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Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed)

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What should be Vaibhav's role in this story..???

  • His role should be the same as before...

    Votes: 19 9.9%
  • Must be of a responsible and humble nature...

    Votes: 22 11.5%
  • One should be as strong as Dada Thakur...

    Votes: 75 39.1%
  • One who gives importance to love over lust...

    Votes: 44 22.9%
  • A person who has fear in everyone's heart...

    Votes: 32 16.7%

  • Total voters
    192
  • Poll closed .

Dark Cobra

CRIMSON
259
443
64
अध्याय - 152
━━━━━━༻♥༺━━━━━━



अगली सुबह।
चाय नाश्ता कर के मैं हवेली से चंदनपुर जाने के लिए जीप से निकला। मां ने मुझे समझाया था कि मैं वहां किसी से भी बेवजह उलझने जैसा बर्ताव न करूं और ना ही अपनी भाभी से ऐसी कोई बात कहूं जिससे कि उन्हें कोई तकलीफ़ पहुंचे। हालाकि ऐसा मैं कर ही नहीं सकता था लेकिन मां तो मां ही थीं, शायद फिक्रमंदी के चलते उन्होंने मुझे ऐसी सलाह दी थी।

पूरे रास्ते मैं भाभी के बारे में ही जाने क्या क्या सोचता रहा। मन में तरह तरह की आशंकाएं उभर आतीं थी जिनके चलते मेरे अंदर एक घबराहट सी होने लगी थी। मैं अपने आपको इस बात के लिए तैयार करता जा रहा था कि जब भाभी से मेरा सामना होगा तब मैं उनके सामने बहुत ही सभ्य और शांत तरीके से अपने दिल की बातें रखूंगा। यूं तो मुझे पूरा भरोसा था कि भाभी मुझे समझेंगी लेकिन इसके बावजूद जाने क्यों मेरे मन में आशंकाएं उभर आतीं थी।

बहरहाल, दोपहर होने से पहले ही मैं चंदनपुर गांव यानि रागिनी भाभी के मायके पहुंच गया। अभी कुछ समय पहले ही मैं यहां आया था, इस लिए जैसे ही भैया के ससुराल वालों ने मुझे फिर से आया देखा तो सबके चेहरों पर हैरानी के भाव उभर आए। ये अलग बात है कि बाद में जल्दी ही उनके चेहरों पर खुशी के भाव भी उभर आए थे।

"अरे! क्या बात है।" भाभी का भाई वीरेंद्र सिंह लपक कर मेरे पास आते हुए बोला____"हमारे वैभव महाराज तो बड़ा जल्दी जल्दी हमें दर्शन दे रहे हैं।"

वीरेंद्र ने कहने के साथ ही झुक कर मेरे पैर छुए। उसकी बातों से जाने क्यों मैं थोड़ा असहज सा हो गया था। ये अलग बात है कि मैं जल्दी ही खुद को सामान्य रखने का प्रयास करते हुए हल्के से मुस्कुरा उठा था। ख़ैर वीरेंद्र मुझे ले कर अंदर बैठक में आया, जहां बाकी लोग पहले से ही मौजूद थे। सबने एक एक कर के मेरे पांव छुए। एक बार फिर से वही क्रिया दोहराई जाने लगी, यानि पीतल की थाल में मेरे पांव धोना वगैरह। थोड़ी देर औपचारिक तौर पर हाल चाल हुआ। इसी बीच अंदर से वीरेंद्र सिंह की पत्नी वंदना भाभी मेरे लिए जल पान के कर आ गईं।

घर में इस वक्त मर्दों के नाम पर सिर्फ वीरेंद्र सिंह ही था, बाकी मर्द खेत गए हुए थे। मेरे आने की ख़बर फ़ौरन ही भैया के चाचा ससुर के घर तक पहुंच गई थी इस लिए उनके घर की औरतें और बहू बेटियां भी आ गईं।

"और बताईए महाराज बड़ा जल्दी आपके दर्शन हो गए।" वीरेंद्र सिंह ने पूछा____"यहां किसी विशेष काम से आए हैं क्या?"

"हां कुछ ऐसा ही है।" मैंने थोड़ा झिझकते हुए कहा____"असल में उस समय जब मैं यहां आया था तो भाभी को लेने आया था। उस समय मुझे बाकी बातों का बिल्कुल भी पता नहीं था। उसके बाद जब यहां से गया तो मां से ऐसी बातें पता चलीं जिनके बारे में मैं कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था।"

"हां मैं समझ सकता हूं महाराज।" वीरेंद्र ने गहरी सांस लेते हुए थोड़ा गंभीर हो कर कहा____"और कृपया मुझे भी माफ़ करें मैंने भी इसके पहले इस बारे में आपको कुछ नहीं बताया। सच कहूं तो मुझे समझ ही नहीं आया था कि आपसे कैसे कहूं? दूसरी बात ये थी कि हम चाहते थे कि ये सब बातें आपको अपने ही माता पिता से पता चलें तो ज़्यादा उचित होगा।"

अभी मैं कुछ कहने ही वाला था कि तभी अंदर से भाभी की मां सुलोचना देवी आ गईं। उन्हें देख कर मैं फिर से थोड़ा असहज सा महसूस करने लगा।

"कोई ख़ास काम था क्या महाराज?" सुलोचना देवी ने आते ही थोड़ी फिक्रमंदी से पूछा____"जिसके लिए आपको फिर से यहां आना पड़ा है?"

"वैभव महाराज को रिश्ते के बारे में पता चल चुका है मां।" मेरे कुछ बोलने से पहले ही वीरेंद्र ने अपनी मां की तरफ देखते हुए कहा____"और ये शायद उसी सिलसिले में यहां आए हैं।"

"ओह! सब ठीक तो है ना महाराज?" सुलोचना देवी एकदम से चिंतित सी नज़र आईं।

"हां मां जी सब ठीक ही है।" मैंने खुद को सामान्य रखने का प्रयास करते हुए कहा____"मैं यहां बस भाभी से मिलने आया हूं। उनसे कुछ ऐसी बातें कहने आया हूं जिन्हें कहे बिना मुझे चैन नहीं मिल सकता। आप कृपया मेरी इस बात को अन्यथा मत लें और कृपा कर के मुझे भाभी से अकेले में बात करने का अवसर दें।"

मेरी बात सुन कर सुलोचना देवी और वीरेंद्र सिंह एक दूसरे की तरफ देखने लगे। चेहरों पर उलझन के भाव उभर आए थे। फिर सुलोचना देवी ने जैसे खुद को सम्हाला और होठों पर मुस्कान सजा कर कहा____"ठीक है, अगर आप ऐसा ही चाहते हैं तो मैं रागिनी से अकेले में आपकी मुलाक़ात करवा देती हूं। आप थोड़ी देर रुकिए, मैं अभी आती हूं।"

कहने के साथ ही सुलोचना देवी पलट कर अंदर की तरफ चली गईं। इधर वीरेंद्र सिंह जाने किस सोच में गुम हो गया था। मुझे भी समझ नहीं आ रहा था कि उससे क्या कहूं। बस ख़ामोशी से वक्त के गुज़रने का इंतज़ार करने लगा।

क़रीब पांच मिनट बाद सुलोचना देवी बाहर आईं। उन्होंने मुझे अपने साथ अंदर चलने को कहा तो मैं एक नज़र वीरेंद्र सिंह पर डालने के बाद पलंग से उठा और सुलोचना देवी के साथ अंदर की तरफ बढ़ चला। एकाएक ही मेरी धड़कनें तीव्र गति से चलने लगीं थी और साथ ही ये सोच कर घबराहट भी होने लगी थी कि भाभी के सामने कैसे खुद को सामान्य रख पाऊंगा मैं? कैसे उनसे नज़रें मिला कर अपने दिल की बातें कह पाऊंगा? क्या वो मुझे समझेंगी?

सुलोचना देवी मुझे ले कर घर के पिछले हिस्से में आ गईं। घर के पीछे खाली जगह थी जहां पर एक तरफ कुआं था और बाकी कुछ हिस्सों में कई सारे पेड़ पौधे लगे हुए थे।

"महाराज।" सुलोचना देवी ने पलट कर मुझसे कहा____"आप यहीं रुकें, मैं रागिनी को भेजती हूं।"

"जी ठीक है।" मैंने कहा और कुएं की तरफ यूं ही बढ़ चला।

उधर सुलोचना देवी वापस अंदर चली गईं। मैं कुएं के पास आ कर उसमें झांकने लगा। कुएं में क़रीब पांच फीट की दूरी पर पानी नज़र आया। मैं झांकते हुए कुएं के पानी को ज़रूर देखने लगा था लेकिन मेरा मन इसी सोच में डूबा हुआ था कि भाभी के आने पर क्या होगा? क्या मेरी तरह उनका भी यही हाल होगा? क्या मेरी तरह वो भी घबराई हुई होंगी?

अभी मैं ये सब सोच ही रहा था कि तभी मुझे किसी के आने का आभास हुआ। किसी के आने के एहसास से एकाएक मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे दिल ने एकदम से धड़कना ही बंद कर दिया हो। सब कुछ थम गया सा महसूस हुआ। मैंने बड़ी मुश्किल से ख़ुद को सम्हाला और फिर धीरे से पलटा।

मेरी नज़र रागिनी भाभी पर पड़ी। गुलाबी कुर्ते सलवार में वो मेरी तरफ पीठ किए अमरूद के पेड़ के पास ठहर ग‌ईं थी। उनके बालों की चोटी उनकी पीठ से होते हुए नीचे उनके नितम्बों को भी पार गई थी। सहसा वो थोड़ा सा घूमीं जिसके चलते मुझे उनके चेहरे की थोड़ी सी झलक मिली। दोनों हाथों में पकड़े अपने दुपट्टे के छोर को हौले हौले उमेठने में लगीं हुईं थी वो।

कुछ देर तक ख़ामोशी से उनकी तरफ देखते रहने के बाद मैं हिम्मत जुटा कर उनकी तरफ बढ़ा। मेरी धड़कनें जो इसके पहले थम सी गई थी वो चलने तो लगीं थी लेकिन हर गुज़रते पल के साथ वो धाड़ धाड़ की शक्ल में बजते हुए मेरी पसलियों पर चोट करने लगीं थी। आख़िर कुछ ही पलों में मैं उनके थोड़ा पास पहुंच गया। शायद उन्हें भी एहसास हो गया था कि मैं उनके पास आ गया हूं इस लिए दुपट्टे को उमेठने वाली उनकी क्रिया एकदम से रुक गई थी।

"भ...भाभी।" मैंने धाड़ धाड़ बजते अपने दिल के साथ बड़ी मुश्किल से उन्हें पुकारा।

एकाएक ही मेरे अंदर बड़ी तेज़ हलचल सी मच गई थी जिसे मैं काबू में करने का प्रयास करने लगा था। उधर मेरे पुकारने पर भाभी पर प्रतिक्रिया हुई। वो बहुत धीमें से मेरी तरफ को पलटीं। अगले ही पल उनका खूबसूरत चेहरा पूरी तरह से मुझे नज़र आया। वो पलट तो गईं थी लेकिन मेरी तरफ देख नहीं रहीं थी। पलकें झुका रखीं थी उन्होंने। सुंदर से चेहरे पर हल्की सी सुर्खी छाई नज़र आई।

"अ...आप ठीक तो हैं ना?" मैंने खुद को सम्हालते हुए बड़ी मुश्किल से पूछा।

"हम्म्म्म।" उन्होंने धीमें से सिर हिलाया।

मुझे समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर किस तरह से उनसे वो बातें कहूं जो मैं उनसे कहने आया था। मेरे दिलो दिमाग़ में हलचल सी मची हुई थी। हल्की ठंड में भी मेरे चहरे पर घबराहट के चलते पसीना उभर आया था।

"व..वो मुझे समझ नहीं आ रहा कि कैसे मैं आपको अपने दिल की बात कहूं?" फिर मैंने किसी तरह उनकी तरफ देखते हुए कहा।

उनकी पलकें अभी भी झुकी हुईं थी किन्तु मेरी बात सुनते ही उन्होंने धीरे से पलकें उठा कर मेरी तरफ देखा। अगले ही पल हमारी नज़रें आपस में टकरा गईं। मुझे अपने अंदर एकदम से झुरझरी सी महसूस हुई। वो सवालिया भाव से मेरी तरफ देखने लगीं थी।

"कृपया आप मुझे ग़लत मत समझिएगा।" मैंने झिझकते हुए कहा____"मैं यहां आपसे ये कहने आया हूं कि मेरे दिल में आपके लिए ना पहले कभी कोई ग़लत ख़याल था और ना ही आगे कभी हो सकता है। मैं पहले भी आपका दिल की गहराइयों से आदर और सम्मान करता था और आगे भी करता रहूंगा।"

मेरी ये बातें सुनते ही भाभी के चेहरे पर राहत और खुशी जैसे भाव उभरे। उनकी आंखें जो विरान सी नज़र आ रहीं थी उनमें एकाएक नमी सी नज़र आने लगी। कुछ कहने के लिए उनके होठ कांपे किंतु शायद उनसे कुछ बोला नहीं गया।

"उस दिन जब मैं यहां आपको लेने आया था तो मुझे कुछ भी पता नहीं था।" मैंने धड़कते दिल से कहा____"यहां कामिनी ने जब मुझसे आपके ब्याह होने की बात बताई तो मुझे सच में धक्का लगा था क्योंकि आपका फिर से ब्याह होने की मैंने कल्पना ही नहीं की थी। फिर जब उन्होंने मुझे आपके जीवन को संवारने और आपकी खुशियों की बातें की तो मुझे भी एहसास हुआ कि वास्तव में आपके लिए यही उचित है। उसके बाद जब आपसे बातें हुईं और आपने ब्याह करने से मना कर दिया तो मुझे अच्छा तो लगा लेकिन फिर ये सोचा कि अगर आपका फिर से ब्याह नहीं हुआ तो भला कैसे आपका जीवन संवर सकता है और कैसे आपको सच्ची खुशियां मिल सकती हैं? इसी लिए मैंने आपसे कहा था कि आप हमारे लिए अपना जीवन बर्बाद मत कीजिए। ख़ैर उसके बाद मैं वापस चला गया था। वापस जाते समय मैं रास्ते में यही सोच रहा था कि आपके बारे में इतना बड़ा फ़ैसला ले लिया गया और किसी ने मुझे बताया तक नहीं। इतना तो मैं समझ गया था कि आपके ब्याह होने की बात मां और पिता जी को भी पहले से ही पता थी लेकिन मैं ये सोच कर नाराज़ सा हो गया था कि ये बात मुझसे क्यों छुपाई गई? जब हवेली पहुंचा तो मैंने मां से नाराज़गी दिखाते हुए यही सब पूछा, तब उन्होंने बताया, लेकिन पूरा सच तब भी नहीं बताया। वो तो रूपचंद्र की बातों से मुझे आभास हुआ कि अभी भी मुझसे कुछ छुपाया गया है। हवेली में जब दुबारा मां से पूछा तो उन्होंने बताया कि वास्तव में सच क्या है।"

इतना सब बोल कर मैं एकाएक चुप हो गया और भाभी को ध्यान से देखने लगा। वो पहले की ही तरह चुपचाप अपनी जगह पर खड़ीं थी। चेहरे पर अजीब से भाव उभर आए थे उनके। नज़रें फिर से झुका लीं थी उन्होंने।

"मां ने जब बताया कि आपका ब्याह असल में मेरे साथ करने का फ़ैसला किया गया है तो मैं आश्चर्यचकित रह गया था।" मैंने फिर से कहना शुरू किया____"मैंने तो ऐसा होने की कल्पना भी नहीं की थी लेकिन मां के अनुसार सच यही था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मेरे और आपके माता पिता हम दोनों का आपस में ब्याह करने का कैसे सोच सकते हैं? जब मैंने मां से ये सवाल किया तो उन्होंने पता नहीं कैसी कैसी बातों के द्वारा मुझे समझाना शुरू कर दिया। ये भी कहा कि क्या मैं अपनी भाभी के जीवन को फिर से संवारने के लिए और उनको सच्ची खुशियां देने के लिए इस रिश्ते को स्वीकार नहीं कर सकता? मां के इस सवाल पर मैं अवाक सा रह गया था और फिर आख़िर में मुझे स्वीकार करना ही पड़ा। सब लोग यही चाहते थे, सबको लगता है कि यही उचित है और इसी से आपका भला हो सकता है तो मैं भला कैसे इंकार कर देता? मैं भला ये कैसे चाह सकता था भाभी कि मेरी वजह से आपका जीवन खुशियों से महरूम हो जाए? मैं तो पहले से ही सच्चे दिल से यही चाहता था कि आप हमेशा खुश रहें, आपके जीवन में एक पल के लिए कभी दुख का साया न आए।"

भाभी अब भी नज़रें झुकाए ख़ामोश खड़ीं थी। उन्हें यूं ख़ामोश खड़ा देख मुझे घबराहट भी होने लगी थी लेकिन मैंने सोच लिया था कि उनसे जो कुछ कहने आया था वो कह कर ही जाऊंगा।

