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Thriller "विश्वरूप" ( completed )

Kala Nag

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Kala Nag

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Rajesh

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👉एक सौ चार अपडेट
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रंग महल के एक कमरे में रोणा सोया हुआ था l उसके चेहरे पर कुछ दर्द सा भाव उभरने लगती है, चेहरा पसीना पसीना होने लगता है और फिर अचानक उसकी नींद टूट जाती है I वह खुद को बेड पर देख कर हैरान होता है फिर वह बीते रात की बात याद करने लगता है, शराब और शबाब के मस्ती में देर रात तक ऐश करता रहा फिर थक हार के लुढ़क गया था I अब रात उसी कपड़े में ही खुद को बिस्तर पर पा कर वह मन ही मन बड़बड़ाने लगता है

रोणा - अररे.. मैं यहाँ कैसे... कब... (बिस्तर से उठ कर खिड़की से बाहर की ओर झांकता है, बाहर अंधेरा धीरे धीरे छट रहा था) यह दोनों हराम खोर... मुझे छोड़ कर चले गए क्या...

यह सोच कर कमरे से निकल कर बाहर आता है l बाहर उसे सोफ़े पर दो साये बैठे हुए दिखते हैं l रोणा दीवार पर अपना हाथ फेरता है, लाइट की स्विच ऑन करता है l वह दो साये कोई और नहीं परीड़ा और बल्लभ थे I लाइट के जलते ही वे दोनों रोणा की ओर देखते हैं l

बल्लभ - कमाल है... टेंटुआ तक नशे में था... फिर भी जल्दी उठ गया...
रोणा - बे भूतनी के... मेरी बात छोड़... तु भुवनेश्वर में भी होटल में उल्लू की तरह जाग रहा था... यहाँ भी जागा हुआ है... पर अकेले नहीं... अपने साथ एक और उल्लू को लिए...
परीड़ा - अबे कुत्ते... मेरी डेजिग्नेशन का कुछ तो खयाल रख... तु ठहरा इंस्पेक्टर... मैं एएसपी...
रोणा - पर बच्चे यह हमाम हैं... जहां तु भी नंगा.. मैं भी नंगा..
परीड़ा - भोषड़ी के... जिस फुर्ती से अपना जुबान चलाता है... उतनी बारीकी से दिमाग भी चला लिया कर...
रोणा - ऐसी कौनसी बेवकूफ़ी भरा काम कर दिया है मैंने... एक मिनट... क्या तुम लोग अभी भी... विश्वा को लेकर परेशान हो...
बल्लभ - हाँ भी... नहीं भी...
रोणा - (हैरान हो कर) क्या... क्या मतलब है तेरा... क्या इसी लिए... रात भर सोये नहीं...
बल्लभ - चल तु हमारी बात छोड़... यह बता... तेरी क्यूँ नींद सुबह इतनी जल्दी टुट गई...

रोणा चुप रहता है l उसे चुप देख कर बल्लभ एक गहरा सांस छोड़ता है l

परीड़ा - प्रधान ने ऐसा क्या पूछ लिया... जो तु चुप हो गया.. (रोणा चुप रहता है)
बल्लभ - जिस बात का जवाब तुझे सूझ नहीं रहा है... उसी बात को सोच हम भी रात भर सो नहीं पाए...
रोणा - अभी तक तो मैं कुछ... सोचा नहीं था... पर तुम लोग मुझे कन्फ्यूज कर दिए...
परीड़ा - देर रात तक... खुब पिया... इतना की लुढ़क गया... तुझे ढो ढो कर बेड पर सुलाया... पर तेरा चेहरा देख कर लग रहा है... डर के मारे उठा है... (रोणा चुप रहता है और उन दोनों के पास एक सोफ़े पर बैठ जाता है)
बल्लभ - जिसके वजह से तेरी नींद टूटी है ना... उसीके बारे में हम रात भर सोच रहे हैं...
रोणा - हम ने जितना भी किया है... राजा साहब तो खुश लग रहे हैं...
बल्लभ - हाँ... हमने बेशक छोटे राजा जी को... सारी बातेँ बताये हैं... पर बातों की गहराई को शायद... छोटे राजा जी ने... राजा साहब को समझा नहीं पाए...
परीड़ा - या शायद... राजा साहब समझना ही नहीं चाहा...

कुछ देर के लिए तीनों में चुप्पी पसर जाती है l चुप्पी ऐसी थी के बाहर से चिडियों की चह चहाट सुनाई दे रही थी l अब कमरे में पहले से ज्यादा उजाला था, इतना की अब लाइट की कोई जरूरत नहीं थी l खामोशी को तोड़ते हुए

बल्लभ - (रोणा से) क्या कोई बुरा सपना देख रहा था...
रोणा - (बल्लभ की ओर देखते हुए) हाँ... घंटा बन गया हूँ... राजा साहब के पास खुद को बजाने के लिए जाता हूँ... और कटक में... विश्वा ने बजाया सो बजाया... वह लड़की...(गुर्राते हुए) उसने भी बजा दिया... उन दोनों की अब... मैं बजाने लिए तड़प रहा हूँ... खैर... मेरी बात छोड़ो... (परीड़ा से) तुने तो स्केच आर्टिस्ट से स्केच बनवाया था ना... क्या पता किया...
परीड़ा - एक प्राइवेट डिटेक्टिव को काम में लगाया है... पर अभी तक... खाली हाथ...
रोणा - ह्म्म्म्म... ठीक है... मुझे लगता है... और एक महीना तक शायद वह हमें दिखे ही ना...
परीड़ा - ऐसा क्यूँ...
बल्लभ - वह इसलिए कि.. उसे जब तक आरटीआई से पुरी जानकारी नहीं मिल जाती... तब तक शायद वह खुदको... हमसे छुपा कर रखना चाहता है...
परीड़ा - चलो मान भी लिया जाए... तुम्हारी बात सही है... पर वह कर भी क्या सकता है... हम तो उसके सारे दरवाजे बंद कर देने वाले हैं... क्यूँ प्रधान...

बल्लभ कोई जवाब नहीं देता, वह कुछ गहरी सोच में खोया हुआ था l उसके हाथ पर रोणा हाथ रख कर झिंझोडता है

रोणा - वकील... ऐ वकील... कहाँ खो गया...
बल्लभ - (चौंक कर) हाँ... क्या... क्या हुआ..
रोणा - परीड़ा ने कहा कि हम... विश्वा के लिए संभावनाओं के सारे दरवाजे... बंद कर देने वाले हैं... पर... हम से भी ज्यादा तु गहरी सोच में है... क्या बात है...
बल्लभ - सात साल पहले... हमारी टीम बनी थी... अब सात साल बाद... हमारी टीम फिरसे बनी है... इन सात सालों में क्या क्या हुआ है... यही सोच रहा हूँ....
परीड़ा - सब को मालुम है... क्या क्या हुआ है...
बल्लभ - (अपना सिर इंकार में हिलाते हुए) नहीं... हम बहुत कुछ अंधेरे में हैं... और तब तक रहेंगे... जब तक विश्वा खुद हमारे सामने नहीं आता... और दाव सामने से नहीं खेलता...
रोणा - वह कैसे...
बल्लभ - हम तीनों... इस बात की गहराई से... अच्छी तरह से वाकिफ हैं... पर तीनों ही... जाहिर करने से बच रहे हैं...

