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Erotica फागुन के दिन चार

komaalrani

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फागुन के दिन चार

भाग ४९ -हाल बनारस का -सोनल और तैयारी दुष्ट दमन की ४८४

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Premkumar65

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भाग ३२ - आपरेशन गुंजा + +

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मैं जमीन पे गिरा था, उसके पैरों के पास। गुड्डी से जो मैंने बाल वाला कांटा लिया था और उसने मजाक में मेरे बालों में खोंस दिया था, मेरे हाथ में था।

खच्च। खच्च। खच्च। दो बार दायें पैर में एक बार बायें पैर में।



वो आदमी लड़खड़ाकर गिर पड़ा।

उठते हुये मैंने उसके दायें हाथ की मेन आर्टरी में, पूरी ताकत से कांटा चुभोया और खून छल-छल बहने लगा। निकलते-निकलते मैंने देखा कि एक मोबाइल फर्श पे गिरा है। मैंने उसे तुरन्त उठा लिया और कमरे के बाहर।

उसी समय एक आँसू गैस का शेल खिड़की तोड़ता हुआ कमरे में।

20 मिनट हो चुका था। मुझे 5 मिनट में बाहर निकलकर आल क्लियर का मेसेज देना था, वरना कमांडो अन्दर। लेकिन ज्यादा तुरन्त की समस्या ये थी, ये दोनों पीछा तो करेंगे ही कैसे उसे कम से कम 5-10 मिनट के लिये डिले किया जाय।

दरवाजा बन्द करके मैंने टूटा हुआ ताला उसमें लटका दिया- ऐडवांटेज एक मिनट।

मैंने गुड्डी से जो चूड़ियां ली थी, सीढ़ी की उल्टी डायरेक्शन में मैंने बिखरा दी और कुछ एक कमरे के सामने। अगर वो कन्फुज हुये तो- ऐडवांटेज दो मिनट।



मैं वापस दौड़ता हुआ सीढ़ी की ओर। तीनों लड़कियां सीढ़ी के पार खड़ी थी।

दोनों लड़कियां, डरी सहमी, सीढ़ीा के दरवाजे के पीछे चिपकी, दीवाल से सटी, कातर हिरणी की तरह, देख रही थीं। डर के मारे उनका चेहरा अभी भी सफ़ेद था, और गुंजा के पास पहुँचते ही, दोनों ने गुंजा के हाथ को कस के पकड़ लिया और जहाँ से गुंजा आयी थी, जहाँ तीनो अभी पल भर पहले बॉम्ब के ऊपर बैठायी गयी थीं, बस उधर ही देख रही थीं।

चुम्मन की पहले गरजती हुयी आवाज, ' “लड़कियां कहां गईं?” देख जायेंगी कहां? यहीं कहीं होगीं, ढूँढ़ जल्दी…” उन्होंने सुनी थी और दहस गयी थीं, और फिर जो मैंने कांटा चुभोया चुम्मन के पैर में तो उसकी हलकी सी चीख भी सुनी, लेकिन वो जानती थीं, खतरा टला नहीं है, बॉम्ब अभी भी क्लास में लगा है और चुम्मन को पता चल गया है की वो सब क्लास से बच के निकल भागी हैं।

मुझे देख के गुंजा ने कस के दोनों लड़कियों का हाथ कस के दबा दिया और डरी हुयी भी उसके चेहरे पे एक छोटी सी, नन्ही सी मुस्कान दौड़ गयी।

लेकिन डर मैं भी रहा था,

चुम्मन से भी और उस से ज्यादा होने वाले कमांडो हमले से। और चुम्मन को जो मैंने पल भर के लिए देखा था, मान गया था मैं, जबरदस्त किलर इंस्टिंक्ट, पावर पैक्ड, और अँधेरे में भी गजब का निशाना। लाइटर की हिलती डुलती रौशनी में भी अगर मैंने पालक झपकते कस के गुंजा को अपने नीचे दबोचा नहीं होता और पूरी तरह अपनी देह से छाप नहीं लिया होता, पक्का वो चाक़ू, गुंजा के दिल में पैबस्त होता। देह से चिपकी टाइट जींस, टाइट टी शर्ट में उसकी एक मसल्स साफ़ साफ़ झलक रही थीं, मैंने उसके एक पैर और हाथ में जो काँटा एकदम आर्टरी में चुभोया था, दूसरा होता तो उसका एक हाथ पैर बेकार हो चुका होता, लेकिन मैं जानता था की बस थोड़ी देर अरे वो हम लोगों के पीछे होगा।

चुम्मन जानता था की उसका पूरा प्रोटेक्शन वो तीनों लड़कियां हैं और जब तक लड़कियां उसके कब्जे में है, कोई शायद ही गोली चलाये, और वो निगोशिएट कर सकता है, लेकिन अगर लड़कियां एक बार निकल गयीं तो डी बी से ज्यादा सिद्द्की की जो अबतक छप्पन वाली रेपुटेशन थी, उसका बचना मुश्किल था, इसलिए मैं जानता था की वो कुछ भी कर के तीनो लड़कियों को पकड़ने की फिर से कोशिश करेगा, और उसकी दोनों फूली जेबों से मुझे अंदाज लग गया था की उसके एक जेब में कट्टा नहीं रिवाल्वर है और दूसरी में बॉम्ब का रिमोट। और एक दो चाक़ू तो जरूर और उसने रख रखा होगा,

इसलिए उसका लड़कियों से सामना होना जरूरी नहीं है, बस एक बार विजुअल कांटेक्ट हो जाए, फिर तो जिस फुर्ती से उसने चाक़ू गुंजा के ऊपर अँधेरे में फेंका था, कोई न कोई लड़की या मैं चाक़ू का शिकार का बनता, और उसके बाद बाकी लड़कियां भी पकड़ी जातीं,

और जो डाइवरसन टूटे ताले और चूड़ियों से मैंने किया था वो भी बहुत देर तक टिकने वाला नहीं था, तो उसकी नजर में आने के पहले हम सब को निकल लेने में ही भलाई थी।

लेकिन चुमन से कम खतरा कमांडो से नहीं था। जिस तरह जब हम लोग कमरे से निकले उसके पहले आंसू गैस का गोला खिड़की तोड़ते हुए आया, ये साफ़ था की अब पांच मिनट के अंदर खिड़की से कमांडो घुस सकते हैं, लेकिन उन्हें मेरे बारे में कुछ पता नहीं है और लड़कियों के पास मुझे देख के हो सकता है कोई शाप शूटर गोली चला दे।

इसलिए बस किसी तरह जल्द से जल्द मुझे इन तीनो लड़कियों के साथ बाहर निकल लेना था, लेकिन अब दो बातें थी। एक तो चढ़ते समय गुंजा और उसकी सहेलियों की बचाने की बात थी, और एड्रिनेलिन पूरी तेजी पर था, लेकिन अब एक बार मिशन हो जाने के बाद वो बात नहीं रहती, और दूसरे खुद को हैंडल करना अकेले आसान होता है, लेकिन साथ में तीन लड़कियां हो और उनकी जान पर भी बनी हो तो खतरा तीन गुना ज्यादा बढ़ जाता है।



एक बार मैंने उन तीनो को देखा, गुंजा दोनों के बीच में, और गुंजा का हाथ दोनों कस के पकडे थीं, जैसे मेले की भीड़ में बच्चे माँ का हाथ कस के पकडे रहते हैं, कहीं बिछुड़ ना जाएँ और गुंजा ने मेरी ओर इशारा करके कुछ कहा तो उन दोनों डरे हुए चेहरों पर एक कमजोर सी मजबूर मुस्कान छा गयी।

एक लड़की जो सबसे पहले बेंच पर से उठी थी, और जिसके कान में गुंजा ने अभी कुछ बोला था, कुछ मुझसे, कुछ अपनी सहेलियों से बोली - “चलें नीचे?”



मैंने कहा- “अभी नहीं…” और सीढ़ी का दरवाजा बन्द कर दिया।

पीछे से जोर-जोर से दरवाजा खड़खड़ाने की आवाज आ रही थी।

मैंने बोला- “ये जो कापियों का बन्डल रखा है ना उसे उठा-उठाकर यहां रखो…”



वो बोली- “मेरा नाम महक है। महक दीप…”

मैंने कहा- “मुझे मालूम है। लेकिन प्लीज जरा जल्दी…” और जल्दी-जल्दी कापियों से जो बैरीकेडिंग हो सकती थी किया।

तीसरी लड़की से मैंने रस्सी के लिये इशारा किया और उसने हाथ बढ़ाकर रस्सी पास कर दी। ऊपर की सिटकिनी से बोल्ट तक फिर एक क्रास बनाते हुये। बीच में जो भी टूटी कुर्सियां, फर्नीचर सब कुछ, कम से कम 5-6 मिनट तक इसे होल्ड करना चाहिये।

ये दरवाजा हमारा पहला प्रोटेक्शन था, कितना भी कमजोर क्यों न हो, लेकिन कुछ तो था।



सीढ़ी पर अँधेरा था, जाले, कबाड़, और एक दो टूटी सीढ़ी और हम चार लोगों को उतर के नीचे के दरवाजे तक पहुंचना था, तो तीन चार मिनट तो लगना ही था और अगर तब तक कहीं चुम्मन इस सीढ़ी के छत वाले दरवाजे पर अपने चमचे के साथ पहुँच जाता तो, उसे सीढ़ी से नीचे उतरना भी नहीं है। मैं अँधेरे में चुम्मन के चाक़ू का निशाना देख चुका था और यहाँ तो हम सब की पीठ उस की ओर होती तो बचने का कोई चांस नहीं था।



बस मुझे मालूम था, की जो मैंने चुम्मन के पैरों में काँटा चुभोया था, उसका एक फायदा तो होगा की पैर से मार के अब वो ये दरवाजा आसानी से नहीं तोड़ पायेगा, और थोड़ा भी बैरकेडिंग में ताकत होगी तो हम लोगों को निचले दरवाजे तक पहुँचने का टाइम मिल जाएगा।

तीसरी लड़की से न मैंने नाम पूछा था न उसने बताया, लेकिन बिन बताये, मुझे पता चल गया था की वो शाज़िया है, एक मामले में मेरी गुंजा के कान काटती और एक मामले में गुंजा को टक्कर देती। सुबह से कितनी बार तो गुंजा उसका गुणगान कर चुकी थी, गाली देने में और होली में मस्ती में सिर्फ अकेली शाज़िया थी जो गुंजा के भी कान काटती थी और फागुन लगते ही उसकी होली शुरू हो जाती थी, और ' बिग बी ( बिग बूब्स ) के मामले में वो दोनों अपने से बड़ी दर्जा दस वालियों को भी पीछे छोड़ देती थीं, हंसती तो गालों में गड्ढे पड़ते, बड़ी बड़ी कजरारी आँखे, खूब लम्बे बाल, गुंजा के बूब्स पर जो दसो उँगलियों के निशान थे वो शाज़िया के ही थे।

लेकिन इस समय सब हंसी खिलंदरा पन गायब था, डर अभी भी उसके चेहरे पर था, पर धीरे धीरे मेरे साथ डर कम होता जा रहा था और रस्सी लगाने, पूरी सीढ़ी पर से टूटे फूटे कबाड़ ला के रस्सी से बाँध के बैरिकेड को स्ट्रांग करने में वो मेरे साथ लगी थी, और गुंजा और महक पुरानी कापियों के बंडल को एक के ऊपर रख के उस को सपोर्ट दे रही थीं।



दो तीन मिनट के अंदर हम लोगों ने सीढ़ी के ऊपर वाले दरवाजे को अच्छी तरह से ब्लाक कर दिया और फिर नीचे की ओर।
Superb update.
 

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खतरा
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तब तक दो बार पैरों से मारने की और फिर धड़ाम की आवाज आई। जिस कमरे में इन्हें होस्टेज बनाकर रखा था, और जिसे मैंने बाहर से बन्द कर दिया था, टूटा ताला लटका कर।

उसका दरवाजा टूट गया था।

मैंने तीनों से बोला- “भागो नीचे। सम्हलकर। चौथी सीढ़ी टूटी है। 11वीं के ऊपर छत नीची है…”

महक ने उतरते हुये जवाब दिया- “मालूम है मालूम है। स्कूल बंक करने का फायदा…”

दौड़ते हुये कदमों की आवाज, सीधे सीढ़ी के दरवाजे की ओर से आ रही थी।

मेरा चूड़ी वाली ट्रिक फेल हो गई थी। मेरे दिमाग की बत्ती जली, जो मेरा खून गिर रहा होगा। अन्धेरे में उससे अच्छा ट्रेल क्या मिलेगा। और कम से कम दो तीन मिनट का टाइम अब कम था हम लोगों के पास, गुंजा के क्लास से निकलने के बाद सीढ़ी वाला दरवाजा बरामदे के कोने में ही तो था इसलिए अब किसी भी पल


और वही हुआ। हमारे नीचे पहुँचने से पहले ही सीढ़ी के दरवाजे पे हमला शुरू हो गया था।

इसका मतलब कि अब दोनों साथ थे, जिसके पैर में मैंने कांटा चुभोया था उसके पैर में इतनी ताकत तो होगी नहीं,

की अकेले वो पैर के धक्के से मारकर दरवाजा खोल सके, दोनों एक साथ जोर लगा रहे थे, भड़ भड़ भड़ भड़,

लेकिन शाज़िया और महक की मेहनत का नतीजा जो बैरिकेड हमने बनाया था वो टिका था, वो टिका था, वरना अब तक वो दरवाजा टूट चुका होता। कुंडे में इतनी ताकत नहीं थी की उसे रोक सकता,



लड़कियां एक बार फिर घबड़ा रही थीं, वो भी जानती थीं, जहाँ वो सीढ़ी का दरवाजा खुला, वहीँ,


