• If you are trying to reset your account password then don't forget to check spam folder in your mailbox. Also Mark it as "not spam" or you won't be able to click on the link.

Thriller आधी रात, सूनी खटिया और शिकारी

🔥 Read Next Hot Story →
Discover more exclusive stories

Nik202

New Member
5
2
3
Update 06

अरहर के ऊंचे खेतों के बीच खड़ी सविता को अब अपने जेठ और ससुर, दोनों से घिन आने लगी थी। उसके तन-बदन में एक सिहरन दौड़ गई। उसने घृणा और बेबसी से कमला की तरफ देखा और रोते हुए कहा, "दीदी... तुम कैसी बातें कर रही हो? अगर मैंने उन दोनों में से किसी एक की भी बात मान ली, तो क्या मेरी बदनामी रुक जाएगी? तुम सोच भी कैसे सकती हो? अगर मैंने आज हामी भर दी, तो वो दोनों भूख से पागल भेड़िये हैं। फिर वो सिर्फ रात के सन्नाटे में बंद कमरे के भीतर नहीं रुकेंगे। फिर तो दिन हो या रात... जब उनका मन करेगा, वो मेरे इस बदन को नोंचेंगे, मुझे अपनी मर्जी से भोगेंगे!"

rafiath_rashid_mithila_new_movie_o_abhagi_based_on_saratchandra_chattopadhyaya_short_story_abhagir_swargo-sixteen_nine.jpg


सविता अपने आँसुओं को पोंछते हुए पगडंडी पर बैठ गई। उसे अच्छी तरह पता था कि इस समाज के मर्द उसकी इस भारी और गदराई काया के लिए कितने तड़पते हैं। जब से उसके पति इस दुनिया को छोड़कर गए थे, उसने अपनी आधी जिंदगी सिर्फ राह चलते मर्दों की उन भूखी और गंदी नजरों से खुद को बचाने में निकाल दी थी। लेकिन तब तक उसके दिल में कम से कम यह सहारा और तसल्ली थी कि उसके घर के भीतर दो मर्द मौजूद हैं। वह अपने जेठ को बड़े भाई जैसा और ससुर को अपने सगे पिता के समान मानती थी। उसे लगता था कि ये दोनों उसकी इज्जत की रक्षा करेंगे, समाज के भेड़ियों के सामने उसकी ढाल बनेंगे।

लेकिन आज... आज उनके दिलों में अपने ही घर की बहू के जिस्म के लिए सुलगती हुई घिनौनी आग को देखकर वह अंदर से पूरी तरह टूट चुकी थी। बड़े भाई जैसा जेठ और पिता समान ससुर, दोनों ही उसकी आबरू के भूखे शिकारी निकले।

सविता को याद आया कि कमला अक्सर घर के काम करते हुए हँसते-मजाक में जेठ और ससुर का नाम लेकर उसे चिढ़ाती थी। तब सविता उसे डांट देती थी। लेकिन आज कमला का वह मजाक, कोई मजाक नहीं रह गया था। वह एक बेहद कड़वी और नग्न सच्चाई के रूप में उसके सामने खड़ा था। सविता ने सुबकते हुए कहा, "कमला दीदी... तुम तो सिर्फ हंसी-मजाक में उनका नाम लेती थीं, लेकिन मुझे क्या पता था कि उन दोनों की सोच इस हद तक घटिया और नीच होगी!"

असल में, सविता का कातिलाना और रसदार बदन ही ऐसा था कि कोई भी मर्द उसे एक बार देख ले तो अपनी सुध-बुध खो बैठता था। अब जब जेठ और ससुर दोनों को यह सुनहरा मौका मिला, तो दोनों ने अपनी पूरी कोशिश लगा दी कि बच्चे को नाम देने के बहाने इस बेसहारा विधवा के मखमली जिस्म से उम्र भर खेलने का लाइसेंस मिल जाए।

सविता जो बहू बनकर अब तक इस घर में पूरे स्वाभिमान से रहती थी, जो कभी इन दोनों मर्दों को घास तक नहीं डालती थी, आज जब वह किसी अनजान का बच्चा अपने पेट में लेकर उनके सामने लाचार खड़ी थी, तो उन दोनों की नजरों में उसकी बची-खुची इज्जत भी गायब हो चुकी थी। अब वह उनके लिए घर की संस्कारी बहू नहीं थी। अब वे उसे एक बिल्कुल अलग, गंदी नजर से देख रहे थे—एक ऐसी प्यासी और आवारा औरत, जिसे बस रात के अंधेरे में चुदने का चस्का लग चुका है, और जिसे यह भी होश नहीं है कि उसके पेट में पल रहे बच्चे का असली बाप कौन है! उनके दिमाग में यही चल रहा था कि यह रण्डी ना जाने किस-किस के नीचे सोकर अपनी आग बुझाती रही है।

शाम ढली और रात का घना अंधेरा पूरे घर पर छा गया। सविता अपने कमरे में अकेली बैठी थी। उसने खिड़की से बाहर देखा, जहाँ आसमान में काले बादल छाए हुए थे। अचानक उसके शातिर होते दिमाग में एक बिजली सी कौंधी। उसने एक बड़ा फैसला किया।

वह खुद से बुदबुदाई, "नहीं... आज रात मैं इस बंद और अंधेरे कमरे के भीतर पैर भी नहीं रखूंगी। हर बार मैं इसी कालकोठरी में सोती हूँ और कोई अंधेरे का फायदा उठाकर, नशीली चीज सुंघाकर मेरे इस बदन के साथ खिलवाड़ करके चला जाता है। यह ख्याल मुझे पहले क्यों नहीं आया?"

सविता ने तुरंत अपनी हिम्मत जुटाई। उसने कमरे से अपनी लकड़ी की खाट उठाई और उसे घसीटते हुए आँगन के ठीक बीचों-बीच, खुले आसमान के नीचे ले आई। आज रात हवा थोड़ी ठंडी थी। सविता ने अपनी साड़ी को अपने भारी बदन पर अच्छी तरह से लपेटा, ब्लाउज की हुक को कसकर चेक किया और खाट पर लेट गई।

rathinirvedam_swetha_menon_hot_pics_posters29.jpg


उसे पूरा यकीन था कि आज खुले आँगन में उसके साथ कुछ भी गलत नहीं हो पाएगा। अगर कोई दबे पाँव उसकी तरफ बढ़ने की हिमाकत भी करेगा, तो आँगन के खुलेपन में उसकी आहट हो जाएगी। और अगर किसी ने आज दोबारा उसे हाथ लगाने की कोशिश की... तो वह झटके से उठकर उसका चेहरा साफ-साफ देख लेगी। इस तरह उसे अपने पेट में पल रहे बच्चे के असली बाप का पता हमेशा के लिए चल जाएगा। वह आज शिकारी को खुद जाल में फंसाने के लिए तैयार थी।

आँगन के सन्नाटे में लेटे-लेटे सविता आसमान के तारों को निहार रही थी। दिन भर की थकान, जेठ और ससुर की घिनौनी बातें, और दिमाग में चल रहे इस भयंकर बवंडर के बीच सविता को समझ ही नहीं आया कि कब उसकी भारी-भारी आँखें बंद हो गईं और वह एक गहरी, बेखबर नींद के आगोश में समा गई...

रात का सन्नाटा गहरा चुका था। खुले आँगन के बीचों-बीच बिछी खाट पर सोई सविता की आँख जब खुली, तो उसके पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। हवा की वो ठंडी छुअन जो उसे सोते वक्त महसूस हो रही थी, अब गायब थी। उसकी आँखों के सामने सिर्फ और सिर्फ भयंकर, गहरा काला अंधेरा था। उसने घबराकर अपनी पलकें झपकानी चाहीं, पर उसकी आँखों पर एक मोटा, मखमली कपड़ा कसकर बंधा हुआ था। वह अपनी आँखों को हिला भी नहीं पा रही थी।

एक खौफनाक सिहरन उसके 48 साल के भारी और गदराए बदन में दौड़ गई। उसने डरकर अपने हाथ-पैर हिलाने की कोशिश की, पर उसके दोनों गोरे, भारी हाथ और कसरती पैर खाट के चारों पायों से सूती रस्सियों के सहारे बड़ी बेरहमी से जकड़े जा चुके थे। वह पूरी तरह बेबस, लाचार और बंधक थी। उसने अपनी छाती को सिकोड़ना चाहा, तो उसे अहसास हुआ कि उसके बदन पर कपड़े का एक धागा तक नहीं था। उसकी भारी साड़ी, उसका ब्लाउज, उसकी पेटीकोट... सब कुछ उसके जिस्म से उतारकर एक तरफ फेंका जा चुका था। खुले आँगन की ठंडी रात में उसका मलाई जैसा गोरा, भारी-भरकम और रसदार नंगा बदन पूरी तरह से खुला पड़ा था।

fifty-shades-of-grey-splash.jpg


वह खौफ से चीखने ही वाली थी कि तभी... रात के उस सन्नाटे को चीरती हुई एक बेहद गर्म, मर्दाना स्पर्श उसकी जांघों पर महसूस हुआ। सविता का पूरा वजूद काँप उठा। उसका दिल इतनी जोर से धड़कने लगा मानो छाती फाड़कर बाहर आ जाएगा। उसे लगा कि आज फिर वही शिकारी आ गया है, जो पिछले दो महीने से उसके साथ यह खेल खेल रहा था। लेकिन... अगले ही पल कुछ ऐसा हुआ जिसने सविता के भीतर के डर को एक गहरे, नशीले सन्नाटे में बदल दिया।

आज उस अनजान मर्द के हाथों में वो पुरानी हैवानियत नहीं थी। उसके मजबूत, भारी हाथ सविता के सुडौल नितंबों और भारी जांघों को बहुत ही नरमी से, धीरे-धीरे सहला रहे थे। उसकी उंगलियाँ सविता के मखमली गोरे बदन पर किसी रेशम की तरह रेंग रही थीं। अचानक, उस मर्द के झुके हुए भारी बदन की गर्म सांसें सविता के गले और छाती पर महसूस हुईं। उसके गीले, रसीले होठों ने सविता के फूले हुए, विशाल स्तनों को बहुत ही कोमलता से चूमना शुरू कर दिया। वह उन्हें बेरहमी से भींच नहीं रहा था, बल्कि किसी अनमोल खजाने की तरह सहला रहा था।

28680181.gif


सविता इस अनपेक्षित, बेहद प्यार भरी छुअन से धीरे-धीरे एक अजीब सी मदहोशी के दलदल में धंसने लगी। दोपहर में खेतों में जेठ की वो गंदी नजरें, बूढ़े ससुर की वो घिनौनी और कड़क आवाज में दी गई धमकी, और कमला की वो कड़वी बातें... सविता के दिमाग से वो सारा दर्द, वो सारी घिन एक पल में धुलने लगी। जेठ और ससुर की बातें याद करके उसे उन दोनों से नफरत सी होने लगी थी। उनकी तुलना में, इस अनजान मर्द का यह कोमल स्पर्श उसे अपनी खुद की मिल्कियत जैसा लगने लगा। उसे अहसास हुआ कि यह साया जो भी है, उसे केवल दर्द नहीं, बल्कि चरम सुख भी दे रहा है।

वह अनजान मर्द धीरे-धीरे नीचे की तरफ खिसका। उसके दोनों हाथों ने सविता के उस उभरे हुए, दो महीने के गर्भवती पेट को बहुत ही प्यार से सहलाया। वह काफी देर तक सविता के पेट पर अपने होठों को रखकर चूमता रहा, मानो वह इस अनचाही गर्भावस्था से, अपने उस आने वाले अंश से बेहद खुश हो। एक मर्द का अपनी होने वाली संतान के प्रति यह मौन प्यार देखकर सविता का औरत का दिल पूरी तरह पिघल गया।

unk_bhj_kiss.gif


इस मीठी छुअन और कामुकता के चरम ने सविता के भीतर एक ऐसी आग सुलगा दी कि उसकी मतवाली चूत ने पसीने के साथ-साथ अपना गाढ़ा, रसीला पानी छोड़ना शुरू कर दिया। उसका पूरा बदन काम-वासना की आँच में तप रहा था। तभी, उस मर्द के गर्म होठ सविता की जांघों के बीच, उसकी कामुकता के केंद्र पर आकर टिक गए। उसने अपनी गीली, गर्म जुबान से सविता की चूत को चाटना शुरू कर दिया। वह उसे इतनी गहराई और दीवानगी से चख रहा था कि सविता खाट पर बंधे होने के बावजूद अपनी पतली कमर को ऊपर-नेचे लहराने लगी।

11583063.gif


वह मर्द उसे तब तक लगातार चाटता रहा, जब तक कि सविता का अंग-अंग काँप नहीं गया और उसका सारा पानी एक तेज फव्वारे की तरह बाहर नहीं निकल गया। सविता अभी इस सुख के झटके से संभल भी नहीं पाई थी कि वह तगड़ा, भारी मर्द पूरी तरह से उसके ऊपर लेट गया। उसका भारी मर्दाना वजन सविता के 48 साल के गरदाई बदन पर आ गिरा। तभी... सविता को अपनी जांघों के बीच एक बेहद गर्म, लोहे जैसा सख्त और विशाल लँड महसूस हुआ।

जब उस मर्द ने अपने लँड की नोक को सविता की चूत के गीले छेद पर टिकाया और एक धीमा, गहरा धक्का मारा... तो सविता की आँखें पट्टी के पीछे फटी की फटी रह गईं। आज नशीली दवा का असर कम था, और क्योंकि वह मर्द बहुत ही आराम से और बिना किसी जल्दबाजी के सब कुछ कर रहा था, इसलिए सविता को आज उसके आकार का एक-एक इंच अपने भीतर उतरते हुए पूरी बारीकी से महसूस हुआ।

