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Erotica फागुन के दिन चार

komaalrani

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भाग ११७ - बुच्ची, इस्तेमाल के बाद

कुल १४,००० से अधिक शब्द, आठ पोस्ट्स

५० से अधिक चित्र,
बुच्ची --


Buccchi-6-download.jpg



भैया से मिलन के बाद


Bucchi-4-stairs-download-2.jpg





कोई दूर से भी देख के कह सकता है, ये छोरी चोदी नहीं गयी है कचरी गयी है और वो भी कस के।


एरोटिक भी

बुच्ची की चूत में अभी भी जैसे कोई मोटा लकड़ी का लंड घुसा हुआ हो, हर कदम पर चीख निकल रही थी। झिल्ली फटने वाली जगह पर भैया ने बार-बार अपना मोटा लंड रगड़ा था, अब वो जगह लाल होकर अच्छे से छिल गई थी। बुच्ची चल नहीं पा रही थी, जाँघें रगड़ती हुई लंगड़ाती चल रही थी। बार-बार रोते हुए बोली,

"कमीनी स्साली... रुक जा न... मेरी चूत फट गई है...!"
हलके गुनगुने पानी में भीगी तौलिये से उसने चार पांच बार बुच्ची की ताज़ी फ़टी बुर की सेंकाई की,


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और उसी के साथ उस की पहली चुदाई की दो दो बार पूरे डिटेल में न सिर्फ दास्तान सुनी बल्कि अपनी बात भी मनवा ली।

" यार सुन, मेरी पांच दिन की छुट्टी शरू हो गयी है और मेरे सब यार एकदम पागल हो गए हैं, कुछ कर न, अब तो तेरे भाई ने इत्ती कस के तेरी कुटाई कर दी है, तू आराम से अब घोंट लेगी मेरी बिन्नो। मेरी अच्छी बुच्ची मान जा न, देख सब इत्तेदिन से तेरे पीछे पड़े हैं और अब इतना निहोरा कर रहे हैं, अच्छा वो जो झूले पे हम सब के साथ था जो ऊपर से नीचे वाले झूले पे, याद है या भूल गयी ? " शीला ने पूछा



रोमांटिक भी




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रात शुरू हो चुकी थी। हल्की चाँदनी आम के पेड़ों की फुनगियों से छन-छन कर नीचे बिखर रही थी, जैसे कोई रहस्यमयी जादू जमीन पर उतर रहा हो।

बुच्ची का रास्ता भले ही पुराना था, पर आज उसका दिल अनजाने में तेजी से धड़क रहा था। वो आँख बंद करके भी घर पहुँच सकती थी, लेकिन आज आँखें बंद करने की नौबत खुद आ गई।

अचानक दो गर्म हथेलियाँ पीछे से आईं और उसकी दोनों आँखों को नरमी से ढक लिया।

बुच्ची की सांस एक पल को थम सी गई। उसका पूरा शरीर हल्का सा काँप उठा। पीछे से एक गहरी, परिचित और थोड़ी काँपती हुई आवाज आई —

"पहचान कौन?"

बुच्ची के होंठों पर एक प्यारी-सी मुस्कान खिल गई। दिल में एक मीठी-सी लहर दौड़ गई। वो जानती थी। उस छुअन को, उस गर्मी को, उस स्पर्श की लालसा को वो हजारों में भी पहचान लेती।

गप्पू...

साल भर से वो दोनों एक-दूसरे को चुपके-चुपके तड़पा रहे थे। नज़रों से, मुस्कानों से, छोटी-छोटी छेड़छाड़ से। आज वो तड़पन अब और सहन नहीं हो रही थी।

गप्पू का सीना धीरे-धीरे उसकी पीठ से सट गया। उसकी गर्म सांस बुच्ची की गर्दन पर पड़ रही थी, जिससे उसके बदन में मीठी-मीठी सिहरन दौड़ रही थी। बुच्ची ने धीरे से पीछे हटकर खुद को उसके सीने से और लिपटा लिया।

"छोड़ न..." उसने बहुत नरम, लगभग फुसफुसाती हुई आवाज में कहा। उसकी आवाज में शरारत थी, लेकिन साथ ही एक गहरी चाहत भी।


और नाच गाने वाले भी, लोकगीत भी



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रीना और मीना के पास बन्ना बन्नी के गीतों का खजाना था लेकिन अब उन्होंने एक मस्ती वाला शादी का गाना शुरू किया जैसे वो आने वाली नयी दुलहिनिया की ओर से कुछ कह रही हों