चुम्मन की जोर की आवाज, गालियां, और एक बार फिर सहम कर के सब सीढ़ी के किनारे खड़ी, नीचे का दरवाजा अभी भी दूर था, पंद्रह बीस सीढियाँ बाकी थीं, और उस भड़भड़ाहट से कापियों के एक दो बंडल लुढ़कते हुए सीढयों पर गिरने लगे,

सीढ़ियों पर एकदम अँधेरा था, ऊपर से जाले, एक दो सीढियाँ बीच में टूटी, और गिरते बंडलों से और मुसीबत हो रही थी फिर टाइम भी निकल रहा था,

चलो, एक एक की लाइन में, मैंने हलके से बोला, सबसे आगे गुंजा, सबसे पीछे मैं और तभी


…. गोली की आवाज।

गोली से वो दरवाजे का बोल्ट तोड़ने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन मुझे ये डर था की कहीं वो इन लड़कियों को ना लग जाये।

मैंने बोला- “पीठ दीवाल से सटाकर चुपचाप…”

एक के बाद एक धांय धांय

सब लाइन में खड़े हो गये। दिवाल से चिपक के और अगले ही पल अगली गोली वहीं से गुजरी जहां हम दो पल पहले थे। वो जाकर सामने वाले दरवाजे में पैबस्त हो गई।



सबसे आगे गुंजा थी, पीछे वो दूसरी लड़की और सबसे अन्त में महक और मैं, एक दूसरे का हाथ पकड़े। गोली की आवाज सुनकर महक कांप गई और उसने कसकर मेरा हाथ भींच लिया और मैंने भी उसी तरह जवाब में उसका हाथ दबा दिया।

महक मुझे देखकर मुश्कुरा दी, और मैं भी मुश्कुरा दिया।

खतरा दोहरा था, एक तो गोली लगने का, दूसरा, गोली छत पर, सीढ़ी की दूसरी दीवार पर लग के जो टकराएगी तो वहां से वापस आ के भी घायल कर सकती थी, और फिर हम रुक भी नहीं सकते थे, दरवाजा अगर ऊपर वाला खुल जाता तो हम सबका बचना मुश्किल था। मैं देख चुका था उस की किलर इंस्टिक्ट, जिस तरह से उसने गुंजा पर चाक़ू चलाया था जो मैंने रोका, वो सीधे गोली चलाता और किसी न किसी का निशाना बनना तय था। इसलिए किसी भी हालत में दरवाजे के खुलने के पहले निचले दरवाजे तक उन चलती गोलियों के बीच पहुंचना जरुरी था। तीनो एक बार फिर डर से सफ़ेद हो गयीं थी, दीवाल में चिपकी, धीरे धीरे सरकते हुए एक एक सीढ़ी उतरते हुए और फिर जब किसी गोली की आवाज आती, कोई गोली सनसनाती हुयी किसी की बगल से निकलती तो एक बार फिर सबकी रूह काँप जाती,

बम से बचे लेकिन गोलियों से कहीं,....

हम सब अपनी पीठ दीवाल से चिपकाए,

अब हम लोग सीढ़ी के नीचे वाले हिस्से में थे, जहां निचले दरवाजे से छनकर रोशनी आ रही थी। मुझे देखकर महक मीठी-मीठी मुश्कुराती रही और मैं भी। इत्ती प्यारी सुन्दर कुड़ी मुश्कुराये और कोई रिस्पान्स ना दे? गुनाह है।

तब तक महक की निगाह मेरे हाथ पे पड़ी वो चीखी- “उईईई… कितना खून?”



अब मेरी नजर भी हाथ पर पड़ी। मैं इतना तो जानता था की चोट हड्डी में नहीं है वरना हाथ काम के लायक नहीं रहता। लेकिन खून लगातार बह रहा था। मेरी बांह और बायीं साईड की शर्ट खून से लाल हो गई थी।

महक ने अपना सफेद दुपट्टा निकाला और एक झटके में फाड़ दिया। और आधा दुपट्टा मेरी चोट पे बांध दिया। खून अभी भी रिस रहा था लेकिन बहना बहुत कम हो गया था।



तब तक दुबारा गोली की आवाज और मैंने महक को खींचकर अपनी ओर। अचानक मैंने रियलाइज किया की मेरे हाथ उसके रूई के फाहे ऐसे उभार पे थे। मैंने झट से हाथ हटा लिया और बोला- “सारी…”



महक ने एक बार फिर मेरा हाथ खींचकर वहीं रख लिया और बोली- “किस बात की सारी? नो थैन्क नो सारी। वी आर फ्रेन्डस…”



मैंने मोबाइल की ओर देखा। सिर्फ दो मिनट बचे थे। अगर मैंने आल क्लियर ना दिया तो इसी रास्ते से मिलेट्री कमान्डो और हम लोग क्रास फायर में। नेटवर्क अभी भी गायब था।

सिर्फ चार सिढ़ियां बची थी। दीवाल से पीठ सटाये-सटाये। हम नीचे उतरे।



ऊपर से जो गोलियां चली थी, उससे नीचे सीढ़ी के दरवाजे में अनेक छेद हो गये थे। काफी रोशनी अंदर आ रही थी। पहली बार हम लोगों ने चैन की सांस ली, और पहली बार हम चारों ने एक दूसरे को देखा।



महक ने अपनी नीली-नीली आँखें नचाकर कहा- “आप हो कौन जी? इत्ते हैन्डसम पुलिस में तो होते नहीं। मिलेट्री में। लेकिन ना पिस्तौल ना बन्दूक…”



गुंजा आगे बढ़कर आई- “मेरे जीजू है यार। जीजू ये है, …”

“महक…” उसनेदुबारा अपना नाम बताया खुद हाथ बढ़ाया और मैंने हाथ मिला लिया।

“मैं शाज़िया…” तीसरी लड़की बोली और अबकी मैंने हाथ बढ़ाया।

महक ने हँसकर कहा- “हे तेरे जीजू तो मेरे भी जीजू…” शाज़िया बोली- “और मेरे भी…”



“एकदम…” गुंजा बोली- “लेकिन आपको ये कैसे पता चला की मैं यहां फँसी हूँ?”



“अरे यार सालियों को जीजा के अलावा और कहीं फँसने की इजाजत नहीं है…” मैंने कसकर महक और गुंजा को दबाते हुये कहा।



मैं बात उन सबसे कर रहा था, लेकिन मेरी निगाह बार-बार ऊपर और नीचे के दरवाजों पे दौड़ रही थी। मुझे ये डर लग रहा था की अभी तो हम सब दिवाल से सटे खड़े हैं। लेकिन जब हम नीचे वाले दरवाजे पे खड़े होंगे अगर उस समय उन सबों ने गोली चलाई, तो हमारी पीठ उनकी ओर होगी। बहुत मुश्किल हो जायेगी। मैं इसलिये टाइम पास कर रहा था की। ऊपर से वो दोनों क्या करते हैं। मुझे एक तरकीब सूझी। कुछ रिस्क तो लेना ही था।



मैं- “तुम तीनों इसी तरह दीवार से चिपक के खड़ी रहो…” और मैं झुक के नीचे वाले दरवाजे के पास गया और ऊपर की ओर देख रहा था।



महक ने आह्ह… भरी- “काश इस निगोड़ी दीवाल की जगह ऐसे हैन्डसम जीजू के साथ सटकर खड़ा होना पड़ता…”



गुंजा बोली- “अरी सालियों वो मौका भी आयेगा। ज्यादा उतावली ना हो…”

एक मिनट तक जब कुछ नहीं हुआ तो मुझे लग गया कि कम से कम अब वो ऊपर दरवाजे के पीछे नहीं हैं।लग रहा था की उसके रिवाल्वर की या तो गोलियां खतम हो गयी हैं या फिर वो दरवाजे के बोल्ट को तोड़ने का कोई और जुगाड़ करने गया है। गोलियां बंद हो गयीं थीं, बस अब हम सबको जल्द से जल्द नीचे का दरवाजा खोल के बाहर निकल लेना था।



मैंने मुड़कर दरवाजे को खोलने की कोशिश की। वो नहीं खुला।-मैंने तो दरवाजा बन्द नहीं किया था। नीचे झुक के एक छेद से मैंने देखने की कोशिश की। तो देखा की बाहर एक ताला लटक रहा
था।
Ek ke baad ek musibat.
 

Premkumar65

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कंट्रोल रूम, गुड्डी, ताला

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कन्ट्रोल रूम के सामने ही वो मोबाईल, पुलिस की गाड़ी का ड्राईवर मिला, जिसे मैंने नीचे रहने को बोला था, दरवाजे के सामने और जिससे कोई दरवाजा ना बन्द कर सके। और वो यहाँ… किसी तरह से मैंने अपने गुस्से को कन्ट्रोल किया।

मैंने ठन्डी आवाज में पूछा- “क्यों कहां चले गये थे तुम?”

वो बोला- “क्यों? मैं तो यहीं था साहब। वहां कोई नहीं मिला क्या आपको…”

मैं चुप रहा।

ड्राईवर ने सफाई दी-

“आपके जाने के दो-चार मिनट के बाद सी॰ओ॰ साहेब, अरिमर्दन सिंह साहब आये थे। उन्होंने मुझसे पूछा- “तू यहां क्यो खड़ा है? मैंने बोला की साहब ने बोला है। फिर मैंने उन्हें सारी बातें बता दी। वो बोले की ठीक है, मैं यहां दो आर्मेड कान्स्टेबल लगा देता हूँ। तुम कन्ट्रोल रूम में जाकर मेम साहेब के पास रहो। तुम अकेले उन्हें ठीक से जानते हो। मेरे सामने ही उन्होंने दो कान्स्टेबल बुलाये और मैंने सी॰ओ॰ साहब को साफ-साफ बता दिया था की आपने बोला है की किसी हालत में दरवाजा नहीं बन्द होना चाहिये। उन्होंने खुद जाकर दरवाजे को खोलकर देखा…”

मैं क्या बोलता। उसके चेहरे से ये लग रहा था की ये आदमी झूठ नहीं बोल रहा है। और जैसे ही हम लोग कमरे में घुसे।

गुड्डी ने पहला सवाल यही दागा-

“तुमने उस ड्राईवर को यहां क्यों भेज दिया? मुझे कौन उठा ले जाता। तुम्हारे जाने के 5-6 मिनट के अन्दर ही वो ड्राईवर आया और बोला की सी॰ओ॰ साहेब ने बोला है की वो यहीं रहे, मेरे पास। तब से भूत की तरह वो दरवाजे के सामने खड़ा है…”


मुझे लगा कि अच्छा हुआ मैंने उसे कुछ नहीं कहा।

लेकिन मैं बोल पाता उसके पहले ही गुन्जा, शाज़िया और महक। एक साथ। गुंजा ने गुड्डी को बाहों में भर लिया और गुड्डी ने गुन्जा को। दोनों की आँखों से आँसू बस छलके नहीं।

गुन्जा बोली- “गुड्डी दीदी। अगर आज जीजू नहीं होते तो? मैं सोच नहीं सकती थी…”

“क्यों नहीं होते। खाली होली खेलने के लिये जीजू बने हैं क्या? मजा लेंगे वो और बचाने कौन आयेगा…” मुझे देखते हुये गुड्डी ने झिड़का।

दबाते-दबाते भी एक आँसू का कतरा उसके गाल पे गिर गया और उसके बाद शाज़िया और महक भी गुड्डी की बांहों में। इतनी देर का टेन्शन, डर, खतरा सब। बिन बोले बड़ी-बड़ी आँखों में तिरते, छलकते आँसुओं में बह गया। महक ने गुड्डी को अपनी बाहों में भर रखा था और बिन कहे। बहुत सी बातें दोनों कह रही थी।

मैंने चिढ़ाया- “हे गुड्डी को सब लोग बांहों में ले रहे हो और मैं। यहां सूखा…”

गुंजा मुश्कुराते हुये बोली- “अरे मैं हूँ ना…” और मेरी बांहों में आ गई और मैंने उसे कसकर बांहों में भींच लिया।


अब गुड्डी ने पहली बार मेरे बायें हाथ और शर्ट को ध्यान से देखा। खून से लथपथ। और बांह में महक का दुपट्टा। वो चीखते हुये बोली- “हे इतना खून बह रहा है। क्या हुआ?”

मैं- “बह नहीं रहा है। बह रहा था। महक के दुपट्टे का असर है। और सालियों के लिये खून क्या मैं सब कुछ बहाने को तैयार हूँ। क्यों मन्जूर?”

