वाह आनंद बाबू नसीब वाले हो जो बनारस की होली खेल रहे हो. तभि तो कन्या रस और नारी रस का संगम दिख रहा है. मन मोह लेने वाला नजारा दिख रहा है. रीत जिस से तुम प्रीत लगाने की कोसिस कर रहे हो. तुमने दबोच मशला लेकिन नजारा तो अशली भाभियों ने दिखाया.रीत -चंदा भाभी-दूबे भाभी और बनारसी होली
रीत, चंदा भाभी और दूबे भाभी के बीच सैंडविच बनी हुई थी।
पीछे से दूबे भाभी ने दबोच रखा था और आगे से चंदा भाभी नंबर लगाकर बैठी थी। और तीनों ब्रा और, बल्की रीत ब्रा और अपनी ट्रेड मार्क पाजामी में, और दूबे और चंदा भाभी ब्रा और साए में। दूबे भाभी के हाथ में अभी भी कालिख का स्टाक बचा हुआ था, जिसे उन्होंने सबसे पहले रीत की गोरी नमकीन पीठ पे मला और फिर आगे हाथ डालकर उसके गोरे उभार पे ब्रा में हाथ डालकर। पीठ पे रंग लगा रहा हाथ सरक के अचानक उसकी पाजामी में, क्या कोई मर्द नितम्बों को दबाएगा, जिस तरह दूबे भाभी रीत के मस्त गुदाज रसीले नितम्बों को दबोच रही थी, पूरी ताकत से।
दबा वो रही थी मजा मुझे आ रहा था।
और पीछे से ब्रा की स्ट्रिप भी रीत की, चन्दा भाभी के लाल गुलाबी रंगों से लाल हो गई थी।
शाम को कभी-कभी जैसे बादल दिखते हैं ना उसकी पीठ वैसे ही दिख रही थी। जो थोड़ी सी जगह रंगों से बच गई थी गोरी, सफेद रूई से बादलों की तरह। दूबे भाभी के हाथ जहां-जहां पहुँचे थे वो श्याम रतनारे बादल की तरह और ब्रा की स्ट्रिप और उसके आस पास चंदा भाभी की उंगलियां जहाँ छू गई थी, वहां लाल गुलाबी जैसे कुछ सफेद बादल भी जहां सूरज की किरणें पड़ती ही लाल छटा दिखाती हैं। रंग लगने से वो और रंगीन हो गई थी।
तभी वो हुआ जो मैं तब से चाहता था जब से मैंने उसे सबसे पहले देखा था।
धींगा मस्ती में दूबे भाभी और चंदा भाभी ने मिलकर उसकी ब्रा नीचे खींच दी और रीत के दोनों उभार एक पल के लिए मुझे दिख गए। बस मैं बेहोश नहीं हुआ यही गनीमत थी।
जैसे कोई पूरी दुनियां की खूबसूरती, जवानी का नशा, जीवन का सारा रस अगर एक जगह लाकर रख दें ना कुछ ऐसा। जैसे गूंगे का गुड़ कहते हैं ना की वो खा तो ले ना लेकिन स्वाद ना बता सके, बस वही हालत मेरी हो रही थी। लेकिन मैं उस हालत से पल भर में उबर गया क्योंकी अगले ही पल दूबे भाभी के हाथों में दोनों कैद हो गए, और वो इस तरह से मसल रही थी की।
उधर दोनों गालों का रस चन्दा भाभी ले रही थी।
मुझे लगा की बिचारी मेरी मृग-नयनी कहाँ दो के साथ कित्ती परेशान होगी बिचारी। लेकिन अचानक वो पीछे मुड़ी जैसे कोई टेलीपैथी हो, और मुझे देखकर ना सिर्फ मुश्कुराई बल्की हल्की आँख भी मार दी।
मैं समझ गया की ये भी उतना ही रस ले रही है।
चंदा भाभी ने तभी एक बाल्टी रंग लेकर पीछे से उसकी पाजामी पे।
और दूबे भाभी भी क्यों पीछे रहती, उन्होंने तो पीछे से पाजामी फैलाकर उसके अन्दर।
