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Incest Mukkader ka sikander

buck

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Jabardast flash back
भाई स्टोरी का रिव्युव दो... जल्दी जल्दी मे अपडेट तब दूंगा जब आप को स्टोरी पसंद आएगी हुए..
सो पलज़्ज़ज़ दो लाइन कम से कम जरूर लिखना...इस से मुझे मोटिवेशन मिलती है स्टोरी को लिखने की


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रात के तक़रीबन दस बज चुके हैं… मोहल्ले के बीचों-बीच धरना जारी है… लोग जोश में नारे लगा रहे हैं…

“हम अपना हक़ लेकर रहेंगे!”
“बिल्डर-माफिया मुर्दाबाद!”

लोगों की भीड़ को जोया लीड कर रही है — पर इस उबाल और जोश से दूर…

पर सिकंदर के कमरे मे...अंधेरे की चुप्पी में, सिकंदर अकेला लेटा था।

कमरे में उजाला सिर्फ एक पुराना सा रेडियो कर रहा है… और उस रेडियो पर एक उदास, रूह तक चीर देने वाला गाना चल रहा है…

“याद... याद... याद...
बस याद रह जाती हैं…” (गाने की आवाज़ धीमे धीमे कमरे में भरती जाती है…)

सिकंदर की आँखें छत पर जमी हैं… लेकिन उनमें कोई रंग, कोई रौशनी नहीं बची…

आज उसका जन्मदिन है।

पर कोई मोमबत्ती नहीं, कोई केक नहीं, कोई 'हैप्पी बर्थडे बेटा' नहीं...

आज वो दिन नहीं जिस दिन वो पैदा हुआ था…
आज वो दिन है जब वो पहली बार उसने जाना था बेहोसी क्या होती है... कैसा लगता है जब कोई भूख प्यास से बेहोस होकर गिर परता है... कैसा लगता है जब किसी के टांगे कापने लगती है कमज़ोरी के मारे.. कैसा लगता है जब कोई भूखे पेट... बोरियां उठाता है... कैसा लगता है... अपनी माँ से दुथकारे जाने पर...


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फ़्लैश बैक


सुबह का वक्त…
अलीना, गुस्से में पागल होकर, सीढ़ियों से नीचे उतरती है।

अलीना (कड़क आवाज़ में):
"आज तुझे सज़ा मिलेगी, हरामजादे अब तू मेरे अलमारी से पैसे चुराने लगा... दिन व दिन तेरे करतूत बढ़ते जा रहे है.... कल ही साहबज़ ने मुझे बोला था... तू स्कूल मे लड़ाईयां करने लगा है और अब चोरी.... वो तो सुकर है सहबाज ने तुझे पैसे चुराते देख लिया नहीं तो मे बेचारे उन नौकरो पर इलज़ाम लगाती...

सिकंदर अपने हारा हुवा चेहरा लिए अपनी माँ के आंखों मे देख रहा था.... वो सायद उन आंखों मे कुछ ढूंढ़ रहा था.. पर वो उसे मिल नहीं रहा था... उसने अलीना से कुछ नहीं कहा.... कुछ कहने का कोई फ़ायदा नहीं था... अब अलीना ने उसके दिल का हाल जाना छोड़ दिया था.. अब अलीना ने उसे पराया कर दिया था

आज न तुझे खाना मिलेगा, न पानी… और पूरे दिन नौकरों के साथ बर्तन मांजेगा और जो काम नौकर करते है वो तुझे करना होगा.. यही तेरी सजा है... अलीना अपने तरफ से सिकंदर को सुधार रही थी.. पर उस बेवकूफ औरत क्या पता था की सहबाज कैसे उस से खेल रहा है.... उसके सिकंदर को उस से दूर करता जा रहा है...