टमाटर जैसे गाल बन्ना छूने न दूँगी, बन्ना छूने न दूँगी, छूने न दूँगी,


टमाटर जैसे गाल बन्ना छूने न दूँगी, टमाटर जैसे गाल बन्ना छूने न दूँगी।

थाली भरी है बन्ना खाने न दूँगी, थाली भरी है बन्ना खाने न दूँगी।

सासु रानी के पास बन्ना जाने न दूँगी, सासु रानी के पास बन्ना जाने न दूँगी।


छुटकी - होली दीदी की ससुराल में पृष्ठ १२१९



please read, like and comment . looking for your views and comments.
 
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motaalund

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वाह क्या बात है कोमल मैम !!!!

आपको इतना याद रहा वो भी इतने सारे कमेंट्स में !!!

आपकी स्मरण शक्ति विलक्षण है वस्तुतः आपका संपूर्ण व्यक्तित्व ही अद्वितीय है चाहे आपकी लेखनी हो, आपका विभिन्न विधाओं पर अधिकार, विषयवस्तु पर पकड़ आदि - आदि।

आपका हार्दिक आभार


सादर
पाठकों के कमेंट... और उन कमेंट्स को याद रखते हुए उनका कहानी में समावेश...
सचमुच विलक्षण प्रतिभा है...
 

motaalund

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Wonderful update madam...the conversation between Reet and Anand Babu was really free flowing...the references to PC Sarkar and Sherlock Holmes was outstanding...
but more importantly, where you really excel is in finding such gems (pics) which are rare to find. I am sure, it takes a lot of effort on your part to search for those pics..it truly is magnificent.

Great work!!

komaalrani
कहानी के परिवर्धित संस्करण में इतनी उद्यम के लिए कोमल जी को सादर नमन...
 

motaalund

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" रीत की रीत , रीत ही जाने " बिल्कुल ठीक कहा आपने । इस लड़की की इंटेलिजेंसी , इसकी वाक - चातुर्यता , बाल मे से भी खाल निकाल लेने की कुशलता इन्हे विशिष्ट और बाकी लड़कियों से अलग बनाती है ।
शेरलाॅक होम्स की तरह उन्होने जिस तरह से ' जल कहां थी ' की तहकीकात करी और फिर ठोस - तरल - गैस का पाठ पढ़ाई वह वास्तव मे अद्भुत था ।
लेकिन सबसे अधिक आश्चर्यचकित किया उन्होने प्रसिद्ध फिल्मकार सत्यजीत रे साहब की फिल्मों का जिक्र करके ।
आजकल के नौजवान बल्कि यूं कहूं सत्यजीत रे साहब के होम स्टेट ' बंगाल ' के भी नौजवान इनके अविश्वसनीय प्रतिभा से अनभिज्ञ हैं ।
इन्होने अपनी पहली फिल्म ' पथेर पांचाली ' से ही दुनियाभर मे ख्याति अर्जित कर ली थी । लेकिन इन्हें आलोचनात्मक प्रशंसा भी झेलनी पड़ी थी । इन पर आरोप था कि वो भारतीय गरीबी का निर्यात करने वाले फिल्म निर्देशक है ।
मुझे याद है जब इन्हें 1992 मे आस्कर का विशेष पुरस्कार " मानद अकादमी पुरस्कार " प्राप्त हुआ था । इनसे पहले यह पुरस्कार सिर्फ पांच व्यक्ति को मिला था जिनमे एक सर्वश्रेष्ठ अदाकार चार्ल चैप्लिन साहब थे ।
इसी से आप सत्यजीत रे साहब की योग्यता का आकलन कर सकते है ।
इनकी फिल्म मे सबसे अधिक काम उस वक्त के सबसे महान और सबसे प्रतिभाशाली अभिनेताओं मे से एक सौमेन मित्र साहब ने किया था ।
उत्पल दत्त साहब के बारे मे क्या ही कहा जाए ! सत्यजीत रे साहब ने इनकी भूरी भूरी प्रशंसा की थी ।
उत्पल दत्त साहब की काॅमिक टाइमिंग गजब की थी । ऐसा लगता था जैसे उत्पल दत्त साहब एक्टिंग नही बल्कि नेचुरल लाइफ फिल्मों मे जी रहे थे ।

