• If you are trying to reset your account password then don't forget to check spam folder in your mailbox. Also Mark it as "not spam" or you won't be able to click on the link.

Incest Mukkader ka sikander

🔥 Read Next Hot Story →
Discover more exclusive stories

buck

Member
231
208
43
सिकंदर किनारे लेटा हुआ था। समुद्र की लहरें किनारे से टकराकर वापस लौट रही थीं, जैसे किसी अजनबी की दस्तक हो जो भीतर आने की इजाजत चाहता हो। लेकिन सिकंदर अब किसी को अपने करीब नहीं आने देना चाहता था।

आज उसे "मार्कोस" से निकाल दिया गया था—वो जगह, जहाँ उसने अपनी पहचान बनाई थी, जहाँ उसका हर शब्द कानून था। लेकिन अब सब बदल गया था।

उसकी साँसें ठहरी हुई थीं, और उसकी नीली आँखें आसमान में टिमटिमाते तारों को देख रही थीं। हवा उसके घने काले बालों से खेल रही थी, और उसकी मजबूत काया रेत पर यूँ पड़ी थी जैसे कोई घायल शेर अपने ज़ख्मों को सहला रहा हो।

उसने गहरी साँस ली, मांसपेशियाँ तन गईं, और एक हल्की मुस्कान उसके होठों पर आई—कड़वी, मगर अटूट।

"तो ये अंत है?" उसने खुद से पूछा।

फिर खुद ही जवाब भी दिया—"नहीं... ये तो बस शुरुआत है।"

मार्कोस ने उसे ठुकराया था, लेकिन सिकंदर वो शख्स नहीं था जो ठुकराए जाने से खत्म हो जाता। वो अब उस लहर की तरह था, जो किनारे से टकराकर लौटती नहीं, बल्कि सबकुछ बहा ले जाती है।



सिकंदर के कदम जैसे ही दिल्ली की सड़कों पर पड़े, हल्की ठंडी हवा ने उसका स्वागत किया। चमचमाते बोर्ड, भीड़ से भरी गलियां, और हर तरफ गाड़ियों का शोर... लेकिन उसकी नीली आँखें एक मकसद पर टिकी थीं—अपने लिए एक घर ढूँढना।

काली जैकेट के कॉलर को थोड़ा ऊपर करते हुए उसने इधर-उधर नजर दौड़ाई। वो इस शहर में नया था, लेकिन उसका अंदाज किसी खानाबदोश का नहीं था। मजबूत कद-काठी, चेहरे पर हल्की दाढ़ी, और आँखों में वो अजीब सा ठहराव, जिसे देखकर कोई भी अंदाजा लगा सकता था कि ये आदमी आम नहीं है।

वो एक रियल एस्टेट एजेंट के पास पहुँचा, उसे उसके दोस्त ने उस एजेंट के पास भेजा था जो अपने ऑफिस के बाहर खड़ा सिगरेट पी रहा था।

सिकंदर: "मुझे एक घर चाहिए। जल्दी।"

एजेंट ने सिर से पैर तक उसका जायजा लिया।

एजेंट (हँसते हुए): "दिल्ली में घर चाहिए? और जल्दी? भाई, यहाँ लोग सालों इंतजार करते हैं। बजट कितना है?"

सिकंदर (शांत लेकिन सख्त लहजे में): "जितना भी चाहिए होगा, दूँगा। बस मुझे मेरी तरह का घर चाहिए—शांत, अकेला, और मजबूत।"

एजेंट को लगा कि सामने कोई अमीर लड़का आया है, लेकिन सिकंदर की आँखों में जो गहराई थी, वो किसी रईसजादे की नहीं थी। वो आँखें किसी ऐसे शख्स की थीं जिसने दुनिया को अपनी शर्तों पर जीना सीखा था।

एजेंट (गंभीर होते हुए): "ठीक है, एक जगह है। लेकिन दिल्ली में ऐसे घर महंगे पड़ते हैं।"

सिकंदर (हल्की मुस्कान के साथ): "महँगाई की चिंता मत कर। जगह दिखा, अगर पसंद आई तो कल सुबह तक पैसा तेरे हाथ में होगा।"

एजेंट अब उसे हल्के में नहीं ले सकता था। उसने फोन निकाला, और एक जगह का पता भेजा।

एजेंट: "ठीक है, ये लो लोकेशन। कल सुबह आठ बजे मिलना, मैं तुझे दिखा दूँगा।"

सिकंदर (आँखों में गहरा आत्मविश्वास लिए): "सुबह का इंतजार नहीं कर सकता। अभी दिखा।"

एजेंट चौंक गया।

एजेंट: "अभी रात के दो बजे हैं!"

सिकंदर: "तो क्या हुआ? घर लेने वाला मैं हूँ, वक्त मैं तय करूँगा।"

एजेंट को अब समझ आ गया था कि सिकंदर कोई साधारण ग्राहक नहीं था। उसने गाड़ी निकाली और दोनों अंधेरी सड़कों पर एक नए सफर के लिए निकल पड़े। सिकंदर की जिंदगी में एक नया अध्याय शुरू हो रहा था, और इस बार, वो खुद अपनी किस्मत लिखने वाला था।



दिल्ली की सर्द हवा गाड़ी की खिड़कियों से टकरा रही थी। सड़कें सुनसान थीं, स्ट्रीट लाइट्स की हल्की रोशनी सोसाइटी की दीवारों पर अजीब सी परछाइयाँ बना रही थीं।

एजेंट ने गाड़ी रोक दी और सिकंदर की तरफ देखा।

एजेंट (हल्की हँसी के साथ): "तो जनाब, ये रही आपकी मंज़िल।"

सिकंदर ने दरवाजा खोला और गाड़ी से बाहर निकला। सामने एक साधारण सी सोसाइटी थी—न बहुत आलीशान, न बहुत बिखरी हुई। चारों ओर पाँच-छह मंज़िला इमारतें, बालकनियों से लटकते कपड़े, कुछ टूटी-फूटी दीवारें, और बीचों-बीच एक छोटा सा कुंआ, जिसमें काई जमी हुई थी।

रात के इस पहर सबकुछ शांत था। दूर किसी कमरे से बच्चे के रोने की आवाज़ आ रही थी, कहीं पर खिड़की से हल्की पीली रोशनी झाँक रही थी, लेकिन ज्यादातर घरों में अंधेरा पसरा था।

सिकंदर ने चारों ओर नज़र दौड़ाई, फिर एजेंट की तरफ देखा।

सिकंदर: "यही है वो जगह?"

एजेंट (कंधे उचकाते हुए): "देख भाई, दिल्ली में हर कोई महल में नहीं रहता। ये मिडिल क्लास एरिया है, लेकिन जगह बुरी नहीं है। तुझे शांति चाहिए थी, यहाँ कोई तेरा पीछा करने नहीं आएगा।"

सिकंदर ने कुंए के पास जाकर नीचे झाँका। अंदर पानी था, लेकिन सतह पर पत्ते और धूल तैर रही थी।

सिकंदर (धीमे स्वर में, जैसे खुद से कह रहा हो): "शांति... हाँ, शायद यही चाहिए।"

एजेंट ने सिगरेट सुलगाई और सिकंदर की तरफ बढ़ा दी।

एजेंट: "स्मोक करता है?"

सिकंदर (हल्की हँसी के साथ): "नहीं, आदत नहीं है।"

एजेंट: "अच्छी बात है। वैसे, इस सोसाइटी में तुझे कोई तंग नहीं करेगा। यहाँ लोग अपनी ज़िंदगी में बिज़ी हैं। तेरा मकान पाँचवे फ्लोर पर है। चाबी कल मिलेगी, लेकिन अगर अभी देखना चाहता है तो देख सकता है।"

सिकंदर ने इमारत की ओर देखा। उसकी बालकनी अंधेरे में छिपी हुई थी, जैसे किसी खामोश अजनबी की तरह जो उसे देख रहा हो।

सिकंदर: "चल, देख लेते हैं।"

एजेंट ने सिर हिलाया और दोनों सीढ़ियों की ओर बढ़े।

सीढ़ियों पर एकदम सन्नाटा था, बस दीवारों पर पुरानी सीलन के धब्बे थे। चलते-चलते सिकंदर ने एक दरवाजे के नीचे से रोशनी झाँकते देखी। अंदर से किसी की धीमी हँसी और बर्तन रखने की आवाज़ आ रही थी।

एजेंट (आवाज़ धीमी करते हुए): "यहाँ लोग अपनी दुनिया में मस्त रहते हैं। किसी को किसी से मतलब नहीं। तुझे भी अकेले रहने की आदत है, तो कोई दिक्कत नहीं होगी।"

सिकंदर ने कोई जवाब नहीं दिया। वो हर कदम के साथ इस जगह को महसूस कर रहा था।

पाँचवे माले तक पहुँचकर एजेंट ने जेब से एक टॉर्च निकाली और दरवाजे की तरफ इशारा किया।

एजेंट: "यही है तेरा घर।"

सिकंदर ने दरवाजा छुआ। ठंडा था, जैसे इसमें अभी तक किसी का वजूद नहीं बसा हो।

सिकंदर (आँखों में अजीब सी चमक के साथ): "अभी खाली है, पर ज्यादा दिन तक ऐसा नहीं रहेगा।"

एजेंट हल्के से मुस्कुराया।

एजेंट: "मुझे तेरा कॉन्फिडेंस पसंद आया। वैसे पेमेंट कल तक कर देगा?"

सिकंदर (जेब से एक बंडल निकालकर उसकी तरफ बढ़ाते हुए): "रात जितनी लंबी हो, सौदा उतना ही जल्दी पूरा होना चाहिए।"

एजेंट ने पैसों का वजन महसूस किया और सिर हिलाते हुए कहा—

"तेरा काम हो गया, सिकंदर। अब ये तेरा घर है।"

सिकंदर ने दरवाजे को एक बार फिर देखा और खुद से कहा—

"घर...? शायद अब मेरी कहानी यहाँ से शुरू होती है।"


सिकंदर ने धीरे से दरवाजा खोला। कमरे में अंधेरा था, लेकिन खिड़की से आती हल्की चांदनी कुछ चीज़ों के अक्स उभार रही थी। उसने अपनी फोन की फ्लैशलाइट ऑन की, और उसकी आँखों के सामने बेतरतीब फैला हुआ कमरा खुल गया।

फर्श पर धूल की मोटी परत जमी थी, कोनों में मकड़ियों के जाले थे, और पुराने फर्नीचर पर गंदगी की परतें चढ़ चुकी थीं। दीवारों पर नमी के निशान और पपड़ी उतर रही थी, जैसे यहाँ सदियों से कोई नहीं आया हो।

सिकंदर ने गहरी साँस ली और हल्की मुस्कान आई—"बिलकुल मेरे हालातों की तरह... उजड़ा हुआ, पर ठहरने लायक।"

वो एक टूटी-सी कुर्सी पर बैठ गया और फोन निकालकर कुछ देर यूँ ही स्क्रीन को देखता रहा। तभी अचानक फोन की स्क्रीन चमकी, और एक नाम उभर आया—"राहिल कॉलिंग..."

सिकंदर ने कॉल उठाई।

राहिल (हँसते हुए): "और भाई, नया ठिकाना कैसा लगा?"

सिकंदर (हल्की मुस्कान के साथ): "अगर तेरी पसंद इतनी खराब होती तो तेरा दोस्त ना होता।"

राहिल (हँसते हुए): "मतलब सही है?"

सिकंदर: "सही नहीं, पर बुरा भी नहीं। सफाई की जरूरत है, पर तू जानता है, मुझे चीजों को बेहतर बनाना आता है।"

राहिल: "बिलकुल, मार्कोस में भी यही किया था, पर वहाँ तुझे ठहरने नहीं दिया... अब यहाँ टिकेगा?"

सिकंदर की आँखों में ठंडक उतर आई। उसने धीरे से जवाब दिया—

"जहाँ एक बार पैर रख देता हूँ, वहाँ से लौटने की आदत नहीं है मेरी।"

राहिल कुछ पल चुप रहा, फिर गहरी साँस ली।

राहिल: "देख भाई, पैसे की चिंता मत कर, जितने चाहिए होंगे, मुझसे ले लेना। पर एक बात याद रखना, ये शहर तुझे अपनाए या ना अपनाए, मैं हमेशा तेरे साथ हूँ।"

सिकंदर की आँखें हल्की सी भीग गईं, लेकिन उसने आवाज़ में वही ठंडापन बनाए रखा।

सिकंदर: "जानता हूँ। और जो उधार दिया है, वो जल्द ही लौटा दूँगा। तुझे मुझे एहसान तले दबा कर रखने की इजाजत नहीं है।"

राहिल हँस पड़ा।

राहिल: "तेरी ये अकड़ हमेशा बरकरार रहनी चाहिए। ठीक है, अब आराम कर, कल मिलते हैं।"

सिकंदर ने कॉल काट दी।

वो कुर्सी पर पीछे टेक लगाकर बैठा,

सिकंदर कुर्सी पर ही सो गया था। पूरी रात का सफर, नए माहौल की थकान और कमरे की ठंडक—इन सबने उसे गहरी नींद में डाल दिया।

सुबह की हल्की धूप खिड़की से अंदर झाँक रही थी। बाहर गली में कुछ बच्चे खेल रहे थे, और पड़ोसियों के घरों से नाश्ते की खुशबू आ रही थी। इसी हलचल के बीच, सोसाइटी के एक फ्लैट का दरवाजा खुला, और एक प्यारी-सी लड़की अंगड़ाई लेते हुए बाहर निकली।

उसने हल्के गुलाबी रंग की नाइटसूट पहनी थी, बाल हल्के बिखरे हुए थे, और चेहरे पर उनींदा-सा मासूमियत भरा भाव था। वो अभी पूरी तरह जागी भी नहीं थी कि उसकी नजर सिकंदर के कमरे के खुले दरवाजे पर पड़ी।

लड़की की आँखें चौड़ी हो गईं।

"आआआआआ!!!"

