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Incest माँ बेटा इक दूजे के सहारे (completed)

Ting ting

Ting Ting
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खाना खाने के बाद मैं चुपचाप अपने कमरे में जा कर लेट गया। मैंने एक लुंगी पहन रखी थी और ढीला सा कच्छा पहना था ताकि रात में मुझे मुठ मारने में दिक्कत न हो.

माँ भी किचन का काम निबटा कर अपने कमरे में जा कर लेट गयी.

मेरा दिल तो बहुत देर से बहुत तेज तेज धड़क रहा था. पर जब माँ अपने कमरे में जा कर लेट गयी और उनके कमरे की लाइट भी बंद हो गयी तो मेरा दिल भुज गया. मुझे लग रहा था की मैंने अपनी माँ से सेक्स सम्भन्ध बनाने की बात करके गलती कर दी है. मेरा तो आज मुठ मारने का भी मन नहीं कर रहा था.

मुझे नींद नहीं आ रही थी.

इसी तरह रात के ११ बज गए.

मैं सोने ही जा रहा था की अचानक मेरे कमरे के दरवाजे पर कुछ आवाज हुई. मैंने सर घुमा कर देखा तो दरवाजा धीरे धीरे खुल रहा था.

मेरा दिल इतनी जोर से धड़कने लगा की जैसे मेरा तो हार्ट अटैक ही आ जायेगा.

दरवाजे से मेरी माँ जिसने एक ढीला सी मैक्सी पहन रखी थी अंदर आयी.

कमरे में खिड़की से बाहर से थोड़ी रौशनी आ रही थी जिस से सब कुछ ठीक से दिखाई दे रहा था.

माँ ने मेरी तरफ देखा और मेरे बेड के पास आ गयी. मैं भी अपलक माँ की तरफ ही देख रहा था.

मैं माँ की ओर देख रहा था मैने अपनी आँखें अपनी माँ की आँखों की तरफ की और उनकी आँखों में देखा.

माँ की आँखों में बेइंतेहा शर्मा की लाली थी. माँ ने शर्म से अपनी आँखें झुका ली. वो मेरी ओर ज्यादा देर तक न देख सकी.

मैं माँ को देखते हुए मुस्कुरा रहा था. और माँ बहुत ही शर्मा रही थी. मैंने माँ को बैठने या लेटने के लिए कुछ न कहा और आराम से अपने बीएड पर लेटा रहा. तो माँ बेचारी आइए ही कड़ी रही. मैं शरारत से मुस्कुरा रहा था.

माँ भी चुप थी. अब वो वापिस भी नहीं है सकती थी. जब मैंने उन्हें बैठने या लेटने को न कहा तो माँ ने आखिर अपनी चुप्पी तोड़ी और मुझे बोली

माँ ने मुझे देखते हुए कहा।

"थोड़ा परे को तो सरक मुझे भी लेटने के लिए थोड़ी जगह दे. देख कैसे अकेला ही पूरा बेड घेर कर लेटा है. "

कहते हुए माँ के होंठों पर एक शरारती सी मुस्कान थी.

मैंने फटाफट पीछे को हो कर माँ के लेटने के लिए जगह बनाई।

खाली जगह में माँ मेरे साथ लेट गयी.

मेरा दिल धड़क रहा था. लगता था माँ ने कोई निर्णय कर लिया है और हम दोनों माँ बेटे के जिंदगी खुशियों से भरने वाली है.

माँ बिलकुल मेरे साथ ही लेटी थी. हमारे शरीरों के बीच में मुश्किल से ६ इंच का फासला था.

माँ का दिल भी इतने जोर से धड़क रहा था कि उनके दिल के धड़कने की आवाज मुझे साफ सुनाई दे रही थी. शायद मेरे तेज तेज धड़कते दिल की आवाज मेरी माँ को भी सुनाई दे रही हो.

यह हमारे जीवन का एक बहुत ही नाजुक और महत्वपूर्ण क्षण था. जो हमारे आने वाले जीवन की दिशा बदल देने वाला था.

मैंने माँ से प्यार से पूछा

"माँ क्या आप ने मेरी बात पर कुछ गौर किया.? आप ने क्या निर्णय लिया है?"

