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Incest Mera Pyara Devar - Ankush

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Premkumar65

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UPDATE 4

हम दोनों तैयार होकर स्कूल के लिए निकल लिए. दोनों एक ही साइकल से स्कूल जाते थे, मैं साइकल लेकर घर से बाहर निकला तो देखा दीदी अपना बैग लिए मेरे इंतजार में ही खड़ी थी. मैं भी अपने पिताजी और भाइयों की तरह काफ़ी तंदुरुस्त शरीर का था, इस उमर में भी मेरी हाइट भाभी के बराबर थी (5’5”) दीदी से लंबा था. अच्छा खाना पीना दूध, घी का, उपर से भाभी का एक्सट्रा लाड प्यार, तो थोड़ा भारी भी होता जा रहा था मेरा शरीर. वैसे तो माँ का दर्जा तो कोई और नहीं ले सकता, पर सच कहूँ तो भाभी के लाड प्यार ने मुझे अपनी माँ की ममता को भी भूलने पर विवश कर दिया था.

मैंने दीदी को अनदेखा करके साइकल लेकर चल दिया, तो दीदी ने आवाज़ देकर रुकने को कहा और बोली – अरे! मुझे कौन ले जाएगा? तू तो अकेला ही भगा जा रहा है.

मैंने साइकल तो रोक ली लेकिन कोई जवाब नहीं दिया और उल्टे अपने गाल फूला लिए, जैसे मैं उनसे बहुत ज़्यादा नाराज़ हूँ. दीदी मेरे पास आई और अपने दोनों कानों को पकड़ कर सॉरी बोला – छोटू! भैया अपनी दीदी को माफ़ करदे.

मैंने कहा ठीक है, माफ़ किया. लेकिन मेरे हाथ में अभी भी दर्द है तो मुझसे डबल बिठा कर साइकल नहीं चलेगी, आप चलो.

मजबूरी में दीदी ने साइकल ले ली, और मैं पीछे कॅरियर पर बैठ गया. गांव से निकल कर हम सड़क पर आ गये, लेकिन दीदी की साँस फूलने लगी, और वो साइकल खड़ी करके हाँफने लगी आ..स्सा..आ..सससा.. उफ़फ्फ़…छोटू.. तू बहुत भारी है रे… मेरे से नहीं चलेगी.. तू जा अकेला.. मैं पैदल ही आ जाती हूँ… ज्यदा दूर भी नहीं है… थोड़ा लेट ही होंगी और क्या..?

मैं – हूंम्म… फिर शाम को बाबूजी से जूते पड़वाना हैं. अगर उन्हें पता चला कि आप अकेली पैदल स्कूल गयी हो तो जानती हो ना क्या करेंगे वो?

दीदी – तो फिर क्या करें? तेरे हाथ में तो दर्द है, डबल सवारी हैंडल कैसे करेगा तू?

मैं – एक काम हो सकता है, आप हैंडल पकडो, मैं कॅरियर पर दोनों ओर पैर करके पेडल मारता हूँ.

दीदी – चला पाएगा तू ऐसे?

मैं – हां आप शुरू करो.

फिर हम ने ऐसे ही साइकल चलाना शुरू कर दिया, मैं पीछे से पेडल मारने लगा, लेकिन बिना कुछ पकड़े ताक़त लग ही नहीं पा रही थी.

जिन लोगों ने इस तरह से साइकल चलाई हो वो इस सिचुयेशन को भली भाँति समझ सकते हैं.

मैं – दीदी! बिना कुछ पकड़े मेरी ताक़त पेडल के उपर नहीं लग पा रही, क्या करूँ?

दीदी- तो सीट को आगे से पकड़ ले.

मैंने दोनों हाथों को सीट के आगे ले गया लेकिन उनकी दोनों जांघे बीच में आ रही थी, मैंने कहा दीदी अपने पैर तो उपर करो, तो उन्होंने अपने दोनों पैर उठा कर आगे सामने वाले फ्रेम के डंडे पर रख लिए. मैंने सीट के दोनों साइड से हाथ आगे ले जाकर अपने हाथों की उंगलियों को एक-दूसरे में फँसा लिया और साइकल पर पेडल मारने लगा, अब मुझे ताक़त लगाने में आसानी हो रही थी. लेकिन दीदी अपने पैर ज़्यादा देर तक डंडे से टिका नहीं पाई और उनके पैर नीचे की ओर सरकने लगे जिससे उनकी मोटी मुलायम जांघे मेरी कलाईयों पर टिक गयी. जोरे लगाने में मेरा सर भी आगे पीछे को होता तो मेरी नाक और सर उनकी पीठ से टच होने लगते. रमा दीदी को आज दूसरी बार अपने भाई के शरीर के टच का अनुभव हो रहा था, जो शुरू तो मजबूरी से हुआ लेकिन अब उसके कोमल मन की भावनाएँ कुछ और ही तरह से उठने लगी. जांघों पर हाथों का स्पर्श, पीठ पर नाक और सर के बार टच होने से उसको सुबह अपने स्तनों पर हुए अपने भाई के हाथों का मसलना याद आने लगा, उसके कोमल अंगों में सुरसूराहट होने लगी. ना चाहते हुए भी वो थोड़ा सा और आगे को खिसक गयी और आगे-पीछे हिला-हिलाकर अपनी चूत को अपने भाई की उंगलियों से टच करने लगी. उसकी पैंटी में गीला पन का एहसास उसे साफ महसूस हुआ और वो मन ही मन गुड-गुडाने लगी. वो अपने आप को कोस रही थी कि क्यों उसने सुबह अपने भाई को नाराज़ किया, थोड़ी देर और अपने स्तनों को मसलवा लेती तो कितना मज़ा आता. यही सब सोचती हुई वो मन ही मन खुश हो रही थी, और अब उसने अपने भाई को और अपने पास आने का मंसूबा बना लिया. दोनों स्कूल पहुँचे और अपनी-अपनी क्लास में जा कर पढ़ाई में लग गये. उमर कोई भी हो, साथ के यार दोस्त सब तरह की बातें तो करते ही हैं, आप चाहो या ना चाहो, वो सब बातें आपको भी असर तो डालती ही हैं. रमा की भी क्लास में कुछ ऐसी लड़कियाँ थी, जो इस उमर में भी लंड का स्वाद ले चुकी थी, और आपस में वो एक दूसरे से इस तरह की बातें भी करती थी. तो ऐसा तो बिल्कुल भी नहीं था कि रमा को इन सब बातों की कोई समझ ही ना हो, लेकिन वो उन दूसरी लड़कियों जैसी नहीं थी की कहीं भी किसी के भी साथ मज़े ले सके. उसके अपने घर के संस्कार इसके लिए कतई उसको इस तरह की इजाजत नहीं दे सकते थे. सारे दिन रमा का पढ़ाई में मन नहीं लगा, रह-रह कर आज उसको दिन की घटनाएं याद आ रही थी, और उनसे पैदा हुई अनुभूतियों को सोच-सोच कर रोमांचित होती रही. टॉयलेट करते समय आज पहली बार उसका मन किया कि अपनी चूत को सहलाया जाए, और ये ख्याल आते ही उसका हाथ स्वतः ही अपनी प्यारी कमसिन चूत पर चला गया, और वो उसे सहलाने लगी. थोड़ा अच्छा भी लगा उसे, पर अब वो अपनी बंद आँखों से इस आभास को अपने भाई की उंगलियों के टच से हुई अनुभूति से तुलना करने लगी.

स्कूल 9 बजे सुबह शुरू होता था और 3 बजे ऑफ हो जाता था, छुट्टी के बाद दोनों भाई बहन घर लौट लिए. रमा ने लौटते वक़्त का कुछ और ही प्लान सोच लिया था. छुट्टी होते ही वो छोटू के पास आई जो स्टैंड से अपनी साइकल निकाल कर पैदल ही गेट की तरफ आ रहा था. रमा पहले से ही गेट पर जाकर खड़ी हो गयी थी. अपना स्कूल बैग भी हैंडल पर लटकाते हुए बोली – भाई तेरे हाथ का दर्द अब कैसा है, कुछ कम हुआ या वैसा ही है?

मैं – वैसे फील नहीं होता है, लेकिन कुछ करने पर थोड़ा दुखता है.

रमा – मैंने सोचा तुझे कॅरियर से पेडल मारने में थोड़ा ज़्यादा ताक़त लगानी पड़ रही थी ना सुबह, तो इधर से हम दोनों साथ में पेडल चलाएँगे.

मैं – अरे! लेकिन पेडल तो इतना छोटा है, उसपर दोनों के पैर कैसे आ पाएँगे?

रमा– अरे! तू देख तो सही, आ जाएँगे, मैं अपनी एड़ी से ज़ोर लगाऊंगी, तू बाहर से पंजों से लगाना. हो जाएगा देखना.

तो वो सीट पर बैठ गयी और मैं कॅरियर पर दोनों ओर पैर करके बैठ गया.

मैं – लेकिन दीदी! अब मैं पाकडूँगा कैसे?

रमा – तू मेरी जांघों के उपर से सीट को पकड़ ले… और उसने अपनी एड़ीयों से साइकल आगे बढ़ाई, मैंने भी उसकी एड़ीयों की बगल से बाहर की तरफ अपने पंजे जमा लिए और हम दोनों मिलकर पेडलों पर ज़ोर लगाने लगे. जैसे ही स्कूल की भीड़ से बाहर निकले, रमाने सीट पकड़ने के लिए कहा. मैंने अपने दोनों हाथ उसकी कमर की साइड से ले जा कर सीट की आगे की नोक पर जमा लिए. सुबह के मुकाबले अब मुझे ताक़त भी कम लगानी पड़ रही थी, रमा दीदी बोली- क्यों भाई अब तो ज़्यादा ज़ोर नहीं लगाना पड़ रहा तुझे?

मैं – हां दीदी! अब सही है, और साइकल भी तेज चल रही है.

हम दोनों मिलकर साइकल चलने लगे, दीदी के शरीर से उठने वाले पसीने की गंध मेरी नाक से अंदर जा रही थी और धीरे-धीरे मैंने अपना गाल उसकी पीठ पर टिका दिया. उधर अपने भाई की बाजुओं का दबाव अपनी जांघों पर बिल्कुल उसकी चूत के बगल से पाकर रमा की चूत में सुर-सुराहट होने लगी और वो उसे आगे-पीछे हिल-हिल कर उसके हाथों से रगड़ने लगी. मज़े से उसकी आँखें बंद होने लगी, जिसकी वजह से साइकल लहराने लगी, छोटू को लगा कि साइकल गिरने वाली है, तो वो चिल्लाया – दीदी क्या कर रही हो? साइकल गिर जाएगी. अपने भाई की आवाज़ सुनकर रमा को होश आया और वो ठीक से बैठ कर हैंडल पर फोकस करने लगी.

रमा – भाई तू मेरी पीठ से क्यों चिपका है?

मैं – अरे दीदी! सीट पकड़ने के लिए हाथ आगे करूँगा तो मुझे भी आगे खिसक कर बैठना पड़ेगा ना!

रमा– तो तू एक काम कर! सीट की जगह मुझे पकड़ ले और अपने एक हाथ से मेरा उधर का हाथ पकड़ कर अपनी जाँघ के जोड़ पर अंदर की तरफ रख दिया और बोली- दूसरा हाथ भी ऐसे ही रख ले. ठीक है?

मैंने हां बोलकर दूसरा हाथ भी ऐसे ही रख लिया, अब मेरे दोनों हाथों की उंगलियाँ एकदम उसकी चूत के उपर थी, मेरे मन में ऐसी कोई भावना नहीं थी कि अपनी बहन को टीज़ करूँ लेकिन वो आगे-पीछे होकर अब मेरे हाथों से अपनी चूत की फुल मसाज करा रही थी. घर पहुँचते पहुँचते रमा इतनी एक्ससिटेड हो गयी, की उसका फेस लाल हो गया, कान गरम हो गये, और उसकी पैंटी पूरी तरह गीली हो गयी, जो मुझे लगा शायद पसीने की वजह से हो. घर पहुँचते ही वो जल्दी से साइकल मुझे पकड़ा कर बाथरूम को भागी, और करीब 10 मिनिट बाद उसमें से निकली, तब तक मैंने साइकल आँगन में खड़ी की, दोनों बाग उतारे, और अपने कपड़े निकाल कर फ्रेश होने बाथरूम की तरफ गया, वो उसमें से निकल रही थी.

मैंने पूछा - दीदी इतनी तेज़ी से बाथरूम में क्यों भागी?

तो वो बोली- अरे यार बहुत तेज़ बाथरूम लगी थी. मैंने सोचा शायद ठीक ही कह रही होगी. मैं फ्रेश होकर भाभी के रूम में चला गया, वो बेसुध होकर सो रही थी, अब मुझे तो पता नहीं था कि बेचारी, रात भर भैया के साथ पलंग तोड़ कुश्ती खेलती रही हैं. सोते हुए वो इतनी प्यारी लग रही थी मानो कोई देवी की मूरत हो, साँसों के साथ उनका वक्ष उपर नीचे हो रहा था, जो आज कुछ ज़्यादा ही उठा हुआ लगा मुझे. मैं उनके पास बैठ गया और उनका एक हाथ अपने हाथों मैं लेकर अपने गाल पर रख कर सहलाया और धीरे से आवाज़ लगाई, लेकिन वो गहरी नींद में थी सो कोई असर नहीं पड़ा.

तो मैंने उनका हाथ हिलाकर थोड़ा ऊँची आवाज़ में पुकारा – भाभी! भाभी! .. उठिए ना… भूख लगी है.. खाना दो.

वो थोड़ा सा कुनमुनाई और मेरी ओर करवट लेकर फिर सो गयी, करवट लेते समय उनका दूसरा हाथ मेरी जाँघ पर आ गया. उनका साड़ी का पल्लू सीने से अलग हो गया और ब्लाउज में कसे उनके तने बूब्स का उपरी हिस्सा लगभग 1/3 दिखाई पड़ने लगा. दोनों बूब्स एक-दूसरे से सट गये थे, अब उन दोनों के बीच एक पतली सी दरार जैसी बनी हुई थी. मेरा मन किया कि इस दरार में उंगली डाल कर देखूं, लेकिन एक ममतामयी भाभी की छवि ने मुझे रोक दिया, और मैं उनके पास से चला आया. बाहर आकर देखा तो दीदी खाना लेकर खा रही थी.

मैंने कहा – मुझे नहीं बुला सकती थी खाने के लिए.

दीदी – मुझे लगा तू बिना भाभी के दिए नहीं खाएगा.. सो इसलिए नहीं पूछा, चल आजा मेरे साथ ही खा ले. दोनों मिलकर खाते हैं.

मैं भी दीदी के साथ ही बैठ गया खाने और फिर हम दोनों बहन भाई ने एक ही थाली में बैठ कर खाना खाया, जो मुझे कुछ ज़्यादा अच्छा लगा एक साथ खाने में. आप भी कभी अपने परिवार के साथ एक थाली में ख़ाके देखना ज़्यादा टेस्टी लगेगा, ये मेरा अपना अनुभव है. शाम को भाभी टीवी के सामने बैठ कर सब्जी काट रही थी, दीदी बड़ी चाची के यहाँ गयी थी, नीलू भैया से नोट्स लेने.

यहाँ थोड़ा अपने परिवार के दूसरे सदस्यों के बारे में बताना ज़रूरी है.

मेरे 3 चाचा: बड़े चाचा राम किशन पिताजी से दो साल छोटे खेती करते हैं, उमर 44, बड़ी चाची जानकी उमर 42 इनके 3 बच्चे हैं दो बड़ी बेटियाँ रेखा और आशा, उमर 22 और 19, बड़ी बेटी की शादी मेरे भैया से एक साल बाद ही हुई थी, तीसरा बेटा नीलू जो रमा दीदी के बराबर का उन्हीं की क्लास में पढ़ता है.

दूसरे (मंझले) चाचा : रमेश उमर 41, ये भी खेती ही करते है, चाची निर्मला 38 की होंगी, इनके दो बच्चे हैं, दोनों ही लड़के हैं सोनू और मोनू. सोनू मेरे से दो साल बड़ा है, और मोनू मेरी उमर का है लेकिन मेरे से एक क्लास पीछे है.

दो बुआ – मीरा और शांति 36 और 33 की उमर दोनों की शादी अच्छे घरों में हुई है ज़्यादा डीटेल समय आने पर.

तीसरे चाचा जो सब बहन भाइयों में छोटे हैं नाम है राकेश 12 क्लास तक पढ़े हैं, इसलिए पिताजी ने इन्हें स्कूल में ही नौकरी दिलवा दी और खेती तो है ही साथ में तो अच्छी कट रही है इनकी इस समय 30 के हो चुके हैं. छोटी चाची रश्मि उमर 26 साल, सच पुछो तो चाचा के भाग ही खुल गये, चाची एकदम हेमा मालिनी जैसी लगती हैं. शादी के 6 साल बाद भी अभी तक कोई बच्चा पैदा नहीं कर पाए हैं. भाभी सोफे पर बैठी सब्जी काट रही थी शाम के खाने के लिए, मैं बाहर आँगन में चारपाई पर बैठा अपना आज का होमवर्क कर रहा था. थोड़ी देर बाद भाभी मेरे पास आकर सिरहाने की तरफ बैठ गयी और पीछे से मेरे सर पर हाथ फेरकर बोली – अंकुश! होमवर्क कर रहे हो?

मैं – हां भाभी आज टीचर ने ढेर सारा होमवर्क दे दिया है, उसी को निपटा रहा हूँ. वैसे हो ही गया है बस थोड़ा सा ही और है.

भाभी – दूध ले आऊं, पीओगे?

मैं – नहीं अभी नहीं रात को खाने के बाद पी लूँगा. अरे हां भाभी! याद आया, आपकी तबीयत कैसी है अब?

भाभी – हां? मुझे क्या हुआ है? भली चंगी तो हूँ!

मैं – नहीं ! वो दो दिन से आप कुछ लंगड़ा कर चल रही थी, और जब मैंने स्कूल से आ के आपको बहुत जगाया, लेकिन आप उठी ही नहीं, सोचा शायद आपको कोई प्राब्लम हुई हो? भाभी थोड़ा शरमा गयी, फिर शायद थोड़ी देर पिछली दो रातें याद आई होगी तो उनके चेहरे पर एक शर्मीली मुस्कान तैर गयी और उनके दोनों गालों में गड्ढे बन गये. मैंने जैसे ही उनके डिंपल देखे, मेरा जी ललचाने लगा तो मैंने अपनी उंगली को उनके डिंपल में घुसा दिया और उंगली को गोल-गोल सहला कर बोला- भाभी मैं आपसे कुछ मांगूँ तो आप नाराज़ तो नहीं होगी ना?