मेरा फायदा हुआ की अब उसके सारे कटाव उभार एक साथ और रीत का ये फायदा हुआ की उसने एक झटके में अपनी ब्रा ठीक कर ली।
क्या कटाव थे।
दोनों भाभियों ने जो रंग की बाल्टियां छोड़ी थी, अन्दर और बाहर रीत की पाजामी पूरी तरह उसकी खूबसूरत जाँघों से चिपक गई। और बिलकुल ‘सब दिखता है’ वाली बात हो रही थी। पीछे का नजारा तो छोड़िये, एक पल के लिए वो आगे मुड़ी तो भरतपुर भी दिख गया। आलमोस्ट। सुधी पाठक सोच ही सकते हैं की मेरे जंगबहादुर की क्या हालत हुई होगी।लेकिन उसके आगे जो हुआ वो और खतरनाक था।
दूबे भाभी और चन्दा भाभी ने मिलकर रीत की पाजामी का नाड़ा खोल दिया लेकिन बहुत मुश्किल से।
एक तो उसने कसकर बाँध रखा था और फिर दोनों हाथों से कसकर। हार के चन्दा भाभी को उसे गुदगुदी लगानी पड़ी। वो खिलखिला के हँसी और नाड़ा दूबे भाभी के हाथ में।
मुझे लगा की अब रीत गुस्सा हो जायेगी।
लेकिन उसकी वो मुश्कुरा रही थी उसी तरह। जब पाजामी नीचे सरकी तो उस चतुर चपला ने ना जाने किस तरह पैरों को किया की वो उसके घुटने पे ही फँस गई लेकिन मुझे एक जबर्दस्त फायदा हुआ, मस्त नितम्बों के नजारे का। जो भीगे पाजामी से झलक मिल रही थी वो तो कुछ भी नहीं थी इसके आगे।
क्या नजारा था।
रीत की लेसी थांग दो इंच चौड़ी भी नहीं रही होगी और पीछे से तो बस एक मोटी रस्सी इतना दोनों नितम्बों के बीच फँसा हुआ।
प्लंप, प्रेटी, परफेक्ट, मस्त कसे कड़े,... पाजामी के ऊपर से उसे देखकर मन मचल जाता था तो अब तो वो कवच भी नहीं रहा। और उसके ऊपर लगे रंग।
दूबे भाभी की उंगलियों से लगा उनकी ट्रेड मार्क कालिख, चंदा भाभी के लाल गुलाबी चटखदार और मेरे हाथ के लगे सतरंगी रंग, मेरी उंगलियों से लगे पेंट के रंग तो दरार के अन्दर तक।
और फिर दूबे भाभी ने वो काम किया की जिसके बाद तो वो मेरी जान मांग लेती तो मैं सोने की थाली में रखकर हाजिर कर देता।
उन्होंने रीत की थांग को पीछे से हटा दिया और साथ-साथ दोनों नितम्बों को फैलाकर पिछवाड़े की वो गली दिखा दी, जिसके लिए सारा बनारस दीवाना था।
दोनों हाथ तो आगे चंदा भाभी ने पकड़ रखे थे।
मेरी ओर देखकर दूबे भाभी ने आँखों-आँखों में पूछा- “पसंद आया…”
सीने पे हाथ रखकर मैंने इशारा किया- “जान चली गई…”
फिर दूबे भाभी ने वो काम शुरू कर दिया, जिसके लिए उनकी सारी ननदें नजदीक की दूर की, रिश्ते की पड़ोस की डरती थी।
क्या कोई मर्द चोदेगा। रीत की कमर पकड़कर वो धक्के उन्होंने लगाए उस तरह से रगड़ा। रीत ने वो किया जिसके लिए मैं उसका दीवाना था, मस्ती और हिम्मत, हाजिर जवाबी और मजे लेने और देने की ताकत।
रीत बोली- “अरे भाभी, मेरी तो पाजामी आप ने सरका दी। लेकिन आप का पेटीकोट। क्या मजा आएगा…”
“ठीक तो कह रही है लड़की…” चंदा भाभी ने बोला और दूर बैठे मैंने भी सहमती में सिर हिलाया।
