बहुत बहुत बढ़िया!
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अंततः कहानी सही तरह से अपनी पटरी पर आ ही गई लगती है!
हाँ क्यूंकि विश्व की कटक भुवनेश्वर वाली लीला खतम होने को है
विक्रम की शैली बुद्धिमानों वाली लगती है, लेकिन उसकी हरकतें पूरी मूर्खों और मूढ़ दम्भियों वाली है। अपने परिवार और परिवारजनों को सुरक्षित रखना, एक अलग बात है। लेकिन अपने परिवार के पाप का पोषण करना गलत है - हर तरीके से। चाहिए तो उसको यह था कि अपने बाप को समझाता, और न समझने पर उससे दूरी बना लेता। लेकिन उल्टा ही वो अपने बाप के पापों का पोषण करता हुआ दिखाई देता है। अहंकार तो है उसमें। अहंकार को अपनी माँ को दिए गए वचन के आँचल से छुपा रखा है - बस!
हाँ उसके इस भूल से रुप ही अवगत कराएगी पर बगावत की मशाल पहले वीर उठाएगा और आगे चलकर उसे विक्रम बुलंद करेगा
उसके मुकाबले वीर ठीक लगता है। ब्लैक एंड व्हाईट किरदार (कम से कम अभी तक तो ऐसा ही है)। जब तक चूतिया था, तब तक था। लेकिन अनु के प्यार ने उसको एक अलग ही धरातल पर ला कर खड़ा कर दिया है। और उसको अपनी इस नई सच्चाई को स्वीकारने में कोई दिक्कत या शर्म नहीं। खैर!
क्यूंकि वीर की चरित्र विक्रम से अलग है l वह बचपन से ही ऐसा है सोच और समझ एक ही दिशा में काम करता है l उसके जीवन में अनु का आना, धीरे धीरे उसके प्रति आकर्षित होना और अब उससे प्यार हो जाना, वीर की चरित्र को जुनूनी बना दे रहा है l
उपडेट की शुरुवात सुप्रिया रिपोर्टर और विश्व की मुलाकात से हुई। ये तो आज कल की न्यूज़ रिपोर्टरों जैसी बिलकुल ही नहीं है। नहीं तो नाच नाच कर और चीखते चिल्लाते किसी बकवास की रिपोर्टिंग कर रही होती। तेज है। लेकिन न जाने क्यों ऐसा लगता है कि इसका कोई पर्सनल एंगल है - खेत्रपालों से कोई पर्सनल खुन्नस होगी शायद! लम्बी कहानी हो गई, इसलिए सभी तथ्य याद नहीं हैं अब। लेकिन कुछ है ऐसा - यह पक्की बात है।
हाँ उसके भाई और भाभी को रंग महल के आखेट गृह में लकड़बग्घों और मगरमच्छों के बीच फिकवा दिया था
लीक से हट कर लड़के की माँ, लड़की का हाथ माँगने उसके घर जाती है। बड़ी बात है। खास तौर पर तब, जब वो खुद रानी है। अनु की दादी को वीर को ले कर कोई संशय रहा हो, तो वो समाप्त हो जाना चाहिए अब। सुषमा जी अच्छी लगीं - हाँलाकि उनका अभी तक बहुत ही छोटा छोटा ही रोल रहा है।
चूंकि वीर पहली बार उसे छोटी रानी की वजाए माँ कहा था, अपना दुख फोन पर कहा था, और पहली बार अपनी जवानी के दिन में उसकी गोद को ढूंढते हुए आया था और उसकी वजह एक लड़की थी जो उसके चरित्र की पुर्ण विपरित थी
उधर अनु के भोलेपन का एक और उदाहरण हमारे सामने प्रस्तुत है। बहुत पहले भी मैंने यह बात लिखी थी - भोले लोगों के साथ अच्छा होता है। सभी को लगता है कि उनका भयंकर नुकसान होगा, लेकिन ऐसा नहीं है। अपने साथ साथ वीर का भी भला कर दिया उसने। और कहीं न कहीं, सुषमा को भी अपने परिवार को ले कर आशा की एक किरण दिखाई देने लगी है।
हाँ अनु की चरित्र वास्तविक है l मैं उस चरित्र से रुबरु हो चुका हूँ l उस चरित्र को देख कर कभी कभी सोचता रहता हूँ इस फाइव जी काल में क्या ऐसा चरित्र संभव है पर चूंकि मैंने वास्तव में देखा है l इसलिए इसे इस कहानी में डाला है
बहुत समय बाद वैदेही का ज़िक्र हुआ। अच्छा लगा। मुझे याद है कि असल में वैदेही ही इस कहानी की नायिका होनी चाहिए थी, लेकिन बाद में यह नायक प्रधान कहानी बन गई। इसलिए यह कोई आश्चर्य नहीं कि वैदेही एक ठोस किरदार के रूप में दिखाई देती है। भैरव की गाड़ी खराब होना एक तरह का forebodance (भविष्य की आपदाओं की आहट) है - ऐसा मुझे लगता है। किसी महान ज्ञानी ने एक बार कहा था कि अपने शत्रु को किसी कोने में इतना न दबाओ कि उसके पास प्रतिवार करने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प ही न बचे। अपने ठसके में भैरव सिंह ने बहुतों के साथ यही किया है। उसकी दिक्कत यह हो गई है कि वो सभी शत्रु अब एक साथ हो कर उसकी झंड करने को तत्पर हैं।
जी बिलकुल
एक छोटा सा स्पयलर देता हूँ
राजनीती में भले ही ओंकार दुश्मनी छेड़ा हुआ है पर वास्तव में पर्दे के पीछे रूलिंग पार्टी के कुछ पॉलिटिशियन और कुछ सरकारी ऑफिसर होंगे जो आगे चलकर वीर के साथ हो लेंगे
कुल मिला कर इस खेल के सभी मुख्य खिलाड़ी अब हमारे सामने हैं। पिछली बार खेत्रपाल ने वार किया था, इसलिए लगता है कि इस बार पहला वार विश्व की तरफ से होने वाला है। बहुत ही मनोरंजक और बढ़िया अपडेट। आनंद आ गया!
धन्यबाद और बहुत बहुत शुक्रिया