उसकी तेज़ चीख से सोसाइटी की शांति भंग हो गई।

लड़की (भागते हुए): "अम्मी!! अब्बू!! भइया!!! उठो!!!"

वो अपने घर के अंदर दौड़ी और पूरे परिवार को हिलाने लगी।

लड़की (घबराई हुई आवाज़ में): "सुनो-सुनो! उस भूतिया कमरे का दरवाजा खुला था!"

उसका छोटा भाई, जो अभी तक आधी नींद में था, आँखें मलते हुए बोला—

"दीदी, सुबह-सुबह हॉरर फिल्म क्यों चला दी?"

लड़की: "मैं सच कह रही हूँ! मैंने खुद देखा!"

अब उसकी अम्मी और अब्बू भी जाग चुके थे।

अम्मी (आश्चर्य से): "क्या? पर वो कमरा तो सालों से बंद था!"

अब्बू (चिंतित होकर): "कहीं कोई गलत आदमी तो नहीं घुस आया?"

घरवालों ने आस-पड़ोस को खबर दी, और कुछ ही मिनटों में पूरी सोसाइटी उस कमरे के बाहर जमा हो गई।

सिकंदर अब भी कुर्सी पर बेसुध पड़ा था, गहरी नींद में।

एक पड़ोसी (फुसफुसाते हुए): "यार, वो सच में भूत निकला तो?"

दूसरा पड़ोसी (काँपते हुए): "पर भूत कमरे में दरवाजा खोलकर सोते नहीं न?"

उसी वक्त, लड़की का छोटा भाई और उसके दोस्त हल्के से दरवाजे के पास गए और अंदर झाँका।

लड़के (हैरान होकर, धीमे स्वर में): "इतना... हैंडसम भूत?!"

दूसरा लड़का (सर हिलाते हुए): "यार, हॉरर फिल्म के हीरो जैसा लग रहा है! इतनी स्टाइलिश जैकेट और किलर लुक वाला भूत मैंने पहली बार देखा!"

तीसरा लड़का: "अगर ऐसे भूत होते हैं तो मैं अपनी बहन को भी डराने के लिए भेजूँ!"

सिकंदर को धीरे-धीरे शोर का एहसास हुआ। उसने हल्की करवट ली और माथे पर हाथ रखा।

सिकंदर (नींद में बड़बड़ाते हुए): "इतना शोर क्यों हो रहा है...?"

अब तो भीड़ की हलचल और बढ़ गई।

एक बुजुर्ग महिला (गैस की तरह आवाज निकालते हुए): "हे भगवान! भूत बोल भी रहा है!!"

सिकंदर ने धीरे से आँखें खोलीं, और जो देखा तो उसे खुद ही समझ नहीं आया कि ये क्या तमाशा हो रहा है।

उसके दरवाजे के बाहर पूरी सोसाइटी खड़ी थी—कुछ डर से, कुछ उत्सुकता से, और कुछ इस उम्मीद में कि अभी कोई जबरदस्त हॉरर सीन देखने को मिलेगा।

लड़की के अब्बू आगे बढ़े और हिम्मत करके बोले—

"त... तुम कौन हो?"

सिकंदर उठकर सीधा हुआ, और हल्की आँखें मसलते हुए बोला—

"इंसान।"

भीड़ में हलचल हुई।

एक औरत (घबराकर): "हाय! भूत झूठ भी बोलते हैं!"

सिकंदर (आहिस्ता से): "...अगर सच में भूत होता तो क्या तुम लोग अब तक यहाँ खड़े रहते?"**

भीड़ एक पल के लिए चुप हो गई।

लड़की, जिसने सबसे पहले चीख मारी थी, अब सिकंदर को ध्यान से देख रही थी।

लड़की (धीरे से): "भूत तो नहीं लग रहे..."

उसका छोटा भाई फुसफुसाया—

"अगर भूत होते तो इतनी अच्छी दाढ़ी कैसे होती?"

सिकंदर अब पूरी तरह जाग चुका था। उसने अपना कॉलर ठीक किया, जेब से फोन निकाला और देखा कि एजेंट का एक मैसेज आया था—

"उम्मीद है, रात अच्छी गुज़री होगी। अब सुबह-सुबह सोसाइटी वालों से न लड़ना।"

सिकंदर ने हल्की मुस्कान दी और फोन वापस जेब में रख लिया। फिर सीधा खड़े होकर भीड़ की ओर देखा और अपने उसी ठंडे, गहरे स्वर में बोला—

"अब कोई बताएगा कि सुबह-सुबह क्यों तमाशा लगा रखा है?"

सोसाइटी वालों को अब लग रहा था कि शायद वो ज़रूरत से ज्यादा रिएक्ट कर गए।

एक पड़ोसी (संकोच से): "हमने सोचा... ये कमरा तो बरसों से बंद था, और फिर अचानक..."

सिकंदर (सीधे शब्दों में): "अब ये कमरा मेरा है। कोई परेशानी?"**

सब एक-दूसरे की ओर देखने लगे।

लड़की (मुस्कान छुपाते हुए, धीरे से अपने भाई से): "इतना एटीट्यूड! सच में कोई हीरो लगता है!"**

भाई (आँखें घुमाते हुए): "हाँ, और तू डर के सबसे पहले भागी थी!"**

थोड़ी देर बाद, जब सोसाइटी वाले समझ गए कि नया पड़ोसी इंसान ही है, तो भीड़ धीरे-धीरे छँटने लगी।

सिकंदर ने गहरी सांस ली और सिर हिलाया।

"सुबह-सुबह ये ड्रामा... लगता है, यहाँ भी चैन से रहना आसान नहीं होगा।"



दिल्ली के पॉश इलाके में सुबह की हलचल शुरू हो चुकी थी। चमचमाती गाड़ियाँ तेज़ रफ्तार से सड़कों पर दौड़ रही थीं, और बड़े-बड़े कॉर्पोरेट ऑफिसों के बाहर कर्मचारियों की आवाजाही बढ़ रही थी। लेकिन एक जगह माहौल बाकी शहर से अलग था—"इंसिग्निया कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड" के गेट के सामने मज़दूरों की भारी भीड़ इकट्ठा थी।

वो सब नारे लगा रहे थे, उनकी आँखों में गुस्सा था, और हाथों में तख्तियां थीं—

"हमें हमारा हक़ चाहिए!"
"न्याय दो! न्याय दो!"

बिल्डिंग के अंदर का माहौल भी कुछ कम उग्र नहीं था। चौथी मंज़िल पर बनी विशाल, शानदार ऑफिस के अंदर माहौल गर्म था।

एक खूबसूरत औरत अपने कर्मचारियों पर ग़ुस्से से बरस रही थी।

उसका नाम अलीना मिर्ज़ा था।

चमकदार नीली आँखें, तेज़ नाक-नक्श, दूध-सी सफेद रंगत और ऊँची एड़ी के स्टाइलिश सैंडल में खड़ी अलीना किसी क्वीन्स की तरह लग रही थी। उसकी आँखों में वही कड़कपन था जो सिकंदर की आँखों में था, लेकिन भावनाएँ बिल्कुल विपरीत थीं।

"ये सब क्या हो रहा है!?"

उसकी गूंजती हुई आवाज़ ने पूरे बोर्डरूम में सन्नाटा खींच दिया।

सामने खड़ा उसका CEO राजेश मल्होत्रा सिर झुकाए खड़ा था।

राजेश: "मैडम, मज़दूरों का कहना है कि उनको पिछले महीने का पूरा भुगतान नहीं मिला है, और ऊपर से उनकी सैलरी भी कम कर दी गई है—"

अलीना (तेज़ स्वर में, आँखें सिकोड़कर): "तुम मुझे ये सब बताने आए हो या इसका हल निकालने?"

राजेश पसीना पोंछने लगा।

राजेश: "मैडम, हम कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उनका गुस्सा बढ़ता जा रहा है। अगर आपने खुद जाकर उनसे बात की तो शायद—"

अलीना (कड़वी हँसी के साथ): "बात? मैं उन लोगों से जाकर बात करूँगी जो मेरे ही पैसे लेकर मुझसे सवाल कर रहे हैं?"

अलीना अपने मेज से उठी और बड़ी ही रॉयल अंदाज़ में खिड़की की ओर बढ़ी।

नीचे गेट के बाहर मज़दूर अब भी नारे लगा रहे थे।

उसने हल्की मुस्कान दी, लेकिन वो मुस्कान ज़हरीली थी।

"राजेश, एक बात कान खोलकर सुन लो—"

वो घूमकर राजेश की आँखों में सीधा देखती है।

"ये दुनिया ताकत से चलती है, दया से नहीं। इन लोगों को अगर हमने आज छूट दे दी, तो कल ये हमारे सिर चढ़कर नाचेंगे।"

राजेश की हिम्मत नहीं हो रही थी कि कोई और सवाल करे, लेकिन HR हेड, मिस नीना, जो हमेशा अलीना से सहमत रहती थी, थोड़ा घबराते हुए बोली—

नीना: "मैडम, मीडिया का ध्यान भी इस मामले पर जा सकता है, अगर हमें हड़ताल रोकनी है तो कुछ करना होगा..."

अलीना ने ठंडी आँखों से उसे देखा।

"तुम्हें लगता है कि मैं नहीं जानती कि क्या करना है?"

वो अपने मोबाइल पर एक नंबर डायल करती है और बेहद शांत लहज़े में किसी से कहती है—

"मुझे नहीं चाहिए ये हड़ताल... एक घंटे में सब क्लियर होना चाहिए। समझे?"

वो कॉल काटती है और हॉल में खड़े स्टाफ को देखती है।

"अब सब अपने काम पर लौटो। ये मज़दूर कितने समय तक हड़ताल पर रहेंगे, ये अब मैं तय करूँगी, ना कि वो।"

राजेश और नीना एक-दूसरे को देखते हैं।

इस औरत में शक्ति, ठंडापन और क्रूरता थी।

वो उस सिकंदर की माँ थी—जिससे वो सालों से अनजान थी।


अलीना अपनी सीट पर बैठी, थके हुए अंदाज़ में अपना सिर कुर्सी से टिका देती है। उसकी नीली आँखें धीरे-धीरे ठंडी पड़ने लगती हैं, जैसे किसी ज्वालामुखी के राख में तब्दील होने की प्रक्रिया शुरू हो गई हो।

उसकी टेबल पर एक खूबसूरत सिल्वर फ्रेम रखा था, जिसमें एक टीनेज लड़के की तस्वीर थी। नीली आँखें, तीखे नाक-नक्श, हल्की मुस्कान और एक गहरी उदासी से भरा चेहरा।

सिकंदर।

वही सिकंदर जो उसका बेटा था...
वही सिकंदर जिसने उसे छोड़ दिया था...
वही सिकंदर जो अब उसकी दुनिया का हिस्सा नहीं था...

अलीना धीरे से फ्रेम उठाती है, उसकी उंगलियाँ तस्वीर के किनारों को हल्के-हल्के सहलाने लगती हैं, जैसे वो तस्वीर नहीं, खुद सिकंदर के गालों को छू रही हो।

"देख रहा है ना, सिकंदर? कैसे सब मेरे पीछे पड़े हैं?"

उसकी आवाज़ में वो ठंडापन नहीं था जो अभी कुछ पल पहले उसके कर्मचारियों को सुनाई दिया था।

अब उसकी आवाज़ भीगी हुई, टूटी हुई थी।

"हर कोई चाहता है कि मैं झुक जाऊं, माफी माँग लूं... लेकिन मैं झुकने वालों में से नहीं हूँ।"

वो तस्वीर को और करीब कर लेती है। उसकी आँखें हल्की लाल होने लगी थीं।

"लेकिन मुझे दूसरों से क्या शिक़ायत करनी, जब तूने ही मुझे छोड़ दिया?"

अब उसकी आँखों में गुस्सा उभरने लगा था, लेकिन वो गुस्सा तस्वीर की मासूमियत देखकर फिर से दर्द में बदल गया।

"धोखेबाज़... बुज़दिल..."

उसने दाँत भींच लिए और अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं, जैसे कोई पुरानी याद उसे जकड़ रही हो।

"तू भी तो उन सब की तरह ही निकला... तू भी मुझे छोड़कर चला गया... मेरे खिलाफ खड़ा हो गया... तू भी मुझसे नफरत करता है ना?"