बल्लभ की बातेँ सुन कर दोनों हैरान होते हैं और एक दुसरे की ओर देखते हैं l प्रतिक्रिया में परीड़ा तो चुप रहता है पर रोणा से रहा नहीं जाता

रोणा - अच्छा.. यहाँ हम तीन हैं... अगर तीनों ही वाकिफ़ हैं... तो आपस में जाहिर करने से... शर्म कैसी... डर कैसा...
बल्लभ - ठीक है... तो सुन... सात साल पहले... हम जिस केस के लिए इकट्ठे हुए थे... वही केस... हमें फिर से इकट्ठा कर रहा है... सात साल पहले का वह केस... फाउंडेशन था... जिस पर.... क्षेत्रपाल का... आज का करप्शन का बहु मंजिली इमारत खड़ी है...
सात साल पहले का वह विश्वा... इक्कीस साल का नौ जवान था... जिसका खुन तो बहुत गर्म था... पर दुनियादारी से... एकदम बेखबर था... तब भी... उसे फंसा कर सजा देने के लिए... हमें लोहे के चने चबाने पड़ गए थे...
आज का विश्वा... अलग है... वह एक फाइटर है.. वकील है... उसकी अपनी... टीम है... पता नहीं कितना बड़ा है... तब तो हमने उसे एक्युस्ड बनाया था... जब कि असल में... वह एक विक्टीम था... वह अब उसी इमारत का नींव हिलाने के चक्कर में है...
रोणा - अब रोने से क्या होगा... जब चिड़ीया चुग गई खेत... मैंने उसी दिन कहा था... एंकाउंटर कर देते हैं... तुमने भी तो मुझे रोका था...
परीड़ा - रहा तु उल्लू का उल्लू... भूतनी के... अगर विश्वा मारा गया होता... तो वह केस किसी ना किसी तरह से सीबीआई तक पहुँच गई होती... क्यूंकि सारे एक्युस्ड में कुछ कि डेथ डिक्लैर कर चुके थे... और कुछ को फरार... साढ़े सात सौ करोड़ का घोटाला था... किसी को तो एक्युस्ड बनाना था... मनरेगा का पैसा था... मत भूल... वह पैसा अभी तक ज़ब्त नहीं हुआ है... अदालत ने एसआईटी को बहाल रखा था... जिसके चलते राजा साहब ने दबाव बनाया था... इसलिए इलेक्शन के बाद... होम मिनिस्ट्री बदली गई थी... फंसने के लिए अगर कोई नहीं मिलता... तो मनरेगा पैसों के खातिर... केंद्र सरकार जांच बिठा देती... तब हम सब फंस गए होते... इसलिए यह एनकाउंटर का रोना बंद कर...

परीड़ा ने जिस तरह से और जिस लहजे से रोणा को झिड़क कर अपनी बात कही थी, रोणा का चेहरा एक दम से उतर जाता है l

बल्लभ - परीड़ा सही कह रहा है...
रोणा - तो अब... अब हम क्या करें...
बल्लभ - हमने अपनी चाल चल दी है... पर यह भी सच है... अगर विश्वा... कोर्ट में... पीआईएल दाख़िल करता है... और केस रि-ओपन होता है... तब वह... हमारी भी क्रास एक्जामिन करेगा... हमें उसके लिए भी तैयारी करनी पड़ेगी... हमने भले ही... दुसरे गवाहों को पागल बनाने वाला आइडिया देकर... उसका एक दरवाजा बंद किया है... पर हमें... अपने हमारे पुराने बयान.... और संभावित प्रश्नों पर गौर करना होगा... उस पर विधि वत... एक्सरसाइज करना होगा....
रोणा - (कुछ सोचते हुए) ह्म्म्म्म... अगर इसबार हम... उसे मार दें... या मरवा दें तो...
परीड़ा - अबे गोबर दिमाग... ऐसी गलती फ़िलहाल के लिए मत करना... वह अब आरटीआई एक्टिविस्ट होने के साथ साथ... वकील भी है... उसने कुछ दूर की सोचा ही होगा... कोई ना कोई तिकड़म भीड़ाया होगा... इसलिए... हमें उसके साथ बहुत संभल कर डील करनी होगी...
बल्लभ - हाँ... पहले कटक में... फिर भुवनेश्वर में... उसने तुम पर हमले करवा कर... एक मैसेज हम तक पहुँचाया है...
रोणा - हाँ... जानता हूँ... यही ना... के हम सब... उसकी नजर में हैं... पर वह... अभी तक हमारी नजरों में नहीं है...
बल्लभ - हाँ... इसीलिए... हमने पागल वाला आइडिया तो दे दिया... पर हमें... इसे कैसे अंजाम देना है... इसकी जुगाड़ करनी होगी... क्यूंकि मुझे पक्का यकीन है... हम लोग यहाँ पर हैं.. विश्वा को खबर होगी... और उसे... हमारे अगली चाल का इंतजार होगा...
रोणा - आआआह्ह्ह्... (खीज कर अपनी जगह से उठ खड़ा होता है और वहाँ से बाहर जाने लगता है)
बल्लभ - ऑए... क्या हो गया... कहाँ जा रहा है...
रोणा - (पीछे मुड़ कर) दम घुटने लगा है... बाहर ताजी हवा में सांस लेने जा रहा हूँ....

कह कर रोणा वहाँ से निकल जाता है l पीछे रंग महल में बल्लभ और परीड़ा बैठे रह जाते हैं l


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तापस और विश्व दोनों जॉगिंग खतम कर पहुँचते है l दोनों अपनी अपनी जुते उतार कर अंदर आते हैं तो देखते हैं हाथ में मोबाइल लिए प्रतिभा कुछ सोच में डूबी हुई है l तापस और विश्व हैरानी से पहले एक दुसरे को देखते हैं फिर तापस प्रतिभा से पूछता है

