भाग 117 ---बुच्ची --भैया से मिलन के बाद पृष्ठ १२१९
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Very erotic updateभाग ९२ ननद और आश्रम
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" हम को तो लागत है भौजी हम पहलवे दिन गाभिन हो गए, " शरारत भरी मुस्कान से खुश खुश मेरी ननद बोलीं। जो बात मैं मैं कहना चाहती थी, उन्होंने खुद दी। मेरे मरद का बीज खाली नहीं जानेवाला था।
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" लगता तो हमको भी यही है, बनायी दिहु अपने भैया के बाप. लेकिन, ... चला कल तो आराम कर लिया पांच में से दो दिन निकल गए, तीन दिन बचे, लेकिन ये तीन दिन नन्दोई जी की परछाई भी नहीं पड़नी चाहिए। पांचवें दिन के बाद भिन्सारे क जून साथे हम लोग होलिका माइ क नाम ले के चेक करेंगे, पक्का नौ महीने में बिटिया आएगी। "
मैंने अब साफ़ साफ़ बोल दिया।
" भौजी, आज तो कोई दिक्क्त नहीं है, भैया आयी रहे होंगे , और नन्दोई तोहार रात में नर्सों के साथ, लेकिन कल दुपहरिया में सांन्झ तक भी आगए तो तोहार ननद कैसे बचे, " अपनी परेशानी ननद ने बता दी।
बात तो उनकी सही थी, अपने साले की तरह उन्हें भी रोज हलवा पूड़ी चाहिए थी। लेकिन मैंने ये जिम्मेदारी भी अपने कंधे पर ले ली। ननद का गाल चूम के बोली,
" ओकर चिंता जिन करा, आखिर भौजाई सब काहें को होती हैं. कल रात तोहरे परछाई के पास नहीं फटकेंगे, बस जैसे जैसे हम कही,... और बाकी अपने भइया के साथ गपागप, गपागप,..... और एक बूँद बीज क न कही बाहर जाये, न बच्चेदानी के अलावा कहीं और, उनकर गाँड़ मारे क मन भी करे तो बोल दीजियेगा साफ़ साफ़ , की भैया भौजाई क हमरे गाँड़ मार ला, नहीं तो दो तीन दिन रुक जा। "
मेरी बात सुन के ननद हंसने लगी, बोली,' भौजाई हो तो ऐसी , अब हम सोने जा रहे हैं कल रात भर सहेलियों के साथ सब इतनी बदमाश, किसका मरद कैसे करता है, निहुरा के लेता है , गोद में बैठा के पेलता है और वो भी खाली जुबानी नहीं, सब कर कर के आपस में, एक मिनट नहीं सोने दिन। और रात में आपका मरद नहीं सोने देगा।'
तबतक सास की आवाज आयी की वो बाहर जा रही है, ग्वालिन चाची के साथ दूबे भौजी के यहां हम दोनों दरवाजा बंद कर लें।
दरवाजा बंद करने के बाद ननद मुझे अपने कमरे में ले आयी और उन्ही के बिस्तर पर, ….
अपनी सास के बारे में वो बात बताई की मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
सास उनकी महा कंटाइन थी ये तो मैं जानती थी,
लेकिन इतनी छिनार होगी मैं भी नहीं सोच सकती थ। साल भर से मेरी ननद के पीछे पड़ी थी, बच्चे के लिए,
अब हर सास तो मेरी सास की तरह तो हो नहीं सकती थी, मैं जब गौने उतरी थी तो उसके चौथे दिन ही, उन्होंने साफ़ साफ़ मुझसे बोल दिया,
" बच्चे के बारे में न तो तेरे मरद की सास तय करेगी, न तोहार सास, सिर्फ और सिर्फ मेरी छोटी बहू फैसला करेगी, और कोई बोले तो पलट के गरिया के जवाब देना, पेट में तुझको रखना है फैसला तुम करोगी, और सास मेरी खुद मुझे लेके आसा बहू के पास गयीं और तांबे का ताला लगवा दिया, उसी दिन से आसा बहू से मेरी दोस्ती भी हो गयी और सास ने बोल दिया की जब खुलवाना हो ताला तो खुद चली आना, आसा बहू के पास, मुझे बताने की भी जरूरत नहीं है।