वो हल्का हँसती है, लेकिन वो हँसी ज्यादा देर तक टिकती नहीं।

तस्वीर पर उसकी उंगलियाँ और कसने लगती हैं।

"लेकिन देखना, एक दिन तू खुद वापस आएगा... माँ को भूल सकता है क्या?"

वो तस्वीर टेबल पर रखती है, लेकिन उसकी नज़रें अब भी उस चेहरे से हट नहीं रही थीं।

बाहर मज़दूरों की हड़ताल की आवाज़ें अब भी गूंज रही थीं, लेकिन अलीना की दुनिया इस वक़्त बस एक तस्वीर तक सिमट चुकी थी।

कमरे में सन्नाटा था।

और उस सन्नाटे में एक माँ अपने ही बेटे की याद में जल रही थी।
Nice start bro
 
  • Like
Reactions: Smith_15

Hamantstar666

New Member
87
413
54
सुबह की हल्की धूप खिड़की से छनकर अंदर आ रही थी।

अलिना की आँखें धीरे-धीरे खुलीं। उसके माथे पर पसीने की नमी थी। वो अपने अतीत को देख रही थी… सपने में।

सिकंदर...

वो झटके से उठी और बैठ गई। उसकी साँसें तेज़ हो गईं।

"फिर वही सपना..." उसने खुद से बुदबुदाया।

लेकिन ये सपना नहीं था, उसका अतीत था… उसकी सच्चाई थी।


---

वो खुद को संभालते हुए बिस्तर से उतरी, ठंडे पानी के छींटे मारे और अपने चेहरे को आइने में देखा।

आइने में वही चेहरा था, पर आँखों में कोई और थी।

एक खोई हुई औरत, जो आज सब कुछ होते हुए भी अधूरी थी।


---

हॉल में आते ही उसने देखा, पूरा परिवार वहाँ बैठा था।

अममी, अब्बू, भाई, भाभी, हसन मिर्जा और साहबाज...

साहबाज अब उसका इकलौता बेटा था।

पर वहाँ कोई नहीं था…तो वो था उसका अपना खून ... उसके जिस्म का टुकड़ा... उसके दरकते दिल की आवाज...

वो नहीं था, जिसे उसने नौ महीने अपनी कोख में पाला था।

खैर अलीना अपने चेहरे पर मुस्कान बिखेरते हुवे.. अपनी उन यादों को भुलाते हुवे सबके साथ नास्ते की टेबल पर जा बैठी....

साहबाज ने उसकी तरफ देखा और मुस्कुराकर बोला,

"अम्मी, मुझे हार्ले डेविडसन मोटरसाइकिल चाहिए!"

अलिना का चेहरा खिल उठा... उसका बेटा उससे कुछ मांग रहा था.... वो खिलखिलाते हुवे बोली.. क्यों नहीं मेरा बच्चा.... तुम्हे जो चाहिए वो मिलेगा दुनिया की सारी खुशी तुम्हे दूंगी मै..


---

इतना सुनते ही भाभी ने ताना मारने वाले अंदाज़ में कहा,

"अरे… यही मोटरसाइकिल ना जो सिकंदर लेना चाहता था? मुझे अच्छे से याद है, ये उसका सपना था…"


---

अलिना ठिठक गई।

उसका दिल जैसे एक पल के लिए रुक गया।


---

"सिकंदर का सपना..."


---

वो कुछ नहीं बोली।

बस सिर हिलाकर हामी भर दी।

पर भीतर ही भीतर उसका दिल टुकड़ों में बंटने लगा।


---

"मेरा अपना खून… धक्के खा रहा होगा… भूखा होगा… जाने कहाँ होगा..."

"और यहाँ मैं… दूसरों के सपने पूरे करने में लगी हूँ…"


---

उसकी आँखों के सामने एक मासूम चेहरा घूम गया।

नीली आँखें… सहमी हुई… पर दर्द से भरी हुई।


---

उसका सिकंदर…

जो अब उसके पास नहीं था।


---

"कहाँ होगा मेरा बच्चा…?"


---

उसका गला सूख गया।

उसने पानी का गिलास उठाया… पर उसे हाथ में पकड़ने की हिम्मत नहीं थी।


---

गिलास हथेली से छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा।

खटाक!

और जैसे ही काँच के टुकड़े फर्श पर बिखरे…

अलिना का दिल भी उसी तरह बिखर गया।


गिलास के टुकड़े ज़मीन पर बिखर चुके थे।

पूरा हॉल एक पल के लिए खामोश हो गया।

सबकी नज़रें अलिना पर थी।


---

हसन मिर्जा ने भौंहें चढ़ाकर देखा,

"अलिना, क्या हुआ?"


---

अलिना ने झट से अपने आँसू पोछे, होंठों पर ज़बरदस्ती की मुस्कान लाई,

"कुछ नहीं… हाथ से छूट गया।"


---

पर उसका दिल जानता था…

कि सिर्फ गिलास नहीं टूटा था… कुछ और भी टूट रहा था।


---

भाभी आगे बढ़ीं,

"गिलास तो टूटेगा ही अलिना… जब दिल से किसी के लिए दुआ निकले और बदले में ताने मिलें, तो हाथ काँप जाते हैं।"


---

अलिना सन्न रह गई।

उसका चेहरा तमतमा गया, पर वो जवाब नहीं दे पाई।


---

साहबाज हंसते हुए बोला,

"अम्मी, आप इतनी टेंशन क्यों ले रही हैं? मैं हूँ ना! सिकंदर की यादें भुला दीजिए, अब मैं ही आपका बेटा हूँ।"


---

उसकी ये बात सुनते ही…

अलिना का दिल धक से रह गया।


---

उसने नजरें ऊपर उठाईं,

"सिकंदर की यादें नहीं भुला सकती मैं!"


---

पहली बार उसने ज़ोर से बोला था।


---

हसन मिर्जा की त्यौरियाँ चढ़ गईं,

"फिर वही पुरानी बातें! सिकंदर चला गया, अब उसे भूल जाओ।"


---

अलिना की आँखों में एक सैलाब उमड़ आया।


---

"कैसे भूल जाऊं हसन? वो मेरा बच्चा था! मेरी कोख से जन्मा था!"

"तुम नहीं समझोगे एक माँ का दर्द…


---

साहबाज अचानक अलीना को गाल पर पप्पी लेते हुवे बोला.. अरे अम्मी मै हूँ ना आपके पास... आप क्यों उस निकम्मे सिकंदर को लेकर परेशान है.... और एक और पप्पी उसके गालों पर ले लेता है.... अलीना भी उसके बातों को नज़र अंदाज़ कर बस उसके प्यार मै खो जाती है.. सोचती है... सिकंदर की लिए मै सहबाज को तो खुद से दूर नहीं कर सकती... वो तो चला गया.. पर अब सहबाज पर मै कोई अँच नहीं आने दूंगी..... मेरा प्यारा बच्चा...ये अलीना सोच ही रही थी की.. हसन की आवाज आयी


---



---




---

पर अगले ही पल…

हसन मिर्जा ने गुस्से से उसकी कलाई पकड़ ली।

"बस करो, अलिना! मैं ये ड्रामा और नहीं सह सकता।"

"तुम्हें फ़ैसला करना होगा—सिकंदर की यादों में जीना है या हमारे साथ रहना है अगर इतना ही प्यार है... उस हरामी से... तो साफ साफ बोल दो.. मै तुम्हे तलाक दे दूंगा...


---

अलिना सन्न रह गई।

"क्या सच में इतनी पराई हो गई हूँ सिकंदर के लिए?"

"क्या सच में मेरे अपने ही मुझे सिकंदर का नाम लेने से रोक रहे हैं?" नहीं नहीं.... हसन नाराज़ हो रहा है.... मै भी पागल हूँ.. पाता नहीं बार बार क्यों उसकी यादो मै खो जाती हूँ...


---



पर उसके दिल के जख़्म अब और भी गहरे हो चुके थे।



पुरानी दिल्ली की सँकरी गलियों में धूल उड़ रही थी। सिकंदर और राहिल एक पुराने, जर्जर मकान के सामने खड़े थे। मकान की दीवारों पर वक्त की मार साफ़ दिख रही थी—उखड़ी हुई पेंटिंग, जगह-जगह जाले, और दरवाज़े पर जंग लगी हुई जंजीर। सिकंदर की नज़रें बेचैनी से दरवाज़े पर जमी थीं।

राहिल ने सिगरेट का एक लंबा कश लिया और सिकंदर की तरफ देखा, "अबे, तू पक्का है? ये ही जगह है?"

सिकंदर की आँखें ठंडी थीं, जैसे बरसों की नफ़रत उसमें जम चुकी हो। उसने हल्के से सिर हिलाया, "हाँ... अब्दुल रहमान यहीं रहता था..."

राहिल ने होंठ भींच लिए, "अबे साले, तेरा तो खून खौलना चाहिए था उसका नाम सुनकर! वो हरामी जो तेरी माँ के साथ..."

सिकंदर ने हल्के से मुस्कुराते हुए राहिल की बात काटी, उसकी मुस्कुराहट में जहर घुला हुआ था। "अगर मैं अपने बाप की जगह होता, तो मैं भी उस हरामज़ादी के साथ यही करता..."

राहिल ने आँखें फाड़ दीं, "अबे! तू क्या बक रहा है, सिकंदर?"

सिकंदर ने जेब से एक सिगरेट निकाली, उसे उँगलियों में घुमाते हुए उसने कहा, "जो औरत एक आदमी के लिए अपने बेटे को छोड़ दे... उसे 'औरत' कहने का हक़ नहीं है। वो साली बस एक रंडी है, जिसे मेरे बाप ने इस्तेमाल किया और फेंक दिया... और जानता है सबसे मज़ेदार बात क्या है, राहिल?"

राहिल ने गहरी साँस ली, "क्या?"

सिकंदर ने सिगरेट को जलाया, हल्का सा धुआँ हवा में छोड़ते हुए कहा, "वो औरत अब भी मेरी माँ कहलाने का दावा करती है... लेकिन सच ये है कि मैंने उसे माँ मानना कब का छोड़ दिया।"साला मै किसी रंडी का बचा कैसे हो सकता हूँ.... उस साली के पाता नहीं कितने यार होंगे

राहिल का चेहरा तमतमा गया, "पर फिर भी... तू उस हरामी का नाम अपने नाम के आगे जोड़ रहा है?"

सिकंदर ने सिर झुका कर हंस दिया, "अबे नाम में क्या रखा है, राहिल? अब्दुल रहमान मेरा बाप था, चाहे जैसा भी था। लेकिन कम से कम, वो उस बदचलन औरत से ज़्यादा सच्चा था।"

राहिल गुस्से से अपनी सिगरेट ज़मीन पर फेंक देता है, "सिकंदर, तेरा दिमाग खराब हो गया है! तुझे नहीं पता कि ये नफरत तुझे अंदर से खा जाएगी!"

सिकंदर ने उसकी तरफ ठंडी नज़रों से देखा, "राहिल... ये नफरत नहीं है... ये सिर्फ इंसाफ़ है।"

और फिर, बिना कुछ कहे, सिकंदर दरवाजे की तरफ बढ़ गया।



पुरानी दिल्ली की धूल भरी गलियों में शाम ढल रही थी। सिकंदर और राहिल उस टूटे-फूटे मकान के बाहर खड़े थे, उनके सामने कुछ बूढ़े लोग बैठे हुक्का पी रहे थे। सिकंदर ने उनमें से एक से पूछा,

"अब्दुल रहमान... यहाँ रहता था, 20 साल पहले...

एक झुर्रीदार बुजुर्ग ने सिकंदर की तरफ देखा, आँखों में पुरानी यादों का बोझ था। "हाँ... नाम सुना है। बड़ा शराबी था... लेकिन दस साल पहले यहाँ से गायब हो गया। कोई कहता है दुबई भाग गया, कोई कहता है यहीं किसी गली में सड़ गया। पर हाँ, लड़का... उस आदमी के पीछे जाने की ज़रूरत नहीं। वो किस्मत से ज्यादा नसीब जलाने वाला था।"

राहिल - मियां पूरी बात बताओ

बुजुर्ग ने लंबा कश लिया और धीरे से कहा, कुछ अमीर लोग उसके पीछे पर गए थे... एक अमीर औरत. ने उसका
उसका जीना हराम कर रखा था.. उसी से पीछा छुराता हुवा यहाँ से चला गया...

सिकंदर ने ठंडी नज़रों से उन बूढ़ों को देखा और बिना कुछ कहे पलट गया।


---



सिकंदर और राहिल अपनी बाइक तक पहुँचे ही थे कि दोनों ठिठक गए।

"साला! बाइक कहाँ गई?" राहिल चिल्लाया।

गली में अंधेरा घिरने लगा था, लेकिन दूर एक मोड़ पर कुछ लड़कों की परछाइयाँ दिख रही थीं। बिल्ला —पुरानी दिल्ली का एक लोकल गुंडा—और उसके साथ दस और लड़के खड़े थे।

बीला ने एक सिगरेट जलाते हुए ठहाका लगाया, "अबे ओ राहिल मियाँ, अपनी बाइक ढूँढ रहे हो?"

राहिल गुस्से से आगे बढ़ा, "हरामी! बाइक वापस कर!"