42209431.gif


उसकी बंद आँखों के सामने उस मर्दानगी का आकार तैर गया। वह अंदर ही अंदर सिहर उठी—यह लँड कम से कम 8 से 9 इंच लंबा था, और उसकी मोटाई... उसकी मोटाई सविता की अपनी गोरी और भारी कलाई जितनी चौड़ी थी! जब वह मोटा मूसल उसकी तंग चूत को फाड़ता हुआ अंदर धंसा, तो सविता के पूरे बदन में एक मीठा, तीखा दर्द दौड़ गया।

पर आज उस दर्द में एक अनोखा नशा था। जहाँ एक तरफ जेठ और ससुर का घिनौना रूप था, वहीं इस अनजान मर्द के इस धीमे, गहरे और प्यार भरे धक्कों ने सविता के दिल में एक अजीब सा खिंचाव पैदा कर दिया था। उसे इस साए से, इस अनजान शिकारी से जैसे एक अनजाना प्यार होने लगा था।

39153


वह मर्द जब बहुत ही धीमी, लयबद्ध रफ्तार से उसके भीतर आ-जा रहा था, तो सविता आज पहली बार दिल से खुश थी। शायद एक वजह यह भी थी कि उसे अब यकीन हो चुका था कि इसी तगड़े मर्द का बीज उसके पेट में पल रहा है। और एक औरत की यह सबसे बड़ी कमजोरी और खूबसूरती होती है कि जिसके अंश को वह अपने पेट में पालती है, उसके आगे वह अपनी रूह, अपना जिस्म और अपनी हर मर्यादा चुपचाप हार बैठती है। वह पूरी तरह उस अनजान लँड के नीचे खुद को सौंप चुकी थी।

खुले आँगन में ठंडी हवा चल रही थी, लेकिन सविता का गोरा, गदराया हुआ बदन उस भारी मर्द के नीचे कामुकता की तपन से सुलग रहा था। वह मर्द बिना किसी जल्दबाजी के, बहुत ही हक्के-हल्के और गहरे धक्के मारते हुए सविता की तंग चूत को तृप्त कर रहा था। उसके होठ लगातार सविता के कांपते हुए गुलाबी होठों, उसके गले और छाती के भारी उभारों को चूम रहे थे। इस कोमल मर्दाने एहसास, और दिन भर के झेले हुए अपमान के बोझ ने अचानक सविता के भीतर भावनाओं का एक बांध तोड़ दिया।

वह पट्टी बंधी आँखों के पीछे से बिलख-बिलख कर रोने लगी। उसका पूरा भारी जिस्म धक्कों की लय के साथ हिल रहा था। उसने हिचकी लेते हुए कांपती आवाज में अपने दिल का गुबार निकालना शुरू किया, "कौन हो तुम... कुछ बोलते क्यों नहीं? क्यों मुझे इस तरह रोज तड़पाते हो? जानते हो... आज मेरे साथ क्या हुआ? आज मैं जीते-जी मर गई..."

5SUz.gif


सविता की इस पहली बात पर, उस मर्द ने कुछ बोले बिना अपनी मजबूत कमर को पीछे खींचा और सविता के भीतर एक गहरा, तेज धक्का मारा—धप्प! उसकी मोटाई ने सविता की चूत की दीवारों को भीतर तक हिला दिया। वह धक्का जैसे उसका जवाब था कि 'मैं सुन रहा हूँ।'

सविता ने कराहते हुए अपने भारी स्तनों को खाट की रस्सियों में ही भींचने की कोशिश की और आगे बोली, "शुरुआत में... शुरुआत में जब तुम आते थे, तो मुझे तुमसे इतनी घिन आती थी... इतना डर लगता था कि मैं लोक-लाज के मारे कुएँ में कूद जाना चाहती थी। मुझे लगता था कि कोई राक्षस मेरी आबरू को रोज लूट कर चला जाता है। लेकिन आज... आज जब मुझे पता चला कि मैं पेट से हूँ, तो मेरे पैरों तले से जमीन खिसक गई..."

27751220.gif


सविता की आखों से आसू पट्टी से सरकते हुए उसके गालों पे आ रहे थे। मर्द ने उसके आंसू पोंछने के लिए अपना अंगूठा उसके गाल पर फेरा, और फिर से एक तेज, गहरा झटका दिया—धप्प! उसकी जांघें सविता के भारी नितंबों से जोर से टकराईं। सविता को उसका यह बेबाक अंदाज इस वक्त दुनिया का सबसे बड़ा सहारा लग रहा था। कोई तो था, जो बिना कुछ कहे उसकी रूह को सुन रहा था।

सविता ने रोते हुए अपना सिर खाट पर पटकते हुए आगे कहा, "दीदी मुझे आज खेतों में जेठ जी के पास ले गई थी। मुझे लगा था वो बड़े भाई जैसे हैं, मेरी इज्जत बचाएंगे। पर... पर वो तो जानवर निकले। वो मेरी लाचारी का फायदा उठाकर सरेआम मेरे इस 48 साल के बदन का सौदा करने लगे। मेरी कमर, मेरी चूत, मेरे इन भारी थनों को घूरते हुए बोले कि अगर मैं रोज उनके नीचे सोऊँगी, तभी वो मेरे इस बच्चे को अपना नाम देंगे। तुम कुछ बोलते क्यों नहीं? क्या तुम्हें तरस नहीं आता मुझ पर?"

सवाब में उस मर्द ने सविता के दोनों होठों को अपने मुँह में भर लिया और उन्हें इतनी दीवानगी से चूसा कि सविता की सांसें अटक गईं। चूसते हुए ही उसने नीचे से एक और तीखा, कड़ा धक्का मारा जिसने सविता की नाभि तक सिहरन दौड़ा दी।

20869869.gif


सविता ने मुँह छूटते ही हांफते हुए आगे कहा, "जेठ तो जेठ... जिसे मैं अपना पिता समझ रही थी, उस बूढ़े ससुर की सोच तो उससे भी ज्यादा नीच निकली। वो मुझे पूरे गाँव के सामने रण्डी और कुतिया बोल रहे थे। कह रहे थे कि ना जाने यह किस-किस से चुदकर अपना मुंह काला करवा के आई है। और फिर... फिर अपनी औकात पर आ गए। बोले कि खानदान की नाक बचानी है, तो मुझे हर रात उनके कमरे में, उनकी खाट पर उनके साथ सोना होगा। वो सुरक्षा के बहाने मेरे इस गदराए जिस्म को अपनी मर्जी से निचोड़ना चाहते हैं। मैं कहाँ जाऊँ? इस दुनिया में मेरा कोई नहीं है..."

उस मर्द ने सविता के गर्भवती पेट पर अपना भारी हाथ रखा, उसे बहुत ही प्यार से सहलाया, और फिर से पूरी ताकत से एक गहरा मूसल अंदर धंसा दिया—धप्प! सविता के मुँह से एक तीखी सिसकारी निकल गई। उस धक्के में एक अजीब सा गुस्सा और सांत्वना दोनों छुपी हुई थी।

432808-all-the-way-in.gif


अब सविता की चूत पूरी तरह से रस छोड़ चुकी थी। वह चरम सुख के बिल्कुल करीब थी। उसका पूरा वजूद इस अनजान मर्द के प्यार और कलाई जैसे मोटे लँड के आगे घुटने टेक चुका था। उसने अपनी आख़िरी मर्यादा को भी हवा में उड़ा दिया। वह तड़पते हुए, खाट की रस्सियों को अपनी उंगलियों में भींचते हुए चिल्लाकर बोली, "मुझे अब कोई ऐतराज नहीं है... सुन रहे हो तुम? मुझे कोई लाज-शर्म नहीं चाहिए! तुम मुझे आज ही, इसी वक्त यहाँ से दूर ले जाओ। बहुत दूर... जहाँ ये घिनौने रिश्ते ना हों। मैं पूरी जिंदगी सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी बन कर रहना चाहती हूँ। मैं इस बच्चे के लिए, इस पेट के लिए कभी कुछ नहीं पूछूंगी... बस तुम मेरे इस बच्चे को अपना नाम दे दो... मुझे अपना बना लो!"

यह आखिरी गुहार सुनते ही उस मर्द के भीतर की कामुकता का सैलाब भी बांध तोड़ गया। उसने सविता के दोनों भारी स्तनों को अपने मजबूत हाथों में जकड़ा। उसने एक के बाद एक कई बेहद तेज, कड़े और ताबड़तोड़ धक्के मारने शुरू कर दिए—धप्प! धप्प! धप्प!

167132-hitting-it-hard.gif


सविता का भारी, गोरा बदन खाट पर पागलों की तरह लहराने लगा। उसकी चूत का सारा पानी एक बार फिर फव्वारे की तरह छूट गया। ठीक उसी पल, उस मर्द ने एक आखिरी, बेहद गहरा और आख़िरी दम तक का झटका मारा, और अपना सारा गर्म, गाढ़ा माल सविता की चूत के गहरे कुएँ में पूरी ताकत से उड़ेल दिया। लँड की गर्मी जब सविता के भीतर फैली, तो उसे एक परम सुकून का अहसास हुआ।

30468196.gif


चोदने के बाद वह मर्द कुछ देर सविता के ऊपर ही हांफता रहा। फिर वह धीरे से नीचे उतरा। उसने कुछ भी नहीं कहा, एक लफ्ज़ भी नहीं बोला। उसने बस बहुत ही गहराई और प्यार से सविता के माथे पर अपने होठ रखे, उसे चूमा, और दबे पाँव आँगन के अंधेरे में ओझल हो गया।

EMKWUGpXYAEuHua.jpg


सविता खाट पर उसी नंगी, बंधी हुई हालत में लेटी रही। जहाँ एक तरफ उसकी चूत से जेठ और ससुर के बजाय इस अपने मर्द का माल बाहर बह रहा था जिससे उसे एक मीठा सुकून मिल रहा था, वहीं दूसरी तरफ उस मर्द के कुछ भी ना बोलने और उसे उसी हाल में छोड़कर चले जाने से उसका दिल एक गहरी निराशा और उदासी से भर गया। वह बस आँसू बहाते हुए सुबह के उजाले का इंतजार करने लगी।

अपने सीने में बरसों से दबा सारा दर्द सविता ने कल रात उस साए के सामने उगल दिया था। अपनी आबरू का वो सबसे बड़ा सच बयां कर देने के बाद, आज उसका मन अंदर से बहुत हल्का महसूस कर रहा था। रात का वह भयंकर तूफ़ान थम चुका था, लेकिन सविता को अभी भी अपनी जांघों के बीच उस भारी मर्द के लँड की चौड़ाई का गहरा अहसास हो रहा था। उसकी मोटाई सविता के अपने हाथ की गोरी और भारी कलाई जितनी थी, जो उसकी तंग चूत को भीतर तक फैलाए हुए थी। चोदने के बाद उस मर्द का जो गाढ़ा, गर्म पानी सविता के अंतस में छूटा था, वह उसकी अंदरूनी दीवारों के मीठे दर्द को किसी गर्म सिकाई की तरह आराम दे रहा था। वह चिपचिपा मर्दाना रस धीरे-धीरे उसकी जांघों से बहकर नीचे खाट के सूती बिछौने को पूरी तरह भिगो चुका था। उस भीगे हुए सुकून और थकान के बीच सविता को पता ही नहीं चला कि कब उसकी भारी आँखें लग गईं।

जब सुबह के सूरज की पहली मखमली किरणें आँगन को चीरती हुई सविता के जिस्म पर पड़ीं, तो उसकी तंद्रा टूटी। उसने भारी पलकों को झपकाते हुए अपनी आँखें खोलीं, तो उसके होश उड़ गए। वह बाहर खुले आँगन में नहीं, बल्कि अपने ही घर के भीतर, अपने उस बंद कमरे की खाट पर सो रही थी! उसकी आँखों की पट्टी और हाथ-पैर की रस्सियाँ गायब थीं, लेकिन उसका पूरा 48 साल का गदराया बदन अभी भी पूरी तरह नंगा था। कपड़े का एक कतरा भी उसकी गोरी काया पर नहीं था। रात का वह रहस्यमयी शिकारी उसे चोदने के बाद न केवल खोल चुका था, बल्कि इतनी खामोशी से उसे अंदर कमरे में लाकर सुला गया था कि उसे भनक तक नहीं लगी।

सविता ने जैसे ही अपनी टांगें फैलाईं, उसे अपनी चूत के घने बालों पर सूख चुका गाढ़ा और पपड़ीदार मर्दाना पानी महसूस हुआ। वह रसीला माल उसकी गोरी जांघों के अंदरूनी हिस्सों पर भी सूखकर सफेद लकीरें बना चुका था, जो कल रात की उस भयंकर चोदना की गवाही दे रहा था।

indira_varma_nude_kama_sutra.jpg


अपनी इस नग्न हालत को देखने के बाद भी, आज सविता के चेहरे पर कोई खौफ नहीं था। इसके विपरीत, रात की उस आलिंगनबद्ध चोदना को याद करके उसके रसीले होठों पर एक बेहद प्यारी और शर्मीली मुस्कान तैर गई। वह शर्म के मारे अपनी हथेलियों से अपना चेहरा छिपाने लगी। उसे खुद पर हैरत हो रही थी कि वह एक अनजान साए के आगे इस कदर टूट कैसे गई? उसने एक आम देहाती औरत की तरह रोते-बिलखते हुए अपने दिल का एक-एक दुख, अपने जेठ और ससुर की वो घिनौनी हवस की बातें उस मर्द के सामने क्यों बयां कर दीं?