अब उनके शर्माने की बारी थी।

लेकिन शाज़िया और महक इत्ती आसानी से थोड़ी छोड़ने वाली थीं, पलट के शाज़िया ने जवाब दिया,

" अरे बाबू वो सीढ़ी पे धूम धड़ाम थोड़ा जल्दी हो गया, वरना मै जो निहुरी थी, वहीँ हाथ बढ़ा के खोल के पकड़ के सटा के, ....बच गए आप "

अब गुंजा भी मैदान में आ गयी, अपनी सहेलियों की हिम्मत बढ़ाते बोली,

" अरे होली के बाद आएंगे ये और पूरे पांच दिन यहीं रहेंगे, मेरा भी हिसाब किताब अभी बाकी है , रंगपंचमी यही होंगी "

उस की रंगभरी पिचकारी छोड़ती आँखे याद दिला रही थीं, उसका फगुवा भी अधूरा था लेकिन महक ने पूरा प्लान बता दिया,

" अरे जीजू, आप सोचते हैं की क्या सिर्फ एक लड़की पे तीन तीन लड़के एक साथ चढ़ सकते हैं, हम तीनो मिल के गैंग रेप करेंगे वो भी एक बार नहीं तीन बार "

" और लाने वाली मै हूँ, जा रही हूँ इनके साथ आज लेकिन कान पकड़ के साथ ले आउंगी और अपनी छोटी बहनों के हवाले कर दूंगी, फिर ये जो बहुत बोल रहे हैं न तब पता चलेगा "

गुड्डी भी उन दर्जा नौ वालियों का साथ देती बोली, एक तो गुंजा की पक्की सहेलियां, दूसरे गुड्डी का भी तो व्ही स्कूल है, उस की जूनियर।

मै दो बातें सोच रहा था, ये लड़कियां अभी थोड़ी देर पहले डर के मारे, कैसे, और ये सब बातें भी डर से बचने का ही एक रास्ता है, और दूसरे मेरी गलती। बनारस में मुंह नहीं खोलना चाहिए, वो भी लड़कियों के आगे और वो सालिया हो तब तो एकदम नहीं,

गुड्डी ने बात घुमा दी और उन तीनो से कुछ और बात करने लगी और मेरी निगाह खिड़की के बाहर स्कूल पर जा रही थी,



एस टी ऍफ़ वाले चले गए थे, लेकिन अब डीबी और लोकल पुलिस जोश में आ गए थे , तीन लाइने पुलिस वालों की सबसे बाहर पी ऐसी के जवान और उसके बाद आर ए ऍफ़ और सबसे अंदर लोकल पुलिस के कमांडो, जो थोड़े बहुत मिडिया वाले आ गए थे आस पास उन्हें हटाया जा रहा था, कुछ लोकल पाल्टीसियन टाइप भी थे जिहे डीबी खुद निपटा रहे थे। एक बार फिर पुलिस ने पैरामीटर बना लिया , एम्बुलेंस की एक दो गाड़ियों और एक फायर ब्रिगेड की गाडी को छोड़ के सब वापस जा रही थी।



पुलिस को छोड़ के बाकी सिविल आफ़िसर्स भी वापस जा रहे थे।

स्कूल के अंदर बॉम्ब डिस्पोजल स्क्वाड का एक दस्ता अंदर घुसा, फिर जो मिलेट्री के कमांडो आये थे, उनके साथ का बॉम्ब स्क्वाड, उन सब के पास तरह तरह के डिटेक्टर थे, फिर दो तीन कुत्ते, शायद बॉम्ब स्क्वाड वालों के थे और सबके बाद सिद्द्की और उसके साथ एक दो लोग और

और मेरे मन में सवाल अभी भी घूम रहे थे चुम्मन लोकल बदमाश था लेकिन जरूर बात उससे कहीं ज्यादा था, उसकी माँ ने बोला था की वो बंबई से हो के आया है, तो वहीँ कोई कांटेक्ट तो नहीं बन गया।



फिर चुम्मन के अलावा शायद मै अकेला था जिसने बॉम्ब को इतनी नजदीक से देखा था और उससे बढ़कर उसके एक्सप्लोड होने का असर देखा था, किसी जबरदस्त बॉम्ब मेकर का हाथ लगता था और अभी ८० % ही लग रहा था , कुछ चीजें उसमे नहीं थी लेकिन, और सबसे ज्यादा मुझे चौंकाया, डबल एक्सप्लोजन ने, आउटर बॉम्ब ने सिर्फ शॉक वेव्स जेनेरेट की, जो लग रहा था सीढ़ी हिल रही है, दरवाजा हिला, प्लास्टर गिरना शुरू हो गया और मुझे लग गया, हम लोग थोड़े सम्हल गए और उसी आउटर बॉम्ब से इनर बॉम्ब का बीस पच्चीस सेकेण्ड के अंदर एक्सप्लोजन हुआ, जो धड़ाके की आवाज हुयी और पक्का भले ही थोड़ी मात्रा में लेकिन लग रहा था आर डी एक्स, पर ये अब जो बॉम्ब डिस्पोजल वाले गए हैं इन्हे अंदाज लग जाएगा,



ऐसा बॉम्ब, बनारस में किसी लोकल बदमाश के पास, ?

और फिर रिवाल्वर, और उसकी गोलियां। अक्सर हम लोग मानते हैं की रिवाल्वर में छह गोलियां होती है लेकिन चार गोलियां तो नीचे वाले दरवाजे में ही लगी थीं, और फिर वो सीढ़ी के ऊपर के दरवाजे को भेद के आयीं और नीचे वाले दरवाजे में उन्होंने छेद किया, तो बिना हाई कैलिबर के और फिर कुछ शेल मैंने देखे भी थे, जो सामने दीवाल में लगा था, जो उससे लड़ के जिस दीवाल में हम चिपके थे वहां नीचे, वो तो मैंने महक को कस के चिपका रखा था, वरना उस हालत में भी वो गोली घायल तो कर ही देती।

आज मुझे अंदाज लग गया था की बनारस में गन रनिंग भी होती है और फॉरन गन्स भी आ गयी हैं लेकिन इस तरह की रिवाल्वर अभी कॉमन नहीं है फिर चुम्मन बनारस के किसी आर्गेनाइज्ड गैंग का पार्ट भी नहीं है

लेकिन सबसे बड़ी बात थी गुंजा और उसकी सहेलियों का बचना और वो हो गया, और इन सब सवालों का जवाब एस टी ऍफ़ वाले और पुलिस वाले ढूंढेंगे, अगर ढूंढना चाहेंगे, मुझे तो बस गुंजा को चंदा भाभी के हवाले करना है और उसकी बाकी सहेलिया भी ठीक ठाक पहुँच जाए अपने अपने घर

और ये चार आने का काम अभी भी बचा था, क्योंकि मिडिया वाले और कुछ सिक्योरटी एजेंसी वाले भी जानना चाहते होंगे की अंदर क्या हुआ



और ये चहकती गौरेया सब कहीं उन के चक्कर में पड़ गयीं तो एक अलग झंझट



कमरे में लगे टीवी पर एंकर चीख रही थी

" कहाँ; हैं तीनो लड़कियां , कौन थी तीनो लड़कियां, क्या हुआ था उनके, बस सिर्फ इसी चैनल पर " निवेदिता जी चीख रही थीं, और पीछे चु दे विद्यालय की तस्वीर और उसके ठीक सामने स्टूडियों में खड़ी वो, नीचे रनर चल रहा था, एस टी ऍफ़ का जबरदस्त आपरेशन, संघर्ष के बाद कमांडो ने तीनो लड़कियों को सकुशल छुड़ाया, लड़कियों की मेडिकल जांच चल रही है

शाज़िया और गुंजा देख के मुस्करा रही थीं, लेकिन महक के चेहरे पे एक बार फिर से डर छा गया था, जैसे वो उन पलों में वापस चली गयी हो। गुड्डी के हाथ को पकड़ के बोली, ' दी , लग नहीं रहा था बचूंगी, अगर आप लोग न आते "


गुड्डी ने बिना बोले बस उसके हाथ को दबा दिया, और मैंने चैनल चेंज कर दिया,

उस चैनल पर सबीहा बोल रही थीं, पहली खबर, होस्टेज के छूटने की सबसे पहली खबर आपको इसी चैनल पर मिली, और उनसे बात भी सबसे पहले इसी चॅनेल पर, हम दिखाएंगे आपको अंदरखाने की खबर, अंदर की बात, एकदम एक्सक्लूसिव, क्या गुजरा उन लड़कियों पर उन तीन घंटो में लेकिन उससे पहले बनारस जानना चाहता है , पुलिस व्यवस्था इतनी लचर क्यों, दिन दहाड़े, थाने से २०० मीटर दूर के लड़कियों के स्कूल में आतंकी हमला, क्या कर रही थी पुलिस, बने रहिये बस ब्रेक के बाद अंदरखाने की खबर , क्या हो रहा था स्कूल में



गुड्डी ने कुछ जानने के लिए कुछ बात बदलने के लिए और कुछ इस बड़े हादसे से बच के आयी लड़कियों का मूड ठीक करने के लिए पूछ लिया गुंजा से, " तू बता न अंदर की बात, क्या हुआ था, कैसे चुम्मन, ? "
Asli baar Gunja batayegi.
 

Mr Sinister

𝖀𝖓𝖆𝖛𝖆𝖎𝖑𝖆𝖇𝖑𝖊..
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Annual Story Contest - XForum
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Winning Writer's ko well deserved Cash Awards milenge, uske alawa aapko apna thread apne section mein sticky karne ka mouka bhi milega taaki aapka thread top par rahe uss dauraan. Isliye aapsab ke liye ye ek behtareen mouka hai XForum ke sabhi readers ke upar apni chhaap chhodne ka or apni reach badhaane kaa.. Ye aap sabhi ke liye ek bahut hi sunehra avsar hai apni kalpanao ko shabdon ka raasta dikha ke yahan pesh karne ka. Isliye aage badhe aur apni kalpanao ko shabdon mein likhkar duniya ko dikha de.

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Aur haan! Kahani ko sirf ek hi post mein post kiya jaana chahiye. Kyunki ye ek short story contest hai jiska matlab hai ki hum kewal chhoti kahaniyon ki ummeed kar rahe hain. Isliye apni kahani ko kayi post / bhaagon mein post karne ki anumati nahi hai. Agar koi bhi issue ho toh aap kisi bhi staff member ko Message kar sakte hain.

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Sanju@

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फागुन के दिन चार भाग २९

गुड्डी का प्लान

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कागज आया और तीन-चार फोन भी। गुड्डी प्लान बनाने में बिजी हो गयी और डीबी फोन में



आखिरी फोन शायद एस॰टी॰एफ॰ के हेड का। डी॰बी॰ का चेहरा टेंस हो गया और आवाज भी तल्ख़ थी। वो सर सर तो बोल रहे थे, लेकिन टोन साफ था की उसे ये पसंद नहीं आ रहा था।

लेकिन कुछ फोन बगल के कमरे में भी बज रहे थे, जहां उनके साथ के और जूनियर अधिकारी बैठे थे, और डीबी उधर चले गए। दरवाजा खुला हुआ था और उनकी फोन की बात चीत और जो वो इंस्ट्रक्शन दे रहे थे साफ़ सुनाई दे रहा था।



गुड्डी पेन्सिल से लाइने खींच रही थी, कभी बंद खिड़की से बाहर अपने स्कूल की ओर देखती जैसे कुछ याद करने की कोशिश कर रही हो और फिर कागज की ओर मुड़ जाती।



और मैं सोच रहा था, डीबी ने जो बातें बतायीं एकदम सही थीं, लेकिन जो बाते गुड्डी सोच रही थी वो भी सही थीं और ज्यादा सही थीं। फिर एक तरह से मेरी सोच भी सही थी।


डीबी अंदाज लगा रहे थे स्कूल में लड़कियों को होस्टेज बनाने वाले कौन हैं, किस तरह के लोग है और उनका मोटिव क्या है ?

इससे उनका काम करने का तरीका पता चल सकता था और उन्हें टैकल करना ज्यादा आसान होता, लेकिन वह साफ़ नहीं हो रहा था। मैंने भी फाइलों में ही सही और केस स्टडी में बहुत से आतंकी ग्रुप्स के बारे में पढ़ा था। कश्मीर के बाहर तो आतंकी सिर्फ दहशत फैलाते हैं और बम्ब का इस्तेमाल करते हैं चाहे ट्रेन में हो या कार में, और हमेशा ज्यादा भीड़ वाली जगह पर और किसी को पता चलने के पहले गायब हो जाते हैं

अब यह जो भी है,... निश्चित रूप से पकडे जाएंगे या मारे जाएंगे।

पर गुंडे बदमाश भी समझ में नहीं आते, सिद्द्की का जलवा तो मैं देख ही चुका था तो कोतवाली के इतने पास और दिन दहाड़े किस गुंडे की हिम्मत होगी? और सबसे बड़ी बात ऐसा सॉफिस्टिकेटेड बम्ब कैसे उसके पास आ सकता है,


सामने टीवी चल रहा था, भले ही म्यूट पर हो लेकिन चल रहे रनर इस घटना को पूरी तरह आतंकी बताने पर तुले थे।

और इसमें फायदा उन्ही का था, .....टी आर पी बढ़ रही थी, लोग नेशनल चैनल छोड़ के लोकल लगा के देख रहे थे और अब नेशनल चैनल पर भीशुरू हो गयी थी ब्रेकिंग न्यूज में। एक लड़कियों के स्कूल में दो गुंडे घुसे तो कोई न्यूज नहीं बनती इसलिए आतंकी, और जितना मसाला हो, तो बनारस में हुए पुराने बॉम्ब ब्लास्ट की पिक्चर्स, पुरानी तबाही, और हेडलाइंस, के अभी कुछ देर बाद स्कूल में यही मंजर होगा

और बहुत से चैनल तो अलग अलग पार्टियों से जुड़े तो सरकार के खिलाफ आग उगलने से भी वो नहीं चूक रहे थे ,

ला एंड आर्डर के नाम पर आयी सरकार फेल, कोतवाली की नाक के नीचे आतंकी हमला,

और कुछ चैनल वाले अब उसे मजहबी रंग भी देने की तैयारी में थे

होली या खून की होली

अपोजिशन पार्टी के नेता तो मैदान में आ ही गए थे रूलिंग पार्टी में जो चीफ मिनिस्टर के खिलाफ थे अंदर अंदर वो मौके का फायदा उठा तहे थे और मैं समझ रहा था की डिप्टी होम मिनिस्टर का भी हाथ है इन चैनल को हवा देकर आतंकी बुलवाने में


आतंकी होने पर ही तो एस टी ऍफ़ का रोल आता।

एस टी ऍफ़ सीधे डीप्टी चीफ होम मिनिस्टर के अंदर और उनकी प्रायरटी होस्टेज को छुड़ाना नहीं बल्कि एनकाउंटर कर के पब्लिटीसीटी लेना होता । वो तो चले जाते रायता डीबी को साफ़ करना पड़ता।

