इस कहानी में ढेर सारे एरोटिक प्रसंगों के बीच कहीं कहीं अवसाद छलक जाता है, शायद यह फोरम के किसी अलिखित परंपंरा या पाठकों की आशा के अनुरूप न हो पर कहानी जिंदगी के आसपास चलती है तो दस बीस पार्ट्स के बाद रोकते रोके भी वह अनबोला दुःख छलक ही जाता है। मौज मस्ती की मोटी परत के नीचे कहीं कहीं अकेलापन भी है, सन्नाटा भी है और वह अकेलापन कुछ नजदीकियां भी ले आता है।
अरविन्द का मामला कुछ ऐसा ही है। आपको याद ही होगा, भाग ५० माँ ( पृष्ठ ५२१ ), दोहा में कई काम करने गए लोगों की मौत से जुडी थी वो पोस्ट और उसी से जुड़े थे अरविन्द और गीता के बाबू जी, उसी भाग में ये लाइन आयी थी
" गीता फिर चुप हो गयी,... फिर अब उसने बोलना शुरू किया तो नहीं रुकी,...
बहुत खराब खबर थी,... पास के गाँव की दो औरतों ने,... एक को तो मैं जानती भी थी,... सिन्दूर पोंछ लिया, चूड़ी तोड़ दिया,...बिदा होके गौने आयी थी तो मैं गयी थी, गौने के दस दिन के अंदर ही,... उसका मरद, वही बाबू जी वाली एजेंसी से ही,... साल भर हुआ होगा,... बोल के गया था जल्दी आयंगे,... हम लोग चिढ़ाते भी थे की जब अबकी आएंगे तो नौ महीने बाद सोहर होगा,... लेकिन,... लेकिन अखबार में फोटो आयी।"
और होलिका माई वाले प्रसंग में ( भाग ६७ पृष्ठ ६४३ )
" बाइस पुरवा में ही तो पांच लोग मरे थे फूटबाल के खेल के लिए जो गए थे, गितवा के बाबू जी भेजे थे, गलती उनकी कोई नहीं थी वो तो अच्छी नौकरी ही दिलवाये थे,... लेकिन उसमें एक सुहागिन थी, हाथ की मेंहदी, पैर का महावर भी नहीं सूखा था की ज्यादा पैसे के लालच में वो चला गया और लौटी तो अखबार में फोटो, और कोई उसको समझा दिया की यही गितवा के माई के मर्द बुलवाये थे,
बस उसने जब चौखट पर चूड़ी तोड़ी तो गितवा के माई का नाम ले ले कर, जैसा मेरा सुहाग उजड़ा वैसे ही,...
बाद में लोगो ने बहुत समझाया,... गितवा के माई से वो खुद बोली, लेकिन गितवा क माई बोली, गलती तुम्हारी नहीं है दुःख ऐसा कौन बर्दास्त कर पायेगा, बस हम लोगों को माफ़ कर दो , गितवा के बाबू का पता नहीं चल रहा था, मिले भी तो कई महीने से टल रहा था अब बम्बई लौटेंगे तब लौटेंगे, लेकिन अब पक्का हो गया दो महीने में,... और गाँव नहीं आ पाएंगे की इतने लोगों की आह लगी है,..."
यहाँ तक की होलिका माई ने भी मना कर दिया की अरविन्द के बाबू अब इस गाँव की सरहद में नहीं आ पाएंगे,
" गितवा क माई बहुत पूजा पाठ की है, सबका उपकार की है, सपने में भी किसी का बुरा नहीं सोची, है तो सावित्री की तरह सत्यवान को लौटा लेगी, अषाढ़ के उज्जर पाख के एकादशी के दिन, लौट आयंगे समुन्दर पार से,... लेकिन,...
वो आवाज रुक गयी , फिर हलकी आवाज में बोली,
उनकर मरद बस ठीक ठाक रहेंगे, ये लड़कन को यहाँ से ले जाने क धंधा छोड़ दें,... हाँ अब यह बाइस पुरवा क सरहद में बकी अब वो नहीं आ सकते,... नहीं आएं तो ठीक,... गितवा क माई का घर गाँव है जब चाहे आये,... सावन में आएगी वो महीना भर के लिए तो सत्ती माई क पूजा करे और बाइस पुरवा क औरतों को भोज दे, ."
तो अब आप सोच सकते हैं अरविन्द और गीता की मनस्थिति, अरविन्द ने इसी लिए मन बना लिया था, गीता के अलावा और किसी के साथ नहीं हाँ फुलवा की बहिनिया या फुलवा की ननद की बात अलग थी, फुलवा खुद उसको अपनी बहन सौंप कर गयी थी।
लेकिन अरविन्द को छुटकी भा गयी थी इसलिए कबड्डी से ही गीता जैसे ही आउट हुयी छुटकी भी आउट हो गयी और वो दोनों
अरविन्द के पास, अगले दिन छुटकी को आना भी नहीं था , न वो ननद थी न भाभी तो अरविन्द, छुटकी और गीता और वो प्रंसग अलग से आएगा बाद में हो सकता है अंतिम हिस्से के आसपास।