क्या... क्या उसे उस रोज रात को आने वाले शिकारी से प्यार होने लगा था? सविता का मन इस सोच से घबरा उठा। उसने खुद को झकझोरते हुए सोचा—'नहीं, तू पागल तो नहीं हो गई सविता? उसी मर्द ने पिछले दो महीनों से तुझे नशीली दवा सुंघाकर, रस्सियों से बांधकर ना जाने कितनी बार बेरहमी से निचोड़ा है, तेरे इस भरे-पूरे बदन को एक खिलौने की तरह भोगा है। फिर सिर्फ इसलिए कि वह तेरे पेट में पल रहे इस अनचाहे बच्चे का असली बाप है, तू उसके आगे इतनी लाचार और नरम क्यों पड़ रही है?'


लेकिन सविता का औरत का दिल और उसका शातिर दिमाग अब धीरे-धीरे हकीकत को कुबूल कर रहा था। उसकी इस नरमी का कारण केवल वह बच्चा नहीं था। असल में, उसके पति के मरने के बाद की सालों की वो सूनी जवानी और जिस्म की छुपी हुई तड़प इसका बड़ा कारण थी। और रही-सही कसर कल दोपहर उसके जेठ और ससुर की उस खौफनाक हवस ने पूरी कर दी थी। जहाँ एक तरफ घर के वो दो मर्द उसके जिस्म को नोचने के लिए घात लगाए बैठे थे, वहीं दूसरी तरफ यह अनजान साया उसे बेपनाह चरम सुख और एक अनकहा सा आदर दे रहा था। इस तीखे थ्रिल और कामुकता के जाल में वह अब पूरी तरह फंस चुकी थी।
Amazing update bhai maja aagya
 
  • Like
Reactions: Forbidden Ink

sunoanuj

Well-Known Member
5,334
13,183
189
Update 06

अरहर के ऊंचे खेतों के बीच खड़ी सविता को अब अपने जेठ और ससुर, दोनों से घिन आने लगी थी। उसके तन-बदन में एक सिहरन दौड़ गई। उसने घृणा और बेबसी से कमला की तरफ देखा और रोते हुए कहा, "दीदी... तुम कैसी बातें कर रही हो? अगर मैंने उन दोनों में से किसी एक की भी बात मान ली, तो क्या मेरी बदनामी रुक जाएगी? तुम सोच भी कैसे सकती हो? अगर मैंने आज हामी भर दी, तो वो दोनों भूख से पागल भेड़िये हैं। फिर वो सिर्फ रात के सन्नाटे में बंद कमरे के भीतर नहीं रुकेंगे। फिर तो दिन हो या रात... जब उनका मन करेगा, वो मेरे इस बदन को नोंचेंगे, मुझे अपनी मर्जी से भोगेंगे!"

rafiath_rashid_mithila_new_movie_o_abhagi_based_on_saratchandra_chattopadhyaya_short_story_abhagir_swargo-sixteen_nine.jpg


सविता अपने आँसुओं को पोंछते हुए पगडंडी पर बैठ गई। उसे अच्छी तरह पता था कि इस समाज के मर्द उसकी इस भारी और गदराई काया के लिए कितने तड़पते हैं। जब से उसके पति इस दुनिया को छोड़कर गए थे, उसने अपनी आधी जिंदगी सिर्फ राह चलते मर्दों की उन भूखी और गंदी नजरों से खुद को बचाने में निकाल दी थी। लेकिन तब तक उसके दिल में कम से कम यह सहारा और तसल्ली थी कि उसके घर के भीतर दो मर्द मौजूद हैं। वह अपने जेठ को बड़े भाई जैसा और ससुर को अपने सगे पिता के समान मानती थी। उसे लगता था कि ये दोनों उसकी इज्जत की रक्षा करेंगे, समाज के भेड़ियों के सामने उसकी ढाल बनेंगे।

लेकिन आज... आज उनके दिलों में अपने ही घर की बहू के जिस्म के लिए सुलगती हुई घिनौनी आग को देखकर वह अंदर से पूरी तरह टूट चुकी थी। बड़े भाई जैसा जेठ और पिता समान ससुर, दोनों ही उसकी आबरू के भूखे शिकारी निकले।

सविता को याद आया कि कमला अक्सर घर के काम करते हुए हँसते-मजाक में जेठ और ससुर का नाम लेकर उसे चिढ़ाती थी। तब सविता उसे डांट देती थी। लेकिन आज कमला का वह मजाक, कोई मजाक नहीं रह गया था। वह एक बेहद कड़वी और नग्न सच्चाई के रूप में उसके सामने खड़ा था। सविता ने सुबकते हुए कहा, "कमला दीदी... तुम तो सिर्फ हंसी-मजाक में उनका नाम लेती थीं, लेकिन मुझे क्या पता था कि उन दोनों की सोच इस हद तक घटिया और नीच होगी!"

असल में, सविता का कातिलाना और रसदार बदन ही ऐसा था कि कोई भी मर्द उसे एक बार देख ले तो अपनी सुध-बुध खो बैठता था। अब जब जेठ और ससुर दोनों को यह सुनहरा मौका मिला, तो दोनों ने अपनी पूरी कोशिश लगा दी कि बच्चे को नाम देने के बहाने इस बेसहारा विधवा के मखमली जिस्म से उम्र भर खेलने का लाइसेंस मिल जाए।

सविता जो बहू बनकर अब तक इस घर में पूरे स्वाभिमान से रहती थी, जो कभी इन दोनों मर्दों को घास तक नहीं डालती थी, आज जब वह किसी अनजान का बच्चा अपने पेट में लेकर उनके सामने लाचार खड़ी थी, तो उन दोनों की नजरों में उसकी बची-खुची इज्जत भी गायब हो चुकी थी। अब वह उनके लिए घर की संस्कारी बहू नहीं थी। अब वे उसे एक बिल्कुल अलग, गंदी नजर से देख रहे थे—एक ऐसी प्यासी और आवारा औरत, जिसे बस रात के अंधेरे में चुदने का चस्का लग चुका है, और जिसे यह भी होश नहीं है कि उसके पेट में पल रहे बच्चे का असली बाप कौन है! उनके दिमाग में यही चल रहा था कि यह रण्डी ना जाने किस-किस के नीचे सोकर अपनी आग बुझाती रही है।

शाम ढली और रात का घना अंधेरा पूरे घर पर छा गया। सविता अपने कमरे में अकेली बैठी थी। उसने खिड़की से बाहर देखा, जहाँ आसमान में काले बादल छाए हुए थे। अचानक उसके शातिर होते दिमाग में एक बिजली सी कौंधी। उसने एक बड़ा फैसला किया।

वह खुद से बुदबुदाई, "नहीं... आज रात मैं इस बंद और अंधेरे कमरे के भीतर पैर भी नहीं रखूंगी। हर बार मैं इसी कालकोठरी में सोती हूँ और कोई अंधेरे का फायदा उठाकर, नशीली चीज सुंघाकर मेरे इस बदन के साथ खिलवाड़ करके चला जाता है। यह ख्याल मुझे पहले क्यों नहीं आया?"

सविता ने तुरंत अपनी हिम्मत जुटाई। उसने कमरे से अपनी लकड़ी की खाट उठाई और उसे घसीटते हुए आँगन के ठीक बीचों-बीच, खुले आसमान के नीचे ले आई। आज रात हवा थोड़ी ठंडी थी। सविता ने अपनी साड़ी को अपने भारी बदन पर अच्छी तरह से लपेटा, ब्लाउज की हुक को कसकर चेक किया और खाट पर लेट गई।

rathinirvedam_swetha_menon_hot_pics_posters29.jpg


उसे पूरा यकीन था कि आज खुले आँगन में उसके साथ कुछ भी गलत नहीं हो पाएगा। अगर कोई दबे पाँव उसकी तरफ बढ़ने की हिमाकत भी करेगा, तो आँगन के खुलेपन में उसकी आहट हो जाएगी। और अगर किसी ने आज दोबारा उसे हाथ लगाने की कोशिश की... तो वह झटके से उठकर उसका चेहरा साफ-साफ देख लेगी। इस तरह उसे अपने पेट में पल रहे बच्चे के असली बाप का पता हमेशा के लिए चल जाएगा। वह आज शिकारी को खुद जाल में फंसाने के लिए तैयार थी।

आँगन के सन्नाटे में लेटे-लेटे सविता आसमान के तारों को निहार रही थी। दिन भर की थकान, जेठ और ससुर की घिनौनी बातें, और दिमाग में चल रहे इस भयंकर बवंडर के बीच सविता को समझ ही नहीं आया कि कब उसकी भारी-भारी आँखें बंद हो गईं और वह एक गहरी, बेखबर नींद के आगोश में समा गई...

रात का सन्नाटा गहरा चुका था। खुले आँगन के बीचों-बीच बिछी खाट पर सोई सविता की आँख जब खुली, तो उसके पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। हवा की वो ठंडी छुअन जो उसे सोते वक्त महसूस हो रही थी, अब गायब थी। उसकी आँखों के सामने सिर्फ और सिर्फ भयंकर, गहरा काला अंधेरा था। उसने घबराकर अपनी पलकें झपकानी चाहीं, पर उसकी आँखों पर एक मोटा, मखमली कपड़ा कसकर बंधा हुआ था। वह अपनी आँखों को हिला भी नहीं पा रही थी।

एक खौफनाक सिहरन उसके 48 साल के भारी और गदराए बदन में दौड़ गई। उसने डरकर अपने हाथ-पैर हिलाने की कोशिश की, पर उसके दोनों गोरे, भारी हाथ और कसरती पैर खाट के चारों पायों से सूती रस्सियों के सहारे बड़ी बेरहमी से जकड़े जा चुके थे। वह पूरी तरह बेबस, लाचार और बंधक थी। उसने अपनी छाती को सिकोड़ना चाहा, तो उसे अहसास हुआ कि उसके बदन पर कपड़े का एक धागा तक नहीं था। उसकी भारी साड़ी, उसका ब्लाउज, उसकी पेटीकोट... सब कुछ उसके जिस्म से उतारकर एक तरफ फेंका जा चुका था। खुले आँगन की ठंडी रात में उसका मलाई जैसा गोरा, भारी-भरकम और रसदार नंगा बदन पूरी तरह से खुला पड़ा था।

fifty-shades-of-grey-splash.jpg


वह खौफ से चीखने ही वाली थी कि तभी... रात के उस सन्नाटे को चीरती हुई एक बेहद गर्म, मर्दाना स्पर्श उसकी जांघों पर महसूस हुआ। सविता का पूरा वजूद काँप उठा। उसका दिल इतनी जोर से धड़कने लगा मानो छाती फाड़कर बाहर आ जाएगा। उसे लगा कि आज फिर वही शिकारी आ गया है, जो पिछले दो महीने से उसके साथ यह खेल खेल रहा था। लेकिन... अगले ही पल कुछ ऐसा हुआ जिसने सविता के भीतर के डर को एक गहरे, नशीले सन्नाटे में बदल दिया।

आज उस अनजान मर्द के हाथों में वो पुरानी हैवानियत नहीं थी। उसके मजबूत, भारी हाथ सविता के सुडौल नितंबों और भारी जांघों को बहुत ही नरमी से, धीरे-धीरे सहला रहे थे। उसकी उंगलियाँ सविता के मखमली गोरे बदन पर किसी रेशम की तरह रेंग रही थीं। अचानक, उस मर्द के झुके हुए भारी बदन की गर्म सांसें सविता के गले और छाती पर महसूस हुईं। उसके गीले, रसीले होठों ने सविता के फूले हुए, विशाल स्तनों को बहुत ही कोमलता से चूमना शुरू कर दिया। वह उन्हें बेरहमी से भींच नहीं रहा था, बल्कि किसी अनमोल खजाने की तरह सहला रहा था।

28680181.gif


सविता इस अनपेक्षित, बेहद प्यार भरी छुअन से धीरे-धीरे एक अजीब सी मदहोशी के दलदल में धंसने लगी। दोपहर में खेतों में जेठ की वो गंदी नजरें, बूढ़े ससुर की वो घिनौनी और कड़क आवाज में दी गई धमकी, और कमला की वो कड़वी बातें... सविता के दिमाग से वो सारा दर्द, वो सारी घिन एक पल में धुलने लगी। जेठ और ससुर की बातें याद करके उसे उन दोनों से नफरत सी होने लगी थी। उनकी तुलना में, इस अनजान मर्द का यह कोमल स्पर्श उसे अपनी खुद की मिल्कियत जैसा लगने लगा। उसे अहसास हुआ कि यह साया जो भी है, उसे केवल दर्द नहीं, बल्कि चरम सुख भी दे रहा है।

वह अनजान मर्द धीरे-धीरे नीचे की तरफ खिसका। उसके दोनों हाथों ने सविता के उस उभरे हुए, दो महीने के गर्भवती पेट को बहुत ही प्यार से सहलाया। वह काफी देर तक सविता के पेट पर अपने होठों को रखकर चूमता रहा, मानो वह इस अनचाही गर्भावस्था से, अपने उस आने वाले अंश से बेहद खुश हो। एक मर्द का अपनी होने वाली संतान के प्रति यह मौन प्यार देखकर सविता का औरत का दिल पूरी तरह पिघल गया।

unk_bhj_kiss.gif


इस मीठी छुअन और कामुकता के चरम ने सविता के भीतर एक ऐसी आग सुलगा दी कि उसकी मतवाली चूत ने पसीने के साथ-साथ अपना गाढ़ा, रसीला पानी छोड़ना शुरू कर दिया। उसका पूरा बदन काम-वासना की आँच में तप रहा था। तभी, उस मर्द के गर्म होठ सविता की जांघों के बीच, उसकी कामुकता के केंद्र पर आकर टिक गए। उसने अपनी गीली, गर्म जुबान से सविता की चूत को चाटना शुरू कर दिया। वह उसे इतनी गहराई और दीवानगी से चख रहा था कि सविता खाट पर बंधे होने के बावजूद अपनी पतली कमर को ऊपर-नेचे लहराने लगी।