उन्होंने हँसते हुए ही मेरे बालों में उंगलियाँ डाली और बोली – ये क्या बात हुई.. भला..? तुम्हें आज तक मैंने किसी चीज़ के लिए मना किया है जो ऐसे माँग रहे हो..? सब कुछ तो तुम्हारा ही है इस घर में. बताओ मुझे क्या चाहिए मेरे प्यारे देवर को और ये कह कर मेरे गाल को प्यार से अपने एक अंगूठे और उंगली के बीच दबा कर हल्का सा दबा दिया.

मैं – मेरा जी करता है, एक बार आपके डिंपल को चूमने का… बोलो चूम लूँ..?

भाभी कुछ देर तक मेरे चेहरे की तरफ देखती रही, फिर एक मुस्कान उनके चेहरे पर तैर गयी और बोली – एक शर्त पर.

मैं – क्या..? इसके लिए आप जो कहोगी मैं करूँगा.

भाभी – मुझे भी अपने गाल चूमने दोगे तो ही मैं अपने चूमने दूँगी. बोलो मंजूर है..?

मैं – हे हे हे… इसमें क्या है ? आप तो कभी भी मेरा चुम्मा ले ही लेती हो ना.

भाभी – नहीं ये कुछ स्पेशल वाला होगा.. मैंने कहा जैसे आप चाहो वैसे ले लेना.. तो वो हँसते हुए बोली ठीक हैं तो फिर तुम ले लो, पहले.

मैंने उनके हँसते ही उसके गाल को चूम लिया और उनके डिंपल में अपनी जीभ की नोक डाल दी. वो खिल खिलाकर हँसते हुए बोली- हटो चीटिंग करते हो, जीभ लगाने की कब बात हुई थी?

फिर मैंने बिना कहे दूसरे गाल पर भी ऐसा ही किया.

भाभी ने कहा – बस हो गया. अब मेरी बारी है.

फिर उन्होंने मेरा सर अपने सीने से सटा लिया और मेरे गाल पर अपने दाँत गड़ा दिए. मेरे मुँह से चीख निकल गयी लेकिन उन्होंने मेरा गाल नहीं छोड़ा और उसे अपने दांतों में दबा कर काट लिया, और कुछ देर तक काटने वाली जगह पर अपने होंठों से ही सहलाने लगी. मेरा दर्द पता नहीं कहाँ छूमंतर हो गया और मुझे मज़ा आने लगा, मेरी आँखें बंद हो गयी, फिर उन्होंने ऐसा ही दूसरे गाल पर भी किया, इस बार दर्द हुआ पर मैं चीखा नहीं और उनके होंठों के सहलाने का मज़ा लेता रहा. “क्यों कैसा लगा मेरा चुम्मा???” जब भाभी ने पूछा तो मैंने कहा – आआहहहह.. भाभी मज़ा आ गया, ऐसा चुम्मा तो आप रोज़ लिया करो, और ये बोलकर मैं उनकी जाँघ पर अपना सर रख कर लेट गया और उनकी पतली कमर में अपनी बाहें लपेट कर उनके ठंडे-ठंडे पेट पर अपना मुंह रख कर बोला- भाभी आप कोई जादू तो नहीं जानती?

भाभी – क्यों मैंने क्या जादू कर दिया तुम पर?

मैं – कुछ देर पहले मेरा दिमाग़ थका-थका सा लग रहा था, लेकिन आपने सारी थकान खतम कर दी मेरी, ये बोलकर मैंने उनके ठंडे पेट को चूम लिया.

भाभी मेरा सर चारपाई पर टिका कर हँसती हुई खाना बनाने चली गयी और मैं फिर अपने होमेवर्क में लग गया. दूसरी सुबह हम फिर स्कूल के लिए रेडी होकर ले साइकल निकाल लिए. आज मेरा हाथ एकदम फिट था, सो मैंने साइकल बढ़ा दी और दीदी को बैठने के लिए बोला. दीदी ने जैसे ही बैठने के लिए कॅरियर पकड़ा, वो सीट के नीचे वाले जॉइंट से अलग होकर पीछे को लटक गया.

दीदी चिल्लाई – छोटू रुक, ये कॅरियर तो निकल गया.

मैं – तो अब क्या करें, चलो पैदल ही चलते हैं वहीं जाकर मेकैनिक से ठीक करा लेंगे, बैग दोनों साइकल पर टाँग उसके हैंडल को पकड़ कर हम दोनों निकल पड़े पैदल स्कूल को. पीछे से नीलू भैया साइकल पर आ रहे थे, उनके पीछे आशा दीदी जो अब क्लास 12 में थी, लेट पढ़ने बैठी थी इसलिए वो अभी क्लास 12 में ही थी. दोनों भाई बहन एक ही क्लास में थे. हमें देख कर उन्होंने भी अपनी साइकल रोकी और पूछा की क्या हुआ, हमने अपनी प्राब्लम बताई तो वो दोनों भी बोले कि ठीक है हम भी तुम दोनों के साथ पैदल ही निकलते हैं.

रमा दीदी ने उनको कहा- अरे नहीं आप लोग निकलो क्यों बिना किसी कारण हमारी वजह से लेट होते हो? तो वो निकल गये. जैसे ही हम सड़क पर पहुँचे तो

दीदी बोली – छोटू ! भाई ऐसे तो हम लोग लेट हो जाएँगे, पहला पीरियड नहीं मिल पाएगा, वो भी मेरा तो फिज़िक्स का है.

मैं – तो क्या करें आप ही बताओ?

दीदी – एक काम करते हैं, में आगे डंडे पर बैठ जाती हूँ. कैसा रहेगा?

मैं – मुझे कोई प्राब्लम नहीं है, आप बैठो.. तो वो आगे डंडे पर बैठ गयी और मैं फिर से साइकल चलाने लगा. स्कूल के लिए थोड़ा लेट हो रहा था तो मैंने साइकल को तेज चलाने के लिए ज़्यादा ताक़त लगाई जिससे मेरे दोनों घुटने अंदर की तरफ हो जाते और सीना आगे करना पड़ता पेडल पर ज़्यादा दबाव डालने के लिए. मेरे लेफ्ट पैर का घुटना दीदी के घुटनो में अड़ने लगा तो वो और थोड़ा पीछे को हो गयी, जिससे उनके कूल्हे राइट साइड को ज़यादा निकल आए और उनकी पीठ मेरे पेट से सटने लगी. मेरी राइट साइड की जाँघ उनके कूल्हे को रब करने लगी और लेफ्ट पैर उनकी टाँगों को. उनके कूल्हे से मेरी जाँघ के बार-बार टच होने से मेरे शरीर में कुछ तनाव सा बढ़ने लगा, और मेरे पैंट में क़ैद लंड, जो अब धीरे-धीरे आकर लेता जा रहा था अकड़ने लगा. दीदी भी अब जान बूझकर अपनी पीठ को मेरे पेट और कमर से रगड़ने लगी, अपना सर उन्होंने और थोड़ा पीछे कर लिया और अपना एक गाल मेरे चेहरे से टच करने लगी ज़ोर लगाने के लिए मैं जब आगे को झुकता तो हम दोनों के गाल एक दूसरे से रगड़ जाते और पूरे शरीर में एक सनसनी सी फैलने लगती. आधे रास्ते पहुँच,

दीदी बोली- छोटू थोड़ा और तेज कर ना लेट हो रहे हैं. तो मैंने अपने दोनों हाथ हैंडल के बीच की ओर लाया जिससे और अच्छे से दम लगा सकूँ. लेकिन सही से पकड़ नहीं पा रहा था. हैंडल…! क्योंकि दीदी के दोनों बाजू बीच में आ रहे थे. तो उसने आइडिया निकाला और अपने दोनों बाजू मेरे बाजुओं के उपर से लेजा कर हैंडल के दस्तानों को पकड़ लिया, जहाँ नोर्मली चलाने वाला पकड़ता है. हैंडल को बीच की तरफ पकड़कर अब साइकल चलाने में दम तो लग रहा था और साइकल भी अब बहुत तेज-तेज चल रही थी लेकिन अब मेरे लेफ्ट साइड की बाजू दीदी के बूब्स को रगड़ने लगी. दूसरी ओर मेरी दाई जाँघ दीदी के मुलायम चूतड़ को रगड़ा दे रही थी. मेरे शरीर का करंट बढ़ता ही जा रहा था, उधर दीदी की तो आँखें ही बंद हो गयी, वो और ज़्यादा अपने बूब्स को जानबूझकर कर मेरे बाजू पर दबाते हुए अपनी जांघों को ज़ोर-तेज़ भिंचने लगी. उत्तेजना के मारे हम दोनों के ही शरीर गरम होने लगे थे. स्कूल पहुँच दीदी ने साइकल से उतरते ही मेरे गाल पर एक किस कर दिया और थैंक यू बोलकर भागती हुई अपनी क्लास रूम में चली गयी.

छुट्टी के बाद लौटते वक़्त जब मैंने दीदी को पूछा की आपने थैंक्स क्यों बोला था, तो बोली – अरे यार समय पर स्कूल पहुँचा दिया तूने इसके लिए और क्या. वैसे तू क्या समझा था..?

मैं – कुछ नहीं, मैं क्या समझूंगा? आज पहली बार आपने थैंक्स बोला इसलिए पूछा. दीदी नज़र नीची करके स्माइल करने लगी. घर लौटते वक़्त भी ऐसा ही कुछ हमारे साथ हुआ, बल्कि इससे भी आगे बढ़कर दीदी ने अपनी लेफ्ट बाजू मेरी जाँघ पर ही रखी थी और अपने अल्प-विकसित उभारों को मेरी बाजू से रगड़-रगड़ कर खुद भी उत्तेजित होती रही और मुझे भी बेहाल कर दिया.

अब ये हमारा रोज़ का ही रूटिन सा बन गया था, दिन में एक बार कम से कम मैं भाभी का चुम्मा लेता, बदले में वो भी मेरे गाल काट कर अपने होंठों से सहला देती, कभी-कभी तो मैं अपना सर या गाल या फिर मुँह उनके स्तनों पर रख कर रगड़ देता. दूसरी तरफ दीदी और मैं भी दिनों दिन मस्ती-मज़ाक में बढ़ते ही जा रहे थे, लेकिन सीमा में रह कर. ऐसे ही मस्ती मज़ाक में दिन गुज़रते चले गये, और ये साल बीत गया, मैं अब नयी क्लास में आ गया था, दीदी 12थ में पहुँच गयी, ये साल हम दोनों का ही बोर्ड था, सो शुरू से ही पढ़ाई पर फोकस करना शुरू कर दिया. उधर बड़े भैया का बी.एड कंप्लीट होने को था, घर में खर्चे भी कंट्रोल में होने शुरू हो गये थे क्योंकि बड़े भैया की पढ़ाई का खर्चा तो अब नहीं रहा था, और आने वाले कुछ महीनों में अब वो भी जॉब करने वाले थे. हम दोनों भाई-बहन ने भाभी से जुगाड़ लगा कर एक व्हीकल लेने के लिए पहले भैया के कानों तक बात पहुँचाई और फिर हम सब ने मिलकर बाबूजी को भी कन्विन्स कर लिया, जिसमें छोटे भैया का भी सपोर्ट रहा. अब घर के सभी सदस्यों की बात टालना भी बाबूजी के लिए संभव नहीं था, ऐसा नहीं था कि उनको पैसों का कोई प्राब्लम था, लेकिन एक डर था कि मैं व्हीकल मैनेज कर पाऊंगा या नहीं? सबके रिक्वेस्ट करने पर वो मान गये और उन्होंने एक बिना गियर की टू वीलर दिलवा दी, अब हम दोनों भाई-बहन टाइम से स्कूल पहुँच जाते थे.

दीदी ने भी चलाना सीख लिया तो कभी मैं ले जाता और कभी वो, जब मैं चलाता तो वो मेरे से चिपक कर बैठती और अपने विकसित हो रहे बूब्स को मेरी पीठ से सहला देती. जब वो चलती तो जानबूझ कर अपने हिप्स मेरे आगे रगड़ देती, जिससे मेरा पप्पू बेचारा पैंट में टाइट हो जाता और कुछ और ना पता देख मन मसोस कर रह जाता, लेकिन दीदी उसे अच्छे से फील करके गरम हो जाती. ऐसे ही कुछ महीने और निकल गये, इतने में बड़े भैया को भी एक इंटर कालेज में लेक्चरर की जॉब मिल गयी, लेकिन शहर में ही जिससे उनके घर आने के रूटिन में कोई तबदीली नहीं हुई. इस बार स्कूल में एनुअल स्पोर्टस डे मानने का आदेश आया था, रूरल एरिया का स्कूल था सो सभी देहाती टाइप के देशी गेम होने थे, जैसे खो-खो, कबड्डी, लोंग जंप, हाइ जंप. लड़कियों के लिए अंताक्षरी, संगीत, डांस. मेरी बॉडी अपने क्लास के हिसाब से बहुत अच्छी थी, सो स्पोर्ट्स टीचर ने मेरे बिना पूछे ही मेरा नाम स्पोर्ट्स के लिए लिख लिया, और सबसे प्रॅक्टीस कराई, जिसमें मेरा कबड्डी और लोंग जंप में अच्छा प्रदर्शन रहा और मैं उन दोनों खेलों के लिए सेलेक्ट कर लिया. सारे दिन खेलते रहने की वजह से शरीर तक के चूर हो रहा था, पहले से कभी कुछ खेलता नहीं था, तो थकान ज़्यादा महसूस हो रही थी. स्कूल से लौटते ही मैंने बैग एक तरफ को पटका और बिना चेंज किए ही आँगन में पड़ी चारपाई पर पसर गया. सारे कपड़े पसीने और मिट्टी से गंदे हो रखे थे. थोड़ी ही देर में मेरी झपकी लग गयी, जब भाभी ने आकर मुझे इस हालत में देखा तो वो मेरे बगल में आकर बैठ गयी, और मेरे बालों में उंगलियाँ फिराते हुए मुझे आवाज़ दी.

मैंने आँखें खोल कर उनकी तरफ देखा तो वो बोली – क्या हुआ, आज ऐसे आते ही पड़ गये, ना कपड़े चेंज किए, और देखो तो क्या हालत बना रखी है कपड़ों की. बैग भी ऐसे ही उल्टा पड़ा है. किसी से कुश्ती करके आए हो?

मैंने कहा नहीं भाभी, असल में आज स्कूल में स्पोर्टस डे के लिए गेम हुए, और मेरा दो खेलों के लिए सेलेक्शन हो गया है. सारे दिन खेलते-खेलते बदन टूट रहा है, कभी खेलता नहीं हूँ ना.. इसलिए.. प्लीज़ थोड़ी देर सोने दो ना भाभी.

अरे! ये तो बहुत अच्छी बात है, लेकिन ऐसे में कैसे नींद आ सकती है, शरीर में कीटाणु लगे हुए हैं, चलो उठो ! पहले नहा के फ्रेश हो जाओ, कुछ खा पी लो, फिर देखना अपनी भाभी के हाथों का चमत्कार, कैसे शरीर की थकान छूमंतर करती हूँ. चलो, अब उठो.

और उन्होंने जबरन हाथ से पकड़ कर मुझे खड़ा कर दिया, और पीठ पर हाथ रख कर पीछे से धकेलते हुए बाथरूम में भेज दिया.
Super sensual story. Bhai behan ki beech ke ye game bahut knell hain teenage me.
 
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बीते एक साल में मोहिनी का बदन पहले से भर गया था, उसके बूब्स भी अब ज़्यादा बड़े-बड़े दिखने लगे थे, कूल्हों का उठान अब साड़ी में साफ-साफ दिखता था. कुल मिलकर अब मोहिनी भाभी एकदम कड़क माल होती जा रही थी. संडे के संडे राम भैया अपनी प्यारी पत्नी यानी मोहिनी भाभी की अच्छे से सर्विस जो कर जाते थे. फ्रेश होकर मुझे भाभी ने बादाम वाला दूध दिया और साथ में कुछ बिस्किट वगैरह दे दिए, मैंने कहा भाभी इनसे क्या होगा, मुझे तो खाना खाना है, तो उन्होंने प्यार से झिड़कते हुए कहा – नहीं आज से इस टाइम तुम खाना नहीं खाओगे, खाना में स्कूल के लिए रख दिया करूँगी, तो रिसेस में खा लिया करना, घर आकर बस हल्का फुल्का और खाना सीधे रात को ही. अब तुम्हें मैं गबरू जवान मर्द बना के छोड़ूँगी. मैं चाहती हूँ मेरा देवर अपने पूरे परिवार में सबसे ज़्यादा ताक़तवर हो. जब सीना तान कर चले तो लगे मानो कोई शेर आ रहा हो.

मैंने हँसते हुए कहा क्यों भाभी बेवजह मुझे चढ़ा रही हो.

तो भाभी बोली – तुम इसे मज़ाक समझ रहे हो. चलो अब छत पर. तुम्हारे बदन की मालिश करनी है फिर देखना कैसा तुम्हारी थकान कोसों दूर खड़ी दिखेगी.

हम दोनों छत पर आ गये, हमारे आधे पोर्षन पर दो-मंज़िला बना हुआ था, वाकई हमारे अलावा आस-पास किसी का इतना उँचा मकान नहीं था. गांव के दूसरे छोर पर सिर्फ़ प्रधान का ही घर हमारे से उँचा था, लेकिन बहुत दूर था वो हमसे. ऊपर दो बड़े कमरे और उनके आगे एक बरामदा, इस सबकी एक कंबाइंड छत काफ़ी लंबी चौड़ी थी, जो चारों तरफ 2.5 फीट उँची बाउंड्री से कवर की हुई थी.

भाभी ने एक बिछावन नीचे डाला और मुझे अपनी बनियान उतारकर उसपर लेटने को कहा, नीचे में बस एक बरमूडा ही पहने हुए था. भाभी ने अपनी साड़ी के पल्लू को दुपट्टा की तरह अपने सीने पर कसकर लपेटा और उसे पीठ पर से लाते हुए अपनी कमर में खोंस लिया, कसे हुए ब्लाउज और साड़ी के बाहर से ही उनके सुडौल बूब्स एकदम उभर कर बाहर को निकल आए. वो मेरे बाजू में उकड़ू बैठ गयी, अपने साथ लाई एक कटोरी जिसमें गुनगुना सरसों का तेल था उसे मेरे सर पास रख दिया, फिर अपने हाथों में ढेर सारा तेल ले कर मेरे सीने और कंधों की मालिश करने लगी. भाभी के गोरे मुलायम हाथ मेरे शरीर पर उपर-नीचे हो रहे थे, उनकी एक साइड की मांसल जाँघ मेरी कमर से रगड़ रही थी, जब वो ऊपर को आती तो जाँघ के साथ-साथ उनके पेट का हिस्सा भी मेरे शरीर से रगड़ जाता.