तापस - क्या बात है भाग्यवान... किसी केस के सिलसिले में सोच में डूबी हो... कोई ना... चलो आज हम तीनों कहीं घूमने जाते हैं... (विश्व से) क्या बोलते हो... लाट साहब...
विश्व - अच्छा आइडिया है... बाहर घूमना और खाना... और हो सके तो... कोई अच्छी सी मूवी... (प्रतिभा से) क्या कहती हो माँ...
प्रतिभा - (अपना सिर समझने के अंदाज में हिलाते हुए) ह्म्म्म्म... यह काम तुम दोनों कर लो...
तापस - व्हाट... और तुम...
प्रतिभा - आज मेरे कुछ खास मेहमान आने वाले हैं... तो मुझे घर में उनकी खातिरदारी के लिए रुकना होगा...
तापस - अच्छा... (बगल के सोफ़े में बैठते हुए) कुछ मेहमान आ रहे हैं... कौन हैं वह...
प्रतिभा - मेरे कुछ खास दोस्त... बहुत ही खास...
तापस - हाँ तो क्या हुआ... तुम अकेली क्यूँ कष्ट उठाओगी... (विश्व से) क्यूँ प्रताप... अरे खड़ा क्यूँ है... आ बैठ... (विश्व भी तापस के पास बैठ जाता है, तापस विश्व के कंधे पर हाथ डाल कर) हम भी तुम्हारा हाथ बटा देंगे... क्यूँ...
प्रतिभा - (अपनी आँखे सिकुड़ कर) किस खुशी मैं...
तापस - अरे... घर पर कौन आ रहे हैं... तुम्हारे मेहमान... तुम्हारे मेहमान मतलब.. हमारे मेहमान... (विश्व से) क्या कहता है प्रताप...
विश्व - हाँ हाँ.. क्यूँ नहीं... क्यूँ नहीं...
प्रतिभा - (चेहरे पर नकली मुस्कान ला कर) तुम दोनों... पहले नहा धो कर... जल्दी से नाश्ता कर लो...
तापस - हाँ... और नाश्ते के बाद... हमें क्या करना होगा...
प्रतिभा - आप और प्रताप... दोनों आज बाहर जाएंगे... और रात को खाने के वक़्त से पहले... घर बिल्कुल नहीं आयेंगे...
दोनों - (चौंक कर एक साथ) क्या... क्यूँ...
प्रतिभा - अरे... लेडीज के बीच... तुम लोगों का क्या काम...
तापस - लेडीज के बीच... मतलब...
प्रतिभा - मतलब साफ है... हंसो के बीच कौवों का क्या काम...
तापस - यह तौहीन है... हमारी
प्रतिभा - तौहीन नहीं तारीफ है... पुरा दिन भर मुझे नजर नहीं आओगे... आप दोनों...
विश्व - पर दिन भर...
तापस - हाँ भाग्यवान... पुरा दिन भर... हम बाहर क्या करेंगे...
प्रतिभा - वही... जो आप मुझे साथ ले जा कर... करने वाले थे... घूमना... खाना... और साथ में.. मूवी देखना...
तापस - (विश्व को दिखा कर) यह अगर अकेला जाना चाहे... तो चला जाए.. मैं नहीं जाने वाला...
विश्व - मैं... मैं अकेला... क्यूँ... मैं भी नहीं जाने वाला...
प्रतिभा - (खड़ी हो जाती है और अपने कमर पर हाथ रखकर) क्या कहा... तो फिर तैयार हो जाओ... जाओ... कपड़े बदल लो...
तापस - ठीक है... अभी जाते हैं... (विश्व से) चल... कपड़े बदल कर आते हैं...
विश्व - हाँ चलिए...
प्रतिभा - हाँ... और सुनो...
दोनों - हाँ... कहो...
प्रतिभा - नीचे बॉक्सर या लुंगी पहन कर आना... और सिर पर गमछा बांध लेना...
दोनों - (एक दुसरे की ओर देख कर) क्या... (प्रतिभा की ओर देख कर) क्यूँ...
प्रतिभा - यह भी बताना पड़ेगा... और हाँ मेहमान जाने तक... तुम दोनों का ड्रेस कोड यही रहेगा... बिल्कुल चेंज नहीं होगा...
तापस - यह अन्याय है... हम इसका विरोध करते हैं...
प्रतिभा - अच्छा... (अपनी कमर में साड़ी की आंचल को ठूँसते हुए) जरा फिरसे कहना...
तापस - (लड़खड़ाती हुई आवाज़ में) फिर से क्यूँ... मैं बार बार कहूंगा.. अकेला थोड़े ही हूँ... हम बहुमत में हैं... (विश्व की हाथ पकड़ कर) क्यूँ लाट साहब...
विश्व - (बड़े प्यार से अपना हाथ छुड़ाते हुए) डैड... अब मत विभाजन हो गया है... इस घर की सभा में फ़िलहाल... त्रिशंकु अवस्था है... और मैं बिना देरी किए... पार्टी भी बदल लिया है... (प्रतिभा को देख कर) माते... जैसी आपकी आज्ञा...
प्रतिभा - मैं बहुत प्रसन्न हुई वत्स...
तापस - (विश्व को झटक कर) गधे.. उल्लू के पट्ठे... नालायक... नाकारा... नामाकूल... (रुक जाता है)
प्रतिभा - हो गया...
तापस - नहीं अभी बाकी है... बेशरम... बेवफ़ा... बेदर्द... बेमुरव्वत... बेकदर... (फिर रुक जाता है)
प्रतिभा - हो गया...
तापस - नहीं... अभी और बाकी है... पितृ द्रोही... चंचक.. ठग... (रुक जाता है)
प्रतिभा - हो गया...
तापस - नहीं... फिर भी... दिल पर पत्थर रख कर... हाँ...
विश्व - क्यूँ...
तापस - क्यूंकि मुझे और याद नहीं आ रहा है...
प्रतिभा - ठीक है... अब सीधे जाओ... नहा धो कर तैयार हो जाओ...
तापस - अच्छा भाग्यवान... फटना कब है...
प्रतिभा - क्या...
विश्व - माँ... वह डैड के कहने का मतलब था... फुटना कब है...
प्रतिभा - (प्यार से) ओ... जाओ... पहले तैयार हो कर आओ... गरमागरम नाश्ता कर लो... (ऊंची आवाज़ में धमकाने के अंदाज में) और रात के खाने के वक़्त तक... दिखना मत...
दोनों - (मायूसी के साथ) ठीक है...

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रोणा अपनी जीप पर खोया खोया हुआ चला रहा था l स्टीयरिंग घुमा कर xxx चौक पर पहुँच कर जीप को रोकता है l उसे वैदेही की नाश्ते की दुकान दिखती है l चाय और नाश्ते के लिए कुछ लोग दुकान के बाहर बैठे हुए थे I वैदेही चूल्हे पर व्यस्त दिख रही थी l वैदेही को देखते ही उसके जबड़े भींच जाती है l उसकी पकड़ स्टीयरिंग पर और मजबूत हो जाती है l गुस्से में उसके दायीं आँख के नीचे की पेशियां फड़फड़ाने लगती है l वह जीप से उतर कर दुकान की ओर जाने लगता है l दुकान पर पहुँच कर रोणा बाहर रखे पानी के ड्रम पर रखे मग से पानी निकाल कर अपने मुहँ पर मरने लगता है, लोग उसके तरफ देख कर किनारे तो हो जाते हैं पर वहाँ से कोई जाता नहीं है l रोणा एक पल के लिए अपनी आँखे बंद कर अपने अतीत को याद करने लगता है l

जब वह पुलिस की जीप लेकर जहां से भी गुजर जाता था वहाँ पर वीरानी पसर जाती थी l पर महीने भर पहले वैदेही की हरकत के बाद गांव वालों पर उसका वह रौब और रुतबा नहीं रहा l

वह मग वापस ड्रम पर रख कर मुड़ता है और वैदेही की ओर देखता है l वैदेही अपने काम में व्यस्त थी l चाय बन चुका था l वैदेही एक कुपि में चाय डाल कर एक गांव वाले की ओर बढ़ाती है, पर वह कुपि रोणा झपट लेता है और उस गांव वाले को धक्का देता है l

गांव वाला - (धक्के के बाद संभल कर) धक्का क्यूँ मारा साहब...

रोणा एक थप्पड़ मार देता है l सभी वहाँ पर मौजूद हैरान हो जाते हैं l रोणा उस गांव वाले की गिरेबान को पकड़ कर

रोणा - सुन बे... भूतनी के... मैं सात साल बाद आया हूँ... मतलब यह नहीं... के तुम लोग साले गटर के कीड़े... अपनी औकात भूल जाओ... (चिल्लाते हुए) देखो मुझे... मैं हूँ रोणा... इंस्पेक्टर रोणा... (रोणा ख़ामोश हो जाता है, अपनी चारों तरफ नजर घुमा कर लोगों को देखने लगता है और फिर नॉर्मल हो कर) सालों भूल गए हो... तो कोई बात नहीं... याद आ जाएगा... (उस गांव वाले की कलर छोड़ कर) जंगल हो या बस्ती... बाघ जहां से गुजरता है... जानवर हो या लोग... छुप जाया करते हैं... (चिल्ला कर) याद आया कुछ...