11583063.gif


वह मर्द उसे तब तक लगातार चाटता रहा, जब तक कि सविता का अंग-अंग काँप नहीं गया और उसका सारा पानी एक तेज फव्वारे की तरह बाहर नहीं निकल गया। सविता अभी इस सुख के झटके से संभल भी नहीं पाई थी कि वह तगड़ा, भारी मर्द पूरी तरह से उसके ऊपर लेट गया। उसका भारी मर्दाना वजन सविता के 48 साल के गरदाई बदन पर आ गिरा। तभी... सविता को अपनी जांघों के बीच एक बेहद गर्म, लोहे जैसा सख्त और विशाल लँड महसूस हुआ।

जब उस मर्द ने अपने लँड की नोक को सविता की चूत के गीले छेद पर टिकाया और एक धीमा, गहरा धक्का मारा... तो सविता की आँखें पट्टी के पीछे फटी की फटी रह गईं। आज नशीली दवा का असर कम था, और क्योंकि वह मर्द बहुत ही आराम से और बिना किसी जल्दबाजी के सब कुछ कर रहा था, इसलिए सविता को आज उसके आकार का एक-एक इंच अपने भीतर उतरते हुए पूरी बारीकी से महसूस हुआ।

42209431.gif


उसकी बंद आँखों के सामने उस मर्दानगी का आकार तैर गया। वह अंदर ही अंदर सिहर उठी—यह लँड कम से कम 8 से 9 इंच लंबा था, और उसकी मोटाई... उसकी मोटाई सविता की अपनी गोरी और भारी कलाई जितनी चौड़ी थी! जब वह मोटा मूसल उसकी तंग चूत को फाड़ता हुआ अंदर धंसा, तो सविता के पूरे बदन में एक मीठा, तीखा दर्द दौड़ गया।

पर आज उस दर्द में एक अनोखा नशा था। जहाँ एक तरफ जेठ और ससुर का घिनौना रूप था, वहीं इस अनजान मर्द के इस धीमे, गहरे और प्यार भरे धक्कों ने सविता के दिल में एक अजीब सा खिंचाव पैदा कर दिया था। उसे इस साए से, इस अनजान शिकारी से जैसे एक अनजाना प्यार होने लगा था।

39153


वह मर्द जब बहुत ही धीमी, लयबद्ध रफ्तार से उसके भीतर आ-जा रहा था, तो सविता आज पहली बार दिल से खुश थी। शायद एक वजह यह भी थी कि उसे अब यकीन हो चुका था कि इसी तगड़े मर्द का बीज उसके पेट में पल रहा है। और एक औरत की यह सबसे बड़ी कमजोरी और खूबसूरती होती है कि जिसके अंश को वह अपने पेट में पालती है, उसके आगे वह अपनी रूह, अपना जिस्म और अपनी हर मर्यादा चुपचाप हार बैठती है। वह पूरी तरह उस अनजान लँड के नीचे खुद को सौंप चुकी थी।

खुले आँगन में ठंडी हवा चल रही थी, लेकिन सविता का गोरा, गदराया हुआ बदन उस भारी मर्द के नीचे कामुकता की तपन से सुलग रहा था। वह मर्द बिना किसी जल्दबाजी के, बहुत ही हक्के-हल्के और गहरे धक्के मारते हुए सविता की तंग चूत को तृप्त कर रहा था। उसके होठ लगातार सविता के कांपते हुए गुलाबी होठों, उसके गले और छाती के भारी उभारों को चूम रहे थे। इस कोमल मर्दाने एहसास, और दिन भर के झेले हुए अपमान के बोझ ने अचानक सविता के भीतर भावनाओं का एक बांध तोड़ दिया।

वह पट्टी बंधी आँखों के पीछे से बिलख-बिलख कर रोने लगी। उसका पूरा भारी जिस्म धक्कों की लय के साथ हिल रहा था। उसने हिचकी लेते हुए कांपती आवाज में अपने दिल का गुबार निकालना शुरू किया, "कौन हो तुम... कुछ बोलते क्यों नहीं? क्यों मुझे इस तरह रोज तड़पाते हो? जानते हो... आज मेरे साथ क्या हुआ? आज मैं जीते-जी मर गई..."

5SUz.gif


सविता की इस पहली बात पर, उस मर्द ने कुछ बोले बिना अपनी मजबूत कमर को पीछे खींचा और सविता के भीतर एक गहरा, तेज धक्का मारा—धप्प! उसकी मोटाई ने सविता की चूत की दीवारों को भीतर तक हिला दिया। वह धक्का जैसे उसका जवाब था कि 'मैं सुन रहा हूँ।'

सविता ने कराहते हुए अपने भारी स्तनों को खाट की रस्सियों में ही भींचने की कोशिश की और आगे बोली, "शुरुआत में... शुरुआत में जब तुम आते थे, तो मुझे तुमसे इतनी घिन आती थी... इतना डर लगता था कि मैं लोक-लाज के मारे कुएँ में कूद जाना चाहती थी। मुझे लगता था कि कोई राक्षस मेरी आबरू को रोज लूट कर चला जाता है। लेकिन आज... आज जब मुझे पता चला कि मैं पेट से हूँ, तो मेरे पैरों तले से जमीन खिसक गई..."

27751220.gif


सविता की आखों से आसू पट्टी से सरकते हुए उसके गालों पे आ रहे थे। मर्द ने उसके आंसू पोंछने के लिए अपना अंगूठा उसके गाल पर फेरा, और फिर से एक तेज, गहरा झटका दिया—धप्प! उसकी जांघें सविता के भारी नितंबों से जोर से टकराईं। सविता को उसका यह बेबाक अंदाज इस वक्त दुनिया का सबसे बड़ा सहारा लग रहा था। कोई तो था, जो बिना कुछ कहे उसकी रूह को सुन रहा था।

सविता ने रोते हुए अपना सिर खाट पर पटकते हुए आगे कहा, "दीदी मुझे आज खेतों में जेठ जी के पास ले गई थी। मुझे लगा था वो बड़े भाई जैसे हैं, मेरी इज्जत बचाएंगे। पर... पर वो तो जानवर निकले। वो मेरी लाचारी का फायदा उठाकर सरेआम मेरे इस 48 साल के बदन का सौदा करने लगे। मेरी कमर, मेरी चूत, मेरे इन भारी थनों को घूरते हुए बोले कि अगर मैं रोज उनके नीचे सोऊँगी, तभी वो मेरे इस बच्चे को अपना नाम देंगे। तुम कुछ बोलते क्यों नहीं? क्या तुम्हें तरस नहीं आता मुझ पर?"

सवाब में उस मर्द ने सविता के दोनों होठों को अपने मुँह में भर लिया और उन्हें इतनी दीवानगी से चूसा कि सविता की सांसें अटक गईं। चूसते हुए ही उसने नीचे से एक और तीखा, कड़ा धक्का मारा जिसने सविता की नाभि तक सिहरन दौड़ा दी।

20869869.gif


सविता ने मुँह छूटते ही हांफते हुए आगे कहा, "जेठ तो जेठ... जिसे मैं अपना पिता समझ रही थी, उस बूढ़े ससुर की सोच तो उससे भी ज्यादा नीच निकली। वो मुझे पूरे गाँव के सामने रण्डी और कुतिया बोल रहे थे। कह रहे थे कि ना जाने यह किस-किस से चुदकर अपना मुंह काला करवा के आई है। और फिर... फिर अपनी औकात पर आ गए। बोले कि खानदान की नाक बचानी है, तो मुझे हर रात उनके कमरे में, उनकी खाट पर उनके साथ सोना होगा। वो सुरक्षा के बहाने मेरे इस गदराए जिस्म को अपनी मर्जी से निचोड़ना चाहते हैं। मैं कहाँ जाऊँ? इस दुनिया में मेरा कोई नहीं है..."

उस मर्द ने सविता के गर्भवती पेट पर अपना भारी हाथ रखा, उसे बहुत ही प्यार से सहलाया, और फिर से पूरी ताकत से एक गहरा मूसल अंदर धंसा दिया—धप्प! सविता के मुँह से एक तीखी सिसकारी निकल गई। उस धक्के में एक अजीब सा गुस्सा और सांत्वना दोनों छुपी हुई थी।

432808-all-the-way-in.gif


अब सविता की चूत पूरी तरह से रस छोड़ चुकी थी। वह चरम सुख के बिल्कुल करीब थी। उसका पूरा वजूद इस अनजान मर्द के प्यार और कलाई जैसे मोटे लँड के आगे घुटने टेक चुका था। उसने अपनी आख़िरी मर्यादा को भी हवा में उड़ा दिया। वह तड़पते हुए, खाट की रस्सियों को अपनी उंगलियों में भींचते हुए चिल्लाकर बोली, "मुझे अब कोई ऐतराज नहीं है... सुन रहे हो तुम? मुझे कोई लाज-शर्म नहीं चाहिए! तुम मुझे आज ही, इसी वक्त यहाँ से दूर ले जाओ। बहुत दूर... जहाँ ये घिनौने रिश्ते ना हों। मैं पूरी जिंदगी सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी बन कर रहना चाहती हूँ। मैं इस बच्चे के लिए, इस पेट के लिए कभी कुछ नहीं पूछूंगी... बस तुम मेरे इस बच्चे को अपना नाम दे दो... मुझे अपना बना लो!"

यह आखिरी गुहार सुनते ही उस मर्द के भीतर की कामुकता का सैलाब भी बांध तोड़ गया। उसने सविता के दोनों भारी स्तनों को अपने मजबूत हाथों में जकड़ा। उसने एक के बाद एक कई बेहद तेज, कड़े और ताबड़तोड़ धक्के मारने शुरू कर दिए—धप्प! धप्प! धप्प!

167132-hitting-it-hard.gif


सविता का भारी, गोरा बदन खाट पर पागलों की तरह लहराने लगा। उसकी चूत का सारा पानी एक बार फिर फव्वारे की तरह छूट गया। ठीक उसी पल, उस मर्द ने एक आखिरी, बेहद गहरा और आख़िरी दम तक का झटका मारा, और अपना सारा गर्म, गाढ़ा माल सविता की चूत के गहरे कुएँ में पूरी ताकत से उड़ेल दिया। लँड की गर्मी जब सविता के भीतर फैली, तो उसे एक परम सुकून का अहसास हुआ।

30468196.gif


चोदने के बाद वह मर्द कुछ देर सविता के ऊपर ही हांफता रहा। फिर वह धीरे से नीचे उतरा। उसने कुछ भी नहीं कहा, एक लफ्ज़ भी नहीं बोला। उसने बस बहुत ही गहराई और प्यार से सविता के माथे पर अपने होठ रखे, उसे चूमा, और दबे पाँव आँगन के अंधेरे में ओझल हो गया।

EMKWUGpXYAEuHua.jpg


सविता खाट पर उसी नंगी, बंधी हुई हालत में लेटी रही। जहाँ एक तरफ उसकी चूत से जेठ और ससुर के बजाय इस अपने मर्द का माल बाहर बह रहा था जिससे उसे एक मीठा सुकून मिल रहा था, वहीं दूसरी तरफ उस मर्द के कुछ भी ना बोलने और उसे उसी हाल में छोड़कर चले जाने से उसका दिल एक गहरी निराशा और उदासी से भर गया। वह बस आँसू बहाते हुए सुबह के उजाले का इंतजार करने लगी।

अपने सीने में बरसों से दबा सारा दर्द सविता ने कल रात उस साए के सामने उगल दिया था। अपनी आबरू का वो सबसे बड़ा सच बयां कर देने के बाद, आज उसका मन अंदर से बहुत हल्का महसूस कर रहा था। रात का वह भयंकर तूफ़ान थम चुका था, लेकिन सविता को अभी भी अपनी जांघों के बीच उस भारी मर्द के लँड की चौड़ाई का गहरा अहसास हो रहा था। उसकी मोटाई सविता के अपने हाथ की गोरी और भारी कलाई जितनी थी, जो उसकी तंग चूत को भीतर तक फैलाए हुए थी। चोदने के बाद उस मर्द का जो गाढ़ा, गर्म पानी सविता के अंतस में छूटा था, वह उसकी अंदरूनी दीवारों के मीठे दर्द को किसी गर्म सिकाई की तरह आराम दे रहा था। वह चिपचिपा मर्दाना रस धीरे-धीरे उसकी जांघों से बहकर नीचे खाट के सूती बिछौने को पूरी तरह भिगो चुका था। उस भीगे हुए सुकून और थकान के बीच सविता को पता ही नहीं चला कि कब उसकी भारी आँखें लग गईं।

जब सुबह के सूरज की पहली मखमली किरणें आँगन को चीरती हुई सविता के जिस्म पर पड़ीं, तो उसकी तंद्रा टूटी। उसने भारी पलकों को झपकाते हुए अपनी आँखें खोलीं, तो उसके होश उड़ गए। वह बाहर खुले आँगन में नहीं, बल्कि अपने ही घर के भीतर, अपने उस बंद कमरे की खाट पर सो रही थी! उसकी आँखों की पट्टी और हाथ-पैर की रस्सियाँ गायब थीं, लेकिन उसका पूरा 48 साल का गदराया बदन अभी भी पूरी तरह नंगा था। कपड़े का एक कतरा भी उसकी गोरी काया पर नहीं था। रात का वह रहस्यमयी शिकारी उसे चोदने के बाद न केवल खोल चुका था, बल्कि इतनी खामोशी से उसे अंदर कमरे में लाकर सुला गया था कि उसे भनक तक नहीं लगी।

सविता ने जैसे ही अपनी टांगें फैलाईं, उसे अपनी चूत के घने बालों पर सूख चुका गाढ़ा और पपड़ीदार मर्दाना पानी महसूस हुआ। वह रसीला माल उसकी गोरी जांघों के अंदरूनी हिस्सों पर भी सूखकर सफेद लकीरें बना चुका था, जो कल रात की उस भयंकर चोदना की गवाही दे रहा था।

indira_varma_nude_kama_sutra.jpg


अपनी इस नग्न हालत को देखने के बाद भी, आज सविता के चेहरे पर कोई खौफ नहीं था। इसके विपरीत, रात की उस आलिंगनबद्ध चोदना को याद करके उसके रसीले होठों पर एक बेहद प्यारी और शर्मीली मुस्कान तैर गई। वह शर्म के मारे अपनी हथेलियों से अपना चेहरा छिपाने लगी। उसे खुद पर हैरत हो रही थी कि वह एक अनजान साए के आगे इस कदर टूट कैसे गई? उसने एक आम देहाती औरत की तरह रोते-बिलखते हुए अपने दिल का एक-एक दुख, अपने जेठ और ससुर की वो घिनौनी हवस की बातें उस मर्द के सामने क्यों बयां कर दीं?

