साईकिल रोक दी और बोला।

अभिषेक- देख भाई। मुझे तो तलब हो रही है गोलगप्पे खाने ने। तुझे भी खाना है तो आ जा।

मैं- अबे तुझे लड़कियों वाली आदत कब से पड़ गई।

अभिषेक- लड़कियों वाली आदत मतलब। तू कहना क्या चाहता है।

मैं- मतलब ये कि उन्हें ही गोलगप्पे ज्यादा पसंद होते हैं। देखता नहीं गोलगप्पे (गुपचुप, फुलकी) की दुकान पर कितनी भीड़ होती है लड़कियों की। चाहे वो खाना खा कर ही घर से निकलें, लेकिन अगर गोलगप्पे का ठेला दिख गया तो उनको फिर भूख लग जाती है। तेरा हाल भी उसी तरह है।

अभिषेक- देख भाई। पहली बात ये कि मैं कोई खाना वाना खा कर नहीं निकला हूँ। और दूसरी बात जब भूख लगती है तो कुछ भी अच्छा दिखे तो खाने में लड़का, लड़की नहीं देखा जाता। अरे मैं तुझसे बात ही क्यों कर रहा हूँ। तुझे खाना है तो आ नहीं तो मैं जा रहा हूं। साला तुझे भाषण देने के चक्कर में भूख और तेज़ हो गई है।

इतना कहकर अभिषेक गोलगप्पे के ठेले के पास पहुँच गया। वहाँ कुछ लड़कियां पहले ही गोलगप्पे खा रही थी। अभिषेक जाकर उनके बगल खड़ा हो गया। मैं भी मन मारकर ठेले के पास पहुँच गया।

अब यहां पर अभिषेक की हालत देखने लायक थी। जब लड़की गोलगप्पा उठती और अपने मुंह में डालती तो अभिषेक इस दौरान हुई उनको पूरी क्रिया को देखता और अपने होंठों पर जीभ फिरता। जब उसने दो चार बार ऐसा किया तो मैंने उससे कहा।

मैं- क्या कर रहा है यार तू। कहीं बीच बाजार मरवा न देना तुम।

अभिषेक- मैं क्या करूँ यार। बहुत भूख लगी है और मुंह में पानी आ रहा है और ये लड़कियाँ पता नहीं कितने जन्मों की भूखी हैं कि खाये ही जा रही हैं। जिनको नज़र नहीं आ रहा है कि दो शरीफ लड़के कब से गोलगप्पे खाने के लिए खड़े हैं।

मैं- मैंने तुझसे पहले ही कहा था कि लड़कियों का मनपसंद होता है गोलगप्पा। चल कहीं और चलते हैं कुछ और खाते हैं।

अभिषेक मेरी बात अनसुना कर दिया और कुछ देर इंतज़ार करने के बाद आखिरकार वो बोल ही पड़ा।

अभिषेक- लगता है तुम लोग कई दिन की भूखी प्यासी हो। कब से देख रहा हूँ गोलगप्पे खाए पड़ी हो। मुझे लगता है पूरा ठेला खाकर ही मानोगी तुम लोग।

अभिषेक की बात सुनकर उन लड़कियों ने उसे घूरकर देखा तो अभिषेक अपने दांत निकालकर हंसने लगा। आखिरकार वो लड़कियाँ गोलगप्पे खाकर चली गई। उनके जाने के बाद मैंने अभिषेक से कहा।

मैं- साले तू एक दिन बहुत पिटेगा। तुझे कितनी बार मना किया है कि ऐसे कोई भी बात मत बोला कर खासकर लड़कियों को, लेकिन तू है कि मेरी बात सुनता ही नहीं। जब मार पड़ेगी तो मुझसे मत कहना कि मैंने तुझे आगाह नहीं किया।

अभिषेक- कुछ नहीं होगा यार। कौन सा मैं उनको छेड़ रहा था। मैं तो बस कम खाने के लिए बोल रहा था। अच्छा अब ज्यादा बातें नहीं। गोलगप्पे वाले भैया। हमे भी गोलगप्पे खिलाइए।