बीला ने सिगरेट का धुआँ उड़ाया, "अबे ओ छोटे, ये दिल्ली है... यहाँ जो छिनता है, वो लौटता नहीं।"

सिकंदर अब तक चुपचाप खड़ा था, उसकी आँखें बिल्ला और उसके आदमियों को नाप रही थीं। वो सिर्फ़ दस थे... बस दस।

राहिल ने धीरे से कहा, "सिकंदर, साले बहुत हैं...चल भाई... बाद मे देखता हूँ इस हराम के औलाद को...

सिकंदर हल्का सा मुस्कुराया, "सिर्फ़ दस है....

राहिल - हाँ बे भोसरी के.... मे तो भूल ही गया था... तू तो marcos मे अपना गांड घिस कर आया है...





बीला के एक आदमी ने आगे बढ़कर सिकंदर पर वार करने के लिए चाकू निकाला, लेकिन उससे पहले ही सिकंदर का घूंसा उसकी जबड़े पर पड़ा—इतना तेज़ कि वो लड़का उल्टा गिरा और बेहोश हो गया!

"सालों! मारो इसे!" बीला चिल्लाया।

बाकी दस लोग सिकंदर और राहिल पर झपट पड़े। लेकिन सिकंदर कोई मामूली लड़का नहीं था... वो एक मर्कोस का सॉल्जर था!

पहला लड़का: उसने लोहे की रॉड उठाकर सिकंदर पर हमला किया, लेकिन सिकंदर ने रॉड को बीच में ही पकड़ लिया और उसे इतनी जोर से घुमाया कि लड़के का कंधा उखड़ गया!

दूसरा लड़का: उसने पीछे से हमला करने की कोशिश की, लेकिन सिकंदर झुका और उसे कोहनी मारकर ज़मीन पर गिरा दिया!

राहिल भी पीछे नहीं था, उसने एक लड़के का गला पकड़कर घुटना मारा और उसे सीधा दीवार से टकरा दिया!

बीला अब गुस्से में था। उसने पिस्तौल निकाली!

"अबे ओ बहुत हो गया, अब तो तेरा खेल ख़त्म!"

लेकिन सिकंदर मुस्कुराया, उसके पिस्टल को देखते हुवे बोला - बच्चे तेरा खिलौना छोटा है..

बीला ने गुस्से में ट्रिगर दबाया—लेकिन राहिल ने तेज़ी से एक पत्थर उठाकर बीला की कलाई पर दे मारा! पिस्तौल ज़मीन पर गिर गई!

सिकंदर ने बिना कोई मौका गँवाए, आगे बढ़कर बीला का गला पकड़ लिया और उसे दीवार से लगा दिया।

सिकंदर- बेटा मे एक राक्षस हूँ.... काट कर खा जाउगा....

बीला घबराकर हाँफने लगा, "स..सॉरी भाई!"

सिकंदर ने उसे छोड़ा और अपने हाथ झाड़ते हुए बाइक के पास गया।

"चल, राहिल! आज बहुत टाइम बर्बाद हो गया!"

राहिल हंसते हुए बाइक पर बैठा, "अबे सिकंदर, यहाँ तो लफड़ा हो गया बे..

सिकंदर ने हल्की मुस्कान दी

बाइक स्टार्ट हुई, और वो दोनों पुरानी दिल्ली की गलियों से बाहर निकल गए...

अलिना ने ऑफिस के दरवाज़े से अंदर कदम रखा, तो उसके चेहरे पर वही ठसक और आत्मविश्वास था, जो हर रोज़ होता था। उसकी ऊँची हील्स फर्श पर ठक-ठक की आवाज़ कर रही थीं, और हाथ में महँगा बैग झूल रहा था। जैसे ही उसने अपने केबिन का दरवाज़ा खोला, सामने उसका CEO और कुछ अन्य अफसर खड़े थे।

"मैम, आपको एक ज़रूरी बात बतानी थी," CEO ने हल्की घबराई हुई आवाज़ में कहा।

"क्या हुआ?" अलिना ने कुर्सी पर बैठते हुए तेज़ आवाज़ में पूछा।

CEO ने थोड़ा पानी पीकर गला साफ़ किया और कहा, "मैम, हमारे XYZ एरिया के जो प्लॉट्स थे... वहाँ झुग्गी-झोपड़ियाँ बस चुकी हैं।"

अलिना का चेहरा सख्त हो गया। उसने झटके से टेबल पर हाथ मारा, जिससे वहाँ रखी फाइलें हल्का-सा उछल गईं।

"झुग्गियाँ? वहाँ? वो मेरी प्रॉपर्टी है!"

CEO ने सिर झुका लिया। "जी, मैम, लेकिन वहाँ काफी गरीब लोग बस चुके हैं। वो खुद को वहाँ का असली हक़दार मानते हैं और हटने के लिए तैयार नहीं हैं। हमने कई बार समझाया, लेकिन..."

अलिना ने घूरते हुए कहा, "तो फिर पुलिस बुलाओ! बुलाओ प्रशासन को! ये सब गैरकानूनी कब्जा है, और मुझे अपनी प्रॉपर्टी वापस चाहिए!"

CEO ने गहरी साँस ली और थोड़ा पास आकर बोला, "मैम, पुलिस और प्रशासन गरीबों के साथ खड़े हो जाते हैं। आपको पता है, ये स्लम वाले अपने हक़ के लिए प्रदर्शन करते हैं, मीडिया इनके पीछे लग जाती है, और फिर सरकार इनका साथ देने लगती है। पुलिस को भेजकर भी कुछ हासिल नहीं होगा।"

अलिना की उँगलियाँ टेबल पर बजने लगीं। उसके माथे पर शिकन और गहरी हो गई।

"तो फिर क्या करना चाहिए?" उसने ठंडी आवाज़ में पूछा।

CEO थोड़ा मुस्कराया और बोला, "मैम, ऐसे मामलों में सीधा एक्शन लेना पड़ता है। अगर हम वहाँ लोकल लड़कों को भेजें, तो मामला जल्दी सुलझ सकता है।"

अलिना की आँखें सिकुड़ गईं। "लोकल लड़के?"

"जी, कुछ गुंडे जो इस काम में माहिर हैं। वो इन झुग्गी वालों को इस तरह से डराएँगे कि वो खुद ब खुद भाग जाएंगे। ना कोई FIR होगी, ना कोई केस। सब साफ़।"

अलिना चुपचाप कुछ सेकंड तक सोची, फिर धीरे से बोली, "नाम बताओ... कौन कर सकता है ये काम?"

CEO ने हल्की मुस्कान के साथ एक पर्ची उसकी तरफ़ बढ़ाई। "यहाँ कुछ नाम लिखे हैं, इनमें से किसी को भी हायर कर सकते हैं।"

अलिना ने पर्ची उठाई और पढ़ने लगी। उसकी उँगलियाँ धीरे-धीरे पर्ची पर फिसल रही थीं, और उसके चेहरे पर हल्की सख्ती और बढ़ रही थी।

फिर उसने धीरे से कहा, "ठीक है... काम हो जाना चाहिए... बिना किसी रुकावट के।"


---






अलिना ने मेज़ पर रखे ग्लास को धीरे से सरकाया और पर्ची को ध्यान से पढ़ने लगी। उसके चेहरे पर एक गहरी सोच की लकीरें उभरने लगीं। तभी CEO ने धीरे से उसकी ओर एक फाइल बढ़ाई।

"मैम, अगर हम सिर्फ उन झुग्गी वालों को हटाएँगे तो बाकी के ज़मीन मालिक सतर्क हो जाएँगे। लेकिन अगर हम... पूरे इलाके में डर फैला दें, तो ये सभी लोग अपनी ज़मीन औने-पौने दामों में हमें बेचने पर मजबूर हो जाएँगे।"

अलिना ने सिर उठाकर उसकी तरफ़ देखा। "क्या मतलब?"

CEO ने एक नक्शा खोला और टेबल पर फैलाया। "देखिए, ये पूरा इलाका देख रही हैं? ये ज़मीनें अलग-अलग लोगों के पास हैं, लेकिन अगर हम सही चाल चले, तो ये सारी ज़मीन हमारे हाथ में आ सकती है।"

अलिना ने नक्शे पर नज़रें दौड़ाईं। आस-पास के इलाकों में छोटे-बड़े कई प्लॉट्स थे, कुछ घर भी बने हुए थे। लेकिन उन सबके बीच में एक छोटी सोसाइटी थी


अलिना ने नक्शे पर उँगली रखी। "ये क्या है?"

CEO हल्के से मुस्कुराया, जैसे वो इसी सवाल का इंतज़ार कर रहा था। उसने अपने चश्मे को एडजस्ट किया और धीरे से बोला, "यही असली खेल है, मैम... ये सोसाइटी बहुत कीमती ज़मीन पर बनी है। अगर हम इसे भी अपने कंट्रोल में ले लें, तो इस पूरे इलाके की कीमत आसमान छूने लगेगी।"

अलिना चुपचाप नक्शे को देखती रही। उसे अच्छी तरह समझ आ रहा था कि CEO किस ओर इशारा कर रहा था। उसकी उँगलियाँ उस सोसाइटी के नाम पर जाकर ठहर गईं...

"तुम्हें लगता है कि ये मुमकिन है?" उसने धीरे से पूछा।

CEO ने नक्शे पर हल्का थपकी दी और कहा, "डर एक बहुत बड़ी ताकत होती है, मैम। लोग अपनी ज़मीन से प्यार करते हैं, लेकिन जब उनके सिर पर खतरा मंडराने लगता है, तो वो प्यार जल्द ही डर में बदल जाता है। और डर के आगे... सौदेबाज़ी आसान हो जाती है।"

अलिना ने एक गहरी साँस ली और कुर्सी पर पीछे टिक गई। "अगर ये हो गया... तो ये शहर में सबसे बड़ी डील होगी।"

CEO ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। "बिल्कुल, मैम। और इसमें आपको सिर्फ एक 'हाँ' कहनी है। बाकी हम संभाल लेंगे।"



उसने हल्के से नक्शे पर उँगली फेरी, और फिर धीरे से मुस्कुराई।

"कर दो शुरूआत..."
 
🔥 Read Next Hot Story →
Discover more exclusive stories

KDM 1994

Member
190
616
108
Bhai apse or 1 saval kiya he uska bi javab mil jata to badiya hota apse jsbab ki umid he dm kiya he ho sake to dekh Lena...
 

Dragon.

Active Member
1,483
1,345
143
सुबह की हल्की धूप खिड़की से छनकर अंदर आ रही थी।

अलिना की आँखें धीरे-धीरे खुलीं। उसके माथे पर पसीने की नमी थी। वो अपने अतीत को देख रही थी… सपने में।

सिकंदर...

वो झटके से उठी और बैठ गई। उसकी साँसें तेज़ हो गईं।

"फिर वही सपना..." उसने खुद से बुदबुदाया।

लेकिन ये सपना नहीं था, उसका अतीत था… उसकी सच्चाई थी।


---

वो खुद को संभालते हुए बिस्तर से उतरी, ठंडे पानी के छींटे मारे और अपने चेहरे को आइने में देखा।


आइने में वही चेहरा था, पर आँखों में कोई और थी।

एक खोई हुई औरत, जो आज सब कुछ होते हुए भी अधूरी थी।


---

हॉल में आते ही उसने देखा, पूरा परिवार वहाँ बैठा था।

अममी, अब्बू, भाई, भाभी, हसन मिर्जा और साहबाज...

साहबाज अब उसका इकलौता बेटा था।

पर वहाँ कोई नहीं था…तो वो था उसका अपना खून ... उसके जिस्म का टुकड़ा... उसके दरकते दिल की आवाज...

वो नहीं था, जिसे उसने नौ महीने अपनी कोख में पाला था।

खैर अलीना अपने चेहरे पर मुस्कान बिखेरते हुवे.. अपनी उन यादों को भुलाते हुवे सबके साथ नास्ते की टेबल पर जा बैठी....

साहबाज ने उसकी तरफ देखा और मुस्कुराकर बोला,

"अम्मी, मुझे हार्ले डेविडसन मोटरसाइकिल चाहिए!"

अलिना का चेहरा खिल उठा... उसका बेटा उससे कुछ मांग रहा था.... वो खिलखिलाते हुवे बोली.. क्यों नहीं मेरा बच्चा.... तुम्हे जो चाहिए वो मिलेगा दुनिया की सारी खुशी तुम्हे दूंगी मै..


---

इतना सुनते ही भाभी ने ताना मारने वाले अंदाज़ में कहा,

"अरे… यही मोटरसाइकिल ना जो सिकंदर लेना चाहता था? मुझे अच्छे से याद है, ये उसका सपना था…"


---

अलिना ठिठक गई।

उसका दिल जैसे एक पल के लिए रुक गया।


---

"सिकंदर का सपना..."


---

वो कुछ नहीं बोली।

बस सिर हिलाकर हामी भर दी।

पर भीतर ही भीतर उसका दिल टुकड़ों में बंटने लगा।


---

"मेरा अपना खून… धक्के खा रहा होगा… भूखा होगा… जाने कहाँ होगा..."

"और यहाँ मैं… दूसरों के सपने पूरे करने में लगी हूँ…"


---

उसकी आँखों के सामने एक मासूम चेहरा घूम गया।

नीली आँखें… सहमी हुई… पर दर्द से भरी हुई।


---

उसका सिकंदर…

जो अब उसके पास नहीं था।


---

"कहाँ होगा मेरा बच्चा…?"