और एस टी ऍफ़ के साथ डिप्टी होम मिनिसिटर की भी इज्जत बढ़ जाती।



लेकिन गुड्डी की सोच कुछ और थी

वो कोई भी हों उनका मोटिव कुछ भी हो, हमें अभी सिर्फ लड़कियों को छुड़ाने के बारे में सोचना चाहिए बस।
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और मेरा सोचना यह था की जो भी गुड्डी सोचती है वो ठीक है, मुझे तो बस ये सोचना है, ये होगा कैसे।

एक बार लड़कियां बच के निकल आयीं तो उन दुष्टों का कुछ भी, पुलिस पकडे, वो सरेंडर करें, पकडे जाने पर गाडी पलट जाए , एस टी ऍफ़ की फायरिंग में वो मारे जाएँ और उन के पास से वो दो चार एके ४७ बरामद करा दे, इससे हम लोगों का लेना देना नहीं, लेकिन लड़कियां किसी भी हालत में पुलिस आपरेशन से पहले बच जाए और एस टी ऍफ़ के आने पहले तो एकदम, क्योंकि जैसे ही फायरिंग शुरू होगी, वो बॉम्ब जरूर एक्सप्लोड कर देंगे, और उससे भी बड़ा खतरा ये था की कही पुलिस की फायरिंग में ही उनमे से कोई इंजर्ड न हो जाए,

तो अब ज्यादा टाइम नहीं था, शाम के पहले बल्कि एस टी ऍफ़ के आने के पहले किसी तरह लड़कियां वहां से निकल जाएँ पर उसके लिए जरूरी था बिल्डिंग प्लान, लड़कियां कहाँ होंगी और कैसे सेफली जहाँ लड़कियां हों उस जगह को एक्सेस कर सकते हैं और उन्हें निकाल सकते हैं



डीबी ने बताया था की उनके पास जो स्कूल का प्लान था उसमे बहुत चेंज हो गए हैं और वो ज्यादा काम का नहीं है

और गुड्डी वही प्लान बना रही थी।



लेकिन एक जंग और चल रही थी नैरेटिव की, आपत्ति में अवसर ढूंढने वालों की और डीबी उससे बाहर जूझ रहे थे ,

टीवी का वॉल्यूम मैंने थोड़ा बढ़ाया, और एक एंकर चीख रहा था,


" होली के मौके पर ही क्यों ? कौन है जो हमारे त्योहारों कोबर्बाद कर रहा है , होली को खून की होली बना रहा है। अपने अगल बगल देखिये, ....पड़ोस में देखिये, कौन लोग है जो आतंकियों को आश्रय देते हैं, पहचानियों उन्हें "


और मुझे याद आया, डीबी ने लो इंटेसिटी दंगो से पोलराइजेशन की बात की थी, कुछ पार्टियां यही चाहती हैं और मौका मिल गया तो

और डी बी सिटी मजिस्ट्रेट को समझा रहे थे,

"आप तब तक जो भी पीस कमिटी हैं उन्हें एक्टिवेट कर दीजिये, एक बार बात कर के ब्रीफ कर दीजिये, "

और फिर वो सिद्दीकी से बोले, ' जरा अफवाह वालों का पता कर के रखो, और ये लोकल चैनल वालों को टाइट करो। हाँ ट्रबुल स्पॉट है और ट्रबुल मेकर, सब थानों से एक बार बात कर के और पी ए सी की थोड़ी गश्त बढ़वा दो।


फिर सी ओ को उन्होंने बोला, " फायरिंग नहीं होगी, किसी भी हालत में नहीं होगी लेकिन अंदर घुसने की तैयारी पूरी कर लो, तीनो पेरिमीटर बन गए न और एस ओ दशाश्वमेध लीड करेंगे और बोट पुलिस को भी लगा दो, कहीं वो नदी के रस्ते न निकले '



और जब वो अंदर हम लोगो के पास आये तो गुड्डी प्लान ले के तैयार थी।
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बहुत ही शानदार और लाजवाब अपडेट है गुड्डी लड़कियों को बचाने के लिए अपनी स्कूल का मैप बनाया है जिससे पुलिस वाले को लड़कियों को निकालने में मदद मिल सके
 

Sanju@

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चू दे स्कूल का प्लान

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गुड्डी ने प्लान खींच दिया, और बताने लगी- “ये ऊपर का रूम है। इसी में एक्स्ट्रा क्लास चल रही थी। लड़कियां यहीं होंगी…”

डी॰बी॰ ने आश्चर्य से पूछा- “ये तुम्हें कैसे मालूम?”

गुड्डी ने झुंझलाकर बोला- “तो किसको मालूम होगा?”

गुड्डी तो गुड्डी थी। गनीमत है। डी॰बी॰ अभी रीत से नहीं मिले थे, सुपर चाचा चौधरी। चाचा चौधरी का दिमाग कंप्यूटर से भी तेज चलता है और रीत का चाचा चौधरी से भी।

गुड्डी बोली- “अरे मैं पिछले छः साल से वहां पढ़ रही हूँ। और कितनी बार उस कमरे में एक्स्ट्रा क्लास अटेंड की है। एक्स्ट्रा क्लास वहीं लगती है। और आज तो गुंजा ने बोला भी था की क्लास वहीं लगेगी…”


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गनीमत था की डी॰बी॰ ने ये नहीं पूछा की गुंजा कौन है?



गुड्डी- “दो दरवाजे हैं एक बाहर का, जिससे सब लोग आते हैं और एक पीछे का जो नार्मली बंद रहता है, चार खिड़कियां हैं, एक खिड़की दायें साइड की है जो बंद नहीं होती…”



अबकी मैंने टोका- “क्यों?”



मुझे डांटने में उसने कोई गुरेज नहीं किया, न आँखों से ना आवाज से-

“क्यों का क्या मतलब? अरे हवा आती है, धूप आती है, मैं तो हमेशा वहीं बैठती थी। टीचर के पास से दिखाई भी नहीं पड़ता था तो एकाध झपकी भी आ जाय, एस॰एम॰एस॰ करते रहो। टीचर ने एकाध बार बंद करने की कोशिश की लेकिन नहीं बंद हुई और सबसे बड़ी बात, ....रुक के थोड़ा मुस्करा के वो बोली

बगल की छत से लड़के लाइन मारते थे। कई बार चिट्ठी फेंकते थे। उस फ्लोर पे पहले कोई कमरा बन रहा था था। फिर आधा बनकर रुक गया है काम, इसीलिए और,… कोई उन लड़कों को मना भी नहीं करता था…”


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मैंने गुड्डी को छेड़ा- “तभी तुम वहां बैठती थी?”



डी॰बी॰- “चुप रहो यार। ये बहुत काम की बात बता रही है और तुम। खाली 3 समोसे खा गये, कालेज में राकेश के यहाँ ब्रेड पकौड़े साफ करते थे और। आप बोलिए, ये ऐसा ही है। इसकी बात पे ध्यान मत दिया करिए…” वो गुड्डी से बोले।


“हमने बिल्डिंग के चारों ओर से फोटोग्राफ भी लिए हैं। लेकिन…” और अपनी बात रोक के उन्होंने फोटोग्राफ मंगाए।

मैंने देखा, गुड्डी ने करीब करीब सारी बिल्डिंग का नक्शा बना दिया था, दरवाजे, सीढियाँ, घुसने का रास्ता, बरामदे,


लेकिन अब जब ये गुड्डी ने बता दिया था की वो तीनो लड़कियां किस कमरे में थी तो मेरा दिमाग बस अब उस नक़्शे को दिमाग में उतार रहा था, चिड़िया की आँख की तरह, कमरे की लम्बाई चौड़ाई, वो खिड़की जिसके बगल में गुड्डी बैठती थी, उस कमरे में घुसने का दरवाजा, पीछे का बरामदा, बगल के क्लास रूम।

इस तरह से की मैं आँख बंद कर के बताऊँ तो एक एक डिटेल एकदम सही हो,

सिर्फ तीन लड़कियां थीं,....



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तो होस्टेज बनाने वाले ने उन्हें साथ ही रखा होगा, बल्कि इस तरह की एक ओर दीवाल हो, और शायद वो तीनो लड़कियां खिड़की के पास ही हों,

अभी दिन का समय है तो बंद खिड़की से भी थोड़ी रौशनी आ रही होगी, लाइट का कनेक्शन तो पुलिस ने काट दिया होगा या काट देंगे

और अब बिल्डिंग के फोटोग्राफ आ गए थे।

टेली लेंस से बगल की बिल्डिंग से हर एंगल से डीबी ने फोटोग्राफी करवाई थी जिससे ऑपरेशन के पहले कमांडो को ब्रीफ किया जा सके।

“यही खिड़की है…” गुड्डी ने उंगली से इशारा किया।
Awesome update
गुड्डी ने डीबी और आनंद को स्कूल के एंट्री और एग्जिट के बारे में बता दिया है गुड्डी तो गुड्डी ही है डीबी को भी नहीं बक्सा सवाल पूछने पर हड़का दिया
 
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खिड़की
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“लेकिन ये तो बंद है…” डी॰बी॰ ने बोला- “कोई भी खिड़की या दरवाजा नहीं खुला है…”



गुड्डी चालू हो गई-

“ओह्ह… मैंने पूरी बात नहीं बतायी। असल में, हम लोगों ने एक लकड़ी का पच्चा उसमें फँसा रखा था, बाहर से टीचर को दिखता नहीं था, कब्जे में लगा रखा था। जो लड़की सबसे पहले पहुँचती थी उसका काम होता था और वो खिड़की के बगल वाली डेस्क भी हथिया लेती थी। साल भर ये काम मैंने किया। रात को तो चौकीदार चेक करता था ना, इसलिए शाम को उसे हटा लिया जाता था…”



डी॰बी॰ प्लान पे तमाम निशान बना रहे थे, और किसी को बुलाकर उन्होंने तमाम आर्डर दिए और गुड्डी से पूछा- “वो जिस जगह काम हो रहा था, मतलब बंद था। कितना दूर था? गैप कितना था?”

दोनों हाथ फैलाकर गुड्डी बोली- “इतना,… थोड़ा सा ज्यादा…”

डी॰बी॰ ने पूछा- “10 फिट। 20 फिट…”



गुड्डी “नहीं नहीं। और कम, 5-6 फिट ज्यादा से ज्यादा। अरे कई बार लड़के तो पास में रखे पटरों की ओर इशारा करके बोलते, …

“आ जाऊं। आ जाऊं।

“और हम लोग उनको चिढ़ाते,.. “आ जाओ, आओ, इशारे करते और जब वो आने का नाटक करते तो हम उन्हें अंगूठा दिखा देते और खिड़की उठंगा देते…”
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डी॰बी॰ ने गुड्डी को चुप रहने का इशारा किया और सी॰ओ॰ अरिमर्दन सिंह को बुलाया। डी॰बी॰ ने पूछा- “बगल में जो मकान बन रहा है। वहां किसी को लगाया है?”

सी॰ओ॰ ने बोला- “जी जी। दो लोग एक गनर भी है…”



डी॰बी॰ ने बोला- “वहां 1+4 के दो सेक्शन लगा दो। एक ऊपर और एक उस बिल्डिंग से जहाँ उतरने का रास्ता हो, स्मार्ट लोगों को लगाना…” उन्होंने बात जारी रखी- “और एक आँसू गैस वाला सेक्शन भी। स्मोक बाम्ब के कुछ कैनिस्टर भी उनको दिलवा दो। हाँ वो सी॰सी॰टीवी वाले कैमरे लग गए चारों ओर?”

“जी…”

डी॰बी॰ ने फिर बोला- “तो उसके मेन फीड की स्क्रीन इसी कमरे में लगाओ…” और उसको जाने का इशारा किया।

उसके जाने के बाद वो गुड्डी से बोले- “यार तुमने,… छोटी हो,..तुम तो बोल सकता हूँ…”

“एकदम…” मुश्कुराकर वो बोली।

“बहुत बड़ी प्राब्लम तुमने साल्व कर दी…” डी॰बी॰ इतने देर में पहली बार मुश्कुराए।

डी॰बी॰ ने बात आगे बढ़ाई-

“असल में, हमें एंट्री समझ में नहीं आ रही थी। चौकीदार से मैंने खुद बात की। उसने लड़कियों के अलावा और किसी को स्कूल में घुसते नहीं देखा। सामने जो हलवाई की दुकान है, उसपे जो लड़का बैठता है, …”

“नंदू…” गुड्डी ने बात काटकर बोला।

डी॰बी॰ ने कहा- “हाँ वही। उसने यहाँ तक बताया की 9वीं क्लास की लड़कियां थी, 24 लड़कियां अन्दर गईं, सब डिटेल। लेकिन उसने भी बोला की किसी को उसने अन्दर जाते नहीं देखा और टीचर के आने के पहले ये हादसा हो गया, ”
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गुड्डी ने जोड़ा- “वो हमेशा लेट आती हैं। उनके पीरियड में बहुत मस्ती होती है…”

मुझे गुंजा की बात याद आयी उन टीचर के बारे में, मोहिनी मैडम, जैसा नाम वैसे सूरत।


मोहिनी मैडम कालेज के जो मारवाड़ी मालिक हैं उन के लड़के से फंसी है,


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और ज्यादातर टाइम उस की बाइक के पीछे चिपकी नजर आती हैं, क्लास वलास तो कम ही लेती हैं लेकिन स्टूडेंट्स उन से बहुत खुश रहती हैं, क्योंकि इम्तहान के पहले वो एक क्लास लेती हैं जिसमें दस वेरी इम्पोर्टेन्ट क्वेशन बताये जाते हैं, आठ शर्तिया आते हैं और करने पांच ही होते हैं। पर्चे मोहिनी मैडम के ताऊ की प्रेस में ही छपते हैं और उस मारवाड़ी मालिक के लड़के की कृपा से हर बार ठेका उन्ही को मिलता है।


और गुंजा ने आज की क्लास का स्पेशल अट्रैक्शन ये बताया की मोहिनी मैडम आज सिर्फ अपना सब्जेक्ट नहीं बल्कि तीन तीन पेपर, मैथ, इंग्लिश और सोसल, तीनो के ' इम्पोर्टेन्ट सवाल ' बताएंगी और मॉडल आंसर भी वो जिराक्स करा के लायी है तो वो भी, हाँ अगर आज उन की क्लास में जो नहीं गया, वो कॉपी में कुछ भी लिख के आये, उस का फेल होना पक्का,

तो हो सकता है जब अटैक हुआ तो मोहिनी मैडम क्लास में तबतक न पहुंची हो क्योंकि नंदू ने सिर्फ २४ लड़कियों की बात बताई थी टीचर की नहीं


“तो उस लड़के ने भी किसी आदमी को अन्दर आते नहीं देखा। इसका साफ मतलब है की वो इसी खिड़की से अन्दर गए और उनके साथ या उन्हें किसी ने इसके बारे में बताया होगा। और कोई रास्ता है क्या?”