जवाब में माँ कुछ नहीं बोली. उनकी गालें शर्म से लाल हो रही थी. शर्म से उनसे कुछ कहा नहीं जा रहा था. बस उन्होंने आगे बढ़ कर मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए और उन्हें चूमने लगी.

माँ का उत्तर बिलकुल स्पष्ट था. मैंने भी अपने होंठ खोल दिए और माँ के होंठों को अपने होंठों के बीच दबा कर चूसने लगा.

मैंने फिर अपना चेहरा पीछे किया और शरारती सी मुस्कान में कहा

"माँ बताओ न आप का क्या निर्णय है. क्या मैं आप की हाँ समझूँ ?"

हालाँकि अब सब स्पष्ट ही था. माँ ने मेरे कमरे में आ कर और मेरे होंठों को चूम कर सब बता ही दिया था पर मैं तो शरारत कर रहा था.

पर माँ तो आखिर माँ ही थी. वो मुँह से कुछ बोल कैसे सकती थी.

जब मैंने माँ से दोबारा उन का निर्णय पूछा तो माँ ने शर्म से अपना चेहरा मेरी छाती में छुपा लिया और मुझसे चिपकते हुए धीरे से अपना हाथ नीचे ले जा कर मेरी लुंगी में डाल दिया और मेरे तने हुए लौड़े को अपने हाथ में पकड़ लिया.

फिर माँ ने धीमे से अपना मुँह मेरे कान के पास किया और मेरे लौड़े को अपने हाथ से आगे पीछे करते हुए, जैसे वो मेरा मुठ मार रही हो, धीरे से बोली

"यह है मेरा निर्णय."

और मेरे लौड़े को जोर से दबा दिया. कि मेरी तो जैसे चीख ही निकल गयी.

माँ अब मेरे लौड़े पर अपने हाथ को तेज तेज आगे पीछे करते हुए मेरे लण्ड को प्यार से सहला रही थी, और फिर मेरे कान में फिर से बोली.

"बेटा मुझे बोलने में बहुत शर्म आ रही है. बस अब कुछ न पूछ. तू खुद ही समझ जा. तू अपना दिल भी बता दे कि तेरे दिल में क्या इच्छा है."

मैंने अपना हाथ नीचे ले जा कर माँ की सलवार मैं घुसेड़ दिया. माँ के कोई पैंटी नहीं पहनी थी. मेरा हाथ सीधा माँ की चूत पर पहुंच गया.

मेरे को एक और झटका सा लगा. माँ की चूत, जिसे मैंने न जाने कितनी बार छुप छुप कर बाथरूम में देखा था की उस पर झांटों का पूरा जंगल ऊगा हुआ था. अब बिलकुल क्लीन शेव थी. लगता था माँ अपनी पहली चुदाई के लिए झांटे साफ करके पूरी तयारी करके आयी थी.

मैंने माँ की फूली हुई चूत को अपनी मुठी में भर लिया और उसे मुट्ठी में मसलते हुए बोला।

"माँ आपका बहुत बहुत धन्यवाद कि आपने मेरी बात पर सहानुभूति पूर्वक फैसला किया। अब आपको कभी भी चुदाई के लिए तड़पना नहीं पड़ेगा और न ही मेरे जीवन में कोई कमी रहेगी. हम दोनों माँ बेटा एक दूजे का सहारा बनेंगे और एक दुसरे की हर तरह से इच्छा पूर्ती करेंगे. आज से दुनिया की नजरों में हम माँ बेटा है पर घर के अंदर हम दोनों एक मर्द और औरत है. दोनों एक दूजे की सेक्स की जरूरत पूरी करेंगे. आज के बाद न ही मेरे को मुठ मारना पड़ेगा और न ही आपको अपनी उँगलियों से या किसी खीरे गाजर आदि से अपनी इच्छा पूरी करने की जरूरत रहेगी. आज से इस बेड पर रोज माँ बेटे की चुदाई होगी. ठीक है न ?"

