UPDATE 5
बीते एक साल में मोहिनी का बदन पहले से भर गया था, उसके बूब्स भी अब ज़्यादा बड़े-बड़े दिखने लगे थे, कूल्हों का उठान अब साड़ी में साफ-साफ दिखता था. कुल मिलकर अब मोहिनी भाभी एकदम कड़क माल होती जा रही थी. संडे के संडे राम भैया अपनी प्यारी पत्नी यानी मोहिनी भाभी की अच्छे से सर्विस जो कर जाते थे. फ्रेश होकर मुझे भाभी ने बादाम वाला दूध दिया और साथ में कुछ बिस्किट वगैरह दे दिए, मैंने कहा भाभी इनसे क्या होगा, मुझे तो खाना खाना है, तो उन्होंने प्यार से झिड़कते हुए कहा – नहीं आज से इस टाइम तुम खाना नहीं खाओगे, खाना में स्कूल के लिए रख दिया करूँगी, तो रिसेस में खा लिया करना, घर आकर बस हल्का फुल्का और खाना सीधे रात को ही. अब तुम्हें मैं गबरू जवान मर्द बना के छोड़ूँगी. मैं चाहती हूँ मेरा देवर अपने पूरे परिवार में सबसे ज़्यादा ताक़तवर हो. जब सीना तान कर चले तो लगे मानो कोई शेर आ रहा हो.
मैंने हँसते हुए कहा क्यों भाभी बेवजह मुझे चढ़ा रही हो.
तो भाभी बोली – तुम इसे मज़ाक समझ रहे हो. चलो अब छत पर. तुम्हारे बदन की मालिश करनी है फिर देखना कैसा तुम्हारी थकान कोसों दूर खड़ी दिखेगी.
हम दोनों छत पर आ गये, हमारे आधे पोर्षन पर दो-मंज़िला बना हुआ था, वाकई हमारे अलावा आस-पास किसी का इतना उँचा मकान नहीं था. गांव के दूसरे छोर पर सिर्फ़ प्रधान का ही घर हमारे से उँचा था, लेकिन बहुत दूर था वो हमसे. ऊपर दो बड़े कमरे और उनके आगे एक बरामदा, इस सबकी एक कंबाइंड छत काफ़ी लंबी चौड़ी थी, जो चारों तरफ 2.5 फीट उँची बाउंड्री से कवर की हुई थी.
भाभी ने एक बिछावन नीचे डाला और मुझे अपनी बनियान उतारकर उसपर लेटने को कहा, नीचे में बस एक बरमूडा ही पहने हुए था. भाभी ने अपनी साड़ी के पल्लू को दुपट्टा की तरह अपने सीने पर कसकर लपेटा और उसे पीठ पर से लाते हुए अपनी कमर में खोंस लिया, कसे हुए ब्लाउज और साड़ी के बाहर से ही उनके सुडौल बूब्स एकदम उभर कर बाहर को निकल आए. वो मेरे बाजू में उकड़ू बैठ गयी, अपने साथ लाई एक कटोरी जिसमें गुनगुना सरसों का तेल था उसे मेरे सर पास रख दिया, फिर अपने हाथों में ढेर सारा तेल ले कर मेरे सीने और कंधों की मालिश करने लगी. भाभी के गोरे मुलायम हाथ मेरे शरीर पर उपर-नीचे हो रहे थे, उनकी एक साइड की मांसल जाँघ मेरी कमर से रगड़ रही थी, जब वो ऊपर को आती तो जाँघ के साथ-साथ उनके पेट का हिस्सा भी मेरे शरीर से रगड़ जाता.