डी॰बी॰ ने गुड्डी ने जो प्लान बनाया था उसे और फोटुयें देखते हुए पूछा।



गुड्डी- “उन्ह। नहीं नहीं। हाँ एक रास्ता है। लेकिन उसे सिर्फ मैं और कुछ लड़कियां जानती हैं। ज्यादातर लोगों को ये मालूम नहीं की ये रास्ता अन्दर जाता है। एक बहुत जंग खाया सा दरवाजा है उसपे फिल्मों के पोस्टर लगे रहते हैं। बाहर और अन्दर दोनों ओर से बंद रहता है। एक सीढ़ी है, बहुत पतली और एकदम अँधेरी सीधे ऊपर जाती है, उसके नीचे बहुत कचड़ा भी पड़ा रहता है। सीढ़ी ऊपर बरामदे में खुलती है। लेकिन उसकी सिटकिनी जरा सा झटके से खुल जाती है। बस वहां से निकलिए तो उस क्लास का पीछे वाला दरवाजा…”


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डी॰बी॰ बोले- “वो भी तो बंद रहता है। तुमने बताया था ना…”



गुड्डी- “हाँ एकदम। लेकिन दो बार अपनी ओर खींचकर हल्के से अन्दर की ओर धक्का दीजिये तो बस खुल जाता है…”

गुड्डी ने राज खोला, और मेरी ओर देखकर बोली-

“मुझे क्या मालूम था रीत ने बताया था मुझे…”

डी॰बी॰ फिर मुश्कुरा रहे थे।

गुड्डी- “एक बार, एक-दो महीने पहले मैं गई थी उधर से। अक्षय कुमार की एक पिक्चर देखने- राठोर। हाँ क्या करूँ क्लास बहुत बोरिंग थी, और एक-दो बार क्लास में चुपके से लेट होने पे। एक बार तो तुम्हारे से ही बात करने के चक्कर में…”

मेरी ओर देखकर उसने इल्जाम लगाया।
गुंजा
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ब तक दो लोग आकर स्क्रीन सेट करने लगे, और एक रिमोट हम लोगों के पास लगा दिया जिससे कैमरा सेलेक्ट हो सकता था।

डी॰बी॰- “वो जो मकान बन रहा है ना, कैमरा उधर सेट करो। हाँ जूम करो। बस उसी खिड़की पे। हाँ और?”

खिड़की अच्छी तरह बंद थी।


डी॰बी॰- “इंटेलिजेंट। जाओ तुम सब…”

और उन्होंने हांक के जमूरों को बाहर कर दिया और हम लोगों को समझाया-

“उन सबों को ये अंदाज लग गया होगा की देर सबेर एंट्री प्वाइंट हमें पता चल जाएगा इसलिए उन्होंने अच्छी तरह से बंद कर दिया। ये कोई…”

तब तक एक और इंस्पेक्टर आलमोस्ट दौड़ता आया-

“सर साइटिंग हो गई। एक स्नाइपर ने देखा, ग्राउंड फ्लोर बाएं से तीसरी खिड़की। उसका कहना है की आब्जेक्ट अभी भी वहीं होगा, हालांकि खिड़की अब बंद हो गई है। वो पूछ रहा है की एंगेज करें उसे? एक्शन स्टार्ट करें?” उसने हांफते हुए पूछा- “कमांडो वाला ग्रुप भी रेडी है…”

डी॰बी॰- “अभी नहीं, कैमरा उधर करो, हाँ फोकस। दो लोगों को बोलना क्राल करके इनर पेरीमीटर के अन्दर घुसे। बट नो एक्शन नाट इवेन वार्निंग शाट, जाओ…” डी॰बी॰ ने आर्डर दिया।

अब कैमरा नीचे का फ्लोर दिखा रहा था। एक खिड़की हल्के से खुली थी लेकिन पर्दा गिरा था।

“मोबाइल। वो आप कह रहे थे न की उसका फोन…” गुड्डी भी अब पूरी तरह इन्वोल्व हो चुकी थी।

डी॰बी॰- “हाँ हाँ क्यों नहीं?” एकदम,...

और थोड़ी देर में रिकार्डिंग की कापी हमारे सामने बज रही थी।


शुरू में तो कुछ समझ में नहीं आ रहा था, फिर एक कुर्सी घसीटने की आवाज, अस्फुट शब्द। फिर बैक ग्राउंड में एक हल्की सी चीख।

गुड्डी बोली-

“ये तो गुंजा लग रही है…” और उसने कान एकदम स्पीकर फोन से सटा लिए।
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फोन पर बोलने वाले ने एकाध लाइन बोली, फिर पीछे से आवाज आई-

“छोड़ो मुझे। हाथ छोड़ो…”

मेरा तो जी एकदम धक्क से रह गया, कलेजा मुंह को आ गया,



जैसे ही गुड्डी के मुंह से गुंजा निकला, मेरी आँखों के आगे अँधेरा छा गया। न कुछ दिखाई दे रहा था न समझ में आ रहा था, कस के मैंने अपनी चेयर पकड़ ली।

डीबी ने रिवाइंड किया, एकदम गुंजा ही थी,



आज सुबह ही तो पहली बार उसे देखा, उससे मिला, एकदम झिलमिलाती, ख़ुशी से भरी, सुबह की कच्ची धूप की तरह, जवानी नहीं बस कैशोर्य के दरवाजे पर सांकल खड़काती,



वही याद आ गया, एकदम बिजली की तरह चमक गयी



एकदम बच्ची नहीं लग रही थी वो।सफेद ब्लाउज़ और नीली स्कर्ट, स्कूल यूनीफार्म में।


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मेरी आँखें बस टंगी रह गईं। चेहरा एकदम भोला-भाला, रंग गोरा चम्पई । लेकिन आँखें उसकी चुगली कर रही थी। खूब बड़ी-बड़ी, चुहल और शरारत से भरी, कजरारी, गाल भरे-भरे, एकदम चन्दा भाभी की तरह और होंठ भी, हल्के गुलाबी रसीले भरे-भरे उन्हीं की तरह। जैसे कह रहे हों- “किस मी। किस मी नाट…”

मुझे कल रात की बात याद आई जब गुड्डी ने उसका जिक्र किया था तो हँसकर मैंने पूछा था- “क्यों बी॰एच॰एम॰बी (बड़ा होकर माल बनेगी) है क्या?”

पलटकर, आँख नचाकर उस शैतान ने कहा था- “जी नहीं। बी॰एच॰ काट दो, और वैसे भी मिला दूंगी…”

मेरी आँखें जब थोड़ी और नीचे उतरी तो एकदम ठहर गई, उसके उभार।

उसके स्कूल की युनिफोर्म, सफेद शर्ट को जैसे फाड़ रहे हों और स्कूल टाई ठीक उनके बीच में, किसी का ध्यान ना जाना हो तो भी चला जाए। परफेक्ट किशोर उरोज। पता नहीं वो इत्ते बड़े-बड़े थे या जानबूझ के उसने शर्ट को इत्ती कसकर स्कर्ट में टाईट करके बेल्ट बाँधी थी।


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मुझे चंदा भाभी की बात याद आ रही थी,... चौदह की हुयी तो चुदवासी,

और जब होली में उनके मुंहबोले पड़ोस के जीजू ने उनकी चिड़िया उड़ाई थी वो गुड्डी की मंझली बहन से भी थोड़ी छोटी, मतलब गुंजा से भी कम उम्र,...



पता नहीं मैं कित्ती देर तक और बेशर्मों की तरह देखता रहता, अगर गुड्डी ने ना टोका होता-

“हे क्या देख रहे हो। गुंजा नमस्ते कर रही है…”

और उस के बाद जिस तरह से उसने अपने हाथ से लाल तीखे मिर्चों से भरे ब्रेड रोल खिलाये,

“जिसने बनाया है वो दे…” हँसकर गुंजा को घूरते हुए मैंने कहा।

मेरा द्विअर्थी डायलाग गुड्डी तुरंत समझ गई। और उसी तरह बोली- “देगी जरूर देगी। लेने की हिम्मत होनी चाहिए, क्यों गुंजा?”



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“एकदम…मैं उन स्सालियों में नहीं जो देने में पीछे हटजाएँ, हां लेने में, 'आपके उनके ' की हिम्मत पर डिपेंड करता है , और जिस तरह से उसने खिलाया



" जीजू आ बोलिये जैसे लड्डू खाने के लिए मुंह खोलते हैं एकदम वैसा और बड़ा, हाँ ऐसे।"

" " दी, एक बार में डाल दूँ पूरा,"

" आधे तीहै में न डालने वाले को मजा न डलवाने वाली को " बुदबुदाती गुंजा ने एक बार में बड़ा सा ब्रेड रोल खूब गरम मेरे मुंह मे।

ब्रेड रोल बहुत ही गरम, स्वाद बहुत ही अच्छा था।


लेकिन अगले ही पल में शायद मिर्च का कोई टुकड़ा। और फिर एक, दो, और मेरे मुँह में आग लग गई थी। पूरा मुँह भरा हुआ था इसलिए बोल नहीं निकल रहे थे।

वो दुष्ट , गुंजा। अपने दोनों हाथों से अपना भोला चेहरा पकड़े मेरे चेहरे की ओर टुकुर-टुकुर देख रही थी।

बस वही चेहरा मेरे आँखों के सामने घूम रहा था


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और अब, बम, होस्टेज, टेरर, बेचारी लड़की कहाँ से गुजर गयी और मैं यहाँ बैठ के समोसे खा रहा हूँ।



डीबी ने एक बार फिर से रिवाइंड कर दिया था, और गुंजा की चीख सुन के मेरे सीने में जैसे किसी ने गरम चाक़ू उतार दिया था। शाक अब गुस्से में बदल गया था। मुझे लग रहा था गुड्डी की हालत मुझसे भी ज्यादा खराब होगी, मैं तो आज मिला वो तो बचपन से ही सहेली, सगी बहन से बढ़कर



डीबी मेरी ओर पुष्टि के लिए देख रहे थे,



मैने बोला- “एकदम गुंजा ही है…”

लेकिन गुड्डी ने ध्यान नहीं दिया।

मैं समझ भी गया था और मान भी गया था गुड्डी को, वह आवाजों की रस्सी पकड़ के कमरे के अंदर घुसने की कोशिश कर रही थी,

साल भर पहले ही तो वो भी उसी क्लास में बैठती थी, एक एक आवाज को सुन के ध्यान से कमरे की हालत पढ़ने की कोशिश कर रही थी। सच में दुःख, शॉक पीने में लड़कियों का कोई मुकाबला नहीं। गुंजा है तो, मुसीबत में है, लेकिन सवाल है उसे बचाने का और ये रिकार्डिंग हेल्प कर सकती है तो चिंता से ऊपर उठ कर बस वो ध्यान से सुन रही थी।



अब फोन की आवाज साफ हो गई थी, गुड्डी ध्यान से सुन रही थी और उसकी आँखों में एक चमक सी आ गई। फिर वो एक मुश्कान में बदल गई और वो वापस कुर्सी पे आराम से बैठ गई। अब दूसरी बार के फोन की रिकार्डिंग बज रही थी।

डी॰बी॰ ने हल्की आवाज में गुड्डी से पूछा- “तुम्हें कुछ अंदाज लग रहा है?”

“हाँ…” उसी तरह गुड्डी धीमे से बोली।


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उन्होंने गुड्डी को होंठों पे उंगली रखकर चुप रहने का इशारा किया और एक मिनट। वो बोले और जाकर दरवाजा बंद कर दिया। लौटकर उन्होंने रिकार्डिंग फिर से आन की और फुसफुसाते हुए गुड्डी से बोले- “ध्यान से एक बार फिर से सुनो, और बहुत कम और बहुत धीमे बोलना…”

रिकार्डिंग एक बार फिर से बजने लगी।

खतम होने के पहले ही गुड्डी ने कहा- “बताऊँ मैं?”



डी॰बी॰ ने सिर हिलाया- “हाँ…”



चुम्मन…” गुड्डी ने बोला।
बहुत ही शानदार और लाजवाब अपडेट हैं डीबी ने सारी तैयारी कर ली गुड्डी ने जैसे जैसे बताया है उन सारी बातों को ध्यान में रखकर फोर्स को अलर्ट कर दिया है जो रिकॉर्डिंग आई है उससे गुड्डी पता लगा रही है आवाज से ये तो पता चल गया है कि गूंजा भी अंदर है आखिर कौन है ये चुम्मन???
 
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फागुन के दिन चार भाग ३०

कौन है चुम्मन ?