लेकिन मेरी ननद की सास, करीब साल भर से मेरी ननद के पीछे पड़ी थीं,
" तोहरे बाद क गौने से उतरी दो दो निकाल दी, एक कोरा में एक ऊँगली पकड़ के चल रहा है, यहाँ तो अभी उलटी भी नहीं शुरू हुयी। "
और करीब छह महीने पहले जब मेरी ननद की पड़ोस की चचिया देवरानी गाभिन हुयी तब से तो वो अगिया बैताल हो गयी।
ननद ने गोली खानी करीब साल भर पहले से बंद कर दी थी, मरद तो अपनी बीबी के साथ कंडोम कभी लगाते नही। छह महीने पहले वो ननद के कमरे में घुस के बिस्तर के अंदर , दवा के डिब्बे में हर जगह चेक कर के देखा और कुछ पुरानी एक्सपायर्ड गर्भ निरोधक गोलियां थीं, बस वो देख के आग बबूला सब उठा के उन्होंने फेंक दिया और मेरी ननद को साफ़ साफ बोल दिया,
" अब ये नीचे क खूनखच्चर बंद होना चाहिए, और उलटी शुरू करो, अब अगर अगले महीने आयी की पांच दिन रसोई में नहीं आओगी तो जउने दिन बाल धोओगी न ओहि दिन खुला झोंटा पकड़ के गुरु जी के आश्रम में ले जाउंगी, एक से एक बाँझिन को प्रसाद दे दिए हैं जहाँ डाक्टर वैद ओझा फ़क़ीर सब फेल हो गए। "
लेकिन अगले महीने ननद रानी को फिर रसोई से पांच दिन छुट्टी लेनी पड़ी, और सास एकदम अलफ,
' गौर रंग, सुंदर बदन ले के कोई का करे, बहू कोई काहें लाता है, घर पोती पोते से भर दे, बंस चलाये और ये महरानी जी, अरे हमरे जमाने में और अभी भी गौने दुल्हिन जिस दिन उतरती है, ठीक नौ महीने बाद सोहर होता है घर में बच्चे की आवाज सुनाई देती है और ये, दो साल से ऊपर हो गए, अभी उलटी भी नहीं शुरू हुयी, ऐसी बहू ले के कोई का करेगा, रूप जोबन का का फायदा, कोई चाटेगा ,
ननद से तो नहीं लेकिन कोई पड़ोसन आती तो अब उससे साफ़ साफ़ बोलती,
" पता नहीं कहाँ से ये बाँझिन घर आ गयी है, हमरे बेटा क, एक तो बेटा और उसकी बहू, पुराना जमाना होता तो साल भर में बहू कुछ नहीं निकालती तो दूसरी ला के बेटे के सेज पर चढाती, "
और पड़ोसन अगर कहती की साधु बाबा के आश्रम में, तो सास बात काट के कहतीं, मैं तो साल भर से कह रही हूँ, गाँव भर की बहुये जाती है लेकिन यही पाँव में महावर लगा के बैठी हैं, लेकिन महीने दो महीने में बात नहीं बनी तो जबरदस्ती ले जाउंगी , गुरु जी का तो बड़ा , और श्रद्धा से मेरी ननद की सास की आंखे बंद हो जाती,
और अबकी जब मेरी ननद होली में मायके आयीं तो सास ने साफ़ साफ अल्टीमेटम दे दिया,
" लौट आयो मायके से, भौजाई की पहली होली है, इसलिए जाने दे रही हूँ, लेकिन होली के बाद झोंटा पकड़ के ले चलूंगी गुरु जी के भाग ९२ बाँझिन और आश्रम, और गुरु जी के पैरों में पटक दूंगी, बड़ी कृपा है उनकी। बोल दूंगी जब तक आपकी कृपा नहीं बरसेगी, ये यही रहेगी आपका गोड़ दबाएगी, मेरी एकलौती बहू है।"
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Superb updateआश्रम
और अबकी जब मेरी ननद होली में मायके आयीं तो सास ने साफ़ साफ अल्टीमेटम दे दिया,