बंगाली फिल्म इंडस्ट्रीज मे , खासकर बंगाली लेंग्वेज फिल्म मे सत्यजीत रे साहब , सौमेन मित्र साहब , उत्पल दत्त साहब , उतम कुमार साहब , सुचित्रा सेन जी का योगदान सबसे अधिक है ।


खैर , रीत मैडम के साथ साथ आनंद भाई साहब भी सत्यजीत रे के बिग प्रशंसक निकले । इसके साथ दोनो का टेस्ट डांसिंग पर भी एक समान है ।

कहीं रीत की माया मे आनंद साहब नई रीत न अपना ले !
इस रीत के चक्कर मे कहीं अपना प्रीत न गंवा बैठे !

वैसे अपडेट मे महान जादूगर ' गोगियापाशा ' और ' पी सी सरकार जूनियर का जिक्र भी आया था । आधुनिक जादूगरी के दुनिया मे जहां तक मुझे याद है , गोगियापाशा का नाम सबसे पहले आता है जिन्होंने एक अमेरिकन एयरपोर्ट को ही अदृश्य कर दिया था । इसके बाद पी सी सरकार का नाम आता है जिन्होंने एक बार शिप पर स्वयं को लोहे के जंजीर से बंधवा कर फिर खुद को एक बक्से मे बंद कर समुद्र मे फेंकवा दिया था ।

इस स्टोरी मे बदलाव स्पष्ट नजर आ रहा है । GST का जिक्र उन दिनों दूर दूर तक नही था ।


बहुत ही खूबसूरत अपडेट कोमल जी ।
आउटस्टैंडिंग एंड अमेजिंग अपडेट ।
Guddi Sandhya aur reeT(GST) पहले भी थे...:haha::haha::haha::haha:
 

motaalund

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फेलू दा और कुछ और बातें



फेलुदा , या प्रोदोष चंद्र मित्रा [मित्तर] , भारतीय निर्देशक और लेखक सत्यजीत रे द्वारा निर्मित एक काल्पनिक जासूस , निजी अन्वेषक है । फेलुदा 21 रजनी सेन रोड, बालीगंज , कलकत्ता , पश्चिम बंगाल में रहते हैं । फेलुदा ने पहली बार 1965 में रे और सुभाष मुखोपाध्याय के संपादकीय में संदेश नामक बंगाली बच्चों की पत्रिका में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई । उनका पहला साहसिक कार्य फेलुदर गोएन्डागिरी था ।

फेलुदा के साथ अक्सर उनका चचेरा भाई, जो उनके सहायक भी है, तपेश रंजन मित्तर (फेलुदा उसे प्यार से टॉपशे कहते हैं) आता है, जो कहानियों में सुनाने का काम करता है।

छठी कहानी, सोनार केला (द गोल्डन फोर्ट्रेस) से, यह जोड़ी एक लोकप्रिय थ्रिलर लेखक जटायु (लालमोहन गांगुली) से जुड़ गई है।

फेलुदा को कई बार फिल्माया गया है, जिसमें सौमित्र चटर्जी , सब्यसाची चक्रवर्ती , अहमद रुबेल , शशि कपूर , अबीर चटर्जी , परमब्रत चटर्जी , टोटा रॉय चौधरी और इंद्रनील सेनगुप्ता ने किरदार निभाया है । सत्यजीत रे ने दो फेलुदा फिल्में निर्देशित कीं - सोनार केला (1974) और जोई बाबा फेलुनाथ (1978)।

फेलुदा का चरित्र शर्लक होम्स से मिलता जुलता है और तपेश/टॉपशे का चरित्र डॉ. वॉटसन से मिलता जुलता है । [ फेलुदा की कहानियों में, उन्हें शर्लक होम्स के एक बड़े प्रशंसक के रूप में प्रदर्शित किया गया है जिसका उल्लेख उन्होंने कई बार किया है।

मार्शल आर्ट में निपुण एक मजबूत शरीर वाले व्यक्ति होने के बावजूद , फेलुदा ज्यादातर इस पर निर्भर रहते हैं शारीरिक शक्ति या हथियारों का उपयोग करने के बजाय मामलों को हल करने के लिए उनकी शानदार विश्लेषणात्मक क्षमता और अवलोकन कौशल (मजाक में इसे मगजस्त्र या मस्तिष्क-हथियार कहा जाता है) वह मामलों को लेने के बारे में बहुत चयनात्मक हैं और उन मामलों को प्राथमिकता देते हैं जिनमें मस्तिष्क के प्रयास की आवश्यकता होती है।