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उन्होंने गुड्डी को होंठों पे उंगली रखकर चुप रहने का इशारा किया और एक मिनट। वो बोले और जाकर दरवाजा बंद कर दिया। लौटकर उन्होंने रिकार्डिंग फिर से आन की और फुसफुसाते हुए गुड्डी से बोले- “ध्यान से एक बार फिर से सुनो, और बहुत कम और बहुत धीमे बोलना…”

रिकार्डिंग एक बार फिर से बजने लगी।

खतम होने के पहले ही गुड्डी ने कहा- “बताऊँ मैं?”
डी॰बी॰ ने सिर हिलाया- “हाँ…”

“चुम्मन…” गुड्डी बोली

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हम सब लोग चुप्पी साधे इंतेजार कर रहे थे। गुड्डी हम लोगों को देख रही थी। फिर बात आगे बढ़ायी-

“बहुत दिन से नहीं दिखा, 7-8 महीने पहले छोटा मोटा दादा टाइप चौराहे पे खड़ा रहता था। एक नई मोटर साइकिल भी ली थी।


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मतलब वो ज्यादा लड़कियों के चक्कर में नहीं रहता था। लेकिन बाकी सब उसे अपना बास मानते थे। लेकिन वो एक गुंजा के साथ लड़की है- महक। महकदीप, उसी की बड़ी बहन, प्रीत के साथ वो सीरियस हो गया था। उसको लगता था बस जो वो कहें सब माने, जैसे उसके चमचे मानते थे।

तो उसने उसको अपने साथ चलने के लिए कहा। दोनों बहनें स्कूटी पे आती थी, प्यारी गुलाबी रंग की।उसके अंकल बहुत पैसे वाले हैं, सिगरा पे उनका एक माल है, हथुवा मार्केट में कई दुकानें हैं, उसके अंकल के कोई है नहीं तो वो दोनों बहनें उनके साथ रहती थी, वैसे उसके फादर कनाड़ा में रहते थे…”



“हुआ क्या यार ये बताओ…” मैंने फास्ट फारवर्ड करने की कोशिश की।

डी॰बी॰ ध्यान से सुन रहे थे- “ठीक है। बोलने दो ना इसे…”

गुड्डी बोली- “तो उसने,… चुम्मन ने तेजाब फेंक दिया…”

“अरे इतना शार्ट कट भी नहीं…” मैंने समझाया।



गुड्डी बोली- “तुम्हीं तो कह रहे थे। खैर, तो मैं बता रही थी ना की चुम्मन ले जाना चाहता था उसको। कोई क्यों ले जाएगा किसी लड़की को,… मौज मस्ती।


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चुम्मन ने उसे दो-चार बार बोला- “चलती क्या खंडाला…” और एक दिन उसकी स्कूटी का हैंडल पकड़कर रोक दिया। जब तक वो संभलती। उसने प्रीत का हाथ पकड़ लिया और अब हम लोग वहीं खड़े थे साथ-साथ। चुम्मन ने उसे अपनी मोटर साइकिल की ओर खींचा।
चारों ओर उसके चमचे खी-खी कर रहे थे घेरकर।

चुम्मन ने बोला- “हे चल आज एक बार मेरे खूंटे पे बैठ जा। फिर खुद आएगी रोज दौड़ी दौड़ी…”

प्रीत ने पूरी ताकत से एक चांटा मार दिया और जब तक वो संभले। स्कूटी उठायी और चल दी… और अगले दिन से कार से आने लगी, ड्राइवर भी उसका बाड़ी-गार्ड टाइप…”


”डी॰बी॰ ने पूछा- “तेजाब उसने कब फेंका? क्या अगले ही दिन?”


गुड्डी फिर बोली-

“नहीं। 10-12 दिन हो गए थे। “एक्जाम का आखिरी दिन था। हम सब लोग बहुत मस्ती में थे। प्रीत मेरे आगे थी। मैं और महक साथ-साथ थे, उसकी कार थोड़ी दूर खड़ी होती थी। अभी तक मुझे एक-एक चीज याद है। अचानक कहीं से वो निकला, उस दिन वो अकेला था। हाथ पीछे…”

प्रीत की ओर आकर उसने एक बोतल दिखाई और बोला- “बहुत गुमान था ना गोरे रंग पे, इस जोबन पे ,
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अब देखता हूँ। तुझे कोई देखेगा भी नहीं…” और पूरी की पूरी बोतल उसकी ओर खोल कर उछाल दी।


लेकिन तब तक मैंने प्रीत का हाथ पकड़कर जोर से पीछे की ओर खींचा। वो पीछे की ओर मुँह के बल गिर पड़ी। इसलिए बच गई, थोड़ा सा उसके पैर के पंजे पे पड़ा बस। करीब 10 दिन बी॰एच॰यू॰ में भर्ती रही थोड़ी प्लास्टिक सर्जरी भी हुई। फिर ठीक हो गई…”

“और चुम्मन?” डी॰बी॰ कुछ कागज पर नोट कर रहे थे, फोन उनके लगातार जारी थे, लेकिन साथ-साथ वो गुड्डी की बात भी ध्यान से सुन रहे थे।

गुड्डी बोली- “वो दिखा नहीं उसके बाद से। उसके अगले दिन उसकी माँ आई थी। सब दुकानदारों से मिली की कोई गवाही ना दे। वैसे भी किसको पड़ी थी। हम लोगों से भी बोला, महक के अंकल से भी…”

डी॰बी॰ ने बोला- “वही जो बगल वाली टेबल पे बैठे थे…”

तब मुझे याद आया, एक लहीम शहीम 50-55 साल के बीच के, रंग ढंग कपड़े अंदाज से काफी पैसे वाले संभ्रांत लगते थे।

डी॰बी॰ ने पूछा- “था वो कहाँ का कुछ याद है?” साथ-साथ वो किसी को फोन लगा रहे थे, उसे इंतेजार करने के लिए बोलकर गुड्डी को उन्होंने देखा।

गुड्डी बोली- “सोनारपुरा,… शायद…”

डी॰बी॰ ने फोन पर इंतेजार कर रहे आदमी को बोला- “सोनारपुरा पी॰एस॰ को बोलना, उसका एक बन्दा है। हाँ वो जानता है मैं किसके बारे में बात कर रहा हूँ। बस उसको बोलना उस आदमी को बोले मेरे दूसरे वाले फोन पे रिंग करे…”
बहुत ही शानदार और लाजवाब अपडेट है तो ये चुम्मन एक सरफिरा आशिक है जो महक की बहन प्रीत के लिए सीरियस है जिसने प्रीत पर तेजाब भी फेंका था लेकिन गुड्डी की वजह से प्रीत का चेहरा बच गया हम तो सोच रहे थे कोई आतंकवादी है लेकिन ये तो लोकल गुंडा निकला अब ये सोनारपुर का क्या मामला है
 

Sanju@

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खबरी
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थोड़ी देर में ही ब्लेक बेरी पे रिंग आई।


डी॰बी॰- “सुनो। सोनारपुरा में कोई चुम्मन है। सुना है उसके बारे में? पिछले एक हफ्ते का उसका अता पता मालूम करो और उसकी माँ होगी। उसको मेरे पास ले आना। हाँ बुरके में और सीधे मेरे पास, आधे घंटे के अन्दर…”

फोन रखकर डी॰बी॰ बोले-

“इट मेक्स सेन्स बट डज नाट आन्सर आल द क्वेस्चन्स। ऐनी वे। इट साल्व्स प्रजेंट प्राब्लम। इट सीम्स…”



पहली बार डी॰बी॰ ने राहत कि साँस ली और दोनों हाथ पीछे करके अंगड़ायी ली- “आपने बहुत हेल्प की…” गुड्डी की ओर देखकर कहा, और फिर मुझे देखकर मुस्करा के बोले.
“बस यही बदकिस्मती है की आप इस जैसे घोन्चू के साथ। चलिये आप कि बदकिस्मती लेकिन इसकी किश्मत…”

गुड्डी मुश्कुरायी और बोली- “बात तो आपकी सही है। लेकिन किश्मत के आगे कुछ चलता है? वैसे आपका?”



मैं और डी॰बी॰ दोनों मुश्कुराये।

डी॰बी॰- “मेरी लाइन बहुत पहले ही बन्द हो चुकी है। बचपन में मेरी एक ममेरी बहन थी। वान्या। मुझसे बहुत छोटी और मैं उसके कान खींचा करता था और उसने पूरा बदला ले लिया अब। वो जिन्दगी भर मेरे कान खींचेगी…”


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गुड्डी ने बहुत अर्थपूर्ण ढंग से देखते हुये मुझे हल्के से आँख मार दी, और हल्के से बोली- “सीखो। सीखो…”


डी॰बी॰ फोन पर दूर खड़े होकर बात कर रहे थे। आकर वो फिर हम लोगों के पास बैठ गये और बोले-
“अच्छा ये चुम्मन डरता है किसी चीज से? और क्या तुम सोचती हो। कौन होगा उसके साथ?”



गुड्डी ने कुछ देर सोचा, और लगभग उछलकर बोली-

“चूहा। मेरे ख्याल से वो चूहे से डरता है, बल्की पक्का डरता है।

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जब, जिस दिन उसने प्रीत पे तेजाब फेंका था। मैंने बताया था ना कि मैं प्रीत के पीछे-पीछे ही थी, और मैंने उसक हाथ पकड़कर पीछे खींचा था। तो हम लोग ना जब किसी को डराना होता था तो बड़ी जोर से बोलते थे- चूहा।

हमारे क्लास में थे भी बहुत, मोटे-मोटे। बस वो डरकर बिदक गया। थोड़ा सा तेजाब उसके अपने हाथ पे भी गिर गया था। प्रीत को इसलिये भी कम लगा और उसके साथ, मेर पूरा शक है। रजऊ ही होगा। वही उसका सबसे बड़ा चमचा था और उसका नाम लेकर लड़कियों को डराता था, और खिड़की पे सबसे ज्यादा वही खड़ा रहता था…”


चुम्मन और रजऊ, चुम्मन मुख्य भूंमिका में और रजऊ उसका चमचा।

मुझे दिन का सीन याद आया। गुंजा के उरोजों पे रंगीन गुब्बारे का सटीक निशाना।

मैंने गुड्डी को देख के बोला और फिर मेरी चमकी और हंस के बोला

" अरे वही, जिसने सुबह गुंजा को होली का गुब्बारा फेंक के मारा था "

मुझे गुंजा की बात याद आयी, जब गुंजा स्कूल से लौट के आयी तो, स्कूल यूनिफार्म करीब करीब बची, सिवाय,… सही समझा


सबसे जबर्दस्त लग रहा था उसके सफेद स्कूल युनिफोर्म वाले ब्लाउज़ पे ठीक उसके उरोज पे, उभरती हुई चूची पे किसी ने लगता है निशाना लगाकर रंग भरा गुब्बारा फेंका था। फच्चाक।

और एकदम सही लगा था,… साइड से। लाल गुलाबी रंग। और चारों ओर फैले छींटे। सफ़ेद ब्लाउज यूनिफार्म का एकदम गीला, जुबना से चपका, उभार न सिर्फ साफ़ साफ़ झलक रहे थे बल्कि उस नौवीं वाली के उभार का कटाव, कड़ापन, साइज सब खुल के, मैं उसे दुआ दे रहा था जिसने इतना तक के गुब्बारा मारा था

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गुड्डी की निगाह भी वहीं थी।

“ये किसने किया?” हँसकर उसने पूछा। आखीरकार, वो भी तो उसी स्कूल की थी।

“और कौन करेगा?” गुंजा बोली।

“रजउ…” गुड्डी बोली और वो दोनों साथ-साथ हँसने लगी।

पता ये चला की इनके स्कूल के सामने एक रोड साइड लोफर है। हर लड़की को देखकर बस ये पूछता है- “का हो रज्जउ। देबू की ना। देबू देबू की चलबू थाना में…” और लड़कियों ने उसका नाम रजउ रख दिया है। छोटा मोटा गुंडा भी है। इसलिए कोई उसके मुँह नहीं लगता।

पक्का वही होगा और मैंने डीबी को बोला
" वही होगा, सुबह भी स्कूल के आसपास थी था, क्या पता उस रजऊ को लड़कियों पे नजर रखने के लिए चुम्मन ने बोला हो

तब तक ओलिव कलर में कुछ मिलेट्री के लोग आये। डी॰बी॰ ने खड़े होकर उनसे हाथ मिलाया और हम लोगों का परिचय कराया।



मिलेट्री मैन- “हम लोगों ने पूरी रेकी कर ली है। थर्मल इमेजिन्ग डिवाइसेज से भी। एक कोई नीचे के कमरे में है और एक ऊपर के कमरे में।

डी॰बी॰ बोले- “थैन्क्स सो मच मेजर समीर। इट विल बि ग्रेट हेल्प और मेरे ख्याल से। वी विल नाट रिक्वायर बिग गन्स। लेकिन आप तैयार रहिये। हम नहीं जानते सिचुयेशन क्या टर्न ले?” और खड़े हो गये।



मेजर को संकेत मिल गया और वो हाथ मिलाकर चले गये।

डी॰बी॰ अब हम लोगों के साथ खुलकर बात करने के मूड में थे- “चलो। ये बात अब साफ हो गई की ये नीचे वाला कमरा जिसे तुम प्रिन्सिपल का रूम कह रही हो चुम्मन यहां है…”

फिर अचानक उन्हें कुछ याद आया और उन्होंने ए॰एम॰, अरिमर्दन सिंह, सी॰ओ॰ कोतवाली को बुलाया। और बोले-

“ये मीडिया वाले साले। इनको बोल दो कोई भी लाइव टेलीकास्ट के चक्कर में ना पड़े अगले तीन घन्टों तक। वैन मोबाइल पे अगर कोई फोटो लेते दिखे, उसे अन्दर कर दो। ये भी साले फीड करते हैं। और 500 मीटर के बाहर…”

अरिमर्दन- “मैं सबको हैंडल कर लूंगा, पर सर वो इन्डिया टीवी…”



डी॰बी॰- “उसकी तो तुम…” अचानक डी॰बी॰ की निगाह बोलते-बोलते गुड्डी पे पड़ी और उसको देखकर बोले- “ऊप्स सारी तुम्हारे सामने…”