मैं अपनी आँखें बंद किए हुए ये सब फील कर रहा था, और धीरे-धीरे एक अजीब सी उत्तेजना मेरे शरीर में भरती जा रही थी. सीने और कंधों की मालिश के बाद भाभी थोड़ा नीचे की तरफ हुई और अब उनकी जांघों का एहसास मुझे अपनी जाँघ के निचले भाग पर हुआ, अब भाभी मेरे पेट और उसके साइड की मालिश करने लगी. जब उनके हाथ मेरे दूसरी साइड की मालिश करते तो उन्हें ज़्यादा झुकना पड़ता जिससे उनका पेट मेरे कमर से टच होता. ना चाहते हुए भी मेरे बरमूडा में उभार सा बनाने लगा. फिर उन्होंने मेरे पैरों की तरफ रुख़ किया और पैर के पंजों से शुरू करते हुए भाभी ऊपर की तरफ आने लगी, घुटनो के ऊपर उनके हाथों को फील करते ही मेरी उत्तेजना और बढ़ने लगी और मेरी लंड कड़क हो गया.
भाभी के हाथ जांघों की मालिश करते हुए ऊपर और ऊपर की तरफ आते जा रहे मैंने हल्के से अपनी आँखें खोलकर देखा तो मालिश करते हुए उनकी नज़र मेरे उभार पर ही टिकी हुई थी और मंद-मंद मुस्करा रही थी. अब भाभी ने मुझे पलटने के लिए कहा- तो में अपने पेट के बल लेट गया. उन्होंने अपनी साड़ी को घुटनों तक चढ़ाया और मेरे ऊपर दोनों तरफ को पैर करके अपने घुटनो पर बैठ गयी. लाख कोशिशों के बावजूद भी जब वो मालिश करते हुए हाथ अपनी तरफ करती तो उनके गद्दे जैसे मुलायम नितंब मेरी कमर से टच हो जाते, फिर वो जैसे-जैसे नीचे को खिसकती गयी अब उनके मोटे-मोटे चूतड़ मेरी गांड के ऊपर थे. जब वो अपना दबाव मेरे ऊपर डालती तो मेरी नीचे कड़ी हुई लंड जो छाती से दबी हुई थी और ज़्यादा फूलने लगी, मारे उत्तेजना के मेरे मुँह से सिसकी निकलने लगी.
भाभी मन ही मन हँसते हुए बोली – क्या हुआ अंकुश जी.. कोई प्राब्लम है..?
अब मैं उनको क्या बताऊँ कि मुझे क्या प्राब्लम है? फिर भी मैंने उनको कहा – आह.. भाभी अपना वजन मत रखो, मुझे दुख रहा है.
भाभी – कहाँ दुख रहा है… ?
मैं – अरे समझा करो भाभी, आप भी ना! मेरी कमर में और कहाँ…
भाभी – ओह्ह्ह.. तो मालिश बंद कर दूँ..?
मैं – नहीं ! लेकिन थोड़ा वजन कम रखो ना प्लीज़…
फिर भाभी थोड़ा नीचे को मेरी जांघों के ऊपर बैठ गयी तो मुझे कुछ राहत मिली, लेकिन अब उन्हें मेरे कंधों तक पहुँचने में ज़्यादा झुकना पड़ रहा था तो भाभी की चूत मेरी गांड से रगड़ खाने लगी. उन्हें अब और ज़्यादा मज़ा आने लगा और मालिश के बहाने और तेज-तेज हाथ चलाने लगी, कुछ देर बाद ही भाभी अपनी चूत को मेरी गांड से चिपका कर हाथों को मेरी पीठ पर टिकाए अकड़ कर बैठ गयी और कुछ देर ऐसे ही शांत बैठी रही. मैंने सर घुमाकर पीछे देखने की कोशिश की तो भाभी ने अपने हाथों का दबाव मेरी पीठ पर और बढ़ा दिया जिसके कारण में देख नहीं पाया कि भाभी ऐसे क्यों शांत बैठी हैं?
मालिश करने के बाद जब भाभी मेरे ऊपर से उठ गई, तो मैं कुछ देर यूँ ही उलटा पड़ा रहा, क्योंकि मैं अपने उभार को दिखाना नहीं चाहता था. वाकई में मेरे शरीर की अकड़न एक दम चली गयी थी, भाभी बिना कुछ कहे अपने कपड़े ठीक करके नीचे चली गयी और मैं वहीं पड़े-पड़े नींद में डूबता चला गया.