"उस दिन से अब तक मैं इसी रिश्ते के बारे में सोचता रहा हूं भाभी।" मैंने गहरी सांस ले कर कहा____"आपकी खुशी के लिए मैं दुनिया का कोई भी काम कर सकता हूं। आपके होठों पर मुस्कान लाने के लिए मैं खुशी खुशी ख़ुद को भी मिटा सकता हूं। मेरे इस बदले हुए जीवन में आपका बहुत बड़ा हाथ रहा है। आज मैं जो बन गया हूं उसमें आपका ही सहयोग था और आपका ही मार्गदर्शन रहा है। मुझे खुशी है कि मैं अपनी भाभी की बदौलत आज एक अच्छा इंसान बनने लगा हूं। मैं आपसे यही कहना चाहता हूं कि आप ये कभी मत समझना कि इस रिश्ते के चलते आपके प्रति मेरी भावनाओं में कोई बदलाव आ जाएगा। आप ये कभी मत सोचना कि मेरे दिल से आपके प्रति आदर और सम्मान मिट जाएगा। मेरे दिल में हमेशा आपके लिए मान सम्मान और श्रद्धा की भावना रहेगी।"

"तु...तुम्हें ये सब कहने की ज़रूरत नहीं है।" भाभी ने नज़रें उठा कर अधीरता से कहा____"मैं जानती हूं और समझती हूं कि तुम मेरी कितनी इज्ज़त करते हो।"

"आपको पता है।" मैंने सहसा अधीर हो कर कहा____"कुछ दिनों से मैं अपने आपको अपराधी सा महसूस करने लगा हूं।"

"ऐसा क्यों?" भाभी के चेहरे पर चौंकने वाले भाव उभरे और साथ ही फिक्रमंदी के भी।

"मेरे मन में बार बार यही ख़याल उभरता रहता है कि इस रिश्ते के चलते आप मेरे बारे में जाने क्या क्या सोचने लगी होंगी।" मैंने कहा____"इतना तो सबको पता रहा है कि मेरा चरित्र कैसा था। अब जब आपका ब्याह मुझसे करने का फ़ैसला किया गया तो मेरे मन में यही ख़याल उभरा कि आप भी अब मेरे चरित्र के आधार पर यही सोच रही होंगी कि मैं आपके बारे में पहले से ही ग़लत सोच रखता रहा होऊंगा, इसी लिए रिश्ते को झट से मंजूरी दे दी।"

"न...नहीं नहीं।" भाभी ने झट से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"ऐसा नहीं है। मैं तुम्हारे बारे में ऐसा सपने में भी नहीं सोच सकती। तुम ऐसा क्यों सोचते हो?"

"क्या करूं भाभी?" मेरी आंखें भर आईं____"मेरा चरित्र ही ऐसा रहा है कि अब अपने उस चरित्र से मुझे ख़ुद ही बहुत घृणा होती है। बार बार यही एहसास होता है कि इस रिश्ते का ज़िक्र होने के बाद अब हर कोई मेरे बारे में ग़लत ही सोच रहा होगा। मेरा यकीन कीजिए भाभी, भले ही मेरा चरित्र निम्न दर्ज़े का रहा है लेकिन मैंने कभी भी आपके बारे में ग़लत नहीं सोचा है। मैं इतना भी गिरा हुआ नहीं था कि अपने ही घर की औरतों और बहू बेटी पर नीयत ख़राब कर लेता। काश! हनुमान जी की तरह मुझमें भी शक्ति होती तो इस वक्त मैं अपना सीना चीर कर आपको दिखा देता। मैं दिखा देता और फिर कहता कि देख लीजिए....मेरे सीने में आपके लिए सिर्फ और सिर्फ आदर सम्मान और श्रद्धा की ही भावना मौजूद है।"

"ब..बस करो।" रागिनी भाभी की आंखें छलक पड़ीं, रुंधे हुए गले से बोलीं____"मैंने कहा ना कि तुम्हें ऐसा कुछ भी सोचने की ज़रूरत नहीं है और ना ही कुछ कहने की। मैं अच्छी तरह जानती हूं और हमेशा महसूस भी किया है कि तुमने कभी मेरे बारे में ग़लत नहीं सोचा है। सच कहती हूं, मुझे हमेशा से ही तुम्हारे जैसा देवर मिलने का गर्व रहा है।"

"आप सच कह रही हैं ना भाभी?" मैं अधीरता से बोल पड़ा____"क्या सचमुच आपको मुझ पर भरोसा है।"

"हां, ख़ुद से भी ज़्यादा।" भाभी ने लरजते स्वर में कहा____"वैसे सच कहूं तो मेरी भी दशा तुम्हारे जैसी ही है। इतने दिनों से मैं भी यही सोचते हुए ख़ुद को दुखी किए हूं कि इस रिश्ते के चलते तुम मेरे बारे में पता नहीं क्या सोचने लगे होगे। अपनी मां और भाभी से यही कहती थी कि अगर तुमने इस रिश्ते के चलते एक पल के लिए भी मेरे बारे में ग़लत सोच लिया तो मेरे लिए वो बहुत ही शर्म की बात हो जाएगी। उस सूरत में मुझे ऐसा लगने लगेगा कि ये धरती फटे और मैं उसमें समा जाऊं।"

"नहीं भाभी नहीं।" मैं तड़प कर बोल पड़ा____"मैं आपके बारे में कभी ग़लत नहीं सोच सकता। आप तो देवी हैं मेरे लिए जिनके प्रति हमेशा सिर्फ श्रद्धा ही रहेगी। दुनिया इधर से उधर हो जाए लेकिन मैं कभी आपके प्रति कुछ भी उल्टा सीधा नहीं सोच सकता। आप इस बात से बिलकुल निश्चिंत रहें भाभी। मैं नहीं जानता कि ऊपर बैठा विधाता मुझसे या आपसे क्या चाहता है लेकिन इतना यकीन कीजिए कि ये संबंध मेरे और आपके बीच मौजूद सच्ची भावनाओं को कभी मैला नहीं कर सकता।"

"तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद वैभव।" भाभी की आंखों से फिर से आंसू का एक कतरा छलक गया____"तुमने ये कह कर मेरे मन को बहुत बड़ी राहत दी है। तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं है कि इतने दिनों से मैं ये सब सोच सोच कर कितना व्यथित थी।"

"आप खुद को दुखी मत रखिए भाभी।" मैंने कहा____"आप अच्छी तरह जानती हैं कि मैं आपको दुखी होते नहीं देख सकता। इसके पहले आपको खुश रखने के लिए मेरे बस में जो था वो कर रहा था लेकिन इस रिश्ते के बाद मेरी हमेशा यही कोशिश रहेगी कि मैं आपको कभी एक पल के लिए भी दुख में न रहने दूं।"

मेरी बात सुन कर रागिनी भाभी बड़े गौर से मेरी तरफ देखने लगीं थी। उनके चेहरे पर खुशी के भाव तो थे ही किंतु एकाएक लाज की सुर्खी भी उभर आई थी। उनकी आंखों में समंदर से भी ज़्यादा गहरा प्यार और स्नेह झलकता नज़र आया मुझे।

"क्या रूपा को पता है इस बारे में?" फिर उन्होंने खुद को सम्हालते हुए पूछा____"उस बेचारी के साथ फिर से एक ऐसी स्थिति आ गई है जहां पर उसे समझौता करना पड़ेगा। उसके बारे में जब भी सोचती हूं तो पता नहीं क्यों बहुत बुरा लगता है। तुम्हारे जीवन में सिर्फ उसी का हक़ है।"

"उसे मैंने ही इस बारे में बताया है।" मैंने उनकी तरफ देखते हुए कहा____"पहले तो उसे यकीन ही नहीं हुआ लेकिन जब मैंने सारी बातें बताई तो वो भी यही कहने लगी कि आपके लिए यही उचित है।"

"क्या उसे इस बारे में जान कर तकलीफ़ नहीं हुई?" भाभी ने हैरानी ज़ाहिर करते हुए पूछा।

"उसने क्या कहा जब आप ये सुनेंगी तो आपको बड़ा आश्चर्य होगा।" मैंने हौले से मुस्कुरा कर कहा।

"अच्छा, क्या कहा उसने?" भाभी ने उत्सुकता से पूछा।

मैंने संक्षेप में उन्हें रूपा से हुई अपनी बातें बता दी। सुन कर सचमुच भाभी के चेहरे पर आश्चर्य के भाव उभर आए। कुछ देर जाने क्या सोचती रहीं फिर एक गहरी सांस लीं।

"सचमुच बहुत अद्भुत लड़की है वो।" भाभी ने चकित भाव से कहा____"आज के युग में ऐसी लड़कियां विरले ही कहीं देखने को मिलती हैं। तुम बहुत किस्मत वाले हो जो ऐसी लड़की तुमसे इतना प्रेम करती है और तुम्हारी जीवन संगिनी बनने वाली है। मेरा तुमसे यही कहना है कि तुम कभी भी उसके प्रेम का निरादर मत करना और ना ही कभी उसको कोई दुख तकलीफ़ देना।"

"कभी नहीं दूंगा भाभी।" मैंने अधीरता से कहा____"उसे दुख तकलीफ़ देने का मतलब है हद दर्ज़े का गुनाह करना। कभी कभी सोचा करता हूं कि मैंने तो अपने अब तक के जीवन में हमेशा बुरे कर्म ही किए थे इसके बावजूद ऊपर वाले ने मेरी किस्मत में मुझे इतना प्रेम करने वाली लड़कियां कैसे लिखी थीं?"

"शायद इस लिए क्योंकि ऐसी अद्भुत लड़कियों के द्वारा वो तुम्हें मुकम्मल रूप से बदल देना चाहता था।" भाभी ने कहा____"काश! ईश्वर ने अनुराधा के साथ ऐसा न किया होता। उस मासूम का जब भी ख़याल आता है तो मन बहुत ज़्यादा व्यथित हो उठता है।"

अनुराधा का ज़िक्र होते ही मेरे दिलो दिमाग़ में बड़ी तेज़ी से एक तूफ़ान सा आया और फिर मुझे अंदर तक हिला कर चला गया। ख़ैर कुछ देर और मेरी भाभी से बातें हुईं उसके बाद वो चली गईं। उनके जाने के थोड़ी देर बाद मैं भी वापस बैठक में आ गया। वीरेंद्र सिंह खेतों की तरफ चला गया था इस लिए मैं चुपचाप पलंग पर लेट गया और फिर भाभी से बातों के बारे में सोचने लगा। भाभी से अपने दिल की बातें कह देने से और उनका जवाब सुन लेने से अब मैं बहुत हल्का महसूस कर रहा था।




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बहरहाल, दोपहर होने से पहले ही मैं चंदनपुर गांव यानि रागिनी भाभी के मायके पहुंच गया। अभी कुछ समय पहले ही मैं यहां आया था, इस लिए जैसे ही भैया के ससुराल वालों ने मुझे फिर से आया देखा तो सबके चेहरों पर हैरानी के भाव उभर आए। ये अलग बात है कि बाद में जल्दी ही उनके चेहरों पर खुशी के भाव भी उभर आए थे।

"अरे! क्या बात है।" भाभी का भाई वीरेंद्र सिंह लपक कर मेरे पास आते हुए बोला____"हमारे वैभव महाराज तो बड़ा जल्दी जल्दी हमें दर्शन दे रहे हैं।"

वीरेंद्र ने कहने के साथ ही झुक कर मेरे पैर छुए। उसकी बातों से जाने क्यों मैं थोड़ा असहज सा हो गया था। ये अलग बात है कि मैं जल्दी ही खुद को सामान्य रखने का प्रयास करते हुए हल्के से मुस्कुरा उठा था। ख़ैर वीरेंद्र मुझे ले कर अंदर बैठक में आया, जहां बाकी लोग पहले से ही मौजूद थे। सबने एक एक कर के मेरे पांव छुए। एक बार फिर से वही क्रिया दोहराई जाने लगी, यानि पीतल की थाल में मेरे पांव धोना वगैरह। थोड़ी देर औपचारिक तौर पर हाल चाल हुआ। इसी बीच अंदर से वीरेंद्र सिंह की पत्नी वंदना भाभी मेरे लिए जल पान के कर आ गईं।

घर में इस वक्त मर्दों के नाम पर सिर्फ वीरेंद्र सिंह ही था, बाकी मर्द खेत गए हुए थे। मेरे आने की ख़बर फ़ौरन ही भैया के चाचा ससुर के घर तक पहुंच गई थी इस लिए उनके घर की औरतें और बहू बेटियां भी आ गईं।

"और बताईए महाराज बड़ा जल्दी आपके दर्शन हो गए।" वीरेंद्र सिंह ने पूछा____"यहां किसी विशेष काम से आए हैं क्या?"

"हां कुछ ऐसा ही है।" मैंने थोड़ा झिझकते हुए कहा____"असल में उस समय जब मैं यहां आया था तो भाभी को लेने आया था। उस समय मुझे बाकी बातों का बिल्कुल भी पता नहीं था। उसके बाद जब यहां से गया तो मां से ऐसी बातें पता चलीं जिनके बारे में मैं कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था।"

"हां मैं समझ सकता हूं महाराज।" वीरेंद्र ने गहरी सांस लेते हुए थोड़ा गंभीर हो कर कहा____"और कृपया मुझे भी माफ़ करें मैंने भी इसके पहले इस बारे में आपको कुछ नहीं बताया। सच कहूं तो मुझे समझ ही नहीं आया था कि आपसे कैसे कहूं? दूसरी बात ये थी कि हम चाहते थे कि ये सब बातें आपको अपने ही माता पिता से पता चलें तो ज़्यादा उचित होगा।"

अभी मैं कुछ कहने ही वाला था कि तभी अंदर से भाभी की मां सुलोचना देवी आ गईं। उन्हें देख कर मैं फिर से थोड़ा असहज सा महसूस करने लगा।

"कोई ख़ास काम था क्या महाराज?" सुलोचना देवी ने आते ही थोड़ी फिक्रमंदी से पूछा____"जिसके लिए आपको फिर से यहां आना पड़ा है?"

"वैभव महाराज को रिश्ते के बारे में पता चल चुका है मां।" मेरे कुछ बोलने से पहले ही वीरेंद्र ने अपनी मां की तरफ देखते हुए कहा____"और ये शायद उसी सिलसिले में यहां आए हैं।"

"ओह! सब ठीक तो है ना महाराज?" सुलोचना देवी एकदम से चिंतित सी नज़र आईं।

"हां मां जी सब ठीक ही है।" मैंने खुद को सामान्य रखने का प्रयास करते हुए कहा____"मैं यहां बस भाभी से मिलने आया हूं। उनसे कुछ ऐसी बातें कहने आया हूं जिन्हें कहे बिना मुझे चैन नहीं मिल सकता। आप कृपया मेरी इस बात को अन्यथा मत लें और कृपा कर के मुझे भाभी से अकेले में बात करने का अवसर दें।"

मेरी बात सुन कर सुलोचना देवी और वीरेंद्र सिंह एक दूसरे की तरफ देखने लगे। चेहरों पर उलझन के भाव उभर आए थे। फिर सुलोचना देवी ने जैसे खुद को सम्हाला और होठों पर मुस्कान सजा कर कहा____"ठीक है, अगर आप ऐसा ही चाहते हैं तो मैं रागिनी से अकेले में आपकी मुलाक़ात करवा देती हूं। आप थोड़ी देर रुकिए, मैं अभी आती हूं।"

कहने के साथ ही सुलोचना देवी पलट कर अंदर की तरफ चली गईं। इधर वीरेंद्र सिंह जाने किस सोच में गुम हो गया था। मुझे भी समझ नहीं आ रहा था कि उससे क्या कहूं। बस ख़ामोशी से वक्त के गुज़रने का इंतज़ार करने लगा।

क़रीब पांच मिनट बाद सुलोचना देवी बाहर आईं। उन्होंने मुझे अपने साथ अंदर चलने को कहा तो मैं एक नज़र वीरेंद्र सिंह पर डालने के बाद पलंग से उठा और सुलोचना देवी के साथ अंदर की तरफ बढ़ चला। एकाएक ही मेरी धड़कनें तीव्र गति से चलने लगीं थी और साथ ही ये सोच कर घबराहट भी होने लगी थी कि भाभी के सामने कैसे खुद को सामान्य रख पाऊंगा मैं? कैसे उनसे नज़रें मिला कर अपने दिल की बातें कह पाऊंगा? क्या वो मुझे समझेंगी?

सुलोचना देवी मुझे ले कर घर के पिछले हिस्से में आ गईं। घर के पीछे खाली जगह थी जहां पर एक तरफ कुआं था और बाकी कुछ हिस्सों में कई सारे पेड़ पौधे लगे हुए थे।

"महाराज।" सुलोचना देवी ने पलट कर मुझसे कहा____"आप यहीं रुकें, मैं रागिनी को भेजती हूं।"

"जी ठीक है।" मैंने कहा और कुएं की तरफ यूं ही बढ़ चला।

उधर सुलोचना देवी वापस अंदर चली गईं। मैं कुएं के पास आ कर उसमें झांकने लगा। कुएं में क़रीब पांच फीट की दूरी पर पानी नज़र आया। मैं झांकते हुए कुएं के पानी को ज़रूर देखने लगा था लेकिन मेरा मन इसी सोच में डूबा हुआ था कि भाभी के आने पर क्या होगा? क्या मेरी तरह उनका भी यही हाल होगा? क्या मेरी तरह वो भी घबराई हुई होंगी?

