आप ऐसे रससिद्ध, भावप्रणव, गुणग्राही, पाठकों से ऐसे शब्द पढ़ के,... बस लगता है जो मैं कहना चाहती थी, जिस तरह से बस उसी तरह से आप तक पहुंचा पायी,ये तुलना हीं बाकी कहानियों से जुदा नजारा पेश करता है...
भावनाओं को सही शब्दों के तालमेल से व्यक्त करना ... कहानी में एक अलग रंग भर देता है...
आपकी यही कला एक अद्वितीय अनुभव कराती है...

अरे आगे का सब कुछ बताने से सस्पेंस ख़तम हो जाएगा न,...अगर इसकी भी झलक मिल जाए तो....
आप दो चार शब्दों में वो बात कह देते हैं जो मैं शायद पूरी पोस्ट में नहीं कह पाती,..पोस्ट करने के बाद से ही आप के कमेंट्स का इन्तजार रहता है,... पुनश्च आभार, धन्यवादबाह्य वातावरण के साथ अंदर के तूफान का संगम ..
क्या शमां बनाया है....
ऐसा लगता है कि पाठकों को शब्दों के जादुई मोहपाश में बाँध लिया गया हो....
Thanks so muchउसके भाई ने पहले तो अपनी बहन के चूतड़ के नीचे जितने भी तकिये पलंग पे थे उसे लगाकर ऊंचा किया , फिर लम्बी छरहरी गोरी गोरी टाँगे अपने कंधो पर लेकर ,... पहले तो दोनों हाथों से फांको को फैला के मोटे सुपाडे को सेट किया, और अब दोनों हाथों को बहन की पतली कटीली कमर पे ,... जितना भी उछले छटक कर अलग न होने पाए , बस एक बार पूरा सुपाड़ा घुस गया , उसके बाद तो लाख चूतड़ पटके , बिन चुदे,...
Bahut hi mast detail mei explain kiya hai![]()
Adesh mst updateUfff ekdam garm
Komal ji achhi??? Are bahot achhi lag rahi he. Ek to aap mahol vo creat karti ho ki dill khush ho jata he.bahoot bahoot thanks, ek writer ke munh se aisi shabd sunana, i am really thankful ki aap time nikal ke ye story padh rahi hain aur aapko acchi lag rahi hai
Sahi haimujhe laga ki ek popular mineal water ke add ko istemaal karke heading banaayi jaaye aur istemaal kiya jaaye , thanks apako pasand aaya
पिछवाड़ा कोरा
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और मेरे नन्दोई चाहते भी तो यही थे , कस के उन्होंने छुटकी को दबौचे हुए थे लेकिन उनका एक हाथ छुटकी के पिछवाड़े फ्राक के अंदर छोटे छोटे लौंडा मार्का चूतड़ों को सहला रहा था , और आँखे मेरे साजन से सवाल पूछ रहीं थी ,
" पिछवाड़ा कोरा है न ,... "
मेरे साजन ने इशारे से ही लेकिन उन्हें पक्का भरोसा दिलाया , वो इलाका उन्होंने मेरे नन्दोई के लिए छोड़ रखा है , एकदम कोरा ,
नन्दोई की उँगलियाँ अब सीधे पिछवाड़े की दरार पर थी , ...
मैं अपनी ननद से गले मिल रही थी लेकिन मेरी और ननद दोनों की निगाहें नन्दोई की उँगलियों पर थीं और हम दोनों मुस्करा रहे थे , ...
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मैं ये और सोच के मुस्करा रही थी की छुटकी ने तो अपनी चड्ढी उस चाय वाले को गिफ्ट कर दी थी, तो नन्दोई जी की उँगलियाँ सीधे उस के कुंवारे अनभोगे पिछवाड़े पर टहल रही होंगी, सहला रही होंगी , दबोच दबोच के हालचाल ले रही होंगीं,...
और तब तक मेरी निगाह दोनों लड़कियों पर पड़ गयी , एक शादी शुदा , एक कुँवारी , और पहचान मैं दोनों को अच्छे से रही थी , ....
एक तो नैना थी , शादी शुदा , मुझ से भी साल डेढ़ साल छोटी लेकिन शादी मुझसे आठ नौ महीने पहले हो गयी , पड़ोस की , पट्टीदारी की ही , ..
जैसे छोटी ननदो से मिलते हैं , उसी तरह मिली उससे मैं , गले मिलते ही मेरा एक हाथ उसके ब्लाउज के अंदर और दूसरा ब्लाउज के ऊपर से कस कस के उसके उभार को दबाने लगा , और वही हरकत वो भी कर रही थी , मुझसे भी जोर जोर से मीज रही थी और मुझे छेड़ा
" काहौ भौजी , यहाँ देवर से चोदवाय के मन नहीं भरा था का , की होली में मायके के पुराने यारों की पिचकारी घोंटने चली गयी ,.... "
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मैं क्यों छोड़ देती , कस के उसके निप्स पिंच करते मैं बोली ,
" अरे मुझे मालूम था की तुम आने वाली हो , तो देवरों को तेरे लिए छोड़ दिया था , एक दो से तो मेरी ननद का काम चलता नहीं , ... "
" एकदम नहीं भौजी भौजी , बंनाने वाले ने तीन तीन छेद बनाये हैं , तो एक दो से काहें काम चलावें ,... " हंस के वो बोली , और उस का एक हाथ अब मेरे पेटीकोट में घुस गया था।