" लौट आयो मायके से, ....भौजाई की पहली होली है, इसलिए जाने दे रही हूँ,... लेकिन होली के बाद झोंटा पकड़ के ले चलूंगी और गुरु जी के पैरों में पटक दूंगी, बड़ी कृपा है उनकी। बोल दूंगी जब तक आपकी कृपा नहीं बरसेगी, ये यही रहेगी आपका गोड़ दबाएगी, मेरी एकलौती बहू है।"
इसलिए ननद की हालत खराब थी, लेकिन ननद हो चिढायी न जाए छेड़ी न जाए, गरियाई न जाये तो ननद कैसी और वो भी मेरी ऐसी भौजाई,
" अरे अच्छा तो है साधु बाबा क हाथ भर क होगा, आपका तो मजा हो हो जाएगा, ....करियेगा सेवा मन भर के और उनके चेले होंगे वो अलग "
लेकिन ननद अलफ, चमक के बोली,
" अरे भौजी, तोहरे मरद अस किसी का न होगा, मिल गया है न हाथ भर का, इसलिए, अरे सात जनम बरत की होंगी तो मेरे भाई जैसा दूल्हा मिला। "
" तो साधुवा क केतना बड़ा है अरे ठीक ठाक होगा, बिना चोदे थोड़े छोड़ता होगा, अरे गाभिन तो करता होगा। " मैंने पूछ लिया।
ननद कुछ देर चुप रही, फिर देर तक हंसती रही, खिलखिलाती रही, फिर अपनी सबसे छोटी ऊँगली, कानी ऊँगली दिखाई, और हसंते हुए बोली, इसकी भी आधी, केचुआ अस।
मेरी ननद को पास के गाँव की उसकी एक सहेली ने सब असली किस्सा सुनाया था।
वैसे तो ननद के गाँव में ही छह सात औरतें जिनके बच्चा नहीं हो रहा था, आश्रम में गयी थीं, महीने दो महीने में सब के पाँव भारी हो गए, लेकिन सब गुरु जी का नाम लेने पर खाली श्रद्धा से हाथ जोड़ लेती। और एक बात ये भी था की ननद की सास भी गुरु जी की साल दो साल से चेली थीं और अब प्रमुख सेविका में थीं, गुरु जी तक उनकी सीधी पहुँच थी। तो शायद इसलिए भी किसी का मुंह नहीं खुला।
लेकिन ननद की सहेली ने सब बात बतायी,
पहली बात तो आश्रम का एक ड्रेस कोड है, एक ही रंग का और एक ही वस्त्र, महिलायें सिर्फ एक साडी पहनती हैं कमर के नीचे लिपटी रहती है और सीना भी उसी से ढंका रहता है ,
पुरुष उसी रंग की एक धोती पहनते है और ऊपर कुछ नही।
जो महिला ' प्रसाद' के लिए जाती है उसे दो दिन रहना रहता है, वो भी दो दिन रही। उसकी सास उसे छोड़ने गयी थी, और सास बहू को ढेर सारे कागजों पर साइन भी करना पड़ता है, और उसके बाद सास को वहीँ से विदा का दिया गया और तीन दिन बाद उन्हें आने को बोला गया।
उसको, ननद की सहेली के पास दो सेविकाएं आयी और उन्होंने उसे, ननद की सहेली को खुद अपने सारे वस्त्र उतारने को कह। वह जगह एक एक आम के घने बाग़ में थीं, एक प्रकोष्ठ था जहाँ एक हवन कुंड था, वो थोड़ा झिझकी, फिर उसे लगा की ये दोनों भी स्त्रियां है और उस इ भी आश्रम का वस्त्र शायद मिले इसलिए, साडी ब्लाउज पेटीकोट तक तो ठीक था, लेकिन ब्रा, पर वो भी उसने उतार दिया। अब वो पूरी तरह निर्वस्त्र थी।
उन दोनों सेविकाओं ने फिर हवन कुंड जलाया और खुद भी अपनी साडी उतार दी और ननद की सहेली को बैठना सिखाया, घुटनों के लेकिन जाँघे पूरी तरह खुली, योनि साफ़ साफ़ दिखनी चाहिए, दोनों स्तन बाहर की ओर उभार कर, सर सीधा लेकिन आँखे झुकी हुईं, कभी भी किसी की आँखों में आँखे डाल कर नहीं देखना है, आँख कंधे से नीचे और गुरु जी या उनके मुख्य शिष्यों के कमर के ऊपर नहीं , और जब बोलने को कहा जाय तभी बोलना है, हाँ वो दोनों उसकी सखियाँ है अगले दो दिन साये की तरह उसके साथ रहेंगी तो उन्हें वो देख भी सकती है बात भी कर सकती है।