फिर शुरू हुआ गोलगप्पे खाने का सिलसिला जो जाकर 70 ₹ पर खत्म हुआ। जिसमें से 10 ₹ का गोलगप्पा मैंने खाया था बाकी के 60 ₹ का गोलगप्पा अभिषेक ने खाया था। उसने गोलगप्पे खाकर एक लंबी डकार ली और अपने हाथ अपनी शर्ट में पोछ कर मुझसे बोला।

अभिषेक- हां। अब लग रहा है कि पेट में कुछ गया है।

मैं- कुछ गया है। भुक्खड़, अगर कुछ देर और खाता तो उसका पूरा ठेला खा डालता तू। कोई इतना खाता है क्या, ऐसा लग रहा था जैसे जन्मों का भूखा है तू।

अभिषेक- जब भूख लगी थी तो क्या करूँ मैं। अब ज्यादा बकचोदी मत कर। तुझे तो मेरे हर चीज से परेशानी है। अब जल्दी से पैसे दे और घर चल। आज कुछ अच्छा बनवाऊंगा खाने के लिए चाची से।

मैं- तू सच में पेटू है। अभी भी तेरा पेट नहीं भरा।

मैंने ये बात मुस्कुराते हुए बोली थी जिसे सुनकर क़र अभिषेक भी मुस्कुराने लगा। फिर मैं गोलगप्पे वाले को पैसे देकर वहां से चल दिया। बाजार पर होने पर मैं साईकिल की सीट पर बैठ गया और साईकिल आगे बढ़ा दी। अभिषेक उछलकर आगे डंडे पर बैठा तभी एक धमाका हुआ।

धड़ाम...... फुस्स सससससस....

उसके उछलकर बैठने से साईकिल का टायर पंचर हो गया। (वैसे टायर पंचर नहीं होता पंचर तो ट्यूब होती है, लेकिन गांव में इसे टायर पंचर ही बोलते हैं) और साईकिल तुरन्त रुक गई। मैं साईकिल स्टैंड पर खड़ीकर अगला टायर देखा तो वो फट गया था। मैं अभिषेक को देखने लगा। वो भी मुझे देख रहा था। मैंने उससे कहा।

मैं- ये सब तेरी वजह से ही हुआ है।

अभिषेक- मेरी वजह से? मैंने क्या किया है।

मैं- तुझे ही बड़ी भूख लगी थी न। और खाया भी तो कितना ठूंस ठूंस कर। फिर भी तेरा पेट नहीं भरा। अभी और खाने की बात कर रहा है। ना तू इतना ज्यादा खाता, न तेरा वजन बढ़ता और न ही टायर पंचर होता।

अभिषेक- देख नयन। अब कुछ ज्यादा ही बोल रहा है तू। मेरे गोलगप्पे खाने से कुछ नहीं हुआ समझे। ये तो टायर कमजोर था साइकिल का। इसलिए फट गया। और इसके लिए तू मुझे मत बोल। अपने आप को देख मुझसे ज्यादा वजन तो तेरा है।

उसकी बात सुनकर मैं चुप हो गया। क्योंकि उसने बात एकदम सही बोली थी। मेरा वजन उससे 2-4 किलो ज्यादा ही था। फिर हम दोनों बात करते हुए पैदल ही साईकिल को घसीटते हुए अपने घर की तरफ चल दिये। जब मैं घर पहुँचा तो पापा और काजल दुआर(घर के सामने की खाली जगह) में चारपाई/खटिया डाले बैठे हुए मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। अभिषेक तुरंत जाकर पापा के पांव छू लिया और खटिया पर बैठ गया। उसे देखकर काजल ने कहा।

काजल- भैया आज आपका भी परिणाम आया होगा न। क्या हुआ बताओ न।

अभिषेक- वो सब बाद में बताऊंगा। पहले ये मिठाई खा और ये कपड़े रख जो पापा ने तेरे लिए भेजे हैं।

