फागुन के दिन चार
भाग ५० रिपोर्ट पृष्ठ ४८८
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अब तो कान तरस जाते हैं, धमार, चौताल और होरी सुनने के लिए और जोगीड़ा के नाम पर जो गाने आते भी हैं उनमे अक्सर होली के गाने की धुन भी नहीं होती, इसलिए कई बार कहानी में लिख के ही शौक पूरा कर लेती हूँहोली बिना भोजपुरी गाने के..
जोगीड़ा.. कबीरा के अधूरी है...
अब जो कमी भोजपुरी गाने पर डांस की रीत की होगी.. वो आनंद बाबू के कम्प्लिमेंट करेगी...
और सरसो के तेल का निहितार्थ भी, और छेड़खानी भरा जवाब, आनंद बाबू और रीत के लिए एकदम सटीक लेकिन उससे बढ़कर दूबे भाभी को आनंद बाबू की पसंद एकदम पसंद आयी होगीगाने की लाइन डालने डलवाने की एक्टिंग
सचमुच रीत का साथ एक अलग उन्माद भरी दुनिया में ले जाता है...
बहुत ही मजेदार अपडेट है एक नई भाभी की एंट्री और आते ही आनंद ने चोक्का मार दियाहम आपके हैं कौन
आ गयी रीत
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इधर चंदा भाभी गुड्डी को आवाज दे रही थीं।
चंदा भाभी पूछ रही थीं, " नाश्ता लग गया, दूबे भाभी के यहाँ से दहीबड़ा आया की नहीं, और ये रीत कब तक आएगी।"
गुड्डी ने एक साँस में तीनो बातों का जवाब दे दिया, ' हाँ नाश्ता लग गया है, दहीबड़ा रीत ला रही है और रीत बस आने वाली है।
“हे ये रीत?” मैंने पूछा।
आँखे नचाते हुए गुड्डी ने पूरा इंट्रो दे दिया
“क्यों बिना देखे दिल मचलने लगा। बोला तो था ना की दूबे भाभी की ननद है। हमारे स्कूल में ही पढ़ती थी। पिछले साल इंटर किया था अभी ग्रेजुएशन कर रही हैं। लेकिन खास बात है डांस और गाना दोनों में कोई इनके आस पास नहीं, वेस्टर्न, फ़िल्मी यहाँ तक की भोजपुरी भी, कुछ साल पहले लखनऊ में कम्पटीशन था, सिर्फ इन्ही के चक्कर में हमारा कालेज फर्स्ट आया और स्पोर्ट में भी। और देख के , देखना क्या हालत होती है तेरी। लेकिन ये ध्यान रखना मेरी बड़ी दी,/
तब तक सीढ़ी पे पदचाप सुनाई पड़ी। वो चुप हो गई लेकिन धीरे से बोली- “एकदम हिरोइन लगती है। कालेज में सब कैटरीना कैफ कहते थे…”
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तब तक वो सामने आ गई। वास्तव में कैटरीना ही लग रही थी। पीला खूब टाईट कुरता, सफेद शलवार, गले में दुपट्टा उसके उभारों की छुपाने की नाकमयाब कोशिश करता, और उभार भी जबरदस्त, बड़े भी कड़े भी, और एकदम शेपली, सुरू के पेड़ की तरह लम्बी, खूब गोरी लम्बी-लम्बी टांगें। मैं उसे देखता ही रह गया। और वो भी मुझे।
उसके मुंह से निकला, कैटरिना मत कहना, इक तो उसकी शादी होगयी और दूसरे हर दूसरा लड़का यही कहता है।
किसी तरह थूक गटकते हुए मैंने बोला, " नहीं कहूंगा, अरे आवाज निकल पाएगी तब न कुछ बोलूंगा ।
और किसी तरह मुँह से निकला,
तुम मुख़ातिब भी हो क़रीब भी हो
तुम को देखें कि तुम से बात करें।
" दोनों " वो कौन चुप होने वाली थी, फिर हलके से आँख मार के बोली,
' कुछ और करने का मन हो तो वो भी कर सकते ही, मेरी छोटी बहन है बुरा नहीं मानेगी। क्यों गुड्डी। "
उसकी निगाहें मेरा मौका मुआयना कर रही थीं।
मैंने झुक के अपनी ओर देखा। गुंजा का टाप एक तो स्लीवलेश। बस किसी तरह मुझे कवर किये हुए था। मेरी सारी मसल्स साफ-साफ दिख रही थी, जिम टोंड ना भी हों तो उनसे कम नहीं और उसका बर्मुडा मेरे शार्ट से भी छोटा था, इसलिए जाँघों की मसल्स भी। थोड़ी देर पहले ही जिस तरह…मम्मी और छुटकी के कबूतर, उससे सबसे इम्पार्टेंट ‘मसल’ भी साफ-साफ दिख रही थी।