और फिर उन दोनों सखियों ने हवन कुंड में कुछ समाग्री डाल कर उसे अग्नि प्रज्वलित करने को कहा, धीरे धीरे ननद की सहेली भी उस माहौल में ढलती जा रही थी, उसने अग्नि जलाई, लेकिन उसके बाद उन दोनों सखियों ने कुछ मंत्र पढ़कर एक नीले रंग का कोई चूर्ण उस हवन कुंड में छोड़ा और तेजी से एक धूम्र रेख निकली, जो बहुत ही मादक, नशीली थी । ननद की सहेली के देह में एकदम वासना की लहर सी दौड़ने लगी,
" अपनी साडी को हवन कुण्ड में डाल दो "
पहली सखी बोली और दूसरी कुछ मंत्र पढ़ रही थी, यंत्रवत ननद की सहेली संजना से अपनी साडी उठाकर हवन कुंड में डाल दी और हवन कुंड भभक उठा।
" पेटीकोट" दूसरी सखी बोली
और संजना ने वो भी अग्नि के हवाले कर दिया।
और पेटीकोट के साथ ही उस दूसरी सखी ने लाल रंग का एक चूर्ण हवन कुंड में डाला, और अबकी जो धुंआ उठा वो पहले से भी ज्यादा नशीला था। वह छोटा सा प्रकोष्ठ पूरी तरह बंद था और सारा धुंआ धीरे धीरे कमरे में फ़ैल रहा था था, लेकिन संजना को बहुत अच्छा लग रहा, खास तौर पर वह धुंआ जब उसकी जाँघों के बीच छू रहा था उसके उरोजों को सहला रहा था,।
और उसके बाद ब्लाउज और ब्रा भी हवन कुंड में दहन हो गए,
अब इन वस्त्रों के साथ ही तुम्हारा अतीत भी दहन हो गया, अब तुम आश्रम की हो, जब तक आश्रम में हो और आश्रम के बाहर भी आश्रम की ही हो "
दोनों सखियाँ साथ बोलीं।
और एक कटोरे ऐसा पात्र निकाल कर, एक चषक से आसव उस पात्र में भर के संजना को दिया। संजना ने जब आधा से ज्यादा उस कटोरे को खाली कर दिया तो दायीं ओर बैठी पहली सखी ने संजना से कटोरे को ले कर बचे हुए आसव का थोड़ा सा पान किया फिर दूसरी सखी को और उसने उस कटोरे को खाली कर दिया।
संजना की आँखे मूंदने लगी जोबन भारी पड़ने लगे, योनि की पंखुड़ियां अपने आप खुलने बंद होने लगीं।
उत्तेजना के मारे उसकी बुरी हालत थी। उसके बाद दो बार और उसी कटोरे से अलग अलग तरह के आसव, और दोनों सखियाँ उसी की तरह निर्वस्त्र और पास में एक तालाब था उसी आम के बगीचे के बीच में वहीँ संजना को रगड़ रगड़ के नहलाया, फिर उस तालाब के पास एक और कमरा था वहां उसे अच्छी तरह तैयार किया। एक कोई लेप दोनों ने संजना के जोबन पे लगाया और पांच मिनट में ही संजना को लगा की बस कोई उसकी चूँची मसल दे रगड़ दे, उसी तरह का लेप जाँघों पे और योनि पे लगाया और संजना की हालत खराब, लेकिन तैयारी अभी पूरी नहीं हुयी थी।
एक कोई जड़ी सी उसे उन्होंने ननद की सहेली संजना की बुर की फांको को फैला के उसके बीच ठूंस दिया और बोला की इसे कस के भींचो और बोलो क्या मन कर रहा है,
मन तो संजना का चुदवाने का कर रहा था संजना का चूत में आग लगी थी, लेकिन अभी भी वो बस बोल पायी,... मन कर रहा है
" अरे साफ़ साफ़ बोल न हम तो तेरी सखियाँ है यहाँ पर इसके बारे में बोलने में कोई रोक नहीं है और लंड चाहिए, चुदवाने का मन कर रहा है तो साफ़ साफ बोलना पड़ता है, अगर कोई गुरु शिष्य तुम्हारे पास आएगा तो तुझे खुद उससे बोलना पड़ेगा, मुझे आपका लंड चाहिए, मुझे आपसे चुदना है, मैं चुदवासी हूँ , चुदने आयी हूँ तेरा लंड मेरी बुर को चाहिए तभी वो चोदेगा, और चुदवाती हुए भी बार बार बोलती रहना वरना वो लंड निकाल लेगा और तेरी ये जलन बिना चुदे शांत नहीं होगी,"