माँ ने फिर शर्म से अपना मुँह मेरे सीने में छुपा लिया और अपने हाथ में पकडे मेरे लौड़े को प्यार से मसलती हुई बोली

"ठीक है बेटा. शायद भगवान को यही मंजूर है. अगर उसकी यही इच्छा है तो ऐसे ही सही. आज से हम दोनों एक दुसरे की सेक्स की जरूरत भी पूरी करेंगे. और सच में एक दूजे का सहारा बनेंगे."

यह कहते हुए माँ मेरे से लिपट गयी , पर उसने हाथ में पकड़ा हुआ मेरा लौड़ा नहीं छोड़ा और उसे धीरे धीरे मुठियाती रही. शायद माँ को १० साल बाद एक असली लौड़ा पकड़ने का मौका मिला था तो वो लण्ड को छोड़ना नहीं चाहती थी. मैंने भी माँ की चूत को अपने हाथ में भरे रखा और धीरे से एक ऊँगली माँ की चूत , जो की अब उसके बह रहे काम रस से गीली हो गयी थी, में घुसेड़ दी.

माँ ने एक आह की आवाज करी पर मेरी ऊँगली को अपनी चूत में से निकलने की कोशिश भी न करि. बल्कि आगे को खिसक कर ऊँगली को और पूरा अंदर तक लेने की कोशिश की।

मैं बहुत खुश था.

भगवान ने हम माँ बेटे की सुन ली थी.

 

sunoanuj

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Bahut hee jabardast update ! 👏🏻👏🏻👏🏻
 

Napster

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खाना खाने के बाद मैं चुपचाप अपने कमरे में जा कर लेट गया। मैंने एक लुंगी पहन रखी थी और ढीला सा कच्छा पहना था ताकि रात में मुझे मुठ मारने में दिक्कत न हो.

माँ भी किचन का काम निबटा कर अपने कमरे में जा कर लेट गयी.

मेरा दिल तो बहुत देर से बहुत तेज तेज धड़क रहा था. पर जब माँ अपने कमरे में जा कर लेट गयी और उनके कमरे की लाइट भी बंद हो गयी तो मेरा दिल भुज गया. मुझे लग रहा था की मैंने अपनी माँ से सेक्स सम्भन्ध बनाने की बात करके गलती कर दी है. मेरा तो आज मुठ मारने का भी मन नहीं कर रहा था.

मुझे नींद नहीं आ रही थी.

इसी तरह रात के ११ बज गए.

मैं सोने ही जा रहा था की अचानक मेरे कमरे के दरवाजे पर कुछ आवाज हुई. मैंने सर घुमा कर देखा तो दरवाजा धीरे धीरे खुल रहा था.

मेरा दिल इतनी जोर से धड़कने लगा की जैसे मेरा तो हार्ट अटैक ही आ जायेगा.

दरवाजे से मेरी माँ जिसने एक ढीला सी मैक्सी पहन रखी थी अंदर आयी.

कमरे में खिड़की से बाहर से थोड़ी रौशनी आ रही थी जिस से सब कुछ ठीक से दिखाई दे रहा था.

माँ ने मेरी तरफ देखा और मेरे बेड के पास आ गयी. मैं भी अपलक माँ की तरफ ही देख रहा था.

मैं माँ की ओर देख रहा था मैने अपनी आँखें अपनी माँ की आँखों की तरफ की और उनकी आँखों में देखा.

माँ की आँखों में बेइंतेहा शर्मा की लाली थी. माँ ने शर्म से अपनी आँखें झुका ली. वो मेरी ओर ज्यादा देर तक न देख सकी.

मैं माँ को देखते हुए मुस्कुरा रहा था. और माँ बहुत ही शर्मा रही थी. मैंने माँ को बैठने या लेटने के लिए कुछ न कहा और आराम से अपने बीएड पर लेटा रहा. तो माँ बेचारी आइए ही कड़ी रही. मैं शरारत से मुस्कुरा रहा था.

माँ भी चुप थी. अब वो वापिस भी नहीं है सकती थी. जब मैंने उन्हें बैठने या लेटने को न कहा तो माँ ने आखिर अपनी चुप्पी तोड़ी और मुझे बोली

माँ ने मुझे देखते हुए कहा।

"थोड़ा परे को तो सरक मुझे भी लेटने के लिए थोड़ी जगह दे. देख कैसे अकेला ही पूरा बेड घेर कर लेटा है. "

कहते हुए माँ के होंठों पर एक शरारती सी मुस्कान थी.