लेकिन एक बात

फेलू दा का संबंध इस कहानी से और विशेष रूप से रीत से एक अलग ढंग से भी है पर वह अपने आप कहानी के साथ पता चल जाएगा।

मैं मानती हूँ की कहानी अपनी बात खुद कहती है और एक बार पोस्ट होने के बाद हर पाठक उसे अपने ढंग से पढ़ने, समझने के लिए आजाद है, लेकिन आप ऐसे पाठको से कथा शिल्प की बात, जिस तरह से मैंने लिखा वह कहना भी अनुचित नहीं

रीत सेंसुअस, सुन्दर वाक् पटु तो है ही लेकिन इस के इन भागों से उसके आबजर्वेंट होने का भी संकेत मिलता है,

दूसरी बात की एक घटना , ब्रेकफास्ट में ब्रेड रोल में मिर्चे और पानी वाला मामला शुरू में ( और है भी ) दो टीनेजर कन्याओं की छेड़खानी के तौर पर आता है, लेकिन उसी का विशेलषण रीत अपने ढंग से कर के अपने ऑबजर्वेंट होने को भी दिखाती है और आनंद बाबू इम्प्रेस हो जाते है।

लेकिन तीसरी बात है रीत के मन की गहराई जो इस प्रसंग के आखिरी पोस्ट में मिलती है जिसमें रीत की एक बात




'कल अब नहीं है, आनेवाला कल भी नहीं है, बस आज है, बल्कि अभी है, उसे ही मुट्ठी में बाँध लो, उसी का रस लो, यह पल बस, "



रीत के मन की गहराई का जीवन के प्रति उसके नजरिये को दिखता है और उसकी पुष्टि के लिए मैंने कबीर के एक पद ' मुर्दों का गाँव " और एक मशहूर होरी का सहारा लिया।

आनंद बाबू का रीत के प्रति दृष्टिकोण जो बना उसमें ये सभी बिंदु समाहित हैं

मैं मानती हूँ की कहानी मल्टी लेयर्ड होनी चाहिए, अलग अलग स्तरों पर मन को, मस्तिष्क को छुए, और चरित्र भी मल्टी डायमेंशनल होने चाहिए, हम लोग जो कहानी लिखते हैं उनकी यह जिम्मेदारी है की भले हम इरोटिका लिख रहे हैं लेकिन हम कथाकारों की एक लम्बी परम्परा की कड़ी है। और कहानी को कुछ कहना चाहिए, अपने पात्रों के जरिये, संवादों के जरिये।



इस कहानी के पाठक अभी कम है लेकिन मैं मानती हूँ कुछ पाठक ही हों जिन्हे कहानी में रूचि हो जिनसे कहानी के बारे में बातचीत की जा सके तो मेहनत वसूल हो जाती है।
बस इतना हीं कहना है कि....👌👌🙏🙏
 

motaalund

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इस पोस्ट के आखिरी हिस्से में ( भूतनाथ की मंगल होरी ) रीत ने जो ये बात कही

" कल अब नहीं है, आनेवाला कल भी नहीं है, बस आज है, बल्कि अभी है, उसे ही मुट्ठी में बाँध लो, उसी का रस लो, यह पल बस, "

उसी के संदर्भ में उसी हिस्से में कबीर की कुछ लाइने उद्धृत की गयी हैं,

" और अचानक कबीर की याद आ गयी,



साधो, राजा मरिहें, परजा मरिहें, मरिहें बैद और रोगी

चंदा मरिहें, सूरज मरिहें, मरिहें धरती और आकास

चौदह भुवन के चौधरी मरिहें, इनहु की का आस।


और यही बात तो बोल के वो लड़की चली गयी, कल नहीं है, जो है वो आज है, अभी है। वह पल जो हमारे साथ है उस को जीना, यही जीवन है.


कबीर का पूरा भजन, " साधो यह मुर्दो का गाँव " जिसकी यह लाइने हैं, यहाँ सूधी पाठको के लिए उद्धृत कर रही हूँ और साथ ही एक वीडियों लिंक भी उस भजन का जो कबीर सीरियल का हिस्सा था


साधो ये मुरदों का गांव!
पीर मरे, पैगम्बर मरि हैं,
मरि हैं ज़िन्दा जोगी,
राजा मरि हैं, परजा मरि हैं,
मरि हैं बैद और रोगी।
साधो ये मुरदों का गांव!