इतना कहकर अभिषेक ने मिठाई का डिब्बा, जो वह घर से लाया था निकालकर काजल को दे दिया साथ में कपड़े का बैग भी दे दिया तब तक मैं भी आकर पापा के पांव स्पर्श किया और उनकी बगल में बैठ गया। अभिषेक ने कहा।

अभिषेक- आपको पता है चाचा जी। मैं और नयन दोनों प्रथम श्रेणी में पास हुए हैं। अभी तक अंक नहीं देखा है। वो आपके सामने देखेंगे।

तबतक मेरी अम्मा भी घर से बाहर आ गई। पापा ने उन्हें देखते हुए कहा।

पापा- अरे सुनती हो भाग्यवान। दोनों बच्चे प्रथम श्रेणी में पास हुए हैं। जाओ इनके खाने लिए मैंने जो जलेबी लाई है उसे ले आओ।

अभिषेक- अरे वाह चाचा जी। आपने बहुत अच्छा किया। मेरे मुंह में पानी आ गया। जल्दी लेकर आइये चाची जी।

मैं- तू कितना बड़ा पेटू है अभिषेक। तेरे मुंह में तो हर खाने वाली चीज को देखकर पानी आ जाता है। अभी आधे घंटे पहले भरपेट गोलगप्पे खाकर आ रहा है। और फिर से तुझे भूख लग गई।


अभिषेक- इतनी दूर पैदल चलवाया तुमने। जो खाया था वो पच गया सब। अब पेट खाली हो गया है तो भूख तो लगेगी ही न और हां चाची जी। आज हम दोनों के पास होने की खुशी में कुछ अच्छा सा बनाइये खाने के लिए।

मम्मी- हां क्यों नहीं मेरे बच्चे पास हुए हैं।

उसके बाद मां एक थाली में जलेबी निकाल कर ले आई। हम सब मिलकर जलेबी खाने लगे और इधर उधर की बातें करने लगे। बातों बातों में मैंने सबको आधे घंटे पहले बाजार वाली कहानी बता दी कि कैसे अभिषेक ने गोलगप्पे खाते हुए लड़कियों को देख रहा था और कैसे इसके मुंह में पानी आ रहा था और कैसे साईकिल पंचर हो गई वगैरह वगैरह। जिसे सुनकर सब हंसने लगे।

इसके आगे की कहानी अगले भाग में।

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तीसरा भाग


अभिषेक के पापा मुझे बहुत मानते थे। उनके लिए मैं और अभिषेक उनके बेटे जैसे थे, लेकिन अभिषेक की मम्मी को इसी बात से गुस्सा था कि वो मुझ जैसे निम्न माध्यम वर्ग के लड़के को इतना स्नेह क्यों करते हैं। इसका कारण ये था कि अभिषेक की मम्मी एक उच्च वर्गीय परिवार से संबंध रखती थी और अधिकतर अमीर लोगों का दिल और भावनाए बहुत संकीर्ण होती हैं।

उन्होंने अभिषेक से भी कई बार कहा था कि अभिषेक का मेरे साथ दोस्ती में अभिषेक का कोई लाभ नहीं है। लेकिन अभिषेक उनकी बात कभी नहीं मानी। यही कारण था कि वो मुझको बिल्कुल पसंद नहीं करती थी। अभिषेक के पापा की वजह से वो खुलकर कभी ये बात बोल नहीं पाती थी, क्योंकि अभिषेक के पापा थोड़ा सख्त मिज़ाज़ के थे और तुरंत ही प्रतिक्रिया दे देते थे। अभिषेक ने कई बात मुझे ये बात बताई जब कभी उसका मूड खराब होता था। मुझे ये जानकर बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता था, लेकिन मैं चाचा और अभिषेक के लिए उनके घर चला जाता था।