मैंने फटाफट पीछे को हो कर माँ के लेटने के लिए जगह बनाई।

खाली जगह में माँ मेरे साथ लेट गयी.

मेरा दिल धड़क रहा था. लगता था माँ ने कोई निर्णय कर लिया है और हम दोनों माँ बेटे के जिंदगी खुशियों से भरने वाली है.

माँ बिलकुल मेरे साथ ही लेटी थी. हमारे शरीरों के बीच में मुश्किल से ६ इंच का फासला था.

माँ का दिल भी इतने जोर से धड़क रहा था कि उनके दिल के धड़कने की आवाज मुझे साफ सुनाई दे रही थी. शायद मेरे तेज तेज धड़कते दिल की आवाज मेरी माँ को भी सुनाई दे रही हो.

यह हमारे जीवन का एक बहुत ही नाजुक और महत्वपूर्ण क्षण था. जो हमारे आने वाले जीवन की दिशा बदल देने वाला था.

मैंने माँ से प्यार से पूछा

"माँ क्या आप ने मेरी बात पर कुछ गौर किया.? आप ने क्या निर्णय लिया है?"

जवाब में माँ कुछ नहीं बोली. उनकी गालें शर्म से लाल हो रही थी. शर्म से उनसे कुछ कहा नहीं जा रहा था. बस उन्होंने आगे बढ़ कर मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए और उन्हें चूमने लगी.

माँ का उत्तर बिलकुल स्पष्ट था. मैंने भी अपने होंठ खोल दिए और माँ के होंठों को अपने होंठों के बीच दबा कर चूसने लगा.

मैंने फिर अपना चेहरा पीछे किया और शरारती सी मुस्कान में कहा

"माँ बताओ न आप का क्या निर्णय है. क्या मैं आप की हाँ समझूँ ?"

हालाँकि अब सब स्पष्ट ही था. माँ ने मेरे कमरे में आ कर और मेरे होंठों को चूम कर सब बता ही दिया था पर मैं तो शरारत कर रहा था.

पर माँ तो आखिर माँ ही थी. वो मुँह से कुछ बोल कैसे सकती थी.

जब मैंने माँ से दोबारा उन का निर्णय पूछा तो माँ ने शर्म से अपना चेहरा मेरी छाती में छुपा लिया और मुझसे चिपकते हुए धीरे से अपना हाथ नीचे ले जा कर मेरी लुंगी में डाल दिया और मेरे तने हुए लौड़े को अपने हाथ में पकड़ लिया.

फिर माँ ने धीमे से अपना मुँह मेरे कान के पास किया और मेरे लौड़े को अपने हाथ से आगे पीछे करते हुए, जैसे वो मेरा मुठ मार रही हो, धीरे से बोली

"यह है मेरा निर्णय."

और मेरे लौड़े को जोर से दबा दिया. कि मेरी तो जैसे चीख ही निकल गयी.

माँ अब मेरे लौड़े पर अपने हाथ को तेज तेज आगे पीछे करते हुए मेरे लण्ड को प्यार से सहला रही थी, और फिर मेरे कान में फिर से बोली.

"बेटा मुझे बोलने में बहुत शर्म आ रही है. बस अब कुछ न पूछ. तू खुद ही समझ जा. तू अपना दिल भी बता दे कि तेरे दिल में क्या इच्छा है."

मैंने अपना हाथ नीचे ले जा कर माँ की सलवार मैं घुसेड़ दिया. माँ के कोई पैंटी नहीं पहनी थी. मेरा हाथ सीधा माँ की चूत पर पहुंच गया.

मेरे को एक और झटका सा लगा. माँ की चूत, जिसे मैंने न जाने कितनी बार छुप छुप कर बाथरूम में देखा था की उस पर झांटों का पूरा जंगल ऊगा हुआ था. अब बिलकुल क्लीन शेव थी. लगता था माँ अपनी पहली चुदाई के लिए झांटे साफ करके पूरी तयारी करके आयी थी.