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मैं अपनी आँखें बंद किए हुए ये सब फील कर रहा था, और धीरे-धीरे एक अजीब सी उत्तेजना मेरे शरीर में भरती जा रही थी. सीने और कंधों की मालिश के बाद भाभी थोड़ा नीचे की तरफ हुई और अब उनकी जांघों का एहसास मुझे अपनी जाँघ के निचले भाग पर हुआ, अब भाभी मेरे पेट और उसके साइड की मालिश करने लगी. जब उनके हाथ मेरे दूसरी साइड की मालिश करते तो उन्हें ज़्यादा झुकना पड़ता जिससे उनका पेट मेरे कमर से टच होता. ना चाहते हुए भी मेरे बरमूडा में उभार सा बनाने लगा. फिर उन्होंने मेरे पैरों की तरफ रुख़ किया और पैर के पंजों से शुरू करते हुए भाभी ऊपर की तरफ आने लगी, घुटनो के ऊपर उनके हाथों को फील करते ही मेरी उत्तेजना और बढ़ने लगी और मेरी लंड कड़क हो गया.

भाभी के हाथ जांघों की मालिश करते हुए ऊपर और ऊपर की तरफ आते जा रहे मैंने हल्के से अपनी आँखें खोलकर देखा तो मालिश करते हुए उनकी नज़र मेरे उभार पर ही टिकी हुई थी और मंद-मंद मुस्करा रही थी. अब भाभी ने मुझे पलटने के लिए कहा- तो में अपने पेट के बल लेट गया. उन्होंने अपनी साड़ी को घुटनों तक चढ़ाया और मेरे ऊपर दोनों तरफ को पैर करके अपने घुटनो पर बैठ गयी. लाख कोशिशों के बावजूद भी जब वो मालिश करते हुए हाथ अपनी तरफ करती तो उनके गद्दे जैसे मुलायम नितंब मेरी कमर से टच हो जाते, फिर वो जैसे-जैसे नीचे को खिसकती गयी अब उनके मोटे-मोटे चूतड़ मेरी गांड के ऊपर थे. जब वो अपना दबाव मेरे ऊपर डालती तो मेरी नीचे कड़ी हुई लंड जो छाती से दबी हुई थी और ज़्यादा फूलने लगी, मारे उत्तेजना के मेरे मुँह से सिसकी निकलने लगी.


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भाभी मन ही मन हँसते हुए बोली – क्या हुआ अंकुश जी.. कोई प्राब्लम है..?

अब मैं उनको क्या बताऊँ कि मुझे क्या प्राब्लम है? फिर भी मैंने उनको कहा – आह.. भाभी अपना वजन मत रखो, मुझे दुख रहा है.

भाभी – कहाँ दुख रहा है… ?

मैं – अरे समझा करो भाभी, आप भी ना! मेरी कमर में और कहाँ…

भाभी – ओह्ह्ह.. तो मालिश बंद कर दूँ..?

मैं – नहीं ! लेकिन थोड़ा वजन कम रखो ना प्लीज़…

फिर भाभी थोड़ा नीचे को मेरी जांघों के ऊपर बैठ गयी तो मुझे कुछ राहत मिली, लेकिन अब उन्हें मेरे कंधों तक पहुँचने में ज़्यादा झुकना पड़ रहा था तो भाभी की चूत मेरी गांड से रगड़ खाने लगी. उन्हें अब और ज़्यादा मज़ा आने लगा और मालिश के बहाने और तेज-तेज हाथ चलाने लगी, कुछ देर बाद ही भाभी अपनी चूत को मेरी गांड से चिपका कर हाथों को मेरी पीठ पर टिकाए अकड़ कर बैठ गयी और कुछ देर ऐसे ही शांत बैठी रही. मैंने सर घुमाकर पीछे देखने की कोशिश की तो भाभी ने अपने हाथों का दबाव मेरी पीठ पर और बढ़ा दिया जिसके कारण में देख नहीं पाया कि भाभी ऐसे क्यों शांत बैठी हैं?

मालिश करने के बाद जब भाभी मेरे ऊपर से उठ गई, तो मैं कुछ देर यूँ ही उलटा पड़ा रहा, क्योंकि मैं अपने उभार को दिखाना नहीं चाहता था. वाकई में मेरे शरीर की अकड़न एक दम चली गयी थी, भाभी बिना कुछ कहे अपने कपड़े ठीक करके नीचे चली गयी और मैं वहीं पड़े-पड़े नींद में डूबता चला गया.

अब भाभी रोज़ सुबह 5 बजे मुझे जगा देती, और फ्रेश होकर कसरत करवाती, वही देसी दंड बैठक और कुछ देसी एक्सरसाइज. उसके बाद नहाना-धोना, स्कूल के लिए रेडी होने के बाद एक लीटर बादाम का दूध पिलाती. स्कूल में भी रोज़ गेम्स की प्रैक्टिस होती, फिर शाम को मालिश, भाभी की मस्तियाँ बढ़ती जा रही थी, लेकिन एक अनदेखी दीवार थी जो हम दोनों को रोके हुए थी अपनी हदें पार करने से. दूसरी ओर रमा दीदी भी मौका निकाल ही लेती मौज मस्ती का. अब उन दोनों के साथ क्या होता था, मुझे नहीं पता, लेकिन ऐसे मौकों पर मेरा हाल बेहाल हो जाता था, और कुछ कर भी नहीं सकता था, क्योंकि यही पता नहीं था कि करूँ तो क्या?

स्पोर्टस डे तक मेरा शरीर भाभी की मालिश, खेलों की प्रैक्टिस और कसरतों की वजह से एक दम पत्थर जैसा हो चुका था. लॉन्ग जम्प में, मैं अपने स्कूल में सबसे आगे था, और कबड्डी में भी मेरी वजह से हमारी क्लास के आगे 12 क्लास की भी टीम हार जाती थी. फाइनल डे को जो होना था वही हुआ, लास्ट में कुश्ती की प्रतियोगिता भी हुई, जिसमें मैंने हिस्सा तो नहीं लिया था, लेकिन 11 क्लास का एक लड़का जो चैंपियन हो गया था पास के ही गांव का, वो घमंड में आ गया और उसने पूरे स्कूल के बच्चों में ओपन चैलैंज कर दिया.

टीचर्स को उसकी ये बात बुरी लगी, तो प्रिन्सिपल ने अपनी तरफ से बड़ा सा इनाम घोषित करके बोले- सभी बच्चों सुनो, तुम लोगों में से जो भी बच्चा इस लड़के को हरा देगा उसे में अपनी तरफ से पचास हज़ार इनाम दूँगा.

जब कोई आगे नहीं आया तो मेरे क्लास टीचर बोले – क्यों अंकुश तुम भी नहीं लड़ सकते इससे?

मैं – नहीं सर ! मुझे कुश्ती लड़ने का कोई आईडिया नहीं है, और ना ही मैं लड़ना चाहता हूँ.

क्लास टीचर मेरे पास आए और धीमी आवाज़ में बोले- मैं जानता हूँ तुम्हारे अंदर इससे बहुत ज़्यादा ताक़त है, बस इसके पैरों पर नज़र रखना और अपना बचाव करते रहना. जब ये थकने लगे तभी उठाकर पटक देना. देखो ये अपने स्कूल की इज़्ज़त का सवाल है, ये लड़का इतनी बदतमीजी से सब को चैलैंज कर रहा है, और अब तो अपने प्रिन्सिपल साहब की भी इज़्ज़त दाँव पर लग गयी है.

मैंने कहा ठीक है सर अगर आप चाहते हैं तो मैं कोशिश ज़रूर करूँगा. उन्होंने फिर अपनी तरफ से ही अनाउन्स कर दिया कि इससे अंकुश लड़ेगा. फिर हम दोनों में कुश्ती हुई, वो दाँव पेच में माहिर था, लेकिन ताक़त में मेरे मुकाबले बहुत कम, तो जैसे मेरे टीचर ने बोला था में कुछ देर उसके दाव बचाता रहा, फिर एक बार फुर्ती से में उसके पीछे आया और उसकी कमर में लपेटा मारकर दे मारा ज़मीन पर. लेकिन साला हवा में ही पलटी खा गया और चित्त नहीं हुआ, अब में उसके ऊपर सवार था और उसको चित्त करने की कोशिश करने लगा. जब उसे लगा कि अब वो ज़्यादा देर तक मेरे सामने नहीं टिक पाएगा, तो उसने अपनी मुट्ठी में रेत भरकर मेरी आँखों में मार दी. मैं बिल-बिलाकर उसे छोड़ कर अपनी आँखों पर हाथ रख कर चीखने लगा, मौका देख कर वो मेरे पीछे आया और मेरी कमर में लपेटा लगा कर मुझे उठाना चाह रहा था. मैच रेफरी फ़ाउल प्ले का विस्सल बजा रहा था लेकिन उसने उसकी नहीं सुनी. जैसे ही उसने मुझे उठाने की कोशिश की मैंने अपनी एक टाँग उसकी टाँग में अड़ा दी और ताक़त लगा कर मैंने उसके हाथों से अपने को आज़ाद किया, और पलट कर एक हाथ उसकी गर्दन में लपेटा. मैंने बंद आँखों से ही उसकी गर्दन को कस दिया. उसने अपनी गर्दन छुड़ाने की लाख कोशिश की लेकिन टस से मस नहीं हुई, आखिरकार उसकी साँसें फूलने लगी और रेफ़री ने आकर उसे मेरी गिरफ़्त से छुड़ा लिया. कोई मेरे लिए पानी ले आया था तो मैंने मिट्टी को धोने के बाद अपनी आँखों में पानी मारा, आँखें खुलने तो लगी लेकिन सुर्ख लाल हो चुकी थी. जब मेरी नज़र उसपर पड़ी तो अभी भी वो ज़ोर-ज़ोर से साँसें ले रहा था और मुझे खा जाने वाली नज़रों से घूर रहा था.

प्रिन्सिपल ने मुझे जीत का इनाम दे दिया. मुझे तुरंत डॉक्टर को दिखाया और दवा डलवाकर और अपना इनाम लेकर हम घर लौट आए. बाहर चौपाल पर ही बाबूजी बैठे थे, उन्होंने मेरी आँखें देखकर पुछ लिया तो दीदी ने उन्हें सारी बात बता दी. उन्होंने मुझे शाबासी दी और अपने गले से लगा लिया. मेरे हाथों में ट्रॉफी देखकर भाभी फूली नहीं समाई, और उन्होंने मुझे अपने सीने से कस लिया, उनकी आँखें डब-डबा गयी. मैंने कारण पूछा तो भाभी बोली – आज मैं अपनी ज़िम्मेदारियों में पास हो गयी, इससे ज़्यादा मेरे लिए और क्या खुशी की बात हो सकती है, माँ जी ने जिस विश्वास से तुम्हारा हाथ मेरे हाथों में सौंपा था उसमें मैं कितना सफल हुई हूँ ये मुझे इस ट्रॉफी के रूप में दिख रहा है.

बाबूजी दरवाजे के पीछे से ये सारी बातें सुन रहे थे, उनसे भी रहा नहीं गया और अंदर आते हुए बोले- सच कहा बहू तुमने, आज तुम्हारे कारण मेरा बेटा ये सब कर पाया है. शायद विमला भी इतना नहीं कर पाती जितना तुमने इन बच्चों के लिए किया है. पिताजी की आवाज़ सुन कर भाभी ने झट से अपने सर पर पल्लू डाला और उनके पैर पड़ गयी.

जुग-जुग जियो मेरी बच्ची, तुमने साबित कर दिया कि तुम्हारे संस्कार कितने महान हैं, इतने कम उमर में तुमने इस घर को इतने अच्छे से संभाला है. मैं हर रोज़ भगवान का कोटि-कोटि धन्यवाद करता हूँ, कि उन्होंने हमें एक दुख के बदले तुम्हारे रूप में इतनी बड़ी सौगात दी है.

जीती रहो बेटा, और अपने घर को इसी तरह सजाती संवारती रहो. इतना बोल अपनी भीगी आँखें पोंछते हुए बाबूजी बाहर चले गये.

ऐसी ही कुछ खट्टी मीठी, यादों के सहारे, आपस में मौज मस्ती करते हुए समय अपनी गति से बढ़ता रहा, और देखते-देखते हमारे एग्जाम की डेट भी आ गई. हम दोनों बहन भाई पढ़ाई में जुट गये, हम दोनों देर रात तक जाग कर पढ़ते रहते, बीच-बीच में आकर भाभी देखने आ जाती की किसी चीज़ की ज़रूरत तो नहीं है. दोनों बड़े भाई भी बीच-बीच में घर आते और हमें अपने एग्जाम के एक्सपीरियेन्सस शेयर करके एनकरेज करते.

एक दिन पढ़ते-पढ़ते मैं थक गया, तो पलंग पर लंबा होकर पढ़ने लगा, ना जाने कब मेरी आँख लग गयी और अपने सीने पर खुली बुक रखकर गहरी नींद में सो गया.

पढ़ते-पढ़ते रमा दीदी जब बोर होने लगी, रात काफ़ी हो गयी थी, आँखों में नींद की खुमारी आने लगी थी, अपनी किताबें उसने टेबल पर रखी. जब उसकी नज़र अपने छोटे भाई पर पड़ी, तो उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी. कुछ देर वो अपने भाई के मासूम चेहरे को देखती रही, जो सोते हुए किसी मासूम से बच्चे की तरह लग रहा था. उसने धीरे से उसके हाथों के बीच से उसकी बुक निकाली और टेबल पर रख दी. कुछ सोच कर एक शरारत उसके चेहरे पर उभरी और लाइट ऑफ करके वो उसके बगल में लेट गयी. छोटू पीठ के बल सीधा लेटा हुआ था, उसके दोनों हाथ उसके सीने पर थे, रमा कुछ देर दूसरी ओर करवट लिए पड़ी रही फिर उसका मन नहीं माना तो वो अपने भाई की तरफ पलट गयी.

अपने एक बाजू को वी शेप में मोड़ कर अपने गाल के नीचे टिकाया और अपने सर को उँचा करके उसने छोटू के चेहरे को देखा, वो अभी भी बेसुध सोया हुआ था. रमा थोड़ी सी उसकी तरफ खिसकी और हल्के से उसने अपने शरीर को अपने भाई से सटा लिया, और अपनी ऊपर वाली टाँग उठाकर छोटू के ठीक जांघों के जोड़ के ऊपर रख लिया. कुछ देर वो यूं ही पड़ी रही, फिर वो अपनी टाँग को उसके बरमूडा के ऊपर रगड़ने लगी.

उसकी टाँग की रगड़ से छोटू की लंड जो अब एक मस्त लंड होती जा रही थी, धीरे-धीरे अपनी औकात में आने लगा. उसके लौड़े का साइज़ फूलता देख रमा दीदी कुछ सहम सी गयी और उसने अपनी टाँग की घिसाई बंद कर दी. लेकिन कुछ देर तक भी छोटू के शरीर में कोई हलचल नहीं हुई, तो उसकी हिम्मत और बढ़ी और उसने उसके हाथ को अपने सीने पर रख लिया और ऊपर से अपना हाथ रख कर अपने मुलायम कच्चे अमरूदों पर रगड़ने लगी. छोटू के हाथ को अपने अमरूदों पर फील कर के वो अपनी आँखें बंद करके मुँह से हल्की-हल्की सिसकियाँ लेने लगी. जैसे-जैसे उसकी उत्तेजना बढ़ती जा रही थी, उसकी झिझक, उसकी शर्म, भाई-बहन वाला बंधन सब सिसकियों के माध्यम से बाहर होते जा रहे थे.

उसका शरीर अब मनमाने तरीक़े से थिरकने लगा, और अब रमा दीदी उसके हाथ के साथ-साथ अपनी प्यारी दुलारी चूत को अपने भाई की जाँघ से सटा कर उपर नीचे को होने लगी. छोटू को नींद में किसी दूसरे शरीर की गर्मी का एहसास हुआ तो उसकी नींद खुल गयी, एक बार उसने अपनी बहन की तरफ देखा और उसने फिर से अपनी आँखें कस कर बंद कर ली और अंकुश भी मज़ा लेने लगा. रमा दीदी की पजामी अब थोड़ी गीली होने लगी थी, उसके गीले पन का एहसास उसकी नंगी जाँघ पर हो रहा था.

अब रमा दीदी ने उसका हाथ अपनी गीली चूत के ऊपर रख दिया और उसे मसलवाने लगी. थोड़ी देर तक अपनी बहन के हाथ के इशारे से ही वो उसकी गीली चूत को सहलाता रहा, फिर अचानक अपनी उंगली मोड़ कर उसकी चूत जो केवल पजामी में ही थी, के ऊपर से ही कुरेदने लगा. रमा उत्तेजना के आवेग में सब कुछ भूल गयी और उसे ये भी एहसास नहीं रहा कि उसके भाई की उंगली उसकी गीली चूत को कुरेद रही है, वो बस अपनी बंद आँखों से नीची आवाज़ में आहें भरने लगी अपने कमर को तेज़ी से हिलाए जा रही थी. एक साथ ही उसका पूरा बदन इतनी ज़ोर से आकड़ा और उसने छोटू के हाथ को बुरी तरह से अपनी गीली चूत के ऊपर दबा दिया और उससे चिपक गयी. दो मिनिट तक वो ऐसे ही चिपकी रही, फिर जब उसका ओर्गास्म हो गया तब उसे होश आया और वो उससे अलग होकर लेट गयी.

कुछ देर पहले हुए इवेंट्स को जब उसने अपने दिमाग़ में रीवाइंड किया तब उसे ध्यान आया कि कैसे उसके भाई की उंगली उसकी चूत में घुसी जा रही थी. झट से उसके दिमाग़ ने झटका खाया, कि ये सब उसने नींद में नहीं किया है.

तो क्या वो जाग रहा था..??

उसने डरी-डरी आँखों से एक बार फिर अपने भाई की तरफ देखा, और जब उसे उसी तरह सोता हुआ पाया तो उसने अपने दिमाग़ को झटक दिया और मन ही मन फ़ैसला भी सुना दिया कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, अंकुश तो सो रहा है, और अपने मन को तसल्ली देकर वो भी अपने बिस्तर पर जाकर लेट गयी, और कुछ ही देर में नींद ने उसे अपने आगोश में ले लिया.