बहरहाल मैं और अभिषेक उनसे अनुमति लेकर मेरे घर जाने के लिए निकल आए थे। वो भी अपनी साईकिल बाहर निकाल लाया। वैसे अभिषेक के घर में दो बाइक थी। उसे कहीं भी जाना होता तो वो बाइक से ही जाता था, लेकिन जब मेरे साथ चलना होता था तो हमेशा साईकल से ही चलता था। स्कूल भी वो साइकिल से ही आता था।

जब मैंने उसे साईकल निकालते देखा तो मैंने उससे कहा।

मैं- साईकल क्यों बाहर निकाल रहा है। आ जा इसी से दोनों लोग चलते हैं। बहुत मज़ा आएगा।

अभिषेक- फिर मैं वापस कैसे आऊंगा।

मैं- वैसे भी आज तू वापस आ नहीं पाएगा। पापा और काजल तुझे आने ही नहीं देंगे। मैं तुझे कल छोड़ दूंगा घर। चल अब जल्दी कर नहीं तो रात हो जाएगी।

फिर मैं साईकल चलाने लगा और अभिषेक उछलकर आगे डंडे पर बैठ गया। फिर हम दोनो बातचीत करते हुए आने लगे। 2 किलोमीटर तक साईकिल चलाने के बाद मैंने अभिषेक से साईकिल चलाने के लिए कहा। अभिषेक साईकिल चलाने लगा। मैं डंडे पर बैठ गया और एक पांव से पैडिल पर मारने लगा जिससे साइकिल की गति तेज हो गई।

मेरे घर से 500 मीटर पहले ही एक छोटा सा बाजार पड़ता है। जो हफ्ते में 3 दिन लगता है। उस दिन बाजार था तो वहां पर गोलगप्पे और टिकिया का ठेला लगा हुआ था। अभिषेक ने साईकिल रोक दी और बोला।

अभिषेक- देख भाई। मुझे तो तलब हो रही है गोलगप्पे खाने ने। तुझे भी खाना है तो आ जा।

मैं- अबे तुझे लड़कियों वाली आदत कब से पड़ गई।

अभिषेक- लड़कियों वाली आदत मतलब। तू कहना क्या चाहता है।

मैं- मतलब ये कि उन्हें ही गोलगप्पे ज्यादा पसंद होते हैं। देखता नहीं गोलगप्पे (गुपचुप, फुलकी) की दुकान पर कितनी भीड़ होती है लड़कियों की। चाहे वो खाना खा कर ही घर से निकलें, लेकिन अगर गोलगप्पे का ठेला दिख गया तो उनको फिर भूख लग जाती है। तेरा हाल भी उसी तरह है।

अभिषेक- देख भाई। पहली बात ये कि मैं कोई खाना वाना खा कर नहीं निकला हूँ। और दूसरी बात जब भूख लगती है तो कुछ भी अच्छा दिखे तो खाने में लड़का, लड़की नहीं देखा जाता। अरे मैं तुझसे बात ही क्यों कर रहा हूँ। तुझे खाना है तो आ नहीं तो मैं जा रहा हूं। साला तुझे भाषण देने के चक्कर में भूख और तेज़ हो गई है।

इतना कहकर अभिषेक गोलगप्पे के ठेले के पास पहुँच गया। वहाँ कुछ लड़कियां पहले ही गोलगप्पे खा रही थी। अभिषेक जाकर उनके बगल खड़ा हो गया। मैं भी मन मारकर ठेले के पास पहुँच गया।

अब यहां पर अभिषेक की हालत देखने लायक थी। जब लड़की गोलगप्पा उठती और अपने मुंह में डालती तो अभिषेक इस दौरान हुई उनको पूरी क्रिया को देखता और अपने होंठों पर जीभ फिरता। जब उसने दो चार बार ऐसा किया तो मैंने उससे कहा।

मैं- क्या कर रहा है यार तू। कहीं बीच बाजार मरवा न देना तुम।

अभिषेक- मैं क्या करूँ यार। बहुत भूख लगी है और मुंह में पानी आ रहा है और ये लड़कियाँ पता नहीं कितने जन्मों की भूखी हैं कि खाये ही जा रही हैं। जिनको नज़र नहीं आ रहा है कि दो शरीफ लड़के कब से गोलगप्पे खाने के लिए खड़े हैं।

