आपने एक लाइन में वो बात कह दी जिसके लिए मैंने पूरी पोस्ट लगा दी और यह होती है एक अच्छे समीक्षक की पहचान, वह सीधे मुख्य बिंदु तक पहुँच जाता है
जो आपने यह कहा, " इस खेल की सबसे बड़ी बाधा है झिझक टूटना । एक बार झिझक टूटा फिर चाहे लड़का हो या लड़की दिल - जिगर - गुर्दा सबकुछ मजबूत होना शुरू हो जाता है । आनंद साहब की झिझक टूट चुकी है ।"
असली बात यही है झिझक टूटना। और खास तौर से जो लोग थोड़े अंतर्मुखी होते हैं, एक अच्छे बच्चे कि इमेज में फंस के जीते हैं, चाह के भी मजे का मजा नहीं ले पाते,
बस चंदा भाभी की पूरी कोशिश यही थी, पनिहारिन और कुंवा के उदाहरण से समझाया, कि एक किसी के पीने से कुंवा नहीं सूखता, फिर केस स्टडी के तौर पर अपना उदहारण भी दिया कि वो उनके जीजा ने उनके साथ, कैसे कब और सबसे बढ़कर रोल प्ले, एक कुंवारी कन्या के साथ जो उन्ही कि तरह अनुभव हीन हो तो उसके साथ कैसे,
किताबें तो आनंद बाबू ने बहुत पढ़ रखी थीं, पढ़ने लिखने, सोचने समझने में भी तेज है, लेकिन बस वही झिझक और उसके लिए एक स्त्री गुरु कि जरूरत थी जो चंदा भाभी ने काफी कुछ पूरी करने कि कोशिश की ।
आपके कमेंट एकदम ' ज्यों नावक के तीर ' कि तरह होते हैं एकदम सटीक, और मैं पोस्ट होने के बाद उनका इन्तजार करती hu।
एक बार फिर से आभार, धन्यवाद