सुबह मैं जल्दी उठ गया था, फ्रेश-व्रेश होकर भाभी किचन में थी, उन्होंने मुझे चाय दी बाबूजी को देने के लिए, मैंने बाहर जा कर बाबूजी को चाय दी, उन्होंने मुझे अपने पास बिठाया और मेरे सर पर हाथ फेरते हुए मुझे एग्जाम की तैयारियों के बारे में पूछा. फिर उनका खाली कप लेकर किचन में रखा, और आँगन में आकर चारपाई पर बैठ गया.

थोड़ी देर में दीदी भी फ्रेश होकर बाथरूम से निकली, मैंने उन्हें गुडमॉर्निंग विश किया. उन्होंने बड़ी बारीकी से मेरे चेहरे को देखा जब मेरे चेहरे पर उन्हें सामान्य से ही भाव दिखे तो मुस्कराते हुए उन्होंने मेरे विश का जवाब दिया और मेरे माथे पर एक किस करके मेरे पास बैठ गयी. हम दोनों ने साथ में नाश्ता किया, कुछ देर भाभी के साथ हँसी ठिठोली की और फिर बैठ गये पढ़ाई करने. हमारे बोर्ड एग्जाम खतम हो चुके थे और समर वेकेशन चल रहा था. आगे दीदी का ग्रेजुएशन करने का विचार था, लेकिन बाबूजी उन्हें शहर भेजना नहीं चाहते थे, तो प्राइवेट करने का फ़ैसला लिया.

बड़े भैया शहर में रहकर जॉब कर रहे थे, और हर सैटरडे की शाम घर आते, मंडे अर्ली मॉर्निंग निकल जाते. जॉब के साथ-साथ बड़े भैया ने पोस्ट ग्रेजुएशन भी शुरू कर दिया था, आगे उनका प्लान पीएचडी करके प्रोफेसर बनाने का था. कभी-कभी मंझले भैया भी आ जाते थे और अब वो ग्रेजुएशन के फाइनल ईयर में आने वाले थे. जब रमा दीदी के प्राइवेट ग्रेजुएशन करने की बात चली, तो मैंने भैया को सुझाव दिया कि क्यों ना भाभी को भी फॉर्म भरवा दिया जाए, वो भी ग्रेजुएशन कर लेंगी. बाबूजी समेत सब मेरी तरफ देखने लगे, भाभी तो मेरी ओर बलिहारी नज़रों से देख रही थी. दोनों भाइयों ने कुछ देर बाद मेरी बात का समर्थन किया, अब सिर्फ़ पिताजी के जवाब की प्रतीक्षा थी. सब की नज़रें उनकी ही तरफ थी.

बाबूजी – तुम क्या कहती हो बहू..? क्या तुम आगे पढ़ना चाहती हो..?

भाभी ने घूँघट में से ही अपना सर हां में हिला दिया. तो बाबूजी ने मुझे अपने पास आने का इशारा किया.

मैं डरते हुए उनके पास गया. उन्होंने मेरे माथे पर एक किस किया और बोले – मेरा बेटा अब समझदार हो गया है. है ना बहू! जुग-जुग जियो मेरे बच्चे. मैं तो चाहता हूँ कि शिक्षा का अधिकार समान रूप से सब को मिले. यही बात मैंने अपने भाइयों को भी समझाने की कोशिश की लेकिन तब उनकी समझ में मेरी बात नहीं आई, लेकिन अब वो भी अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा रहे. चलो देर से ही सही शिक्षा का महत्व समझ तो आया उनकी.

भाभी का मन गद-गद हो रहा था, जैसा ही अकेले में उन्हें मौका मिला, अपने सीने से भींच लिया मुझे और मेरे चेहरे पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी.

थैंक यू अंकुश डिअर, तुमने मेरे दिल की बात सब के सामने कह कर मुझे बिन मोल खरीद लिया. आगे पढ़ने की मेरी कितनी ख्वाहिश थी, लेकिन जल्दी शादी होने से मन की मन में ही रह गयी. उस दिन के बाद भाभी का झुकाव मेरी तरफ और ज़्यादा हो गया, और वो हर संभव मुझे अधिक से अधिक खुशी देने की कोशिश करती. एक दिन सभी भाई घर पर ही थे, बाबूजी बाहर चौपाल पर बैठे, लोगों के साथ गप सड़ाके में लगे थे, कि अचानक भाभी का जी मिचलाने लगा और वो सिंक मैं जा कर उल्टियाँ करने लगी. अब घर में और कोई बुजुर्ग महिला होती तो वो उनकी परेशानी को समझती. आनन फानन में बड़े भैया ने उनको स्कूटी पर बिठाया और कस्बे में डॉक्टर को दिखाने चल दिए. ना जाने क्या हुआ होगा, ये सोचकर मैं भी अपनी साइकल जो काफ़ी दिनों से कम यूज़ हो रही थी, उठाई और उनके पीछे-पीछे चल पड़ा.

डॉक्टर ने उनका चेकअप किया और भैया से बोले- बधाई हो राम, तुम बाप बनाने वाले हो.

भैया की खुशी का ठिकाना नहीं रहा, फिर डॉक्टर की फीस देकर वो बोले- छोटू तू अपनी भाभी को लेकर घर चल में साइकल से आता हूँ, कुछ मिठाई-विठाई लेकर.

रास्ते में मैंने भाभी को छेड़ा – क्यों भाभी बधाई हो, अब तो आप माँ बनोगी. लेकिन अपने बच्चे की खुशी में अपने इस नालायक देवर को मत भूल जाना.

वो मेरी पीठ पर अपना गाल सटा कर मुझसे लिपट गयी और बोली- तुम मेरे बच्चे नहीं हो..? जो मैं भूल जाऊंगी..! हां? आइंदा ऐसी बात भी मत करना. वरना में तुमसे कभी बात नहीं करूँगी… समझे…

मैं – अरे भाभी! मैं तो मज़ाक कर रहा था. क्या मुझे पता नहीं है कि आप मुझसे कितना प्यार करती हैं.

ऐसी ही बातें करते-करते हम घर आ गये. जब घर पर सब को ये खुशख़बरी सुनाई तो सब खुशी से नाचने लगे. घर में उत्सव जैसा माहौल बन गया था, भैया ने पूरे गांव में मिठाई बँटवाई, हमारे पूरे परिवार ने मिलकर हमारी इस खुशी में साथ दिया.

भाभी अपने घर जा रही थी. पता नहीं मेरे मन में दो तरह के भाव क्यों आ रहे थे, बोले तो डबल माइंड. एक तो इस बात की खुशी थी कि भाभी इतने सालों में अपने घर जा रही थी, दूसरा उनसे इतने सालों बाद बिछड़ना हो रहा था. सच कहूँ तो मुझे उनकी आदत सी हो गयी थी, तो उनके जाने के समय कुछ उदास सा हो गया. जिसे भाभी ने ताड़ लिया और मुझे अकेले में ले जा कर समझाने लगी.

अंकुश क्या हुआ..? मेरे जाने से खुश नहीं हो..?

मैं – नहीं भाभी, आपको इतने सालों बाद अपने घर जाने का मौका मिला है, मैं भला क्यों खुश नहीं होऊँगा..?

वो – (मेरे गाल पकड़ते हुए), तो फिर ऐसे मुँह क्यों लटका रखा है..?

मैं – पता नहीं भाभी एक तरफ तो आपके जाने की खुशी भी है कि चलो इतने दिनों बाद आपको अपने घर जाने का मौका मिल रहा है, दूसरी ओर ऐसा लग रहा है जैसे मेरे अंदर से कोई चीज़ निकल कर आपके साथ जा रही हो, और मैं खाली सा होता जा रहा हूँ.

भाभी कुछ देर शांत खड़ी मेरे चेहरे को देखती रही. फिर अचानक उनकी पलकें भीग गयी, और रुँधे स्वर में बोली – ये मेरे प्रति तुम्हारा लगाव है, जो स्वाभाविक है और ऐसा नहीं कि ये स्थिति केवल तुम्हारी ही है. मेरा भी कुछ ऐसा ही हाल है. तुम्हारी भावना तो केवल मेरे लिए ही हैं तब इतना दुख हो रहा है, लेकिन मेरा तो पूरे घर के साथ है तो सोचो मेरा क्या हाल हो रहा होगा? फिर भी अगर तुम नहीं चाहते कि मैं ना जाऊं तो नहीं जाऊंगी.

मैं – नही..नही..! भाभी प्लीज़ आप मेरी वजह से अपनी खुशी कुर्बान मत करिए, दो महीने की ही तो बात है.

भाभी चली गयी और मैं अपना जी कड़ा करके उन्हें बस स्टॉप तक विदा करके आया. मन्झ्ले भैया का ये फाइनल ईयर था, उन्होंने डिसाइड किया था कि वो इस साल के पीसीएस के एग्जाम में बैठेंगे. बड़े भैया की भी यही सलाह थी जिस पर पिताजी को भी कोई आपत्ति नहीं थी.

हम बहन भाई की रास्ते की मस्तियाँ बंद हो गयी थी, लेकिन घर में हम एक दूसरे को छेड़ने का मौका निकाल लेते थे, अब इसमें रेखा दीदी भी शामिल हो गयी थी. एक दिन दीदी मुझे गुदगुदाके भाग गयी, और दूर खड़ी अपनी जीभ निकाल कर चिढ़ा ने लगी तो मैं भी उनकी तरफ भागा… लेकिन वो मेरे हाथ नहीं आ रही थी.

फुर्रर इधर- तो फुर्रर उधर, किसी तितली की तरफ निकल जाती, एक दो बार हाथ आई भी तो झुक कर अपने को छुड़ा लेती और फिर दूर भाग जाती. यहाँ तक कि हम दोनों की साँसें उखाड़ने लगी.

अब ये मेरे लिए प्रेस्टीज इशू बनता जा रहा था, मैं उनको ज़्यादा खुलेतौर पर टीज़ नहीं करना चाहता था, लेकिन उनके मन में पता नहीं क्या चल रहा था, मैं जैसे ही जाने दो सोच के खड़ा होता तो वो थोड़ा दूर से मुझे अंगूठा दिखा के जीभ निकाल कर चिढ़ाने लगती. मैंने ठान लिया कि अब इनको सबक सीखा के ही रहूँगा. इस समय हम अपने लंबे-चौड़े आँगन में ही थे.
Bhai behal ki ye teasing teenage bahut hoti hai. Yahi teasing bath kai sex ki taraf bade jati hai. Mera bhi aisa kafi experience raha hai. Sisters ke sath aur cousins( mama aur bua ki ladkiyon) ke sath.
 
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aidenabhishek

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UPDATE 68​

बाहर आते ही मेरा 9” लंबा और उसकी कलाई जितना मोटा लंड किसी कोबरा नाग की तरह फनफनाकर शालिनी के मुँह पर जा लगा. शालिनी अपनी आँखें चौड़ी करके उसे देखने लगी.

शालिनी अपने मुँह पर हाथ रखकर बोली - हे राम…. ये क्या है?

मैं - इसे लंड कहते हैं जानेमन…

मैंने शालिनी के बूब्स को दबाते हुए कहा.

शालिनी - वो तो मैं भी देख रही हूँ… लेकिन इतना बड़ा और मोटा??? किसी की भी चूत की धज्जियाँ उड़ा देता होगा तुम्हारा लंड तो… उसने झुरझुरी सी लेते हुए कहा.

मैं - तुम्हें नहीं उड़वानी अपनी चूत की धज्जियाँ तो मैं अपना समान पैक करूँ शालिनी डार्लिंग??

मैंने शालिनी को चिढ़ाते हुए कहा.

शालिनी झट से बोल पड़ी - नहीं नहीं… मैं तो अब इसे ज़रूर लूँगी… पहली बार इतना बड़ा लंड देखा हैं मैंने… देखूं तो सही कैसा मज़ा आता है??

इतना कहकर उसने मेरे 9” लंबे और 3” मोटे कड़क सोटे जैसे लंड को चूमा और उसकी गर्मी को अपने मुलायम फूले हुए गाल से सटा कर आँखें बंद करके उसे अपने गाल से मसाज सी देने लगी. एक दो बार उसने उसे हाथ से ऊपर नीचे किया, लंड के सुर्ख दहकते सुपाड़े को जीभ से चाट कर उसने अपने मुँह में ले लिया. सुपाड़े से ही उसका पूरा मुँह भर गया. मेरी चीकू जैसी गोलियों को एक हाथ से सहलाते हुए वो उसे मस्ती में आकर चूसने लगी. कुछ ही देर में मेरा लौड़ा एकदम कड़क होकर किसी लोहे की रोड जैसा सख़्त हो गया, उसके चारों ओर के मसल्स बाहर को उभर आए. अब वो गोलाकार ना होकर किसी रोमबस शेप रोड जैसा दिखने लगा.

मैंने शालिनी के कंधे पकड़ कर ऊपर उठने का इशारा किया और उसके बाकी बचे कपड़ों को निकाल कर पूरी तरह से नंगा कर दिया. एक बार उसके होंठ चूसकर, शालिनी की रसीली चूत को सहलाया. वो बूँद-बूँद करके रिसने लगी थी. खड़े-खड़े ही मैंने शालिनी की एक टाँग ऊपर की और अपने लंड को उसकी चूत के छेद पर टिका कर एक धक्का मार दिया. सर्ररर.. से शालिनी की गीली रसीली चूत में मेरा आधा लंड चला गया. शालिनी अपनी आँखें बंद करके सिसक पड़ी.

शालिनी - आआहह…. सस्स्सिईईईईईईई… फट गयी मेरी चूत… उफफफफफ्फ़… जोसेफ तुम्हारा लौड़ा बहुत मोटा है…

मैंने एक और धक्का मार कर पूछा – पसंद आया मेरी जान??

शालिनी सिसकते हुए बोली – उईईई… माआआ.. मर गयी मैं… बहुत मज़ा है इसमें… जोसेफ अब चोदो मुझे…

मैंने अपने आधे लंड को भी बाहर निकाल लिया. अब उसकी अच्छे से ग्रीसिंग हो चुकी थी शालिनी की चूत के ग्रीस से. मैंने शालिनी की चूत की मोटी-मोटी फांकों के बीच अपना लंड रगड़ते हुए पूछा – शालिनी तुम बता रही थी, तुम्हारी देवरानी किसी जमींदार की बेटी है… कहाँ के जमींदार हैं वो??

शालिनी सिसक कर बोली – जोसेफ डार्लिंग ये बातों का वक़्त नहीं है.. आअहह.. पहले तुम अपने लंड को अंदर करो जल्दी… मेरी चूत में आग लगी हुई है और तुम्हें बातें सूझ रही हैं??

मैंने अपने लौड़े की हल्की सी ठोकर शालिनी की गरम रसीली चूत की क्लिट की जड़ में लगाकर कहा – डालता हूँ ना… पहले बताओ तो सही वो कहाँ के जमींदार हैं??

शालिनी – आआहह.. क्या बेकार की बातें ले बैठे?? सस्सिईइ… आअहह… किशनगढ़ के ज़मींदार हैं वो… अब तो तुम अपने लंड को मेरी चूत में अंदर डालो जोसेफ… नहीं सबर होता मुझसे…

मैंने अब अपने सुपाड़े को शालिनी की गीली रसीली चूत के छेद पर रख कर हल्का सा अंदर करके बोला – उनका नाम क्या है?

शालिनी – आअहह… तुम क्यों पूछ रहे हो?? सूर्य प्रताप नाम है उनका… अब चोदो भी जल्दी से.. सस्सिईईईई… हाआंणन्न… आअहह.. मज़ा आ गया… और अंदर करो… उउउफफफ्फ़… हाय..

पूरा लंड अंदर डालकर मैंने शालिनी को गोद में उठा लिया और पलंग पर लिटाकर उसकी टाँगों को ऊपर करके एक बार लंड बाहर निकाल कर फिर से एक ही झटके में अंदर डाल दिया. इस झटके से शालिनी का मुँह खुल गया, उसके मुँह से एक कामुक कराह निकल पड़ी.

शालिनी - आआययययीीई…. म्माआ.. उउउफफफ्फ़… क्या मस्त लौड़ा है जोसेफ तुम्हारा?? हाए… फाड़ डालो मेरी मुई चूत को.. जोसेफ … धज्जियाँ उड़ा दो इसकी… आज…

मेरे हथौड़े जैसा लंड शालिनी अपनी चूत में लेकर मस्ती से अपनी गान्ड उठा-उठाकर चुदने लगी. कुछ देर में ही शालिनी झड़ने लगी और मेरी कमर में अपने पैरों की कैंची डालकर मुझसे चिपक गयी. कुछ देर रुक कर मैंने उसे घोड़ी बना दिया और उसकी 36 की गद्देदार गान्ड को मसलते हुए पीछे से अपना लंड उसकी रस से लबालब चूत में पेल दिया. फच.. से मेरा पूरा लंड शालिनी की चूत में समा गया. शालिनी अपना मुँह ऊपर करके कराह उठी.

शालिनी – आअहह… म्माआ… धीरे जोसेफ.. तुम्हारा लंड बहुत मोटा है…

मैंने शालिनी के कंधों पर अपने हाथ जमाए और दे ढका-धक जो चुदाई की. शालिनी अनाप-शनाप बकती हुई चुदाई का मज़ा लेने लगी. 20 मिनट चोद कर मैंने शालिनी की चूत को अपनी मलाई से भर दिया, वो औंधे मुँह पलंग पर गिर पड़ी. मैं भी शालिनी की पीठ पर पसर कर अपनी साँसें ठीक करने लगा. कुछ देर बाद हम अगल-बगल में पड़े एक दूसरे के बदन सहला रहे थे.

मैंने शालिनी के होंठ चूमकर कहा – बहुत शानदार औरत हो तुम… बहुत मज़ा आया तुम्हारी रसीली चूत चोद कर.

शालिनी मेरे बदन से चिपकते हुए बोली – जोसेफ.. तुम भी बहुत मस्त चुदाई करते हो इस शानदार लंड से, पहली बार इतना मज़ा आया है मुझे कि बता नहीं सकती…

फिर वो उठाते हुए बोली – अब मुझे घर जाना होगा.. देर हो गयी तो पता नहीं वो ड्राइवर क्या-क्या नई कहानी बना दे??

मैं उसे कपड़े पहनते हुए देखकर बोला – और कौन-कौन हैं घर में??

शालिनी - ससुर हैं.. सास पहले ही चल बसी.. हम दोनों अकेली दिन भर घर में रहती हैं. तीनों मर्द दिन में बाहर रहते हैं बिज़नेस के काम से.

मैंने उठाते हुए कहा – चलो मैं तुम्हें छोड़ देता हूँ तुम्हारे घर..