चंदा मरि है, सूरज मरि है,
मरि हैं धरणी आकासा,
चौदह भुवन के चौधरी मरि हैं
इन्हूँ की का आसा।
साधो ये मुरदों का गांव!

नौहूँ मरि हैं, दसहुँ मरि हैं,
मरि हैं सहज अठ्ठासी,
तैंतीस कोटि देवता मरि हैं,
बड़ी काल की बाज़ी।
साधो ये मुरदों का गांव!

नाम अनाम अनंत रहत है,
दूजा तत्व न होइ,
कहे कबीर सुनो भाई साधो
भटक मरो मत कोई।
आप सचमुच ज्ञान की खान हैं....
 

motaalund

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उफ्फ्फ.... जब शरारत और रोमांस को आप मिक्स कर देती हो तो कुछ अजीब सा मीठा आभास करवा देती हो आप. क्या जबरदस्त एहसास करवाया. मुजे तो मोहे रंग दे की याद आ गइ. बस फरक बिन ब्याहे प्रेम की कहानी है. और इस बार सजनी के बदले साजन की जुबानी का एहसास है. फिर भी बाथरूम वाली सेविंग क्रीम वाली जबरदस्त शारारत वही छेड़ छाड़ वाला एहसास करवाती है. जो वहां शादी के माहौल का एहसास करवाया था. प्रेमी के नजर से प्रेमिका के आकर्षक का एहसास जबरदस्त था. दिल को छू गया ये अपडेट.

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एक एक पंक्ति दिल को छू लेती है....
 

motaalund

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जबरदस्त. जिस कहानी मे शारारत ना हो तो कोमलरानी नहीं. मझा आआ गया. बीवी बने तो गुड्डी रानी जैसी. बाँट के खाती है. खुद साली को को साजन के बिस्तर तक ले आए. अमेज़िंग लेडी को कोल्ड फीलिंग्स. मुझे सबसे ज्यादा पसंद आई.

सेविंग क्रीम के बदले हेयर रिमूवर क्रीम. वाह. यहाँ तो आप ने जोरू के गुलाम वाली फीलिंग्स ला दी. मेला छोनु मोनू....

और गुंजा के नाम से जो 61,62 वाला किस्सा तोजबरदस्त मज़ेदार था.

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आखिर शेविंग क्रीम भी बाल हटाते हैं और हेयर रिमूवर भी...
 

motaalund

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अमेज़िंग. सिर्फ बातो से ही इरोटिका का एहसास करवा दिया.

मम्मी.... पढ़ते हुए तो मुजे भी हसीं आ ही गई. मतलब मान लिया आनंद बाबू ने. जबरदस्त.... आखिर होने वाला ससुराल जो है भैया. मम्मी.

लेकिन अपने वाले का कोई बखान करें तो सीना चौड़ा हो जता है. तो गुड्डी कैसे फूली ना समाती. ऊपर से वो भी मायका मे.

छुटकी तो सच मे कमल की है. उसके किस्से तो किसी भी कहानी मे. शरारती और मज़ेदार ही होते है.


I love this Update.

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पल भर में गुड्डी की मम्मी की मुसीबत हर ली...
तो तारीफ तो मिलनी हीं थी....
और वो तारीफ गुड्डी को आनंद बाबू से ज्यादा खुद की लगी...
 

motaalund

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वाओ..... सायद ये भी कहानी की लीड हीरोइन है. मझा आ गया.

और ऊपर से देवर भाभी वाला सीन वो भी फागुन मे. अमेज़िंग. लगता है मतलब सायद अक्सन शुरू होने वाला है.

बट रीत है नई नवेली दुल्हन.



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नई नवेली... लेकिन नशा पुरानी शराब का....
 

motaalund

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जबरदस्त..... आनंद बाबू... साली कहोगे या भाभी. दोनों रिस्ता लगेगा. प्रेम मे हलकी सी जलन कुछ अलग सा मीठा अहसास देती है. ऊपर से रीत के रूप ने तो माहौल को कुछ और ही रूप दे दिया. केटरिना..... माझा आ गया.

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कभी कटरीना... कभी आयशा.. कभी आलिया...
 
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