क्या... क्या उसे उस रोज रात को आने वाले शिकारी से प्यार होने लगा था? सविता का मन इस सोच से घबरा उठा। उसने खुद को झकझोरते हुए सोचा—'नहीं, तू पागल तो नहीं हो गई सविता? उसी मर्द ने पिछले दो महीनों से तुझे नशीली दवा सुंघाकर, रस्सियों से बांधकर ना जाने कितनी बार बेरहमी से निचोड़ा है, तेरे इस भरे-पूरे बदन को एक खिलौने की तरह भोगा है। फिर सिर्फ इसलिए कि वह तेरे पेट में पल रहे इस अनचाहे बच्चे का असली बाप है, तू उसके आगे इतनी लाचार और नरम क्यों पड़ रही है?'


लेकिन सविता का औरत का दिल और उसका शातिर दिमाग अब धीरे-धीरे हकीकत को कुबूल कर रहा था। उसकी इस नरमी का कारण केवल वह बच्चा नहीं था। असल में, उसके पति के मरने के बाद की सालों की वो सूनी जवानी और जिस्म की छुपी हुई तड़प इसका बड़ा कारण थी। और रही-सही कसर कल दोपहर उसके जेठ और ससुर की उस खौफनाक हवस ने पूरी कर दी थी। जहाँ एक तरफ घर के वो दो मर्द उसके जिस्म को नोचने के लिए घात लगाए बैठे थे, वहीं दूसरी तरफ यह अनजान साया उसे बेपनाह चरम सुख और एक अनकहा सा आदर दे रहा था। इस तीखे थ्रिल और कामुकता के जाल में वह अब पूरी तरह फंस चुकी थी।
बहुत ही शानदार और बेहतरीन अपडेट!
कहानी बहुत ही दिलचस्प और रोचक है !
👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻
 
  • Like
Reactions: Forbidden Ink

sunoanuj

Well-Known Member
5,334
13,183
189
Update 06

अरहर के ऊंचे खेतों के बीच खड़ी सविता को अब अपने जेठ और ससुर, दोनों से घिन आने लगी थी। उसके तन-बदन में एक सिहरन दौड़ गई। उसने घृणा और बेबसी से कमला की तरफ देखा और रोते हुए कहा, "दीदी... तुम कैसी बातें कर रही हो? अगर मैंने उन दोनों में से किसी एक की भी बात मान ली, तो क्या मेरी बदनामी रुक जाएगी? तुम सोच भी कैसे सकती हो? अगर मैंने आज हामी भर दी, तो वो दोनों भूख से पागल भेड़िये हैं। फिर वो सिर्फ रात के सन्नाटे में बंद कमरे के भीतर नहीं रुकेंगे। फिर तो दिन हो या रात... जब उनका मन करेगा, वो मेरे इस बदन को नोंचेंगे, मुझे अपनी मर्जी से भोगेंगे!"

rafiath_rashid_mithila_new_movie_o_abhagi_based_on_saratchandra_chattopadhyaya_short_story_abhagir_swargo-sixteen_nine.jpg


सविता अपने आँसुओं को पोंछते हुए पगडंडी पर बैठ गई। उसे अच्छी तरह पता था कि इस समाज के मर्द उसकी इस भारी और गदराई काया के लिए कितने तड़पते हैं। जब से उसके पति इस दुनिया को छोड़कर गए थे, उसने अपनी आधी जिंदगी सिर्फ राह चलते मर्दों की उन भूखी और गंदी नजरों से खुद को बचाने में निकाल दी थी। लेकिन तब तक उसके दिल में कम से कम यह सहारा और तसल्ली थी कि उसके घर के भीतर दो मर्द मौजूद हैं। वह अपने जेठ को बड़े भाई जैसा और ससुर को अपने सगे पिता के समान मानती थी। उसे लगता था कि ये दोनों उसकी इज्जत की रक्षा करेंगे, समाज के भेड़ियों के सामने उसकी ढाल बनेंगे।

लेकिन आज... आज उनके दिलों में अपने ही घर की बहू के जिस्म के लिए सुलगती हुई घिनौनी आग को देखकर वह अंदर से पूरी तरह टूट चुकी थी। बड़े भाई जैसा जेठ और पिता समान ससुर, दोनों ही उसकी आबरू के भूखे शिकारी निकले।

सविता को याद आया कि कमला अक्सर घर के काम करते हुए हँसते-मजाक में जेठ और ससुर का नाम लेकर उसे चिढ़ाती थी। तब सविता उसे डांट देती थी। लेकिन आज कमला का वह मजाक, कोई मजाक नहीं रह गया था। वह एक बेहद कड़वी और नग्न सच्चाई के रूप में उसके सामने खड़ा था। सविता ने सुबकते हुए कहा, "कमला दीदी... तुम तो सिर्फ हंसी-मजाक में उनका नाम लेती थीं, लेकिन मुझे क्या पता था कि उन दोनों की सोच इस हद तक घटिया और नीच होगी!"

असल में, सविता का कातिलाना और रसदार बदन ही ऐसा था कि कोई भी मर्द उसे एक बार देख ले तो अपनी सुध-बुध खो बैठता था। अब जब जेठ और ससुर दोनों को यह सुनहरा मौका मिला, तो दोनों ने अपनी पूरी कोशिश लगा दी कि बच्चे को नाम देने के बहाने इस बेसहारा विधवा के मखमली जिस्म से उम्र भर खेलने का लाइसेंस मिल जाए।

सविता जो बहू बनकर अब तक इस घर में पूरे स्वाभिमान से रहती थी, जो कभी इन दोनों मर्दों को घास तक नहीं डालती थी, आज जब वह किसी अनजान का बच्चा अपने पेट में लेकर उनके सामने लाचार खड़ी थी, तो उन दोनों की नजरों में उसकी बची-खुची इज्जत भी गायब हो चुकी थी। अब वह उनके लिए घर की संस्कारी बहू नहीं थी। अब वे उसे एक बिल्कुल अलग, गंदी नजर से देख रहे थे—एक ऐसी प्यासी और आवारा औरत, जिसे बस रात के अंधेरे में चुदने का चस्का लग चुका है, और जिसे यह भी होश नहीं है कि उसके पेट में पल रहे बच्चे का असली बाप कौन है! उनके दिमाग में यही चल रहा था कि यह रण्डी ना जाने किस-किस के नीचे सोकर अपनी आग बुझाती रही है।

शाम ढली और रात का घना अंधेरा पूरे घर पर छा गया। सविता अपने कमरे में अकेली बैठी थी। उसने खिड़की से बाहर देखा, जहाँ आसमान में काले बादल छाए हुए थे। अचानक उसके शातिर होते दिमाग में एक बिजली सी कौंधी। उसने एक बड़ा फैसला किया।

वह खुद से बुदबुदाई, "नहीं... आज रात मैं इस बंद और अंधेरे कमरे के भीतर पैर भी नहीं रखूंगी। हर बार मैं इसी कालकोठरी में सोती हूँ और कोई अंधेरे का फायदा उठाकर, नशीली चीज सुंघाकर मेरे इस बदन के साथ खिलवाड़ करके चला जाता है। यह ख्याल मुझे पहले क्यों नहीं आया?"

सविता ने तुरंत अपनी हिम्मत जुटाई। उसने कमरे से अपनी लकड़ी की खाट उठाई और उसे घसीटते हुए आँगन के ठीक बीचों-बीच, खुले आसमान के नीचे ले आई। आज रात हवा थोड़ी ठंडी थी। सविता ने अपनी साड़ी को अपने भारी बदन पर अच्छी तरह से लपेटा, ब्लाउज की हुक को कसकर चेक किया और खाट पर लेट गई।

rathinirvedam_swetha_menon_hot_pics_posters29.jpg


उसे पूरा यकीन था कि आज खुले आँगन में उसके साथ कुछ भी गलत नहीं हो पाएगा। अगर कोई दबे पाँव उसकी तरफ बढ़ने की हिमाकत भी करेगा, तो आँगन के खुलेपन में उसकी आहट हो जाएगी। और अगर किसी ने आज दोबारा उसे हाथ लगाने की कोशिश की... तो वह झटके से उठकर उसका चेहरा साफ-साफ देख लेगी। इस तरह उसे अपने पेट में पल रहे बच्चे के असली बाप का पता हमेशा के लिए चल जाएगा। वह आज शिकारी को खुद जाल में फंसाने के लिए तैयार थी।

आँगन के सन्नाटे में लेटे-लेटे सविता आसमान के तारों को निहार रही थी। दिन भर की थकान, जेठ और ससुर की घिनौनी बातें, और दिमाग में चल रहे इस भयंकर बवंडर के बीच सविता को समझ ही नहीं आया कि कब उसकी भारी-भारी आँखें बंद हो गईं और वह एक गहरी, बेखबर नींद के आगोश में समा गई...

रात का सन्नाटा गहरा चुका था। खुले आँगन के बीचों-बीच बिछी खाट पर सोई सविता की आँख जब खुली, तो उसके पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। हवा की वो ठंडी छुअन जो उसे सोते वक्त महसूस हो रही थी, अब गायब थी। उसकी आँखों के सामने सिर्फ और सिर्फ भयंकर, गहरा काला अंधेरा था। उसने घबराकर अपनी पलकें झपकानी चाहीं, पर उसकी आँखों पर एक मोटा, मखमली कपड़ा कसकर बंधा हुआ था। वह अपनी आँखों को हिला भी नहीं पा रही थी।

एक खौफनाक सिहरन उसके 48 साल के भारी और गदराए बदन में दौड़ गई। उसने डरकर अपने हाथ-पैर हिलाने की कोशिश की, पर उसके दोनों गोरे, भारी हाथ और कसरती पैर खाट के चारों पायों से सूती रस्सियों के सहारे बड़ी बेरहमी से जकड़े जा चुके थे। वह पूरी तरह बेबस, लाचार और बंधक थी। उसने अपनी छाती को सिकोड़ना चाहा, तो उसे अहसास हुआ कि उसके बदन पर कपड़े का एक धागा तक नहीं था। उसकी भारी साड़ी, उसका ब्लाउज, उसकी पेटीकोट... सब कुछ उसके जिस्म से उतारकर एक तरफ फेंका जा चुका था। खुले आँगन की ठंडी रात में उसका मलाई जैसा गोरा, भारी-भरकम और रसदार नंगा बदन पूरी तरह से खुला पड़ा था।

fifty-shades-of-grey-splash.jpg


वह खौफ से चीखने ही वाली थी कि तभी... रात के उस सन्नाटे को चीरती हुई एक बेहद गर्म, मर्दाना स्पर्श उसकी जांघों पर महसूस हुआ। सविता का पूरा वजूद काँप उठा। उसका दिल इतनी जोर से धड़कने लगा मानो छाती फाड़कर बाहर आ जाएगा। उसे लगा कि आज फिर वही शिकारी आ गया है, जो पिछले दो महीने से उसके साथ यह खेल खेल रहा था। लेकिन... अगले ही पल कुछ ऐसा हुआ जिसने सविता के भीतर के डर को एक गहरे, नशीले सन्नाटे में बदल दिया।

आज उस अनजान मर्द के हाथों में वो पुरानी हैवानियत नहीं थी। उसके मजबूत, भारी हाथ सविता के सुडौल नितंबों और भारी जांघों को बहुत ही नरमी से, धीरे-धीरे सहला रहे थे। उसकी उंगलियाँ सविता के मखमली गोरे बदन पर किसी रेशम की तरह रेंग रही थीं। अचानक, उस मर्द के झुके हुए भारी बदन की गर्म सांसें सविता के गले और छाती पर महसूस हुईं। उसके गीले, रसीले होठों ने सविता के फूले हुए, विशाल स्तनों को बहुत ही कोमलता से चूमना शुरू कर दिया। वह उन्हें बेरहमी से भींच नहीं रहा था, बल्कि किसी अनमोल खजाने की तरह सहला रहा था।

28680181.gif


सविता इस अनपेक्षित, बेहद प्यार भरी छुअन से धीरे-धीरे एक अजीब सी मदहोशी के दलदल में धंसने लगी। दोपहर में खेतों में जेठ की वो गंदी नजरें, बूढ़े ससुर की वो घिनौनी और कड़क आवाज में दी गई धमकी, और कमला की वो कड़वी बातें... सविता के दिमाग से वो सारा दर्द, वो सारी घिन एक पल में धुलने लगी। जेठ और ससुर की बातें याद करके उसे उन दोनों से नफरत सी होने लगी थी। उनकी तुलना में, इस अनजान मर्द का यह कोमल स्पर्श उसे अपनी खुद की मिल्कियत जैसा लगने लगा। उसे अहसास हुआ कि यह साया जो भी है, उसे केवल दर्द नहीं, बल्कि चरम सुख भी दे रहा है।