“अरे चूत मरानो, छिनार, तेरी तरह मैं पाजामी, जीन्स, पैंट नहीं पहनती जिसे उतारने में 10 झंझट हो। साड़ी पेटीकोट पहनो तो आम की बाग हो, अरहर और गन्ने का खेत हों बस लेटो टांग उठाओ, तैयार…”
दूबे भाभी बोली और एक झटके में पेटीकोट उठाकर कमर पे खोंस लिया।
डबल धमाका।
एक किशोरी के बाद अब एक प्रौढ़ा, एक मस्त खेली खायी भाभी का पिछवाड़ा, वो भी 40+ वाली साइज का। पीछे से दूबे भाभी। आगे से चंदा भाभी। मैंने दूर बैठकर थ्री-सम का मजा देख रहा था।
रीत रानी छिनार, मेरी ननदी छिनार, अगवाड़ा छिनार, पिछवाड़ा छिनार,
एक जाए आगे, दूसर पिछवाड़े, बचा नहीं कोऊ नौवा कहांर।
साथ में बनारसी गारी का भी मजा, दूबे भाभी और चंदा भाभी के समवेत स्वरों में।
गुड्डी और संध्या भाभी। दूर से देख रही थी। गुड्डी लगभग बची हुई थी, मेरे हाथ से निकालने के बाद से। एक तो उसके ‘वो दिन’ चल रहे थे और फिर जब मैं रीत के साथ मिलकर दूबे भाभी के चीरहरण में लगा था वो अन्दर थी, चंदा भाभी के साथ।
उसने संध्या भाभी से मिलकर कुछ बात की और राहत मिशन लान्च हुआ।
रीत को तो थोड़ी राहत मिली लेकिन अब गुड्डी फँस गई, वो भी दूबे भाभी के हाथों।

वाह अब तो गुड्डी रानी भी घाट मे आ गई बेचारी. जादूगर्नी की तरह जब गुड्डी की ब्रा आनंद बाबू की तरह फेकि. वो चूमना और फ़्लाइंग किश. और गुड्डी का कैच करना. जबरदस्त इरोटिक रोमांटिक था.गुड्डी की रगड़ाई
“बहुत बची हुई थी ना। अब बताती हूँ…”
और दूबे भाभी ने एक हाथ उसकी फ्राक पे ऐसा डाला की सारी की सारी बटन टूटकर चटक के हवा में।
“नीचे की दुकान बंद है तो क्या हुआ ऊपर की तो खुली है? तुम आज बचा ले गई उसको। होली में भी अपने यार के साथ रहोगी, लेकिन याद रखना। रंगपंचमी में सूद समेत बदला लूंगी…”
दूबे भाभी ने हड़काया उनके दोनों हाथ फ्राक के अन्दर कसकर यौवन मर्दन करते हुए और जो हाथ उन्होंने बाहर निकाला तो गुड्डी की ब्रा और उन्होंने फेंका तो सीधे मेरे ऊपर।
मैंने गुड्डी को दिखाकर उसे चूम लिया।
एक बार फिर दूबे भाभी के हाथ अन्दर।
जैसे कोई जादूगर डिब्बे से हाथ बार-बार निकालता है तो हर बार अलग-अलग चीजें, कभी खरगोश, कभी कबूतर।
अबकी कबूतर बाहर आये गोरे-गोरे सफेद हाँ मेरे और दूबे भाभी के हाथ के लाल काले रंग के निशान। गुड्डी के इन कबूतरों को मैं कई बार प्यार से छू चुका था, सहला चुका था, दबा चुका था। लेकिन इस तरह पहली बार पिंजड़े से बाहर खुलकर देखने का वो भी दिन में सबके सामने ये पहला मौका था।
दूबे भाभी ने पहले तो उसे प्यार से हल्के से दबाया और फिर खुलकर कसकर रगड़ना मसलना शुरू कर दिया।
मजा गुड्डी को भी आ रहा था भले ही वो कसकर उह्ह… आह्ह… कर रही थी। उसके कबूतरों की चोंच, मस्त निपल एकदम कड़े खड़े थे। दूबे भाभी ने कसकर उसकी चूची को दबाते हुए उभार के मुझे दिखाया और एक निपल को पिंच कर दिया। मानो कह रही हों- “लोगे क्या?”