और यह कहकर उन्होंने उसकी क्लिट पर भी कोई महलम लगा दिया, श्रृंगार भी पूरा किया था, काजल, देह पर चंदन का लेप,
गुरु जी के पास पहंचने के पहले वो जड़ी संजना की बुर से सखियों ने निकाल दी। संजना को लगा अब उसकी चूत कुंवारियों जैसी हो गयी है । वो शादी के पहले से चुदवा रही थी और एक दो ऊँगली तो आराम से घुसती थी, लेकिन अब एक ऊँगली भी घुसना मुश्किल लग रहा था।
दोपहर के बाद वो गुरूजी के पास गयी, उसी तरह दोनों जाँघे फैला के बैठी और सर झुका के गुरु जी के चरणों में सर रख दिया।
लेकिन मेरी ननद ने संजना से मुद्दे की बात पूछी,
"बड़ा कितना था"
और संजना ने बोला कानी ऊँगली जैसा या उससे भी छोटा, लेकिन वो इतनी चुदवासी थी की उस समय तो सींक भी मूसल जैसी लगती । और बुर उसकी टाइट भी बहुत हो गयी थी। हाँ गुरु जी झड़े नहीं जल्दी लेकिन कोई ज्यादा भी नहीं बस ठीक ठाक सब की तरह पांच सात मिनट।
और शाम को गुरु जी के शिष्यों ने नंबर लगाया, चार एक साथ आये शाम को और रात में फिर चार बारी बारी से , दो दो घण्टे के लिए। उन सबों की साइज ठीक ठाक थी और ताकत भी। अगले दिन फिर उसी तरह से।
लेकिन हर बार संजना को बोलना होता,
"मुझे चोदो , अपनी संजना को चोदो, "और अगर दो तीन मिनट के अंदर वो नहीं बोलती थी तो वो चुदाई रोक देते, संजना खुद मस्ती में पागल थी।
"हे स्साली ये बोल, मजा आया की नहीं, "मेरी ननद ने अपनी उदास सहेली संजना का मन ठीक करने के लिए चिढ़ाते हुए उसकी ठुड्डी उठा के पूछा,
संजना हँसते हुए बोली, ' स्साली छिनार, अरे कोई लड्डू जबरदस्ती भी खिलायेगा तो लगेगा तो मीठा ही न। फिर तोहरे बहनोई छह महीना साल भर में सूरत से आके सूरत दिखाते हैं, और उसपर भी आने के बाद उनकी बहिन महतारी आगे पीछे, और उसमे भी रात को आधे टाइम तो बाहर ही पिचकारी का पानी निकल जाता है, और कभी बड़ी मुश्किल से घुसा भी तो तो, और उन सबों का भी कोई गदहा घोडा अस नहीं, बस ठीक ठाक, लेकिन एक उतरता था तो दूसरा तैयार रहता था चढ़ने को, तो लड्डू तो मीठा था ही, और ऊपर से वो सब छिनार जो पिलाई थीं उसका असर, एकदम गर्मायी थी
]
मेरी ननद ने संजना से पुछा की तुझे ये नहीं पता चलेगा की तेरे बच्चे के बाप गुरु जी है या उनके चेले,
तो संजना हंस के बोली, अरे वो भी नहीं
फिर उस ने असली खेल बताया की जैसे आजकल सांड नहीं है तो कृत्रिम गर्भधान केंद्र में वीर्य गाय में डाल देते है एकदम उसी तरह मैं पलंग पर थी और एक स्टैंड टाइप थी उसी में दोनों सखियों ने मेरी टाँगे फैला के फंसा दिया, उसके बाद एक मोटा सा इंजेक्शन जैसा उसमे बीज भर के मेरी बुर में डाल के और करीब आधे घण्टे तक मेरी दोनों टाँगे ऐसी हवा में लटकी रही, तो दो दिन में तीन बार वो भी हुआ।
लेकिन ननद जिस चीज से घबड़ायी थीं वो उनकी सहेली ने सबसे अंत में बताई।
मेरी ननद की सहेली संजना गाभिन भी हुयी और नौ महीने बाद बियाई भी, लेकिन,

Lajawab super duper gazab updatesUpdates have been posted, please read, enjoy, like and comment.