मैं- मैंने तुझसे पहले ही कहा था कि लड़कियों का मनपसंद होता है गोलगप्पा। चल कहीं और चलते हैं कुछ और खाते हैं।

अभिषेक मेरी बात अनसुना कर दिया और कुछ देर इंतज़ार करने के बाद आखिरकार वो बोल ही पड़ा।

अभिषेक- लगता है तुम लोग कई दिन की भूखी प्यासी हो। कब से देख रहा हूँ गोलगप्पे खाए पड़ी हो। मुझे लगता है पूरा ठेला खाकर ही मानोगी तुम लोग।

अभिषेक की बात सुनकर उन लड़कियों ने उसे घूरकर देखा तो अभिषेक अपने दांत निकालकर हंसने लगा। आखिरकार वो लड़कियाँ गोलगप्पे खाकर चली गई। उनके जाने के बाद मैंने अभिषेक से कहा।

मैं- साले तू एक दिन बहुत पिटेगा। तुझे कितनी बार मना किया है कि ऐसे कोई भी बात मत बोला कर खासकर लड़कियों को, लेकिन तू है कि मेरी बात सुनता ही नहीं। जब मार पड़ेगी तो मुझसे मत कहना कि मैंने तुझे आगाह नहीं किया।

अभिषेक- कुछ नहीं होगा यार। कौन सा मैं उनको छेड़ रहा था। मैं तो बस कम खाने के लिए बोल रहा था। अच्छा अब ज्यादा बातें नहीं। गोलगप्पे वाले भैया। हमे भी गोलगप्पे खिलाइए।


फिर शुरू हुआ गोलगप्पे खाने का सिलसिला जो जाकर 70 ₹ पर खत्म हुआ। जिसमें से 10 ₹ का गोलगप्पा मैंने खाया था बाकी के 60 ₹ का गोलगप्पा अभिषेक ने खाया था। उसने गोलगप्पे खाकर एक लंबी डकार ली और अपने हाथ अपनी शर्ट में पोछ कर मुझसे बोला।

अभिषेक- हां। अब लग रहा है कि पेट में कुछ गया है।

मैं- कुछ गया है। भुक्खड़, अगर कुछ देर और खाता तो उसका पूरा ठेला खा डालता तू। कोई इतना खाता है क्या, ऐसा लग रहा था जैसे जन्मों का भूखा है तू।

अभिषेक- जब भूख लगी थी तो क्या करूँ मैं। अब ज्यादा बकचोदी मत कर। तुझे तो मेरे हर चीज से परेशानी है। अब जल्दी से पैसे दे और घर चल। आज कुछ अच्छा बनवाऊंगा खाने के लिए चाची से।

मैं- तू सच में पेटू है। अभी भी तेरा पेट नहीं भरा।

मैंने ये बात मुस्कुराते हुए बोली थी जिसे सुनकर क़र अभिषेक भी मुस्कुराने लगा। फिर मैं गोलगप्पे वाले को पैसे देकर वहां से चल दिया। बाजार पर होने पर मैं साईकिल की सीट पर बैठ गया और साईकिल आगे बढ़ा दी। अभिषेक उछलकर आगे डंडे पर बैठा तभी एक धमाका हुआ।

धड़ाम...... फुस्स सससससस....

उसके उछलकर बैठने से साईकिल का टायर पंचर हो गया। (वैसे टायर पंचर नहीं होता पंचर तो ट्यूब होती है, लेकिन गांव में इसे टायर पंचर ही बोलते हैं) और साईकिल तुरन्त रुक गई। मैं साईकिल स्टैंड पर खड़ीकर अगला टायर देखा तो वो फट गया था। मैं अभिषेक को देखने लगा। वो भी मुझे देख रहा था। मैंने उससे कहा।