वह अनजान मर्द धीरे-धीरे नीचे की तरफ खिसका। उसके दोनों हाथों ने सविता के उस उभरे हुए, दो महीने के गर्भवती पेट को बहुत ही प्यार से सहलाया। वह काफी देर तक सविता के पेट पर अपने होठों को रखकर चूमता रहा, मानो वह इस अनचाही गर्भावस्था से, अपने उस आने वाले अंश से बेहद खुश हो। एक मर्द का अपनी होने वाली संतान के प्रति यह मौन प्यार देखकर सविता का औरत का दिल पूरी तरह पिघल गया।

unk_bhj_kiss.gif


इस मीठी छुअन और कामुकता के चरम ने सविता के भीतर एक ऐसी आग सुलगा दी कि उसकी मतवाली चूत ने पसीने के साथ-साथ अपना गाढ़ा, रसीला पानी छोड़ना शुरू कर दिया। उसका पूरा बदन काम-वासना की आँच में तप रहा था। तभी, उस मर्द के गर्म होठ सविता की जांघों के बीच, उसकी कामुकता के केंद्र पर आकर टिक गए। उसने अपनी गीली, गर्म जुबान से सविता की चूत को चाटना शुरू कर दिया। वह उसे इतनी गहराई और दीवानगी से चख रहा था कि सविता खाट पर बंधे होने के बावजूद अपनी पतली कमर को ऊपर-नेचे लहराने लगी।

11583063.gif


वह मर्द उसे तब तक लगातार चाटता रहा, जब तक कि सविता का अंग-अंग काँप नहीं गया और उसका सारा पानी एक तेज फव्वारे की तरह बाहर नहीं निकल गया। सविता अभी इस सुख के झटके से संभल भी नहीं पाई थी कि वह तगड़ा, भारी मर्द पूरी तरह से उसके ऊपर लेट गया। उसका भारी मर्दाना वजन सविता के 48 साल के गरदाई बदन पर आ गिरा। तभी... सविता को अपनी जांघों के बीच एक बेहद गर्म, लोहे जैसा सख्त और विशाल लँड महसूस हुआ।

जब उस मर्द ने अपने लँड की नोक को सविता की चूत के गीले छेद पर टिकाया और एक धीमा, गहरा धक्का मारा... तो सविता की आँखें पट्टी के पीछे फटी की फटी रह गईं। आज नशीली दवा का असर कम था, और क्योंकि वह मर्द बहुत ही आराम से और बिना किसी जल्दबाजी के सब कुछ कर रहा था, इसलिए सविता को आज उसके आकार का एक-एक इंच अपने भीतर उतरते हुए पूरी बारीकी से महसूस हुआ।

42209431.gif


उसकी बंद आँखों के सामने उस मर्दानगी का आकार तैर गया। वह अंदर ही अंदर सिहर उठी—यह लँड कम से कम 8 से 9 इंच लंबा था, और उसकी मोटाई... उसकी मोटाई सविता की अपनी गोरी और भारी कलाई जितनी चौड़ी थी! जब वह मोटा मूसल उसकी तंग चूत को फाड़ता हुआ अंदर धंसा, तो सविता के पूरे बदन में एक मीठा, तीखा दर्द दौड़ गया।

पर आज उस दर्द में एक अनोखा नशा था। जहाँ एक तरफ जेठ और ससुर का घिनौना रूप था, वहीं इस अनजान मर्द के इस धीमे, गहरे और प्यार भरे धक्कों ने सविता के दिल में एक अजीब सा खिंचाव पैदा कर दिया था। उसे इस साए से, इस अनजान शिकारी से जैसे एक अनजाना प्यार होने लगा था।

39153


वह मर्द जब बहुत ही धीमी, लयबद्ध रफ्तार से उसके भीतर आ-जा रहा था, तो सविता आज पहली बार दिल से खुश थी। शायद एक वजह यह भी थी कि उसे अब यकीन हो चुका था कि इसी तगड़े मर्द का बीज उसके पेट में पल रहा है। और एक औरत की यह सबसे बड़ी कमजोरी और खूबसूरती होती है कि जिसके अंश को वह अपने पेट में पालती है, उसके आगे वह अपनी रूह, अपना जिस्म और अपनी हर मर्यादा चुपचाप हार बैठती है। वह पूरी तरह उस अनजान लँड के नीचे खुद को सौंप चुकी थी।

खुले आँगन में ठंडी हवा चल रही थी, लेकिन सविता का गोरा, गदराया हुआ बदन उस भारी मर्द के नीचे कामुकता की तपन से सुलग रहा था। वह मर्द बिना किसी जल्दबाजी के, बहुत ही हक्के-हल्के और गहरे धक्के मारते हुए सविता की तंग चूत को तृप्त कर रहा था। उसके होठ लगातार सविता के कांपते हुए गुलाबी होठों, उसके गले और छाती के भारी उभारों को चूम रहे थे। इस कोमल मर्दाने एहसास, और दिन भर के झेले हुए अपमान के बोझ ने अचानक सविता के भीतर भावनाओं का एक बांध तोड़ दिया।

वह पट्टी बंधी आँखों के पीछे से बिलख-बिलख कर रोने लगी। उसका पूरा भारी जिस्म धक्कों की लय के साथ हिल रहा था। उसने हिचकी लेते हुए कांपती आवाज में अपने दिल का गुबार निकालना शुरू किया, "कौन हो तुम... कुछ बोलते क्यों नहीं? क्यों मुझे इस तरह रोज तड़पाते हो? जानते हो... आज मेरे साथ क्या हुआ? आज मैं जीते-जी मर गई..."

5SUz.gif


सविता की इस पहली बात पर, उस मर्द ने कुछ बोले बिना अपनी मजबूत कमर को पीछे खींचा और सविता के भीतर एक गहरा, तेज धक्का मारा—धप्प! उसकी मोटाई ने सविता की चूत की दीवारों को भीतर तक हिला दिया। वह धक्का जैसे उसका जवाब था कि 'मैं सुन रहा हूँ।'

सविता ने कराहते हुए अपने भारी स्तनों को खाट की रस्सियों में ही भींचने की कोशिश की और आगे बोली, "शुरुआत में... शुरुआत में जब तुम आते थे, तो मुझे तुमसे इतनी घिन आती थी... इतना डर लगता था कि मैं लोक-लाज के मारे कुएँ में कूद जाना चाहती थी। मुझे लगता था कि कोई राक्षस मेरी आबरू को रोज लूट कर चला जाता है। लेकिन आज... आज जब मुझे पता चला कि मैं पेट से हूँ, तो मेरे पैरों तले से जमीन खिसक गई..."

27751220.gif


सविता की आखों से आसू पट्टी से सरकते हुए उसके गालों पे आ रहे थे। मर्द ने उसके आंसू पोंछने के लिए अपना अंगूठा उसके गाल पर फेरा, और फिर से एक तेज, गहरा झटका दिया—धप्प! उसकी जांघें सविता के भारी नितंबों से जोर से टकराईं। सविता को उसका यह बेबाक अंदाज इस वक्त दुनिया का सबसे बड़ा सहारा लग रहा था। कोई तो था, जो बिना कुछ कहे उसकी रूह को सुन रहा था।

सविता ने रोते हुए अपना सिर खाट पर पटकते हुए आगे कहा, "दीदी मुझे आज खेतों में जेठ जी के पास ले गई थी। मुझे लगा था वो बड़े भाई जैसे हैं, मेरी इज्जत बचाएंगे। पर... पर वो तो जानवर निकले। वो मेरी लाचारी का फायदा उठाकर सरेआम मेरे इस 48 साल के बदन का सौदा करने लगे। मेरी कमर, मेरी चूत, मेरे इन भारी थनों को घूरते हुए बोले कि अगर मैं रोज उनके नीचे सोऊँगी, तभी वो मेरे इस बच्चे को अपना नाम देंगे। तुम कुछ बोलते क्यों नहीं? क्या तुम्हें तरस नहीं आता मुझ पर?"

सवाब में उस मर्द ने सविता के दोनों होठों को अपने मुँह में भर लिया और उन्हें इतनी दीवानगी से चूसा कि सविता की सांसें अटक गईं। चूसते हुए ही उसने नीचे से एक और तीखा, कड़ा धक्का मारा जिसने सविता की नाभि तक सिहरन दौड़ा दी।

20869869.gif


सविता ने मुँह छूटते ही हांफते हुए आगे कहा, "जेठ तो जेठ... जिसे मैं अपना पिता समझ रही थी, उस बूढ़े ससुर की सोच तो उससे भी ज्यादा नीच निकली। वो मुझे पूरे गाँव के सामने रण्डी और कुतिया बोल रहे थे। कह रहे थे कि ना जाने यह किस-किस से चुदकर अपना मुंह काला करवा के आई है। और फिर... फिर अपनी औकात पर आ गए। बोले कि खानदान की नाक बचानी है, तो मुझे हर रात उनके कमरे में, उनकी खाट पर उनके साथ सोना होगा। वो सुरक्षा के बहाने मेरे इस गदराए जिस्म को अपनी मर्जी से निचोड़ना चाहते हैं। मैं कहाँ जाऊँ? इस दुनिया में मेरा कोई नहीं है..."

उस मर्द ने सविता के गर्भवती पेट पर अपना भारी हाथ रखा, उसे बहुत ही प्यार से सहलाया, और फिर से पूरी ताकत से एक गहरा मूसल अंदर धंसा दिया—धप्प! सविता के मुँह से एक तीखी सिसकारी निकल गई। उस धक्के में एक अजीब सा गुस्सा और सांत्वना दोनों छुपी हुई थी।

432808-all-the-way-in.gif


अब सविता की चूत पूरी तरह से रस छोड़ चुकी थी। वह चरम सुख के बिल्कुल करीब थी। उसका पूरा वजूद इस अनजान मर्द के प्यार और कलाई जैसे मोटे लँड के आगे घुटने टेक चुका था। उसने अपनी आख़िरी मर्यादा को भी हवा में उड़ा दिया। वह तड़पते हुए, खाट की रस्सियों को अपनी उंगलियों में भींचते हुए चिल्लाकर बोली, "मुझे अब कोई ऐतराज नहीं है... सुन रहे हो तुम? मुझे कोई लाज-शर्म नहीं चाहिए! तुम मुझे आज ही, इसी वक्त यहाँ से दूर ले जाओ। बहुत दूर... जहाँ ये घिनौने रिश्ते ना हों। मैं पूरी जिंदगी सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी बन कर रहना चाहती हूँ। मैं इस बच्चे के लिए, इस पेट के लिए कभी कुछ नहीं पूछूंगी... बस तुम मेरे इस बच्चे को अपना नाम दे दो... मुझे अपना बना लो!"

यह आखिरी गुहार सुनते ही उस मर्द के भीतर की कामुकता का सैलाब भी बांध तोड़ गया। उसने सविता के दोनों भारी स्तनों को अपने मजबूत हाथों में जकड़ा। उसने एक के बाद एक कई बेहद तेज, कड़े और ताबड़तोड़ धक्के मारने शुरू कर दिए—धप्प! धप्प! धप्प!

167132-hitting-it-hard.gif


सविता का भारी, गोरा बदन खाट पर पागलों की तरह लहराने लगा। उसकी चूत का सारा पानी एक बार फिर फव्वारे की तरह छूट गया। ठीक उसी पल, उस मर्द ने एक आखिरी, बेहद गहरा और आख़िरी दम तक का झटका मारा, और अपना सारा गर्म, गाढ़ा माल सविता की चूत के गहरे कुएँ में पूरी ताकत से उड़ेल दिया। लँड की गर्मी जब सविता के भीतर फैली, तो उसे एक परम सुकून का अहसास हुआ।

30468196.gif


चोदने के बाद वह मर्द कुछ देर सविता के ऊपर ही हांफता रहा। फिर वह धीरे से नीचे उतरा। उसने कुछ भी नहीं कहा, एक लफ्ज़ भी नहीं बोला। उसने बस बहुत ही गहराई और प्यार से सविता के माथे पर अपने होठ रखे, उसे चूमा, और दबे पाँव आँगन के अंधेरे में ओझल हो गया।

EMKWUGpXYAEuHua.jpg


सविता खाट पर उसी नंगी, बंधी हुई हालत में लेटी रही। जहाँ एक तरफ उसकी चूत से जेठ और ससुर के बजाय इस अपने मर्द का माल बाहर बह रहा था जिससे उसे एक मीठा सुकून मिल रहा था, वहीं दूसरी तरफ उस मर्द के कुछ भी ना बोलने और उसे उसी हाल में छोड़कर चले जाने से उसका दिल एक गहरी निराशा और उदासी से भर गया। वह बस आँसू बहाते हुए सुबह के उजाले का इंतजार करने लगी।

