कहानी कुछ चुनी हुयी घटनाओं को एक फ्रेम में एक चौखटे में रखती हैं जैसे हम कोई नाटक या फिल्म देखते हैं और हर पात्र कहानी के कथ्य को आगे बढ़ाते हैं उसे एक दिशा देते हैं या एक रिचनेस लाते हैं, और बहुत से पात्र जो शायद हो सकते हैं तो भी नहीं होते, तो मेरी कहानी में भी एक लम्बी कहानी में जो मूल कथ्य या उससे जुडी हुयी छोटी छोटी उप कथाएं ( लम्बी कहानियों में जैसे फागुन के दिन चार या जोरू का गुलाम या मोहे रंग दे में ) वही चरित्र मैं जोड़ना चाहती हूँ जिनके साथ मैं न्याय कर पाऊं, जो भले ही थोड़ी देर के लिए आएं पर वह एक कटआउट या पोस्टकार्ड थिन कैरेक्टर न लगे
और वैसे भी मैं मूल रूप से स्त्री प्रधान कहनियां लिखती हूँ और वैसे परिवेश में जहाँ ज्यादातर कहानियां पुरुष परिप्रेक्ष्य में लिखी जा रही हों यह कुछ गड़बड़ मुझे नहीं लगता की एक दो कहानी महिलाओं के प्वाइंट आफ व्यू से हैं हालाकिं कुछ पाठक असहज हो सकता है महसूस करते हों
मैंने फागुन के दिन चार को पुरुष नैरेटर के द्वारा लिखने की कोशिश की पर मेरी कलम पर मेरा ज्यादा जोर नहीं चलता और उस कहानी में भी स्त्री पात्र कहानी में भारी पड़े, चाहे रीत हो या बाकी,...
और जहाँ तक इस कहानी का सवाल है बस मैं यही कहूंगी की कहानी के साथ बने रहिये अगले कुछ भागों के बाद अगर फिर से यह सवाल उठेगा तो मैं जरूर चर्चा करुँगी