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सिकंदर की आंखें लाल हैं, जिस्म पर धूल है, हाथों में छाले हैं... और दिल में एक जला हुआ कोना।

सुबह से शाम हो चुकी है… लेकिन उसके पेट में एक दाना तक नहीं गया।
प्यास से होठ सूख चुके हैं, सांसों में थकावट की भारी चुप्पी है।

हवेली के बड़े से किचन में आज भी उसकी जगह नहीं थी…
उसकी थाली आज भी खाली थी…

नौकर लोग, जिन्हें वो पहले नाम से बुलाता था… आज उसी को हुक्म सुना रहे थे।



सिकंदर, बिना कोई जवाब दिए, बस सर झुकाकर काम करता रहा…
जैसे उसे किसी सवाल का हक़ ही नहीं…

उसका गला सूख रहा था… लेकिन कोई एक ग्लास पानी तक नहीं पूछता…

वो बर्तन मांजते-मांजते, किसी कोने में जाकर कभी थोड़ी देर आँखें मूँद लेता… फिर उठ कर दोबारा लग जाता…
उसकी कमर झुकती जा रही थी, कंधे जवाब दे रहे थे, पर किसी ने पूछा तक नहीं –
"तू ठीक है?"

कभी वो ही सिकंदर था जो हवेली के हर काम में सबसे आगे होता था…
पर आज किसी के लिए वो बस एक सज़ायाफ्ता नौकर था।


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एक शानदार, बड़ी-बड़ी शीशे की खिड़कियों वाला ऑफिस…
जहाँ अलीना एक कॉन्फ्रेंस कॉल में बिज़ी है।

अलीना (प्रोफेशनल अंदाज़ में):
"Yes, Mr. Qureshi. Finalize the deal. I don’t want any more delays."

मीटिंग खत्म होती है… वो लैपटॉप बंद करती है…
एक गहरी सांस लेती है और अपनी कुर्सी से उठकर स्ट्रेच करती है।




उसका ध्यान पास टंगे कैलेंडर पर चला जाता है…

और जैसे ही उसकी निगाह उस तारीख पर जाती है —

"10 अप्रैल" —



अलीना (धीरे से फुसफुसाती है):
"10 अप्रैल...? आज... आज सिकंदर का जन्मदिन है…"

वो घरी मे समय देकती है तो 5 बज रहे थे... वो जल्दी से अपना पर्स उठाती है और ऑफिस से बाहर निकलती है रास्ते से वो एक केक और कुछ बल्लोंन और एक प्यारा सा खेलना.. लेती है.. सायद ये सिकंदर का गिफ्ट था.. अलीना अब तक नहीं समझीथी की उसके लाडले को खेलोना नहीं उकसा प्यार चाहिए...





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सिकंदर की हालत अब काबू से बाहर जा चुकी थी।
पेट खाली… होंठ सूखे… जिस्म काँपता हुआ… आँखों में गहराती अंधेरी थकावट.,.. उसके पैर काँप रहे थे.. क्यों की घुटनो मे जान नहीं बची थी...

हर सांस जैसे एक बोझ बन चुकी थी…
हर कदम जैसे पत्थर का हो गया था…

वो किसी तरह दीवार पकड़ कर अपने कमरे के दरवाज़े तक पहुँचता है…
दरवाज़ा भी ठीक से नहीं खोल पाता… और बेसुध होकर अंदर गिर जाता है।

ठक्..!
एक भारी आवाज़ होती है —
उसका जिस्म फर्श से टकराता है। पर मासूम के पास कोई नहीं था... जो उसे सहारा दे सके.. सायद आज उस खु*दा के आँखों मे भी आंसू आये होंगे... सायद इस लिए वो सिकंदर को अपने पास बुला लेना चाहता था..

सिकंदर अब बेहोश था … एकदम चुप… बर्फ की तरह ठंडा…

उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था, होंठ नीले, हाथ-पैर थमे हुए से…

कपड़ों में मिट्टी लगी थी, चेहरे पर थकान की दरारें थे...और दिल में अधूरी उम्मीद की खामोशी।


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दूसरी तरफ – हवेली का बड़ा दरवाज़ा खुलता है…

अलीना, एक सजाया हुआ केक हाथ में लिए, अपने पूरे परिवार के साथ अंदर दाखिल होती है…

साथ में उसका भाई, भाभी, अम्मी और अब्बू भी हैं।
सबके चेहरों पर मुस्कान है… शायद आज वो ‘एक सरप्राइज़’ देने आए हैं…

अलीना (हल्की मुस्कराहट के साथ):
"आज उसे हँसते हुए देखूंगी..... अलीना बहुत ख़ुश थी...