शालिनी मेरी बात मान गयी. 15 मिनट बाद हम उसके घर पर थे. ये एक अच्छा ख़ासा बंगले नुमा घर था. हॉल में कदम रखते ही रागिनी दिखाई दी जो हॉल नुमा बैठक में सोफे पर बैठी टीवी देख रही थी. हमें देखते ही बोली.

रागिनी – अरे दीदी… आप?? और ये कौन है??

चूँकि मैं जोसेफ वाले गेट-अप में था. फ्रेंच कट दादी, नीली आँखें, नाक थोड़ी फूली हुई सी.

शालिनी – ये जोसेफ हैं.. रास्ते में हमारी गाड़ी खराब हो गयी थी. इन्होंने ही मुझे लिफ्ट दी और यहाँ तक लाए हैं.

फिर शालिनी ने सारी दास्तान कह सुनाई. सिर्फ होटल की अपनी चुदाई छोड़कर. रागिनी मेरे लिए कोल्ड ड्रिंक ले आई. हम तीनों ही सोफे पर बैठे थे. रागिनी मेरी तरफ बड़े नशीले अंदाज से देख रही थी. मेरी पर्सनॅलिटी देख कर रागिनी के भी अरमान जागने लगे थे. लेकिन अपनी जेठानी के होते हुए वो कैसे आगे बढ़े?

लेकिन रागिनी के इस असमंजस को शालिनी ने ही हल कर दिया. शालिनी आकर मेरी बगल में ही बैठ गयी और मेरे बदन से सटाते हुए बातें करने लगी. रागिनी अपनी जेठानी की आदतों से अच्छी तरह परिचित थी. शालिनी के मेरे साथ चिपटते ही, रागिनी फ़ौरन ताड़ गयी और बोली.

रागिनी – वाह दीदी, आपने तो रास्ते में ही मुर्गा फँसा लिया लगता है??

शालिनी हँसते हुए बोली – ऐसा हैंडसम मुर्गा कहाँ मिलेगा मेरी जान??

ये कहकर शालिनी ने मेरे गाल को चूम लिया और उठते हुए बोली – तुम लोग बातें करो मैं ज़रा फ्रेश होकर आती हूँ, फिर मिलकर इस मुर्गे को हलाल करेंगे.

मुझे पता था, कि शालिनी की चूत मलाई से लबालब भरी होगी, इसलिए वो उसे साफ करने जा रही है.

शालिनी के जाते ही, रागिनी मेरे साथ चिपकते हुए बोली – जोसेफ साहब… आप तो बड़े फास्ट निकले.. दीदी को रास्ते में ही फाँस लिया…

ये कहते हुए रागिनी मेरी जाँघ सहलाने लगी. रागिनी इस समय एक रेड कलर का टॉप और फुल लंबाई की स्कर्ट पहने थी. रागिनी पहले से ज़्यादा भर गयी थी. उसका बदन भी शालिनी जैसा ही गदराया हुआ था.

रागिनी की स्कर्ट के ऊपर से उसकी चूत को सहलाते हुए मैंने कहा – आपकी जेठानी हैं ही ऐसी.. कोई भी एक नज़र देखते ही लट्टू हो जाए… फिर यहाँ तो उन्होंने मुझे खुद ही लिफ्ट दे दी.

रागिनी धीरे से अपना हाथ मेरे लंड तक ले जाते हुए बोली – आपकी पर्सनालिटी है ही ऐसी.. कोई भी औरत आपके नीचे लेटने को तैयार हो जाएगी. शालिनी की तो वैसे भी चूत हर समय प्यासी ही रहती है.

ये कहते हुए रागिनी खिल-खिलाकर हँसने लगी और उसने अपनी हथेली से मेरे लौड़े को कसकर मसल दिया.

मैंने रागिनी के टॉप में हाथ डालकर उसकी गदर चुचियों को मसलते हुए पूछा – अरे हां… शालिनी बता रही थी, कि आप ठाकुर सूर्य प्रताप की बेटी हो.

रागिनी मज़े के आवेश में ही चौंकते हुए मेरी तरफ देखकर बोली – आप जानते हैं उन्हें??

मैं – नहीं.. मैं उन्हें तो नहीं जानता.. लेकिन भानु प्रताप को जानता हूँ, वो आपका भाई है ना?

रागिनी – हां… लेकिन आप मेरे भाई को कैसे जानते हो?

मैंने अपना एक हाथ रागिनी के स्कर्ट में डाल दिया. रागिनी ने भी फ़ौरन अपनी टाँगें खोल दी. अपने हाथ से रागिनी की चूत को पैंटी के ऊपर से ही सहलाते हुए कहा – दरअसल में असलम का दोस्त हूँ, जिसके साथ आपका भाई काम करता था. अब उसका सब कारोबार और वो खुद उसके अब्बा, सबके सब खतम हो गये, यहाँ तक कि उनके सभी पार्टनर भी. जब ये रेड पड़ी थी तब मैं भी वहीं था. मैं अपनी फ़ितरत के अनुसार जैसे तैसे करके वहाँ से बच निकला. रागिनी मुँह बाए मेरी बातें सुन रही थी. साथ ही साथ वो उत्तेजित भी होने लगी थी. मैं लगातार रागिनी की चूत सहलाए जा रहा था. आश्चर्य और उत्तेजना के मिले जुले भाव उसके चेहरे पर परिलक्षित होते दिख रहे थे.

मैंने आगे कहा – असलम का बहुत सारा माल और कैश जो पुलिस की रेड में बच गया था, वो अब मेरे पास है. मैं चाहता हूँ, कि एक-एक करके जो भी पुराने लोग बचे हैं उन्हें इकट्ठा करके फिर से उस कारोबार खड़ा किया जाए. लेकिन कुछ दिनों से तुम्हारे भाई का कोई अता-पता नहीं चल रहा. सुना है उसने उस एसपी के भाई को किडनैप किया था, जो उसकी क़ैद से निकल भगा. अब पुलिस भानु की तलाश में है??

मेरा जिक्र आते ही, क्षण मात्र को रागिनी के चेहरे के भाव बदले. शायद उसे मेरे साथ बिताए हुए वो पल याद आ रहे होंगे.

मैंने रागिनी के चेहरे पर एक नज़र डालकर आगे कहा - मैं चाहता हूँ, कि अपना धंधा यहाँ से समेट कर मुंबई शिफ्ट कर दूं और जिन्होंने उस धंधे को खड़ा करने में मदद की थी, उनको उनका हक़ मिल सके.

रागिनी – कितना माल बाकी बचा है अभी?

मैं - कम से कम 500 करोड़ का माल अभी बचा होगा.

रागिनी – 500 करोड़???? बाप रे….

रागिनी कुछ देर सोच में डूबी रही.

मैंने रागिनी से पूछा – तुम उसकी बहन हो शायद तुम्हें तो पता ही होगा वो आजकल कहाँ है?? मैं चाहता हूँ, उसमें से उसका हिस्सा उसे भी मिलना चाहिए और मेरे साथ मिलकर इस कारोबार को फिर से खड़ा करना चाहिए. इसलिए मैं उसे ढूंढ़ने की कोशिश कर रहा हूँ. तुम्हारी जेठानी से तुम्हारे पापा का नाम सुनकर मुझे लगा कि शायद मुझे मेरी मंज़िल का एक मुसाफिर मिल जाएगा. क्या तुम्हें उसका पता मालूम है??

रागिनी सोच में डूबी हुई थी, शायद मेरा तीर सही निशाने पर लगा था. 500 करोड़ का नाम सुनकर उसके चेहरे के भाव बदल रहे थे, फिर शायद उसने भानु का पता बताने का फ़ैसला कर लिया.

रागिनी – आप सच कह रहे हैं, भैया को आप मुंबई सेटल करके धंधा दोबारा शुरू करना चाहते हैं?

मैं – मेरे ऊपर तुम्हारे शक़ की क्या वजह है?? चाहो तो फोन करके अपने भाई से मेरा नाम पूछ सकती हो. शायद असलम ने उसे बताया हो कभी.

रागिनी – नहीं उसकी कोई ज़रूरत नहीं है. असल में पुलिस के डर से वो यहीं आकर अंडरग्राउंड हो गये हैं.

मैं – क्या?? यहाँ तुम्हारे घर में?

रागिनी – नहीं, घर में तो नहीं… पर इसी शहर में हैं. मैं आपको उनका नया नंबर और पता देती हूँ. आप रात को उनसे जाकर मिलना, किसी को पता नहीं चलना चाहिए.

मैंने मुस्करा कर कहा – मैं इन बातों को अच्छी तरह से समझता हूँ रागिनी. इस लाइन का बहुत पुराना खिलाड़ी हूँ. आज तक पुलिस मुझे छू भी नहीं पाई है.

अब रागिनी को मेरी बातों पर पूरा विश्वास हो चुका था, फिर उसने उसका मोबाइल नंबर और भानु कहाँ छुपा है उस जगह का पता भी दे दिया. तब तक वहाँ शालिनी भी आ गयी. हमारी बात-चीत का सिलसिला वहीं थम गया, फिर दोनों ने मिलकर मुझे सैंडविच बना लिया और दोनों तरफ से मेरे लंड पर टूट पड़ी. दोनों ही एक से बढ़कर एक मस्त माल मेरे सामने नंगी थी. मैंने दोनों को घोड़ी बनाकर आजू बाजू झुका लिया.

रागिनी पहले से ही बहुत ज़्यादा गरम हो चुकी थी, अपनी जांघों के बीच हाथ लाकर अपनी चूत के रस को पोंछते हुए बोली – आअहह… सस्सिईईईई… दीदी पहले मुझे चुदने दो. उउंम्म… नहीं सबर हो रहा…

मैंने रागिनी के गांड पर थप्पड़ मारते हुए कहा – चल मेरी घोड़ी पहले तू ही सही…

ये कहकर मैंने अपना लौड़ा रागिनी की रसीली चूत में पेल दिया. शायद उसे उम्मीद नहीं थी कि मेरा लौड़ा इतने बड़े साइज़ का होगा. मेरे लंड के अंदर घुसते ही रागिनी बहुत ज्यादा छटपटाने लगी. रागिनी को चोदते हुए मैंने अपनी दो उंगलियाँ बाजू में घोड़ी बनी शालिनी की चूत में पेल दी. अब मैं एक की चूत में लंड पेलता, तो दूसरी की चूत में उंगलियाँ डाल देता. दोनों ही मेरा मस्त मलंग लंड लेकर निहाल हो गयी. दो घंटे की जमकर चुदाई के बाद मैं पस्त हो गया, वो दोनों भी चुदते-चुदते पानी छोड़ते-छोड़ते बेहाल हो गयी. दोनों को अपने लंड का लोहा मनवाकर शाम ढलते ही मैं रागिनी के घर से चला आया. उन्होंने मुझसे फिर मिलने का वादा लेकर मुझे विदा किया.

भानु का पता पाकर मैं बहुत खुश था, मैंने फ़ैसला लिया कि आज रात ही उसे वहाँ से निकल कर ले जाऊँगा. मेरे वहाँ से निकलते ही रागिनी ने भानु को फोन किया. हमारे बीच हुई सारी बातें डीटेल से उसको बता दी. चूँकि भानु ने मेरा नाम सुन रखा था तो शक़ करने की कोई वजह नहीं थी. उसे मेरे ज़रिए अपने बचने की किरण दिखाई देने लगी. साथ ही इतना बड़ा लालच भी. मैं होटल में लौटते ही फ्रेश हुआ, दो घंटे आराम किया. जब उठा तब तक अंधेरा घिर चुका था. मैंने खाना ऑर्डर किया और साथ ही भानु को कॉल लगाई. वो शायद मेरे फोन का ही इंतजार कर रहा था, फ़ौरन कॉल पिक कर ली.

मैं – हेलो भानु प्रताप, पहचाना मुझे??

भानु – कौन जोसेफ??

मैं – हां.. मैं जोसेफ बोल रहा हूँ. लगता है तुम्हारी बहन ने तुम्हें सब कुछ बता दिया है.

भानु – हां.. तुम कहाँ हो अभी?

मैं – मेरी छोड़ो.. इधर आने की ग़लती भी मत करना. ये बोलो क्या सोचा है अब??

भानु – मुझे क्या सोचना है? मुझे जल्दी से जल्दी किसी तरह यहाँ से निकालो.. मैं तुम्हारे साथ काम करना चाहता हूँ.

मैं – ठीक है… 10 बजे दिल्ली हाइवे पर शहर से 5 किमी बाहर मिलो, मैं गाड़ी लेकर वहाँ ठीक 10 बजे पहुँच जाऊँगा.

भानु – ठीक है.. मैं तुम्हारा इंतजार करूँगा. आना ज़रूर..

मैं – डॉन’ट वरी, मैं समय पर पहुँच जाऊँगा. ओक, टेक केयर..

मैंने 9 बजे तक खाना खतम किया, 9:45 को तयशुदा जगह से आधा किमी पहले मैंने अपनी गाड़ी रोड से नीचे झाड़ियों के पीछे छुपा दी. मैं देखना चाहता था, कि भानु जैसा कुत्ता कोई चाल तो नहीं चल रहा. क्या पता उसने पता लगा लिया हो कि जोसेफ के भेष में मैंने ही उस्मान के गैंग को खतम कराया था. वैसे तो श्वेता को भी इस बारे में कुछ पता नहीं होना चाहिए कि मैं ही जोसेफ था. कुछ देर बाद एक ऑटो मेरे सामने से गुजरा. उसमें भानु अकेला ही था. मुझे तसल्ली हो गयी कि ऐसा कुछ नहीं है, जो मैंने सोचा था. मेरे बताए हुए जगह पर जाकर वो ऑटो रुका. उसमें से भानु बाहर आया, उसने एक कपड़े से अपने आप को पूरी तरह से ढक रखा था. जब वो ऑटो वहाँ से वापस मुड़कर शहर की तरफ चला गया, तब मैंने अपनी गाड़ी रोड पर लाकर भानु के पास जाकर रोकी. भानु पर्सनली जोसेफ से कभी नहीं मिला था, लेकिन असलम से उसका नाम ज़रूर सुना था. भानु अपने सामने गाड़ी रुकती देख वो उसकी तरफ लपका.

मैंने शीशा नीचे करके पूछा – भानु प्रताप??

भानु ने फ़ौरन अपनी मुंडी हां में हिलाई. उसने लंबी सी दाढ़ी रख रखी थी शायद अपनी पहचान छुपाने के लिहाज से.

मैंने कहा – आ जाओ अंदर…

भानु के बैठते ही मैंने गाड़ी आगे बढ़ा दी. रास्ते में हम वही बातें करते रहे. मैंने उसे बताया, किस तरह से पुलिस की रेड पड़ी, कौन-कौन मारा गया, मैं कैसे बच निकला. कुछ देर भानु सब सुनता रहा, फिर जैसे ही मेरी बात खतम हुई तो उसने पूछा

भानु – अब हम दिल्ली क्यों जा रहे हैं??

मैंने कहा – वहाँ से ट्रेन पकड़ कर मुंबई जाएँगे. सारा समान ऑलरेडी मैंने शिफ्ट कर दिया है. बस अपने आदमियों को इकट्ठा करने में लगा हूँ. अब तुम मिल गये हो, आदमियों का इंतजाम तो अब तुम जल्दी कर ही लोगे.

भानु – हां.. आदमियों की तुम चिंता मत करो. जितनी चाहिए उतने कर दूँगा. एक से बढ़कर एक ख़तरनाक लोग… आज भी मेरे लिंक अपने आदमियों से बने हुए हैं.

कुछ दूर जाकर मैंने रोड के साइड में गाड़ी खड़ी कर दी, रात के सन्नाटे में उसने पूछा – गाड़ी यहाँ क्यों रोक दी तुमने??

मैंने अपनी छोटी उंगली दिखाकर पेशाब करने का इशारा करते हुए कहा – बहुत तेज़ लगी है, तुम भी फारिग हो लो. फिर हम दिल्ली जाकर ही रुकेंगे.

मैं एक तरफ रोड साइड को अपनी पैंट खोल कर खड़ा हो गया. मेरे से कुछ कदम दूर भानु दूसरी तरफ मुँह करके पेशाब करने लगा. अंधेरा तो था ही, एक दूसरे का समान तो दिखने का कोई चान्स ही नहीं था. भानु बिंदास होकर फारिग होने में मशगूल हो गया. अभी वो पेशाब करने के बाद अपने लंड को अंदर भी नहीं कर पाया था, कि रिवाल्वर के हत्थे की एक जोरदार चोट उसकी कनपटी पर पड़ी. भानु ज़मीन पर गिर पड़ा. मैंने घसीटकर उसे गाड़ी में डाला और उसे दौड़ा दिया अपने तयशुदा ठिकाने की तरफ..

दो ढाई घंटे की ड्राइव के बाद मैं श्वेता के फार्म हाउस में था. चाबी मैंने भैया से पहले ही ले रखी थी. पुलिस की सील को तोड़ा और भानु को ले जाकर मैंने उसी हॉल में बाँध कर डाल दिया जिसमें उन्होंने मुझे डाला था. उसे बेहोश बँधा छोड़कर मैं अपने ज़रूरी कामों में जुट गया.
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Doctor Rakesh

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क्या बात है बहुत अच्छे स्टोरी बस आपकी ही पढने वाली है बाकी तो सब घिसट कर चल रही हैं
 
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Premkumar65

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UPDATE 6

अब ये मेरे लिए प्रेस्टीज इशू बनता जा रहा था, मैं रमा दीदी को ज़्यादा खुले तौर पर टीज़ नहीं करना चाहता था, लेकिन उनके मन में पता नहीं क्या चल रहा था, मैं जैसे ही जाने दो सोच के खड़ा होता तो वो थोड़ा दूर से मुझे अंगूठा दिखा के जीभ निकाल कर चिढ़ाने लगती

मैंने ठान लिया कि अब इनको सबक सीखा के ही रहूँगा. इस समय हम अपने लंबे-चौड़े आँगन में ही थे. मैंने एक लंबी सी छलांग लगाई और इससे पहले कि रमा दीदी संभाल कर भाग पाती मैंने पीछे से उनकी कमर में लपेटा मार दिया. वो नीचे को झुकती चली गयी, मैं उनके ऊपर था. पीठ मेरे सीने से सटी हुई थी, मैंने उनको अपनी बाजुओं में कस कर उठा लिया. रमा दीदी खिल-खिला रही थी, और मुझसे छोड़ने के लिए बोलती जा रही थी. दीदी के हाथ मेरे हाथों के ऊपर थे, लेकिन उनसे वो मेरे हाथों पर दबाव डाले थी, उन्हें छुड़ाने का कोई प्रयास नहीं था. मेरी हाइट दीदी से कुछ ज़्यादा ही थी, उनको ऊपर उठाते हुए मेरे हाथ उनके पेट से सरक कर थोड़ा ऊपर को हो गये और उनके अमरूद के निचले हिस्से को टच होने लगे.