अभी मैं ये सब सोच ही रहा था कि तभी मुझे किसी के आने का आभास हुआ। किसी के आने के एहसास से एकाएक मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे दिल ने एकदम से धड़कना ही बंद कर दिया हो। सब कुछ थम गया सा महसूस हुआ। मैंने बड़ी मुश्किल से ख़ुद को सम्हाला और फिर धीरे से पलटा।

मेरी नज़र रागिनी भाभी पर पड़ी। गुलाबी कुर्ते सलवार में वो मेरी तरफ पीठ किए अमरूद के पेड़ के पास ठहर ग‌ईं थी। उनके बालों की चोटी उनकी पीठ से होते हुए नीचे उनके नितम्बों को भी पार गई थी। सहसा वो थोड़ा सा घूमीं जिसके चलते मुझे उनके चेहरे की थोड़ी सी झलक मिली। दोनों हाथों में पकड़े अपने दुपट्टे के छोर को हौले हौले उमेठने में लगीं हुईं थी वो।

कुछ देर तक ख़ामोशी से उनकी तरफ देखते रहने के बाद मैं हिम्मत जुटा कर उनकी तरफ बढ़ा। मेरी धड़कनें जो इसके पहले थम सी गई थी वो चलने तो लगीं थी लेकिन हर गुज़रते पल के साथ वो धाड़ धाड़ की शक्ल में बजते हुए मेरी पसलियों पर चोट करने लगीं थी। आख़िर कुछ ही पलों में मैं उनके थोड़ा पास पहुंच गया। शायद उन्हें भी एहसास हो गया था कि मैं उनके पास आ गया हूं इस लिए दुपट्टे को उमेठने वाली उनकी क्रिया एकदम से रुक गई थी।

"भ...भाभी।" मैंने धाड़ धाड़ बजते अपने दिल के साथ बड़ी मुश्किल से उन्हें पुकारा।

एकाएक ही मेरे अंदर बड़ी तेज़ हलचल सी मच गई थी जिसे मैं काबू में करने का प्रयास करने लगा था। उधर मेरे पुकारने पर भाभी पर प्रतिक्रिया हुई। वो बहुत धीमें से मेरी तरफ को पलटीं। अगले ही पल उनका खूबसूरत चेहरा पूरी तरह से मुझे नज़र आया। वो पलट तो गईं थी लेकिन मेरी तरफ देख नहीं रहीं थी। पलकें झुका रखीं थी उन्होंने। सुंदर से चेहरे पर हल्की सी सुर्खी छाई नज़र आई।

"अ...आप ठीक तो हैं ना?" मैंने खुद को सम्हालते हुए बड़ी मुश्किल से पूछा।

"हम्म्म्म।" उन्होंने धीमें से सिर हिलाया।

मुझे समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर किस तरह से उनसे वो बातें कहूं जो मैं उनसे कहने आया था। मेरे दिलो दिमाग़ में हलचल सी मची हुई थी। हल्की ठंड में भी मेरे चहरे पर घबराहट के चलते पसीना उभर आया था।

"व..वो मुझे समझ नहीं आ रहा कि कैसे मैं आपको अपने दिल की बात कहूं?" फिर मैंने किसी तरह उनकी तरफ देखते हुए कहा।

उनकी पलकें अभी भी झुकी हुईं थी किन्तु मेरी बात सुनते ही उन्होंने धीरे से पलकें उठा कर मेरी तरफ देखा। अगले ही पल हमारी नज़रें आपस में टकरा गईं। मुझे अपने अंदर एकदम से झुरझरी सी महसूस हुई। वो सवालिया भाव से मेरी तरफ देखने लगीं थी।

"कृपया आप मुझे ग़लत मत समझिएगा।" मैंने झिझकते हुए कहा____"मैं यहां आपसे ये कहने आया हूं कि मेरे दिल में आपके लिए ना पहले कभी कोई ग़लत ख़याल था और ना ही आगे कभी हो सकता है। मैं पहले भी आपका दिल की गहराइयों से आदर और सम्मान करता था और आगे भी करता रहूंगा।"

मेरी ये बातें सुनते ही भाभी के चेहरे पर राहत और खुशी जैसे भाव उभरे। उनकी आंखें जो विरान सी नज़र आ रहीं थी उनमें एकाएक नमी सी नज़र आने लगी। कुछ कहने के लिए उनके होठ कांपे किंतु शायद उनसे कुछ बोला नहीं गया।

"उस दिन जब मैं यहां आपको लेने आया था तो मुझे कुछ भी पता नहीं था।" मैंने धड़कते दिल से कहा____"यहां कामिनी ने जब मुझसे आपके ब्याह होने की बात बताई तो मुझे सच में धक्का लगा था क्योंकि आपका फिर से ब्याह होने की मैंने कल्पना ही नहीं की थी। फिर जब उन्होंने मुझे आपके जीवन को संवारने और आपकी खुशियों की बातें की तो मुझे भी एहसास हुआ कि वास्तव में आपके लिए यही उचित है। उसके बाद जब आपसे बातें हुईं और आपने ब्याह करने से मना कर दिया तो मुझे अच्छा तो लगा लेकिन फिर ये सोचा कि अगर आपका फिर से ब्याह नहीं हुआ तो भला कैसे आपका जीवन संवर सकता है और कैसे आपको सच्ची खुशियां मिल सकती हैं? इसी लिए मैंने आपसे कहा था कि आप हमारे लिए अपना जीवन बर्बाद मत कीजिए। ख़ैर उसके बाद मैं वापस चला गया था। वापस जाते समय मैं रास्ते में यही सोच रहा था कि आपके बारे में इतना बड़ा फ़ैसला ले लिया गया और किसी ने मुझे बताया तक नहीं। इतना तो मैं समझ गया था कि आपके ब्याह होने की बात मां और पिता जी को भी पहले से ही पता थी लेकिन मैं ये सोच कर नाराज़ सा हो गया था कि ये बात मुझसे क्यों छुपाई गई? जब हवेली पहुंचा तो मैंने मां से नाराज़गी दिखाते हुए यही सब पूछा, तब उन्होंने बताया, लेकिन पूरा सच तब भी नहीं बताया। वो तो रूपचंद्र की बातों से मुझे आभास हुआ कि अभी भी मुझसे कुछ छुपाया गया है। हवेली में जब दुबारा मां से पूछा तो उन्होंने बताया कि वास्तव में सच क्या है।"

इतना सब बोल कर मैं एकाएक चुप हो गया और भाभी को ध्यान से देखने लगा। वो पहले की ही तरह चुपचाप अपनी जगह पर खड़ीं थी। चेहरे पर अजीब से भाव उभर आए थे उनके। नज़रें फिर से झुका लीं थी उन्होंने।

"मां ने जब बताया कि आपका ब्याह असल में मेरे साथ करने का फ़ैसला किया गया है तो मैं आश्चर्यचकित रह गया था।" मैंने फिर से कहना शुरू किया____"मैंने तो ऐसा होने की कल्पना भी नहीं की थी लेकिन मां के अनुसार सच यही था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मेरे और आपके माता पिता हम दोनों का आपस में ब्याह करने का कैसे सोच सकते हैं? जब मैंने मां से ये सवाल किया तो उन्होंने पता नहीं कैसी कैसी बातों के द्वारा मुझे समझाना शुरू कर दिया। ये भी कहा कि क्या मैं अपनी भाभी के जीवन को फिर से संवारने के लिए और उनको सच्ची खुशियां देने के लिए इस रिश्ते को स्वीकार नहीं कर सकता? मां के इस सवाल पर मैं अवाक सा रह गया था और फिर आख़िर में मुझे स्वीकार करना ही पड़ा। सब लोग यही चाहते थे, सबको लगता है कि यही उचित है और इसी से आपका भला हो सकता है तो मैं भला कैसे इंकार कर देता? मैं भला ये कैसे चाह सकता था भाभी कि मेरी वजह से आपका जीवन खुशियों से महरूम हो जाए? मैं तो पहले से ही सच्चे दिल से यही चाहता था कि आप हमेशा खुश रहें, आपके जीवन में एक पल के लिए कभी दुख का साया न आए।"

भाभी अब भी नज़रें झुकाए ख़ामोश खड़ीं थी। उन्हें यूं ख़ामोश खड़ा देख मुझे घबराहट भी होने लगी थी लेकिन मैंने सोच लिया था कि उनसे जो कुछ कहने आया था वो कह कर ही जाऊंगा।

"उस दिन से अब तक मैं इसी रिश्ते के बारे में सोचता रहा हूं भाभी।" मैंने गहरी सांस ले कर कहा____"आपकी खुशी के लिए मैं दुनिया का कोई भी काम कर सकता हूं। आपके होठों पर मुस्कान लाने के लिए मैं खुशी खुशी ख़ुद को भी मिटा सकता हूं। मेरे इस बदले हुए जीवन में आपका बहुत बड़ा हाथ रहा है। आज मैं जो बन गया हूं उसमें आपका ही सहयोग था और आपका ही मार्गदर्शन रहा है। मुझे खुशी है कि मैं अपनी भाभी की बदौलत आज एक अच्छा इंसान बनने लगा हूं। मैं आपसे यही कहना चाहता हूं कि आप ये कभी मत समझना कि इस रिश्ते के चलते आपके प्रति मेरी भावनाओं में कोई बदलाव आ जाएगा। आप ये कभी मत सोचना कि मेरे दिल से आपके प्रति आदर और सम्मान मिट जाएगा। मेरे दिल में हमेशा आपके लिए मान सम्मान और श्रद्धा की भावना रहेगी।"

"तु...तुम्हें ये सब कहने की ज़रूरत नहीं है।" भाभी ने नज़रें उठा कर अधीरता से कहा____"मैं जानती हूं और समझती हूं कि तुम मेरी कितनी इज्ज़त करते हो।"

"आपको पता है।" मैंने सहसा अधीर हो कर कहा____"कुछ दिनों से मैं अपने आपको अपराधी सा महसूस करने लगा हूं।"

"ऐसा क्यों?" भाभी के चेहरे पर चौंकने वाले भाव उभरे और साथ ही फिक्रमंदी के भी।

"मेरे मन में बार बार यही ख़याल उभरता रहता है कि इस रिश्ते के चलते आप मेरे बारे में जाने क्या क्या सोचने लगी होंगी।" मैंने कहा____"इतना तो सबको पता रहा है कि मेरा चरित्र कैसा था। अब जब आपका ब्याह मुझसे करने का फ़ैसला किया गया तो मेरे मन में यही ख़याल उभरा कि आप भी अब मेरे चरित्र के आधार पर यही सोच रही होंगी कि मैं आपके बारे में पहले से ही ग़लत सोच रखता रहा होऊंगा, इसी लिए रिश्ते को झट से मंजूरी दे दी।"

"न...नहीं नहीं।" भाभी ने झट से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"ऐसा नहीं है। मैं तुम्हारे बारे में ऐसा सपने में भी नहीं सोच सकती। तुम ऐसा क्यों सोचते हो?"

"क्या करूं भाभी?" मेरी आंखें भर आईं____"मेरा चरित्र ही ऐसा रहा है कि अब अपने उस चरित्र से मुझे ख़ुद ही बहुत घृणा होती है। बार बार यही एहसास होता है कि इस रिश्ते का ज़िक्र होने के बाद अब हर कोई मेरे बारे में ग़लत ही सोच रहा होगा। मेरा यकीन कीजिए भाभी, भले ही मेरा चरित्र निम्न दर्ज़े का रहा है लेकिन मैंने कभी भी आपके बारे में ग़लत नहीं सोचा है। मैं इतना भी गिरा हुआ नहीं था कि अपने ही घर की औरतों और बहू बेटी पर नीयत ख़राब कर लेता। काश! हनुमान जी की तरह मुझमें भी शक्ति होती तो इस वक्त मैं अपना सीना चीर कर आपको दिखा देता। मैं दिखा देता और फिर कहता कि देख लीजिए....मेरे सीने में आपके लिए सिर्फ और सिर्फ आदर सम्मान और श्रद्धा की ही भावना मौजूद है।"

"ब..बस करो।" रागिनी भाभी की आंखें छलक पड़ीं, रुंधे हुए गले से बोलीं____"मैंने कहा ना कि तुम्हें ऐसा कुछ भी सोचने की ज़रूरत नहीं है और ना ही कुछ कहने की। मैं अच्छी तरह जानती हूं और हमेशा महसूस भी किया है कि तुमने कभी मेरे बारे में ग़लत नहीं सोचा है। सच कहती हूं, मुझे हमेशा से ही तुम्हारे जैसा देवर मिलने का गर्व रहा है।"

"आप सच कह रही हैं ना भाभी?" मैं अधीरता से बोल पड़ा____"क्या सचमुच आपको मुझ पर भरोसा है।"

"हां, ख़ुद से भी ज़्यादा।" भाभी ने लरजते स्वर में कहा____"वैसे सच कहूं तो मेरी भी दशा तुम्हारे जैसी ही है। इतने दिनों से मैं भी यही सोचते हुए ख़ुद को दुखी किए हूं कि इस रिश्ते के चलते तुम मेरे बारे में पता नहीं क्या सोचने लगे होगे। अपनी मां और भाभी से यही कहती थी कि अगर तुमने इस रिश्ते के चलते एक पल के लिए भी मेरे बारे में ग़लत सोच लिया तो मेरे लिए वो बहुत ही शर्म की बात हो जाएगी। उस सूरत में मुझे ऐसा लगने लगेगा कि ये धरती फटे और मैं उसमें समा जाऊं।"

"नहीं भाभी नहीं।" मैं तड़प कर बोल पड़ा____"मैं आपके बारे में कभी ग़लत नहीं सोच सकता। आप तो देवी हैं मेरे लिए जिनके प्रति हमेशा सिर्फ श्रद्धा ही रहेगी। दुनिया इधर से उधर हो जाए लेकिन मैं कभी आपके प्रति कुछ भी उल्टा सीधा नहीं सोच सकता। आप इस बात से बिलकुल निश्चिंत रहें भाभी। मैं नहीं जानता कि ऊपर बैठा विधाता मुझसे या आपसे क्या चाहता है लेकिन इतना यकीन कीजिए कि ये संबंध मेरे और आपके बीच मौजूद सच्ची भावनाओं को कभी मैला नहीं कर सकता।"

"तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद वैभव।" भाभी की आंखों से फिर से आंसू का एक कतरा छलक गया____"तुमने ये कह कर मेरे मन को बहुत बड़ी राहत दी है। तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं है कि इतने दिनों से मैं ये सब सोच सोच कर कितना व्यथित थी।"

"आप खुद को दुखी मत रखिए भाभी।" मैंने कहा____"आप अच्छी तरह जानती हैं कि मैं आपको दुखी होते नहीं देख सकता। इसके पहले आपको खुश रखने के लिए मेरे बस में जो था वो कर रहा था लेकिन इस रिश्ते के बाद मेरी हमेशा यही कोशिश रहेगी कि मैं आपको कभी एक पल के लिए भी दुख में न रहने दूं।"

मेरी बात सुन कर रागिनी भाभी बड़े गौर से मेरी तरफ देखने लगीं थी। उनके चेहरे पर खुशी के भाव तो थे ही किंतु एकाएक लाज की सुर्खी भी उभर आई थी। उनकी आंखों में समंदर से भी ज़्यादा गहरा प्यार और स्नेह झलकता नज़र आया मुझे।

"क्या रूपा को पता है इस बारे में?" फिर उन्होंने खुद को सम्हालते हुए पूछा____"उस बेचारी के साथ फिर से एक ऐसी स्थिति आ गई है जहां पर उसे समझौता करना पड़ेगा। उसके बारे में जब भी सोचती हूं तो पता नहीं क्यों बहुत बुरा लगता है। तुम्हारे जीवन में सिर्फ उसी का हक़ है।"

"उसे मैंने ही इस बारे में बताया है।" मैंने उनकी तरफ देखते हुए कहा____"पहले तो उसे यकीन ही नहीं हुआ लेकिन जब मैंने सारी बातें बताई तो वो भी यही कहने लगी कि आपके लिए यही उचित है।"

"क्या उसे इस बारे में जान कर तकलीफ़ नहीं हुई?" भाभी ने हैरानी ज़ाहिर करते हुए पूछा।

"उसने क्या कहा जब आप ये सुनेंगी तो आपको बड़ा आश्चर्य होगा।" मैंने हौले से मुस्कुरा कर कहा।

"अच्छा, क्या कहा उसने?" भाभी ने उत्सुकता से पूछा।

मैंने संक्षेप में उन्हें रूपा से हुई अपनी बातें बता दी। सुन कर सचमुच भाभी के चेहरे पर आश्चर्य के भाव उभर आए। कुछ देर जाने क्या सोचती रहीं फिर एक गहरी सांस लीं।

"सचमुच बहुत अद्भुत लड़की है वो।" भाभी ने चकित भाव से कहा____"आज के युग में ऐसी लड़कियां विरले ही कहीं देखने को मिलती हैं। तुम बहुत किस्मत वाले हो जो ऐसी लड़की तुमसे इतना प्रेम करती है और तुम्हारी जीवन संगिनी बनने वाली है। मेरा तुमसे यही कहना है कि तुम कभी भी उसके प्रेम का निरादर मत करना और ना ही कभी उसको कोई दुख तकलीफ़ देना।"

"कभी नहीं दूंगा भाभी।" मैंने अधीरता से कहा____"उसे दुख तकलीफ़ देने का मतलब है हद दर्ज़े का गुनाह करना। कभी कभी सोचा करता हूं कि मैंने तो अपने अब तक के जीवन में हमेशा बुरे कर्म ही किए थे इसके बावजूद ऊपर वाले ने मेरी किस्मत में मुझे इतना प्रेम करने वाली लड़कियां कैसे लिखी थीं?"