जैसे ही सब सिकंदर के कमरे के पास पहुंचते हैं…

दरवाज़ा अधखुला पड़ा है… और अंदर घुप्प अंधेरा।

अलीना धीरे से अंदर झांकती है…

और अगले ही पल — उसकी चीख हवेली में गूंज उठती है…

अलीना (दहशत में):
"सिकंदर…!!!"

उसके हाथ से केक गिर जाता है…
फर्श पर "Happy Birthday लिखे शब्द भी टूट जाते हैं… जैसे उनकी तरह रिश्तों का वहम भी टूट जाता है…

अलीना दौड़कर उसके पास आती है… उसका चेहरा अपनी गोद में रख लेती है…

अलीना (थरथराती हुई):
"उठ ना … उठ … देख … अम्मी आई है… देख … अम्मी के साथ सब आए हैं…" क्या हुवा तुझे बाबू..

अम्मी, अब्बू, सब चौंक कर पास आ जाते हैं…

भाई (हक्का-बक्का):
"यार… ये तो… इसका जिस्म तो बर्फ की तरह ठंडा है…!"

भाभी (रोते हुए):
"हाय अल्ला**ह… ये क्या हो गया…?"(ये अभी अभी अपने मायके से आयी थी)

अलीना अब उसके गालों पर थपकियाँ देती है… पर कोई हरकत नहीं…हर पल के साथ अलीना की रूह उसके जिस्म को छोड़ रही थी... वो आज पहली बार अपने जिगर के टुकड़े को बेहोस देख रही थी...



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अलीना ज़मीन पर बैठी सिकंदर का सिर अपनी गोद में रखे पागलों की तरह रुदन करने लगती है।
उसके हाथ कांप रहे थे… चेहरा सूजा हुआ… और दिल ऐसे धड़क रहा था जैसे किसी ने उस पर हथौड़े मार दिए हों।

तभी पीछे से हसन मिर्ज़ा और साहबाज कमरे में घबराकर दाखिल होते हैं।

हसन मिर्ज़ा (दहशत में):
"ये… ये क्या हुआ उसे…?!"

अलीना (टूटती आवाज़ में):
"पता नहीं … क्या हुवा है मेरे बच्चे को कैसे बेहोस हो गया..… कुछ बोल ही नहीं रहा…"

हसन मिर्ज़ा फोन उठाते हैं और डॉक्टर को कॉल करते हैं —
"डॉक्टर साहब… जल्दी आइए…मेरा बेटा बेहोष हो गया है… हालत बहुत ख़राब है…"

तभी कुछ नौकर-चाकर कमरे में आ जाते हैं। हसन मिर्ज़ा उन्हें घूरते हैं —
"किसी को कुछ पता है ये क्या हुआ इसे?!"

एक बूढ़ा नौकर धीरे से बोल पड़ता है —
"बीबी जी… सुबह आपने ही तो कहा था कि छोटे उस्ताद को आज ना खाना देना है… ना पानी… और पूरे घर का काम करवाना है… शायद उसी से… अचेत हो गए होंगे …"

बस…!! जैसे किसी ने अलीना के सीने में आग लगा दी हो…वो सह नहीं पायी की उसके बेटे की ये हालत उसकी वजह से हुवी है...वो अपना सुध वुद्ध खो बैठती है.. और जोर से चिल्लाती है....या अल्ला56हहहहहहहहहहह

उसके दिल मानो फट गया हो...
वो धीरे-धीरे उस नौकर की ओर मुड़ती है…
उसकी आँखों में अब आँसू नहीं —
अब उसमें माँ की टूटी हुई आत्मा थी…

और फिर…

अलीना चीख पड़ती है —
क्या कहा तूने... सुबह से इसने कुछ नहीं खाया... तुम लोगों ने मेरे बच्चे को सुबह से भूखा रखा.... पुरे दिन मेरा बचा भूखे प्यासे काम करता रहा... अल्ला22ह.....सुबह से इसके पेट मे एक दाना तक नहीं गया...