सी॰ओ॰ चले गये।



डी॰बी॰ ने फिर गुड्डी से माफी मांगने कि कोशिश की तो मैंने रोक दिया-

“आप इसको नहीं जानते। ये अगर मूड में आ जाय ना। तो ये सब जो आप बोल रहे थे ना कुछ नहीं है और अगर आप इनकी दूबे भाभी से मिलेंगे तो फिर तो जो आप फ्रेशर्स को सिखाते थे ना वो शरीफों की जुबान हो जाय…” मैंने जोड़ा।


डी॰बी॰ बोले- “मैं फिर जरूर मिलूंगा। बनारस में एक-दो भाभियां तो होनी ही चाहिये। ओके…”


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फिर बात पर लौट आये- “वो चुम्मन। वो नीचे प्रिन्सिपल के कमरे में इसलिये है कि वहां टीवी होगा…”



गुड्डी ने तुरन्त हामी भरी।

डी॰बी॰ बोले- “वो वहां से लाइव टेलीकास्ट देख रहा होगा। दूसरे वहा से मेन गेट और घुसने के सारे रास्ते दिखते हैं, यहां तक की वो खिड़की भी जिससे वो सब इंटर हुये थे। तो अगर उसके पास कोई रिमोट होगा तो वहीं से वो एक्स्प्लोड कर सकता है। लेकिन लड़कियों को वो अकेले नहीं छोड़ सकता तो ये जो थर्मल इमेजिन्ग दिखा रही है। गुड्डी आपने एकदम सही कहा था। लड़कियां इसी कमरे में होस्टेज हैं। लेकिन घुसेंगे कैसे? सामने से वहां वो बन्दा है और अगर उसके पास रिमोट हुआ। खिड़की। लेकिन लड़कियां एकदम सटकर हैं, ऐन्ड माई ब्रीफ इज जीरो कैजुअल्टी…”


तब तक एक फटीचर छाप जीन्स और कुर्ते में एक आदमी दनदनाता हुआ अन्दर घुसा। बाहर कोई उसको अन्दर आने से मना कर रहा था पर डी॰बी॰ ने आवाज देकर उसे अन्दर बुला लिया।

वो बोला- “सर जी आपने एकदम सही कहा था। कुछ दिन में तो आपको हम लोगों की जरूरत नहीं रहेगी…”



डी॰बी॰ ने पूछा- “सीधे मुद्दे पे आओ। ये बोलो। उसकी माँ मिली कि नहीं?”
चन्दर

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“अरे आप चन्दर को हुकुम दें और वो फेल हो जाय ये हो नहीं सकता। लाये हैं बाहर बैठी हैं। लेकिन मैंने सोचा कि मैं खुद साहब को पहले बता दूं ना…” उस आदमी ने बोला।



डी॰बी॰ ने कहा- “ठीक है बोलो…”

चंदर ने कहा- “वो तेजाब वाले वारदात के बाद, करीब छ महीने से वो गायब था। लेकिन अभी 10-12 दिन से नजर आ रहा है। अब सब लोग कहते हैं की एकदम बदल गया है। एकदम शान्त। बोलबै नहीं करता। घर पे भी कम नजर आता है और उसकी दो बातें जबरदस्त हैं। एक तो चाकू का निशाना, अन्धेरे में भी नहीं चूक सकता, और दूसरा जो लौन्डे लिहाड़ी हैं ना, वो सब बहुत कदर करते हैं। उसकी बात मानते हैं…”

डी॰बी॰ ने कहा- “ठीक है। उसकी माँ को बुला लाओ…”

जैसे ही बुरके में वो औरत आई, डी॰बी॰ उठकर खड़े हो गये और बोले- “अम्मा बैठिये…”

वो बैठ गईं और नकाब उठा दिया। एक मिडिल ऐजेड, 45-50 साल की गोरी थोडे स्थूल बदन की-
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“अरे भैय्या उ चुम्मनवा काव गड़बड़ किहिस। आप लोग काहे ओके पकड़े हैं?” उन्होंने बोला।


डी॰बी॰ ने बड़े शान्त भाव से प्यार से उनसे कहा-

“अरे नाहिं आप निशाखातिर रहिये। कोई नाहि पकड़े है उसको। कुछ नहीं किये है वो। आप पानी पिजिये…” और अपने हाथ से उन्होंने पानी बढ़ाया।

उन्होंने पानी का एक घूंट पिया और पूछा- “त बात का है? हम कसम खात हैं उ अब बहुत सुधर गया है…”

डीबी ने मोबाइल रिकार्डिन्ग को आन किया- “जरा ये आवजिया सुनियेगा…”

वो ध्यान से सुनती रही चुपचाप, फिर बोली- “अवाजिया त ओहि का है बाकी। …”


“बाकी का अम्मा?” डी॰बी॰ ने बड़े प्यार से उनसे पूछा।

“हमार मतलब। बाकी उ कह का रहा है, ये हमारे समझ में नहीं आ रहा है…”

“कौनो बात नहीं। त इ बतायीं की…”



और डी॰बी॰ की प्यार भरी बात ने 5 मिनट में सब कुछ साफ करा दिया।



चुम्मन की माँ ने बताया-


“उस तेजाब वाली घटना के बाद वो बम्बई चला गया था। उसके कोई फूफा रहते थे, उसके यहाँ… कुछ दिन टैक्सी वैक्सी का काम किया, लेकिन जमा नहीं, लाइसेंस नहीं मिला। फिर वो भिवंडी में। वहीं उसकी कुछ लोगों से उसकी मुलाकात हुई। वो एकदम मजहबी हो गया और अब जब आया है तो अब अपने पुराने दोस्तों से बहुत कम,.... खाली एक-दो से और एक कोई साहब कुछ खास काम दिये हैं, पता नही। बस यही कहता है की अम्मी बहुत बिजी हौं और कुछ जुगाड़ बन गया तो सऊदिया जाने का प्रोग्राम भी बन सकता है…”
आगे क्या करना है


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मेरी आँखों के सामने गुंजा की सूरत घूम रही थी, कहाँ तो उससे वादा कर के आया था की होली के बाद लौट के आऊंगा, रंगपंचमी के पहले लौट के आऊंगा और सबसे पहले होली उसी के साथ खेलूंगा, और कहाँ अब उसके जान बचने की दुआ मांग रहा था, बार बार मन घबड़ा रहा था

चन्दर को बुलाकर डी॰बी॰ ने हिदायत दी- “इन महिला को आराम से एक कमरे में रखे…” और हम लोग मिलकर ऐक्शन प्लान बनाने में जुट गये।

आगे क्या करना है अब इसका प्लान बनाना था

बहुत चीजें साफ़ हो गयी थीं, गुड्डी की बात से और उससे बढ़ कर चुम्मन की माँ के बयान से।

डीबी ने ये सब बात सिर्फ हम तीनो तक सीमित रखी थी, मैं गुड्डी और डीबी,

बाहर तो वही, भय आतंक, एस टी ऍफ़ के आने की तैयारी, मिलेट्री के लोग, पुलिस की स्पेशल कमांडो टीम, अलग अलग डिपार्टमेंट के लोग अलग सिचुएशन सम्हाल रहे थे। और हर थाने से खबरी, लोकल इंटेलिजेंस वाले टेंशन बढ़ने की सूचना दे रहे थे, मिडिया वाले अलग आग में हाथ सेंक रहे थे, टी आर पी बढ़ाने के चक्कर में थे,


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और डीबी कभी हम लोगों के साथ, तो कभी बीच बीच में सिद्दीकी, तो कभी लोकल इंटेलिजेंस यूनिट वाला, लगातार बज रहे फोन को भी हैंडल कर रहे थे, लेकिन कभी हम लोगों के पास से हटकर, कमरे के दूसरे ओर तो कभी बगल के कमरे में जाकर,

और मैं और गुड्डी सामने पड़े गुड्डी के बनाये नक़्शे को देख रहे थे, और अब साथ में मिलेट्री के लोगो ने जो थर्मल इमैजिंग की बहुत क्लियर दोनों मंजिलो की पिक्चर्स दी थीं उसे भी गुड्डी के बनाये नक़्शे से मैं जोड़ कर देख रहा था, सामने स्क्रीन पर अलग अलग एंगल से स्कूल की बिल्डिंग की तस्वीर आ रही थी, कैमरे का एंगल भी चेंज कर के देखा जा सकता था।

इन तीनो को बार बार देख के मन में कुछ बातें मेरे एकदम साफ़ हो गयीं थीं



१ स्कूल बिल्डिंग में गुंजा और उसके साथ की दो लड़कियों के अलावा सिर्फ दो और लोग हैं, वही जिन्होंने उन्हें बंधक बनाया है।


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२ उनमे से एक, चुम्मन नीचे प्रिंसिपल के कमरे में टीवी पर चल रही ख़बरों से बाहर की हाल चाल ले रहा होगा और वहां लैंडलाइन फोन भी है , और अगर जरूरत पड़ी तो उससे बात भी कर सकता है। उस कमरे की खिड़की भी थोड़ी खुली है, जहाँ से वो बाहर का नजारा देख रहा है।

३ दूसरा ऊपर के कमरे में लड़कियों के आस पास ही है, थर्मल इमेजिंग में करीब पन्दरह बीस फुट दूर नजर आ रहा है, बम्ब का रिमोट उसी के पास होगा। और चुम्मन ने उसे बोला होगा की लड़कियों के ऊपर नजर रखने को, लेकिन बम्ब से डर कर वह कमरे के दूसरी ओर या दरवाजे के पास खड़ा है।


४ तीनो लड़कियां एक साथ दरवाजे के पास, जो खिड़की गुड्डी ने बतायी थी, बस वही चिपक के बैठी हैं और बम्ब वही हैं।


५, गुड्डी के प्लान से कमरे में घुसने का रास्ता निकलने का रास्ता सब साफ़ हो गया था और कैमरे की फीड से नीचे का वो दरवाजा भी हल्का हलका दिख रहा था।



तो दोनों होस्टेज बनाने वाले चुम्मन और उसका चमचा थे और गुंजा के साथ बाकी दो लड़कियां कौन थीं?



सुबह की गुंजा के साथ जबरदस्त होली बार बार मुझे याद आ रही थी, छोटी सी प्यारी सी लड़की, इतनी खुश और मस्त और अब बस एक धागे से उसकी और उसकी दोनों सहेलियों की जान, बार बार मेरा दिल भर आ रहा था, लेकिन मेरे सवाल का जवाब भी उसी से मिल गया। बाकी दो लड़कियां, गुड्डी ने महक, की बहन का किस्सा और उसका चुम्मन का चक्कर बताया था, तो पक्का एक लड़की महक ही होगी और वही चुम्मन की असली टारगेट होगी, और वो दोनों हैं तो साथ में शाजिया भी होगी।



दोपहर की गुंजा के संग होली में इसी स्कूल के तो कितने किस्से गुंजा ने बताये थे और अपनी सहेलियों के भी

" जीजू, चलिए जीजा के साथ तो, ....और साली तो साली होती, छोटी बड़ी नहीं होती,... लेकिन उसके महीने भर के अंदर ही उसके एक फुफेरे भाई थे उससे पूरे सात साल बड़े, बस उसपे सुनीता ने लाइन मारनी शुरू कर दी और उनके साथ भी,... और फिर आके बताती, ...अभी तो चार पांच यार हैं उसके, कोई हफ्ता नहीं जाता जब कुटवाती नहीं और फिर आके हम लोगो को ललचाती है, ख़ास तौर से मुझे महक और शाजिया को, हम तीनो का क्लास में फेविकोल का जोड़ है.,...


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और अब खाली हम छह सात ही बची हैं , जिनकी चिड़िया नहीं उडी, खैर मेरी पे तो मेरे जीजू का नाम लिखा है "

"मैंने शाजिया और महक ने तय कर लिया था कुछ और लड़कियों से मिल के,.... आज होली में इस स्साली सुनीता की बुलबुल को हवा खिलाएंगे, लेकिन महक जानती थी की वो स्साली जरूर भागने की कोशिश करेगी, पीछे वाली सीढ़ी से, बस मैं और शाजिया तो नौ बी वालो की माँ बहन कर रहे थे,

लेकिन महक की नजर बाज ऐसी सीधे सुनीता पे, और जैसे सुनीता ने क्लास के पीछे वाले दरवाजे से निकलने की कोशिश की वो पंजाबन उड़ के क्या झपट्टा मारा, और फिर दो तीन लड़कियां और, और इधर हम लोग भी जीत गए थे, फिर तो मैं और शाजिया भी, "



मैं और गुड्डी दोनों ध्यान लगा के सुन रहे थे, गुंजा मुस्कराते हुए मेरी आँख में आँख डाल के बोली,



" जीजू, शाजिया, कभी मिलवाउंगी आपसे, ....पक्की कमीनी, लेकिन वो और महक मेरी पक्की दोस्त दर्जा ४ से,...