दीदी लगातार खिल-खिलाए जा रही थी और अपने हाथों से मेरे हाथों को और ऊपर को खिसकाने की कोशिश कर रही थी, अब उनकी कमर का ऊपरी हिस्सा मेरे ठीक लंड के सामने था जो कमर के दबाव से फूलने लगा था. दीदी ने अब अपने को छुड़ाने के बहाने अपने को और झुकाया और मेरी बाजुओं पर झूल गयी, अपने दोनों पैर हवा में उठा लिए और उन्हें मेरे घुटनों पर जमा लिया. उसके बाद उन्होंने अपनी कमर को और ऊपर की ओर उछाला, अब उनके गोल-मटोल चुतड़ों की दरार ठीक मेरे अकड़ चुके लंड के सामने थी, वो लगातार मुझसे छोड़ने के लिए बोल रही थी और साथ ही अपने गांड को मेरे बाबू के ऊपर रगड़ रही थी.

हम दोनों के ही मुँह लाल पड़ गये थे. अभी कुछ और आगे होता उसके पहले बाहर के दरवाजे से एक और खिल-खिलाहट की आवाज़ सुनाई दी. मैंने दीदी को छोड़ दिया और हम दोनों ने ही पीछे मुड़कर देखा, दरवाजे पर आशा दीदी खड़ी ताली बजा-बजा कर हमारा खेल देखते हुए हंस रही थी.

आशा – वाह ! भाई-बहन अकेले-अकेले ही खेल में लगे हो. अरे भाई हमें भी शामिल कर लो.

रमा– देखो ना दीदी, ये छोटू बहुत तंग करता है मुझे, ऐसा कस कर पकड़ लिया कि छोड़ ही नहीं रहा था.

मैं – अच्छा मेरे गुदगुदी किसने की थी हां! अब बताओ दीदी को खुद शुरू करती है, और दोष मेरे ऊपर डाल रही है.

आशा – अरे बस करो तुम दोनों और बताओ कोई काम-वाम तो नहीं है तुम दोनों को..?

दोनों एक साथ – नहीं ऐसा तो कोई काम नहीं है.

आशा – तो चलो क्यों ना हम लोग खेतों में चलें, वही बाग़ में बैठ कर खेलते हैं, यहाँ कितनी गर्मी है.

मैंने कहा – हां दीदी चलो वहीं चलते हैं. फिर हम बाबूजी को बता कर तीनों खेतों की तरफ चल दिए, जो बस घर से कोई आधा किमी की दूरी पर ही थे.

हमारी लंबी चौड़ी ज़मीन थी, ज़मीन के लगभग सेंटर में 4 एकड़ का आम और अमरूद का बाग था, जिसमें और भी आमला, बेर जैसे पेड़ थे, लेकिन मुख्य तौर पर आम और अमरूद ही थे. बगीचे के चारों तरफ के हिस्से बराबर-बराबर खेत चारों भाइयों में बँटे हुए थे. गांव की तरफ का हमारा हिस्सा था, और उसके ठीक अपोजिट आशा दीदी के खेत थे, चारों की ज़मीन की सिंचाई हमारे ही ट्यूबवेल से होती थी. ये सीज़न आमों का था, लेकिन कच्चे आम लगे थे, पकने में अभी कम से कम एक महीना और लगने वाला था.

हम तीनों आम के बगीचे में जहाँ घने पेड़ थे उनके नीचे एक चादर बिछा कर बैठ गये, और कार्ड्स खेलने लगे. गर्मियों की चिलचिलाती दोपहरी में घर से ज़्यादा यहाँ राहत थी, वैसे तो हवा ज़्यादा नहीं थी, फिर भी जब भी हवा का झोंका आता, तो बड़ी ठंडक पहुँचती उस तमतमाति गर्मी में.

कार्ड खेलते हमारी पूरी दोपहरी निकल गयी, 3 बजे रमा दीदी बोली, यार अब चलो, बोर हो गये खेलते-खेलते. तभी आशा दीदी बोली चलो ठीक है, लेकिन कुछ आम ले लेते हैं, शाम को चटनी बनाने के काम आएँगे.

आशा दीदी बोली – छोटू तू ट्राइ करना कुछ आम तोड़ने की.. तो मैं उचक कर कुछ नीचे की तरफ लटके आमों को तोड़ने की कोशिश करने लगा, लेकिन काफ़ी कोशिश करने पर भी उन तक पहुँच नहीं पाया. दोनों दीदी मिट्टी के ढेले उठाकर आमों को निशाना लगाकर तोड़ने की कोशिश करने लगी, लेकिन निशाना नहीं लग पा रहा था और एक-आध लगा भी तो कच्चे आम मिट्टी के ढेलों से नहीं टूट पाए.

आशा – छोटू यार ! तू घोड़ा बन जाए तो तेरे ऊपर चढ़ कर मैं या रमा पहुँच सकती हैं आमों तक. मैं अपने घुटने टेक कर घोड़ा बन गया, पहले रमा दीदी ने कोशिश किया लेकिन वो नहीं पहुँच पाई, फिर आशा दीदी ने भी कोशिश किया, उनका वजन थोड़ा ज़्यादा था, लेकिन मैंने उनको भी सहन कर लिया, लेकिन नतीजा वो ही ढाक के तीन पात.

आशा दीदी बोली, यार! ये तो बात नहीं बन रही, तू पेड़ पर चढ़के नहीं तोड़ सकता क्या? अब मैं आज तक किसी पेड़ पर नहीं चढ़ा था, तो मैंने मना कर दिया.

फिर वो बोली – तो एक काम कर, मुझे उचका दे. मैं तोड़ लूँगी.

मैंने रमा दीदी की ओर देखा, तो वो मन ही मन मुस्करा रही थी, लेकिन प्रत्यक्ष में कुछ नहीं बोली, मुझे चुप रहते हुए वो फिर बोली- अरे उचका ना बिंदास, सोच क्या रहा है.. तू भी ना… !

मैंने आशा दीदी को जैसे ही पीछे से पकड़ने की कोशिश की तो वो पलट गयी और बोली – आगे से उठा, जिससे तुझे भी दिखे कि और कितना ऊपर करना है.

मैंने थोड़ा झुक कर उनकी जांघों को अपने बाजुओं में लपेटा और ऊपर को उठाया. इस पोज़िशन में उनकी चूत मेरे कमर से थोड़ा ऊपर माने पेट पर था और उनके बूब्स मेरे मुँह से थोड़ा सा नीचे थे. उनकी मोटी मांसल जांघों के एहसास ने मेरे शरीर में झुरझुरी सी दौड़ा दी, भारी-भारी गोल मुलायम चुचियों का उपरी भाग मेरी ठोडी को सहला रहा था. दो-चार आम तो उनकी हद में आ गये और उन्होंने उन्हें तोड़ लिया, लेकिन और भी तोड़ने के लिए अभी भी वो नहीं पहुँच पा रही थी.

आशा – छोटू! भाई और थोड़ा ऊपर कर ना!

मैंने उन्हें और 6-8” ऊपर किया तो मेरा मुँह ठीक उनके बूब्स के बीच में आ गया, मेरे गाल उनकी चुचियों पर थे.

अचानक उनके मुँह से एक हल्की से सिसकी निकल गयी.. ईीीइसस्स्शह…सीईईईईईई.., मैंने कहा- क्या हुआ दीदी..? तो वो फ़ौरन बोली – कुछ नहीं तू ऐसे ही पकड़े रह बस मैं आम को पकड़ने ही वाली हूँ… अरे हिल मत…ना..!

मेरा मुँह और नाक उनकी मोटी-मोटी चुचियों में दब रहा था, तो उसको थोड़ा इधर-उधर किया. इससे मेरी नाक उनकी चुचियों पर रगड़ने लगी. वो तो आम तोड़ना भूल कर अपनी आँखें बंद करके मस्ती में खो गयी.

मेरा भी नीचे तंबू बनता जा रहा था, फिर अचानक रमा दीदी बोली – अरे दीदी ! तोडो ना आम जल्दी उसको प्राब्लम हो रही है, कब तक वो ऐसे उठाए खड़ा रहेगा..?

आशा – अरे तोड़ तो रही हूँ! छोटू ! भैया थोडा पीछे को हो ना ! ये चार आम थोड़े तेरे पीछे को हैं.

मैं जैसे ही थोड़ा पीछे को हुआ, मुझे पता नहीं था कि ज़मीन थोड़ा उबड़-खाबड़ है, मेरा पैर एक गड्ढे में चला गया और मैं पीछे को गिरने लगा. छोटूऊऊ….संभाअल. वो चिल्लाई लेकिन एक बार बॅलेन्स क्या बिगड़ा कि धडाम से में पीछे को गिर पड़ा. आशा दीदी मेरे उपर उनकी चूत मेरे आकड़े हुए लंड को किस कर रही थी.

उसके 34” के दोनों उभार मेरे सीने में दबे पड़े थे, उत्तेजना के कारण दीदी के निप्पल भी कड़े होकर मेरे सीने में चुभन पैदा कर रहे थे. मेरे दोनों हाथ अभी भी उनकी मस्त गद्देदार गांड पर थे. मुझे पता नहीं चला कि कही चोट-वोट भी लगी है, मैं तो बस उनके मादक शरीर के नीचे पड़ा उनकी आँखों में झाँक रहा था, जिसमें एक निमंत्रण दिखाई दिया. वो भी ऐसे ही कुछ देर मज़े के आलम में खोई रही. रमा दीदी पास में खड़ी खिल-खिला रही थी.

फिर मुझे अपनी पीठ में कुछ चुभता सा महसूस हुआ और मैंने उनसे कहा- अरे दीदी ! उठो मेरी पीठ टूट गयी..!

वो – तो पहले तू मुझे छोड़ तो सही, तभी तो मैं उठुँगी…! तब जाकर मुझे एहसास हुआ कि मेरे दोनों हाथ उसके चुतड़ों पर कसे हुए हैं. जब मैंने उन्हें छोड़ा, तो अपनी चूत को मेरे लंड के ऊपर ज़ोर से रगड़ा और एक मादक सिसकी भरती हुई वो मेरे ऊपर से उठ गयी.

मैं जैसे ही खड़ा हुआ तब मुझे अपनी पीठ में दर्द का एहसास हुआ. क्योंकि जहाँ में गिरा था, वहाँ एक छोटा सा ब्रिक (ईंट) का टुकड़ा पड़ा हुआ था और उस साले ने मेरी पीठ को चटका दिया था.

मैं आहह भरते हुए उठा… तो रमा दीदी बोली – क्या हुआ छोटू..? चोट लग गयी क्या..?

मैं – हां दीदी इस पत्थर से मेरी पीठ टूट गई शायद, तो आशा दीदी ने मेरी शर्ट ऊपर करके अपने हाथ से कुछ देर सहलाया और बोली- रमा घर जाकर थोड़ा आयोडेक्स की मालिश कर देना ठीक हो जाएगा. इसी तरह की चुहलबाज़ियों में समय व्यतीत हो रहा था, मेरी दोनों बहनें मेरे साथ दिनों दिन खुलती जा रही थी और मैं उनकी हरकतों से बुरी तरह उत्तेजित हो जाता था, लेकिन कुछ कर नहीं पाता.

मैंने अभी तक अपने लौडे को हाथ में लेकर सिवाय मुताने के और कोई उसे नहीं किया था. मन ही मन सोचता था, कि काश इसके आगे भी कुछ कर पाता. लेकिन क्या? ये कोई आईडिया नहीं था. मेरा कोई ऐसा दोस्त भी नहीं था जिससे मैं इस तरह की बातें शेयर कर पाता. वो दोनों तो मुझे गरम करके अपना काम निकाल कर अपने रास्ते हो लेती और मैं यूँ ही चूतिया बना रह जाता.

आख़िरकार छुट्टियों के दिन बीत गये और मैंने क्लास 11 में एडमिशन ले लिया. स्कूल शुरू होने के कुछ दिन बाद ही मोहिनी भाभी लौट आई, मतलब बड़े भैया ले आए अपनी ससुराल जाकर. आखिर उनके भी तो लौड़े में खुजली होती ही होगी. भाभी ने आते ही मेरी क्लास ले ली, और वो जो टाइम टेबल बना कर गयी थी, उसके बारे में पूछा जिसे मैं एक आज्ञाकारी शिष्य की तरह ईमानदारी से पालन कर रहा था. उन्होंने मुझे गले से लगा लिया और मेरा माथा चूम कर मुझे अपनी गोद में लिटाया और बीते दिनों का सारा प्यार उडेल दिया.

मैं अकेला स्कूल जाने वाला ही रह गया था, मंझले चाचा के बच्चे तो अपने मामा के यहाँ शहर में रह कर पढ़ रहे थे. और मेरी दीदी समेत वाकी की 12थ तक की पढ़ाई पूरी हो गयी थी. भाभी की प्रेग्नेन्सी को जैसे-जैसे दिन बढ़ रहे थे, उनके शरीर में कुछ ज़्यादा ही बदलाव दिखने लगे थे, उनके वक्ष और कूल्हे एक दम अपोजिट साइड को बाहर निकलते जा रहे थे.

यही नहीं, वो दिनों दिन बोल्ड भी होती जा रही थी. एक दिन मालिश करते-करते भाभी ने मेरी हालत बहुत खराब कर दी. ना जाने आज उनको क्या सूझी की अपनी साड़ी उतार कर एक तरफ रख दी, और मात्र ब्लाउज और पेटीकोट में मेरे लौड़े के ऊपर अपनी उभरी हुई गांड टिका कर मेरे सीने पर मालिश करने लगी. आगे-पीछे होते हुए उनकी गांड मेरे लंड पर रगड़ा दे रही थी, जिसकी वजह से मेरे लंड महाराज बुरी तरह अकड़ गये, फिर तो उसकी ऐसी रेल बनी कि पुछो मत.

उधर ब्लाउज में कसे उनके बूब्स बिल्कुल मेरी आँखों के सामने थे जो झटकों के साथ उछल-उछल कर बाहर को निकलने पर आमादा दिखाई दे रहे थे. फिर भाभी मेरे ऊपर ही पसर गयी और उन्होंने मेरे होंठ अपने होंठों में भर लिए, मुझे बड़ा अजीब लगा कि ये कर क्या रही हैं, जिंदगी में पहली बार किसी ने मेरे होंठों को चूमा था. यही नहीं, वो अपनी कमर को लगातार ज़ोर-तेज़ मेरे लंड पर घिसने लगी.

15 मिनिट में उन्होंने मेरी हालत बैरंग कर दी, उनका मुँह लाल हो गया, बदन भट्टी की तरह तप रहा था, मानो बुखार चढ़ गया हो. फिर अचानक ही वो शांत पड़ गयी और कुछ देर बाद मेरे ऊपर से उतर कर अपनी साड़ी उठाई और नीचे भाग गयी. मैं बड़ा असमंजस में पड़ गया और सोचने लगा कि शायद भाभी को कहीं बुखार तो नहीं आ गया, जिसकी वजह से वो ऐसी हरकत कर रही थी. इधर मेरा बुरा हाल था, मेरा मन कर रहा था, कि अपने लंड को कच्छे से बाहर निकल लूँ और ज़ोर-ज़ोर से हिलाऊँ, उसे सहलाऊँ…!

आखिरकार मैंने आज पहली बार उसको बाहर निकाल ही लिया और ज़ोर-ज़ोर से मसलने लगा. इधर जैसे ही मेरे लंड के टोपे की खाल ऊपर को खिंची, मुझे बेहद दर्द का भी एहसास हुआ. लेकिन मन करे कि तेज़ इसको रगड़ूं, मसलूं. अभी मैं इसी कश्मकश में था कि क्या और कैसे करूँ कि अचानक भाभी की आवाज़ सुनाई दी.

भाभी - अंकुश!..... ये क्या हो रहा है..?

मैंने गर्दन घुमाकर देखा, तो भाभी जीने की सबसे उपरी सीढ़ी पर अपनी कमर पर हाथ रखे खड़ी थी. मेरी तो गांड ही फट गयी, इधर मेरा लंड फुल अकड़ में था. मैंने झट से उसे अपने पेट की तरफ लिटाया और अपने शॉर्ट को ऊपर की तरह खींच कर एलास्टिक छोड़ दी. चटकककक! शॉर्ट की टाइट एलास्टिक लंड के ठीक टोपे पर जहाँ उसकी स्किन का जॉइंट था वहाँ पड़ी. अरईईई…..मैय्आआआआअ………मररर्र्र्र्र्र्र्ररर…..गय्आआ……..रीईईईईईईईईईई. दर्द के मारे मेरी हालत पतली हो गयी और में करवट लेते हुए, अपने घुटनों को पेट पर मोड़ कर लोट-पोट होने लगा…!

मुझे दर्द से तड़पता देख भाभी दौड़ कर मेरे पास आई, और मेरे सर के पास बैठ, हाथ फेरते हुए बोली – क्या हुआ मेरे राजा मुन्ना को, बताओ मुझे… क्या हुआ..?

मेरे मुँह से कोई शब्द ही नहीं निकल पा रहे थे. मैं लगातार कभी करवट से हो जाता तो कभी पीठ के बल, मेरे घुटने मुड़े ही हुए थे. मेरी आँखों से पानी निकल आया. तेज दर्द की लहर मेरी जान ही निकाले दे रही थी. भाभी मेरे सर को लगातार सहलाए जा रही थी और बार-बार पूछने की कोशिश कर रही थी कि आख़िर मुझे हुआ क्या है..? जब थोड़ा दर्द में राहत हुई और मेरा चीखना कम हो गया तो उन्होंने फिर से पूछा… देखो अंकुश मुझे बताओ… क्या हुआ है तुम्हें..?

आह्ह्ह्ह…. भाभी मेरे पेट में बहुत तेज दर्द है… मैंने बात को छिपाने की कोशिश करते हुए कहा. मैं नहीं चाहता था कि भाभी को पता चले कि मैं क्या कर रहा था..?

भाभी – देखो झूठ मत बोलो,… पेट दर्द में कोई ऐसा नहीं बिलबिलाता है… सच-सच बताओ… शरमाओ नही… कहीं कुछ बड़ी प्राब्लम हो गयी तो लेने के देने पड़ जाएँगे…

दरअसल उन्होंने मुझे वो करते हुए तो देख ही लिया था, तो प्राब्लम भी कोई उसी से रिलेटेड होगी. इसलिए वो जानना चाहती थी.