"शायद इस लिए क्योंकि ऐसी अद्भुत लड़कियों के द्वारा वो तुम्हें मुकम्मल रूप से बदल देना चाहता था।" भाभी ने कहा____"काश! ईश्वर ने अनुराधा के साथ ऐसा न किया होता। उस मासूम का जब भी ख़याल आता है तो मन बहुत ज़्यादा व्यथित हो उठता है।"

अनुराधा का ज़िक्र होते ही मेरे दिलो दिमाग़ में बड़ी तेज़ी से एक तूफ़ान सा आया और फिर मुझे अंदर तक हिला कर चला गया। ख़ैर कुछ देर और मेरी भाभी से बातें हुईं उसके बाद वो चली गईं। उनके जाने के थोड़ी देर बाद मैं भी वापस बैठक में आ गया। वीरेंद्र सिंह खेतों की तरफ चला गया था इस लिए मैं चुपचाप पलंग पर लेट गया और फिर भाभी से बातों के बारे में सोचने लगा। भाभी से अपने दिल की बातें कह देने से और उनका जवाब सुन लेने से अब मैं बहुत हल्का महसूस कर रहा था।




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Bahot jabardast update tha bhai bahot maja aaya. Bhai ab bahot acha lag raha hai kyu ki pyaar bhara update chahiye bhai bahot dukh dekh liya bhai aur dukh bhara update parne ki takat nahi hain bhai. Bas pyaar bhara update dete rehna bhai. Please aur dukh nahi 🙏🙏🙏. Next update ka intajaar rahegaa bhai 👌👌👌👌👌👌👍👍👍👍👌👌👌
 
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Sunli

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अध्याय - 152
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अगली सुबह।
चाय नाश्ता कर के मैं हवेली से चंदनपुर जाने के लिए जीप से निकला। मां ने मुझे समझाया था कि मैं वहां किसी से भी बेवजह उलझने जैसा बर्ताव न करूं और ना ही अपनी भाभी से ऐसी कोई बात कहूं जिससे कि उन्हें कोई तकलीफ़ पहुंचे। हालाकि ऐसा मैं कर ही नहीं सकता था लेकिन मां तो मां ही थीं, शायद फिक्रमंदी के चलते उन्होंने मुझे ऐसी सलाह दी थी।

पूरे रास्ते मैं भाभी के बारे में ही जाने क्या क्या सोचता रहा। मन में तरह तरह की आशंकाएं उभर आतीं थी जिनके चलते मेरे अंदर एक घबराहट सी होने लगी थी। मैं अपने आपको इस बात के लिए तैयार करता जा रहा था कि जब भाभी से मेरा सामना होगा तब मैं उनके सामने बहुत ही सभ्य और शांत तरीके से अपने दिल की बातें रखूंगा। यूं तो मुझे पूरा भरोसा था कि भाभी मुझे समझेंगी लेकिन इसके बावजूद जाने क्यों मेरे मन में आशंकाएं उभर आतीं थी।

बहरहाल, दोपहर होने से पहले ही मैं चंदनपुर गांव यानि रागिनी भाभी के मायके पहुंच गया। अभी कुछ समय पहले ही मैं यहां आया था, इस लिए जैसे ही भैया के ससुराल वालों ने मुझे फिर से आया देखा तो सबके चेहरों पर हैरानी के भाव उभर आए। ये अलग बात है कि बाद में जल्दी ही उनके चेहरों पर खुशी के भाव भी उभर आए थे।

"अरे! क्या बात है।" भाभी का भाई वीरेंद्र सिंह लपक कर मेरे पास आते हुए बोला____"हमारे वैभव महाराज तो बड़ा जल्दी जल्दी हमें दर्शन दे रहे हैं।"

वीरेंद्र ने कहने के साथ ही झुक कर मेरे पैर छुए। उसकी बातों से जाने क्यों मैं थोड़ा असहज सा हो गया था। ये अलग बात है कि मैं जल्दी ही खुद को सामान्य रखने का प्रयास करते हुए हल्के से मुस्कुरा उठा था। ख़ैर वीरेंद्र मुझे ले कर अंदर बैठक में आया, जहां बाकी लोग पहले से ही मौजूद थे। सबने एक एक कर के मेरे पांव छुए। एक बार फिर से वही क्रिया दोहराई जाने लगी, यानि पीतल की थाल में मेरे पांव धोना वगैरह। थोड़ी देर औपचारिक तौर पर हाल चाल हुआ। इसी बीच अंदर से वीरेंद्र सिंह की पत्नी वंदना भाभी मेरे लिए जल पान के कर आ गईं।

घर में इस वक्त मर्दों के नाम पर सिर्फ वीरेंद्र सिंह ही था, बाकी मर्द खेत गए हुए थे। मेरे आने की ख़बर फ़ौरन ही भैया के चाचा ससुर के घर तक पहुंच गई थी इस लिए उनके घर की औरतें और बहू बेटियां भी आ गईं।

"और बताईए महाराज बड़ा जल्दी आपके दर्शन हो गए।" वीरेंद्र सिंह ने पूछा____"यहां किसी विशेष काम से आए हैं क्या?"

"हां कुछ ऐसा ही है।" मैंने थोड़ा झिझकते हुए कहा____"असल में उस समय जब मैं यहां आया था तो भाभी को लेने आया था। उस समय मुझे बाकी बातों का बिल्कुल भी पता नहीं था। उसके बाद जब यहां से गया तो मां से ऐसी बातें पता चलीं जिनके बारे में मैं कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था।"

"हां मैं समझ सकता हूं महाराज।" वीरेंद्र ने गहरी सांस लेते हुए थोड़ा गंभीर हो कर कहा____"और कृपया मुझे भी माफ़ करें मैंने भी इसके पहले इस बारे में आपको कुछ नहीं बताया। सच कहूं तो मुझे समझ ही नहीं आया था कि आपसे कैसे कहूं? दूसरी बात ये थी कि हम चाहते थे कि ये सब बातें आपको अपने ही माता पिता से पता चलें तो ज़्यादा उचित होगा।"

अभी मैं कुछ कहने ही वाला था कि तभी अंदर से भाभी की मां सुलोचना देवी आ गईं। उन्हें देख कर मैं फिर से थोड़ा असहज सा महसूस करने लगा।

"कोई ख़ास काम था क्या महाराज?" सुलोचना देवी ने आते ही थोड़ी फिक्रमंदी से पूछा____"जिसके लिए आपको फिर से यहां आना पड़ा है?"

"वैभव महाराज को रिश्ते के बारे में पता चल चुका है मां।" मेरे कुछ बोलने से पहले ही वीरेंद्र ने अपनी मां की तरफ देखते हुए कहा____"और ये शायद उसी सिलसिले में यहां आए हैं।"

"ओह! सब ठीक तो है ना महाराज?" सुलोचना देवी एकदम से चिंतित सी नज़र आईं।

"हां मां जी सब ठीक ही है।" मैंने खुद को सामान्य रखने का प्रयास करते हुए कहा____"मैं यहां बस भाभी से मिलने आया हूं। उनसे कुछ ऐसी बातें कहने आया हूं जिन्हें कहे बिना मुझे चैन नहीं मिल सकता। आप कृपया मेरी इस बात को अन्यथा मत लें और कृपा कर के मुझे भाभी से अकेले में बात करने का अवसर दें।"

मेरी बात सुन कर सुलोचना देवी और वीरेंद्र सिंह एक दूसरे की तरफ देखने लगे। चेहरों पर उलझन के भाव उभर आए थे। फिर सुलोचना देवी ने जैसे खुद को सम्हाला और होठों पर मुस्कान सजा कर कहा____"ठीक है, अगर आप ऐसा ही चाहते हैं तो मैं रागिनी से अकेले में आपकी मुलाक़ात करवा देती हूं। आप थोड़ी देर रुकिए, मैं अभी आती हूं।"

कहने के साथ ही सुलोचना देवी पलट कर अंदर की तरफ चली गईं। इधर वीरेंद्र सिंह जाने किस सोच में गुम हो गया था। मुझे भी समझ नहीं आ रहा था कि उससे क्या कहूं। बस ख़ामोशी से वक्त के गुज़रने का इंतज़ार करने लगा।

क़रीब पांच मिनट बाद सुलोचना देवी बाहर आईं। उन्होंने मुझे अपने साथ अंदर चलने को कहा तो मैं एक नज़र वीरेंद्र सिंह पर डालने के बाद पलंग से उठा और सुलोचना देवी के साथ अंदर की तरफ बढ़ चला। एकाएक ही मेरी धड़कनें तीव्र गति से चलने लगीं थी और साथ ही ये सोच कर घबराहट भी होने लगी थी कि भाभी के सामने कैसे खुद को सामान्य रख पाऊंगा मैं? कैसे उनसे नज़रें मिला कर अपने दिल की बातें कह पाऊंगा? क्या वो मुझे समझेंगी?

सुलोचना देवी मुझे ले कर घर के पिछले हिस्से में आ गईं। घर के पीछे खाली जगह थी जहां पर एक तरफ कुआं था और बाकी कुछ हिस्सों में कई सारे पेड़ पौधे लगे हुए थे।

"महाराज।" सुलोचना देवी ने पलट कर मुझसे कहा____"आप यहीं रुकें, मैं रागिनी को भेजती हूं।"

"जी ठीक है।" मैंने कहा और कुएं की तरफ यूं ही बढ़ चला।

उधर सुलोचना देवी वापस अंदर चली गईं। मैं कुएं के पास आ कर उसमें झांकने लगा। कुएं में क़रीब पांच फीट की दूरी पर पानी नज़र आया। मैं झांकते हुए कुएं के पानी को ज़रूर देखने लगा था लेकिन मेरा मन इसी सोच में डूबा हुआ था कि भाभी के आने पर क्या होगा? क्या मेरी तरह उनका भी यही हाल होगा? क्या मेरी तरह वो भी घबराई हुई होंगी?

अभी मैं ये सब सोच ही रहा था कि तभी मुझे किसी के आने का आभास हुआ। किसी के आने के एहसास से एकाएक मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे दिल ने एकदम से धड़कना ही बंद कर दिया हो। सब कुछ थम गया सा महसूस हुआ। मैंने बड़ी मुश्किल से ख़ुद को सम्हाला और फिर धीरे से पलटा।

मेरी नज़र रागिनी भाभी पर पड़ी। गुलाबी कुर्ते सलवार में वो मेरी तरफ पीठ किए अमरूद के पेड़ के पास ठहर ग‌ईं थी। उनके बालों की चोटी उनकी पीठ से होते हुए नीचे उनके नितम्बों को भी पार गई थी। सहसा वो थोड़ा सा घूमीं जिसके चलते मुझे उनके चेहरे की थोड़ी सी झलक मिली। दोनों हाथों में पकड़े अपने दुपट्टे के छोर को हौले हौले उमेठने में लगीं हुईं थी वो।

कुछ देर तक ख़ामोशी से उनकी तरफ देखते रहने के बाद मैं हिम्मत जुटा कर उनकी तरफ बढ़ा। मेरी धड़कनें जो इसके पहले थम सी गई थी वो चलने तो लगीं थी लेकिन हर गुज़रते पल के साथ वो धाड़ धाड़ की शक्ल में बजते हुए मेरी पसलियों पर चोट करने लगीं थी। आख़िर कुछ ही पलों में मैं उनके थोड़ा पास पहुंच गया। शायद उन्हें भी एहसास हो गया था कि मैं उनके पास आ गया हूं इस लिए दुपट्टे को उमेठने वाली उनकी क्रिया एकदम से रुक गई थी।

"भ...भाभी।" मैंने धाड़ धाड़ बजते अपने दिल के साथ बड़ी मुश्किल से उन्हें पुकारा।

एकाएक ही मेरे अंदर बड़ी तेज़ हलचल सी मच गई थी जिसे मैं काबू में करने का प्रयास करने लगा था। उधर मेरे पुकारने पर भाभी पर प्रतिक्रिया हुई। वो बहुत धीमें से मेरी तरफ को पलटीं। अगले ही पल उनका खूबसूरत चेहरा पूरी तरह से मुझे नज़र आया। वो पलट तो गईं थी लेकिन मेरी तरफ देख नहीं रहीं थी। पलकें झुका रखीं थी उन्होंने। सुंदर से चेहरे पर हल्की सी सुर्खी छाई नज़र आई।

"अ...आप ठीक तो हैं ना?" मैंने खुद को सम्हालते हुए बड़ी मुश्किल से पूछा।

"हम्म्म्म।" उन्होंने धीमें से सिर हिलाया।

मुझे समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर किस तरह से उनसे वो बातें कहूं जो मैं उनसे कहने आया था। मेरे दिलो दिमाग़ में हलचल सी मची हुई थी। हल्की ठंड में भी मेरे चहरे पर घबराहट के चलते पसीना उभर आया था।

"व..वो मुझे समझ नहीं आ रहा कि कैसे मैं आपको अपने दिल की बात कहूं?" फिर मैंने किसी तरह उनकी तरफ देखते हुए कहा।

उनकी पलकें अभी भी झुकी हुईं थी किन्तु मेरी बात सुनते ही उन्होंने धीरे से पलकें उठा कर मेरी तरफ देखा। अगले ही पल हमारी नज़रें आपस में टकरा गईं। मुझे अपने अंदर एकदम से झुरझरी सी महसूस हुई। वो सवालिया भाव से मेरी तरफ देखने लगीं थी।

"कृपया आप मुझे ग़लत मत समझिएगा।" मैंने झिझकते हुए कहा____"मैं यहां आपसे ये कहने आया हूं कि मेरे दिल में आपके लिए ना पहले कभी कोई ग़लत ख़याल था और ना ही आगे कभी हो सकता है। मैं पहले भी आपका दिल की गहराइयों से आदर और सम्मान करता था और आगे भी करता रहूंगा।"

मेरी ये बातें सुनते ही भाभी के चेहरे पर राहत और खुशी जैसे भाव उभरे। उनकी आंखें जो विरान सी नज़र आ रहीं थी उनमें एकाएक नमी सी नज़र आने लगी। कुछ कहने के लिए उनके होठ कांपे किंतु शायद उनसे कुछ बोला नहीं गया।

"उस दिन जब मैं यहां आपको लेने आया था तो मुझे कुछ भी पता नहीं था।" मैंने धड़कते दिल से कहा____"यहां कामिनी ने जब मुझसे आपके ब्याह होने की बात बताई तो मुझे सच में धक्का लगा था क्योंकि आपका फिर से ब्याह होने की मैंने कल्पना ही नहीं की थी। फिर जब उन्होंने मुझे आपके जीवन को संवारने और आपकी खुशियों की बातें की तो मुझे भी एहसास हुआ कि वास्तव में आपके लिए यही उचित है। उसके बाद जब आपसे बातें हुईं और आपने ब्याह करने से मना कर दिया तो मुझे अच्छा तो लगा लेकिन फिर ये सोचा कि अगर आपका फिर से ब्याह नहीं हुआ तो भला कैसे आपका जीवन संवर सकता है और कैसे आपको सच्ची खुशियां मिल सकती हैं? इसी लिए मैंने आपसे कहा था कि आप हमारे लिए अपना जीवन बर्बाद मत कीजिए। ख़ैर उसके बाद मैं वापस चला गया था। वापस जाते समय मैं रास्ते में यही सोच रहा था कि आपके बारे में इतना बड़ा फ़ैसला ले लिया गया और किसी ने मुझे बताया तक नहीं। इतना तो मैं समझ गया था कि आपके ब्याह होने की बात मां और पिता जी को भी पहले से ही पता थी लेकिन मैं ये सोच कर नाराज़ सा हो गया था कि ये बात मुझसे क्यों छुपाई गई? जब हवेली पहुंचा तो मैंने मां से नाराज़गी दिखाते हुए यही सब पूछा, तब उन्होंने बताया, लेकिन पूरा सच तब भी नहीं बताया। वो तो रूपचंद्र की बातों से मुझे आभास हुआ कि अभी भी मुझसे कुछ छुपाया गया है। हवेली में जब दुबारा मां से पूछा तो उन्होंने बताया कि वास्तव में सच क्या है।"

