क्या बात कही आपने
" बेपनाह हुस्न , इनकी गदराई जिस्म की तपन , इनकी सिडक्टिव भरी बातें , इनकी कामातुर भाव- भंगिमा और इनकी कामुक हरकतों से '
इसलिए ही हर थ्रेड, हर लिखने वाला आपके कमेंट्स की प्रतीक्षा करता है।
एक अच्छा कमेंट न सिर्फ लिखने वाले को तृप्त करता है बल्कि कहानी की मीमांसा कर के उसकी की पकड़ को, पहुँच को और बढ़ाता है।
बात आपकी एकदम सही है अकेले आनंद बाबू की यह हालत नहीं होती,
फागु के भीर, अभीरन ते गहि, गोविंद ले गयी भीतर गोरी ।
भाय करि मन की पद्माकर, ऊपर नाय अबीर की झोरी।
छीन पीतांबर कमर ते, सु बिदा दई मोड़ि कपोलन रोरी।
नैन नचाय कही मुस्काय, लला फिर अइयो खेलन होरी।
मेरी एक होली की छोटी कहानी भी है, लला फिर अइयो खेलन होरी, तो होली में ये हालत तो होनी ही है, और आनंद बाबू किसको कहीं भी रंग लगाएं, देह की होली खेले, लेकिन नेह की होली तो गुड्डी के साथ ही है और इसलिए उस की हालत सब से ख़राब है
एरी! मेरी बीर जैसे तैसे इन आँखिन सोँ,
कढिगो अबीर पै अहीर को कढै नहीँ
और होली का मशहूर गाना तो आपने सुना ही होगा, " रसिया को नार बनाउंगी, रसिया को " तो बस आज साली, सलहज सब को मौका मिला है और अगले कई पोस्टो तक होली का ये रंग छलकेगा और एक बात और होली में रंग लगाने का तो मजा है लेकिन लगवाने वाला भी इन्तजार करता है, जीजा हो, देवर हो , नन्दोई हो , उन गोरे गोरे मुलायम , चूड़ियों से सजे हाथों के स्पर्श, का
रंग तो बहाना है ,