---

उसका गला सूख गया।

उसने पानी का गिलास उठाया… पर उसे हाथ में पकड़ने की हिम्मत नहीं थी।


---

गिलास हथेली से छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा।

खटाक!

और जैसे ही काँच के टुकड़े फर्श पर बिखरे…

अलिना का दिल भी उसी तरह बिखर गया।


गिलास के टुकड़े ज़मीन पर बिखर चुके थे।

पूरा हॉल एक पल के लिए खामोश हो गया।

सबकी नज़रें अलिना पर थी।


---

हसन मिर्जा ने भौंहें चढ़ाकर देखा,

"अलिना, क्या हुआ?"


---

अलिना ने झट से अपने आँसू पोछे, होंठों पर ज़बरदस्ती की मुस्कान लाई,

"कुछ नहीं… हाथ से छूट गया।"


---

पर उसका दिल जानता था…

कि सिर्फ गिलास नहीं टूटा था… कुछ और भी टूट रहा था।


---

भाभी आगे बढ़ीं,

"गिलास तो टूटेगा ही अलिना… जब दिल से किसी के लिए दुआ निकले और बदले में ताने मिलें, तो हाथ काँप जाते हैं।"


---

अलिना सन्न रह गई।

उसका चेहरा तमतमा गया, पर वो जवाब नहीं दे पाई।


---

साहबाज हंसते हुए बोला,

"अम्मी, आप इतनी टेंशन क्यों ले रही हैं? मैं हूँ ना! सिकंदर की यादें भुला दीजिए, अब मैं ही आपका बेटा हूँ।"


---

उसकी ये बात सुनते ही…

अलिना का दिल धक से रह गया।


---

उसने नजरें ऊपर उठाईं,

"सिकंदर की यादें नहीं भुला सकती मैं!"


---

पहली बार उसने ज़ोर से बोला था।


---

हसन मिर्जा की त्यौरियाँ चढ़ गईं,

"फिर वही पुरानी बातें! सिकंदर चला गया, अब उसे भूल जाओ।"


---

अलिना की आँखों में एक सैलाब उमड़ आया।


---

"कैसे भूल जाऊं हसन? वो मेरा बच्चा था! मेरी कोख से जन्मा था!"

"तुम नहीं समझोगे एक माँ का दर्द…


---

साहबाज अचानक अलीना को गाल पर पप्पी लेते हुवे बोला.. अरे अम्मी मै हूँ ना आपके पास... आप क्यों उस निकम्मे सिकंदर को लेकर परेशान है.... और एक और पप्पी उसके गालों पर ले लेता है.... अलीना भी उसके बातों को नज़र अंदाज़ कर बस उसके प्यार मै खो जाती है.. सोचती है... सिकंदर की लिए मै सहबाज को तो खुद से दूर नहीं कर सकती... वो तो चला गया.. पर अब सहबाज पर मै कोई अँच नहीं आने दूंगी..... मेरा प्यारा बच्चा...ये अलीना सोच ही रही थी की.. हसन की आवाज आयी


---



---




---

पर अगले ही पल…

हसन मिर्जा ने गुस्से से उसकी कलाई पकड़ ली।

"बस करो, अलिना! मैं ये ड्रामा और नहीं सह सकता।"

"तुम्हें फ़ैसला करना होगा—सिकंदर की यादों में जीना है या हमारे साथ रहना है अगर इतना ही प्यार है... उस हरामी से... तो साफ साफ बोल दो.. मै तुम्हे तलाक दे दूंगा...


---

अलिना सन्न रह गई।

"क्या सच में इतनी पराई हो गई हूँ सिकंदर के लिए?"

"क्या सच में मेरे अपने ही मुझे सिकंदर का नाम लेने से रोक रहे हैं?" नहीं नहीं.... हसन नाराज़ हो रहा है.... मै भी पागल हूँ.. पाता नहीं बार बार क्यों उसकी यादो मै खो जाती हूँ...


---



पर उसके दिल के जख़्म अब और भी गहरे हो चुके थे।



पुरानी दिल्ली की सँकरी गलियों में धूल उड़ रही थी। सिकंदर और राहिल एक पुराने, जर्जर मकान के सामने खड़े थे। मकान की दीवारों पर वक्त की मार साफ़ दिख रही थी—उखड़ी हुई पेंटिंग, जगह-जगह जाले, और दरवाज़े पर जंग लगी हुई जंजीर। सिकंदर की नज़रें बेचैनी से दरवाज़े पर जमी थीं।

राहिल ने सिगरेट का एक लंबा कश लिया और सिकंदर की तरफ देखा, "अबे, तू पक्का है? ये ही जगह है?"

सिकंदर की आँखें ठंडी थीं, जैसे बरसों की नफ़रत उसमें जम चुकी हो। उसने हल्के से सिर हिलाया, "हाँ... अब्दुल रहमान यहीं रहता था..."

राहिल ने होंठ भींच लिए, "अबे साले, तेरा तो खून खौलना चाहिए था उसका नाम सुनकर! वो हरामी जो तेरी माँ के साथ..."

सिकंदर ने हल्के से मुस्कुराते हुए राहिल की बात काटी, उसकी मुस्कुराहट में जहर घुला हुआ था। "अगर मैं अपने बाप की जगह होता, तो मैं भी उस हरामज़ादी के साथ यही करता..."

राहिल ने आँखें फाड़ दीं, "अबे! तू क्या बक रहा है, सिकंदर?"

सिकंदर ने जेब से एक सिगरेट निकाली, उसे उँगलियों में घुमाते हुए उसने कहा, "जो औरत एक आदमी के लिए अपने बेटे को छोड़ दे... उसे 'औरत' कहने का हक़ नहीं है। वो साली बस एक रंडी है, जिसे मेरे बाप ने इस्तेमाल किया और फेंक दिया... और जानता है सबसे मज़ेदार बात क्या है, राहिल?"

राहिल ने गहरी साँस ली, "क्या?"

सिकंदर ने सिगरेट को जलाया, हल्का सा धुआँ हवा में छोड़ते हुए कहा, "वो औरत अब भी मेरी माँ कहलाने का दावा करती है... लेकिन सच ये है कि मैंने उसे माँ मानना कब का छोड़ दिया।"साला मै किसी रंडी का बचा कैसे हो सकता हूँ.... उस साली के पाता नहीं कितने यार होंगे

राहिल का चेहरा तमतमा गया, "पर फिर भी... तू उस हरामी का नाम अपने नाम के आगे जोड़ रहा है?"

सिकंदर ने सिर झुका कर हंस दिया, "अबे नाम में क्या रखा है, राहिल? अब्दुल रहमान मेरा बाप था, चाहे जैसा भी था। लेकिन कम से कम, वो उस बदचलन औरत से ज़्यादा सच्चा था।"

राहिल गुस्से से अपनी सिगरेट ज़मीन पर फेंक देता है, "सिकंदर, तेरा दिमाग खराब हो गया है! तुझे नहीं पता कि ये नफरत तुझे अंदर से खा जाएगी!"

सिकंदर ने उसकी तरफ ठंडी नज़रों से देखा, "राहिल... ये नफरत नहीं है... ये सिर्फ इंसाफ़ है।"

और फिर, बिना कुछ कहे, सिकंदर दरवाजे की तरफ बढ़ गया।



पुरानी दिल्ली की धूल भरी गलियों में शाम ढल रही थी। सिकंदर और राहिल उस टूटे-फूटे मकान के बाहर खड़े थे, उनके सामने कुछ बूढ़े लोग बैठे हुक्का पी रहे थे। सिकंदर ने उनमें से एक से पूछा,

"अब्दुल रहमान... यहाँ रहता था, 20 साल पहले...

एक झुर्रीदार बुजुर्ग ने सिकंदर की तरफ देखा, आँखों में पुरानी यादों का बोझ था। "हाँ... नाम सुना है। बड़ा शराबी था... लेकिन दस साल पहले यहाँ से गायब हो गया। कोई कहता है दुबई भाग गया, कोई कहता है यहीं किसी गली में सड़ गया। पर हाँ, लड़का... उस आदमी के पीछे जाने की ज़रूरत नहीं। वो किस्मत से ज्यादा नसीब जलाने वाला था।"

राहिल - मियां पूरी बात बताओ

बुजुर्ग ने लंबा कश लिया और धीरे से कहा, कुछ अमीर लोग उसके पीछे पर गए थे... एक अमीर औरत. ने उसका
उसका जीना हराम कर रखा था.. उसी से पीछा छुराता हुवा यहाँ से चला गया...

सिकंदर ने ठंडी नज़रों से उन बूढ़ों को देखा और बिना कुछ कहे पलट गया।


---



सिकंदर और राहिल अपनी बाइक तक पहुँचे ही थे कि दोनों ठिठक गए।

"साला! बाइक कहाँ गई?" राहिल चिल्लाया।

गली में अंधेरा घिरने लगा था, लेकिन दूर एक मोड़ पर कुछ लड़कों की परछाइयाँ दिख रही थीं। बिल्ला —पुरानी दिल्ली का एक लोकल गुंडा—और उसके साथ दस और लड़के खड़े थे।

बीला ने एक सिगरेट जलाते हुए ठहाका लगाया, "अबे ओ राहिल मियाँ, अपनी बाइक ढूँढ रहे हो?"

राहिल गुस्से से आगे बढ़ा, "हरामी! बाइक वापस कर!"

बीला ने सिगरेट का धुआँ उड़ाया, "अबे ओ छोटे, ये दिल्ली है... यहाँ जो छिनता है, वो लौटता नहीं।"

सिकंदर अब तक चुपचाप खड़ा था, उसकी आँखें बिल्ला और उसके आदमियों को नाप रही थीं। वो सिर्फ़ दस थे... बस दस।

राहिल ने धीरे से कहा, "सिकंदर, साले बहुत हैं...चल भाई... बाद मे देखता हूँ इस हराम के औलाद को...

सिकंदर हल्का सा मुस्कुराया, "सिर्फ़ दस है....

राहिल - हाँ बे भोसरी के.... मे तो भूल ही गया था... तू तो marcos मे अपना गांड घिस कर आया है...





बीला के एक आदमी ने आगे बढ़कर सिकंदर पर वार करने के लिए चाकू निकाला, लेकिन उससे पहले ही सिकंदर का घूंसा उसकी जबड़े पर पड़ा—इतना तेज़ कि वो लड़का उल्टा गिरा और बेहोश हो गया!

"सालों! मारो इसे!" बीला चिल्लाया।

बाकी दस लोग सिकंदर और राहिल पर झपट पड़े। लेकिन सिकंदर कोई मामूली लड़का नहीं था... वो एक मर्कोस का सॉल्जर था!

पहला लड़का: उसने लोहे की रॉड उठाकर सिकंदर पर हमला किया, लेकिन सिकंदर ने रॉड को बीच में ही पकड़ लिया और उसे इतनी जोर से घुमाया कि लड़के का कंधा उखड़ गया!

दूसरा लड़का: उसने पीछे से हमला करने की कोशिश की, लेकिन सिकंदर झुका और उसे कोहनी मारकर ज़मीन पर गिरा दिया!

राहिल भी पीछे नहीं था, उसने एक लड़के का गला पकड़कर घुटना मारा और उसे सीधा दीवार से टकरा दिया!

बीला अब गुस्से में था। उसने पिस्तौल निकाली!

"अबे ओ बहुत हो गया, अब तो तेरा खेल ख़त्म!"

लेकिन सिकंदर मुस्कुराया, उसके पिस्टल को देखते हुवे बोला - बच्चे तेरा खिलौना छोटा है..

बीला ने गुस्से में ट्रिगर दबाया—लेकिन राहिल ने तेज़ी से एक पत्थर उठाकर बीला की कलाई पर दे मारा! पिस्तौल ज़मीन पर गिर गई!

सिकंदर ने बिना कोई मौका गँवाए, आगे बढ़कर बीला का गला पकड़ लिया और उसे दीवार से लगा दिया।

सिकंदर- बेटा मे एक राक्षस हूँ.... काट कर खा जाउगा....

बीला घबराकर हाँफने लगा, "स..सॉरी भाई!"

सिकंदर ने उसे छोड़ा और अपने हाथ झाड़ते हुए बाइक के पास गया।

"चल, राहिल! आज बहुत टाइम बर्बाद हो गया!"

राहिल हंसते हुए बाइक पर बैठा, "अबे सिकंदर, यहाँ तो लफड़ा हो गया बे..

सिकंदर ने हल्की मुस्कान दी

बाइक स्टार्ट हुई, और वो दोनों पुरानी दिल्ली की गलियों से बाहर निकल गए...