अलीना (गुस्से से कांपती हुई):
हरामजादे.... मेरे बेटे को भूखा रखा तूने...

अलीना नौकर पर झपट पड़ती है…
उसे गंदी-गंदी गालियाँ देने लगती है…

"कमीने... साले हरामखोर...हराम के जाने.... निकल यहाँ से...
तुझे अगर मेरी एक भी बात समझ नहीं आई थी तो पूछ लेता…
पर तुझे क्या… मेरा बच्चा तेरा कौन सा अपना था …क्या जाता तेरा अगर उसे एक रोटी दे देता…!!!"

सिक्न्दर को अपने सीने से लगा कर... उठ जा सिकंदर मेरे लाल... अम्मी तुझे ऐसे नहीं देख सकती.. देख अगर तू नहीं उठा तो तेरी अम्मी की जान निकल जयेगी.... नहीं देख सकती तुझे ऐसे... ए मेरे खुदा... मेरे लाल को लोटा दे मुझे...




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हवेली – रात

डॉक्टर आ चुके हैं।
सिकंदर को ड्रिप पर लगाया गया है।
डॉक्टर ने चेकअप के बाद हसन मिर्ज़ा को देखा और कहा:

डॉक्टर (नरम लहज़े में):
“ये तो साफ़ है कि बच्चा बहुत ज़्यादा कमज़ोर हो चुका है…
शरीर में पानी की भारी कमी है…
लंबे समय तक कुछ ना खाना, थकावट और भावनात्मक दबाव… यही वजह है बेहोशी की।”

डॉक्टर रुकते हैं, फिर अलीना की ओर देखते हैं…
“पर सच बताऊँ… ये सिर्फ़ जिस्मानी कमजोरी नहीं है…
इसे सदमा लगा है... आप लोग इसके आस पास ज्यादा से ज्यादा समय बिताएं

डॉक्टर चला जाता है। कमरे में फिर से सन्नाटा छा जाता है।

अलीना सिकंदर के सिरहाने बैठी है।
उसके सामने उसका वही बेटा, जो कभी उसका आँचल पकड़कर चलता था, अब बिस्तर पर बेहोश पड़ा है…
या शायद होश में होते हुए भी इस दुनिया से बेग़ाना।

अलीना (धीरे से उसके हाथ को थामती है):
“सिकंदर… बेटा… उठ जा… देख मैं तेरे पास हूँ…
मैंने बहुत गलती की है… पर अब मैं तुझे छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी…”

पर सिकंदर की पलकें हल्की सी हिलती हैं, वो आँख खोलता है…
पर उसमें कोई जज़्बात नहीं होते।

वो उठकर बैठता है… बिना कुछ कहे…

अलीना:
“कुछ तो बोल… गुस्सा कर… डाँट ले मुझे…
पर ऐसे चुप मत रह बेटा… तुझसे ये खामोशी नहीं देखी जाती…”

समय बीतने लगा सिकंदर अब किसी से बात नहीं करता था.. अलीना उसकी आवाज़ सुनने के लिए तरश गई थी... अब उसे सिकंदर की ख़ामोशी खाने लगी थी... वो औफिस से आती और सिकंदर के आगे पीछे गहने लगती.. पर वो बच्चा अब बिखर चूका था... सायद उसने ऐसा कुछ देख लिया था जो उसे नहीं देखनी चाहिए थी...