इतना सब बोल कर मैं एकाएक चुप हो गया और भाभी को ध्यान से देखने लगा। वो पहले की ही तरह चुपचाप अपनी जगह पर खड़ीं थी। चेहरे पर अजीब से भाव उभर आए थे उनके। नज़रें फिर से झुका लीं थी उन्होंने।

"मां ने जब बताया कि आपका ब्याह असल में मेरे साथ करने का फ़ैसला किया गया है तो मैं आश्चर्यचकित रह गया था।" मैंने फिर से कहना शुरू किया____"मैंने तो ऐसा होने की कल्पना भी नहीं की थी लेकिन मां के अनुसार सच यही था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मेरे और आपके माता पिता हम दोनों का आपस में ब्याह करने का कैसे सोच सकते हैं? जब मैंने मां से ये सवाल किया तो उन्होंने पता नहीं कैसी कैसी बातों के द्वारा मुझे समझाना शुरू कर दिया। ये भी कहा कि क्या मैं अपनी भाभी के जीवन को फिर से संवारने के लिए और उनको सच्ची खुशियां देने के लिए इस रिश्ते को स्वीकार नहीं कर सकता? मां के इस सवाल पर मैं अवाक सा रह गया था और फिर आख़िर में मुझे स्वीकार करना ही पड़ा। सब लोग यही चाहते थे, सबको लगता है कि यही उचित है और इसी से आपका भला हो सकता है तो मैं भला कैसे इंकार कर देता? मैं भला ये कैसे चाह सकता था भाभी कि मेरी वजह से आपका जीवन खुशियों से महरूम हो जाए? मैं तो पहले से ही सच्चे दिल से यही चाहता था कि आप हमेशा खुश रहें, आपके जीवन में एक पल के लिए कभी दुख का साया न आए।"

भाभी अब भी नज़रें झुकाए ख़ामोश खड़ीं थी। उन्हें यूं ख़ामोश खड़ा देख मुझे घबराहट भी होने लगी थी लेकिन मैंने सोच लिया था कि उनसे जो कुछ कहने आया था वो कह कर ही जाऊंगा।

"उस दिन से अब तक मैं इसी रिश्ते के बारे में सोचता रहा हूं भाभी।" मैंने गहरी सांस ले कर कहा____"आपकी खुशी के लिए मैं दुनिया का कोई भी काम कर सकता हूं। आपके होठों पर मुस्कान लाने के लिए मैं खुशी खुशी ख़ुद को भी मिटा सकता हूं। मेरे इस बदले हुए जीवन में आपका बहुत बड़ा हाथ रहा है। आज मैं जो बन गया हूं उसमें आपका ही सहयोग था और आपका ही मार्गदर्शन रहा है। मुझे खुशी है कि मैं अपनी भाभी की बदौलत आज एक अच्छा इंसान बनने लगा हूं। मैं आपसे यही कहना चाहता हूं कि आप ये कभी मत समझना कि इस रिश्ते के चलते आपके प्रति मेरी भावनाओं में कोई बदलाव आ जाएगा। आप ये कभी मत सोचना कि मेरे दिल से आपके प्रति आदर और सम्मान मिट जाएगा। मेरे दिल में हमेशा आपके लिए मान सम्मान और श्रद्धा की भावना रहेगी।"

"तु...तुम्हें ये सब कहने की ज़रूरत नहीं है।" भाभी ने नज़रें उठा कर अधीरता से कहा____"मैं जानती हूं और समझती हूं कि तुम मेरी कितनी इज्ज़त करते हो।"

"आपको पता है।" मैंने सहसा अधीर हो कर कहा____"कुछ दिनों से मैं अपने आपको अपराधी सा महसूस करने लगा हूं।"

"ऐसा क्यों?" भाभी के चेहरे पर चौंकने वाले भाव उभरे और साथ ही फिक्रमंदी के भी।

"मेरे मन में बार बार यही ख़याल उभरता रहता है कि इस रिश्ते के चलते आप मेरे बारे में जाने क्या क्या सोचने लगी होंगी।" मैंने कहा____"इतना तो सबको पता रहा है कि मेरा चरित्र कैसा था। अब जब आपका ब्याह मुझसे करने का फ़ैसला किया गया तो मेरे मन में यही ख़याल उभरा कि आप भी अब मेरे चरित्र के आधार पर यही सोच रही होंगी कि मैं आपके बारे में पहले से ही ग़लत सोच रखता रहा होऊंगा, इसी लिए रिश्ते को झट से मंजूरी दे दी।"

"न...नहीं नहीं।" भाभी ने झट से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"ऐसा नहीं है। मैं तुम्हारे बारे में ऐसा सपने में भी नहीं सोच सकती। तुम ऐसा क्यों सोचते हो?"

"क्या करूं भाभी?" मेरी आंखें भर आईं____"मेरा चरित्र ही ऐसा रहा है कि अब अपने उस चरित्र से मुझे ख़ुद ही बहुत घृणा होती है। बार बार यही एहसास होता है कि इस रिश्ते का ज़िक्र होने के बाद अब हर कोई मेरे बारे में ग़लत ही सोच रहा होगा। मेरा यकीन कीजिए भाभी, भले ही मेरा चरित्र निम्न दर्ज़े का रहा है लेकिन मैंने कभी भी आपके बारे में ग़लत नहीं सोचा है। मैं इतना भी गिरा हुआ नहीं था कि अपने ही घर की औरतों और बहू बेटी पर नीयत ख़राब कर लेता। काश! हनुमान जी की तरह मुझमें भी शक्ति होती तो इस वक्त मैं अपना सीना चीर कर आपको दिखा देता। मैं दिखा देता और फिर कहता कि देख लीजिए....मेरे सीने में आपके लिए सिर्फ और सिर्फ आदर सम्मान और श्रद्धा की ही भावना मौजूद है।"

"ब..बस करो।" रागिनी भाभी की आंखें छलक पड़ीं, रुंधे हुए गले से बोलीं____"मैंने कहा ना कि तुम्हें ऐसा कुछ भी सोचने की ज़रूरत नहीं है और ना ही कुछ कहने की। मैं अच्छी तरह जानती हूं और हमेशा महसूस भी किया है कि तुमने कभी मेरे बारे में ग़लत नहीं सोचा है। सच कहती हूं, मुझे हमेशा से ही तुम्हारे जैसा देवर मिलने का गर्व रहा है।"

"आप सच कह रही हैं ना भाभी?" मैं अधीरता से बोल पड़ा____"क्या सचमुच आपको मुझ पर भरोसा है।"

"हां, ख़ुद से भी ज़्यादा।" भाभी ने लरजते स्वर में कहा____"वैसे सच कहूं तो मेरी भी दशा तुम्हारे जैसी ही है। इतने दिनों से मैं भी यही सोचते हुए ख़ुद को दुखी किए हूं कि इस रिश्ते के चलते तुम मेरे बारे में पता नहीं क्या सोचने लगे होगे। अपनी मां और भाभी से यही कहती थी कि अगर तुमने इस रिश्ते के चलते एक पल के लिए भी मेरे बारे में ग़लत सोच लिया तो मेरे लिए वो बहुत ही शर्म की बात हो जाएगी। उस सूरत में मुझे ऐसा लगने लगेगा कि ये धरती फटे और मैं उसमें समा जाऊं।"

"नहीं भाभी नहीं।" मैं तड़प कर बोल पड़ा____"मैं आपके बारे में कभी ग़लत नहीं सोच सकता। आप तो देवी हैं मेरे लिए जिनके प्रति हमेशा सिर्फ श्रद्धा ही रहेगी। दुनिया इधर से उधर हो जाए लेकिन मैं कभी आपके प्रति कुछ भी उल्टा सीधा नहीं सोच सकता। आप इस बात से बिलकुल निश्चिंत रहें भाभी। मैं नहीं जानता कि ऊपर बैठा विधाता मुझसे या आपसे क्या चाहता है लेकिन इतना यकीन कीजिए कि ये संबंध मेरे और आपके बीच मौजूद सच्ची भावनाओं को कभी मैला नहीं कर सकता।"

"तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद वैभव।" भाभी की आंखों से फिर से आंसू का एक कतरा छलक गया____"तुमने ये कह कर मेरे मन को बहुत बड़ी राहत दी है। तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं है कि इतने दिनों से मैं ये सब सोच सोच कर कितना व्यथित थी।"

"आप खुद को दुखी मत रखिए भाभी।" मैंने कहा____"आप अच्छी तरह जानती हैं कि मैं आपको दुखी होते नहीं देख सकता। इसके पहले आपको खुश रखने के लिए मेरे बस में जो था वो कर रहा था लेकिन इस रिश्ते के बाद मेरी हमेशा यही कोशिश रहेगी कि मैं आपको कभी एक पल के लिए भी दुख में न रहने दूं।"

मेरी बात सुन कर रागिनी भाभी बड़े गौर से मेरी तरफ देखने लगीं थी। उनके चेहरे पर खुशी के भाव तो थे ही किंतु एकाएक लाज की सुर्खी भी उभर आई थी। उनकी आंखों में समंदर से भी ज़्यादा गहरा प्यार और स्नेह झलकता नज़र आया मुझे।

"क्या रूपा को पता है इस बारे में?" फिर उन्होंने खुद को सम्हालते हुए पूछा____"उस बेचारी के साथ फिर से एक ऐसी स्थिति आ गई है जहां पर उसे समझौता करना पड़ेगा। उसके बारे में जब भी सोचती हूं तो पता नहीं क्यों बहुत बुरा लगता है। तुम्हारे जीवन में सिर्फ उसी का हक़ है।"

"उसे मैंने ही इस बारे में बताया है।" मैंने उनकी तरफ देखते हुए कहा____"पहले तो उसे यकीन ही नहीं हुआ लेकिन जब मैंने सारी बातें बताई तो वो भी यही कहने लगी कि आपके लिए यही उचित है।"

"क्या उसे इस बारे में जान कर तकलीफ़ नहीं हुई?" भाभी ने हैरानी ज़ाहिर करते हुए पूछा।

"उसने क्या कहा जब आप ये सुनेंगी तो आपको बड़ा आश्चर्य होगा।" मैंने हौले से मुस्कुरा कर कहा।

"अच्छा, क्या कहा उसने?" भाभी ने उत्सुकता से पूछा।

मैंने संक्षेप में उन्हें रूपा से हुई अपनी बातें बता दी। सुन कर सचमुच भाभी के चेहरे पर आश्चर्य के भाव उभर आए। कुछ देर जाने क्या सोचती रहीं फिर एक गहरी सांस लीं।

"सचमुच बहुत अद्भुत लड़की है वो।" भाभी ने चकित भाव से कहा____"आज के युग में ऐसी लड़कियां विरले ही कहीं देखने को मिलती हैं। तुम बहुत किस्मत वाले हो जो ऐसी लड़की तुमसे इतना प्रेम करती है और तुम्हारी जीवन संगिनी बनने वाली है। मेरा तुमसे यही कहना है कि तुम कभी भी उसके प्रेम का निरादर मत करना और ना ही कभी उसको कोई दुख तकलीफ़ देना।"

"कभी नहीं दूंगा भाभी।" मैंने अधीरता से कहा____"उसे दुख तकलीफ़ देने का मतलब है हद दर्ज़े का गुनाह करना। कभी कभी सोचा करता हूं कि मैंने तो अपने अब तक के जीवन में हमेशा बुरे कर्म ही किए थे इसके बावजूद ऊपर वाले ने मेरी किस्मत में मुझे इतना प्रेम करने वाली लड़कियां कैसे लिखी थीं?"

"शायद इस लिए क्योंकि ऐसी अद्भुत लड़कियों के द्वारा वो तुम्हें मुकम्मल रूप से बदल देना चाहता था।" भाभी ने कहा____"काश! ईश्वर ने अनुराधा के साथ ऐसा न किया होता। उस मासूम का जब भी ख़याल आता है तो मन बहुत ज़्यादा व्यथित हो उठता है।"

अनुराधा का ज़िक्र होते ही मेरे दिलो दिमाग़ में बड़ी तेज़ी से एक तूफ़ान सा आया और फिर मुझे अंदर तक हिला कर चला गया। ख़ैर कुछ देर और मेरी भाभी से बातें हुईं उसके बाद वो चली गईं। उनके जाने के थोड़ी देर बाद मैं भी वापस बैठक में आ गया। वीरेंद्र सिंह खेतों की तरफ चला गया था इस लिए मैं चुपचाप पलंग पर लेट गया और फिर भाभी से बातों के बारे में सोचने लगा। भाभी से अपने दिल की बातें कह देने से और उनका जवाब सुन लेने से अब मैं बहुत हल्का महसूस कर रहा था।




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Bahut hi sandar apdet Bhai
 
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avsji

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अध्याय - 152
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अगली सुबह।
चाय नाश्ता कर के मैं हवेली से चंदनपुर जाने के लिए जीप से निकला। मां ने मुझे समझाया था कि मैं वहां किसी से भी बेवजह उलझने जैसा बर्ताव न करूं और ना ही अपनी भाभी से ऐसी कोई बात कहूं जिससे कि उन्हें कोई तकलीफ़ पहुंचे। हालाकि ऐसा मैं कर ही नहीं सकता था लेकिन मां तो मां ही थीं, शायद फिक्रमंदी के चलते उन्होंने मुझे ऐसी सलाह दी थी।

पूरे रास्ते मैं भाभी के बारे में ही जाने क्या क्या सोचता रहा। मन में तरह तरह की आशंकाएं उभर आतीं थी जिनके चलते मेरे अंदर एक घबराहट सी होने लगी थी। मैं अपने आपको इस बात के लिए तैयार करता जा रहा था कि जब भाभी से मेरा सामना होगा तब मैं उनके सामने बहुत ही सभ्य और शांत तरीके से अपने दिल की बातें रखूंगा। यूं तो मुझे पूरा भरोसा था कि भाभी मुझे समझेंगी लेकिन इसके बावजूद जाने क्यों मेरे मन में आशंकाएं उभर आतीं थी।

बहरहाल, दोपहर होने से पहले ही मैं चंदनपुर गांव यानि रागिनी भाभी के मायके पहुंच गया। अभी कुछ समय पहले ही मैं यहां आया था, इस लिए जैसे ही भैया के ससुराल वालों ने मुझे फिर से आया देखा तो सबके चेहरों पर हैरानी के भाव उभर आए। ये अलग बात है कि बाद में जल्दी ही उनके चेहरों पर खुशी के भाव भी उभर आए थे।

"अरे! क्या बात है।" भाभी का भाई वीरेंद्र सिंह लपक कर मेरे पास आते हुए बोला____"हमारे वैभव महाराज तो बड़ा जल्दी जल्दी हमें दर्शन दे रहे हैं।"

वीरेंद्र ने कहने के साथ ही झुक कर मेरे पैर छुए। उसकी बातों से जाने क्यों मैं थोड़ा असहज सा हो गया था। ये अलग बात है कि मैं जल्दी ही खुद को सामान्य रखने का प्रयास करते हुए हल्के से मुस्कुरा उठा था। ख़ैर वीरेंद्र मुझे ले कर अंदर बैठक में आया, जहां बाकी लोग पहले से ही मौजूद थे। सबने एक एक कर के मेरे पांव छुए। एक बार फिर से वही क्रिया दोहराई जाने लगी, यानि पीतल की थाल में मेरे पांव धोना वगैरह। थोड़ी देर औपचारिक तौर पर हाल चाल हुआ। इसी बीच अंदर से वीरेंद्र सिंह की पत्नी वंदना भाभी मेरे लिए जल पान के कर आ गईं।

घर में इस वक्त मर्दों के नाम पर सिर्फ वीरेंद्र सिंह ही था, बाकी मर्द खेत गए हुए थे। मेरे आने की ख़बर फ़ौरन ही भैया के चाचा ससुर के घर तक पहुंच गई थी इस लिए उनके घर की औरतें और बहू बेटियां भी आ गईं।

"और बताईए महाराज बड़ा जल्दी आपके दर्शन हो गए।" वीरेंद्र सिंह ने पूछा____"यहां किसी विशेष काम से आए हैं क्या?"

"हां कुछ ऐसा ही है।" मैंने थोड़ा झिझकते हुए कहा____"असल में उस समय जब मैं यहां आया था तो भाभी को लेने आया था। उस समय मुझे बाकी बातों का बिल्कुल भी पता नहीं था। उसके बाद जब यहां से गया तो मां से ऐसी बातें पता चलीं जिनके बारे में मैं कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था।"

"हां मैं समझ सकता हूं महाराज।" वीरेंद्र ने गहरी सांस लेते हुए थोड़ा गंभीर हो कर कहा____"और कृपया मुझे भी माफ़ करें मैंने भी इसके पहले इस बारे में आपको कुछ नहीं बताया। सच कहूं तो मुझे समझ ही नहीं आया था कि आपसे कैसे कहूं? दूसरी बात ये थी कि हम चाहते थे कि ये सब बातें आपको अपने ही माता पिता से पता चलें तो ज़्यादा उचित होगा।"

अभी मैं कुछ कहने ही वाला था कि तभी अंदर से भाभी की मां सुलोचना देवी आ गईं। उन्हें देख कर मैं फिर से थोड़ा असहज सा महसूस करने लगा।

"कोई ख़ास काम था क्या महाराज?" सुलोचना देवी ने आते ही थोड़ी फिक्रमंदी से पूछा____"जिसके लिए आपको फिर से यहां आना पड़ा है?"