अलिना ने ऑफिस के दरवाज़े से अंदर कदम रखा, तो उसके चेहरे पर वही ठसक और आत्मविश्वास था, जो हर रोज़ होता था। उसकी ऊँची हील्स फर्श पर ठक-ठक की आवाज़ कर रही थीं, और हाथ में महँगा बैग झूल रहा था। जैसे ही उसने अपने केबिन का दरवाज़ा खोला, सामने उसका CEO और कुछ अन्य अफसर खड़े थे।

"मैम, आपको एक ज़रूरी बात बतानी थी," CEO ने हल्की घबराई हुई आवाज़ में कहा।

"क्या हुआ?" अलिना ने कुर्सी पर बैठते हुए तेज़ आवाज़ में पूछा।

CEO ने थोड़ा पानी पीकर गला साफ़ किया और कहा, "मैम, हमारे XYZ एरिया के जो प्लॉट्स थे... वहाँ झुग्गी-झोपड़ियाँ बस चुकी हैं।"

अलिना का चेहरा सख्त हो गया। उसने झटके से टेबल पर हाथ मारा, जिससे वहाँ रखी फाइलें हल्का-सा उछल गईं।

"झुग्गियाँ? वहाँ? वो मेरी प्रॉपर्टी है!"

CEO ने सिर झुका लिया। "जी, मैम, लेकिन वहाँ काफी गरीब लोग बस चुके हैं। वो खुद को वहाँ का असली हक़दार मानते हैं और हटने के लिए तैयार नहीं हैं। हमने कई बार समझाया, लेकिन..."

अलिना ने घूरते हुए कहा, "तो फिर पुलिस बुलाओ! बुलाओ प्रशासन को! ये सब गैरकानूनी कब्जा है, और मुझे अपनी प्रॉपर्टी वापस चाहिए!"

CEO ने गहरी साँस ली और थोड़ा पास आकर बोला, "मैम, पुलिस और प्रशासन गरीबों के साथ खड़े हो जाते हैं। आपको पता है, ये स्लम वाले अपने हक़ के लिए प्रदर्शन करते हैं, मीडिया इनके पीछे लग जाती है, और फिर सरकार इनका साथ देने लगती है। पुलिस को भेजकर भी कुछ हासिल नहीं होगा।"

अलिना की उँगलियाँ टेबल पर बजने लगीं। उसके माथे पर शिकन और गहरी हो गई।

"तो फिर क्या करना चाहिए?" उसने ठंडी आवाज़ में पूछा।

CEO थोड़ा मुस्कराया और बोला, "मैम, ऐसे मामलों में सीधा एक्शन लेना पड़ता है। अगर हम वहाँ लोकल लड़कों को भेजें, तो मामला जल्दी सुलझ सकता है।"

अलिना की आँखें सिकुड़ गईं। "लोकल लड़के?"

"जी, कुछ गुंडे जो इस काम में माहिर हैं। वो इन झुग्गी वालों को इस तरह से डराएँगे कि वो खुद ब खुद भाग जाएंगे। ना कोई FIR होगी, ना कोई केस। सब साफ़।"

अलिना चुपचाप कुछ सेकंड तक सोची, फिर धीरे से बोली, "नाम बताओ... कौन कर सकता है ये काम?"

CEO ने हल्की मुस्कान के साथ एक पर्ची उसकी तरफ़ बढ़ाई। "यहाँ कुछ नाम लिखे हैं, इनमें से किसी को भी हायर कर सकते हैं।"

अलिना ने पर्ची उठाई और पढ़ने लगी। उसकी उँगलियाँ धीरे-धीरे पर्ची पर फिसल रही थीं, और उसके चेहरे पर हल्की सख्ती और बढ़ रही थी।

फिर उसने धीरे से कहा, "ठीक है... काम हो जाना चाहिए... बिना किसी रुकावट के।"


---






अलिना ने मेज़ पर रखे ग्लास को धीरे से सरकाया और पर्ची को ध्यान से पढ़ने लगी। उसके चेहरे पर एक गहरी सोच की लकीरें उभरने लगीं। तभी CEO ने धीरे से उसकी ओर एक फाइल बढ़ाई।

"मैम, अगर हम सिर्फ उन झुग्गी वालों को हटाएँगे तो बाकी के ज़मीन मालिक सतर्क हो जाएँगे। लेकिन अगर हम... पूरे इलाके में डर फैला दें, तो ये सभी लोग अपनी ज़मीन औने-पौने दामों में हमें बेचने पर मजबूर हो जाएँगे।"

अलिना ने सिर उठाकर उसकी तरफ़ देखा। "क्या मतलब?"

CEO ने एक नक्शा खोला और टेबल पर फैलाया। "देखिए, ये पूरा इलाका देख रही हैं? ये ज़मीनें अलग-अलग लोगों के पास हैं, लेकिन अगर हम सही चाल चले, तो ये सारी ज़मीन हमारे हाथ में आ सकती है।"

अलिना ने नक्शे पर नज़रें दौड़ाईं। आस-पास के इलाकों में छोटे-बड़े कई प्लॉट्स थे, कुछ घर भी बने हुए थे। लेकिन उन सबके बीच में एक छोटी सोसाइटी थी


अलिना ने नक्शे पर उँगली रखी। "ये क्या है?"

CEO हल्के से मुस्कुराया, जैसे वो इसी सवाल का इंतज़ार कर रहा था। उसने अपने चश्मे को एडजस्ट किया और धीरे से बोला, "यही असली खेल है, मैम... ये सोसाइटी बहुत कीमती ज़मीन पर बनी है। अगर हम इसे भी अपने कंट्रोल में ले लें, तो इस पूरे इलाके की कीमत आसमान छूने लगेगी।"

अलिना चुपचाप नक्शे को देखती रही। उसे अच्छी तरह समझ आ रहा था कि CEO किस ओर इशारा कर रहा था। उसकी उँगलियाँ उस सोसाइटी के नाम पर जाकर ठहर गईं...

"तुम्हें लगता है कि ये मुमकिन है?" उसने धीरे से पूछा।

CEO ने नक्शे पर हल्का थपकी दी और कहा, "डर एक बहुत बड़ी ताकत होती है, मैम। लोग अपनी ज़मीन से प्यार करते हैं, लेकिन जब उनके सिर पर खतरा मंडराने लगता है, तो वो प्यार जल्द ही डर में बदल जाता है। और डर के आगे... सौदेबाज़ी आसान हो जाती है।"

अलिना ने एक गहरी साँस ली और कुर्सी पर पीछे टिक गई। "अगर ये हो गया... तो ये शहर में सबसे बड़ी डील होगी।"

CEO ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। "बिल्कुल, मैम। और इसमें आपको सिर्फ एक 'हाँ' कहनी है। बाकी हम संभाल लेंगे।"



उसने हल्के से नक्शे पर उँगली फेरी, और फिर धीरे से मुस्कुराई।

"कर दो शुरूआत..."


Bro हसन मिर्जा और अलिना ka divorce kab hoga

Hero Or अलिना ke beech romance ❤
 

buck

Member
231
208
43
अलीना अपनी महंगी गाड़ी से उतरी। हवेली जैसी उसकी कोठी सोने की तरह चमक रही थी, लेकिन अंदर का सूनापन किसी उजड़े हुए किले जैसा था।

"सलाम, बेगम साहिबा!"

गुलामों की झुकी हुई नज़रें, आदर में झुके हुए सर—सब कुछ वैसा ही था, जैसा अलीना ने अपने लिए चाहा था।

लेकिन फिर भी…

वो इस आलीशान घर में अकेली थी।

अलीना किसी से कुछ कहे बिना सीधे अपने कमरे में चली गई। उसने अपने जूते उतारे, अपने भारी दुपट्टे को बिस्तर पर फेंका और खुद भी थकान से बिस्तर पर गिर पड़ी।

छत पर उसकी नज़र टिक गई।

अचानक, अतीत के दरवाज़े खुल गए।


अलीना की आँखों में आँसू थे। उसके माँ-बाप के सामने वो गिड़गिड़ा रही थी।

"अमी, अब्बू… प्लीज़ समझने की कोशिश करो… मैं रहमान से बेइंतहा मोहब्बत करती हूँ!"

अब्बू की आँखें गुस्से से लाल थीं।

"चुप कर, अलीना! तू हमें शर्मिंदा कर रही है!"

अमी ने घबराई नज़रों से उसे देखा।

"बेटा, ये तुम क्या कह रही हो? रहमान हमारे बराबर का नहीं है! उसकी औक़ात कुछ भी नहीं!"

अलीना ने अपनी माँ की गोदी में सिर रख दिया, उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

"अमी, इश्क़ औक़ात नहीं देखता…! रहमान मुझसे सच्चा प्यार करता है!"

अब्बू ने गुस्से में ज़ोर से मेज़ पर हाथ मारा।

"और तूने उस नालायक के साथ अपनी ज़िंदगी बर्बाद करने की ठान ली? बता, तेरी गोद में जो बच्चा पल रहा है, वो किसका है?"

अलीना की आँखें डर से चौड़ी हो गईं।

उसने काँपते लहज़े में जवाब दिया—

"अब्बू… ये रहमान का बच्चा है… हमारा बच्चा।"

घर में सन्नाटा छा गया।

अब्बू का चेहरा गुस्से से लाल हो गया, और उन्होंने झटके से अलीना को पकड़ लिया।

"हरामज़ादी! तूने हमारी इज़्ज़त मिट्टी में मिला दी!"

अमी ने अब्बू का हाथ पकड़कर अलीना को छुड़ाया।

"खुदा के लिए, उसे मत मारो!"

अलीना फूट-फूटकर रोने लगी।

"अब्बू, अमी… मेरी मोहब्बत को ग़लत मत समझो… मैं रहमान के बिना मर जाऊँगी!"

अब्बू ने गुस्से से दरवाज़े की तरफ इशारा किया।

"अगर तू मिर्ज़ा से इतनी मोहब्बत करती है, तो निकल जा मेरे घर से! आज से तू हमारे लिए मर चुकी है!"

अलीना की दुनिया अंधेरे में डूब गई।

उसने अपनी माँ की ओर देखा, उम्मीद थी कि वो कुछ कहेंगी…

लेकिन अमी रोते हुए भी चुप थीं।

अब्बू का फैसला आखिरी था।

अलीना को अपना घर छोड़ना पड़ा… अपनी मोहब्बत के लिए

उसकी आँखों में एक भी आँसू नहीं था।

अब वो लड़की नहीं थी जो मोहब्बत के लिए गिड़गिड़ाती थी।

अब वो अलीना रहमान थी।

जिसने दुनिया से सिर्फ़ नफरत करना सीखा था।
इश्क़, धोखा और तबाही

अलीना जब रहमान के घर पहुँची, तो उसकी सांसें तेज़ हो गईं।

उसका दिल उम्मीदों से भरा था—

"मेरा रहनान ... मेरा प्यार... मेरी दुनिया... अब सब ठीक हो जाएगा..."

लेकिन जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला, उसकी रूह काँप गई।

रहामान... वो मर्द जिसे वो अपनी जान से भी ज़्यादा चाहती थी...

वो किसी और के साथ था!वो 'कोई और' कोई लड़की थी...



अलीना को एक झटका लगा। उसकी आँखें चौड़ी हो गईं, साँसें अटक गईं।

"रहमान ... ये क्या है?" उसकी आवाज़ काँपी।रहमान ने घबराकर पीछे देखा। उसकी आँखों में पहली बार डर था।

अलीना के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसकी दुनिया, उसकी मोहब्बत—सब झूठ था!

"तू... तू मुझसे धोखा कर रहा था?"
रहमान ने अपने कपड़े संभाले, और चेहरे पर एक ज़हरीली मुस्कान ले आया।

"अब जान गई तू? हाँ, मैंने तुझे धोखा दिया। लेकिन अब तू कुछ नहीं कर सकती।"

अलीना का खून खौल उठा।

"हरामज़ादे!" वो ज़ोर से चीखी और उस पर झपट पड़ी।

उसके हाथ रहमान के गले तक पहुँचते इससे पहले ही रहमान ने उसका हाथ पकड़ लिया और ज़ोर से धक्का दिया।

अलीना ज़मीन पर गिर पड़ी।रहमान उसकी ओर झुकते हुए हँसा।

"अब तुझे सब समझ आ गया ना? लेकिन बहुत देर हो चुकी है, अलीना..."

अलीना ने नफ़रत से उसे देखा।
रहमान आगे बढ़ा और फुसफुसाया—

"तेरे पेट में मेरा बच्चा है... अब तू दुनिया को क्या बताएगी?"

"क्या कहेगी सबको? कि अलीना ने शादी से पहले किसी का बच्चा पैदा किया?"

अलीना के होश उड़ गए।

रहमान उसकी आँखों में डर देख रहा था और उसे मज़ा आ रहा था।

"अब तुझे मुझसे शादी करनी ही पड़ेगी... नहीं तो दुनिया तुझे जीने नहीं देगी।"

अलीना ने अपने पेट पर हाथ रखा।

उसके अंदर एक ज़िन्दगी पल रही थी।

लेकिन...

"नहीं!"

अलीना के दिमाग में बस एक ही बात आई—

"मैं ना तुझे छोड़ूँगी और ना इस बच्चे को!"

उसने घृणा से रहमान को देखा।

"मैं अपने शरीर से तेरी हर निशानी मिटा दूँगी!"

रहमान उसकी आँखों में पागलपन देखा।

"तू... तू ऐसा नहीं कर सकती..." उसने पहली बार घबराकर कहा।

"देखना, मैं तेरा नामो-निशान मिटा दूँगी, मिर्ज़ा!"