गांव वाले समझ जाते हैं l बिना कोई चु चपड़ किए सभी धीरे धीरे खिसक लेते हैं l कुछ देर बाद वहाँ पर वैदेही, रोणा थे l गल्ले पर गौरी बैठी हुई थी l सब के जाने के बाद अपने चेहरे पर कुटिल मुस्कान लिए वैदेही को देखता है l

रोणा - क्यूँ... कैसी रही...
वैदेही - सात साल बाद... जिस तरह की सीन बनाया... मैंने सोचा... अभी सूतली बम फटेगा... पर देखो फूस हो गया...
रोणा - कमीनी... आज के बाद... तेरी दुकान की... रोज मारने आता रहूँगा.... तेरी यह वाली धंधा बंद हो जाएगी... जब खाने की लाले पड़ जाएंगे... तब.. तु खुद को बेचने की धंधा शुरु कर देगी... कसम से... तब पहला और आखिरी ग्राहक... मैं ही होऊंगा...
वैदेही - (उसके तरफ ध्यान दिए वगैर) बड़ा भूखा लग रहा है... खाना खाएगा...
रोणा - हा हा हा हा... हाँ हाँ... जरूर... क्यूंकि आज के बाद तेरे दुकान पर... खाना खाने कोई नहीं आएगा...
वैदेही - वह तो देखा जाएगा... वैसे खाना कल रात का है... और हाँ जूठा भी है... गरम तो मैं करने से रही... बेहतर है केले का पत्ता लगा देती हूँ... खा ले...
रोणा - कमीनी...(दांत पिसते हुए) कुत्तीआ... मुझे जूठन खाने को कहती है...
वैदेही - क्या करूँ... संस्कार है... माँ और बाबा ने दिया था... के खाने का पहला निवाला हमेशा गाय को देना.... और आखिरी निवाला कुत्ते को... कल रात कोई कुत्ता आया नहीं... पर सुबह सुबह तु आ गया... यह बचा खुचा आखिरी निवाला है... हम सबकी जूठन है... इसलिए तुझसे पूछा...

वैदेही की बातेँ सुन कर रोणा की झांटे सुलग जाती है l उसे गुस्सा इतना आता है कि उसका जिस्म थर्राने लगती है l

रोणा - कमीनी... दो कौड़ी की रंडी साली... मुझे कुत्ता कह रही है...
वैदेही - चुप कर... खाकी वर्दी पर बदनुमा दाग कहीं के... जिस तरह का हरामी पन दिखा रहा है... उससे तेरी पैदाइश मालूम पड़ रहा है...

रोणा तैस में आकर अंदर घुस जाता है l वैदेही तुरंत पास रखे एक सेल्फ से दरांती निकाल लेती है l दरांती देख कर रोणा रुक जाता है और थोड़ा नर्म पड़ जाता है l

रोणा - (अटक अटक कर) मैं तुझे... अभी के अभी... पुलिस वाले को हथियार दिखाने... और धमकाने के जुर्म में... गिरफ्तार कर सकता हूँ... मौका भी बन रहा है... तेरे हाथ में... दरांती भी है...

रोणा की बात सुन कर वैदेही हँसती है और देखते देखते अपनी ब्लाउज का बाएं हाथ वाला हिस्सा फाड़ देती है l

वैदेही - तुझसे नहीं होगा... कुत्ते... मैं अभी तेरा पेट फाड़ कर... अंतड़ी निकाल दूंगी... और तुझपर रेप अटेंप्ट केस फाइल करूंगी... मौका भी बन गया है... तुझसे शराब की बदबू यहां तक आ रही है... और तु मेरे दुकान के अंदर भी है...

इतना सुनते ही रोणा अपने अगल बगल देखने लगता है l फिर धीरे से दुकान के बाहर चला जाता है l

रोणा - बहुत दिमाग चला रही है आज कल...
वैदेही - पागल कुत्तों से दूर रहने के लिए... अपना तरीका आजमा रही हूँ मैं...
रोणा - तुझे.... (वैदेही को उंगली दिखाते हुए) तुझे... नहीं छोड़ूंगा... देख लेना... इन्हीं गालियों में... बालों से घसीटते हुए... तुझे ले कर जाऊँगा...
वैदेही - हाँ... जरूर... भूलना भी मत... तब जनाना अधिकारी को... साथ में जरूर लाईयो... वरना... मेरा भाई.. तेरी वर्दी उतरवा देगा...
रोणा - भाई... हा हा हा हा हा... कहाँ है तेरा भाई... साला हिजड़ा... कहाँ छुपा हुआ है...
वैदेही - (गुर्राते हुए) सुन बे कुत्ते... मैं जानती हूँ... अभी तु यहाँ... मेरे विशु के बारे ही में जानकारी लेने आया है... पर वह कहते हैं ना... शेर शिकार करने से पहले... कुछ कदम पीछे जाता है.... तो अभी वह कुछ कदम पीछे ही गया है...
रोणा - शेर... हा हा हा हा हा... आक थू... बच्चा है... (अपनी हाथ में उंगलियों पर अंगूठे को मसलते हुए) उसे यूँ... यूँ मसल दूँगा...
वैदेही - (थोड़ी ऊंची आवाज़ में) वह बच्चा नहीं है भुतनी के... वह तेरा बाप है... वह अभी नजर के सामने नहीं आया है... तो तुम लोग पगलाए हुए हो... जब सामने आकर खड़ा हो जाएगा... तब... तब तु... आगे गिला और पीछे से पीला हो जाएगा...
रोणा - (अपनी जबड़े भींच कर) ओ हो... तो इतना बड़ा मर्द है...
वैदेही - कोई शक़... तुने यहाँ आकर मुझे सिर्फ एकबार धमकाया था... बदले में... उसके तेरी दो बार बजा दिया... भुला तो नहीं होगा तु...
रोणा - (अपनी हलक से थूक निगलता है, आवाज और भी दब जाता है) तो छुपा क्यूँ है... कहाँ है... सामने कब आ रहा है...
वैदेही - चु.. चु... चु.. बहुत बेताब है... अपने बाप से मिलने के लिए... कोई नहीं... आज से ठीक तीसरे दिन... मेरे दुकान पर... अन्न छत्र खुलेगा... मेरे भाई की आने की खुशी में... पुरा गांव मुफ्त में खाएगा... जा... तु भी आ जाना... पेट भर खाना... और उसे देख लेना...
रोणा - अच्छा... तो दो दिन बाद आ रहा है... अब पता चलेगा... उसे भी... और तुझे भी... किस मर्द से पाला पड़ा है...
वैदेही - तु... और मर्द... आक थू... जिसे देख कर... किसी घर की इज़्ज़त और आबरू... खौफ जादा हो जाएं... अपना रास्ता बदल दें... वह मर्द नहीं होता... एक पागल वहशी जानवर होता है... असली मर्द क्या होता है... उस दिन देख लेना... जिसे देखते ही... हर घर की इज़्ज़त को हिम्मत मिल जाएगी... जिसे साथ लेकर... हर आबरू अपनी रास्ता... अपनी मंजिल तय कर लेगी...