मैंने माँ की फूली हुई चूत को अपनी मुठी में भर लिया और उसे मुट्ठी में मसलते हुए बोला।

"माँ आपका बहुत बहुत धन्यवाद कि आपने मेरी बात पर सहानुभूति पूर्वक फैसला किया। अब आपको कभी भी चुदाई के लिए तड़पना नहीं पड़ेगा और न ही मेरे जीवन में कोई कमी रहेगी. हम दोनों माँ बेटा एक दूजे का सहारा बनेंगे और एक दुसरे की हर तरह से इच्छा पूर्ती करेंगे. आज से दुनिया की नजरों में हम माँ बेटा है पर घर के अंदर हम दोनों एक मर्द और औरत है. दोनों एक दूजे की सेक्स की जरूरत पूरी करेंगे. आज के बाद न ही मेरे को मुठ मारना पड़ेगा और न ही आपको अपनी उँगलियों से या किसी खीरे गाजर आदि से अपनी इच्छा पूरी करने की जरूरत रहेगी. आज से इस बेड पर रोज माँ बेटे की चुदाई होगी. ठीक है न ?"

माँ ने फिर शर्म से अपना मुँह मेरे सीने में छुपा लिया और अपने हाथ में पकडे मेरे लौड़े को प्यार से मसलती हुई बोली

"ठीक है बेटा. शायद भगवान को यही मंजूर है. अगर उसकी यही इच्छा है तो ऐसे ही सही. आज से हम दोनों एक दुसरे की सेक्स की जरूरत भी पूरी करेंगे. और सच में एक दूजे का सहारा बनेंगे."

यह कहते हुए माँ मेरे से लिपट गयी , पर उसने हाथ में पकड़ा हुआ मेरा लौड़ा नहीं छोड़ा और उसे धीरे धीरे मुठियाती रही. शायद माँ को १० साल बाद एक असली लौड़ा पकड़ने का मौका मिला था तो वो लण्ड को छोड़ना नहीं चाहती थी. मैंने भी माँ की चूत को अपने हाथ में भरे रखा और धीरे से एक ऊँगली माँ की चूत , जो की अब उसके बह रहे काम रस से गीली हो गयी थी, में घुसेड़ दी.

माँ ने एक आह की आवाज करी पर मेरी ऊँगली को अपनी चूत में से निकलने की कोशिश भी न करि. बल्कि आगे को खिसक कर ऊँगली को और पूरा अंदर तक लेने की कोशिश की।

मैं बहुत खुश था.

भगवान ने हम माँ बेटे की सुन ली थी.
बहुत ही मस्त और लाजवाब अपडेट है भाई मजा आ गया
अगले धमाकेदार और चुदाईदार अपडेट की प्रतिक्षा रहेगी जल्दी से दिजिएगा
 

Ajju Landwalia

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खाना खाने के बाद मैं चुपचाप अपने कमरे में जा कर लेट गया। मैंने एक लुंगी पहन रखी थी और ढीला सा कच्छा पहना था ताकि रात में मुझे मुठ मारने में दिक्कत न हो.

माँ भी किचन का काम निबटा कर अपने कमरे में जा कर लेट गयी.

मेरा दिल तो बहुत देर से बहुत तेज तेज धड़क रहा था. पर जब माँ अपने कमरे में जा कर लेट गयी और उनके कमरे की लाइट भी बंद हो गयी तो मेरा दिल भुज गया. मुझे लग रहा था की मैंने अपनी माँ से सेक्स सम्भन्ध बनाने की बात करके गलती कर दी है. मेरा तो आज मुठ मारने का भी मन नहीं कर रहा था.

मुझे नींद नहीं आ रही थी.

इसी तरह रात के ११ बज गए.

मैं सोने ही जा रहा था की अचानक मेरे कमरे के दरवाजे पर कुछ आवाज हुई. मैंने सर घुमा कर देखा तो दरवाजा धीरे धीरे खुल रहा था.

मेरा दिल इतनी जोर से धड़कने लगा की जैसे मेरा तो हार्ट अटैक ही आ जायेगा.

