उस्मान बोला
"अब्बूजान मेरे ख्याल में इस से बढ़िया कुछ हो नई नहीं सकता. आप एक बार है बोल दें. किसी को कानो कान खबर भी न होगी. और मजहबी काम भी पूरा हो जायेगा. "
अब्बास जिस के मन मैं तो खुशियों के लड्डू फुट रहे थे, पर प्रगट में वो उदास सा मुँह बना कर बोला
"उस्मान देख लो अगर और कोई चारा नहीं है तो मैं तुम्हारी और ज़ैनब की जिंदगी बचाने के लिए इस के लिए भी त्यार हूँ। शायद अल्लाह को यही मंजूर है. "
ज्योंही अब्बास ने हाँ करी , ज़ैनब के भी मन मैं ख़ुशी के लड्डू फूटने लगे. उसका मन कर रहा था की वो ख़ुशी से नाच उठे. पर उसका बाप और शोहर पास में थे तो वो दिखावे के लिए चुप बैठी रही.
अब्बास बोला " ठीक है उस्मान , हम बाजार से तो ज़ैनब के लिए शादी का जोड़ा नहीं खरीदने जा सकते. तो ऐसा करते है कि ज़ैनब की माँ का जो शादी का जोड़ा पड़ा है ज़ैनब वो ही पहन लेती है तुम मौलवी हो तो तुम हम दोनों का निकाह पढ़वा दो। "
अब्बास ने अंदर से अपनी मरहूम बीवी का शादी का लाल लेहंगा चोली का सूट निकल कर ज़ैनब को दे दिया. जिसे ज़ैनब ने बाथरूम मैं जाकर पहन लिया.
फिर उस्मान ने दोनों बाप बेटी अब्बास और ज़ैनब को बिठा कर निकाह पढ़वा दिया.
उस्मान " आप दोनों आज से बाप बेटी नहीं बल्कि मिया बीवी हो। ज़ैनब अब अब्बास तुम्हारा शोहर है. इस को शोहर का प्यार देना. और अब्बाजान अब काफी शाम हो गयी है रात होने ही वाली है. आप आज रात को हलाला कर लीजिये (दुसरे शब्दों में कहें तो भरपूर चुदाई कर लीजिये ) . मैं कल सुबह आऊंगा और तब आप ज़ैनब तो तलाक दे कर मेरे साथ उसकी शादी कर देना. अब मैं अपने घर जाता हूँ. खुदा हाफिज."
यह कह कर उस्मान अपने घर चला गया और इधर घर में रह गए दोनों बाप बेटी। जिन्हे अब हम बाप बेटी नहीं बल्कि बीवी और शोहर कहेंगे.
अब दोनों को इंतजार था अपनी सुहागरात का।
अब्बास ने कहा
"ज़ैनब रात होने ही वाली है. में बाजार से कुछ खाने को ले आता हूँ, खाना बनाने में तो बहुत टाइम लगेगा. फिर हम सोने चलेंगे. "
ज़ैनब मन ही मन मुस्कुरा दी. वो समझ गयी की उस का बाप खाना बनाने का भी टाइम खराब नहीं करना चाहता और उस के साथ हलाला करने को उत्सुक है. वो खुद भी चाहती थी कि खाना तो रोज ही खाते हैं बस आज तो जितनी जल्दी हो सके असली काम को शुरु किया जाये.
उस ने है में सर हिला दिया.
अब्बास जल्दी से बाजार से खाना लाया और दोनों बाप बेटी ने फटाफट खा लिया. दोनों एक दुसरे से शर्मा रहे थे.
चाहे उनकी शादी हो गयी थी पर असल में वो थे तो बाप बेटी ही, कुछ शर्म तो होनी लाजमी ही थी, (चाहे वो शर्म थोड़ी देर मैं बैडरूम में उतर जाने वाली थी,)
खाना खाने के बाद अब्बास ने ज़ैनब से कहा
"बेटी बर्तन साफ़ करने को तो आज रहने दो। तुम जल्दी से मुँह हाथ धो कर बैडरूम में चलो मैं मैं दो घंटे में आता हूँ, तुम तब तक त्यार हो जाओ. “
ज़ैनब समझ गयी की उस का बाप उसे सुहागरात (हलाला) के लिए तैयार होने को कह रहा है. ज़ैनब समझ गयी की जिस घडी का उन दोनों को सालों से इन्तजार था वो आ गयी है.