हम दोनों ने एक साथ एक दूसरे को देखा। दोनों की चोरी पकड़ी गई। हम दोनों एक साथ जोर से हँस दिए।
गुड्डी ने बोला- “उफफ्फ। मैंने आप दोनों का परिचय तो करवाया ही नहीं। ये हैं रीत। ये आनंद…”
रीत ने गुड्डी के गाल कस के मींज दिए और छेड़ते हुए बोली, साफ़ साफ़ क्यों नहीं कहती ' तेरा माल है "
मैंने एक बार फिर उसे देखा। पीछे लग रहा था धुन बज रही है- “मैं चीज बड़ी हूँ मस्त। मैं चीज बड़ी हूँ मस्त…”
“मुझे मालूम है…” एक बार हम दोनों फिर एक साथ बोले।
“अरे आती हुई बहार का, खुशबू का, खिलखिलाती कलियों का, गुनगुनाती धुप का परिचय थोड़ी देना पड़ता है। वो अपना अहसास खुद करा देती हैं…” मैं बोला।
मस्का मस्का, गुड्डी चिल्लाई फिर जोड़ा मस्का लगाने से रीत दी आपको छोड़ेंगी नहीं, रगड़ाई बल्कि डबल होगी।
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“मुझे आप के बारे में सब मालूम है। इसने, इसकी मम्मी ने सब बताया है। लेकिन मैं सोच रही थी की। …” उस कली ने बोला।
“की हम आपके हैं कौन?” मुश्कुराकर मैं बोला।
“इकजैक्टली…” वो हँसकर बोली।
“अरे मैं बताती हूँ ना। ये बिन्नो भाभी के देवर, तो…” गुड्डी बोली।
“चुप मुझे जोड़ने दे? बिन्नो भाभी। यानी तुम्हारी मम्मी की ननद यानि चन्दा भाभी. मेरी भाभी, सबकी ननद। और मैं भी इस सबकी ननद,... तो फिर आप उनके देवर, तो आप मेरे तो देवर हुए…” और कैटरीना ने मेरी ओर हाथ मिलाने के लिए हाथ बढ़ाया।
“एकदम सही लेकिन सिर्फ दो बातें गलत…” मैं बोला और बजाय हाथ मिलाने के लिए हाथ बढ़ाने, मैं गले मिलने के लिए बढ़ा।वो खुद आगे बढ़कर मेरी बाहों में आ गई।
मैंने कसकर उसे भींच लिया। मेरे होंठ उसके कान के पास थे। उसके इयर लोबस को हल्के से होंठों से सहलाते हुए मैंने उसके कान में फुसफुसाया-
“हे भाभी से मैं हाथ नहीं मिलाता, गले मिलता हूँ…”
“मंजूर…” मुश्कुराते हुए वो बोली।
“और दूसरी बात। भाभी मुझे आप नहीं तुम बोलती हैं…” मैं बोला।
“लेकिन मैं तो आप। मेरा मतलब। तुमसे छोटी हूँ…” वो कुनमुनाई।
उसके उरोज अब मेरे सीने के नीचे दब रहे थे, मैंने और कसकर उसे भींचा। उसने छुड़ाने की कोई कोशिश नहीं की। बल्की और उभार के अपने उरोज मेरे सीने में दबा दिए।
“तो चलो हम दोनों एक दूसरे को तुम कहेंगे। ठीक?” मैंने सुझाया।
“ठीक…” वो कुनमुनाई।
मैंने थोड़ी और हिम्मत की। मैं एक हाथ को हम दोनों के बीच उसके, दबे हुए उरोज पे ले गया और बोला- “फागुन में तो भाभी से ऐसे गले मिलते हैं…”
मेरे दोनों पैर उसकी लम्बी टांगों के बीच में थे। मैंने उन्हें थोड़ा फैला दिया, और अपने ‘उसको’ वो भी अब टनटना गया था, सीधे उसके सेंटर पे लगाकर हल्के से दबा दिया। मेरा बदमाश लालची हाथ भी। हल्के से दबाने लगा था। उसके उरोज…”
वो मुश्कुराकर बहुत धीमे से मेरे कान में बोली- “अच्छा जी मैं भी तुम्हारी भाभी हूँ, कोई मजाक नहीं…” और बरमुडा के ऊपर से ‘उसे’ दबा दिया।
वो और तन्ना गया- “हे भाभी डरती हो क्या? काटेगा नहीं। ऊपर से क्यों? फागुन है। तुम मेरी भाभी बनी हो तो…” मैंने उसे और चढ़ाया।
हम दोनों ऐसे चिपके थे की बगल से भी नहीं दिख सकता था की हमारे हाथ क्या कर रहे हैं?