अब भाभी रोज़ सुबह 5 बजे मुझे जगा देती, और फ्रेश होकर कसरत करवाती, वही देसी दंड बैठक और कुछ देसी एक्सरसाइज. उसके बाद नहाना-धोना, स्कूल के लिए रेडी होने के बाद एक लीटर बादाम का दूध पिलाती. स्कूल में भी रोज़ गेम्स की प्रैक्टिस होती, फिर शाम को मालिश, भाभी की मस्तियाँ बढ़ती जा रही थी, लेकिन एक अनदेखी दीवार थी जो हम दोनों को रोके हुए थी अपनी हदें पार करने से. दूसरी ओर रमा दीदी भी मौका निकाल ही लेती मौज मस्ती का. अब उन दोनों के साथ क्या होता था, मुझे नहीं पता, लेकिन ऐसे मौकों पर मेरा हाल बेहाल हो जाता था, और कुछ कर भी नहीं सकता था, क्योंकि यही पता नहीं था कि करूँ तो क्या?
स्पोर्टस डे तक मेरा शरीर भाभी की मालिश, खेलों की प्रैक्टिस और कसरतों की वजह से एक दम पत्थर जैसा हो चुका था. लॉन्ग जम्प में, मैं अपने स्कूल में सबसे आगे था, और कबड्डी में भी मेरी वजह से हमारी क्लास के आगे 12 क्लास की भी टीम हार जाती थी. फाइनल डे को जो होना था वही हुआ, लास्ट में कुश्ती की प्रतियोगिता भी हुई, जिसमें मैंने हिस्सा तो नहीं लिया था, लेकिन 11 क्लास का एक लड़का जो चैंपियन हो गया था पास के ही गांव का, वो घमंड में आ गया और उसने पूरे स्कूल के बच्चों में ओपन चैलैंज कर दिया.
टीचर्स को उसकी ये बात बुरी लगी, तो प्रिन्सिपल ने अपनी तरफ से बड़ा सा इनाम घोषित करके बोले- सभी बच्चों सुनो, तुम लोगों में से जो भी बच्चा इस लड़के को हरा देगा उसे में अपनी तरफ से पचास हज़ार इनाम दूँगा.
जब कोई आगे नहीं आया तो मेरे क्लास टीचर बोले – क्यों अंकुश तुम भी नहीं लड़ सकते इससे?
मैं – नहीं सर ! मुझे कुश्ती लड़ने का कोई आईडिया नहीं है, और ना ही मैं लड़ना चाहता हूँ.
क्लास टीचर मेरे पास आए और धीमी आवाज़ में बोले- मैं जानता हूँ तुम्हारे अंदर इससे बहुत ज़्यादा ताक़त है, बस इसके पैरों पर नज़र रखना और अपना बचाव करते रहना. जब ये थकने लगे तभी उठाकर पटक देना. देखो ये अपने स्कूल की इज़्ज़त का सवाल है, ये लड़का इतनी बदतमीजी से सब को चैलैंज कर रहा है, और अब तो अपने प्रिन्सिपल साहब की भी इज़्ज़त दाँव पर लग गयी है.
