नहीं नहीं , बुरा मानने की कोई बात नहीं, बल्कि मैं खुश होती हैं की कोई इतने ध्यान से पढ़ता है और मेरी बात सही ढंग से पहुँच रही है,
दूसरा फायदा इस बतकही का ये होता है मुझे की इस कहानी के साथ अपनी बाकी कहानी के भी कुछ अंतर्निहित प्रसंगो को उल्लेख कर लेती हूँ, वरना लोक भाषा, रीत रिवाज और लोक गीत तो बस अब लुप्त होते जा रहे हैं,
अब आपने बात छेड़ दी है तो दुबारा,... इसी भाग के अंत में भी जैसे मैंने एक लाइन लिखी थी,
" तैयारी कर लीजिये, देवरानी उतारने के लिए चुनरी लूंगी और पोता होने क पियरी , और उसकी दोनों दादी लोगन क सोहर के साथे जम के गारी सुनाऊँगी। "
आप ऐसे रस सिक्त पाठक जब उन्हें समझते है रस से भीगते हैं सराहतें हैं तो सारी मेहनत वसूल हो जाती है।