वही दुसरी तरफ... साहबाज अब अपनी हदें पार करने लगा था... वो अब अलीना से अकेले मे या सिकंदर के सामने गन्दी बातें करने लगा था.. अलीना के दिमाग मे हसन मिर्ज़ा ने भर दिया था की सहबाज से प्यारा और समझदार बचा इस दुनयाँ मे नहीं है... वो सहबाज के सवालों को उसकी मासूमयत समझती थी.. उसे लगता था की सहबाज को बचपन से ही माँ का प्यार नहीं मिला इस लिए वो मुझमे अपनी माँ को ढूंढ़ रहा है...
सहबाज उसे गलत तरीके से छूता.. पर वो उसको उसका प्यार समझती... या फिर उसे भी मज़ा आ रहा था.. ये तो रब जनता है....पर ये बात पक्की थी अलीना उसे मना नहीं करती थी....

एक दिन ऑफिस जाने से पहले अलीना सिकंदर को उसके कमरे मे मिलने आई.. उसके पीछे सहबाज भी था...अलीना ने सिकंदर को गले लगाया पर सिकंदर का वही ठंढा वार्ताब... फिर सहबाज आकर अलीना के गले लग जाता है.. वो अलीना के स्थन को हाथ लगता है अलीना उसे हटाने या डाठने के वजाहय उसके तरह मुस्कुराते हुवे देख रही थी वी ये भी भूल गई थी की सिकंदर भी उनके साथ खरा है...

सहबाज - अम्मी आपने वादा किया है.. की आप ऑफिस से आकर मुझे दुधु पिलाओगी... मेने कभी दुधु नहीं पिया है..

अलीना ( उसके बालों मे हाथ फेरते हुवे ) - पक्का वादा.. मेरा बच्चे को अम्मी की दुधु पिने का मन कर रहा है.. आज पक्का... उनके बातों से जाहिर था.. ये पहली बार नहीं हुवा है... हाँ पहली बार सिकंदर के सामने जरूर हुवा था...

तभी अलीना को आहसास होता है सिकंदर भी वही है.. वो सहबाज को अपने दे दूर करते है और आँखों से ईसारा करती है... सहबाज उसके इसारे को समझ जाता है.. और मुस्कुराते हुवे कमरे से चले जाता है... सिकंदर ये देख कर दंग रह जाता है.. अलीना उसके चेहरे को पेड़ चुकी थे.. वो समझ गई की सिकंदर को ये अच्छा नहीं लगा पर ये बेवकूफ़ औरत को लग रहा था की सिकंदर को सहबाज दे जलन हो रही है इस लिए उसका चेहरा उतर गया है.... खैर अत्तित का पन्नों पर पूर्ण विराम लगता है और सिकंदर खुद को अपने कमरे मे पाता है... उसके आँखों से आंसू की बुँदे टपक रही थी...



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| शाम का समय हो गया था| मोहल्ले के बीचों-बीच धरना | माहौल भावुक और खामोश बगावत से भरा हुआ]

कमरे की बत्तियां बुझी हुई थीं। बस एक कोने में रखा पुराना रेडियो चल रहा था, जिसकी धीमी आवाज़ में वही गाना गूंज रहा था:

"याद... याद... याद बस यादें रह जाती हैं..."

सिकंदर अब बिस्तर पर नहीं था।

सिकंदर काले कुर्ते-पायजामे में तैयार हो चुका था। उसका चेहरा शांत था… लेकिन आंखों में एक ठहरा हुआ दर्द, एक ठहरी हुई आग साफ़ झलक रही थी।

वो अपना इत्र लगाता है, , फिर खामोशी से कमरे का दरवाज़ा खोलकर बाहर निकलता है।

बाहर का दृश्य:

धरने की भीड़ में हलचल थी। लोग “इंसाफ़ दो, इंसाफ़ दो!” के नारे लगा रहे थे। ज़ोया मंच के पास खड़ी थी। रुक्सार और अली भी वहीं थे। तभी सबकी नजर सामने से आते सिकंदर पर पड़ी।

उसका चेहरा थका हुआ था, लेकिन चाल में एक अलग ही ठहराव था।

रुक्सार उसे पास बुला कर बोली बोली:

रुक्सार: “सिकंदर बेटा… कहां जा रहे हो इस वक़्त?”