मैंने कहा ठीक है सर अगर आप चाहते हैं तो मैं कोशिश ज़रूर करूँगा. उन्होंने फिर अपनी तरफ से ही अनाउन्स कर दिया कि इससे अंकुश लड़ेगा. फिर हम दोनों में कुश्ती हुई, वो दाँव पेच में माहिर था, लेकिन ताक़त में मेरे मुकाबले बहुत कम, तो जैसे मेरे टीचर ने बोला था में कुछ देर उसके दाव बचाता रहा, फिर एक बार फुर्ती से में उसके पीछे आया और उसकी कमर में लपेटा मारकर दे मारा ज़मीन पर. लेकिन साला हवा में ही पलटी खा गया और चित्त नहीं हुआ, अब में उसके ऊपर सवार था और उसको चित्त करने की कोशिश करने लगा. जब उसे लगा कि अब वो ज़्यादा देर तक मेरे सामने नहीं टिक पाएगा, तो उसने अपनी मुट्ठी में रेत भरकर मेरी आँखों में मार दी. मैं बिल-बिलाकर उसे छोड़ कर अपनी आँखों पर हाथ रख कर चीखने लगा, मौका देख कर वो मेरे पीछे आया और मेरी कमर में लपेटा लगा कर मुझे उठाना चाह रहा था. मैच रेफरी फ़ाउल प्ले का विस्सल बजा रहा था लेकिन उसने उसकी नहीं सुनी. जैसे ही उसने मुझे उठाने की कोशिश की मैंने अपनी एक टाँग उसकी टाँग में अड़ा दी और ताक़त लगा कर मैंने उसके हाथों से अपने को आज़ाद किया, और पलट कर एक हाथ उसकी गर्दन में लपेटा. मैंने बंद आँखों से ही उसकी गर्दन को कस दिया. उसने अपनी गर्दन छुड़ाने की लाख कोशिश की लेकिन टस से मस नहीं हुई, आखिरकार उसकी साँसें फूलने लगी और रेफ़री ने आकर उसे मेरी गिरफ़्त से छुड़ा लिया. कोई मेरे लिए पानी ले आया था तो मैंने मिट्टी को धोने के बाद अपनी आँखों में पानी मारा, आँखें खुलने तो लगी लेकिन सुर्ख लाल हो चुकी थी. जब मेरी नज़र उसपर पड़ी तो अभी भी वो ज़ोर-ज़ोर से साँसें ले रहा था और मुझे खा जाने वाली नज़रों से घूर रहा था.
प्रिन्सिपल ने मुझे जीत का इनाम दे दिया. मुझे तुरंत डॉक्टर को दिखाया और दवा डलवाकर और अपना इनाम लेकर हम घर लौट आए. बाहर चौपाल पर ही बाबूजी बैठे थे, उन्होंने मेरी आँखें देखकर पुछ लिया तो दीदी ने उन्हें सारी बात बता दी. उन्होंने मुझे शाबासी दी और अपने गले से लगा लिया. मेरे हाथों में ट्रॉफी देखकर भाभी फूली नहीं समाई, और उन्होंने मुझे अपने सीने से कस लिया, उनकी आँखें डब-डबा गयी. मैंने कारण पूछा तो भाभी बोली – आज मैं अपनी ज़िम्मेदारियों में पास हो गयी, इससे ज़्यादा मेरे लिए और क्या खुशी की बात हो सकती है, माँ जी ने जिस विश्वास से तुम्हारा हाथ मेरे हाथों में सौंपा था उसमें मैं कितना सफल हुई हूँ ये मुझे इस ट्रॉफी के रूप में दिख रहा है.
बाबूजी दरवाजे के पीछे से ये सारी बातें सुन रहे थे, उनसे भी रहा नहीं गया और अंदर आते हुए बोले- सच कहा बहू तुमने, आज तुम्हारे कारण मेरा बेटा ये सब कर पाया है. शायद विमला भी इतना नहीं कर पाती जितना तुमने इन बच्चों के लिए किया है. पिताजी की आवाज़ सुन कर भाभी ने झट से अपने सर पर पल्लू डाला और उनके पैर पड़ गयी.
जुग-जुग जियो मेरी बच्ची, तुमने साबित कर दिया कि तुम्हारे संस्कार कितने महान हैं, इतने कम उमर में तुमने इस घर को इतने अच्छे से संभाला है. मैं हर रोज़ भगवान का कोटि-कोटि धन्यवाद करता हूँ, कि उन्होंने हमें एक दुख के बदले तुम्हारे रूप में इतनी बड़ी सौगात दी है.
जीती रहो बेटा, और अपने घर को इसी तरह सजाती संवारती रहो. इतना बोल अपनी भीगी आँखें पोंछते हुए बाबूजी बाहर चले गये.
ऐसी ही कुछ खट्टी मीठी, यादों के सहारे, आपस में मौज मस्ती करते हुए समय अपनी गति से बढ़ता रहा, और देखते-देखते हमारे एग्जाम की डेट भी आ गई. हम दोनों बहन भाई पढ़ाई में जुट गये, हम दोनों देर रात तक जाग कर पढ़ते रहते, बीच-बीच में आकर भाभी देखने आ जाती की किसी चीज़ की ज़रूरत तो नहीं है. दोनों बड़े भाई भी बीच-बीच में घर आते और हमें अपने एग्जाम के एक्सपीरियेन्सस शेयर करके एनकरेज करते.