रीत दहीबड़े की प्लेट लायी थी और साथ में बैग में कुछ। गुड्डी उसे ही देख रही थी और बीच-बीच में हम लोगों को। रीत ने उसे हम लोगों को देखते हुए पकड़ लिया और मुझसे बोली-
“हे जरा सून्घों कहीं। कहीं कुछ जलने की, सुलगने की महक आ रही है…”
Thanks so much for support and commentKaamuk madak erotic updates
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नकबेसर कागा ले भागा -होली का असली राष्ट्रीय पारम्परिक गीत है और उसके बिना होली का मजा पूरा नहीं होता और चिढ़ाने के लिए भी जो सामने हो उसका नाम, उसकी महिला रिश्तेदारों का नाम जोड़ने से नमक स्वादानुसार का मजा मिलता है जैसे इसमें आनंद बाबू की ममेरी बहन को, और फिर रीत को घसीटा गया।मौके की नजाकत और संध्या भाभी की चाहत..
और दूबे भाभी का गानों में आनंद बाबू का स्वागत...
चोली की जगह स्कर्ट...
आपके लगातार और सटीक कमेंट्स को देखकर कितनी ख़ुशी हो रही है मैं कह नहीं सकती, कहानी लिखने, कमेंट्स के जवाब देने के बीच आप समय निकाल कर यहाँ आ रहे हैं और इस कहानी का मान बढ़ा रहे हैंलगता ही नही सुहागरात की ट्रेनिंग हो रही है
लग रहा है उस बहन कम माल गुड्डी से समैकडाउन की तैयारी चल रही है ।
हाथ ऐठ कर , टाँगे फैला कर कब चोक स्लैम देना है सब
सेंस के साथ सिक्स सेंस की भी तालीम
बस जिगर फिल्म की तरह यहा चंदा भौजी ने पायल नही खनकाया नही तो कमरे मे आनन्द बाबू को भाभी जी कुल्हे टटोलते देखने का मजा दूगना हो जाता![]()
Bahut achi writing hai Mam aapki maza aa gayaपूर्वाभास कुछ झलकियां
(२) सुबहे बनारस - गुड्डी और गूंजामेरी आँखें जब थोड़ी और नीचे उतरी तो एकदम ठहर गई। उसके उभार। उसके स्कूल की युनिफोर्म, सफेद शर्ट को जैसे फाड़ रहे हों और स्कूल टाई ठीक उनके बीच में, किसी का ध्यान ना जाना हो तो भी चला जाए। परफेक्ट किशोर उरोज। पता नहीं वो इत्ते बड़े-बड़े थे या जानबूझ के उसने शर्ट को इत्ती कसकर स्कर्ट में टाईट करके बेल्ट बाँधी थी।
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पता नहीं मैं कित्ती देर तक और बेशर्मों की तरह देखता रहता, अगर गुड्डी ने ना टोका होता- “हे क्या देख रहे हो। गुंजा नमस्ते कर रही है…”
मैंने ध्यान हटाकर झट से उसके नमस्ते का जवाब दिया और टेबल पे बैठ गया। वो दोनों सामने बैठी थी। मुझे देखकर मुश्कुरा रही थी और फिर आपस में फुसफुसा के कुछ बातें करके टीनेजर्स की तरह खिलखिला रही थी। मेरे बगल की चेयर खाली थी।
मैंने पूछा- “हे चंदा भाभी कहाँ हैं?”