"वैभव महाराज को रिश्ते के बारे में पता चल चुका है मां।" मेरे कुछ बोलने से पहले ही वीरेंद्र ने अपनी मां की तरफ देखते हुए कहा____"और ये शायद उसी सिलसिले में यहां आए हैं।"

"ओह! सब ठीक तो है ना महाराज?" सुलोचना देवी एकदम से चिंतित सी नज़र आईं।

"हां मां जी सब ठीक ही है।" मैंने खुद को सामान्य रखने का प्रयास करते हुए कहा____"मैं यहां बस भाभी से मिलने आया हूं। उनसे कुछ ऐसी बातें कहने आया हूं जिन्हें कहे बिना मुझे चैन नहीं मिल सकता। आप कृपया मेरी इस बात को अन्यथा मत लें और कृपा कर के मुझे भाभी से अकेले में बात करने का अवसर दें।"

मेरी बात सुन कर सुलोचना देवी और वीरेंद्र सिंह एक दूसरे की तरफ देखने लगे। चेहरों पर उलझन के भाव उभर आए थे। फिर सुलोचना देवी ने जैसे खुद को सम्हाला और होठों पर मुस्कान सजा कर कहा____"ठीक है, अगर आप ऐसा ही चाहते हैं तो मैं रागिनी से अकेले में आपकी मुलाक़ात करवा देती हूं। आप थोड़ी देर रुकिए, मैं अभी आती हूं।"

कहने के साथ ही सुलोचना देवी पलट कर अंदर की तरफ चली गईं। इधर वीरेंद्र सिंह जाने किस सोच में गुम हो गया था। मुझे भी समझ नहीं आ रहा था कि उससे क्या कहूं। बस ख़ामोशी से वक्त के गुज़रने का इंतज़ार करने लगा।

क़रीब पांच मिनट बाद सुलोचना देवी बाहर आईं। उन्होंने मुझे अपने साथ अंदर चलने को कहा तो मैं एक नज़र वीरेंद्र सिंह पर डालने के बाद पलंग से उठा और सुलोचना देवी के साथ अंदर की तरफ बढ़ चला। एकाएक ही मेरी धड़कनें तीव्र गति से चलने लगीं थी और साथ ही ये सोच कर घबराहट भी होने लगी थी कि भाभी के सामने कैसे खुद को सामान्य रख पाऊंगा मैं? कैसे उनसे नज़रें मिला कर अपने दिल की बातें कह पाऊंगा? क्या वो मुझे समझेंगी?

सुलोचना देवी मुझे ले कर घर के पिछले हिस्से में आ गईं। घर के पीछे खाली जगह थी जहां पर एक तरफ कुआं था और बाकी कुछ हिस्सों में कई सारे पेड़ पौधे लगे हुए थे।

"महाराज।" सुलोचना देवी ने पलट कर मुझसे कहा____"आप यहीं रुकें, मैं रागिनी को भेजती हूं।"

"जी ठीक है।" मैंने कहा और कुएं की तरफ यूं ही बढ़ चला।

उधर सुलोचना देवी वापस अंदर चली गईं। मैं कुएं के पास आ कर उसमें झांकने लगा। कुएं में क़रीब पांच फीट की दूरी पर पानी नज़र आया। मैं झांकते हुए कुएं के पानी को ज़रूर देखने लगा था लेकिन मेरा मन इसी सोच में डूबा हुआ था कि भाभी के आने पर क्या होगा? क्या मेरी तरह उनका भी यही हाल होगा? क्या मेरी तरह वो भी घबराई हुई होंगी?

अभी मैं ये सब सोच ही रहा था कि तभी मुझे किसी के आने का आभास हुआ। किसी के आने के एहसास से एकाएक मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे दिल ने एकदम से धड़कना ही बंद कर दिया हो। सब कुछ थम गया सा महसूस हुआ। मैंने बड़ी मुश्किल से ख़ुद को सम्हाला और फिर धीरे से पलटा।

मेरी नज़र रागिनी भाभी पर पड़ी। गुलाबी कुर्ते सलवार में वो मेरी तरफ पीठ किए अमरूद के पेड़ के पास ठहर ग‌ईं थी। उनके बालों की चोटी उनकी पीठ से होते हुए नीचे उनके नितम्बों को भी पार गई थी। सहसा वो थोड़ा सा घूमीं जिसके चलते मुझे उनके चेहरे की थोड़ी सी झलक मिली। दोनों हाथों में पकड़े अपने दुपट्टे के छोर को हौले हौले उमेठने में लगीं हुईं थी वो।

कुछ देर तक ख़ामोशी से उनकी तरफ देखते रहने के बाद मैं हिम्मत जुटा कर उनकी तरफ बढ़ा। मेरी धड़कनें जो इसके पहले थम सी गई थी वो चलने तो लगीं थी लेकिन हर गुज़रते पल के साथ वो धाड़ धाड़ की शक्ल में बजते हुए मेरी पसलियों पर चोट करने लगीं थी। आख़िर कुछ ही पलों में मैं उनके थोड़ा पास पहुंच गया। शायद उन्हें भी एहसास हो गया था कि मैं उनके पास आ गया हूं इस लिए दुपट्टे को उमेठने वाली उनकी क्रिया एकदम से रुक गई थी।

"भ...भाभी।" मैंने धाड़ धाड़ बजते अपने दिल के साथ बड़ी मुश्किल से उन्हें पुकारा।

एकाएक ही मेरे अंदर बड़ी तेज़ हलचल सी मच गई थी जिसे मैं काबू में करने का प्रयास करने लगा था। उधर मेरे पुकारने पर भाभी पर प्रतिक्रिया हुई। वो बहुत धीमें से मेरी तरफ को पलटीं। अगले ही पल उनका खूबसूरत चेहरा पूरी तरह से मुझे नज़र आया। वो पलट तो गईं थी लेकिन मेरी तरफ देख नहीं रहीं थी। पलकें झुका रखीं थी उन्होंने। सुंदर से चेहरे पर हल्की सी सुर्खी छाई नज़र आई।

"अ...आप ठीक तो हैं ना?" मैंने खुद को सम्हालते हुए बड़ी मुश्किल से पूछा।

"हम्म्म्म।" उन्होंने धीमें से सिर हिलाया।

मुझे समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर किस तरह से उनसे वो बातें कहूं जो मैं उनसे कहने आया था। मेरे दिलो दिमाग़ में हलचल सी मची हुई थी। हल्की ठंड में भी मेरे चहरे पर घबराहट के चलते पसीना उभर आया था।

"व..वो मुझे समझ नहीं आ रहा कि कैसे मैं आपको अपने दिल की बात कहूं?" फिर मैंने किसी तरह उनकी तरफ देखते हुए कहा।

उनकी पलकें अभी भी झुकी हुईं थी किन्तु मेरी बात सुनते ही उन्होंने धीरे से पलकें उठा कर मेरी तरफ देखा। अगले ही पल हमारी नज़रें आपस में टकरा गईं। मुझे अपने अंदर एकदम से झुरझरी सी महसूस हुई। वो सवालिया भाव से मेरी तरफ देखने लगीं थी।

"कृपया आप मुझे ग़लत मत समझिएगा।" मैंने झिझकते हुए कहा____"मैं यहां आपसे ये कहने आया हूं कि मेरे दिल में आपके लिए ना पहले कभी कोई ग़लत ख़याल था और ना ही आगे कभी हो सकता है। मैं पहले भी आपका दिल की गहराइयों से आदर और सम्मान करता था और आगे भी करता रहूंगा।"

मेरी ये बातें सुनते ही भाभी के चेहरे पर राहत और खुशी जैसे भाव उभरे। उनकी आंखें जो विरान सी नज़र आ रहीं थी उनमें एकाएक नमी सी नज़र आने लगी। कुछ कहने के लिए उनके होठ कांपे किंतु शायद उनसे कुछ बोला नहीं गया।

"उस दिन जब मैं यहां आपको लेने आया था तो मुझे कुछ भी पता नहीं था।" मैंने धड़कते दिल से कहा____"यहां कामिनी ने जब मुझसे आपके ब्याह होने की बात बताई तो मुझे सच में धक्का लगा था क्योंकि आपका फिर से ब्याह होने की मैंने कल्पना ही नहीं की थी। फिर जब उन्होंने मुझे आपके जीवन को संवारने और आपकी खुशियों की बातें की तो मुझे भी एहसास हुआ कि वास्तव में आपके लिए यही उचित है। उसके बाद जब आपसे बातें हुईं और आपने ब्याह करने से मना कर दिया तो मुझे अच्छा तो लगा लेकिन फिर ये सोचा कि अगर आपका फिर से ब्याह नहीं हुआ तो भला कैसे आपका जीवन संवर सकता है और कैसे आपको सच्ची खुशियां मिल सकती हैं? इसी लिए मैंने आपसे कहा था कि आप हमारे लिए अपना जीवन बर्बाद मत कीजिए। ख़ैर उसके बाद मैं वापस चला गया था। वापस जाते समय मैं रास्ते में यही सोच रहा था कि आपके बारे में इतना बड़ा फ़ैसला ले लिया गया और किसी ने मुझे बताया तक नहीं। इतना तो मैं समझ गया था कि आपके ब्याह होने की बात मां और पिता जी को भी पहले से ही पता थी लेकिन मैं ये सोच कर नाराज़ सा हो गया था कि ये बात मुझसे क्यों छुपाई गई? जब हवेली पहुंचा तो मैंने मां से नाराज़गी दिखाते हुए यही सब पूछा, तब उन्होंने बताया, लेकिन पूरा सच तब भी नहीं बताया। वो तो रूपचंद्र की बातों से मुझे आभास हुआ कि अभी भी मुझसे कुछ छुपाया गया है। हवेली में जब दुबारा मां से पूछा तो उन्होंने बताया कि वास्तव में सच क्या है।"

इतना सब बोल कर मैं एकाएक चुप हो गया और भाभी को ध्यान से देखने लगा। वो पहले की ही तरह चुपचाप अपनी जगह पर खड़ीं थी। चेहरे पर अजीब से भाव उभर आए थे उनके। नज़रें फिर से झुका लीं थी उन्होंने।

"मां ने जब बताया कि आपका ब्याह असल में मेरे साथ करने का फ़ैसला किया गया है तो मैं आश्चर्यचकित रह गया था।" मैंने फिर से कहना शुरू किया____"मैंने तो ऐसा होने की कल्पना भी नहीं की थी लेकिन मां के अनुसार सच यही था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मेरे और आपके माता पिता हम दोनों का आपस में ब्याह करने का कैसे सोच सकते हैं? जब मैंने मां से ये सवाल किया तो उन्होंने पता नहीं कैसी कैसी बातों के द्वारा मुझे समझाना शुरू कर दिया। ये भी कहा कि क्या मैं अपनी भाभी के जीवन को फिर से संवारने के लिए और उनको सच्ची खुशियां देने के लिए इस रिश्ते को स्वीकार नहीं कर सकता? मां के इस सवाल पर मैं अवाक सा रह गया था और फिर आख़िर में मुझे स्वीकार करना ही पड़ा। सब लोग यही चाहते थे, सबको लगता है कि यही उचित है और इसी से आपका भला हो सकता है तो मैं भला कैसे इंकार कर देता? मैं भला ये कैसे चाह सकता था भाभी कि मेरी वजह से आपका जीवन खुशियों से महरूम हो जाए? मैं तो पहले से ही सच्चे दिल से यही चाहता था कि आप हमेशा खुश रहें, आपके जीवन में एक पल के लिए कभी दुख का साया न आए।"

भाभी अब भी नज़रें झुकाए ख़ामोश खड़ीं थी। उन्हें यूं ख़ामोश खड़ा देख मुझे घबराहट भी होने लगी थी लेकिन मैंने सोच लिया था कि उनसे जो कुछ कहने आया था वो कह कर ही जाऊंगा।

"उस दिन से अब तक मैं इसी रिश्ते के बारे में सोचता रहा हूं भाभी।" मैंने गहरी सांस ले कर कहा____"आपकी खुशी के लिए मैं दुनिया का कोई भी काम कर सकता हूं। आपके होठों पर मुस्कान लाने के लिए मैं खुशी खुशी ख़ुद को भी मिटा सकता हूं। मेरे इस बदले हुए जीवन में आपका बहुत बड़ा हाथ रहा है। आज मैं जो बन गया हूं उसमें आपका ही सहयोग था और आपका ही मार्गदर्शन रहा है। मुझे खुशी है कि मैं अपनी भाभी की बदौलत आज एक अच्छा इंसान बनने लगा हूं। मैं आपसे यही कहना चाहता हूं कि आप ये कभी मत समझना कि इस रिश्ते के चलते आपके प्रति मेरी भावनाओं में कोई बदलाव आ जाएगा। आप ये कभी मत सोचना कि मेरे दिल से आपके प्रति आदर और सम्मान मिट जाएगा। मेरे दिल में हमेशा आपके लिए मान सम्मान और श्रद्धा की भावना रहेगी।"

"तु...तुम्हें ये सब कहने की ज़रूरत नहीं है।" भाभी ने नज़रें उठा कर अधीरता से कहा____"मैं जानती हूं और समझती हूं कि तुम मेरी कितनी इज्ज़त करते हो।"

"आपको पता है।" मैंने सहसा अधीर हो कर कहा____"कुछ दिनों से मैं अपने आपको अपराधी सा महसूस करने लगा हूं।"

"ऐसा क्यों?" भाभी के चेहरे पर चौंकने वाले भाव उभरे और साथ ही फिक्रमंदी के भी।

"मेरे मन में बार बार यही ख़याल उभरता रहता है कि इस रिश्ते के चलते आप मेरे बारे में जाने क्या क्या सोचने लगी होंगी।" मैंने कहा____"इतना तो सबको पता रहा है कि मेरा चरित्र कैसा था। अब जब आपका ब्याह मुझसे करने का फ़ैसला किया गया तो मेरे मन में यही ख़याल उभरा कि आप भी अब मेरे चरित्र के आधार पर यही सोच रही होंगी कि मैं आपके बारे में पहले से ही ग़लत सोच रखता रहा होऊंगा, इसी लिए रिश्ते को झट से मंजूरी दे दी।"

"न...नहीं नहीं।" भाभी ने झट से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"ऐसा नहीं है। मैं तुम्हारे बारे में ऐसा सपने में भी नहीं सोच सकती। तुम ऐसा क्यों सोचते हो?"