मैं- ये सब तेरी वजह से ही हुआ है।

अभिषेक- मेरी वजह से? मैंने क्या किया है।

मैं- तुझे ही बड़ी भूख लगी थी न। और खाया भी तो कितना ठूंस ठूंस कर। फिर भी तेरा पेट नहीं भरा। अभी और खाने की बात कर रहा है। ना तू इतना ज्यादा खाता, न तेरा वजन बढ़ता और न ही टायर पंचर होता।

अभिषेक- देख नयन। अब कुछ ज्यादा ही बोल रहा है तू। मेरे गोलगप्पे खाने से कुछ नहीं हुआ समझे। ये तो टायर कमजोर था साइकिल का। इसलिए फट गया। और इसके लिए तू मुझे मत बोल। अपने आप को देख मुझसे ज्यादा वजन तो तेरा है।

उसकी बात सुनकर मैं चुप हो गया। क्योंकि उसने बात एकदम सही बोली थी। मेरा वजन उससे 2-4 किलो ज्यादा ही था। फिर हम दोनों बात करते हुए पैदल ही साईकिल को घसीटते हुए अपने घर की तरफ चल दिये। जब मैं घर पहुँचा तो पापा और काजल दुआर(घर के सामने की खाली जगह) में चारपाई/खटिया डाले बैठे हुए मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। अभिषेक तुरंत जाकर पापा के पांव छू लिया और खटिया पर बैठ गया। उसे देखकर काजल ने कहा।

काजल- भैया आज आपका भी परिणाम आया होगा न। क्या हुआ बताओ न।

अभिषेक- वो सब बाद में बताऊंगा। पहले ये मिठाई खा और ये कपड़े रख जो पापा ने तेरे लिए भेजे हैं।

इतना कहकर अभिषेक ने मिठाई का डिब्बा, जो वह घर से लाया था निकालकर काजल को दे दिया साथ में कपड़े का बैग भी दे दिया तब तक मैं भी आकर पापा के पांव स्पर्श किया और उनकी बगल में बैठ गया। अभिषेक ने कहा।

अभिषेक- आपको पता है चाचा जी। मैं और नयन दोनों प्रथम श्रेणी में पास हुए हैं। अभी तक अंक नहीं देखा है। वो आपके सामने देखेंगे।

तबतक मेरी अम्मा भी घर से बाहर आ गई। पापा ने उन्हें देखते हुए कहा।

पापा- अरे सुनती हो भाग्यवान। दोनों बच्चे प्रथम श्रेणी में पास हुए हैं। जाओ इनके खाने लिए मैंने जो जलेबी लाई है उसे ले आओ।

अभिषेक- अरे वाह चाचा जी। आपने बहुत अच्छा किया। मेरे मुंह में पानी आ गया। जल्दी लेकर आइये चाची जी।

मैं- तू कितना बड़ा पेटू है अभिषेक। तेरे मुंह में तो हर खाने वाली चीज को देखकर पानी आ जाता है। अभी आधे घंटे पहले भरपेट गोलगप्पे खाकर आ रहा है। और फिर से तुझे भूख लग गई।


अभिषेक- इतनी दूर पैदल चलवाया तुमने। जो खाया था वो पच गया सब। अब पेट खाली हो गया है तो भूख तो लगेगी ही न और हां चाची जी। आज हम दोनों के पास होने की खुशी में कुछ अच्छा सा बनाइये खाने के लिए।

मम्मी- हां क्यों नहीं मेरे बच्चे पास हुए हैं।

उसके बाद मां एक थाली में जलेबी निकाल कर ले आई। हम सब मिलकर जलेबी खाने लगे और इधर उधर की बातें करने लगे। बातों बातों में मैंने सबको आधे घंटे पहले बाजार वाली कहानी बता दी कि कैसे अभिषेक ने गोलगप्पे खाते हुए लड़कियों को देख रहा था और कैसे इसके मुंह में पानी आ रहा था और कैसे साईकिल पंचर हो गई वगैरह वगैरह। जिसे सुनकर सब हंसने लगे।

इसके आगे की कहानी अगले भाग में।
Nice and superb update..
 
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