“अपने देवर के लिए गरमा-गरम ब्रेड रोल बना रही हैं। किचेन में…” आँख नचाकर गुंजा बोली।
“हम लोगों के उठने से पहले से ही वो किचेन में लगी हैं…” गुड्डी ने बात में बात जोड़ी।
मैंने चैन की सांस ली।
तब तक गुड्डी बोली- “हे नाश्ता शुरू करिए ना। पेट में चूहे दौड़ रहे हैं हम लोगों के और वैसे भी इसे स्कूल जाना है। आज लास्ट डे है होली की छुट्टी के पहले। लेट हो गई तो मुर्गा बनना पड़ेगा…”
“मुर्गा की मुर्गी?” हँसते हुए मैंने गुंजा को देखकर बोला। मेरा मन उससे बात करने को कर रहा था लेकिन गुड्डी से बात करने के बहाने मैंने पूछा- “लेकिन होली की छुट्टी के पहले वाले दिन तो स्कूल में खाली धमा चौकड़ी, रंग, ऐसी वैसी टाइटिलें…”
मेरी बात काटकर गुड्डी बोली- “अरे तो इसीलिए तो जा रही है ये। आज टाइटिलें…”
उसकी बात काटकर गुंजा बीच में बोली- “अच्छा दीदी, बताऊँ आपको क्या टाइटिल मिली थी…”
गुड्डी- “मारूंगी। आप नाश्ता करिए न कहाँ इसकी बात में फँस गए। अगर इसके चक्कर में पड़ गए तो…”
लेकिन मुझे तो जानना था। उसकी बात काटकर मैंने गुंजा से पूछा- “हे तुम इससे मत डरो मैं हूँ ना। बताओ गुड्डी को क्या टाइटिल मिली थी?”
हँसते हुए गुंजा बोली- “बिग बी…”
पहले तो मुझे कुछ समझ नहीं आया ‘बिग बी’ मतलब लेकिन जब मैंने गुड्डी की ओर देखा तो लाज से उसके गाल टेसू हो रहे थे, और मेरी निगाह जैसे ही उसके उभारों पे पड़ी तो एक मिनट में बात समझ में आ गई। बिग बी। बिग बूब्स । वास्तव में उसके अपने उम्र वालियों से 20 ही थे।
गुड्डी ने बात बदलते हुए मुझसे कहा- “हे खाना शुरू करो ना। ये ब्रेड रोल ना गुंजा ने स्पेशली आपके लिए बनाए हैं…”
“जिसने बनाया है वो दे…” हँसकर गुंजा को घूरते हुए मैंने कहा।
मेरा द्विअर्थी डायलाग गुड्डी तुरंत समझ गई। और उसी तरह बोली- “देगी जरूर देगी। लेने की हिम्मत होनी चाहिए, क्यों गुंजा?”
“एकदम…” वो भी मुश्कुरा रही थी। मैं समझ गया था की सिर्फ शरीर से ही नहीं वो मन से भी बड़ी हो रही है।
गुड्डी ने फिर उसे चढ़ाया- “हे ये अपने हाथ से नहीं खाते, इनके मुँह में डालना पड़ता है अब अगर तुमने इत्ते प्यार से इनके लिए बनाया है तो। …”
“एकदम…” और उसने एक किंग साइज गरम ब्रेड रोल निकाल को मेरी ओर बढ़ाया। हाथ उठने से उसके किशोर उरोज और खुलकर। मैंने खूब बड़ा सा मुँह खोल दिया लेकिन मेरी नदीदी निगाहें उसके उरोजों से चिपकी थी।
“इत्ता बड़ा सा खोला है। तो डाल दे पूरा। एक बार में। इनको आदत है…” गुड्डी भी अब पूरे जोश में आ गई थी।
“एकदम…” और सच में उसकी उंगलियां आलमोस्ट मेरे मुँह में और सारा का सारा ब्रेड रोल एक बार में ही।
स्वाद बहुत ही अच्छा था। लेकिन अगले ही पल में शायद मिर्च का कोई टुकड़ा। और फिर एक, दो, और मेरे मुँह में आग लग गई थी। पूरा मुँह भरा हुआ था इसलिए बोल नहीं निकल रहे थे।
