बुच्ची-भोर भिन्सारे
भोर भिन्सारे तो कुल मरदन का खड़ा रहता है, और सूरजु देवर क तो एकदम घोडा, गदहा छाप, इमरतिया यही सोच रही थी,… जब वो बुच्ची के साथ चाय लेकर सुरजू सिंह की कोठरी में पहुंची।
रात भर की मस्ती के बाद बुच्ची की हालत खराब थी, ससुरी शीला इतना हाथ गोड़ जोड़े, की बहिनी एक बार झाड़ दो लेकिन ना, गरमा कर के चूड दे रही थी, और ऊपर से मंजू भाभी क बदमाशी, और ये समय फ्राक के नीचे कुछ पहनी भी नहीं थी, एकदम लस लस कर रही थी, गुलाबो।
सुरजू ने बुच्ची को देखा तो झट से एक छोटी सी तौलीया लुंगी की तरह लपेट ली, लेकिन सूरजू की निगाह बुच्ची के छोटे छोटे कबूतरों पे चिपक के रह गयी। ढक्क्न तो था नहीं तो दोनों छोटे छोटे कबूतर बाहर निकलने को बेचैन थे, और उनकी चोंचे भी साफ़ साफ़ दिख रही थीं।
सुरजू की निगाह अपनी बूआ की बेटी के चूजों पर चिपकी , और उसे देखते देख, बुच्ची और गरमा गयी। बुच्ची की निगाह भी सीधे, और तम्बू तना एकदम जबरदस्त।
बस इमरतिया को मौका मिल गया, जब तक भाई बहन की देखा देखी हो रही थी, झट से उसने तौलिया सरका दी , और शेर उछलकर बाहर आ गया।
'इत्ता बड़ा, इत्ता मोटा, और केतना गुस्से में लग रहा है,'
बुच्ची की आँखे फटी रह गयीं, कलेजा मुंह में आ गया।
ये नहीं की उसने पहले नहीं देखा था। कहते हैं न की शादी नहीं हुयी तो बरात तो गए हैं, तो कई बार चौकीदारी उसने की थी, जब उसकी सहेली, शीलवा गन्ने के खेत में गाँव के लौंडो के साथ, तो कौन लड़की तांका झांकी नहीं करेगी। लेकिन ये तो हाथ भर का,
सुरजू ने अपनी बुआ की बिटिया को देखते देखा तो झट से तौलिया फिर से ठीक कर लिया और लजा गया, लेकिन बुच्ची जोर से मुस्कराने लगी और बोली, " भैया चाय "
लेकिन इमरतिया तो भौजाई, वो काहें देवर को रगड़ने का मौका छोड़ती, छेड़ते हुए खिलखिला के बोली
" अरे बबुआ किससे लजा रहे हो, हम देख चुके हैं, तोहार बहिनिया देख ली, तोहार माई तो बचपन में खोल खोल के कडुवा तेल लगायी है, मालिश की तब इतना मोटा सुपाड़ा हुआ और जो हमार देवरानी आयंगी दस दिन बाद, तो कोठरिया क दरवाजा बाद में बंद होई, तू एके पहले निकाल के देखाओगे। बहुत दिन शेर पिंजड़े में रह चुका अब जंगल में, घूमने,गुफा में घुसने का टाइम आ गया है। "
जितना सूरज सिंह लजा रहे थे, उतना बुच्ची मुस्करा रही थी, और चाय बढ़ाते बोली,
" लो न भैया, अपने हाथ से बना के लायी हूँ "
और इमरतिया ने फिर रगड़ा अपनी ननद -देवर को, " आज से बुच्ची देंगी तोहे, ले लो ले लो, तोहार बहिन देने को तैयार है और तुम्ही लेने में हिचक रहे हो भैया। "
लेकिन रात की मस्ती के बाद अब बुच्ची भी एकदम गरमाई थी और डबल मीनिंग बात में एक्सपर्ट हो गयी थी, आँखे नचा के वो टीनेजर पलट के जवाब देती बोली
" तो भौजी, क्या खाली भौजी लोग दे सकती हैं, …भैया को बहिनिया नहीं दे सकती हैं ? "
" एकदम दे सकती है काहें नहीं दे सकती, जो चीज भौजी लोगो के पास है वो बहिनियो के पास है तो काहें नहीं दे सकती। और अभी तो तोहरे नयकी भौजी के आने में दस बारह दिन, तो फिर रोज दूनो जून दा। देखो न कितना भूखा है बेचारा "
इमरतिया कौन पीछे रहने वाली थी
लेकिन आज दिन भर उसको बहुत काम था। सब रीत रिवाज रस्म, शादी में जितना काम पंडित का होता है उससे दसो गुना ज्यादा नाउन का।
नाउन और बूआ सब रस्म में यही दोनों आगे रहती है और उसके अलावा, आना जाना मेहमान आज से, और फिर बड़की ठकुराईआं का पूरा बिस्वास इमरतिया पे और घर में कोई सगी,… चचेरी बहु भी नहीं तो दूल्हे की भौजाई वाला भी