अलीना उठी, अपने आँसू पोंछे, और वहाँ से तेज़ी से निकल गई।

उसने कसम खाई—

"अब मेरी ज़िन्दगी में कोई मोहब्बत नहीं होगी.

मनाली की ठंडी हवाएँ तेज़ी से दौड़ रही थीं। चारों ओर घना अंधेरा था।

सुनसान सड़क पर एक गाड़ी की हेडलाइट जल रही थी।

स्टेयरिंग पर झुकी अलीना, गहरी साँसें ले रही थी। उसकी आँखों में आँसू थे, होंठ काँप रहे थे।

रात के तीन बजे...

उसने अपना हाथ अपने पेट पर रखा। वहाँ एक नन्हीं जान थी, जो नफ़रत की आग में जल रही थी।

"सिकंदर..." उसकी आवाज़ टूट गई।

"तू सुन रहा है ना? तेरी माँ को कैसे बर्बाद किया गया?"

उसकी साँसें तेज़ हो गईं।

"तेरे बाप ने मेरी मोहब्बत को धोखा बना दिया। उसने मेरी इज़्ज़त को नीलाम कर दिया। उसने मेरे जिस्म से खेला... और अब, तू..."

उसकी आँखों में जंगली पागलपन था।

"मैं तेरी परछाई भी अपने साथ नहीं रख सकती!"

अचानक, उसने अपने पेट पर घूंसे बरसाने शुरू कर दिए।

"तुझे मरना होगा, सिकंदर!"

उसके होंठ कांपने लगे, लेकिन उसका हाथ नहीं रुका।

"तू इस दुनिया में नहीं आएगा! तुझे मैं अपने साथ नहीं घसीटूंगी!"

उसके चेहरे पर आँसुओं की धार थी, लेकिन उसका क्रोध ज़्यादा गहरा था।

वो ज़ोर से चीखी—

"मर जा सिकंदर... मर जा!!"

उसके हाथ झटके से रुक गए।

उसका शरीर काँप रहा था।

"क्यों नहीं मर रहा तू?"

उसकी आँखों में पागलपन का तूफान था।

अचानक, उसके पेट के अंदर हलचल हुई।

उसका दिल ज़ोर से धड़क उठा।

वो बुत बन गई।

"तू... तू जिंदा है?"

एक गहरी खामोशी छा गई।

उसने अपने पेट पर हाथ रखा... और फिर ज़ोर से रो पड़ी।

"तू मेरी कोख में जिंदा है, सिकंदर..."

उसने पहली बार महसूस किया कि वो एक माँ थी।

"पर मैं माँ नहीं बन सकती... मैं नहीं बन सकती..."****"नहीं!"

वो फिर से गाड़ी स्टार्ट करने लगी।

"इस बच्चे को खत्म करना होगा!"

उसकी आँखों में आँसू थे... लेकिन अब उसकी आँखों में एक और चीज़ थी—

, दर्द और नफ़रत का नशा।

तभी उसकी गारी एक पेड़ से टकरा गई

अस्पताल का सफ़ेद कमरा... धुंधली रोशनी... और अलीना की टूटी हुई साँसें।

उसकी पलकें भारी थीं, सिर दर्द से फटा जा रहा था। जैसे ही उसने आँखें खोलीं, एक अजीब सा सन्नाटा उसके कानों में गूंजा।

"अलीना... मेरी बच्ची!" उसकी माँ, फातिमा, रोती हुई उसके सिर पर हाथ फेर रही थीं।

अलीना की नज़र चारों ओर घूमी। उसके पिता, उसका भाई, उसकी भाभी... सब वहीं थे।

"ये... मैं कहाँ हूँ?" उसकी आवाज़ धीमी और कांपती हुई थी।

तभी डॉक्टर अंदर आया। उसके चेहरे पर एक गंभीर भाव था।

"मिस अलीना, आपको होश आ गया, ये बहुत अच्छी बात है।"

अलीना दर्द से कराह उठी, लेकिन अचानक उसे कुछ याद आया।

"मेरा... बच्चा?"

कमरा एक पल के लिए पूरी तरह खामोश हो गया।

डॉक्टर ने गहरी सांस ली।

"आपका बेटा... समय से पहले पैदा हुआ है। वह सिर्फ़ सात महीने का है, इसलिए उसकी हालत बहुत नाज़ुक है।"

अलीना की आँखों में जंगली बेचैनी थी।

"नहीं... नहीं, ये नहीं हो सकता!"

डॉक्टर की आवाज़ गहरी थी—

"मगर... उस बच्चे में जीने की ज़बरदस्त चाहत है, मिस अलीना। उसने दुनिया छोड़ने से इंकार कर दिया।"

अलीना का शरीर जम सा गया।

"क्या मतलब?"

"मतलब ये कि आपका बेटा मरना नहीं चाहता, मिस अलीना। उसने हार नहीं मानी। वह जीना चाहता है!"

अलीना का दिल ज़ोर से धड़क उठा।

"तू मेरी कोख में भी जिंदा रहना चाहता था... और अब भी?" उसकी आँखों में आँसू थे।

उसकी माँ ने उसका हाथ थामा।

"अलीना, ये अ23लाह का करिश्मा है। ये बच्चा तुझे सबक देने आया है।"

अलीना कांपते हुए बोली—

"मैंने उसे मारने की कोशिश की थी, अम्मी... मैंने उसे चाहा ही नहीं था... फिर भी वो ज़िंदा है?"

डॉक्टर की आवाज़ भारी थी—

"वो सिर्फ़ जिंदा नहीं है, मिस अलीना, वो लड़ रहा है।"

अलीना की आँखों से आँसू गिर पड़े।

"मैंने उसे कभी चाहा ही नहीं था..."

उसके पिता पहली बार बोले—

"मगर वो तुझे चाहता है, अलीना।"

कमरे में गहरी खामोशी छा गई।

अलीना की आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा।

उसने सिर्फ़ एक बात कही—

"मुझे... मेरे बेटे के पास ले चलो..."

और फिर उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

अस्पताल का आईसीयू… धीमी-धीमी बीप की आवाज़ें… मशीनों में उलझा हुआ एक नन्हा सा जिस्म…

सफ़ेद कपड़ों में लिपटा हुआ, कांच के पीछे रखा गया वह नन्हा सा बच्चा, जो अभी पूरी तरह इस दुनिया के लिए तैयार नहीं था। मगर फिर भी… उसकी छोटी-छोटी उंगलियाँ हर बार हिल रही थीं… उसकी नन्ही सी छाती मुश्किल से ऊपर-नीचे हो रही थी, मगर वह सांस लेना नहीं छोड़ रहा था।

"नहीं... नहीं, ये नहीं हो सकता!!" अलीना ने अपने बालों को मुट्ठी में भींच लिया।

उसके भीतर से अजीब सी बेचैनी उठने लगी।

"अम्मी, ये मर क्यों नहीं रहा?! इसको मरना चाहिए था, ना?! क्यों लड़ रहा है ये?!" उसकी आँखें लाल थीं, हाथ काँप रहे थे।

उसकी माँ ने डरते हुए उसे थामने की कोशिश की—

"अलीना, खुदा के लिए होश में आ!"

"नहीं अम्मी! ये बच्चा नहीं है! ये सज़ा है मेरी! ये याद दिलाने आया है कि मैं धोखा खा चुकी हूँ, कि मैं टूटी हुई हूँ! इसको मरना चाहिए था, अम्मी!! मर जाना चाहिए था!!!"

अलीना घुटनों के बल ज़मीन पर बैठ गई।

"अल23लाह.. अ**ल्ला जी, आप मुझसे इतनी नफरत क्यों करते हैं? मैंने इस बच्चे को अपनी कोख में मारने की कोशिश की थी, मैंने गाड़ी तेज़ चलाई थी ताकि ये दुनिया में ना आए… फिर भी इसने मुझे हरा दिया? फिर भी इसने जीने का फैसला किया? क्यों? क्यूं, अ**ल्लाह जी?!!"

नर्सें सहम गईं। डॉक्टर चुप हो गया। उसके पिता ने एक लंबी सांस ली, मगर बोले कुछ नहीं।

मगर आईसीयू के कांच के दूसरी तरफ़, वह बच्चा अपनी सांसों के लिए लड़ रहा था।

"देख रही हो, अलीना?" उसके पिता की आवाज़ भारी थी। "वो हार नहीं मान रहा।"

"मुझे इसकी ज़रूरत नहीं है!!!" अलीना ने ज़मीन पर हाथ मारा।

डॉक्टर ने धीरे से कहा—

"मगर इस बच्चे को तुम्हारी ज़रूरत है, मिस अलीना।"

एक पल के लिए सब खामोश हो गए।

अलीना की आँखों से आँसू बहने लगे।

"इसको मेरी नहीं… मेरी मौत की ज़रूरत थी…" वह फुसफुसाई।

तभी कांच के उस पार, वह नन्ही सी जान अपनी छोटी-छोटी मुट्ठियाँ हल्का सा हिला गई… जैसे वह कह रहा हो—

"नहीं अम्मी… मुझे तुम्हारी ज़रूरत है।"

अस्पताल के आईसीयू में दर्द और चीख़ों का साया था…

"नहीं… नहीं… ये नहीं हो सकता!!!"उस 18 साल की मासूम लड़की अलीना ने अपने सिर को दोनों हाथों से पकड़ लिया, उसकी आँखों में खून उतर आया था। उसके हलक से सिर्फ एक ही नाम निकल रहा था—

"सिकंदर…"

आईसीयू के कांच के उस पार, मशीनों से जुड़ा वह नन्हा सा बच्चा, साँसों के लिए लड़ रहा था… उसकी नाज़ुक पलकों के नीचे हल्की-हल्की नीली नसें झलक रही थीं… मगर वह हार मानने को तैयार नहीं था।

"नहीं… नहीं… सिकंदर को नहीं जीना चाहिए!!!"

अलीना ज़मीन पर घुटनों के बल गिर पड़ी, उसके हाथ काँप रहे थे, चेहरा आंसुओं से भीग चुका था।

"अ232लाह जी… सिकंदर को मार दो!!! मैंने इसको दुनिया में लाने का फैसला नहीं किया था! मैंने इसको अपनाने का इरादा नहीं किया था!! फिर भी क्यों, क्यों अ23लाह जी?!!!"

चारों तरफ़ सन्नाटा था… नर्सें चुप थीं… डॉक्टर चुप था… लेकिन उसकी चीखें पूरे अस्पताल में गूंज रही थीं।

"सिकंदर को मरना होगा, अ23लाह जी! सिकंदर को मरना चाहिए था!! इसको दुनिया में नहीं आना था!! अ23लाह जी, मेरी सुन लो!!! सिकंदर को खत्म कर दो, इसे खत्म कर दो!!!"

वह फर्श पर अपना सिर पटकने लगी। उसके नाखून खुद के ही हाथों में धंस चुके थे।

"मुझे इसकी सूरत नहीं देखनी, मुझे इसकी साँसों की आवाज़ नहीं सुननी! मुझे सिकंदर नहीं चाहिए!!!"

डॉक्टर ने नर्स की तरफ़ इशारा किया।

"इसका ब्लड प्रेशर खतरनाक तरीके से बढ़ रहा है… हमें इसे शांत करना होगा…"

नर्स ने कांपते हाथों से सिरिंज उठाई।

लेकिन अलीना अभी भी चीख़ रही थी।

"नहीं… नहीं… सिकंदर को खत्म कर दो!!! सिकंदर को जला दो, मिटा दो, मार दो!!! अल234लाह जी, मेरी सुन लो, मेरी सुन लो!!!"

अचानक, डॉक्टर ने उसके हाथ को पकड़कर उसे रोका और नर्स ने जल्दी से उसे बेहोशी का इंजेक्शन लगा दिया।

"नहीं… नहीं… सिकंदर… सिकंदर… सिक—"

उसकी आवाज़ धीमी होने लगी।

"सिकंदर… मर जाना चाहिए था… सिकंदर को…"

उसकी आँखें बंद हो गईं।

कमरे में अब सिर्फ मशीनों की बीप की आवाज़ थी।

आईसीयू के उस पार, नन्हा सिकंदर अभी भी साँसों की लड़ाई लड़ रहा था… और इस पार, उसकी माँ बेहोश पड़ी थी..... पर अब होस मे आ रही थी

अलिना की पलकें धीरे-धीरे खुलीं। बेहोशी की हालत से बाहर आते ही उसके दिमाग में एक भारीपन महसूस हुआ। उसके चारों तरफ सफेद दीवारें थीं, और हल्की-हल्की दवाइयों की गंध उसके नथुनों में घुस रही थी।

तभी एक नर्स ने उसके पास आकर कहा—
"मिस अलिना, आपको होश आ गया। डॉक्टर को बुलाती हूँ।"

अलिना ने कुछ नहीं कहा। उसका दिल बहुत धीमे-धीमे धड़क रहा था, जैसे किसी गहरे कुएं में गिरा हो।

तभी दरवाजा खुला और डॉक्टर अंदर आया। उसके हाथों में एक छोटा सा सफेद कपड़े में लिपटा हुआ नन्हा बच्चा था। वह बहुत ही नाजुक था, मानो उसकी सांसें अभी भी ज़िन्दगी से लड़ रही हों।

"आपका बेटा, मिस अलिना..." डॉक्टर ने धीरे से कहा और बच्चे को अलिना की ओर बढ़ाया।

अलिना ने घृणा से उसे देखा।

"मेरा बेटा? ये मेरा बेटा नहीं है..." उसकी आवाज़ सख्त थी, लेकिन उसमें कुछ टूटने की आहट थी।

उसकी अम्मी, जो वहीं पास खड़ी थीं, ने उसकी ओर देखा। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि सिर्फ दर्द था।

"अलिना, इसे गोद में लो... माँ बनो..."