वो दुष्ट। गुंजा। अपने दोनों हाथों से अपना भोला चेहरा पकड़े मेरे चेहरे की ओर टुकुर-टुकुर देख रही थी।
“क्यों कैसा लगा, अच्छा था ना?” इतने भोलेपन से उसने पूछा की।
तब तक गुड्डी भी मेरी ओर ध्यान से देखते हुए वो बोली- “अरे अच्छा तो होगा ही तूने अपने हाथ से बनाया था। इत्ती मिर्ची डाली थी…”
मेरे चेहरे से पसीना टपक रहा था।
गुंजा बोली- “आपने ही तो बोला था की इन्हें मिर्चें पसंद है तो। मुझे लगा की आपको तो इनकी पसंद नापसंद सब मालूम ही होगी। और मैंने तो सिर्फ चार मिर्चे डाली थी बाकी तो आपने बाद में…”
इसका मतलब दोनों की मिली भगत थी। मेरी आँखों से पानी निकल रहा था। बड़ी मुश्किल से मेरे मुँह से निकला- “पानी। पानी…”
“ये क्या मांग रहे हैं…” मुश्किल से मुश्कुराहट दबाते हुए गुंजा बोली।
गुड्डी- “मुझे क्या मालूम तुमसे मांग रहे हैं। तुम दो…” दुष्ट गुड्डी भी अब डबल मीनिंग डायलाग की एक्सपर्ट हो गई थी।
पर गुंजा भी कम नहीं थी- “हे मैं दे दूंगी ना तो फिर आप मत बोलना की। …” उसने गुड्डी से बोला।
यहाँ मेरी लगी हुई थी और वो दोनों।
“दे दे। दे दे। आखिर मेरी छोटी बहन है और फागुन है तो तेरा तो…” बड़ी दरियादिली से गुड्डी बोली।
बड़ी मुश्किल से मैंने मुँह खोला, मेरे मुँह से बात नहीं निकल रही थी। मैंने मुँह की ओर इशारा किया।
“अरे तो ब्रेड रोल और चाहिए तो लीजिये ना…” और गुंजा ने एक और ब्रेड रोल मेरी ओर बढ़ाया- “और कुछ चाहिए तो साफ-साफ मांग लेना चाहिए। जैसे गुड्डी दीदी वैसे मैं…”
वो नालायक। मैंने बड़ी जोर से ना ना में सिर हिलाया और दूर रखे ग्लास की ओर इशारा किया। उसने ग्लास उठाकर मुझे दे दिया लेकिन वो खाली था। एक जग रखा था। वो उसने बड़ी अदा से उठाया।
“अरे प्यासे की प्यास बुझा दे बड़ा पुण्य मिलता है…” ये गुड्डी थी।
“बुझा दूंगी। बुझा दूंगी। अरे कोई प्यासा किसी कुंए के पास आया है तो…” गुंजा बोली और नाटक करके पूरा जग उसने ग्लास में उड़ेल दिया। सिर्फ दो बूँद पानी था।
“अरे आप ये गुझिया खा लीजिये ना गुड्डी दीदी ने बनायी है आपके लिए। बहुत मीठी है कुछ आग कम होगी तब तक मैं जाकर पानी लाती हूँ। आप खिला दो ना अपने हाथ से…”
वो गुड्डी से बोली और जग लेकर खड़ी हो गई।
गुड्डी ने प्लेट में से एक खूब फूली हुई गुझिया मेरे होंठों में डाल ली और मैंने गपक ली। झट से मैंने पूरा खा लिया। मैं सोच रहा था की कुछ तो तीतापन कम होगा। लेकिन जैसे ही मेरे दांत गड़े एकदम से, गुझिया के अन्दर बजाय खोवा सूजी के अबीर गुलाल और रंग भरा था। मेरा सारा मुँह लाल। और वो दोनों हँसते-हँसते लोटपोट।
तब तक चंदा भाभी आईं एक प्लेट में गरमागरम ब्रेड रोल लेकर। लेकिन मेरी हालत देखकर वो भी अपनी हँसी नहीं रोक पायीं, कहा- “क्या हुआ ये दोनों शैतान। एक ही काफी है अगर दोनों मिल गई ना। क्या हुआ?”