लेकिन निकलने के पहले, अपना हाथ दिखाना नहीं चुकी।
बुच्ची के पीछे खड़ी हो के, एक झटके में उसने बुच्ची का फ्राक ऊपर उठा दिया, और बोली,
" बिन्नो हमरे देवर क तो खूब मजा ले ले के देखा तो जरा अपनी सहेली का भी चेहरा दिखा दो न "
बुच्ची ने छिनरपन कर के अपनी टांगो को चिपकाने की कोशिश की, लेकिन उसका पाला इमरतिया से पड़ा था, और इमरतरिया ने बुच्ची की दोनों टांगों के बीच टाँगे डाल के पूरी ताकत से फैला दिया। पर हालत सुरजू की ख़राब हो रही थी,
एकदम कसी कसी दो फांके, गुलाबी, एकदम चिपकी, लसलसी, जैसे लग रहा था लाख कोशिश करने पे भी दोनों फांके अलग नहीं होंगी, कितना मजा आएगा उसके अंदर ठोंकने में,
सरजू की निगाह बुच्ची की जाँघों के बीच चिपकी थी, बुच्ची छूटने के लिए छटपटा रही थी। लेकिन सुरजू को वहां देखते उसे भी न जाने कैसा कैसा लग रहा था।
और इमरतिया ने गीली लसलसी चासनी से डूबी फांको पर अपनी तर्जनी फिराई, उन्हें अलग करने की कोशिश की और सीधे सुरजू के होंठों पे
" अरे चख लो, खूब मीठ स्वाद है "
बोल के बुच्ची का हाथ पकड़ के मुड़ गयी, और दरवाजा बंद करने के पहले दोनों से मुस्करा के बोली,
" अरे कोहबर क बात कोहबर में ही रह जाती है और वैसे भी छत पे रात में ताला बंद हो जाता है।
और सीढ़ी से धड़धड़ा के नीचे, बुच्ची का हाथ पकडे, बड़की ठकुराइन दो बार हाँक लगा चुकी थी। बहुत काम था आज दिन में
दिन शुरू हो गया था, आज से और मेहमान आने थे, रीत रस्म रिवाज भी शुरू होना था।
बुच्ची-भोर भिन्सारे
भोर भिन्सारे तो कुल मरदन का खड़ा रहता है, और सूरजु देवर क तो एकदम घोडा, गदहा छाप, इमरतिया यही सोच रही थी,… जब वो बुच्ची के साथ चाय लेकर सुरजू सिंह की कोठरी में पहुंची।
रात भर की मस्ती के बाद बुच्ची की हालत खराब थी, ससुरी शीला इतना हाथ गोड़ जोड़े, की बहिनी एक बार झाड़ दो लेकिन ना, गरमा कर के चूड दे रही थी, और ऊपर से मंजू भाभी क बदमाशी, और ये समय फ्राक के नीचे कुछ पहनी भी नहीं थी, एकदम लस लस कर रही थी, गुलाबो।
सुरजू ने बुच्ची को देखा तो झट से एक छोटी सी तौलीया लुंगी की तरह लपेट ली, लेकिन सूरजू की निगाह बुच्ची के छोटे छोटे कबूतरों पे चिपक के रह गयी। ढक्क्न तो था नहीं तो दोनों छोटे छोटे कबूतर बाहर निकलने को बेचैन थे, और उनकी चोंचे भी साफ़ साफ़ दिख रही थीं।
सुरजू की निगाह अपनी बूआ की बेटी के चूजों पर चिपकी , और उसे देखते देख, बुच्ची और गरमा गयी। बुच्ची की निगाह भी सीधे, और तम्बू तना एकदम जबरदस्त।
बस इमरतिया को मौका मिल गया, जब तक भाई बहन की देखा देखी हो रही थी, झट से उसने तौलिया सरका दी , और शेर उछलकर बाहर आ गया।
'इत्ता बड़ा, इत्ता मोटा, और केतना गुस्से में लग रहा है,'
बुच्ची की आँखे फटी रह गयीं, कलेजा मुंह में आ गया।
ये नहीं की उसने पहले नहीं देखा था। कहते हैं न की शादी नहीं हुयी तो बरात तो गए हैं, तो कई बार चौकीदारी उसने की थी, जब उसकी सहेली, शीलवा गन्ने के खेत में गाँव के लौंडो के साथ, तो कौन लड़की तांका झांकी नहीं करेगी। लेकिन ये तो हाथ भर का,
सुरजू ने अपनी बुआ की बिटिया को देखते देखा तो झट से तौलिया फिर से ठीक कर लिया और लजा गया, लेकिन बुच्ची जोर से मुस्कराने लगी और बोली, " भैया चाय "
लेकिन इमरतिया तो भौजाई, वो काहें देवर को रगड़ने का मौका छोड़ती, छेड़ते हुए खिलखिला के बोली