रोणा वैदेही की बातेँ सुन कर कुछ देर के लिए वहीँ जम जाता है l फिर कुछ देर बाद वह अपनी नजरें घुमा कर देखता है और बिना पीछे मुड़े वहाँ से चला जाता है l वैदेही अपने दमकती चेहरे पर मुस्कान लिए रोणा को जाते हुए देखती है I रोणा के चले जाने के बाद गौरी गल्ले से उठ कर वैदेही के पास आती है l

गौरी - वैदेही... क्या सच में... विशु आ रहा है...
वैदेही - (गौरी की तरफ घुम कर) हाँ काकी.. हाँ... मेरा विशु आ रहा है... मैं ना कहती थी... इस गांव में बहुत जल्द एक मर्द आने वाला है... मेरा बच्चा विशु आ रहा है... मर्द क्या है... मर्द की पहचान क्या है... परिभाषा क्या है... यह सब जानेंगे... वह ना सिर्फ बतायेगा... ना दिखाएगा... बल्कि हर एक मरे हुए ज़ज्बात में जान भरेगा... जगाएगा... तुम... देखना काकी... तुम देखना...

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विश्व xxx मॉल के अंदर आता है और सीधे कॉफी डे की ओर जाता है l वहाँ कॉफी डे के सामने वीर बैठा हुआ था, किसी गहरी सोच में खोया हुआ था l विश्व उसे देख कर उसके पास जाता है और उसके सामने बैठ जाता है l वीर अपने में इस कदर खोया हुआ था कि विश्व का आना उसके सामने बैठना उसे बिलकुल भी आभास नहीं हुआ था l विश्व एक सर्विस बॉय को इशारे से दो ग्लास कॉफी ऑर्डर करता है I बॉय इशारा समझ कर दो ग्लास कॉफी बना कर लाता है और इन दोनों के सामने टेबल पर रख देता है l विश्व अपना ग्लास उठाता है और सीप लेने लगता है l दो तीन बार सीप लेने के बाद भी वीर जब होश में नहीं आता तब विश्व वीर के चेहरे के सामने अपना हाथ लेकर चुटकी बजाता है l चुटकी की आवाज से वीर की ध्यान टूटती है, अपने सामने विश्व को देख कर चौंकता है l

वीर - अरे प्रताप... तुम... तुम कब आए...
विश्व - हम तो कब के आए हुए हैं... बस आप हो कि... किसी के याद में दुनिया जहान को भुलाए बैठे हैं... क्या बात है... प्यार का इजहार हुआ... या नहीं..

वीर मुस्कराते हुए शर्मा कर हाँ कहते हुए अपना सिर नीचे कर लेता है l

विश्व - वाव.. वाव.. वाव... क्या बात है... इजहार ए मुहब्बत... इकरार ए मुहब्बत... सब हो गया है...

वीर का चेहरा खुशी से लाल हो जाता है वह फिर से अपना चेहरा शर्म के मारे नीचे कर लेता है l

विश्व - ऑए.. होए... भई... लड़की शर्मा जाए.. तो बात समझ में आता है... पर तु क्यूँ शर्मा रहा है...
वीर - (शर्माते हुए, झिझकते हुए) क्या कहूँ यार... बस एक एहसास... पता नहीं कैसा है... बयान करने जाऊँ तो लफ्ज़ कम पड़ जाएं...
विश्व - वाह... क्या बात है...
वीर - हाँ यार.... एक वह एहसास था... जब मैं प्यार में था.. पर मुझे एहसास नहीं था... वह भी क्या गजब का एहसास था... तुमने मुझे एहसास दिलाया... की मुझे प्यार हुआ है... प्यार की एहसास के बाद... ऐसा लगा कि... मैं जैसे बादलों में तैर रहा हूँ... बहारों में झूम रहा हूँ... और अब...
विश्व - (जिज्ञासा भरे लहजे में) हाँ... अब...
वीर - अब तो.. मुझे हर जगह... सिर्फ अनु ही अनु दिख रही है... ज़माने की हर शय में... मुझे उसकी अक्स दिखाई देती है... हर खिलते गुलों में... उसकी मुस्कराता हुआ चेहरा नजर आता है... क्या कहूँ... बस एक ऐसा एहसास... जो गुदगुदा रहा है... रुला भी रहा है...
विश्व - वाव.. वाव.. वाव... यार तुम्हारी बातों से... एक जबरदस्त एक्साइटमेंट फिल हो रहा है... बोलो बोलो बोलो... गुल ए गुलजार... दिल ए दिलदार... कैसे इजहार हुआ... कैसे इकरार हुआ... मैं... सुनने के लिए बेताब हूँ...
वीर - याद है... तुमने कहा था... प्यार अगर सच्चा हो... तो भगवान रास्ता दिखाते हैं...
विश्व - हाँ... बिल्कुल... यानी तुम उस दिन मंदिर गए थे....
वीर - हाँ यार....

वीर उस दिन से लेकर अब तक अनु से प्यार का इजहार और स्वीकार और सुषमा का आकार दादी से हाथ माँगना सब कुछ बता देता है l सब सुनने के बाद

विश्व - वाव... वाकई... गुड्डू... वह नन्ही सी बच्ची... तुम दोनों प्यार करने वालों के लिए भगवान के तरफ से आई थी... वाव... वाकई... तुम्हारे प्यार में सच्चाई थी... तभी तो तुम्हें अपना प्यार मिला... और सब से बड़ी बात... तुमने अपने स्टाइल में... अपने स्टाइल में ही प्यार का इजहार किया...
वीर - हाँ यार... थैंक्यू... और सॉरी...
विश्व - हेइ... यह थैंक्यू और सॉरी किस लिए...
वीर - थैंक्यू इसलिए... की जब जब मुझे सलाह मशविरा की जरूरत पड़ी... तुमने मुझे सही रास्ता सुझाया... तुम्हारे दिखाए हुए रास्ते पर चलाकर... मुझे मंजिल तो मिली... पर सॉरी... तुम्हें आज यह बात बता रहा हूँ...
विश्व - (मुस्कराते हुए) अरे कोई नहीं... अपने यार की खुशी में... मैं भी बहुत खुश हूँ... आखिर ज़माने में... इकलौता दोस्त जो है मेरा...
वीर - थैंक्स यार...
विश्व - फिर थैंक्स... यार... दोस्तों के बीच... नो सॉरी... नो थैंक्स...
वीर - ओके... ओके... (थोड़ा गंभीर हो कर) यार... मुझे तुझसे एक बात कहना है...
विश्व - हाँ बोल बोल... बिंदास बोल...