मैं – नहीं भाभी सच में मेरे पेट में ही दर्द है.. मैंने फिर से छिपाने की कोशिश की.

भाभी थोड़ा बनावटी गुस्सा अपने चेहरे पर ला कर बोली – अंकुश..! मुझे तुमसे ये उम्मीद नहीं थी कि मुझसे तुम कोई बात छिपाओगे…!

सच बताओ क्या बात है. कहीं कुछ ज़्यादा प्राब्लम हो गयी तो सब मुझे ही दोष देंगे, कैसी भाभी है ये? बिन माँ के बच्चे का ख्याल भी नहीं रख सकी. क्या तुम चाहते हो कि तुम्हारी भाभी किसी से बात करने लायक ना रहे?

अब मेरे पास सच बताने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा था… उन्होंने इमोशनली मुझे फँसा दिया था. मेरा दर्द भी अब जा चुका था तो मैं उनकी गोद में अपना सर रख कर बोला – भाभी मेरी सूसू मेरे शॉर्ट की एलास्टिक से दब गयी थी. बस और कुछ नहीं.

भाभी – लेकिन तुम ऐसा क्या कर रहे थे जो तुम्हारी सूसू दब गयी? और इतनी ज़ोर से कैसे दबी कि इतना दर्द हुआ…?

मैं – जाने दो ना भाभी..! अब सब ठीक है..!

भाभी – तो तुम मुझे सच-सच नहीं बताओगे.. हां! कोई बात नहीं, आज के बाद मेरे से कभी बात मत करना और उन्होंने मेरा सर अपनी गोद से उठा दिया और उठ कर जाने लगी. मैंने उनका हाथ पकड़ लिया और बोला – मैं सब सच बताता हूँ. लेकिन प्लीज़ भाभी मुझसे नाराज़ मत हो. वरना मैं कैसे जी पाऊंगा…?

उन्होंने लाड़ से मुझे अपने सीने में दबा लिया. उनके मुलायम दूध मेरे मुँह पर दब गये. कुछ देर बाद उन्होंने मुझे अलग किया और मेरा माथा चूमकर मेरी ओर देखने लगी…!

मैं – भाभी जब आप मालिश कर रही थी, तो आपके चुतड़ों की रगड़ से मेरी सूसू अकड़ने लगी. मेरे अंदर उत्तेजना बढ़ने लगी जो निरंतर बढ़ती ही गयी. जब आप उठकर चली गयी तो लाख कोशिश के बाद भी मैं अपने आप को रोक ना सका और अपनी लंड को बाहर निकाल कर मसलने लगा. लेकिन आपकी आवाज़ सुन कर मैंने जल्दबाज़ी में उसको छुपाना चाहा और झटके से एलास्टिक छूट कर उसके ऊपर लगी. भाभी कुछ देर चुप रही, और मेरे मासूम चेहरे की ओर देखती रही.फिर ना जाने क्या सोचकर वो मुस्कराने लगी और मेरे नंगे बदन पर हाथ फेरते हुए बोली – लाओ दिखाओ तो मुझे… क्या हुआ है वहाँ…?

मैंने शर्म से अपने घुटने जोड़ लिए ताकि भाभी कहीं जबरदस्ती मेरे शॉर्ट को ना खींच दें और बोला – नहीं भाभी ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है. अब दर्द भी नहीं हो रहा आप रहने दो..!

वो अपनी आँखें तरेर कर बोली – तुम अभी बच्चे हो, अभी दर्द नहीं है तो इसका मतलब ये तो नहीं हुआ कि सब कुछ सही है, कही अंदरूनी चोट हुई तो बाद में परेशान कर सकती है. देखो ये शर्म छोड़ो और मुझे देखने दो. फिर उन्होंने मुझे लिटा दिया और मेरे शॉर्ट को नीचे करने लगी. मैंने एक लास्ट कोशिश की और उनके हाथ पकड़ लिया. उन्होंने एक हाथ से मेरा हाथ हटा दिया और मेरा शॉर्ट नीचे खिसका कर घुटनों तक कर दिया.

भाभी - हइई… दैयाआआआ.. ये क्या है अंकुश…? मेरा लंड देखकर उनका मुँह खुला का खुला रह गया और अपने खुले मुँह पर हाथ रख कर वो कुछ देर तक.. टक-टॅकी लगाए वो मेरे लंड की सुंदरता को देखती रह गयी..!

मैं – क्यों क्या हुआ भाभी…? ये मेरा सूसू ही तो है…!

भाभी - हे भगवान..! तुम इसे अभी भी सूसू ही समझ रहे हो..? ये तो पूरा मस्त हथियार हो गया है. फिर वो उसकी जड़ को अपनी मुट्ठी में पकड़ कर इधर-उधर घुमा फिरा कर देखने लगी. जब उन्होंने मेरे टोपे की खाल को पीछे करने की कोशिश की तो वो बस अपना घूँघट की खोल पाया कि मुझे दर्द होने लगा.

मैं – अह्ह्ह्ह… भाभी नहीं… खोलो मत… दर्द होता है.

जब भाभी ने सुपाड़े के पीछे देखा तो मेरी खाल के होल से कोई आधा-पोना इंच नीचे ही जुड़ी हुई थी, जिसे खींचने पर दर्द होने लगता था.

भाभी – अंकुश! तुम्हारा हथियार तो अभी तक कोरा ही है. कभी कुछ किया नहीं इससे..?

मैं – हां ! रोज़ ही करता हूँ…. पेशाब..!

भाभी – खाली पेशाब?.... और कुछ नहीं..?

मैं – नहीं..! और भी कुछ होता है इससे..?

भाभी – हां अंकुश! और बहुत कुछ होता है.. लेकिन ताज्जुब है..! जब तुमने और कुछ भी नहीं किया है अब तक… तो फिर ये इतना लंबा और मोटा कैसे हो गया…?

मैं क्या जानू… ? मैंने जवाब दिया तो

भाभी बोली – तो फिर अभी क्यों हिला रहे थे..?

मैं – सच कहूँ भाभी.. आप जब भी मालिश करती हो और आपका बदन इससे रगड़ा ख़ाता है… तो मैं इतना उत्तेजित हो जाता हूँ कि कुछ पुछो मत… और जी करने लगता है की इसको मसल डालूं…, कुचल कर रख दूं.. लेकिन दर्द की वजह से कुछ कर नहीं पाता….! पर आज आपने इसे ज़्यादा ही रगड़ दिया तो मुझसे रहा नहीं गया और वो करने लगा…

मेरा लंड अभी भी ज्यों का त्यों सोता सा एकदम 90 डिग्री पर खड़ा भाभी की मुट्ठी में क़ैद था. उन्होंने उसको थोड़ा खोल कर उसके पेशाब वाले छेद को अपनी उंगली से सहला दिया और बोली – तो अब कैसा लग रहा है..?

मैं – सीईईईई…. आहह.. भाभी ये सब मत करो… वरना ये फट जाएगा.

भाभी – तो इसको शांत कैसे करोगे अब…?

मैं – पता नहीं भाभी इसके पहले ये इतना कभी नहीं फूला था.. आज तो हद ही हो गयी है और अब आपका हाथ लगते ही तो और हालत खराब हो रही है…अह्ह्ह्ह…प्लीज़ भाभी कुछ करो ना ! प्लीज़…… वरना में कुछ कर बैठूँगा…!

भाभी – अच्छा.. अच्छा.. शांत रहो.. ! मैं कुछ करती हूँ, और फिर उसे हिलाने लगी, धीरे-धीरे बड़े एहतियात से उसको आगे पीछे करने लगी ताकि उसकी स्किन ज़्यादा ना खिंच जाए. मज़े में मेरे मुँह से आहह….उउउहह…और जल्दीीई.. ऐसी आवाज़ें निकलने लगी… और वो उनकी मुट्ठी में और ज़्यादा फूलने लगा… उसकी नसें उभर आईं.

भाभी की भी एक्साइटमेंट बढ़ने लगी, और किसी सम्मोहन सी शक्ति उनके चेहरे को मेरे लंड के नजदीक और नजदीक खींचने लगी. अब भाभी की गरम साँसें मेरे लंड पर महसूस हो रही थी. उत्तेजना में मेरे कान तक लाल हो गये थे. आखिरकार उनके होंठों ने मेरे अधखुले सुपाड़े को छू ही लिया. उफफफफफफफफफफफ्फ़…… मैं तो जैसे स्वर्ग में ही उड़ने लगा… उनके होंठों के स्पर्श होते ही मुझे एक सुकून सा मिला, और उनके रसीले होंठ उसको अपनी क़ैद में लेते चले गये. देखते-देखते उनके होंठों ने मेरे पूरे 3” लंबे सुपाड़े को जो दहक कर लाल शिमला के सेब जैसा दिख रहा था गडप्प कर लिया. एक ठंड सी पड़ गयी मेरे लंड में, जैसे किसी गरम चीज़ को एक साथ पानी में डाल दिया हो. उनकी जीभ मेरे पी होल पर गोल-गोल घूम रही थी. आनंद के मारे मेरी आँखें बंद हो चुकी थी और कमर थरथराने लगी. भाभी मेरे लंड को अंदर और अंदर अपने मुँह में लेती जा रही थी, लेकिन खूब कोशिश करके वो उसे करीब आधा ही ले पाई और उतने पर ही अपने होंठों से मालिश देने लगी. भाभी मेरे बगल में ही उकड़ू बैठी थी, लंड को अंदर-बाहर करते समय उनके मस्त मुलायम बूब्स मेरे पेट और कमर पर रगड़ खा रहे थे.

लंड का जड़ वाला हिस्सा अभी भी भाभी की मुट्ठी में ही था और वो मुँह के साथ-साथ अपने हाथ से भी उसे मसलती जा रही थी. 20-25 मिनिट की चुसाई के बाद भी मेरा कुछ नहीं हुआ तो भाभी ने अपना मुँह हटाया और मेरी ओर देख कर बोली – कुछ हुआ कि नहीं…?

मैं – बहुत अच्छा लग रहा है भाभी… प्लीज़ रूको मत ऐसे ही करती रहो..!

भाभी – तुम्हें तो मज़ा आ रहा है.. लेकिन मेरा तो मुँह दुखने लगा, और तुम्हारा माल अभी तक नहीं निकला.

फिर वो मेरी कमर के नीचे की साइड में आकर बैठ गयी और फिर से अपने मुँह में लेकर चूसने लगी, अब साथ-साथ उनकी उंगलियाँ मेरे टट्टों से खेल रही थी. मेरा तो मज़ा ही दुगना हो गया और मैं अपनी कमर उचका-उचका कर उनके मुँह में लंड पेलने की कोशिश करने लगा. अब भाभी जल्दी से जल्दी मेरा पानी निकालना चाहती थी, क्योंकि उनका मुँह दर्द करने लगा था, बीच-बीच में वो अपना एक हाथ अपनी चूत के पास ले जाती और ऊपर से उसको सहला देती. अब वो मेरे टट्टों और गांड के होल के बीच की जगह पर नाख़ून से खुरचने लगी. ऐसा करने से मेरे उस जगह पर करंट जैसा लगा और मुझे उस जगह से कुछ उठता सा महसूस होने लगा.

मैंने भाभी के सर पर हाथ रखा और तेज़-तेज़ अपनी कमर उचका कर अपना ज़्यादा से ज़्यादा लंड उनके मुँह में ठूंस दिया उनका गला चोक हो गया, में दनादन धक्के मारकर उनके सर को दबाए हुए था. वो मेरे हाथों को हटाने की जी तोड़ कोशिश कर रही थी, लेकिन अब में अपने होश-हवास खो चुका था, फिर कुछ ऐसा हुआ मानो मेरे टट्टों से कोई बिजली सी दौड़ती हुई मेरे लंड में प्रवेश कर रही हो और मैं उनका सर अपने लंड पर कसकर पिचकारी छोड़ने लगा. मुझे लगा जैसे कोई गरम लावा जैसा मेरे लंड से निकल कर भाभी के मुँह में भर रहा हो. दो मिनिट तक दे दना दन पिचकारी मारने के बाद मैंने अपना हाथ उनके सर से हटाया और अपनी कमर को फर्श पर लैंड करा दिया…..!!

झट से उन्होंने अपना सर ऊपर किया. फलफला कर ढेर सारी मलाई जैसी उनके मुँह से निकल कर मेरे पेट पर गिरी, उनका मुँह लाल सुर्ख हो रहा था. वो खांसने लगी, फिर भागते हुए छत पर लगे नल से पानी लेकर मुँह साफ किया.

मैं बैठ कर उन्हें ही देख रहा था, मुँह साफ करके वो वापस लौटी और एक प्यार भरी धौल मेरी पीठ पर जमाई और बोली – जंगली कहीं के! मेरी दम निकालना चाहते थे..? हां!... पता है! मेरी साँसें बंद होने लगी थी.

मैं – सॉरी भाभी वो मैं … मुझे… होश ही नहीं रहा…

भाभी मुस्करा के बोली… मैं समझ सकती हूँ.. अच्छा ये बताओ अब कैसा लग रहा है.. कुछ हल्का फील हुआ या नहीं?

मैं – हां भाभी! थैंक्स! अब मेरी उत्तेजना कुछ कम हो गयी है.

भाभी – लेकिन तुम्हारा ये हथियार तो ज्यों का त्यों खड़ा है, जाओ बाथरूम में जाकर कुछ देर इसपर ठंडा पानी डाल लो.

आज पहली बार मुझे पता चला कि लंड से पेशाब के अलावा और भी कुछ निकलता है, जो इतना आनंद देता है. अब तो मैं अपने हाथ से भी उस मज़े को लेने की कोशिश करने लगा, लेकिन वो मज़ा नहीं मिला जो भाभी के चूसने से मिला था. फिर एक दिन बाथरूम में खड़ा मैं अपने लंड को सहला रहा था कि भाभी ने देख लिया और वो डाँट पिलाई कि पुछो मत.

जब मैंने कारण पूछा तो वो समझाने लगी – अंकुश देखो ये रोज़-रोज़ की आदत मत लगाओ. ठीक नहीं है, इससे तुम्हारा शरीर कमजोर होने लगेगा, हो सकता है कोई बीमारी भी लग जाए. कभी-कभी कर लेने में कोई बुराई नहीं है, पर हाथ से नहीं. हाथ से करने को मूठ मारना बोलते हैं और लिमिट से ज़्यादा मूठ मारने से इसकी (लिंग) नसें कमजोर पड़ जाती हैं.., यहाँ तक कि आदमी नामर्द भी हो जाते हैं, और शादी के बाद वो किसी काम के नहीं रह पाते.

मैंने पूछा कि भाभी तो और कौन-कौन से तरीके हैं उस आनंद को लेने के?

तो वो मुस्कराईं और बोली – अंकुश तुम तो आज ही सब कुछ जानना चाहते हो..! फिर कुछ सोच कर वो बोली – उस दिन मैंने जिस तरह से तुम्हें रिलीस किया था उसको मुख मैथुन (ब्लोजॉब) कहते हैं. असल में तो वो भी सही तरीका नहीं है.

मैं – तो सही तरीका क्या है, भाभी…?

भाभी – मर्द और औरत के बीच संभोग ही सही तरीका होता है, जो प्राकृतिक माना जाता है.. लेकिन उसके लिए अभी तुम्हारी उमर नहीं हुई है, तुम्हारे लिंग की स्किन जो जुड़ी हुई है ना वो भी तभी अलग होगी जब तुम किसी के साथ ये सब करोगे लेकिन गलती से भी किसी के साथ ऐसे वैसे संबंध बनाने की कोशिश भी मत करना… वरना…! मुझसे बुरा कोई नहीं होगा..! जब भी वो समय आएगा, मैं खुद तुम्हारी मदद करूँगी.

मेरे अपरिपक्व दिमाग़ में कुछ पल्ले पड़ा कुछ नहीं, पर मैं इतना ज़रूर समझ गया, कि भाभी मेरी सब जायज़, नाजायज़ ज़रूरतों का ख्याल रखती हैं, और जब जिस काम की ज़रूरत होगी वो ज़रूर करेंगी. मैं अपनी पढ़ाई में जुट गया. समय निकलता रहा, भाभी की प्रेग्नेन्सी का समय नजदीक आता जा रहा था, अब उनका पेट काफ़ी बड़ा हो गया था. मैं उनके पेट पर हाथ फेरकर उनको चिढ़ाया करता, कभी उनके पेट पर कान लगाकर बच्चे से बात करता. छोटी चाची, समय-समय पर भाभी की देख भाल कर देती.

आखिरकार वो समय आ गया और भाभी ने एक प्यारी सी गुड़िया को जन्म दिया. सभी बहुत खुश थे उस नन्ही परी के आने से जिसका नाम मैंने रूचि रखा.

कुछ दिनों बाद मेरे एग्जाम भी हो गये, और अब में एक बार फिर बोर्ड की क्लास में पहुँच गया था. उधर कृष्णा भैया ने ग्रेजुएशन के फाइनल के साथ पी.सी.एस. के एग्जाम भी दे दिए थे, और उनका सेलेक्शन होना लगभग तय था. रमा दीदी ने फर्स्ट ईयर प्राइवेट से क्लियर कर लिया था, लेकिन प्रेग्नेन्सी की वजह से भाभी एग्जाम नहीं दे पाई, जिसका उनको मलाल था. लेकिन वो जिंदगी के अहम एग्जाम में तो पास हो ही चुकी थी. कुछ दिनो के बाद मँझले भैया का पी.सी.एस. का रिज़ल्ट आ गया, रैंक के हिसाब से उनको डीएसपी की पोस्ट के लिए सेलेक्ट किया गया था, अब उन्हें कुछ महीनों के लिए ट्रेनिंग पर जाना था. मेरा इस साल बोर्ड था, सभी को मेरे भविष्य की चिंता थी, सो स्कूल के पहले दिन से ही सब का अटेन्षन मेरे ऊपर ही था.

उस दिन संडे था, दोनों बड़े भाई भी घर आए हुए थे, कल मंझले भैया को ट्रेनिंग के लिए निकलना था, घर में थोड़ा मिल बैठ कर खाने का प्रोग्राम रखा था. हमारे परिवार में मेरे यहाँ ही मिक्सर था, जो बड़े भैया की शादी में आया था, और इस समय वो छोटी चाची के यहाँ था, वो किसी काम के लिए ले गयी थी उसे. वैसे तो चाची को भी हमारे घर ही आना था, लेकिन थोड़ा काम जल्दी हो जाए तो भाभी ने मुझे कहा – अंकुश! छोटी चाची के यहाँ से अपना मिक्सर तो ला दो ज़रा, कुछ नारियल वग़ैरह की चटनी भी बना लेंगे.