एक दिन पढ़ते-पढ़ते मैं थक गया, तो पलंग पर लंबा होकर पढ़ने लगा, ना जाने कब मेरी आँख लग गयी और अपने सीने पर खुली बुक रखकर गहरी नींद में सो गया.
पढ़ते-पढ़ते रमा दीदी जब बोर होने लगी, रात काफ़ी हो गयी थी, आँखों में नींद की खुमारी आने लगी थी, अपनी किताबें उसने टेबल पर रखी. जब उसकी नज़र अपने छोटे भाई पर पड़ी, तो उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी. कुछ देर वो अपने भाई के मासूम चेहरे को देखती रही, जो सोते हुए किसी मासूम से बच्चे की तरह लग रहा था. उसने धीरे से उसके हाथों के बीच से उसकी बुक निकाली और टेबल पर रख दी. कुछ सोच कर एक शरारत उसके चेहरे पर उभरी और लाइट ऑफ करके वो उसके बगल में लेट गयी. छोटू पीठ के बल सीधा लेटा हुआ था, उसके दोनों हाथ उसके सीने पर थे, रमा कुछ देर दूसरी ओर करवट लिए पड़ी रही फिर उसका मन नहीं माना तो वो अपने भाई की तरफ पलट गयी.
अपने एक बाजू को वी शेप में मोड़ कर अपने गाल के नीचे टिकाया और अपने सर को उँचा करके उसने छोटू के चेहरे को देखा, वो अभी भी बेसुध सोया हुआ था. रमा थोड़ी सी उसकी तरफ खिसकी और हल्के से उसने अपने शरीर को अपने भाई से सटा लिया, और अपनी ऊपर वाली टाँग उठाकर छोटू के ठीक जांघों के जोड़ के ऊपर रख लिया. कुछ देर वो यूं ही पड़ी रही, फिर वो अपनी टाँग को उसके बरमूडा के ऊपर रगड़ने लगी.
उसकी टाँग की रगड़ से छोटू की लंड जो अब एक मस्त लंड होती जा रही थी, धीरे-धीरे अपनी औकात में आने लगा. उसके लौड़े का साइज़ फूलता देख रमा दीदी कुछ सहम सी गयी और उसने अपनी टाँग की घिसाई बंद कर दी. लेकिन कुछ देर तक भी छोटू के शरीर में कोई हलचल नहीं हुई, तो उसकी हिम्मत और बढ़ी और उसने उसके हाथ को अपने सीने पर रख लिया और ऊपर से अपना हाथ रख कर अपने मुलायम कच्चे अमरूदों पर रगड़ने लगी. छोटू के हाथ को अपने अमरूदों पर फील कर के वो अपनी आँखें बंद करके मुँह से हल्की-हल्की सिसकियाँ लेने लगी. जैसे-जैसे उसकी उत्तेजना बढ़ती जा रही थी, उसकी झिझक, उसकी शर्म, भाई-बहन वाला बंधन सब सिसकियों के माध्यम से बाहर होते जा रहे थे.
उसका शरीर अब मनमाने तरीक़े से थिरकने लगा, और अब रमा दीदी उसके हाथ के साथ-साथ अपनी प्यारी दुलारी चूत को अपने भाई की जाँघ से सटा कर उपर नीचे को होने लगी. छोटू को नींद में किसी दूसरे शरीर की गर्मी का एहसास हुआ तो उसकी नींद खुल गयी, एक बार उसने अपनी बहन की तरफ देखा और उसने फिर से अपनी आँखें कस कर बंद कर ली और अंकुश भी मज़ा लेने लगा. रमा दीदी की पजामी अब थोड़ी गीली होने लगी थी, उसके गीले पन का एहसास उसकी नंगी जाँघ पर हो रहा था.
