अपडेट १०
शाम को फोन बजने की वजह से मेरी नींद 6 बजे खुली, मैंने देखा कि फोन में राज के 2 मिस्ड कॉल पड़े हैं तभी मुझे याद आता है कि आज शाम को राज ने मुझे नदी के पुल पर आने के लिए कहा था और कुछ देर बाद मैं साइकिल से नदी के पुल पर पहुंच गया, राज बड़ा गुमसुम सा पुल पर बैठा था और नदी में पत्थर फेंक रहा था।
"कहां रह गया था तू, मैं 5 बजे से यहां तेरा इंतजार कर रहा हूं" राज झल्लाते हुए बोला
"गुस्सा क्यों कर रहा है साले, तुझे तो पता है ना कि आज घर में पूजा थी, मैं थक गया था और अभी सो के उठा हूं"
"कोई बात नहीं भाई, चल अब काम की बात कर लेते हैं"
"हां लेकिन राज एक बार फिर से सोच ले तू, मुझे तो अभी तक यकीन नहीं हो रहा कि तू अपनी ही सगी मां को चोदना चाहता है"
"भाई मैं अपनी मां से बहुत प्यार करता हूं और तुझे सब कुछ तो बता चुका ही हूं लेकिन मेरी एक मजबूरी भी है"
"कौन–सी मजबूरी?"
"तुझे ये तो पता है कि मेरा बापू कर्जे ने डूबा हुआ है लेकिन तू नहीं जानता कि जिन्होंने बापू को कर्जा दिया है उन लोगों की गंदी नजर अब मेरी मां पर है, अगर बापू का कर्जा चुकाने के लिए मां किसी के बातों में आ गई तो सब कुछ बर्बाद हो जाएगा इसलिए मैं अपनी मां की जिम्मेदारी उठाना चाहता है, भाई, मैं तो बहुत कोशिश कर चुका हूं लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ बल्कि उल्टा मुझे नुकसान ही हुआ है मैं जितना मां के करीब आने की कोशिश करता हूं मां उतना ही मुझसे दूर जाने की कोशिश करती है इसलिए मैं चाहता हूं की अब तू कोशिश कर मेरी मां के करीब आने की और इसके लिए मेरे पास एक प्लान है
"कौन–सा प्लान?"
फिर राज मुझे अपना प्लान सुनाता है।
"लेकिन तुझे यकीन है कि ये प्लान काम करेगा।"
"भाई तुझे थोड़ा बहुत जोखिम तो उठाना पड़ेगा और इसके अलावा और कोई चारा भी तो नहीं है"
"मुझे भी लगता है कि मुझे थोड़ी बहुत कोशिश करके जोखिम उठा लेना चाहिए"
"ठीक है तू कोशिश करके देख ले, अगर तू कामयाब हो गया तो मैं भी इमोशनल ब्लैकमेल करके मां को पटा लूंगा"
फिर ऐसे ही कुछ देर हम इधर उधर की बातें करते हैं और थोड़ी देर के बाद मैं साइकिल से घर पहुंच जाता हूं।
आज हम खाने के लिए बाहर जाने वाले थे पीहू दीदी तैयार हो गई थी और आंगन में घूम घूमकर फोन पर किसी से बातें कर रही थी उन्होंने गुलाबी रंग की सलवार कमीज पहनी हुई थी, आज पहली बार मेरी नजर जैसे पीहू दीदी पर एकटक जम गई थी उनकी कमीज गहरे गले वाली थी जिसमें से उनकी बड़ी बड़ी चूचियों की गहरी दरार बाहर झांक रही थी और उनकी गोरी गोरी पीठ लगभग नंगी ही थी और उनकी सलवार बहुत टाइट थी जिसमें से उनके मोटे मोटे कूल्हे ऐसे मटक रहे थे जैसे किसी गाने की धुन पर थिरक रहे हों। पीहू दीदी फोन पर किसी से बहुत धीरे धीरे बात करते हुए मुस्कुरा रही थी फिर जैसे ही उन्होंने मुझे देखा तो अपने कमरे में चली गई।