" अरे बबुआ किससे लजा रहे हो, हम देख चुके हैं, तोहार बहिनिया देख ली, तोहार माई तो बचपन में खोल खोल के कडुवा तेल लगायी है, मालिश की तब इतना मोटा सुपाड़ा हुआ और जो हमार देवरानी आयंगी दस दिन बाद, तो कोठरिया क दरवाजा बाद में बंद होई, तू एके पहले निकाल के देखाओगे। बहुत दिन शेर पिंजड़े में रह चुका अब जंगल में, घूमने,गुफा में घुसने का टाइम आ गया है। "
जितना सूरज सिंह लजा रहे थे, उतना बुच्ची मुस्करा रही थी, और चाय बढ़ाते बोली,
" लो न भैया, अपने हाथ से बना के लायी हूँ "
और इमरतिया ने फिर रगड़ा अपनी ननद -देवर को, " आज से बुच्ची देंगी तोहे, ले लो ले लो, तोहार बहिन देने को तैयार है और तुम्ही लेने में हिचक रहे हो भैया। "
लेकिन रात की मस्ती के बाद अब बुच्ची भी एकदम गरमाई थी और डबल मीनिंग बात में एक्सपर्ट हो गयी थी, आँखे नचा के वो टीनेजर पलट के जवाब देती बोली
" तो भौजी, क्या खाली भौजी लोग दे सकती हैं, …भैया को बहिनिया नहीं दे सकती हैं ? "
" एकदम दे सकती है काहें नहीं दे सकती, जो चीज भौजी लोगो के पास है वो बहिनियो के पास है तो काहें नहीं दे सकती। और अभी तो तोहरे नयकी भौजी के आने में दस बारह दिन, तो फिर रोज दूनो जून दा। देखो न कितना भूखा है बेचारा "
इमरतिया कौन पीछे रहने वाली थी
लेकिन आज दिन भर उसको बहुत काम था। सब रीत रिवाज रस्म, शादी में जितना काम पंडित का होता है उससे दसो गुना ज्यादा नाउन का।
नाउन और बूआ सब रस्म में यही दोनों आगे रहती है और उसके अलावा, आना जाना मेहमान आज से, और फिर बड़की ठकुराईआं का पूरा बिस्वास इमरतिया पे और घर में कोई सगी,… चचेरी बहु भी नहीं तो दूल्हे की भौजाई वाला भी
लेकिन निकलने के पहले, अपना हाथ दिखाना नहीं चुकी।
बुच्ची के पीछे खड़ी हो के, एक झटके में उसने बुच्ची का फ्राक ऊपर उठा दिया, और बोली,
" बिन्नो हमरे देवर क तो खूब मजा ले ले के देखा तो जरा अपनी सहेली का भी चेहरा दिखा दो न "
बुच्ची ने छिनरपन कर के अपनी टांगो को चिपकाने की कोशिश की, लेकिन उसका पाला इमरतिया से पड़ा था, और इमरतरिया ने बुच्ची की दोनों टांगों के बीच टाँगे डाल के पूरी ताकत से फैला दिया। पर हालत सुरजू की ख़राब हो रही थी,
एकदम कसी कसी दो फांके, गुलाबी, एकदम चिपकी, लसलसी, जैसे लग रहा था लाख कोशिश करने पे भी दोनों फांके अलग नहीं होंगी, कितना मजा आएगा उसके अंदर ठोंकने में,
सरजू की निगाह बुच्ची की जाँघों के बीच चिपकी थी, बुच्ची छूटने के लिए छटपटा रही थी। लेकिन सुरजू को वहां देखते उसे भी न जाने कैसा कैसा लग रहा था।
और इमरतिया ने गीली लसलसी चासनी से डूबी फांको पर अपनी तर्जनी फिराई, उन्हें अलग करने की कोशिश की और सीधे सुरजू के होंठों पे
" अरे चख लो, खूब मीठ स्वाद है "
बोल के बुच्ची का हाथ पकड़ के मुड़ गयी, और दरवाजा बंद करने के पहले दोनों से मुस्करा के बोली,
" अरे कोहबर क बात कोहबर में ही रह जाती है और वैसे भी छत पे रात में ताला बंद हो जाता है।
और सीढ़ी से धड़धड़ा के नीचे, बुच्ची का हाथ पकडे, बड़की ठकुराइन दो बार हाँक लगा चुकी थी। बहुत काम था आज दिन में
दिन शुरू हो गया था, आज से और मेहमान आने थे, रीत रस्म रिवाज भी शुरू होना था।
Thanks for the first comment. Please do support my two other stories also. ThanksTino bhojaiyo ka koi jabab nahi
आपने एकदम सही कहा, इमरतिया पूरी खिलाड़ी है, तभी तो अपने देवर सूरजु सिंह को अनाड़ी से पक्का खिलाड़ी बनाएगी,Sharahniye......koi jabab nahi.
Aakhir pila hi diya ...
Puri khiladi hai apni imratiya..aisha trained kia ki plbahu tak ko nahi chhooda