वीर कुछ देर के लिए चुप हो जाता है, अपना जबड़ा और मुट्ठीयाँ भींच लेता है, फिर एक गहरी सांस छोड़ते हुए कहता है

वीर - यार... बड़े नसीब वाले होते हैं... जिन्हें दोस्ती और मुहब्बत का नैमत मिलता है... मैं बहुत खुश नसीब हूँ...
विश्व - क्यूँ... अकेले तुम क्यूँ... मैं भी तो दोस्ती के मामले में बहुत खुश नसीब हूँ...
वीर - (झिझकते हुए) पता नहीं... पर आज मैं... तुम्हारे सामने कुछ कंफेस करना चाहता हूँ...
विश्व - (कॉफी की सीप लेते हुए) कैसा कंफेस...
वीर - तुम मेरे बारे में... क्या जानते हो...
विश्व - ह्म्म्म्म... यही के तुम... वीर हो... और तुम अनु से बेहद मुहब्बत करते हो...
वीर - और...
विश्व - और कुछ नहीं... वैसे तुम भी तो... मेरे बारे में... कुछ नहीं जानते...
वीर - हाँ... हमने... एक दुसरे से अपनी अपनी... आईडेंटिटी डीसक्लोज नहीं की है... मैं दावे के साथ कह सकता हूँ... तुम्हारे आइडेंटिटी डीसक्लोज होने से... कुछ फर्क़ नहीं पड़ेगा... पर मेरी आइडेंटिटी से... शायद तुम किनारा कर लो...
विश्व - (हैरान हो कर) क्यूँ भई... किसी अंडरवर्ल्ड से ताल्लुक रखते हो... या कोई सीक्रेट एजेंट हो...
वीर - दोनों नहीं...
विश्व - फिर...
वीर - प्रताप.. मैं एक ही सांस में कह देना चाहता हूँ... इसलिए पहले मेरी बात सुन लो... फिर जैसा तुम्हारा फैसला होगा... मुझे मंजुर होगा....

वीर की बातेँ सुन कर विश्व को और भी ताज्जुब होता है l विश्व गौर से वीर की चेहरे को देखता है, वीर वाकई बहुत सीरियस दिख रहा था l

विश्व - ठीक है... चलो बताओ... अपने बारे में....
वीर - तुम्हें शायद यकीन ना हो प्रताप... मैं एक ऐसे परिवार से हूँ... जिसकी अच्छाई से दूर दूर तक कोई रिश्ता नहीं है... उस परिवार की गुरूर और अभिमान... इस बात पर टिकी हुई है... की कौन कितनी बुराई की दल दल में किस हद तक डुबा हुआ है... मैं खुद को मजबूर... या मासूम नहीं बता रहा हूँ प्रताप... मैं भी उसी गुरूर और अहं का हिस्सा था... और अपनी नसों में खुन की वजाए... बुराई की हद तक बुराई की गटर को ढो रहा था... तब तक... जब एक ताजी हवा की झोंके की तरह मेरी जिंदगी में अनु नहीं आ गई... उसके मेरी जिंदगी में आते ही... सबकुछ बदल गया... मैं बस अपने खानदानी वज़ूद से खुद को दूर करता गया... मुझे हमेशा उसकी पसंद का खयाल रहा... मैं खुद को उसके सांचे में ढालने लगा... और आज उसीके वजह से... वह मेरी जिंदगी बन गई है... और तुम मेरे दोस्त...
विश्व - ह्म्म्म्म... देखो... तुम्हें पहले जब देखा था... तब लगा कि तुम कोई रईसजादा हो.... पर एक बात यह भी है... अनु के लिए तुम्हारी आँखों में सच्ची चाहत भी देखा था... और रही दोस्ती... सो तो होनी ही थी....
वीर - तुम समझे नहीं प्रताप... मैं अपनी खानदानी पहचान के आगे... कभी भी किसीको भाव नहीं देता था... इसलिए मैं दोस्ती जैसे रिश्ते से... जिंदगी भर महरूम रहा... या यूं कहूँ के... मेरे खानदानी पहचान के वजह से... ना मैं किसी से दोस्ती करता था... ना ही कोई मेरे साथ दोस्ती करना चाहता था... इसलिए तो आज मेरे पास... मेरा सिर्फ एक ही दोस्त है... जिसे मैं खोना नहीं चाहता... और उससे कुछ छुपाना नहीं चाहता...
विश्व - ह्म्म्म्म... बात बहुत गंभीर है... चलो... अब सस्पेंस खतम भी करो... अपनी पहचान बता दो...
वीर - (बहुत झिझकते हुए, अटक अटक कर) प्रताप... देखो बुरा मत मानना... अगर इल्ज़ाम लगाओ भी... तो... अपनी सफाई पेश करने के लिए... मौका जरूर देना.... (विश्व यह बात सुन कर बहुत हैरान होता है) प.. प्र... प्रताप... मेरा नाम... वीर सिंह क्षेत्रपाल पाल है.... (विश्व की आँखे चौड़ी हो जातें हैं और मुहँ खुल जाता है, तो वीर विश्व की हाथ पकड़ लेता है) मेरे पिता का नाम... पिनाक सिंह क्षेत्रपाल है... भुवनेश्वर के मेयर हैं... मैं ESS मतलब एक्जीक्युटिव सेक्योरिटी सर्विस का सीइओ हूँ... हम राजगड़ से हैं... राजा भैरव सिंह क्षेत्रपाल... मेरे बड़े पिता हैं... यानी मेरे पिता के बड़े भाई...

इतना कह कर वीर विश्व का हाथ छोड़ देता है और अपना सिर झुका लेता है l वह विश्व की ओर देखने के लिए हिम्मत जुटा नहीं पाता l विश्व भी सब सुन कर अपना हाथ खिंच लेता है और वीर से क्या कहे वह खुद भी समझ नहीं पा रहा है l कुछ देर बाद विश्व कहना शुरू करता है l

विश्व - वीर... तुमने सच्चे दिल से... अपनी बात बता दी... कोई छल नहीं किया... तुम अपने परिवार के पांच और सदस्यों के बारे नहीं कहा... तुम्हारे दादा जी... नागेंद्र सिंह क्षेत्रपाल... तुम्हारी माताजी... सुषमा सिंह क्षेत्रपाल... तुम्हारा भाई... विक्रम सिंह क्षेत्रपाल... भाभी शुभ्रा सिंह क्षेत्रपाल... और एक बहन... रुप सिंह क्षेत्रपाल...
वीर - हाँ... यह बात... सभी जानते हैं...
विश्व - हाँ सभी जानते हैं... क्यूंकि... क्षेत्रपाल परिवार... इस स्टेट की एक रिनाउन इंडस्ट्रीयलिस्ट.... और स्टेट पालिटिक्स की... कींग मेकर हैं... यह बात सभी जानते हैं... पर तुम एक बात नहीं जानते... और शायद जानने के बाद... तुम मुझसे दोस्ती ना रखना चाहो...

विश्व ने जिस तरह से अपनी बात कहा था l वीर को लगा जैसे प्रताप ने कोई बम फोड़ दिया हो l अब वीर हैरान था और उसका मुहँ खुला हुआ था l

विश्व - मेरा नाम... विश्व प्रताप महापात्र है... मैं भी राजगड़ से हूँ... और तुम्हारे परिवार की धौंस और अहं के चलते... जैल में सात साल की सजा काट कर लौटा हूँ....