अब रमा दीदी ने उसका हाथ अपनी गीली चूत के ऊपर रख दिया और उसे मसलवाने लगी. थोड़ी देर तक अपनी बहन के हाथ के इशारे से ही वो उसकी गीली चूत को सहलाता रहा, फिर अचानक अपनी उंगली मोड़ कर उसकी चूत जो केवल पजामी में ही थी, के ऊपर से ही कुरेदने लगा. रमा उत्तेजना के आवेग में सब कुछ भूल गयी और उसे ये भी एहसास नहीं रहा कि उसके भाई की उंगली उसकी गीली चूत को कुरेद रही है, वो बस अपनी बंद आँखों से नीची आवाज़ में आहें भरने लगी अपने कमर को तेज़ी से हिलाए जा रही थी. एक साथ ही उसका पूरा बदन इतनी ज़ोर से आकड़ा और उसने छोटू के हाथ को बुरी तरह से अपनी गीली चूत के ऊपर दबा दिया और उससे चिपक गयी. दो मिनिट तक वो ऐसे ही चिपकी रही, फिर जब उसका ओर्गास्म हो गया तब उसे होश आया और वो उससे अलग होकर लेट गयी.
कुछ देर पहले हुए इवेंट्स को जब उसने अपने दिमाग़ में रीवाइंड किया तब उसे ध्यान आया कि कैसे उसके भाई की उंगली उसकी चूत में घुसी जा रही थी. झट से उसके दिमाग़ ने झटका खाया, कि ये सब उसने नींद में नहीं किया है.
तो क्या वो जाग रहा था..??
उसने डरी-डरी आँखों से एक बार फिर अपने भाई की तरफ देखा, और जब उसे उसी तरह सोता हुआ पाया तो उसने अपने दिमाग़ को झटक दिया और मन ही मन फ़ैसला भी सुना दिया कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, अंकुश तो सो रहा है, और अपने मन को तसल्ली देकर वो भी अपने बिस्तर पर जाकर लेट गयी, और कुछ ही देर में नींद ने उसे अपने आगोश में ले लिया.
सुबह मैं जल्दी उठ गया था, फ्रेश-व्रेश होकर भाभी किचन में थी, उन्होंने मुझे चाय दी बाबूजी को देने के लिए, मैंने बाहर जा कर बाबूजी को चाय दी, उन्होंने मुझे अपने पास बिठाया और मेरे सर पर हाथ फेरते हुए मुझे एग्जाम की तैयारियों के बारे में पूछा. फिर उनका खाली कप लेकर किचन में रखा, और आँगन में आकर चारपाई पर बैठ गया.
थोड़ी देर में दीदी भी फ्रेश होकर बाथरूम से निकली, मैंने उन्हें गुडमॉर्निंग विश किया. उन्होंने बड़ी बारीकी से मेरे चेहरे को देखा जब मेरे चेहरे पर उन्हें सामान्य से ही भाव दिखे तो मुस्कराते हुए उन्होंने मेरे विश का जवाब दिया और मेरे माथे पर एक किस करके मेरे पास बैठ गयी. हम दोनों ने साथ में नाश्ता किया, कुछ देर भाभी के साथ हँसी ठिठोली की और फिर बैठ गये पढ़ाई करने. हमारे बोर्ड एग्जाम खतम हो चुके थे और समर वेकेशन चल रहा था. आगे दीदी का ग्रेजुएशन करने का विचार था, लेकिन बाबूजी उन्हें शहर भेजना नहीं चाहते थे, तो प्राइवेट करने का फ़ैसला लिया.
बड़े भैया शहर में रहकर जॉब कर रहे थे, और हर सैटरडे की शाम घर आते, मंडे अर्ली मॉर्निंग निकल जाते. जॉब के साथ-साथ बड़े भैया ने पोस्ट ग्रेजुएशन भी शुरू कर दिया था, आगे उनका प्लान पीएचडी करके प्रोफेसर बनाने का था. कभी-कभी मंझले भैया भी आ जाते थे और अब वो ग्रेजुएशन के फाइनल ईयर में आने वाले थे. जब रमा दीदी के प्राइवेट ग्रेजुएशन करने की बात चली, तो मैंने भैया को सुझाव दिया कि क्यों ना भाभी को भी फॉर्म भरवा दिया जाए, वो भी ग्रेजुएशन कर लेंगी. बाबूजी समेत सब मेरी तरफ देखने लगे, भाभी तो मेरी ओर बलिहारी नज़रों से देख रही थी. दोनों भाइयों ने कुछ देर बाद मेरी बात का समर्थन किया, अब सिर्फ़ पिताजी के जवाब की प्रतीक्षा थी. सब की नज़रें उनकी ही तरफ थी.