जवाब में मैंने एक फ्लाईंग किस दिया, और गुड्डी ने मुश्कुराते हुए उछलकर कैच कर लिया। मेरा बस चलता तो दूबे भाभी की जगह मैं ही।
जगह बदल तो गई थी लेकिन चंदा भाभी के साथ, अब रीत और संध्या भाभी के बीच चंदा भाभी सैंडविच बनी हुई थी। रीत ने अपनी पाजामी फिर से बाँध ली थी।
रीत रीत थी।
लेकिन चंदा भाभी भी कम नहीं थी। वो अकेले दोनों पे भारी पड़ रही थी। उन्होंने एक हाथ से संध्या भाभी के और दूसरे से रीत के उभार दबा रखे थे। लेकिन रीत चतुर, चपल चालाक थी और ये कहावत पूरे शहर में मशहूर थी की रीत से कोई जीत नहीं सकता। उसने जैसे चन्दा भाभी से बचना चाहती हो ऐसे झुकी, और जब तक वो समझें उसने ‘बिलो द बेल्ट’ हमला कर दिया, सीधे भाभी के नाड़े पे।
बिचारी चंदा भाभी ने घबड़ाकर दोनों हाथ से अपना साया पकड़ा।
रीत इत्ती आसानी से छोड़ने वाली थोड़ी थी। उसने चन्दा भाभी के साए में हाथ डाल दिया।
अब एक हाथ से वो नाड़ा पकड़े थी और दूसरे हाथ से रीत को रोकने की कोशिश कर रही थी।
“क्यों कोई खास चीज छुपा रखी है क्या भाभी, जो इस तरह इसे बचा रही हैं?” हँसकर रीत बोली।
मेरी आँखें वहीं चिपकी थी।
चंदा भाभी भी नहीं समझ पायीं की ये मात्र डाइवर्सन की ट्रिक थी। वो निचले मंजिल पे उलझी थी और संध्या भाभी के हाथ उनकी ब्रा में घुस गए। फिर तो पेंट, रंग गुलाल सब कुछ।
“आप अकेले। अरे मेरी भी तो प्यारी-प्यारी भाभी हैं देखूं ना। चोली के पीछे क्या है? जो मेरे ही नहीं भाभी के भैया लोग भी बचपन से इसपे लट्टू थे…” खिलखिलाती हुई रीत बोली।
“आ ना…” संध्या भाभी बोली।
रीत ने पीछे से घात लगाई, वो चन्दा भाभी की पीठ से चिपकी हुई थी जिससे तमाम कोशिश करके भी। वो उसको पकड़ नहीं पा रही थी। रीत के एक हाथ भाभी की अधखुली ब्रा में घुसे रगड़ घिस कर रहे थे। उसने चिढ़ाया-
“क्यों भाभी सबसे पहले किससे दबवाया था जो इत्ते मस्त गदरा गए ये जोबन…”
“अरी तू बता किससे रगड़वाती मसलवाती रहती है…” चंदा भाभी ने जवाबी बाण छोड़ा।
“अब भाभी इत्ता कहाँ कौन हिसाब रखता है? हाँ, सबसे मस्त और सबसे आखिरी में दबाने वाला। वो है…” रीत की उंगली मेरी ओर थी।
आगे से संध्या भाभी भी-
“माना भाभी की चूचियां मस्त हैं, लेकिन कब तक उसमें उलझी रहेगी? अरे जरा खजाने का भी तो मजा ले…”
कहकर संध्या भाभी ने रीत को ललकारा। पीछे का हिस्सा रीत के कब्जे में और आगे का संध्या भाभी के कब्जे में।
चंदा भाभी भी आक्रमण के मूड में आ गई और उन्होंने संध्या के साए में हाथ डाल दिया और कस-कसकर उंगली करने लगी-
“क्यों ननद रानी कैसा लगा सैयां से चुदवाना? तेरे मैके के यार ज्यादा जबरदस्त थे या ससुराल के?”