अपने सीने में बरसों से दबा सारा दर्द सविता ने कल रात उस साए के सामने उगल दिया था। अपनी आबरू का वो सबसे बड़ा सच बयां कर देने के बाद, आज उसका मन अंदर से बहुत हल्का महसूस कर रहा था। रात का वह भयंकर तूफ़ान थम चुका था, लेकिन सविता को अभी भी अपनी जांघों के बीच उस भारी मर्द के लँड की चौड़ाई का गहरा अहसास हो रहा था। उसकी मोटाई सविता के अपने हाथ की गोरी और भारी कलाई जितनी थी, जो उसकी तंग चूत को भीतर तक फैलाए हुए थी। चोदने के बाद उस मर्द का जो गाढ़ा, गर्म पानी सविता के अंतस में छूटा था, वह उसकी अंदरूनी दीवारों के मीठे दर्द को किसी गर्म सिकाई की तरह आराम दे रहा था। वह चिपचिपा मर्दाना रस धीरे-धीरे उसकी जांघों से बहकर नीचे खाट के सूती बिछौने को पूरी तरह भिगो चुका था। उस भीगे हुए सुकून और थकान के बीच सविता को पता ही नहीं चला कि कब उसकी भारी आँखें लग गईं।

जब सुबह के सूरज की पहली मखमली किरणें आँगन को चीरती हुई सविता के जिस्म पर पड़ीं, तो उसकी तंद्रा टूटी। उसने भारी पलकों को झपकाते हुए अपनी आँखें खोलीं, तो उसके होश उड़ गए। वह बाहर खुले आँगन में नहीं, बल्कि अपने ही घर के भीतर, अपने उस बंद कमरे की खाट पर सो रही थी! उसकी आँखों की पट्टी और हाथ-पैर की रस्सियाँ गायब थीं, लेकिन उसका पूरा 48 साल का गदराया बदन अभी भी पूरी तरह नंगा था। कपड़े का एक कतरा भी उसकी गोरी काया पर नहीं था। रात का वह रहस्यमयी शिकारी उसे चोदने के बाद न केवल खोल चुका था, बल्कि इतनी खामोशी से उसे अंदर कमरे में लाकर सुला गया था कि उसे भनक तक नहीं लगी।

सविता ने जैसे ही अपनी टांगें फैलाईं, उसे अपनी चूत के घने बालों पर सूख चुका गाढ़ा और पपड़ीदार मर्दाना पानी महसूस हुआ। वह रसीला माल उसकी गोरी जांघों के अंदरूनी हिस्सों पर भी सूखकर सफेद लकीरें बना चुका था, जो कल रात की उस भयंकर चोदना की गवाही दे रहा था।

indira_varma_nude_kama_sutra.jpg


अपनी इस नग्न हालत को देखने के बाद भी, आज सविता के चेहरे पर कोई खौफ नहीं था। इसके विपरीत, रात की उस आलिंगनबद्ध चोदना को याद करके उसके रसीले होठों पर एक बेहद प्यारी और शर्मीली मुस्कान तैर गई। वह शर्म के मारे अपनी हथेलियों से अपना चेहरा छिपाने लगी। उसे खुद पर हैरत हो रही थी कि वह एक अनजान साए के आगे इस कदर टूट कैसे गई? उसने एक आम देहाती औरत की तरह रोते-बिलखते हुए अपने दिल का एक-एक दुख, अपने जेठ और ससुर की वो घिनौनी हवस की बातें उस मर्द के सामने क्यों बयां कर दीं?

क्या... क्या उसे उस रोज रात को आने वाले शिकारी से प्यार होने लगा था? सविता का मन इस सोच से घबरा उठा। उसने खुद को झकझोरते हुए सोचा—'नहीं, तू पागल तो नहीं हो गई सविता? उसी मर्द ने पिछले दो महीनों से तुझे नशीली दवा सुंघाकर, रस्सियों से बांधकर ना जाने कितनी बार बेरहमी से निचोड़ा है, तेरे इस भरे-पूरे बदन को एक खिलौने की तरह भोगा है। फिर सिर्फ इसलिए कि वह तेरे पेट में पल रहे इस अनचाहे बच्चे का असली बाप है, तू उसके आगे इतनी लाचार और नरम क्यों पड़ रही है?'


लेकिन सविता का औरत का दिल और उसका शातिर दिमाग अब धीरे-धीरे हकीकत को कुबूल कर रहा था। उसकी इस नरमी का कारण केवल वह बच्चा नहीं था। असल में, उसके पति के मरने के बाद की सालों की वो सूनी जवानी और जिस्म की छुपी हुई तड़प इसका बड़ा कारण थी। और रही-सही कसर कल दोपहर उसके जेठ और ससुर की उस खौफनाक हवस ने पूरी कर दी थी। जहाँ एक तरफ घर के वो दो मर्द उसके जिस्म को नोचने के लिए घात लगाए बैठे थे, वहीं दूसरी तरफ यह अनजान साया उसे बेपनाह चरम सुख और एक अनकहा सा आदर दे रहा था। इस तीखे थ्रिल और कामुकता के जाल में वह अब पूरी तरह फंस चुकी थी।
बहुत ही शानदार और बेहतरीन अपडेट!
कहानी बहुत ही दिलचस्प और रोचक है !
👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻
 
  • Like
Reactions: Forbidden Ink

Forbidden Ink

Your Friendly Neighborhood
59
86
19
Behad Umda, Lajawab, Kamuk, Rahasyamai aur Shandar update . Kuchh sawal yaksh ki tarah khade hai. Akhir kaun hai vah shakhs ? Yah Raaz kab tak uajagar hoga ? Kya Savita youn hi Bebasi aur lachari me bina Jane uske bachche ko janm degi ? Ya fir samaj aur ghar walo bete ki badnami ke darr se bhag jayegi ya atmahatya kar legi ? In sab ka jawab aane wale updates se hi pata chalega. Thanks.
Thank you Bhai itana detail me comments karane ke liye
 
  • Like
Reactions: Ashiq Baba
🔥 Read Next Hot Story →
Discover more exclusive stories

Forbidden Ink

Your Friendly Neighborhood
59
86
19
Update 07

वक्त अपनी रफ्तार से सरकता रहा और देखते ही देखते दो महीने और बीत गए। सविता की गर्भावस्था का अब पाँचवाँ महीना चल रहा था। समय के साथ-साथ उसके भीतर का खौफ भी पूरी तरह बदल चुका था। अब रात का वह घनेरा अंधेरा और उस अनजान मर्द की आहट उसे डराती नहीं थी, और ना ही अब उसे अपनी खाट पर होने वाली उस कामुक चोदना से कोई ऐतराज था। वह खौफनाक खेल अब उसकी जिंदगी का एक नशीला हिस्सा बन चुका था।

हालाँकि, हर रात जब वह साया उसके बदन पर चढ़ता, तो सविता अपनी पट्टी बंधी आँखों के पीछे से बिलखती हुई उसके आगे गिड़गिड़ाती थी। वह हर बार उस तगड़े मर्द के चौड़े कांधों को भींचते हुए कहती, "अब तो मान जाओ... कुछ तो बोलो। मेरा पाँचवाँ महीना लग गया है। अब इस पेट को दुनिया से छिपाना नामुमकिन होता जा रहा है। मेरे इस बच्चे को अपना नाम दे दो... मुझे इस नरक से निकाल लो।" लेकिन वह रहस्यमयी मूक शिकारी उसकी मिन्नतें सुनकर भी एक लफ्ज़ नहीं बोलता था। वह बस और ज्यादा गहराई, और ज्यादा प्यार से उसके गदराए बदन को चूमते हुए अपनी कलाई जितनी मोटी मर्दानगी से उसकी चूत को शांत कर देता था।

big-boobs-hot-babe-fucked-big-dick.gif


कभी-कभी जब सविता अपनी बेबसी में आकर नखरे करने लगती, अपना मुँह फेर लेती या उस लँड को अंदर लेने से कतराती, तो वह मर्द और ज्यादा हिंसक हो जाता था। वह बिना कोई रहम दिखाए, सविता के दोनों भारी नितंबों को हवा में उठाकर और ज्यादा बेरहमी और ताकत से ताबड़तोड़ धक्के मारना शुरू कर देता था। उसकी चूत को तब तक बेदर्दी से मसला जाता जब तक कि सविता पूरी तरह टूट कर पानी-पानी नहीं हो जाती थी। अब तो हालत यह थी कि सविता रात होने से पहले ही खुद अपने सारे कपड़े उतारकर खाट पर बिल्कुल नग्न लेट जाती थी। वह अपनी मलाई जैसी गोरी, भारी और सुडौल काया को फैलाए हुए जागती आँखों से सिर्फ इसी इंतजार में रहती थी कि कब उसका वह साया, उसका असली मर्द और उसका सहारा बनकर आने वाला लँड कमरे की कुंडी खोलेगा।

लेकिन दिन का उजाला होते ही हकीकत की तपिश उसे झुलसाने लगती थी। पाँचवें महीने में सविता का पेट अब साफ बाहर की तरफ दिखने लगा था। उसकी साड़ी के पल्लू से भी अब वह गदराया हुआ उभार छिप नहीं पाता था। गाँव की औरतें जब कुएं पर या आँगन में उसे देखतीं, तो कानाफूसी शुरू हो चुकी थी। गाँव-बस्ती की गलियों में यह तीखी बातें हवा की तरह फैल रही थीं कि चिंटू के पापा को मरे जमाना बीत गया, फिर भी यह गोरी विधवा पेट से कैसे घूम रही है। चारों तरफ बदनामी का कीचड़ तैयार हो रहा था।

इस गिरती हुई इज्जत को देखकर घर के भीतर बैठे दोनों भेड़िये, यानी उसका जेठ और बूढ़ा ससुर, एक बार फिर घात लगाकर बैठ गए थे। जब भी कमला किसी काम से बाहर जाती या चिंटू खेतों की तरफ होता, ये दोनों अलग-अलग मौकों पर सविता को अकेले पाकर घेर लेते थे।

जेठ दीवारों से सटकर खड़ा हो जाता और उसकी पतली कमर और फूले हुए पेट को भूखी नजरों से नापते हुए दबी आवाज में लालच देता, "देख सविता, गाँव में थू-थू शुरू हो चुकी है। अभी भी मौका है, मान जा मेरी शर्त। अपने इस रसीले जिस्म की चाबी मुझे सौंप दे, फिर देख मैं कैसे पूरे गाँव का मुँह बंद करके इस बच्चे को अपना नाम देता हूँ।"

वहीं दूसरी तरफ, बूढ़ा ससुर अपनी मूंछों को ताव देते हुए हुक्का गुड़गुड़ाता और अपनी कड़क, मर्दानी आवाज में कमरे के कोने में उसे डराता, "रण्डी, पाँचवाँ महीना है। कुछ दिनों में बच्चा आँगन में रोएगा। अगर खानदान की चौखट के भीतर सिर छिपाना है, तो मेरी खाट पर आना ही पड़ेगा। मेरे कमरे में सोएगी, तो यह बच्चा जमींदार का खून कहलाएगा, वरना दुनिया तुझे लात मारकर बाहर फेंक देगी।"

दोनों मर्द उसे अपनी हवस की आग में झोंकने के लिए पूरी कोशिश कर रहे थे। लेकिन इन सब के बीच सविता के पास सिर्फ एक ही सबसे मजबूत ढाल थी—उसका 24 साल का जवान बेटा चिंटू। सविता अंदर से बहुत अच्छी तरह जानती थी कि जब तक उसका गबरू बेटा घर के भीतर मौजूद है, तब तक उसके जेठ या बूढ़े ससुर की इतनी औकात नहीं है कि वो जबरदस्ती उसकी साड़ी पर हाथ डाल सकें या उसके साथ कोई जोर-जबरदस्ती कर सकें। चिंटू का खौफ ही था जिसने उन दोनों भेड़ियों को सिर्फ अकेले में जुबान चलाने तक महदूद कर रखा था। लेकिन सविता को यह भी पता था कि यह शांति सिर्फ तूफान से पहले की है, क्योंकि जैसे ही चिंटू के सामने यह सच आएगा, घर के भीतर एक खूनी बवंडर उठना तय था।

गाँव में एक दूर के रिश्तेदार के यहाँ शादी थी। घर के सभी लोग—बूढ़ा ससुर, जेठ और कमला—तैयार होकर शाम को ही शादी वाले घर चले गए थे। लेकिन सविता ने जाने से साफ़ मना कर दिया था। वह अब ऐसे किसी भी माहौल या भीड़-भाड़ से दूर भागती थी जहाँ लोगों की तीखी नजरें सीधे उस पर पड़ें। पाँचवें महीने का पेट अब साड़ी के भारी सूती पल्लू से भी पूरी तरह छिपता नहीं था। वह जब भी बाहर निकलती, गाँव की औरतें उसे देखते ही आपस में कानाफूसी करने लगती थीं। वे ऐसे-ऐसे तीखे, कड़वे और नुकीले सवाल पूछती थीं कि सविता का मन करता था कि ज़मीन फट जाए और वह ज़िंदा उसी वक्त उसमें धंस जाए। वह सूने घर में अकेली अपनी पुरानी लकड़ी की खाट पर बैठी अपनी फूटी किस्मत को कोस रही थी और उसकी आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।

रात काफी गहरा चुकी थी और चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था, तभी चिंटू शहर का काम निपटाकर देर से घर लौटा। हमेशा की तरह सविता अपनी ममता समेटकर खाट से उठी। उसने अपनी साड़ी के पल्लू से जल्दी-जल्दी चेहरे के दुख और आँसूओं को छिपाने की कोशिश की और बड़े लाड से बोली, "आ गया मेरा बच्चा? बहुत देर कर दी आज आने में। बैठ, मैं रसोई से तेरे लिए गरमा-गरम खाना लाती हूँ।"

लेकिन चिंटू ने अपनी माँ की बात का कोई जवाब नहीं दिया। वह अपनी जगह पर काठ की मूरत की तरह जड़ खड़ा रहा। उसका गोरा चेहरा उतरा हुआ था, माथे पर पसीना था और उसकी आँखों में एक अजीब सी गहरी, कड़वी उलझन साफ दिखाई दे रही थी। वह काफी देर तक बिना कुछ बोले चुपचाप खड़ा रहा और किसी गहरी सोच में डूबा रहा। फिर, अचानक उसकी नजरें घूमीं और सीधे सविता के उस फूले हुए, गदराए हुए पाँच महीने के पेट पर टिक गईं, जो साड़ी के भीतर से साफ अपना आकार दिखा रहा था।

चिंटू ने एक भारी और कांपती हुई आवाज में सीधे अपनी माँ की आँखों में झांकते हुए पूछा, "माँ... क्या... क्या गाँव की गलियों में लोग जो बातें कर रहे हैं, वो सब सच कह रहे हैं? क्या तुम सच में...?"