बाबूजी – तुम क्या कहती हो बहू..? क्या तुम आगे पढ़ना चाहती हो..?
भाभी ने घूँघट में से ही अपना सर हां में हिला दिया. तो बाबूजी ने मुझे अपने पास आने का इशारा किया.
मैं डरते हुए उनके पास गया. उन्होंने मेरे माथे पर एक किस किया और बोले – मेरा बेटा अब समझदार हो गया है. है ना बहू! जुग-जुग जियो मेरे बच्चे. मैं तो चाहता हूँ कि शिक्षा का अधिकार समान रूप से सब को मिले. यही बात मैंने अपने भाइयों को भी समझाने की कोशिश की लेकिन तब उनकी समझ में मेरी बात नहीं आई, लेकिन अब वो भी अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा रहे. चलो देर से ही सही शिक्षा का महत्व समझ तो आया उनकी.
भाभी का मन गद-गद हो रहा था, जैसा ही अकेले में उन्हें मौका मिला, अपने सीने से भींच लिया मुझे और मेरे चेहरे पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी.
थैंक यू अंकुश डिअर, तुमने मेरे दिल की बात सब के सामने कह कर मुझे बिन मोल खरीद लिया. आगे पढ़ने की मेरी कितनी ख्वाहिश थी, लेकिन जल्दी शादी होने से मन की मन में ही रह गयी. उस दिन के बाद भाभी का झुकाव मेरी तरफ और ज़्यादा हो गया, और वो हर संभव मुझे अधिक से अधिक खुशी देने की कोशिश करती. एक दिन सभी भाई घर पर ही थे, बाबूजी बाहर चौपाल पर बैठे, लोगों के साथ गप सड़ाके में लगे थे, कि अचानक भाभी का जी मिचलाने लगा और वो सिंक मैं जा कर उल्टियाँ करने लगी. अब घर में और कोई बुजुर्ग महिला होती तो वो उनकी परेशानी को समझती. आनन फानन में बड़े भैया ने उनको स्कूटी पर बिठाया और कस्बे में डॉक्टर को दिखाने चल दिए. ना जाने क्या हुआ होगा, ये सोचकर मैं भी अपनी साइकल जो काफ़ी दिनों से कम यूज़ हो रही थी, उठाई और उनके पीछे-पीछे चल पड़ा.
डॉक्टर ने उनका चेकअप किया और भैया से बोले- बधाई हो राम, तुम बाप बनाने वाले हो.
भैया की खुशी का ठिकाना नहीं रहा, फिर डॉक्टर की फीस देकर वो बोले- छोटू तू अपनी भाभी को लेकर घर चल में साइकल से आता हूँ, कुछ मिठाई-विठाई लेकर.
रास्ते में मैंने भाभी को छेड़ा – क्यों भाभी बधाई हो, अब तो आप माँ बनोगी. लेकिन अपने बच्चे की खुशी में अपने इस नालायक देवर को मत भूल जाना.
वो मेरी पीठ पर अपना गाल सटा कर मुझसे लिपट गयी और बोली- तुम मेरे बच्चे नहीं हो..? जो मैं भूल जाऊंगी..! हां? आइंदा ऐसी बात भी मत करना. वरना में तुमसे कभी बात नहीं करूँगी… समझे…
मैं – अरे भाभी! मैं तो मज़ाक कर रहा था. क्या मुझे पता नहीं है कि आप मुझसे कितना प्यार करती हैं.
ऐसी ही बातें करते-करते हम घर आ गये. जब घर पर सब को ये खुशख़बरी सुनाई तो सब खुशी से नाचने लगे. घर में उत्सव जैसा माहौल बन गया था, भैया ने पूरे गांव में मिठाई बँटवाई, हमारे पूरे परिवार ने मिलकर हमारी इस खुशी में साथ दिया.