“अरे भाभी मेरे मैके के यार तो आपके भी देवर लगते हैं। उनकी नाप जोख तो होली, बिना होली आपने भी खूब की है। रहा मेरे सैयां का सवाल तो वो तो आपके नन्दोई हैं आपका हक बनता है। होली में आयंगे ही आप स्वाद चख लीजिएगा, खुद पता लग जाएगा…” संध्या भाभी हँसते हुए बोली और अचानक चीखी-
“उयी एक साथ तीन-तीन। लगता है भाभी…”
“अरे ज्यादा छिनालपन ना कर। शादी के पहले सम्हालने की बात होती है। अब तो आने दे रंगपंचमी तेरी चूत में पूरी मुट्ठी ना किया तो कहना…”
दूबे भाभी उनकी ओर देखती बोली।
“अरे सिर्फ इसकी क्यों? इसकी दोनों सहेलियों के भी तो…”
चंदा भाभी ने रीत और गुड्डी की ओर इशारा करते हुए कहा- “अब कहाँ कुँवारी बचने वाली ये दोनों…” उनकी निगाह मेरी ओर मुश्कुराती हुई टिकी थी।
“कल का सूरज निकलने के पहले दोनों चुद जानी चाहिए…” दूबे भाभी ने फरमान जारी किया, और वो भी मेरी ओर देख रही थी।
गुड्डी और रीत दोनों शैतान, एक साथ बोली- “मंजूर लेकिन करने वाले से पूछिए…”
उसी जोश में मैं भी बोला- “एकदम मंजूर…”

कुछ भी हो आनंद बाबू घूम फिर कर तुम्हारी बाहनिया पर बात आ ही जाती है. अरे उनकी नांदिया लगी. और नांदिया तो छिनार होती है. उपर से तुम अपनी होने वाली ससुराल मे.जोश दूबे भाभी का
तब तक दूबे भाभी ने बात पकड़ ली और गुड्डी और रीत दोनों को हड़काते हुए बोला-
“सालियों, हरामिनों, होलिका माई जर गईं बुर चोदाई कह गईं। होली खेलते समय सिर्फ लण्ड, चूत, गाण्ड, चुदाई ही बोलते हैं, वरना होलिका माई तरसा देंगी। सारी जिंदगी बैगन और मोमबत्ती से काम चलाओगी। अगर किसी ने कुछ और बोला ना तो अभी गाण्ड में हाथ पेल दूंगी कुहनी तक…”
किसको गाण्ड तक हाथ डलवाना था, रीत और गुड्डी की जुबान भी दूबे भाभी वाली हो गई। रीत ने मेरी ओर आँख नचाते हुए पूछा-
“लेकिन जो इस बहनचोद की छिनार बहना आएगी। उसके साथ कौन करेगा ये काम?”
अबकी चंदा भाभी बोली- “अरे तुम दोनों क्या सिर्फ इसका लण्ड घोटने के लिए हो? तुम दोनों की तो ननद लगेगी वो, तो तुम लोग मुट्ठी करना। सालियों…”
“और क्या चुदकर तो वो भी आएगी और चोदने वाला भी वही। आखीरकार, दूबे भाभी का हुकुम है मजाक नहीं…” हँसकर गुड्डी बोली।
भंग और दारू के नशे का असर, या दूबे भाभी का हुकुम, या फिर होली की मस्ती, या सब की सब। बात अब सिर्फ बात में ही कमर के नीचे नहीं पहुँच गई थी बल्की सच में भी।
इसलिए गुड्डी कट ली।
उस बिचारी के ‘वो दिन’ चल रहे थे। वो मेरी ओर आई। मैंने उसे बगल में बैठने का इशारा किया लेकिन वो सीधे मेरी गोद में।
उधर बाजी पलट चुकी थी।
ननद भाभी के मैच में बाजी फिर भाभी के हाथ में। दूबे भाभी ने संध्या को नीचे गिरा दिया था और चंदा भाभी रीत के साथ।
“इत्ती देर से मेरी गाण्ड में उंगली करने की कोशिश कर रही थी ना अब बताती हूँ। देख क्या-क्या डालती हूँ आगे भी, पीछे भी…”
चंदा भाभी ने रीत को चैलेन्ज किया।
उनके चंगुल से बचती हँसती खिलखिलाती रीत बोली-
“नहीं भाभी, अरे मैं कहाँ उंगली करूँगी? मुझे मालूम है इसमें एक से एक मोटे लण्ड जाकर मुँह लटका के लौट आते हैं, तो बिचारी मेरी उंगली की क्या बिसात…”
लेकिन वो भी पकड़ी गई।
दूबे भाभी तो संध्या भाभी के ऊपर पूरी तरह से। कोई मर्द क्या इस तरह रगड़कर चोदेगा। दोनों टांगें उठाकर उन्होंने अपने कंधे पे इस तरह रख ली थी की वो बिचारी चाहकर भी हिल डुल नहीं सकती थी-