सिकंदर (धीमी आवाज़ में, बहुत शांत लहजे में):
"दुआ करने… जमा मस्जिद जा रहा हूं।"

ज़ोया उसे पलभर तक देखती रही।। वो बिना कुछ कहे उसके पास आई।

ज़ोया (धीरे से):
“मुझे भी ले चलो… मैं भी दुआ मांगना चाहती हूँ.. अपने और इन लोगों की सलामती के लिए..

सिकंदर उसकी तरफ एक पल देखता रहा… फिर बिना कुछ कहे मोटरसाइकिल की चाबी निकलता है।



ज़ोया जल्दी से अपना दुपट्टा ठीक करती है। अली कुछ कहने ही वाला होता है लेकिन रुक्सार उसे आंखों से रोक देती है।

ज़ोया और सिकंदर, दोनों बिना कुछ बोले, बाइक पर सवार हो जाते हैं। सिकंदर बाइक स्टार्ट करता है। ज़ोया उसकी पीठ से हल्के से टिक जाती है।

बाइक धीरे-धीरे चल पड़ती है… मोहल्ले के रास्तों से गुजरते हुए… धरने के नारों के बीच… उस पुरानी, जानी-पहचानी मगर अब अजनबी हो चुकी अहसास के साथ


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हवेली का ड्राइंग रूम | रात का समय | सब लोग साथ बैठे हैं

हवेली में गर्मा-गर्म चाय के साथ सब बैठकर बातें कर रहे थे। हँसी-मज़ाक चल रहा था। भाभियाँ हल्की-फुल्की चुहल कर रही थीं। सहबाज सोफे पर पसरा था, और अम्मी साइड में बैठी हुई थीं।

अचानक, माहौल में हल्की-सी चुप्पी आ गई जब अलिना की भाभी से अम्मी ने यूँ ही पूछ लिया:

अम्मी:
"बहु, दोपहर में तुम कहां गई थीं? नजर ही नहीं आईं पूरे दिन..."

भाभी ने धीरे से मुस्कुराते हुए जवाब दिया:

भाभी:
"अम्मी… मस्जिद गई थी… दुआ करने। आज सिकंदर का जनमदिन था ना। अब किसी को याद रहे या न रहे, मैं तो उसे बहुत चाहती थी, बहुत… उसकी हर बात, हर आदत… सब याद है मुझे। मैं उसके जनमदिन को कैसे भूल सकती हूं?"

ये शब्द, एक तीर की तरह जाकर अलिना के सीने में धँस गए। जैसे किसी ने उसकी माँ होने की हैसियत पर तमाचा मार दिया हो।

– वो चुप है… उसकी नज़रें झुकी हुई हैं।

उसका हाथ काँप रहा था। दिल की धड़कनें तेज़ हो गई थीं। उसके कानों में सिर्फ भाभी के वो शब्द गूंज रहे थे –
"मैं उसके जनमदिन को कैसे भूल सकती हूं…"

अचानक, अलिना उठती है। हड़बड़ाहट में चाय का कप गिर जाता है, कोई कुछ पूछता उससे पहले ही वो अपने बैग की तरफ लपकती है, चाबी उठाती है और दरवाज़े की तरफ बढ़ती है।

सब चौंकते हैं। सहबाज पूछता है:
"अरे अम्मी कहां जा रही हैं इस वक़्त?"

अलिना -
"मुझे कुछ याद आ गया है… बहुत जरूरी है जाना।"


कार के अंदर | अलिना ड्राइव करते हुए | आँखों में आंसू
सड़क पर उसकी गाड़ी तेज़ चल रही थी… लेकिन उसका मन उससे भी तेज़ भाग रहा था… पीछे की तरफ, अतीत की ओर।

अलिना (अपने आप से):
"कैसे भूल गई मैं… कैसे… आज उसका जनमदिन था…







"मुझे तुझसे कुछ नहीं चाहिए मेरे खुदा… बस एक बार… एक बार मेरी औलाद मुझे देखे… शायद मुझे माफ़ कर दे… या कम से कम मेरी आँखों में देख कर नफ़रत ही कर ले… पर कुछ तो कहे… कुछ तो सुने…" अगर वो मुझे मारे पीटे... जो चाहे वो करें बस एक आकर मुझे देख ले...