भाभी अपने घर जा रही थी. पता नहीं मेरे मन में दो तरह के भाव क्यों आ रहे थे, बोले तो डबल माइंड. एक तो इस बात की खुशी थी कि भाभी इतने सालों में अपने घर जा रही थी, दूसरा उनसे इतने सालों बाद बिछड़ना हो रहा था. सच कहूँ तो मुझे उनकी आदत सी हो गयी थी, तो उनके जाने के समय कुछ उदास सा हो गया. जिसे भाभी ने ताड़ लिया और मुझे अकेले में ले जा कर समझाने लगी.
अंकुश क्या हुआ..? मेरे जाने से खुश नहीं हो..?
मैं – नहीं भाभी, आपको इतने सालों बाद अपने घर जाने का मौका मिला है, मैं भला क्यों खुश नहीं होऊँगा..?
वो – (मेरे गाल पकड़ते हुए), तो फिर ऐसे मुँह क्यों लटका रखा है..?
मैं – पता नहीं भाभी एक तरफ तो आपके जाने की खुशी भी है कि चलो इतने दिनों बाद आपको अपने घर जाने का मौका मिल रहा है, दूसरी ओर ऐसा लग रहा है जैसे मेरे अंदर से कोई चीज़ निकल कर आपके साथ जा रही हो, और मैं खाली सा होता जा रहा हूँ.
भाभी कुछ देर शांत खड़ी मेरे चेहरे को देखती रही. फिर अचानक उनकी पलकें भीग गयी, और रुँधे स्वर में बोली – ये मेरे प्रति तुम्हारा लगाव है, जो स्वाभाविक है और ऐसा नहीं कि ये स्थिति केवल तुम्हारी ही है. मेरा भी कुछ ऐसा ही हाल है. तुम्हारी भावना तो केवल मेरे लिए ही हैं तब इतना दुख हो रहा है, लेकिन मेरा तो पूरे घर के साथ है तो सोचो मेरा क्या हाल हो रहा होगा? फिर भी अगर तुम नहीं चाहते कि मैं ना जाऊं तो नहीं जाऊंगी.
मैं – नही..नही..! भाभी प्लीज़ आप मेरी वजह से अपनी खुशी कुर्बान मत करिए, दो महीने की ही तो बात है.
भाभी चली गयी और मैं अपना जी कड़ा करके उन्हें बस स्टॉप तक विदा करके आया. मन्झ्ले भैया का ये फाइनल ईयर था, उन्होंने डिसाइड किया था कि वो इस साल के पीसीएस के एग्जाम में बैठेंगे. बड़े भैया की भी यही सलाह थी जिस पर पिताजी को भी कोई आपत्ति नहीं थी.
हम बहन भाई की रास्ते की मस्तियाँ बंद हो गयी थी, लेकिन घर में हम एक दूसरे को छेड़ने का मौका निकाल लेते थे, अब इसमें रेखा दीदी भी शामिल हो गयी थी. एक दिन दीदी मुझे गुदगुदाके भाग गयी, और दूर खड़ी अपनी जीभ निकाल कर चिढ़ा ने लगी तो मैं भी उनकी तरफ भागा… लेकिन वो मेरे हाथ नहीं आ रही थी.
फुर्रर इधर- तो फुर्रर उधर, किसी तितली की तरफ निकल जाती, एक दो बार हाथ आई भी तो झुक कर अपने को छुड़ा लेती और फिर दूर भाग जाती. यहाँ तक कि हम दोनों की साँसें उखाड़ने लगी.
अब ये मेरे लिए प्रेस्टीज इशू बनता जा रहा था, मैं उनको ज़्यादा खुलेतौर पर टीज़ नहीं करना चाहता था, लेकिन उनके मन में पता नहीं क्या चल रहा था, मैं जैसे ही जाने दो सोच के खड़ा होता तो वो थोड़ा दूर से मुझे अंगूठा दिखा के जीभ निकाल कर चिढ़ाने लगती. मैंने ठान लिया कि अब इनको सबक सीखा के ही रहूँगा. इस समय हम अपने लंबे-चौड़े आँगन में ही थे.