“ससुराल में तो बहुत मिजवाई होगी चूची ना अब जरा भाभी का भी मजा लो ना। तेरी ये चूचियां इत्ती मस्त है की नंदोई तो रोज। दीवाने होंगे इसके…” वो बोली।
“लेकिन भाभी वो मुझसे ज्यादा आपकी चूची के दीवाने हैं…” ब्रा के ऊपर से ही दूबे भाभी के जोबन का मजा लेते संध्या बोली।
“अरे ये तो बड़ी अच्छी बात है। होली मैं तो वो आयेंगे ना अदला-बदली कर लो। मेरे सैयां तुम्हारे साथ और तेरे सैंयां मेरे साथ। होली में नीचे वाले मुँह का भी स्वाद बदल जाएगा…”
और साथ ही दूबे भाभी ने अपनी चूत से इत्ती कसकर घिस्सा लगाया की संध्या भाभी की सिसकी निकल गई।
अब बिना रंगों की होली हो रही थी। लेकिन संध्या भाभी दूबे भाभी की बात का मतलब समझ गईं और नीचे से कमर उचकाते बोली-
“भाभी ये आपके मायके में होता होगा। मुझे मेरे ही भैया से चुदवाने का प्लान बना रही हैं। आपको मेरे सैयां भी मुबारक मेरे भैया भी मुबारक, एक आगे से एक पीछे से…”
तब तक शायद दूबे भाभी ने उनके पिछवाड़े भी उंगली कर दी, जिससे वो चिहुँक कर बोली- “इधर नहीं भाभी इधर नहीं…”
“अरे तो ननदोई जी ने पीछे का बाजा नहीं बजाया? इत्ते मस्त नगाड़े जैसे तेरे चूतड़ और गाण्ड नहीं मारी? बहुत नाइंसाफी है…”
दूबे भाभी बिना उंगली निकाले बोली। और उसके बाद तो जो धमाचौकड़ी मची की न जाने कित्ते आसन दूबे भाभी ने ट्राई किये।
संध्या भाभी ने थोड़ा जवाब देने की कोशिश की लेकिन सब बेकार।
रीत का मुकाबला ज्यादा बराबरी का था। भले ही उसे उतना अनुभव ना हो लेकिन वो सीखती बहुत जल्दी थी। चंदा भाभी ने उसे दबोच लिया था लेकिन वो फिसल के मछली की तरह बाहर और उसके बाद वो जो ऊपर चढ़ी तो उसने अपने दोनों पैरों को आपस में फँसा लिया। फिर चंदा भाभी लाख ऊपर-नीचे हुई लेकिन उसकी पकड़ ढीली नहीं हुई।
गुड्डी मेरी गोद में थी, और जो होली वहां ननद भाभी खेल रही थी वही हम यहाँ खेल रहे थे। गुड्डी के जो उरोज खुले हुए थे, उसे उसने फिर से फ्राक के अन्दर बंद करने की कोशिश की। लेकिन मैंने मना कर दिया।
जिस तरह ननद भाभी एक दूसरे की चूचियां मसलती उसी तरह मैं गुड्डी की।
एक बार रीत ने देखा तो उसने वहीं से थम्स-अप की साइन दी और बोली- “लगे रहो। लेकिन इत्ते धीरे। अरे जरा कसकर…”
उसके बाद तो मुझे उकसाने की जरूरत नहीं पड़ी।

उम्मीद है कोमल जी की next update मे गुड्डी और आनंद बाबू का प्रेम मिलन नथ उत्तराई हो जाएगी. लेकिन गुड्डी की तो निचे वाली छुट्टी है. तो आप क्या रंग दिखाओगी क्या पता. गुड्डी, दुबे भाभी, चंदा भाभी एक बार और या फिर नई नवेली खेली खाई संध्या भाभी.फागुन के दिन चार भाग १५
दूबे भाभी
अपडेट पोस्टेड . कृपया पढ़ें, लाइक करें और कमेंट दें .

tAb Komalji konsi story ka update aane vala he??? Chhutki ya JKG.
Bas aaj rat se hi start kar dungiChhutaki ka udpate post ho gaya hai, please read, enjoy, like and comment.
t
Arre raat bhar to chhapanbhog ka maja udaya tha, Chanda Bhabhi ka aur abhi to HOLI shuru huyi hai, ummid pe duniya kaayam haiAnand babu ke sath subah se klpd ho raha hai
ekdm aur us ke pahale raat bhi hogi Chanda bhi niklega fir dekhiya kya hota hai Guddi ke saathPathako ko bhi intejar hai, kal ke suraj ka