दरवाजे से मेरी माँ जिसने एक ढीला सी मैक्सी पहन रखी थी अंदर आयी.

कमरे में खिड़की से बाहर से थोड़ी रौशनी आ रही थी जिस से सब कुछ ठीक से दिखाई दे रहा था.

माँ ने मेरी तरफ देखा और मेरे बेड के पास आ गयी. मैं भी अपलक माँ की तरफ ही देख रहा था.

मैं माँ की ओर देख रहा था मैने अपनी आँखें अपनी माँ की आँखों की तरफ की और उनकी आँखों में देखा.

माँ की आँखों में बेइंतेहा शर्मा की लाली थी. माँ ने शर्म से अपनी आँखें झुका ली. वो मेरी ओर ज्यादा देर तक न देख सकी.

मैं माँ को देखते हुए मुस्कुरा रहा था. और माँ बहुत ही शर्मा रही थी. मैंने माँ को बैठने या लेटने के लिए कुछ न कहा और आराम से अपने बीएड पर लेटा रहा. तो माँ बेचारी आइए ही कड़ी रही. मैं शरारत से मुस्कुरा रहा था.

माँ भी चुप थी. अब वो वापिस भी नहीं है सकती थी. जब मैंने उन्हें बैठने या लेटने को न कहा तो माँ ने आखिर अपनी चुप्पी तोड़ी और मुझे बोली

माँ ने मुझे देखते हुए कहा।

"थोड़ा परे को तो सरक मुझे भी लेटने के लिए थोड़ी जगह दे. देख कैसे अकेला ही पूरा बेड घेर कर लेटा है. "

कहते हुए माँ के होंठों पर एक शरारती सी मुस्कान थी.

मैंने फटाफट पीछे को हो कर माँ के लेटने के लिए जगह बनाई।

खाली जगह में माँ मेरे साथ लेट गयी.

मेरा दिल धड़क रहा था. लगता था माँ ने कोई निर्णय कर लिया है और हम दोनों माँ बेटे के जिंदगी खुशियों से भरने वाली है.

माँ बिलकुल मेरे साथ ही लेटी थी. हमारे शरीरों के बीच में मुश्किल से ६ इंच का फासला था.

माँ का दिल भी इतने जोर से धड़क रहा था कि उनके दिल के धड़कने की आवाज मुझे साफ सुनाई दे रही थी. शायद मेरे तेज तेज धड़कते दिल की आवाज मेरी माँ को भी सुनाई दे रही हो.

यह हमारे जीवन का एक बहुत ही नाजुक और महत्वपूर्ण क्षण था. जो हमारे आने वाले जीवन की दिशा बदल देने वाला था.

मैंने माँ से प्यार से पूछा

"माँ क्या आप ने मेरी बात पर कुछ गौर किया.? आप ने क्या निर्णय लिया है?"

जवाब में माँ कुछ नहीं बोली. उनकी गालें शर्म से लाल हो रही थी. शर्म से उनसे कुछ कहा नहीं जा रहा था. बस उन्होंने आगे बढ़ कर मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए और उन्हें चूमने लगी.

माँ का उत्तर बिलकुल स्पष्ट था. मैंने भी अपने होंठ खोल दिए और माँ के होंठों को अपने होंठों के बीच दबा कर चूसने लगा.

मैंने फिर अपना चेहरा पीछे किया और शरारती सी मुस्कान में कहा

"माँ बताओ न आप का क्या निर्णय है. क्या मैं आप की हाँ समझूँ ?"

हालाँकि अब सब स्पष्ट ही था. माँ ने मेरे कमरे में आ कर और मेरे होंठों को चूम कर सब बता ही दिया था पर मैं तो शरारत कर रहा था.

पर माँ तो आखिर माँ ही थी. वो मुँह से कुछ बोल कैसे सकती थी.

जब मैंने माँ से दोबारा उन का निर्णय पूछा तो माँ ने शर्म से अपना चेहरा मेरी छाती में छुपा लिया और मुझसे चिपकते हुए धीरे से अपना हाथ नीचे ले जा कर मेरी लुंगी में डाल दिया और मेरे तने हुए लौड़े को अपने हाथ में पकड़ लिया.