यह सुनने के बाद वीर और भी बुरी तरह से चौंकता है l अपने सामने बैठे विश्व को वह हैरानी भरे नजरों से देखे जा रहा था l उसके जेहन में विश्वा नाम गूंज रहा था l उसे याद आता है कि विक्रम ने किसी विश्वा के बारे में भैरव सिंह से पूछा था I ज़वाब में भैरव सिंह ने कहा था कि "विश्व एक एहसान फरामोश कुत्ता था" I वीर अपनी ख़यालों से बाहर निकलता है जब विश्व फिरसे कहना चालू करता है l

विश्व - मैं... तुम्हारे बड़े पिता... उर्फ़ राजा साहब... उर्फ़ भैरव सिंह क्षेत्रपाल का जानी दुश्मन हूँ... तुम्हारे बड़े भाई... विक्रम सिंह से.. तीन बार... मेरा अनचाहा मुलाकात हो चुका है... और शायद... तुम्हारा भाई... मेरे बारे में... सब कुछ जानता है... उसे मेरे बारे में... पूछ लेना... उसके बाद... अगर दोस्ती बरकरार रखना चाहोगे... मुझे अपने पास... हमेशा एक दोस्त की तरह पाओगे....

इतना कह कर विश्व वहाँ पर नहीं रुकता l बिना पीछे देखे या मुड़े वहाँ से चला जाता है l हक्का बक्का सा हो कर वीर वहीँ बैठा रहा I

×_____×_____×_____×_____×_____×_____×

डोर बेल बजती है, तो अंदर से आवाज आती है

"अंदर आ जाओ नंदिनी... तुम्हारा ही इंतजार है..."

नंदिनी अंदर जाती है, अंदर प्रतिभा सोफ़े पर बैठी हुई मिलती है l नंदिनी को देख कर

प्रतिभा - ह्म्म्म्म... वेलकम.. स्वागतम... इस्तकबाल है तुम्हारा नंदिनी...
नंदिनी - (वहीँ खड़ी हो कर, झिझक के साथ) आंटी... आप मेरे उपर गुस्सा हैं ना...
प्रतिभा - उम्म्म्म्म्म... हूँ तो...
नंदिनी - सॉरी...
प्रतिभा - ठीक है... वह बाद में देखेंगे... पहले बैठो तो सही...

नंदिनी पास एक और सोफ़े पर बैठ जाती है और इधर उधर झांकने लगती है l

प्रतिभा - घबराओ मत... घर पर कोई नहीं है... सिवाय हम दोनों के... और आज राज डिनर तक... कोई नहीं आएगा...
नंदिनी - (मुस्कराने की कोशिश करते हुए) जी थैंक्यू...
प्रतिभा - नो मेनशन...
नंदिनी - क्यूँ...
प्रतिभा - इसके दो वजह हैं... पहला... उस दिन तुम मुझसे कुछ जानना चाहती थी... पर ना तुम्हें मौका मिला... ना मुझे... इसलिए तुमसे कहा था कि... तुम किसी छुट्टी के दिन मुझसे कंटेक्ट करना... मैं पुरा दिन तुम्हें दूंगी...
नंदिनी - और दुसरा...
प्रतिभा - मैं जानना जरूर चाहुँगी... तुमने मेरे बेटे प्रताप को... क्यूँ मारा...

नंदिनी की झिझक और बढ़ जाती है l वह अपनी उँगलियों से अपनी आंचल को मोड़ने और ठीक करने लगती है l

प्रतिभा - ओह कॉम ऑन नंदिनी... हम अजनबी नहीं हैं... बोलो.. तुम्हारे मन में... क्या शंका है.. क्या जानना चाहती हो तुम...
नंदिनी -(उसी झिझक के साथ) वह मैं... दरअसल मैं... वह... प.. प्र.. प्रताप... (कहते हुए प्रतिभा की चेहरे की ओर देखने लगती है) (प्रतिभा की चेहरे पर एक शरारती मुस्कान देख कर झेंप जाती है)
प्रतिभा - हूँ... तो तुम्हें... मेरे बेटे के बारे में... कुछ जानकारी चाहिए... हम्म्म...
नंदिनी - (अपनी झिझक से बाहर आने की कोशिश करते हुए) वह प्रताप... आ... आपका बेटा नहीं है... मैं जानती हूँ... नहीं है ना... (कह कर प्रतिभा की चेहरे को गौर से देखने लगती है)
प्रतिभा - (नंदिनी की बात सुन कर थोड़ी सीरियस हो जाती है, और गुर्राते हुए) कैसे जानती हो...
नंदिनी - (दबी हुई आवाज में) बस जानती हूँ...
प्रतिभा - और क्या जानती हो...
नंदिनी - यही... के वह प्रताप नहीं है... विश्व प्रताप है... और वह राजगड़ से है...

इतनी खुलासे से प्रतिभा चौंक जाती है l वह नंदिनी को घूरने लगती है l फिर अचानक उसके आँखों में एक चमक छा जाती है, और मुस्कराते हुए नंदिनी से

प्रतिभा - रुप... तुम रुप हो... रुप हो ना...

प्रतिभा के रुप बुलाने से नंदिनी अब चौंकती है और वह हैरानी से अपनी गर्दन को हाँ में हिलाती है l

प्रतिभा - ओह.. भगवान... तुम रुप सिंह क्षेत्रपाल हो...
रुप - आपको कैसे मालुम हुआ... की मैं रुप हूँ...
प्रतिभा - (अब फिरसे शरारती भाव से) वह छोड़ो... पहले यह बताओ... यहाँ आया कौन है... रुप सिंह... या राज कुमारी...
रुप - दोनों एक ही तो हैं...
प्रतिभा - अच्छा... तो सवाल ऐसा होने चाहिए था... तुम यहाँ आई किसके लिए हो... विश्व प्रताप के लिए... या अपने अनाम के लिए...
रुप - क्या... (चौंक कर खड़ी हो जाती है) म... मत... मतलब... आप सब जानती हैं...
प्रतिभा - ऑफकोर्स... सब जानती हूँ... अब खड़ी क्यूँ हो गई... बैठो तो सही.... (रुप के बैठते ही) पहले यह बताओ... जब तुम्हारा नाम... मेरे प्रताप के गर्दन के पीछे गुदा हुआ है... फिर तुम यहाँ नंदिनी बन कर क्यूँ घुम रही हो...
रुप - वह... मेरा नाम असल में... रुप नंदिनी सिंह क्षेत्रपाल है... पुरा नाम...
प्रतिभा - अब यह बताओ... तुमने उसे पहचाना कब... कहीं थप्पड़ मारने से पहले तो नहीं...
रुप - (शर्माते हुए) जी... वह जब हमने.. सुकुमार अंकल और गायत्री आंटी जी को सी ऑफ किया... मैं भावुकता वश... (रुक जाती है)
प्रतिभा - हूँ.. हूँ.. बताओ बताओ...
रुप - आंटी... इट्स अ गर्ल थिंग...
प्रतिभा - अरे... मैं भी तो गर्ल हूँ...
रुप - वह... मैं भावुकता वश अनाम के गले लग गई... वह सब अचानक हुआ... असल में उस दिन मॉल में ही देख कर मुझे शक हो गया था... और उसके गले लगते ही... मेरी तन मन महकने लगा... बचपन से... एडोलसेंस आने तक... एक ही तो था... जिसके गले लगती थी... जिसके सीने में अपना मुहँ छुपाती थी... उसके जिस्म से आ रही खुशबु... बस मैंने पहचान लिया... यही अनाम है....