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[सीन शुरू – ज़ामा मस्जिद के बाहर की गलियाँ | रात का वक्त]

अलिना अपनी कार से उतरती है। आसमान में हल्की सी ठंडक है, गीली मिट्टी की खुशबू फैली हुई है। मस्जिद के आसपास की तंग गलियाँ पीली लाइटों से जगमगा रही हैं। लोग इधर-उधर जा रहे हैं, बच्चे खेल रहे हैं, कुछ दुकानदार अपनी दुकानें समेट रहे हैं।

(कैमरा अलिना के चेहरे पर – उदासी और बेचैनी साफ झलक रही है।)

वो धीरे-धीरे मस्जिद की तरफ बढ़ती है, हील की हल्की-हल्की आवाज़ पत्थर की गलियों में गूंज रही है।


तभी... सामने से एक काले लिवास में एक लंबा, बेहद खूबसूरत जवान आता है… उसके घुंघराले बाल हवा में उड़ रहे होते हैं… नीली आंखें, चेहरे पर ग़ैरमामूली सुकून… रौब ऐसा कि भीड़ अपने आप रास्ता दे रही हो।

अलिना का दिल एक पल के लिए रुक जाता है… सांसें थम जाती हैं…

(धीरे से फुसफुसाती है):
"सिकंदर…?"

वो वहीं थम जाती है। नज़रों को यकीन नहीं होता… उस लड़के के चेहरे में कुछ था… कुछ जाना-पहचाना… जो सीधा उसके दिल से जुड़ता था।

वो बिना अलिना की तरफ देखे आगे बढ़ता है, और भीड़ में खो जाता है

अलिना एक झटके से पीछे मुड़ती है… उसकी नज़रों ने उसे ढूंढना चाहा… लेकिन…

(हल्की सी सिसकी लेती है):
"कहां चला गया…? क्या मेरा वहम था…?"

वो खुद को समझाती है, पर आंखें उस भीड़ में भटक रही होती हैं… शायद दिल अब भी उम्मीद में था कि एक बार फिर वो चेहरा दिख जाए।



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अलीना दुवा करके महज़ीद से बाहर आती है तभी उसके फोन पर कल आता है....मुस्ता क़ कालिंग...

अलीना फ़ोन उठाते हुवे...- हाँ मुस्ता क़ साहब बोलिए..

CEO - मैडम गजब हो गया... सहबाज बाबू को किसी ने बहुत मारा है... वही राहिल के लोग थे..सर पर रोड लेकर मारा है हालत बहुत नाजुक है...

Conti
 

Akash18

Magic You Looking For Is In The Work You Avoiding
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Bhai story bahut hi badiya hai or apki writing skills ka to kya hi kahna yr padte hue esa lagta hai jese samne movie hi chal rhi hai
 

Hamantstar666

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Bhai story bahut hi badiya hai or apki writing skills ka to kya hi kahna yr padte hue esa lagta hai jese samne movie hi chal rhi hai
सुक्रिया मेरे दोस्त.... Btw तुम्हे क्या लगता है.. अलीना कैसी औरत है... क्या वो बदचलन है?
 

Akash18

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सुक्रिया मेरे दोस्त.... Btw तुम्हे क्या लगता है.. अलीना कैसी औरत है... क्या वो बदचलन है?
[/QUOTE
भाई अलीना बदचलन तो नहीं लेकिन नासमझ और लापरवाह औरत जरूर है, वो जो सिकंदर के सामने दूध पीने वाला सीन है उसे देखते हुए तो यही लगता है। बाकी वो एक क्रूर औरत भी लगी मुझे क्योंकि उसने जो सिकंदर के साथ किया उसका उसे गिल्ट है बाकी जो भी उसने गलत किया अपने बिजनेस के लिए दूसरे लोगों के साथ उसका उसे कोई गिल्ट नहीं।
 
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