फिर माँ ने धीमे से अपना मुँह मेरे कान के पास किया और मेरे लौड़े को अपने हाथ से आगे पीछे करते हुए, जैसे वो मेरा मुठ मार रही हो, धीरे से बोली

"यह है मेरा निर्णय."

और मेरे लौड़े को जोर से दबा दिया. कि मेरी तो जैसे चीख ही निकल गयी.

माँ अब मेरे लौड़े पर अपने हाथ को तेज तेज आगे पीछे करते हुए मेरे लण्ड को प्यार से सहला रही थी, और फिर मेरे कान में फिर से बोली.

"बेटा मुझे बोलने में बहुत शर्म आ रही है. बस अब कुछ न पूछ. तू खुद ही समझ जा. तू अपना दिल भी बता दे कि तेरे दिल में क्या इच्छा है."

मैंने अपना हाथ नीचे ले जा कर माँ की सलवार मैं घुसेड़ दिया. माँ के कोई पैंटी नहीं पहनी थी. मेरा हाथ सीधा माँ की चूत पर पहुंच गया.

मेरे को एक और झटका सा लगा. माँ की चूत, जिसे मैंने न जाने कितनी बार छुप छुप कर बाथरूम में देखा था की उस पर झांटों का पूरा जंगल ऊगा हुआ था. अब बिलकुल क्लीन शेव थी. लगता था माँ अपनी पहली चुदाई के लिए झांटे साफ करके पूरी तयारी करके आयी थी.

मैंने माँ की फूली हुई चूत को अपनी मुठी में भर लिया और उसे मुट्ठी में मसलते हुए बोला।

"माँ आपका बहुत बहुत धन्यवाद कि आपने मेरी बात पर सहानुभूति पूर्वक फैसला किया। अब आपको कभी भी चुदाई के लिए तड़पना नहीं पड़ेगा और न ही मेरे जीवन में कोई कमी रहेगी. हम दोनों माँ बेटा एक दूजे का सहारा बनेंगे और एक दुसरे की हर तरह से इच्छा पूर्ती करेंगे. आज से दुनिया की नजरों में हम माँ बेटा है पर घर के अंदर हम दोनों एक मर्द और औरत है. दोनों एक दूजे की सेक्स की जरूरत पूरी करेंगे. आज के बाद न ही मेरे को मुठ मारना पड़ेगा और न ही आपको अपनी उँगलियों से या किसी खीरे गाजर आदि से अपनी इच्छा पूरी करने की जरूरत रहेगी. आज से इस बेड पर रोज माँ बेटे की चुदाई होगी. ठीक है न ?"

माँ ने फिर शर्म से अपना मुँह मेरे सीने में छुपा लिया और अपने हाथ में पकडे मेरे लौड़े को प्यार से मसलती हुई बोली

"ठीक है बेटा. शायद भगवान को यही मंजूर है. अगर उसकी यही इच्छा है तो ऐसे ही सही. आज से हम दोनों एक दुसरे की सेक्स की जरूरत भी पूरी करेंगे. और सच में एक दूजे का सहारा बनेंगे."

यह कहते हुए माँ मेरे से लिपट गयी , पर उसने हाथ में पकड़ा हुआ मेरा लौड़ा नहीं छोड़ा और उसे धीरे धीरे मुठियाती रही. शायद माँ को १० साल बाद एक असली लौड़ा पकड़ने का मौका मिला था तो वो लण्ड को छोड़ना नहीं चाहती थी. मैंने भी माँ की चूत को अपने हाथ में भरे रखा और धीरे से एक ऊँगली माँ की चूत , जो की अब उसके बह रहे काम रस से गीली हो गयी थी, में घुसेड़ दी.

माँ ने एक आह की आवाज करी पर मेरी ऊँगली को अपनी चूत में से निकलने की कोशिश भी न करि. बल्कि आगे को खिसक कर ऊँगली को और पूरा अंदर तक लेने की कोशिश की।

मैं बहुत खुश था.

भगवान ने हम माँ बेटे की सुन ली थी.
Bahut hi umda update he Bro

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