रुप कह कर चुप हो जाती है l कमरे में खामोशी पसर गई थी l रुप प्रतिभा की ओर देखने की कोशिश करती है l प्रतिभा के चेहरे पर असीम आनंद दिखाई दे रही थी l

रुप - आंटी...
प्रतिभा - हूँ...
रुप - वह... कटक कब आया... क्या आपने उसे गोद लिया... या.. वाकई... वह आपका जुड़वा बेटा है... कभी खो गया था...
प्रतिभा - बाप रे... कितनी सवाल कर रही है यह लड़की...
रुप - सॉरी आंटी... पर आज से आठ साल पहले तक... प्रताप एक अनाथ था... बहुत गरीब भी था... महल में... एक मुलाजिम था...
प्रतिभा - जानती हो रुप... तुम अपने पिता से अलग हो... बहुत ही अलग हो... शायद तुम्हारे माँ की संस्कार के असर है...
रुप - (समझ नहीं पाती) मतलब...
प्रतिभा - तुमने... प्रताप को... मुलाजिम कहा... तुम्हारे पिता होते... तो या तो नौकर कहते... या फिर गुलाम....
रुप - (अपनी जगह से उठती है और प्रतिभा के पास आकर बैट जाती है, प्रतिभा के दोनों हाथों को अपने हाथ में लेकर) प्लीज... आंटी... कहिए ना... इन आठ सालों में क्या हुआ है... मिनिस्टर की पार्टी में... जिस तरह से... राजा साहब से प्रताप बातेँ कर रहा था... ऐसा लगा... जैसे उसके अतीत में... हमारे परिवार ने कुछ ठीक नहीं किया है...
प्रतिभा - रुप... तुम्हें आठ साल पहले की नहीं... पुरे अट्ठाइस साल की कहानी जननी होगी...
रुप - (हैरान हो कर) अट्ठाइस साल...
प्रतिभा - हाँ... अगर तुम अनाम... उर्फ़ विश्व प्रताप के बारे में जानना चाहती हो...
रुप - बताइए ना आंटी... प्लीज... मुझे जानना है...
प्रतिभा - ठीक है बताती हूँ... बस इतना जान लो... हाँ प्रताप मेरा बेटा नहीं है... पर यह गलती मेरी या प्रताप की नहीं... भगवान की है... आज भले ही मैं उसे बेटा... और वह मुझे माँ मानता हो... पर उसके जिंदगी में एक और औरत है... जिसे वह मुझसे भी ज्यादा मान देता है... भगवान की जगह रखता है...
रुप - (जिज्ञासा भरी लहजे में) वह... वह कौन है... आंटी...
प्रतिभा - वैदेही... प्रताप की दीदी... उसकी बड़ी बहन... जिसे वह माँ से कम नहीं समझता... असल में... यह कहानी... उसीकी है... (आवाज़ में कड़क पन) वह... यह समझ लो... दुर्गा है... और प्रताप उसके हाथ में त्रिशूल है... युद्ध चल रहा है... परिणाम वही होगा... जो युगों युगों से हो रहा है... पाप का विनाश... शत्रु का संहार... और यह होगा... हो कर ही रहेगा...
Mind blowing update hai bhai maza aa gaya

Yaha to har kisiko ek dusre ke bare me jankari mil rahi hai ek taraf rup ko vishwa ke bare me pratibha se aur ek taraf Veer khud vishwa ko apne bare me batata hai aur vishwa veer ko apne bare me batata hai

Ab kya veer vishwa se kis tarah se milna chahega ek dost ki tarah ye fir dushman ki tarah

Agle update ka besabri se intezar rahega bhai
 

Kala Nag

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Kya yaha flash back dena jaruri h
Short m hi nipta do n
भाई मेरे कोशिश मेरी यही रहेगी जितना छोटा हो सके उतना छोटा फ्लैशबैक रखूं
फिर भी फ्लैशबैक बहुत जरूरी है क्यूंकि जैल जाने से पहले विश्व की जद्दोजहद है इस में
 

Kala Nag

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Mind blowing update hai bhai maza aa gaya
धन्यबाद मेरे दोस्त
Yaha to har kisiko ek dusre ke bare me jankari mil rahi hai ek taraf rup ko vishwa ke bare me pratibha se aur ek taraf Veer khud vishwa ko apne bare me batata hai aur vishwa veer ko apne bare me batata hai
जी उन दोनों की आइडेंटिटी एक दुसरे पर खुलना जरूरी था
क्यूँकी वीर अपना अगला हर कदम सोच समझ कर उठाएगा
Ab kya veer vishwa se kis tarah se milna chahega ek dost ki tarah ye fir dushman ki tarah
ह्म्म्म्म देखते हैं
Agle update ka besabri se intezar rahega bhai
ज़रूर Rajesh भाई जल्दी लाने की कोशिश करता हूँ
 

Sidd19

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जल्दी देने की कोशिश करता हूँ
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क्या ही बेहतरीन अपडेट दिया बुज्जी भाई आप ने। और आप के संवाद लेखन की जितनी भी तारीफ करू वो कम ही है। बल्कि अगर ये कहू कि इस पूरे फोरम पर आप से बेहतर कोई संवाद राइटर नही है तो कोई अतिशयोक्तिपूर्ण नही होगा।
संवाद के माध्यम से घटनाक्रम और उस परिवेश मे जान फूंक देना कोई आप से सिखे।
आप ने स्टेप्स बाई स्टेप्स इस अपडेट मे तीन महत्वपूर्ण खुलासे कर दिए। पहला, विश्व और वीर का एक दूसरे को अपनी पहचान बताना -----दूसरा, वैदेही का रोणा को यह कहना कि विश्व की इन्तजार की घड़िया खतम हुई-----और तीसरा , प्रतिभा जी और नंदिनी के बीच बातो के दौरान विश्व की सच्चाई जाहिर होना।
तीनो घटनाएं और उन का प्रस्तुतीकरण-------Fabulous --extraordinary ----fantastic ---mind blowing.

और अपडेट का अंतिम पैराग्राफ और वैदेही का संवाद अपडेट का ही नही बल्कि पुरी कहानी का सबसे बेस्ट डायलॉग बन गया। कहानी का मूल अंश--मूल तत्व--सार बन गया।

आउटस्टैंडिंग बुज्जी भाई।
जगमग जगमग अपडेट। :adore:
 

Nobeless

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Kya yaha flash back dena jaruri h
Short m hi nipta do na
Anky bhai short flashback story ko weak krta है अगर सही तरीके से handle ना किया जाए तो और इस epic का short me निपटारा krna कोई न्याय नहीं होगा इस कहानी se let the character breath and give them some story time to feel the moments yeh koi 2-2½ घण्टे की मूवी नहीं जो सब कुछ FastTrack ही chle we dont need to put that restriction in this medium of story telling Hume कौनसी jaldi hai कहानी को खत्म करने की? उसके लिए cinema का medium पहले से ही है हमारे पास। अगर नाग भाई ने वैदेही के फ्लैश back को शॉर्ट मे निपटाया होता (जो कि मैं कहूँगा फिर भी शॉर्ट है considering the vaidahi importance in this story) तो तो आज is story का वेटेज शायद उतना नहीं होता जितना अभी है revenge का महत्व को समझने ke लिए उसके पीछे के कारण उस प्रताड़ना को जानना भी उतना ही आवश्यक होता है। Revenge without the proper cause?!!! That revenge would be another edgy stuff that we have seen in a lot movies recently so [Anky] bhai flashback toh अति महत्वपूर्ण हिस्सा है इस स्टोरी का बिना flashback bht se chije बेमतलब najar आएगी।
Thank you
 
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