मैं बड़ी मुश्किल से बोल पाया- “पानी…”
उन्होंने एक जासूस की तरह पूरे टेबल पे निगाह दौडाई जैसे किसी क्राइम सीन का मुआयना कर रही हों। वो दोनों चोर की तरह सिर झुकाए बैठी थी। फिर अचानक उनकी निगाह केतली पे पड़ी और वो मुश्कुराने लगी। उन्होंने केतली उठाकर ग्लास में पोर किया। और पानी।
रेगिस्तान में प्यासे आदमी को कहीं झरना नजर आ जाए वो हालत मेरी हुई। मैंने झट से उठाकर पूरा ग्लास खाली कर दिया। तब जाकर कहीं जान में जान आई। जब मैंने ग्लास टेबल पे रखा तब चन्दा भाभी ने मेरा चेहरा ध्यान से देखा। वो बड़ी मुश्किल से अपनी हँसी रोकने की कोशिश कर रही थी लेकिन हँसी रुकी नहीं। और उनके हँसते ही वो दोनों जो बड़ी मुश्किल से संजीदा थी। वो भी। फिर तो एक बार हँसी खतम हो और मेरे चेहरे की और देखें तो फिर दुबारा। और उसके बाद फिर।
“आप ने सुबह। हीहीहीही। आपने अपना चेहरा। ही ही शीशे में। हीहीहीही…” चन्दा भाभी बोली।
“नहीं वो ब्रश नहीं था तो गुड्डी ने। उंगली से मंजन। फिर…” मैंने किसी तरह समझाने की कोशिश की मेरे समझ में कुछ नहीं आ रहा था।
“जाइए जाइए। मैंने मना तो नहीं किया था शीशा देखने को। मगर आप ही को नाश्ता करने की जल्दी लगी थी। मैंने कहा भी की नाश्ता कहीं भागा तो नहीं जा रहा है। लेकिन ये ना। हर चीज में जल्दबाजी…” ऐसे बनकर गुड्डी बोली।
गुंजा- “अच्छा मैं ले आती हूँ शीशा…”
और मिनट भर में गुंजा दौड़ के एक बड़ा सा शीशा ले आई। लग रहा था कहीं वाशबेसिन से उखाड़ के ला रही हो और मेरे चेहरे के सामने कर दिया।
मेरा चेहरा फक्क हो गया। न हँसते बन रहा था ना।
तीनों मुश्कुरा रही थी।
मांग तो मेरी सीधी मुँह धुलाने के बाद गुड्डी ने काढ़ी थी। सीधी और मैंने उसकी शरारत समझा था। लेकिन अब मैंने देखा। चौड़ी सीधी मांग और उसमें दमकता सिन्दूर। माथे पे खूब चौड़ी सी लाल बिंदी, जैसे सुहागन औरतें लगाती है। होंठों पे गाढ़ी सी लाल लिपस्टिक और। जब मैंने कुछ बोलने के लिए मुँह खोला तो दांत भी सारे लाल-लाल।
अब मुझे बन्दर छाप दन्त मंजन का रहस्य मालूम हुआ और कैसे दोनों मुझे देखकर मुश्कुरा रही थी। ये भी समझ में आया। चलो होली है चलता है।
चन्दा भाभी ने मुझे समझाया और गुंजा को बोला- “हे जाकर तौलिया ले आ…”
उन्होंने गुड्डी से कहा- “हे हलवा किचेन से लायी की नहीं?”
मैं तुरंत उनकी बात काटकर बोला- “ना भाभी अब मुझे इसके हाथ का भरोसा नहीं है आप ही लाइए…”
हँसते हुए वो किचेन में वापस में चली गईं। गुंजा तौलिया ले आई और खुद ही मेरा मुँह साफ करने लगी। वो जानबूझ कर इत्ता सटकर खड़ी थी की उसके उरोज मेरे सीने से रगड़ रहे थे। मैंने भी सोच लिया की चलो यार चलता है इत्ती हाट लड़कियां।
मैंने गुड्डी को चिढ़ाते हुए कहा- “चलो बाकी सब तो कुछ नहीं लेकिन ये बताओ। सिंदूर किसने डाला था?”
गुंजा ने मेरा मुँह रगड़ते हुए पूछा- “क्यों?”
“इसलिए की सिन्दूर दान के बाद सुहागरात भी तो मनानी पड़ेगी ना। अरे सिन्दूर चाहे कोई डाले सुहागरात वाला काम किये बिना तो पूरा नहीं होगा ना काम…” मैंने हँसते हुए कहा।