"क्या करूं भाभी?" मेरी आंखें भर आईं____"मेरा चरित्र ही ऐसा रहा है कि अब अपने उस चरित्र से मुझे ख़ुद ही बहुत घृणा होती है। बार बार यही एहसास होता है कि इस रिश्ते का ज़िक्र होने के बाद अब हर कोई मेरे बारे में ग़लत ही सोच रहा होगा। मेरा यकीन कीजिए भाभी, भले ही मेरा चरित्र निम्न दर्ज़े का रहा है लेकिन मैंने कभी भी आपके बारे में ग़लत नहीं सोचा है। मैं इतना भी गिरा हुआ नहीं था कि अपने ही घर की औरतों और बहू बेटी पर नीयत ख़राब कर लेता। काश! हनुमान जी की तरह मुझमें भी शक्ति होती तो इस वक्त मैं अपना सीना चीर कर आपको दिखा देता। मैं दिखा देता और फिर कहता कि देख लीजिए....मेरे सीने में आपके लिए सिर्फ और सिर्फ आदर सम्मान और श्रद्धा की ही भावना मौजूद है।"

"ब..बस करो।" रागिनी भाभी की आंखें छलक पड़ीं, रुंधे हुए गले से बोलीं____"मैंने कहा ना कि तुम्हें ऐसा कुछ भी सोचने की ज़रूरत नहीं है और ना ही कुछ कहने की। मैं अच्छी तरह जानती हूं और हमेशा महसूस भी किया है कि तुमने कभी मेरे बारे में ग़लत नहीं सोचा है। सच कहती हूं, मुझे हमेशा से ही तुम्हारे जैसा देवर मिलने का गर्व रहा है।"

"आप सच कह रही हैं ना भाभी?" मैं अधीरता से बोल पड़ा____"क्या सचमुच आपको मुझ पर भरोसा है।"

"हां, ख़ुद से भी ज़्यादा।" भाभी ने लरजते स्वर में कहा____"वैसे सच कहूं तो मेरी भी दशा तुम्हारे जैसी ही है। इतने दिनों से मैं भी यही सोचते हुए ख़ुद को दुखी किए हूं कि इस रिश्ते के चलते तुम मेरे बारे में पता नहीं क्या सोचने लगे होगे। अपनी मां और भाभी से यही कहती थी कि अगर तुमने इस रिश्ते के चलते एक पल के लिए भी मेरे बारे में ग़लत सोच लिया तो मेरे लिए वो बहुत ही शर्म की बात हो जाएगी। उस सूरत में मुझे ऐसा लगने लगेगा कि ये धरती फटे और मैं उसमें समा जाऊं।"

"नहीं भाभी नहीं।" मैं तड़प कर बोल पड़ा____"मैं आपके बारे में कभी ग़लत नहीं सोच सकता। आप तो देवी हैं मेरे लिए जिनके प्रति हमेशा सिर्फ श्रद्धा ही रहेगी। दुनिया इधर से उधर हो जाए लेकिन मैं कभी आपके प्रति कुछ भी उल्टा सीधा नहीं सोच सकता। आप इस बात से बिलकुल निश्चिंत रहें भाभी। मैं नहीं जानता कि ऊपर बैठा विधाता मुझसे या आपसे क्या चाहता है लेकिन इतना यकीन कीजिए कि ये संबंध मेरे और आपके बीच मौजूद सच्ची भावनाओं को कभी मैला नहीं कर सकता।"

"तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद वैभव।" भाभी की आंखों से फिर से आंसू का एक कतरा छलक गया____"तुमने ये कह कर मेरे मन को बहुत बड़ी राहत दी है। तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं है कि इतने दिनों से मैं ये सब सोच सोच कर कितना व्यथित थी।"

"आप खुद को दुखी मत रखिए भाभी।" मैंने कहा____"आप अच्छी तरह जानती हैं कि मैं आपको दुखी होते नहीं देख सकता। इसके पहले आपको खुश रखने के लिए मेरे बस में जो था वो कर रहा था लेकिन इस रिश्ते के बाद मेरी हमेशा यही कोशिश रहेगी कि मैं आपको कभी एक पल के लिए भी दुख में न रहने दूं।"

मेरी बात सुन कर रागिनी भाभी बड़े गौर से मेरी तरफ देखने लगीं थी। उनके चेहरे पर खुशी के भाव तो थे ही किंतु एकाएक लाज की सुर्खी भी उभर आई थी। उनकी आंखों में समंदर से भी ज़्यादा गहरा प्यार और स्नेह झलकता नज़र आया मुझे।

"क्या रूपा को पता है इस बारे में?" फिर उन्होंने खुद को सम्हालते हुए पूछा____"उस बेचारी के साथ फिर से एक ऐसी स्थिति आ गई है जहां पर उसे समझौता करना पड़ेगा। उसके बारे में जब भी सोचती हूं तो पता नहीं क्यों बहुत बुरा लगता है। तुम्हारे जीवन में सिर्फ उसी का हक़ है।"

"उसे मैंने ही इस बारे में बताया है।" मैंने उनकी तरफ देखते हुए कहा____"पहले तो उसे यकीन ही नहीं हुआ लेकिन जब मैंने सारी बातें बताई तो वो भी यही कहने लगी कि आपके लिए यही उचित है।"

"क्या उसे इस बारे में जान कर तकलीफ़ नहीं हुई?" भाभी ने हैरानी ज़ाहिर करते हुए पूछा।

"उसने क्या कहा जब आप ये सुनेंगी तो आपको बड़ा आश्चर्य होगा।" मैंने हौले से मुस्कुरा कर कहा।

"अच्छा, क्या कहा उसने?" भाभी ने उत्सुकता से पूछा।

मैंने संक्षेप में उन्हें रूपा से हुई अपनी बातें बता दी। सुन कर सचमुच भाभी के चेहरे पर आश्चर्य के भाव उभर आए। कुछ देर जाने क्या सोचती रहीं फिर एक गहरी सांस लीं।

"सचमुच बहुत अद्भुत लड़की है वो।" भाभी ने चकित भाव से कहा____"आज के युग में ऐसी लड़कियां विरले ही कहीं देखने को मिलती हैं। तुम बहुत किस्मत वाले हो जो ऐसी लड़की तुमसे इतना प्रेम करती है और तुम्हारी जीवन संगिनी बनने वाली है। मेरा तुमसे यही कहना है कि तुम कभी भी उसके प्रेम का निरादर मत करना और ना ही कभी उसको कोई दुख तकलीफ़ देना।"

"कभी नहीं दूंगा भाभी।" मैंने अधीरता से कहा____"उसे दुख तकलीफ़ देने का मतलब है हद दर्ज़े का गुनाह करना। कभी कभी सोचा करता हूं कि मैंने तो अपने अब तक के जीवन में हमेशा बुरे कर्म ही किए थे इसके बावजूद ऊपर वाले ने मेरी किस्मत में मुझे इतना प्रेम करने वाली लड़कियां कैसे लिखी थीं?"

"शायद इस लिए क्योंकि ऐसी अद्भुत लड़कियों के द्वारा वो तुम्हें मुकम्मल रूप से बदल देना चाहता था।" भाभी ने कहा____"काश! ईश्वर ने अनुराधा के साथ ऐसा न किया होता। उस मासूम का जब भी ख़याल आता है तो मन बहुत ज़्यादा व्यथित हो उठता है।"

अनुराधा का ज़िक्र होते ही मेरे दिलो दिमाग़ में बड़ी तेज़ी से एक तूफ़ान सा आया और फिर मुझे अंदर तक हिला कर चला गया। ख़ैर कुछ देर और मेरी भाभी से बातें हुईं उसके बाद वो चली गईं। उनके जाने के थोड़ी देर बाद मैं भी वापस बैठक में आ गया। वीरेंद्र सिंह खेतों की तरफ चला गया था इस लिए मैं चुपचाप पलंग पर लेट गया और फिर भाभी से बातों के बारे में सोचने लगा। भाभी से अपने दिल की बातें कह देने से और उनका जवाब सुन लेने से अब मैं बहुत हल्का महसूस कर रहा था।




━━━━✮━━━━━━━━━━━✮━━━━

तो भाई, अंततः वैभव और रागिनी की आमने सामने बात हो ही गई।
अच्छी बात है। यह आवश्यक भी था - मन ही मन यह सोच सोच कर कि अगला क्या सोचे, खुद को सालते रहना ठीक नहीं।
अब दोनों को एक दूसरे की सच्चाई पता है, और एक दूसरे की स्वीकृति भी।

लेकिन वैभव ने रूपचंद को क्यों उंगली दे दी? उसको जिससे मन करे, वो शादी करे। ये तो अजब बात हुई - मैं कूद रहा हूँ, तो अकेले क्यों!
खैर, कोई फीडबैक देने जैसा कुछ नहीं है। सब कुछ उम्मीद के मुताबिक़ हो रहा है फिलहाल!
 

eternity

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Dosto, time nikaal kar do update fir se post kar diye hain maine... :declare:
Priya mitra aapaki is kahani ka jitani bhi prashansha ki jay wo kam hai lekin jyo jyo ye kahani apani samapti ke najdik aati ja rahi hai dhukha bhi ho raha ha ek apurv kahani ke khatma hone ka aur shayad aapse bicharne ka bhi...............................
SADHUVAAD
 

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अगली सुबह।
चाय नाश्ता कर के मैं हवेली से चंदनपुर जाने के लिए जीप से निकला। मां ने मुझे समझाया था कि मैं वहां किसी से भी बेवजह उलझने जैसा बर्ताव न करूं और ना ही अपनी भाभी से ऐसी कोई बात कहूं जिससे कि उन्हें कोई तकलीफ़ पहुंचे। हालाकि ऐसा मैं कर ही नहीं सकता था लेकिन मां तो मां ही थीं, शायद फिक्रमंदी के चलते उन्होंने मुझे ऐसी सलाह दी थी।

पूरे रास्ते मैं भाभी के बारे में ही जाने क्या क्या सोचता रहा। मन में तरह तरह की आशंकाएं उभर आतीं थी जिनके चलते मेरे अंदर एक घबराहट सी होने लगी थी। मैं अपने आपको इस बात के लिए तैयार करता जा रहा था कि जब भाभी से मेरा सामना होगा तब मैं उनके सामने बहुत ही सभ्य और शांत तरीके से अपने दिल की बातें रखूंगा। यूं तो मुझे पूरा भरोसा था कि भाभी मुझे समझेंगी लेकिन इसके बावजूद जाने क्यों मेरे मन में आशंकाएं उभर आतीं थी।

बहरहाल, दोपहर होने से पहले ही मैं चंदनपुर गांव यानि रागिनी भाभी के मायके पहुंच गया। अभी कुछ समय पहले ही मैं यहां आया था, इस लिए जैसे ही भैया के ससुराल वालों ने मुझे फिर से आया देखा तो सबके चेहरों पर हैरानी के भाव उभर आए। ये अलग बात है कि बाद में जल्दी ही उनके चेहरों पर खुशी के भाव भी उभर आए थे।

"अरे! क्या बात है।" भाभी का भाई वीरेंद्र सिंह लपक कर मेरे पास आते हुए बोला____"हमारे वैभव महाराज तो बड़ा जल्दी जल्दी हमें दर्शन दे रहे हैं।"

वीरेंद्र ने कहने के साथ ही झुक कर मेरे पैर छुए। उसकी बातों से जाने क्यों मैं थोड़ा असहज सा हो गया था। ये अलग बात है कि मैं जल्दी ही खुद को सामान्य रखने का प्रयास करते हुए हल्के से मुस्कुरा उठा था। ख़ैर वीरेंद्र मुझे ले कर अंदर बैठक में आया, जहां बाकी लोग पहले से ही मौजूद थे। सबने एक एक कर के मेरे पांव छुए। एक बार फिर से वही क्रिया दोहराई जाने लगी, यानि पीतल की थाल में मेरे पांव धोना वगैरह। थोड़ी देर औपचारिक तौर पर हाल चाल हुआ। इसी बीच अंदर से वीरेंद्र सिंह की पत्नी वंदना भाभी मेरे लिए जल पान के कर आ गईं।

घर में इस वक्त मर्दों के नाम पर सिर्फ वीरेंद्र सिंह ही था, बाकी मर्द खेत गए हुए थे। मेरे आने की ख़बर फ़ौरन ही भैया के चाचा ससुर के घर तक पहुंच गई थी इस लिए उनके घर की औरतें और बहू बेटियां भी आ गईं।

"और बताईए महाराज बड़ा जल्दी आपके दर्शन हो गए।" वीरेंद्र सिंह ने पूछा____"यहां किसी विशेष काम से आए हैं क्या?"

"हां कुछ ऐसा ही है।" मैंने थोड़ा झिझकते हुए कहा____"असल में उस समय जब मैं यहां आया था तो भाभी को लेने आया था। उस समय मुझे बाकी बातों का बिल्कुल भी पता नहीं था। उसके बाद जब यहां से गया तो मां से ऐसी बातें पता चलीं जिनके बारे में मैं कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था।"

"हां मैं समझ सकता हूं महाराज।" वीरेंद्र ने गहरी सांस लेते हुए थोड़ा गंभीर हो कर कहा____"और कृपया मुझे भी माफ़ करें मैंने भी इसके पहले इस बारे में आपको कुछ नहीं बताया। सच कहूं तो मुझे समझ ही नहीं आया था कि आपसे कैसे कहूं? दूसरी बात ये थी कि हम चाहते थे कि ये सब बातें आपको अपने ही माता पिता से पता चलें तो ज़्यादा उचित होगा।"

अभी मैं कुछ कहने ही वाला था कि तभी अंदर से भाभी की मां सुलोचना देवी आ गईं। उन्हें देख कर मैं फिर से थोड़ा असहज सा महसूस करने लगा।

"कोई ख़ास काम था क्या महाराज?" सुलोचना देवी ने आते ही थोड़ी फिक्रमंदी से पूछा____"जिसके लिए आपको फिर से यहां आना पड़ा है?"

"वैभव महाराज को रिश्ते के बारे में पता चल चुका है मां।" मेरे कुछ बोलने से पहले ही वीरेंद्र ने अपनी मां की तरफ देखते हुए कहा____"और ये शायद उसी सिलसिले में यहां आए हैं।"

"ओह! सब ठीक तो है ना महाराज?" सुलोचना देवी एकदम से चिंतित सी नज़र आईं।

"हां मां जी सब ठीक ही है।" मैंने खुद को सामान्य रखने का प्रयास करते हुए कहा____"मैं यहां बस भाभी से मिलने आया हूं। उनसे कुछ ऐसी बातें कहने आया हूं जिन्हें कहे बिना मुझे चैन नहीं मिल सकता। आप कृपया मेरी इस बात को अन्यथा मत लें और कृपा कर के मुझे भाभी से अकेले में बात करने का अवसर दें।"

मेरी बात सुन कर सुलोचना देवी और वीरेंद्र सिंह एक दूसरे की तरफ देखने लगे। चेहरों पर उलझन के भाव उभर आए थे। फिर सुलोचना देवी ने जैसे खुद को सम्हाला और होठों पर मुस्कान सजा कर कहा____"ठीक है, अगर आप ऐसा ही चाहते हैं तो मैं रागिनी से अकेले में आपकी मुलाक़ात करवा देती हूं। आप थोड़ी देर रुकिए, मैं अभी आती हूं।"

कहने के साथ ही सुलोचना देवी पलट कर अंदर की तरफ चली गईं। इधर वीरेंद्र सिंह जाने किस सोच में गुम हो गया था। मुझे भी समझ नहीं आ रहा था कि उससे क्या कहूं। बस ख़ामोशी से वक्त के गुज़रने का इंतज़ार करने लगा।

क़रीब पांच मिनट बाद सुलोचना देवी बाहर आईं। उन्होंने मुझे अपने साथ अंदर चलने को कहा तो मैं एक नज़र वीरेंद्र सिंह पर डालने के बाद पलंग से उठा और सुलोचना देवी के साथ अंदर की तरफ बढ़ चला। एकाएक ही मेरी धड़कनें तीव्र गति से चलने लगीं थी और साथ ही ये सोच कर घबराहट भी होने लगी थी कि भाभी के सामने कैसे खुद को सामान्य रख पाऊंगा मैं? कैसे उनसे नज़रें मिला कर अपने दिल की बातें कह पाऊंगा? क्या वो मुझे समझेंगी?

सुलोचना देवी मुझे ले कर घर के पिछले हिस्से में आ गईं। घर के पीछे खाली जगह थी जहां पर एक तरफ कुआं था और बाकी कुछ हिस्सों में कई सारे पेड़ पौधे लगे हुए थे।

"महाराज।" सुलोचना देवी ने पलट कर मुझसे कहा____"आप यहीं रुकें, मैं रागिनी को भेजती हूं।"

"जी ठीक है।" मैंने कहा और कुएं की तरफ यूं ही बढ़ चला।

उधर सुलोचना देवी वापस अंदर चली गईं। मैं कुएं के पास आ कर उसमें झांकने लगा। कुएं में क़रीब पांच फीट की दूरी पर पानी नज़र आया। मैं झांकते हुए कुएं के पानी को ज़रूर देखने लगा था लेकिन मेरा मन इसी सोच में डूबा हुआ था कि भाभी के आने पर क्या होगा? क्या मेरी तरह उनका भी यही हाल होगा? क्या मेरी तरह वो भी घबराई हुई होंगी?