अलिना का दिल काँपा। लेकिन अगले ही पल उसकी आँखों में वही नफरत लौट आई।

"नहीं! मैं इसे गोद में नहीं लूंगी... मैं इसकी माँ नहीं हूँ। एक माँ अपने बच्चे को प्यार करती है, और मैं इससे नफरत करती हूँ! मैं इसे दूध नहीं पिलाऊंगी!"

"अलिना!! ये क्या कह रही हो?" उसकी अम्मी की आँखों में आँसू आ गए।

अलिना की आँखें उस नन्हे बच्चे पर जमी हुई थीं। वह बहुत कमजोर था, लेकिन उसकी छोटी-छोटी मुठ्ठियां कसकर बंद थीं। वह जीना चाहता था।

अलिना कांप रही थी, लेकिन अपनी नफरत पर काबू रखते हुए बोली—

"मैं तुझे कभी अपना दूध नहीं पिलाऊंगी! एक माँ तुझे सीने से लगाकर तुझसे प्यार करती, लेकिन मैं तुझसे नफरत करती हूँ, सिकंदर!"

"तू नहीं जी पाएगा! तुझे नहीं जीना चाहिए! तेरा जन्म ही एक गलती था!"

बच्चे ने हल्की-सी करवट ली, उसकी साँसे तेज़ चल रही थीं। नर्स उसे अलिना की गोद में रखने लगी, लेकिन अलिना ने झटके से मुंह फेर लिया।

तभी उसकी अम्मी ने सख्ती से कहा—
"अगर तू इसे दूध नहीं पिलाएगी, तो ये मर जाएगा, अलिना!"

अलिना के दिल में एक झटका लगा।

मर जाएगा?

एक अजीब-सा दर्द उसके सीने में उठा। उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे। उसने कांपते हुए अपने हाथ बढ़ाए और बच्चे को गोद में ले लिया।

"क्यों आया तू मेरी ज़िन्दगी में...? क्यों नहीं मर गया तू वहीं, जहाँ तेरा जन्म हुआ था...?"

लेकिन बच्चा कुछ नहीं बोला। वह सिर्फ उसकी छाती से लग गया, और उसी पल अलिना का दिल तेज़ी से धड़क उठा।

"तू... तू जीना चाहता है? इतनी मजबूती से मेरी उंगलियां पकड़ रखी हैं तूने?"

उसके अंदर कहीं कोई दीवार गिर रही थी।

धीरे-धीरे उसने सिकंदर को अपने सीने से लगाया और कांपते हाथों से उसके मुँह से कपड़ा हटाया।

"मैं तुझे दूध नहीं पिलाऊंगी... नहीं पिलाऊंगी..."

लेकिन अगले ही पल उसकी ममता उसकी नफरत पर हावी हो गई।

अलिना ने रोते हुए अपने आँचल को ठीक किया और पहली बार सिकंदर को अपने दूध का एक बूंद पिलाया।

उसके आँसू उसके चेहरे से गिरते रहे, लेकिन उस छोटे से बच्चे ने जैसे अपनी माँ की नफरत को पी लिया हो।

सिकंदर ने हल्का-सा करवट बदला और धीरे-धीरे दूध पीने लगा। उसकी साँसे अब स्थिर हो रही थीं, जैसे वह अलिना के सीने से जुड़कर अपनी ज़िन्दगी की जंग जीत रहा हो।

"नफरत करती हूँ तुझसे... लेकिन फिर भी... तू मेरी ज़िन्दगी से जुड़ गया, सिकंदर..."

उस रात अलिना ने पहली बार एक माँ और एक औरत के बीच की जंग को महसूस किया।





अलिना ने सिकंदर को दूध पिलाया था, लेकिन उसका दिल अब भी भारी था। उसके अंदर जो नफरत पल रही थी, वह उस मासूम के स्पर्श से कांप उठी थी। क्या वो इस नफरत को ममता में बदलने देगी? या फिर ये बस एक पल की कमजोरी थी?

उसके आँसू लगातार गिर रहे थे, लेकिन उसने उन्हें पोंछने की कोशिश नहीं की। उसका दिल धड़क रहा था, पर दिमाग शोर मचा रहा था—

"ये वही बच्चा है, जो तेरी जिंदगी बर्बाद कर देगा।"

"ये वही बच्चा है, जो तुझे याद दिलाएगा कि तुझे कैसे धोखा मिला था।"

"ये तेरा दुश्मन है, अलिना।"

लेकिन उसके सीने से लगा सिकंदर एक मासूम जान था। उसके छोटे-छोटे हाथ उसकी उंगलियों को पकड़ने की कोशिश कर रहे थे, जैसे वो अपनी माँ को अपनी दुनिया बना लेना चाहता हो।

अलिना ने जल्दी से उसे नर्स को वापस सौंप दिया।

"इसे ले जाओ।" उसकी आवाज़ में ठंडापन था।

"लेकिन मैम, ये अभी बहुत कमजोर है। इसकी माँ को इसके पास रहना चाहिए।" नर्स ने हिम्मत करके कहा।

अलिना ने गहरी सांस ली और नर्स को घूरते हुए कहा—
"इसकी माँ मर चुकी है।"

"लेकिन मैम..."

"मैंने कहा, इसे ले जाओ।"

नर्स घबरा गई और जल्दी से सिकंदर को लेकर चली गई।

अलिना की अम्मी ने उसकी ओर देखा। उनके चेहरे पर नाराजगी, दुःख और दर्द था।

"तू क्यों इतनी पत्थर दिल हो गई है, अलिना?"

अलिना हँस पड़ी, लेकिन उसकी हँसी में दर्द था।

"पत्थर दिल? अम्मी, मेरी ज़िन्दगी में जब प्यार था, तब आपने मुझे घर से निकाल दिया था। जब मैं गिरी, तो कोई नहीं था उठाने वाला। जब मुझे सहारे की ज़रूरत थी, तब मैंने खुद को संभाला। और अब, जब मैं पत्थर बन गई हूँ, तो आप पूछ रही हैं क्यों?"

उसकी अम्मी की आँखें भीग गईं।

"बेटा, सिकंदर तेरा बेटा है। तू चाहे जितना नफरत कर ले, लेकिन एक दिन तुझे एहसास होगा कि ये बच्चा तेरी जान है..."

अलिना ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया।

लेकिन सच तो ये था कि उसके दिल में जो जंग चल रही थी, वो अभी खत्म नहीं हुई थी।



इसी बीच, सिकंदर को ICU में ले जाया गया। वो बहुत कमजोर था। डॉक्टर लगातार उसकी स्थिति को मॉनिटर कर रहे थे।

एक डॉक्टर ने धीरे से कहा—
"ये बच्चा जिंदा रहने की पूरी कोशिश कर रहा है। इसे शायद एहसास है कि इसे अपनी माँ के लिए जीना होगा।"

"लेकिन अगर इसे माँ का प्यार नहीं मिला, तो ये ज्यादा दिनों तक नहीं टिकेगा..." दूसरे डॉक्टर ने कहा।

छोटे-छोटे तारों से जुड़ा हुआ, ऑक्सीजन मास्क से सांसें लेते हुए सिकंदर इस दुनिया में अपनी जगह बना लेना चाहता था।

और शायद... किसी दिन वो अपनी माँ के पत्थर दिल को पिघला देगा।




आईसीयू के कमरे में सन्नाटा था। मॉनिटर पर सिकंदर की नाज़ुक धड़कनें धीमी होती जा रही थीं। डॉक्टरों ने उसे बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन एक माँ के दूध के बिना वो कब तक जिंदा रह सकता था?

"हम...हम उसे नहीं बचा पाए।" डॉक्टर ने गहरी सांस लेते हुए कहा।

अलिना के परिवार वालों ने एक-दूसरे को देखा। उनके चेहरों पर दुःख था, लेकिन उनके लिए अलिना ज़्यादा अज़ीज़ थी।

अलिना के चेहरे पर कुछ पल के लिए एक अजीब-सी शांति आई। उसके दिल में एक अजीब-सा सुकून उतरा। "ख़त्म हो गया सब।"

लेकिन अगले ही पल, जैसे ही उसने सिकंदर के छोटे-छोटे ठंडे हाथों को देखा, उसका दिल किसी ने मुट्ठी में जकड़ लिया।

"सिकंदर...?" उसकी आवाज़ में कंपन था।

उसने धीरे से सिकंदर के नन्हें जिस्म को अपनी गोद में उठाया। एक निःशब्द झटका उसकी आत्मा को लगा।

"चला गया तू...?" उसकी आवाज़ कांप रही थी, "जा मेरे शहज़ादे, जा... वहाँ अ232लाह के पास मेरा इंतजार करना। जब मैं आउंगी, फिर माँ तेरे पास हमेशा-हमेशा के लिए रहेगी..."

उसके आँसू सिकंदर की बंद पलकों पर गिर रहे थे। उसे लग रहा था जैसे सिकंदर उससे कुछ कह रहा हो।

"माँ... मैं तुझे इस दुनिया से बचाने आया था... मैंने अपनी पूरी जान लगा दी माँ... ताकि मैं तेरे ज़ख्मों पर मरहम लगाने के क़ाबिल बन सकूँ... पर तूने ही मेरे साथ धोखा किया..."

अलिना का पूरा शरीर सिहर उठा। उसकी सिसकियाँ पूरे कमरे में गूंज रही थीं।

"तेरा सिकंदर अब हार मानता है, माँ..."

अलिना की साँसें तेज़ हो गईं। "नहीं, नहीं... ये सच नहीं हो सकता!"

वो पागलों की तरह सिकंदर का चेहरा देखने लगी। अचानक, उसने महसूस किया कि सिकंदर की पलकों में हल्की-सी हरकत हुई।

"डॉक्टर!" वो चीख पड़ी, "ये ज़िंदा है! सिकंदर ज़िंदा है!"

कमरे में अफरातफरी मच गई। डॉक्टर तुरंत दौड़ पड़े।

"लेकिन ये कैसे हो सकता है?" एक नर्स ने हैरानी से कहा।

"ममता... माँ की ममता ने इसे वापस बुला लिया।" डॉक्टर ने गहरी सांस लेते हुए कहा।

अलिना की आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। अब वो हार मानने लगी थी— अपने ही बेटे से।

अब उसे समझ आ चुका था... नफ़रत और दर्द जितना भी गहरा क्यों न हो, ममता हमेशा उससे जीत जाती है।



डॉक्टरों की पूरी टीम दौड़ पड़ी। सिकंदर को ऑक्सीजन सपोर्ट पर डाला गया। उसकी नन्हीं-नन्हीं साँसें अभी भी लड़ रही थीं, जैसे किसी ने उसे वापस बुला लिया हो।

अलिना की आँखें सिकंदर के चेहरे पर टिकी थीं। "ये कैसे हो सकता है?" उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।

डॉक्टर ने सिकंदर की जाँच की और चौंकते हुए कहा, "ये किसी चमत्कार से कम नहीं! बच्चे के शरीर में अभी भी जान बाकी है। जल्दी से इसे आईसीयू में शिफ्ट करो!"

अलिना वहीं ज़मीन पर गिर पड़ी। उसका पूरा शरीर काँप रहा था।

"नहीं! इसे मर जाना चाहिए था... ये ज़िंदा क्यों है?" उसकी आवाज़ कांप रही थी, "अ323लाह, तूने इसे वापस क्यों भेज दिया?"

लेकिन उसकी आँखों से गिरते आँसू कुछ और ही बयां कर रहे थे।

"बेटा... तूने इतनी कोशिश की जीने की?"

"तेरी माँ ही तेरा क़त्ल करने चली थी और तू फिर भी इस दुनिया में आना चाहता था?"

"क्यों? आखिर क्यों सिकंदर?"

उसके अंदर एक अजीब-सी जंग छिड़ चुकी थी।

उसने सिकंदर को अपनी गोद में उठाया। उसकी नन्हीं उंगलियाँ अब भी ठंडी थीं।

"जा मेरे शहज़ादे... अगर तू जिंदा रहना चाहता है तो जी ले... मैं तुझे अब नहीं रोकूंगी।"

उसी वक़्त सिकंदर की हल्की-हल्की साँसे चलने लगीं। नर्सें उसे आईसीयू में लेकर भागीं।

"अलिना, अब भी वक़्त है!" उसकी अम्मी ने कहा, "तू माँ बन जा। सिकंदर तेरा है!"

लेकिन अलिना अभी भी लड़ रही थी— अपने अंदर की नफ़रत से, अपनी ही ममता से।

अब सवाल ये था— क्या वो सच में सिकंदर को अपनाने के लिए तैयार थी?
Nice writing skills
 
🔥 Read Next Hot Story →
Discover more exclusive stories
Top