बस होली में कोई शाजिया की पकड़ में आ जाए,... महक और बाकी लड़कियों ने पीछे से हाथ पकड़ रखा था सुनीता का और शाजिया ने आराम से स्कर्ट उठा के धीरे धीरे चड्ढी खोली सुनीता की, दो टुकड़े किये और अपने बैग में रख ली, और जीजू आप मानेंगे नहीं, शाजिया ने उसकी बिल फैलाई तो भरभरा के सफेदा, और चारो ओर भी, मतलब स्कूल के रस्ते में किसी से चुदवा के आ रही थीं।

कम से कम पांच कोट रंग का और शाजिया ने कस के दो ऊँगली एक साथ उस की बिल में पेल दी, ऊपर वाला हिस्सा मेरे हिस्से में, ...चड्ढी शाजिया ने लूटी और ब्रा मैंने,... फिर मैंने भी खूब कस के रंग पेण्ट सब लगाया।

उस के साथ तो जो होली शुरू हुयी, आज पूरे दो घंटे थे, सीढ़ी वाले रास्ते से कोई जा नहीं सकता था महक उधर ही थी और जब तक फाइनल छुट्टी का घंटा नहीं बजता बाहर का गेट खुलता नहीं। इसलिए खूब जम के अबकी होली हुयी, ब्रा चड्ढी तो सबकी लूटी भी फटी भी, मैंने खुद तीन लूटीं, "



"लेकिन ये बताओ," मैंने उसके उभारो पर बने उँगलियों के निशानों की ओर इशारा किया ये


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वो जोर से खिलखिलाई,

" मन कर रहा है आपका शाजिया से मिलने का, बताया तो शाजिया के हाथ के निशान हैं लेकिन पहले मैंने ही, मैं सफ़ेद वार्निश वाली ३-४ डिब्बी ले गयी थी बस वही उसकी दोनों चूँचियों पे, एकदम इसी तरह, उसके भी और महक के भी, और शाजिया के तो पिछवाड़े भी, वहां तो छुड़ाने में भी उसकी हालत खराब हो जायेगी। "


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तो दो चार घंटे पहले ये तीन लड़कियां इतनी मस्ती कर रही थीं लेकिन अब, ....क्या हालत हो रही होगी उन बेचारियों की, सोच सोच के क्या होनेवाला है।

ये सोच के बस रोना नहीं आ रहा था, लेकिन मैंने तय कर लिया, कुछ भी हो और बहुत जल्द, क्योंकि वो कोई प्रोफेशनल तो हैं नहीं कब उन्हें डर लगे की वो पकडे जाएंगे और बम्ब का स्विच दबा दें,....



एक बार फिर मैंने नक़्शे को, थर्मल इमेजेस को देखा और धीरे धीरे एक एक दरवाजे, खिड़की रस्ते को मन में बैठा लिया। अब आँखे बंद कर के भी मैं जा सकता था।

मैंने डी॰बी॰ से पूछा- “अरे जब पता चल गया है कि ऐसा कोई खास नहीं हैं तो आप बता क्यों नहीं देते? फालतू का टेन्शन…”

डी॰बी॰ बोले- “मुझे बेवकूफ समझ रखा है। पहली बात इस बात की क्या गारन्टी की वो टेररिस्ट नहीं है? दूसरी इतना बढ़िया मौका मेरे लिये। इसी बहाने आर॰ऐ॰एफ॰, सी॰आर॰पी॰एफ॰ ये सब मिल गईं अब होली पीसफुली गुजर जायेगी। वरना डंडा छाप होमगार्ड के सहारे। इतना ज्यादा अफवाह है होली में दंगे की। और तीसरी बात- बेसिक सिचुएशन तो नहीं बदली है ना। वो तीन लड़कियां तो अभी तक होस्टेज हैं…”



बात तो उनकी सही थी।

डीबी ने जो बात नहीं बोली थी वो भी मैंने सुन ली,

क्या पता कोई टेरर लिंक हो ही। चुम्मन बंबई से आया है, अपनी अम्मी से कही विदेश जाने की बात कर रहा है, फिर उसकी अम्मी ने जो ये बात बोली की बंबई से लौटने के बाद एकदम बदल गया है। कुछ भी हो सकता है और सबसे बड़ी बात ये बम्ब, कहाँ से उसके हाथ लगा, फोड़ के फेंकने वाला लोकल नहीं था, तो कैसे उस एंगल को रूल आउट कर सकते हैं



और वो बात जो डीबी को ज्यादा तंग कर रही थी, नैरेटिव, पोलिटिकल लीडरशिप का एक पार्ट टेरर एंगल ही चाहता था तभी तो पोलिटिकल माइलेज मिलेगा, मीडया की भी टी आर पी मिलेगी और पुलिसवालों को मैडल मिलेगा, पकड़ लिया पकड़ लिया और इसलिए बोला गया है एस टी ऍफ़ का इंतजार करें मिडिया की आँखों के सामने आपरेशन, लड़कियां इन्वाल्व हैं, होली का मौका,

उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता की आपरेशन में लड़कियों की जान जा सकती है

डर से वो दोनों बॉम्ब एक्सप्लोड कर सकते हैं

और मिडिया वालो की हेडलाइन इम्प्रूव हो जायेगी

पर इसलिए ही डीबी और हम दोनों चाहते हैं की लड़कियां आपरेशन के पहले बाहर निकल जाए क्योंकि एस टी ऍफ़ के आने के बाद बातें उन के कंट्रोल के बाहर हो जायेगी।

और एक बात और थी, शहर में टेंशन, मेरे खड़े कानो ने सुन लिया था और डीबी के चेहरे का टेंशन देख लिया था। चुम्मन की अम्मी जो अभी बुर्के में आयी थी, कहीं किसी की नजर में पड़ गयी, तो एक नया एंगल


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लेकिन गुड्डी ज्यादा फोकस्ड थी, वो श्योर थी अब बिना रुके लड़कियों को छुड़ाने का काम होना चाहिए

हम दोनों ने मिलकर प्लान बनाना शुरू किया, लेकिन शुरू में ही झगड़ा हो गया और सुलझाया गुड्डी ने। उसकी बात टालने कि हिम्मत डी॰बी॰ में भी नहीं थी। झगड़ा इस बात पे था कि पीछे वाली सीढ़ी से अन्दर कौन घुसे?
अन्दर कौन घुसे?

मेरा कहना था की मैं।

डी॰बी॰ का कहना था की पुलिस के कमान्डो।



मेरा आब्जेक्शन दो बातों से था।

पहला जूते, दूसरा सफारी। पुलिस वाले वर्दी पहने ना पहनें, ब्राउन कलर के जूते जरूर पहनते हैं और कोई थोड़ा स्मार्ट हुआ, स्पेशल फोर्स का हुआ तो स्पोर्टस शू। और सादी वर्दी वाले सफारी। दूर से ही पहचान सकते हैं और सबसे बढ़कर। बाडी स्ट्रक्चर और ऐटीट्युड। उनकी आँखें।

डी॰बी॰ का मानना था कि बो प्रोफेशनल हैं हथियार चला सकते हैं, और फिर बाद में कोई बात हुई तो?



मेरा जवाब था- “हथियार चलाने से ही तो बचना है। गोली चलने पे अगर कहीं किसी लड़की को लगी तो फिर इतने आयोग हैं, और सबसे बढ़कर न मैं चाहता था ना वो की ये हालत पैदा हों। दूसरी बात। अगर कुछ गड़बड़ हुआ तो वो हमेशा कह सकता है की उसे नहीं मालूम कौन था? वो तो एस॰टी॰एफ॰ का इन्तजार कर रहा था…”



लेकिन फैसला गुड्डी ने किया। वो बोली-

“साली इनकी है, जाना इनको चाहिये और ये गुंजा को जानते हैं तो इन्हें देखकर वो चौंकेगी नहीं और उसे ये समझा सकते हैं…”



तब तक एक आदमी अन्दर आया और बोला- “बाबतपुर एयरपोर्ट, बनारस का एयरपोर्ट से फोन आया है की एस॰टी॰एफ॰ का प्लेन 25 मिनट में लैन्ड करने वाला है और बाकी सारी फ्लाइट्स को डिले करने के लिये बोला गया है। उनकी वेहिकिल्स सीधे रनवे पर पहुँचेंगी…”



डी॰बी॰ ने दिवाल घड़ी देखी, कम से कम 20 मिनट यहां पहुँचने में लगेंगें यानी सिर्फ 45 मिनट। हम लोगों का काम 40 मिनट में खतम हो जाना चाहिये। फिर उस इंतेजार कर रहे आदमी से कहा- “जो एल॰आई॰यू॰ के हेड है ना पान्डेजी। और एयरपोर्ट थाने के इन्चार्ज को बोलियेगा की उन्हें रिसीव करेंगे और सीधे सर्किट हाउस ले जायेंगे। वहां उनकी ब्रीफिंग करें…”



अब डी॰बी॰ एक बार फिर। पूरी टाइम लाइन चेन्ज हो गई। डी॰बी॰ ने बोला- “जीरो आवर इज 20 मिनटस फ्राम नाउ…”



मुझे 15 मिनट बाद घुसना था, 17 मिनट बाद प्लान ‘दो’ शुरू हो जायेगा 20वें मिनट तक मुझे होस्टेज तक पहुँच जाना है और अगर 30 मिनट तक मैंने कोई रिस्पान्स नहीं मिला तो सीढ़ी के रास्ते से मेजर समीर के लोग और। छत से खिड़की तोड़कर पुलिस के कमान्डो।



डी॰बी॰ ने पूछा- “तुम्हें कोई हेल्प सामान तो नहीं चाहिये?”



मैंने बोला- “नहीं बस थोड़ा मेक-अप, पेंट…”



गुड्डी बोली- “वो मैं कर दूंगी…”



डी॰बी॰ बोले- “कैमोफ्लाज पेंट है हमारे पास। भिजवाऊँ?”



गुड्डी बोली- “अरे मैं 5 मिनट में लड़के को लड़की बना दूं। ये क्या चीज है? आप जाइये। टाइम बहुत कम है…”



डी॰बी॰ बगल के हाल में चले गये और वहां पुलिसवाले, सिटी मजिस्ट्रेट, मेजर समीर के तेजी से बोलने की आवाजें आ रही थीं।



गुड्डी ने अपने पर्स, उर्फ जादू के पिटारे से कालिख की डिबिया जो बची खुची थी, दूबे भाभी ने उसे पकड़ा दी थी, और जो हम लोगों ने सेठजी के यहां से लिया था, निकाली और हम दोनों ने मिलकर। 4 मिनट गुजर गये थे। 11 मिनट बाकी थे।



मैंने पूछा- “तुम्हारे पास कोई चूड़ी है क्या?”



“पहनने का मन है क्या?” गुड्डी ने मुश्कुराकर पूछा और अपने बैग से हरी लाल चूड़ियां। जो उसने और रीत ने मिलकर मुझे पहनायी थी।



सब मैंने ऊपर के पाकेट में रख ली। मैंने फिर मांगा- “चिमटी और बाल में लगाने वाला कांटा…”



“तुमको ना लड़कियों का मेक-अप लगता है बहुत पसन्द आने लगा। वैसे एकदम ए-वन माल लग रहे थे जब मैंने और रीत ने सुबह तुम्हारा मेक अप किया था। चलो घर कल से तुम्हारी भाभी के साथ मिलकर वहां इसी ड्रेस में रखेंगें…” ये कहते हुये गुड्डी ने चिमटी और कांटा निकालकर दे दिया।



7 मिनट गुजर चुके थे, सिर्फ 8 मिनट बाकी थे। निकलूं किधर से? बाहर से निकलने का सवाल ही नहीं था, इस मेक-अप में। सारा ऐड़वान्टेज खतम हो जाता। मैंने इधर-उधर देखा तो कमरे की खिड़की में छड़ थी, मुश्किल था। अटैच्ड बाथरूम। मैं आगे-आगे गुड्डी पीछे-पीछे। खिड़की में तिरछे शीशे लगे थे। मैंने एक-एक करके निकालने शुरू किये और गुड्डी ने एक-एक को सम्हाल कर रखना। जरा सी आवाज गड़बड़ कर सकती थी। 6-7 शीशे निकल गये और बाहर निकलने की जगह बन गई।



9 मिनट। सिर्फ 6 मिनट बाकी। बाहर आवाजें कुछ कम हो गई थीं, लगता है उन लोगों ने भी कुछ डिसिजन ले लिया था। गुड्डी ने खिड़की से देखकर इशारा किया। रास्ता साफ था। मैं तिरछे होकर बाथरूम की खिड़की से बाहर निकल आया।


वो दरवाजा 350 मीटर दूर था।

यानी ढाई मिनट। वो तो प्लान मैंने अच्छी तरह देख लिया था, वरना दरवाजा कहीं नजर नहीं आ रहा था। सिर्फ पिक्चर के पोस्टर।

तभी वो हमारी मोबाईल का ड्राईवर दिखा, उसको मैंने बोला- “तुम यहीं खड़े रहना और बस ये देखना कि दरवाजा खुला रहे…”



पास में कुछ पुलिस की एक टुकडी थी। ड्राइवर ने उन्हें हाथ से इशारा किया और वो वापस चले गये। 13 मिनट, सिर्फ दो मिनट बचे थे।

मैं एकदम दीवाल से सटकर खड़ा था, कैसे खुलेगा ये दरवाजा? कुछ पकड़ने को नहीं मिल रहा था। एक पोस्टर चिपका था। सेन्सर की तेज कैन्ची से बच निकली, कामास्त्री।


हीरोईन का खुला क्लिवेज दिखाती और वहीं कुछ उभरा था। हैंडल के ऊपर ही पोस्टर चिपका दिया था। दो बार आगे, तीन बार पीछे जैसा गुड्डी ने समझाया था।

सिमसिम।

दरवाजा खुल गया। वो भी पूरा नहीं थोड़ा सा।
बहुत ही शानदार और लाजवाब अपडेट है गुड्डी और चुम्मन की मां ने आवाज को पहचान लिया है अब ये कन्फर्म हो गया है कि वह चुम्मन ही है लेकिन उसकी मां ने जो बताया है उससे लगता है कि चुम्मन भिवंडी में किसी गैंग से मिला जिसने शायद उसे आतंकवादी ग्रुप से मिलाया हो जब ही वो किसी काम की बात कर रहा था डीबी मिलिट्री के आने से पहले अपना मिशन पूरा करना चाहता है इसलिए वह आनंद और गुड्डी के साथ प्लान बनाता है गुड्डी तय करती हैं कि अंदर आनंद को जाना चाहिए क्योंकि गूंजा उसे जानती है और वह उसे कॉपरेट भी करेगी इसलिए आनंद अपना लुक चेंज करके अंदर जा रहा है देखते हैं अपने मिशन में कामयाब होता हैं या नहीं
 
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