अभी मैं ये सब सोच ही रहा था कि तभी मुझे किसी के आने का आभास हुआ। किसी के आने के एहसास से एकाएक मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे दिल ने एकदम से धड़कना ही बंद कर दिया हो। सब कुछ थम गया सा महसूस हुआ। मैंने बड़ी मुश्किल से ख़ुद को सम्हाला और फिर धीरे से पलटा।

मेरी नज़र रागिनी भाभी पर पड़ी। गुलाबी कुर्ते सलवार में वो मेरी तरफ पीठ किए अमरूद के पेड़ के पास ठहर ग‌ईं थी। उनके बालों की चोटी उनकी पीठ से होते हुए नीचे उनके नितम्बों को भी पार गई थी। सहसा वो थोड़ा सा घूमीं जिसके चलते मुझे उनके चेहरे की थोड़ी सी झलक मिली। दोनों हाथों में पकड़े अपने दुपट्टे के छोर को हौले हौले उमेठने में लगीं हुईं थी वो।

कुछ देर तक ख़ामोशी से उनकी तरफ देखते रहने के बाद मैं हिम्मत जुटा कर उनकी तरफ बढ़ा। मेरी धड़कनें जो इसके पहले थम सी गई थी वो चलने तो लगीं थी लेकिन हर गुज़रते पल के साथ वो धाड़ धाड़ की शक्ल में बजते हुए मेरी पसलियों पर चोट करने लगीं थी। आख़िर कुछ ही पलों में मैं उनके थोड़ा पास पहुंच गया। शायद उन्हें भी एहसास हो गया था कि मैं उनके पास आ गया हूं इस लिए दुपट्टे को उमेठने वाली उनकी क्रिया एकदम से रुक गई थी।

"भ...भाभी।" मैंने धाड़ धाड़ बजते अपने दिल के साथ बड़ी मुश्किल से उन्हें पुकारा।

एकाएक ही मेरे अंदर बड़ी तेज़ हलचल सी मच गई थी जिसे मैं काबू में करने का प्रयास करने लगा था। उधर मेरे पुकारने पर भाभी पर प्रतिक्रिया हुई। वो बहुत धीमें से मेरी तरफ को पलटीं। अगले ही पल उनका खूबसूरत चेहरा पूरी तरह से मुझे नज़र आया। वो पलट तो गईं थी लेकिन मेरी तरफ देख नहीं रहीं थी। पलकें झुका रखीं थी उन्होंने। सुंदर से चेहरे पर हल्की सी सुर्खी छाई नज़र आई।

"अ...आप ठीक तो हैं ना?" मैंने खुद को सम्हालते हुए बड़ी मुश्किल से पूछा।

"हम्म्म्म।" उन्होंने धीमें से सिर हिलाया।

मुझे समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर किस तरह से उनसे वो बातें कहूं जो मैं उनसे कहने आया था। मेरे दिलो दिमाग़ में हलचल सी मची हुई थी। हल्की ठंड में भी मेरे चहरे पर घबराहट के चलते पसीना उभर आया था।

"व..वो मुझे समझ नहीं आ रहा कि कैसे मैं आपको अपने दिल की बात कहूं?" फिर मैंने किसी तरह उनकी तरफ देखते हुए कहा।

उनकी पलकें अभी भी झुकी हुईं थी किन्तु मेरी बात सुनते ही उन्होंने धीरे से पलकें उठा कर मेरी तरफ देखा। अगले ही पल हमारी नज़रें आपस में टकरा गईं। मुझे अपने अंदर एकदम से झुरझरी सी महसूस हुई। वो सवालिया भाव से मेरी तरफ देखने लगीं थी।

"कृपया आप मुझे ग़लत मत समझिएगा।" मैंने झिझकते हुए कहा____"मैं यहां आपसे ये कहने आया हूं कि मेरे दिल में आपके लिए ना पहले कभी कोई ग़लत ख़याल था और ना ही आगे कभी हो सकता है। मैं पहले भी आपका दिल की गहराइयों से आदर और सम्मान करता था और आगे भी करता रहूंगा।"

मेरी ये बातें सुनते ही भाभी के चेहरे पर राहत और खुशी जैसे भाव उभरे। उनकी आंखें जो विरान सी नज़र आ रहीं थी उनमें एकाएक नमी सी नज़र आने लगी। कुछ कहने के लिए उनके होठ कांपे किंतु शायद उनसे कुछ बोला नहीं गया।

"उस दिन जब मैं यहां आपको लेने आया था तो मुझे कुछ भी पता नहीं था।" मैंने धड़कते दिल से कहा____"यहां कामिनी ने जब मुझसे आपके ब्याह होने की बात बताई तो मुझे सच में धक्का लगा था क्योंकि आपका फिर से ब्याह होने की मैंने कल्पना ही नहीं की थी। फिर जब उन्होंने मुझे आपके जीवन को संवारने और आपकी खुशियों की बातें की तो मुझे भी एहसास हुआ कि वास्तव में आपके लिए यही उचित है। उसके बाद जब आपसे बातें हुईं और आपने ब्याह करने से मना कर दिया तो मुझे अच्छा तो लगा लेकिन फिर ये सोचा कि अगर आपका फिर से ब्याह नहीं हुआ तो भला कैसे आपका जीवन संवर सकता है और कैसे आपको सच्ची खुशियां मिल सकती हैं? इसी लिए मैंने आपसे कहा था कि आप हमारे लिए अपना जीवन बर्बाद मत कीजिए। ख़ैर उसके बाद मैं वापस चला गया था। वापस जाते समय मैं रास्ते में यही सोच रहा था कि आपके बारे में इतना बड़ा फ़ैसला ले लिया गया और किसी ने मुझे बताया तक नहीं। इतना तो मैं समझ गया था कि आपके ब्याह होने की बात मां और पिता जी को भी पहले से ही पता थी लेकिन मैं ये सोच कर नाराज़ सा हो गया था कि ये बात मुझसे क्यों छुपाई गई? जब हवेली पहुंचा तो मैंने मां से नाराज़गी दिखाते हुए यही सब पूछा, तब उन्होंने बताया, लेकिन पूरा सच तब भी नहीं बताया। वो तो रूपचंद्र की बातों से मुझे आभास हुआ कि अभी भी मुझसे कुछ छुपाया गया है। हवेली में जब दुबारा मां से पूछा तो उन्होंने बताया कि वास्तव में सच क्या है।"

इतना सब बोल कर मैं एकाएक चुप हो गया और भाभी को ध्यान से देखने लगा। वो पहले की ही तरह चुपचाप अपनी जगह पर खड़ीं थी। चेहरे पर अजीब से भाव उभर आए थे उनके। नज़रें फिर से झुका लीं थी उन्होंने।

"मां ने जब बताया कि आपका ब्याह असल में मेरे साथ करने का फ़ैसला किया गया है तो मैं आश्चर्यचकित रह गया था।" मैंने फिर से कहना शुरू किया____"मैंने तो ऐसा होने की कल्पना भी नहीं की थी लेकिन मां के अनुसार सच यही था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मेरे और आपके माता पिता हम दोनों का आपस में ब्याह करने का कैसे सोच सकते हैं? जब मैंने मां से ये सवाल किया तो उन्होंने पता नहीं कैसी कैसी बातों के द्वारा मुझे समझाना शुरू कर दिया। ये भी कहा कि क्या मैं अपनी भाभी के जीवन को फिर से संवारने के लिए और उनको सच्ची खुशियां देने के लिए इस रिश्ते को स्वीकार नहीं कर सकता? मां के इस सवाल पर मैं अवाक सा रह गया था और फिर आख़िर में मुझे स्वीकार करना ही पड़ा। सब लोग यही चाहते थे, सबको लगता है कि यही उचित है और इसी से आपका भला हो सकता है तो मैं भला कैसे इंकार कर देता? मैं भला ये कैसे चाह सकता था भाभी कि मेरी वजह से आपका जीवन खुशियों से महरूम हो जाए? मैं तो पहले से ही सच्चे दिल से यही चाहता था कि आप हमेशा खुश रहें, आपके जीवन में एक पल के लिए कभी दुख का साया न आए।"

भाभी अब भी नज़रें झुकाए ख़ामोश खड़ीं थी। उन्हें यूं ख़ामोश खड़ा देख मुझे घबराहट भी होने लगी थी लेकिन मैंने सोच लिया था कि उनसे जो कुछ कहने आया था वो कह कर ही जाऊंगा।

"उस दिन से अब तक मैं इसी रिश्ते के बारे में सोचता रहा हूं भाभी।" मैंने गहरी सांस ले कर कहा____"आपकी खुशी के लिए मैं दुनिया का कोई भी काम कर सकता हूं। आपके होठों पर मुस्कान लाने के लिए मैं खुशी खुशी ख़ुद को भी मिटा सकता हूं। मेरे इस बदले हुए जीवन में आपका बहुत बड़ा हाथ रहा है। आज मैं जो बन गया हूं उसमें आपका ही सहयोग था और आपका ही मार्गदर्शन रहा है। मुझे खुशी है कि मैं अपनी भाभी की बदौलत आज एक अच्छा इंसान बनने लगा हूं। मैं आपसे यही कहना चाहता हूं कि आप ये कभी मत समझना कि इस रिश्ते के चलते आपके प्रति मेरी भावनाओं में कोई बदलाव आ जाएगा। आप ये कभी मत सोचना कि मेरे दिल से आपके प्रति आदर और सम्मान मिट जाएगा। मेरे दिल में हमेशा आपके लिए मान सम्मान और श्रद्धा की भावना रहेगी।"

"तु...तुम्हें ये सब कहने की ज़रूरत नहीं है।" भाभी ने नज़रें उठा कर अधीरता से कहा____"मैं जानती हूं और समझती हूं कि तुम मेरी कितनी इज्ज़त करते हो।"

"आपको पता है।" मैंने सहसा अधीर हो कर कहा____"कुछ दिनों से मैं अपने आपको अपराधी सा महसूस करने लगा हूं।"

"ऐसा क्यों?" भाभी के चेहरे पर चौंकने वाले भाव उभरे और साथ ही फिक्रमंदी के भी।

"मेरे मन में बार बार यही ख़याल उभरता रहता है कि इस रिश्ते के चलते आप मेरे बारे में जाने क्या क्या सोचने लगी होंगी।" मैंने कहा____"इतना तो सबको पता रहा है कि मेरा चरित्र कैसा था। अब जब आपका ब्याह मुझसे करने का फ़ैसला किया गया तो मेरे मन में यही ख़याल उभरा कि आप भी अब मेरे चरित्र के आधार पर यही सोच रही होंगी कि मैं आपके बारे में पहले से ही ग़लत सोच रखता रहा होऊंगा, इसी लिए रिश्ते को झट से मंजूरी दे दी।"

"न...नहीं नहीं।" भाभी ने झट से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"ऐसा नहीं है। मैं तुम्हारे बारे में ऐसा सपने में भी नहीं सोच सकती। तुम ऐसा क्यों सोचते हो?"

"क्या करूं भाभी?" मेरी आंखें भर आईं____"मेरा चरित्र ही ऐसा रहा है कि अब अपने उस चरित्र से मुझे ख़ुद ही बहुत घृणा होती है। बार बार यही एहसास होता है कि इस रिश्ते का ज़िक्र होने के बाद अब हर कोई मेरे बारे में ग़लत ही सोच रहा होगा। मेरा यकीन कीजिए भाभी, भले ही मेरा चरित्र निम्न दर्ज़े का रहा है लेकिन मैंने कभी भी आपके बारे में ग़लत नहीं सोचा है। मैं इतना भी गिरा हुआ नहीं था कि अपने ही घर की औरतों और बहू बेटी पर नीयत ख़राब कर लेता। काश! हनुमान जी की तरह मुझमें भी शक्ति होती तो इस वक्त मैं अपना सीना चीर कर आपको दिखा देता। मैं दिखा देता और फिर कहता कि देख लीजिए....मेरे सीने में आपके लिए सिर्फ और सिर्फ आदर सम्मान और श्रद्धा की ही भावना मौजूद है।"

"ब..बस करो।" रागिनी भाभी की आंखें छलक पड़ीं, रुंधे हुए गले से बोलीं____"मैंने कहा ना कि तुम्हें ऐसा कुछ भी सोचने की ज़रूरत नहीं है और ना ही कुछ कहने की। मैं अच्छी तरह जानती हूं और हमेशा महसूस भी किया है कि तुमने कभी मेरे बारे में ग़लत नहीं सोचा है। सच कहती हूं, मुझे हमेशा से ही तुम्हारे जैसा देवर मिलने का गर्व रहा है।"

"आप सच कह रही हैं ना भाभी?" मैं अधीरता से बोल पड़ा____"क्या सचमुच आपको मुझ पर भरोसा है।"

"हां, ख़ुद से भी ज़्यादा।" भाभी ने लरजते स्वर में कहा____"वैसे सच कहूं तो मेरी भी दशा तुम्हारे जैसी ही है। इतने दिनों से मैं भी यही सोचते हुए ख़ुद को दुखी किए हूं कि इस रिश्ते के चलते तुम मेरे बारे में पता नहीं क्या सोचने लगे होगे। अपनी मां और भाभी से यही कहती थी कि अगर तुमने इस रिश्ते के चलते एक पल के लिए भी मेरे बारे में ग़लत सोच लिया तो मेरे लिए वो बहुत ही शर्म की बात हो जाएगी। उस सूरत में मुझे ऐसा लगने लगेगा कि ये धरती फटे और मैं उसमें समा जाऊं।"

"नहीं भाभी नहीं।" मैं तड़प कर बोल पड़ा____"मैं आपके बारे में कभी ग़लत नहीं सोच सकता। आप तो देवी हैं मेरे लिए जिनके प्रति हमेशा सिर्फ श्रद्धा ही रहेगी। दुनिया इधर से उधर हो जाए लेकिन मैं कभी आपके प्रति कुछ भी उल्टा सीधा नहीं सोच सकता। आप इस बात से बिलकुल निश्चिंत रहें भाभी। मैं नहीं जानता कि ऊपर बैठा विधाता मुझसे या आपसे क्या चाहता है लेकिन इतना यकीन कीजिए कि ये संबंध मेरे और आपके बीच मौजूद सच्ची भावनाओं को कभी मैला नहीं कर सकता।"

"तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद वैभव।" भाभी की आंखों से फिर से आंसू का एक कतरा छलक गया____"तुमने ये कह कर मेरे मन को बहुत बड़ी राहत दी है। तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं है कि इतने दिनों से मैं ये सब सोच सोच कर कितना व्यथित थी।"

"आप खुद को दुखी मत रखिए भाभी।" मैंने कहा____"आप अच्छी तरह जानती हैं कि मैं आपको दुखी होते नहीं देख सकता। इसके पहले आपको खुश रखने के लिए मेरे बस में जो था वो कर रहा था लेकिन इस रिश्ते के बाद मेरी हमेशा यही कोशिश रहेगी कि मैं आपको कभी एक पल के लिए भी दुख में न रहने दूं।"

मेरी बात सुन कर रागिनी भाभी बड़े गौर से मेरी तरफ देखने लगीं थी। उनके चेहरे पर खुशी के भाव तो थे ही किंतु एकाएक लाज की सुर्खी भी उभर आई थी। उनकी आंखों में समंदर से भी ज़्यादा गहरा प्यार और स्नेह झलकता नज़र आया मुझे।

"क्या रूपा को पता है इस बारे में?" फिर उन्होंने खुद को सम्हालते हुए पूछा____"उस बेचारी के साथ फिर से एक ऐसी स्थिति आ गई है जहां पर उसे समझौता करना पड़ेगा। उसके बारे में जब भी सोचती हूं तो पता नहीं क्यों बहुत बुरा लगता है। तुम्हारे जीवन में सिर्फ उसी का हक़ है।"

"उसे मैंने ही इस बारे में बताया है।" मैंने उनकी तरफ देखते हुए कहा____"पहले तो उसे यकीन ही नहीं हुआ लेकिन जब मैंने सारी बातें बताई तो वो भी यही कहने लगी कि आपके लिए यही उचित है।"

"क्या उसे इस बारे में जान कर तकलीफ़ नहीं हुई?" भाभी ने हैरानी ज़ाहिर करते हुए पूछा।

"उसने क्या कहा जब आप ये सुनेंगी तो आपको बड़ा आश्चर्य होगा।" मैंने हौले से मुस्कुरा कर कहा।

"अच्छा, क्या कहा उसने?" भाभी ने उत्सुकता से पूछा।

मैंने संक्षेप में उन्हें रूपा से हुई अपनी बातें बता दी। सुन कर सचमुच भाभी के चेहरे पर आश्चर्य के भाव उभर आए। कुछ देर जाने क्या सोचती रहीं फिर एक गहरी सांस लीं।

"सचमुच बहुत अद्भुत लड़की है वो।" भाभी ने चकित भाव से कहा____"आज के युग में ऐसी लड़कियां विरले ही कहीं देखने को मिलती हैं। तुम बहुत किस्मत वाले हो जो ऐसी लड़की तुमसे इतना प्रेम करती है और तुम्हारी जीवन संगिनी बनने वाली है। मेरा तुमसे यही कहना है कि तुम कभी भी उसके प्रेम का निरादर मत करना और ना ही कभी उसको कोई दुख तकलीफ़ देना।"

"कभी नहीं दूंगा भाभी।" मैंने अधीरता से कहा____"उसे दुख तकलीफ़ देने का मतलब है हद दर्ज़े का गुनाह करना। कभी कभी सोचा करता हूं कि मैंने तो अपने अब तक के जीवन में हमेशा बुरे कर्म ही किए थे इसके बावजूद ऊपर वाले ने मेरी किस्मत में मुझे इतना प्रेम करने वाली लड़कियां कैसे लिखी थीं?"

"शायद इस लिए क्योंकि ऐसी अद्भुत लड़कियों के द्वारा वो तुम्हें मुकम्मल रूप से बदल देना चाहता था।" भाभी ने कहा____"काश! ईश्वर ने अनुराधा के साथ ऐसा न किया होता। उस मासूम का जब भी ख़याल आता है तो मन बहुत ज़्यादा व्यथित हो उठता है।"

अनुराधा का ज़िक्र होते ही मेरे दिलो दिमाग़ में बड़ी तेज़ी से एक तूफ़ान सा आया और फिर मुझे अंदर तक हिला कर चला गया। ख़ैर कुछ देर और मेरी भाभी से बातें हुईं उसके बाद वो चली गईं। उनके जाने के थोड़ी देर बाद मैं भी वापस बैठक में आ गया। वीरेंद्र सिंह खेतों की तरफ चला गया था इस लिए मैं चुपचाप पलंग पर लेट गया और फिर भाभी से बातों के बारे में सोचने लगा। भाभी से अपने दिल की बातें कह देने से और उनका जवाब सुन लेने से अब मैं बहुत हल्का महसूस कर रहा था।




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Ati Sundar.........Kamal ka update bhai👍👍👍👍
 
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