4a336ce81b40aca47e0b688961da892f.jpg


यह सुनते ही सविता के पैर बुरी तरह कांपने लगे। उसने शर्म और लाचारी के मारे अपनी आँखें नीचे झुका लें। वह अंदर से अच्छी तरह समझ गई थी कि अब अपने सगे जवान बेटे से इस सच को और ज्यादा छुपाना मुमकिन नहीं है। उसने सिसकते हुए अपना सिर 'हाँ' में हिला दिया और अपनी दोनों हथेलियों से अपना चेहरा छिपाकर बिलख-बिलख कर रोने लगी। वह अब और ज्यादा इस भारी बोझ को अपने सीने में दबा नहीं सकती थी।

चिंटू का दिल अपनी माँ के इस तरह रोने और आँसू बहाने से पूरी तरह टूट गया। उसका सारा गुस्सा एक पल में गायब हो गया। वह घुटनों के बल सविता के पास खाट के नीचे ज़मीन पर बैठ गया और उसके दोनों गोरे हाथों को अपने हाथों में पकड़कर रुआंसा होकर बोला, "माँ... अगर आपकी जिंदगी में इतना सूनापन था, आप इतनी अकेली थीं, तो मुझसे एक बार कह दिया होता माँ। मैं आपका बेटा था, कोई दुश्मन नहीं। मैं खुद आपकी दोबारा किसी अच्छे और भले आदमी से शादी करवा देता। मैं खुद आपका घर बसा देता जो आपकी कद्र करता, आपका पूरा ख्याल रखता। लेकिन ऐसे... इस तरह आपको पेट से कर कोई चला जाए... माँ, कौन है वो? आप मुझे बस एक बार उसका नाम बताओ, मैं आपको आपका पूरा हक दिला कर रहूँगा माँ!"

चिंटू की आँखों से भी अब आँसू बहने लगे थे। उसने सविता के गोरे, मखमली हाथों को चूमा और बेहद ग्लानि से भरकर आगे बोला, "दिन-रात काम के चक्कर में मेरा ध्यान कभी आप पर गया ही नहीं माँ। मुझे माफ़ कर दो, यह सब मेरी ही लापरवाही की वजह से हुआ है। अगर मैंने आपको पूरा वक्त दिया होता, बेटा बनकर पूरा प्यार दिया होता, तो आप कभी किसी पराए मर्द के प्यार में नहीं पड़तीं माँ। एक बार मुझे सच बता दो कौन है वो... मैं उसके पैर पकड़ लूँगा।"

सविता ने तड़पकर चिंटू का सिर अपने दोनों हाथों से थामा और उसे अपनी भरी हुई छाती से लगा लिया। वह रोते हुए बिलखकर बोली, "नहीं मेरे बच्चे! यह सब क्या पागलपन की बातें बोल रहा है तू? इस बारे में अब और मत सोच। इसमें किसी की कोई गलती नहीं है... यह सब मेरी... मेरी ही गलती है। मैं ही गुनहगार हूँ जो इस उम्र में यह सब कर बैठी। मैं सब सह लूँगी, पूरे गाँव के ताने और गालियां सुन लूँगी, पर तू अपनी जिंदगी इस दलदल में खराब मत कर।"

चिंटू ने झटके से अपनी माँ की छाती से अपना सिर उठाया, उसकी रोती हुई आँखों में अब अचानक भयंकर गुस्सा उतर आया था। उसने कड़ककर कहा, "माँ, आपकी क्या गलती है इसमें? गलती तो उस मर्द की है जिसने आपके इस पवित्र बदन के अंदर अपना बीज बोया है! माँ, आप सच-सच बताओ... कहीं... कहीं आपके साथ किसी ने कोई जोर-जबरदस्ती तो नहीं की? अगर किसी ने आपके साथ गलत काम किया है, तो बस एक बार उसका नाम बताओ माँ, मैं उसे काट डालूँगा!"

चिंटू के मुँह से 'जोर-जबरदस्ती' और 'बीज बोने' की यह नग्न बात सुनकर सविता अंदर तक पूरी तरह सिहर उठी। उसका पूरा बदन काँप गया। वह उसे सच बता भी नहीं सकती थी कि रोज़ रात को क्या होता है। उसने घबराकर तुरंत चिंटू के मुँह पर अपना हाथ रख दिया और रोते हुए बोली, "नहीं मेरे बच्चे! ऐसा कुछ नहीं है, तू शांत हो जा। तू बस अपनी माँ से इस बारे में अब और कोई बात मत कर। तेरा यह बेटा बनकर मेरे पास खड़े रहना ही मेरे लिए बहुत काफी है।"

b5ac7ee30520e7c9375f64263852bbe5.gif


दोनों माँ-बेटे एक-दूसरे के गले लग गए और उस सूने, खामोश घर में एक-दूसरे की बाहों में भरकर फूट-फूट कर रोने लगे। सविता का 48 साल का भरा-पूरा और गदराया हुआ बदन चिंटू के सीने से पूरी तरह सट चुका था। पाँचवें महीने की प्रेगनेंसी की वजह से सविता के विशाल स्तन अब इतने ज्यादा भर चुके थे कि जब वो चिंटू की चौड़ी, जवान छाती पर पूरी ताकत से भींचे गए, तो पूरे कमरे की हवा में एक अजीब सा अहसास घुल गया।

रोते-रोते, जाने-अनजाने में चिंटू को अपनी माँ के उन बेहद भारी, रसीले और फूले हुए स्तनों का बहुत ही गर्म, मखमली और सिहराने वाला स्पर्श महसूस होने लगा। वह मातृत्व की गोद में रो रहा था, लेकिन उस ४८ साल की काया की छुअन और उसके बदन की महक चिंटू के २४ साल के जवान खून के भीतर एक अजीब सी मदहोशी, बेचैनी और वासना का नया करंट पैदा करने लगी। सविता भी उस गहरी छुअन से पूरी तरह बेखबर, अपने बेटे की बाहों में अपना सारा दुख भूलकर सुकून तलाश रही थी, जबकि इस बंद कमरे के भीतर सस्पेंस और रिश्तों का एक नया और बेहद पेचीदा रुख तैयार हो रहा था।

घर के बाकी लोगों की गैरमौजूदगी में चिंटू ने अपनी माँ की इस लाचारी को देखकर एक बहुत बड़ा फैसला कर लिया। उसने सविता के कांपते हुए आंसुओं को पोंछा और कड़क लहजे में कहा, "माँ, अब हम इस नरक में एक पल भी नहीं रहेंगे। गाँव के ये लोग और हमारे घर के ये मर्द मिलकर तुम्हारा जीना हराम कर देंगे। मैं तुम्हें कल सुबह ही शहर लेकर जा रहा हूँ। जब तक तुम्हारी डिलीवरी नहीं हो जाती, हम वहीं रहेंगे।"

अगली ही सुबह, बाकी सब के शादी से लौटने से पहले, चिंटू अपनी माँ को लेकर शहर के एक सुदूर कोने में चला आया। वहाँ उसने एक बहुत ही छोटा सा, एक कमरे का मकान किराए पर लिया। वही एक कमरा ही उनका सब कुछ था—एक कोने में छोटा सा चूल्हा और किचन था, और बीच में सोने के लिए बिछौना। साथ में एक छोटा सा बाथरूम बना हुआ था।

महीने बीतते गए। चिंटू दिन भर शहर में हाड़-तोड़ कमाई करता और रात को थका-हारा लौटकर अपनी माँ के पास बैठता। वह सविता के फूले हुए पेट पर हाथ रखता और उसका हौसला बढ़ाता, "माँ, तुम फिक्र मत करो। तुम्हारा यह बेटा हमेशा तुम्हारे साथ खड़ा है। दुनिया कुछ भी कहे, मैं इस बच्चे को कभी बेसहारा नहीं होने दूंगा।"

सविता का अब आखिरी महीना चल रहा था। गाँव छोड़ने के बाद पिछले चार महीनों से रात के अंधेरे में उसके कमरे में आने वाला वह रहस्यमयी साया पूरी तरह गायब हो चुका था। इन चार महीनों में सविता की चूत में एक बार भी लँड नहीं गया था। उम्र के इस पड़ाव पर, उस ८ से ९ इंच लंबे और कलाई जितने मोटे मूसल की आदत लग जाने के बाद, सविता का ४८ साल का वह गदराया और रसीला बदन भीतर से उस मर्दाना सुख के लिए बुरी तरह तड़प रहा था। उसकी जांघों के बीच अक्सर एक मचलती हुई प्यास उठती थी, लेकिन माँ बनने का अहसास और बेटे का यह निश्छल सहारा इतना बड़ा था कि वह अपनी उस शारीरिक भूख को चुपचाप दबाकर सब कुछ खुशी-खुशी बर्दाश्त कर रही थी।

close-up-on-a-face-of-a-woman-in-labor-pushing-hard-to-give-birth-obstetricians-assisting.jpg


फिर वह दिन भी आया जब अस्पताल में सविता ने एक बेहद प्यारे, सुंदर और स्वस्थ बेटे को जन्म दिया। बच्चे की पहली किलकारी सुनकर सविता के थके हुए चेहरे पर एक बेहद प्यारी मुस्कान तैर गई। चिंटू ने उस नन्हे बच्चे को अपनी गोद में उठाया और अपनी माँ के माथे को चूमते हुए कहा, "देखो माँ, कितना सुंदर बच्चा है।" सविता मुस्कुरा तो रही थी, पर उसके सीने के एक कोने में एक तीखा दर्द भी चुभ रहा था कि इस बच्चे का असली बाप कौन है, यह खुद उसे भी नहीं पता। इस पूरी दुनिया में उसकी इस खुशी में शामिल होने वाला सिर्फ और सिर्फ उसका अपना जवान बेटा चिंटू ही था।

वक्त का पहिया घूमा और जब नन्हा बच्चा दो महीने का हो गया, तो शहर का खर्च उठाना चिंटू के लिए मुश्किल होने लगा। आखिरकार, दोनों माँ-बेटे को वापस अपने उसी पुश्तैनी गाँव लौटना पड़ा।

जैसे ही सविता उस दो महीने के बच्चे को छाती से लगाए चिंटू के साथ गाँव की चौखट पर पहुँची, पूरे गाँव में जैसे भूचाल आ गया। गाँव के चौराहे पर और कुएं पर बैठी औरतें और मर्द उन्हें देखते ही थू-थू करने लगे। गाँव के लोग सीधे चिंटू की तरफ उंगली उठाकर भद्दी-भद्दी गालियां देने लगे।

गाँव का एक बुजुर्ग जोर से हंसते हुए बोला, "लो! आ गए शहर से पाप कमाकर! अरे दुनिया को बेवकूफ समझते हो क्या? अपनी ही सगी माँ के इस गदराए बदन की भूख में बेटा ऐसा अंधा हुआ कि पाप छुपाने के लिए शहर भाग गया था! अब जब बच्चा पैदा हो गया, तो मुंह उठाकर वापस आ गए।"

यह कड़वा लांछन सुनकर चिंटू का खून उबल उठा। उसने मुट्ठियां भींच लीं और चिल्लाया, "जुबान संभाल कर बात करो! वो मेरी माँ हैं!"

लेकिन गाँव वाले कहाँ मानने वाले थे। वे सब माँ-बेटे के इस पवित्र रिश्ते पर कीचड़ उछाल रहे थे। हद तो तब हो गई जब वे अपने खुद के घर पहुँचे। सविता के बार-बार मना करने और उनके जाल में ना फंसने के कारण, उसके जेठ और बूढ़े ससुर के भीतर की हवस अब भयंकर गुस्से और बदले की आग में बदल चुकी थी।

जैसे ही सविता आँगन में आई, जेठ ने कुदाल पटकते हुए तंज कसा, "क्यों रे चिंटू? बड़ा माँ का रखवाला बनता था ना? शहर ले जाकर अपनी ही माँ की चूत मारने में बड़ा मजा आया तुझे? अब इस नाजायज औलाद को लेकर यहाँ क्यों आया है?"

ससुर भी हाथ में लाठी लिए खाट पर बैठे थे। उन्होंने मूंछों पर ताव दिया और कड़ककर घिनौने लहजे में कहा, "साली रण्डी! जब हम अपनी खाट पर सोने के लिए कह रहे थे, तब तो बड़ा सती सावित्री बन रही थी। और अपने ही जवान बेटे के लँड के नीचे सोकर पेट कर लिया? पूरा खानदान अपवित्र कर दिया इस छिनाल ने! माँ-बेटे मिलकर घर के भीतर ही यह गंदा खेल खेल रहे थे, थू है तुम्हारी ऐसी जिंदगी पर!"

crying-cry.gif


सविता अपने ससुर और जेठ के मुँह से रिश्तों को तार-तार करने वाली ये घिनौनी और गंदी बातें सुनकर आँगन के बीचों-बीच खड़ी रोए जा रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह इस समाज और अपने ही घर के भेड़ियों के सामने खुद को कैसे बेकसूर साबित करे, जबकि चिंटू गुस्से में हांफ रहा था।
 
Top