छोटे चाचा का घर भी बगल में ही था, उन्होंने अपने हिस्से में अपनी ज़रूरत के ही हिसाब से दो कमरे और एक छोटा सा किचन मेन गेट के साथ ही बना रखे थे, बाकी की ज़मीन में ऊँची सी बाउंड्री से कवर कर रखा था. बाउंड्री की पीछे की दीवार पर छप्पर डाल कर गाय-भैंस के लिए जगह कर रखी थी उसी के साथ में चारा काटने की मशीन लगा रखी थी जो एक सिंगल फेज़ की मोटर से चल जाती थी.

मैं चाची के घर पहुँचा तो उनका गेट अंदर से बंद था, मैंने गेट खटखटाया, तो अंदर से चाची की आवाज़ आई… कौन है…?

मैं हूँ चाची… मैंने जवाब दिया तो वो बोली – रूको अंकुश, अभी गेट खोलती हूँ.

थोड़ी देर बाद जैसे ही गेट खुला, सामने चाची को देख कर मेरी आँखें फटी रह गयी… मुँह खुला का खुला रह गया और मैं फटी आँखों से उन्हें देखता ही रह गया…. सामने चाची मात्र एक पेटीकोट में जो उनकी पहाड़ की चोटियों जैसी चुचियों पर सिर्फ़ लपेटा हुआ था और वो उसे एक हाथ से पकड़े हुए थी, वही पेटीकोट नीचे उनके घुटनों से भी 2”-3” ऊपर तक ही आ रहा था और उनकी गोल-गोल खंबे जैसी मांसल जांघें दिखाई दे रही थी. गेट खोलते ही वो मुझे देख क मुस्कराईं और बोली:

आओ छोटू..! और इतना कह कर पलट गयी.. अब उनकी हाहाकारी गांड मेरी आँखों के सामने थी. उनकी गांड पीछे को इतनी उभरी हुई थी कि, कमर के कटाव पर अगर कोई तौलिया रख दिया जाए तो गारंटीड वो गिर नहीं सकता. ऊपर से आगे को खिंचा हुआ पेटीकोट.. लगता था गांड के प्रेशर से कहीं फट ना जाए… कसे हुए पेटीकोट में उनकी गांड ऐसी लग रही थी मानो दो बड़े वाले तरबूज फिट हो रहे हों… दोनों के बीच की दरार तरबूजों की कसावट की वजह से बहुत ही कम दिखाई दी मुझे.

चाची अपनी तरबूजों को मटकाते हुए अपने बाथरूम की ओर चल दी जो किचन के साइड से मात्र 3 फीट की तीन तरफ से ओट सी लगाकर नहाने-धोने के लिए बना रखा था. उनके मटकते हुए कूल्हे ऐसे लग रहे थे, मानो एक दूसरे से शर्त लगा रहे हों… “कि मैं बड़ा कि तू..?” अब रहने वाले दो ही तो प्राणी थे.., शादी के 10 साल बाद भी इतनी उपजाऊ ज़मीन से भी चाचा कोई फसल नहीं काट पाए थे. चाची की इस जान मारु गांड को देख कर मेरा लंड फड़कने लगा. अब कुछ दिन पहले ऐसा कुछ हुआ होता तो शायद मेरे लिए ये नॉर्मल बात होती, लेकिन अब भाभी ने मेरे नाग से जहर निकाल कर ये जता दिया था, कि नारी का बदन क्या, क्यों और किसलिए होता है..?

वो अपनी लंड फाड़ू गांड को मटकाते हुए बाथरूम की ओर बढ़ते हुए बोली – और बताओ अंकुश, कैसे आना हुआ..?

मैं हड़बड़ा कर बोला – वो चाची… वो..वो.. भाभी ने.. वो मिक्सर लाने के लिए बोला है…

चाची – अच्छा हां ! तुम थोड़ी देर बैठो.. उसके जार को साफ करना है अभी.. मैं थोड़ा नहा लेती हूँ.. उसके बाद साफ करके दूँगी..

मैं वहीं आँगन में पड़ी चारपाई पर पैर लटका कर बैठ गया, और कनखियों से उनके बाथरूम की तरफ देखने लगा. चाची बैठ कर नहा रही थी, उनके सर के बाल मुझे दिख रहे थे. वो मुझसे बातें भी करती जा रही थी नहाने के साथ-साथ. करीब 10 मिनिट में ही उनका नहाना हो गया और वहीँ पर रखे उनके दूसरे पेटीकोट को उन्होंने बैठे-बैठे ही उठाया और अपने सर के ऊपर से अपने शरीर पर डाल लिया, फिर वहीं रखी ब्रा उठाई और उसे पहनने लगी.

मैं अभी भी चोर नज़रों से उधर ही देख रहा था.. अचानक वो उठ खड़ी हुई, उनका पेटीकोट ठीक वैसे ही था जो नहाने से पहले वाला था.. उनकी कमर से ऊपर का हिस्सा मुझे दिख रहा था.

उन्होंने मुझे आवाज़ दी – ओ अंकुश! ज़रा इधर तो आना.

मैं उठकर उनके पास पहुँचा, इस समय उनके गीले बदन से वो पेटीकोट भी जगह-जगह गीला होकर उनके बदन से चिपका हुआ था. गीले कपड़े से उनके शरीर का रंग तक झलक रहा था. उन्होंने पेटीकोट के ऊपर से ही वो ब्रा जिसकी स्ट्रिप्स अपने कंधों पर चढ़ा कर आगे अपने स्तनों पर पकड़ रखी थी, और उसकी पट्टियाँ जिनको पीछे लेजा कर हुक करते हैं, वो साइड्स से झूल रही थीं.

मैं उनके ठीक पीछे जा खड़ा हुआ और बोला – जी चाची .. बताइए क्या काम है..?

चाची – अरे अंकुश ! देखो ना ये मेरी ब्रा थोड़ी टाइट हो गयी है, बहुत कोशिश की लेकिन मैं अपने हाथ से इसके हुक नहीं लगा पा रही, थोड़ा तुम लगा दो ना!

मैंने उनके दोनों ओर झूल रही ब्रा के स्ट्रैप्स को पकड़ा.. तो मेरे हाथ उनके गीले नंगे कांख से टच हो गये. मेरे लंड ने एक फिर ठुमका मारा...! फिर उन्होंने पेटीकोट को ब्रा के नीचे से निकाल कर हाथों में पकड़ लिया और उसको कमर में बाँधने के लिए अपनी नाभि जो किसी बोरिंग के गड्ढे की तरह दिख रही थी… तक ले गयी, अब एक हाथ उनका आगे दोनों चोटियों के ऊपर से ब्रा को थामे था, और दूसरे में पेटीकोट पकड़ा हुआ था…. मैंने दोनों तरफ की स्ट्रैप को खींच कर पीछे उनकी पीठ पर लाया.. मेरी दोनों हथेलियाँ चाची की नंगी पीठ पर धीरे-धीरे फिसल रही थीं…

ना जाने ये कैसी उत्तेजना थी मेरे शरीर में की मेरे हाथ काँपने लगे….

ब्रा वाकई में कुछ ज़्यादा ही टाइट थी, उनके हुक के होल जो धागे के बने हुए थे, उनमें हुक डालने में मुझे बड़ी दिक्कत आ रही थी…

अरे ! खड़े-खड़े क्या कर रहे हो अंकुश, जल्दी डालो ना.. चाची की आवाज़ सुन कर मेरे हाथ और ज़्यादा काँपने लगे….

मैंने स्ट्रैप को और थोड़ा खींच कर उनके होल के मुँह तक हुक लाकर छोड़ दिए. चाची को लगा कि अब तो हुक लग ही जाएगा, सो उनका वो हाथ जो ब्रा को आगे से संभाले हुए था, वो भी अब पेटीकोट के नाडे को बाँधने के लिए नीचे कर लिया था...! जैसे ही मैंने हुक को उसके होल में छोड़ा, वो साला होल में जाने की बजाय बाहर से ही स्लिप हो गया… नतीजा… चाची की ब्रा किसी स्प्रिंग लगे गुड्डे की तरह उछल कर उनके सामने ज़मीन पर टपक गयी…

फ़ौरन चाची ने अपना एक हाथ अपनी बड़ी बड़ी चुचियों पर रख लिया…और वो उन्हें ढकने की नाकाम कोशिश करती हुई बोली – क्या अंकुश… ऊँट से हो गए हो और एक छोटा सा काम नहीं होता तुमसे.

मैंने मरी सी आवाज़ में कहा – मैंने पहले कभी डाला नहीं हैं ना चाची.. तो..

चाची – क्या नहीं डाला अभी तक..?

मैं – व.व.उूओ.. हुक कभी होल में नही…. डॅलाया.. सॉरी चाची..

चाची सामने पड़ी ब्रा उठाने के लिए आगे को झुकी, नाडे पर उनके हाथ की पकड़ कम हो गयी और जिस हाथ से उन्होंने अपनी चुचियाँ ढक रखी थी उसी हाथ से ब्रा उठाने लगी. तीन काम एक साथ हुए. एक गांड पर से उनका पेटीकोट थोड़ा नीचे को सरक गया और उनकी गांड की दरार का उपरी हिस्सा मेरी आँखों के सामने उजागर हो गया, दूसरा झुकने की वजह से उनकी गांड की दरार ठीक मेरे अकडे हुए लंड पर टिक गयी, और उसकी लंबाई दरार के समानांतर होकर वो एक तरह दरार में सेट हो गया. तीसरा उनकी नंगी गोल-मटोल बड़ी-बड़ी चुचियाँ, नीचे को झूल गयी जो मुझे साइड से दिखाई दे रही थी.

मेरी उत्तेजना चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी…, शरीर जुड़ी के मरीज की तरह काँपने लगा. लेकिन ना तो मैंने पीछे हटने की कोई कोशिश की और ना चाची ने मुझे हटने को कहा. ब्रा को उठा कर उन्होंने अपनी गांड को और थोड़ा पीछे को झटका देकर एक फुल लंबाई का रगड़ा मेरे लंड पर मारा और खड़ी हो गयी.

फिर उन्होंने अपनी ब्रा को वैसे ही अपनी चुचियों के ऊपर रख कर उसी पोज़िशन में रह कर बोली – अंकुश तुम जाओ यहाँ से.. तुम्हारे बस का कुछ नहीं है.. वैसे ही पहाड़ हो रहे हो, एक हुक तक नहीं लगा सकते…

मैं – पर चाची वो मिक्सर??

चाची – मैं अपने साथ लेकर आती हूँ, तुम जाओ.. और हां ! ये बातें किसी से कहना मत.. समझ गये…

मैं हां में अपना सर हिलाकर, अपनी गर्दन झुकाए वहाँ से लौट आया लेकिन आँखों में अभी भी वही दृश्य (सीन) घूम रहे थे. सोच-सोच कर मेरा लंड कच्छे में उछल कूद मचाए हुए था, मैं जितना उसको दबाने की कोशिश करता वो उतना ही उछलने लगता. ऐसी हालत में घर जाना मैंने उचित नहीं समझा, और मैं खेतों की ओर बढ़ गया.

एक झाड़ी के पीछे जाकर पेशाब की धार मारी, मामला कुछ हल्का हुआ. तो मैं घर लौट लिया. उस घटना के बाद मेरी हिम्मत नहीं होती चाची से नज़रें मिलाने की, लेकिन इसके ठीक उलट वो हर संभव प्रयास करती रहती मेरे पास आने का, मुझे लाड करने के बहाने अपने से चिपका लेती, कभी-कभी तो मेरे मुँह को अपने बड़े-बड़े स्तनों के बीच में डाल कर दबाए रखती. मैं उनकी हरकतों से उत्तेजित होने लगता लेकिन उन्हें अपनी तरफ से टच करने की भी हिम्मत नहीं जुटा पाता. कुछ दिनों से चाची के मेरे प्रति आए बदलाव को भाभी ने नोटिस किया, लेकिन ये बात उन्होंने अपने तक ही रखी.
Gaon me aksar is tarih ke incidents hote hain . Maine apni ghar ki kai aurton aur ladkiyon ko nahate dekha hai. Nahar par to ham sabhi bhai behan sath me nahane jate the.
 
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Premkumar65

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UPDATE 7

एक दिन सुबह-सुबह की मखमली धूप में छत पर वो अपनी बेटी की मालिश कर रही थी, मैं भी उनके पास ही बैठा था, रूचि के सो जाने के बाद उन्होंने मेरे से कहा, चलो अंकुश तुम भी अपनी शर्ट उतार दो, लगे हाथ तुम्हारी भी मालिश कर देती हूँ.

अपनी शर्ट उतार कर मैं भी वहीं लेट गया, नीचे पाजामा पहना हुआ था, तो भाभी बोली – ये पाजामा पहन कर मालिश कराओगे इसे भी उतारो.

मैं – लेकिन भाभी नीचे में खाली फ्रेंची ही पहने हूँ.

भाभी – तो अब मेरे से भी शर्म आ रही है, मैं तो तुम्हारा सब कुछ देख चुकी हूँ.

मैंने हिचकते हुए अपना पाजामा भी निकाल दिया और मात्र फ्रेंची में लेट गया.

भाभी ने कहा – पलट जाओ, पहले पीठ की मालिश करती हूँ, फिर आगे करा लेना.

मैं पेट के बल लेट गया, भाभी मेरी पीठ की मालिश अच्छे से रगड़ा लगा कर करने लगी, जब उन्होंने मेरी कमर पर दबाव डालकर मालिश की तो लंड भाई को तकलीफ़ होने लगी, और वो घुड़कने लगा. दरअसल, अकड़ तो वो भाभी के टच करते ही गया था, पर जब कमर पर दबाव पड़ा तो हालत और खराब होने लगी. जब पीछे की मालिश हो गयी, तो उन्होंने मुझे सीधे लेटने को कहा.

भाभी मेरे सीने की मालिश करने लगी, लेकिन उनकी नज़र मेरे लंड पर ही थी, जिसने बेचारी छोटी सी फ्रेंची को ऐसे उठा रखा था, जैसे डब्ल्यू डब्ल्यू ई के कोर्ट में बिग शो सामने वाले फाइटर को अपने हाथों पर टाँग लेता है.

अंकुश! रश्मि चाची के बारे में तुम्हारा क्या ख़याल है..? भाभी ने अचानक ये सवाल दागा. नज़रें उनकी अभी भी मेरे कच्छे पर ही लगी थी.

मैं समझा नहीं भाभी… किस बारे में ..? मैंने उल्टा सवाल किया.

भाभी – आजकल वो तुम्हें कुछ ज़्यादा ही लाड़ करने लगी हैं.

मैं – हां! मैंने भी फील किया है… लेकिन इसमें मेरा ख़याल क्यों पूछा आपने..?

भाभी – नहीं! मेरा मतलब है. जब वो तुम्हें इस तरह से लिपटा चिपटा कर प्यार जताती हैं, तो तुम्हें क्या फील होता है..? आइ मीन कैसा फील करते हो..?

मैं तुरंत ही कोई जवाब नहीं दे पाया, और चाची के साथ हुई उस दिन वाली घटना मेरे दिमाग़ में घूमने लगी. जिसका इंस्टेंट असर मेरे लंड पर पड़ा और वो भेन्चोद फ्रेंची में फड़फड़ाने लगा. उसकी कूद फांद देख कर भाभी के चेहरे पर एक गहरी स्माइल तैर गयी जिसे मेरे जैसे छोटे दिमाग़ वाले को समझना बस की बात नहीं थी.

भाभी ने अपना सवाल फिर से दोहराया. तो मैं कुछ हड़बड़ा गया और बोला – म… म… मैं क्या फील करूँगा भाभी.. क.क.कुकछ नहीं. बस यही कि वो मेरी चाची हैं और मुझे प्यार करती हैं.. बस… मैंने बात संभालने की कोशिश की…

भाभी – लेकिन तुम्हारा… ये लंड तो कुछ और ही कह रहा है.. ये कहकर भाभी ने मेरे लंड को सहला दिया…!

मैं – ये ये.. क्या कह रहा है… मतलब.. आप कहना क्या चाहती हो भाभी..?

भाभी – मेरे प्यारे देवर जी अब तुम इतने भी भोले नहीं हो कि, जो मैं कहना चाहती हूँ, वो तुम नहीं समझ रहे… अब सीधी तरह बताते हो या… इसको मैं उखाड़ लूँ… और भाभी ने शरारती हँसी हँसते हुए मेरे लौड़े को ज़ोर से मरोड़ दिया..

मैं – आईईईईई…..भाभिईीईई…… क्या करती हो…. दर्द करता है…

भाभी – तो बताओ… फिर क्या बात है…?

मैं – तो मैंने उस दिन वाली घटना भाभी को बता दी और कहा- कि उस दिन से ही चाची का बिहेवियर चेंज सा हो गया है और सच कहूँ तो भाभी उनकी वो हरकतें मुझे भी अच्छी लगती हैं, लेकिन चाह कर भी अपनी तरफ से कुछ करने की हिम्मत नहीं कर पाता…!

भाभी – वैसे क्या करने का मन करता है तुम्हारा…?

ऐसे सवाल कर के भाभी मुझे छेड़ने लगी. मुझे तो काफी ज्यादा शर्म आने लगी. जैसे तैसे कर के मैंने अपनी जान छुड़ाई.

अगले दिन फिर मैं किसी काम से चाची के यहाँ गया था, ऐसे कुछ संयोग बने की फिर मैं काफी उत्तेजित हो गया और वहां से घर के लिए निकल गया.

मैं इतना एक्साइटेड हो चुका था कि आज किसी तरह अपने नाग का जहर निकालना चाहता था.. जल्दी-जल्दी घर पहुँचा और सीधा बाथरूम की तरफ जा रहा था, कि तभी भाभी सामने आ गई. वो मेरे चेहरे और लंड की भयंकरता को देखते ही समझ गयी और मुस्कराते हुए बोली - चाची के घर गये थे…?

मैं उनको हां बोलकर सीधा बाथरूम में घुस गया. अभी मैंने अपने नाग को पिटारे से बाहर निकालकर हाथ में लेकर हिलाना शुरू किया ही था कि पीछे से भाभी की आवाज़ सुनाई दी. भाभी - अंकुश! मैंने कितनी बार मना किया है, कि ये हाथ से ज़्यादा मत किया करो. लेकिन तुम्हारी अकल में ही नहीं आता है.

मैंने फटाफट उसे अंदर किया, और घूम कर बोला – तो मैं क्या करूँ भाभी? कैसे शांत करूँ इसे?? आप ही बताइए..?

भाभी - अब हुआ क्या है जो इतने उत्तेजित हो रहे हो.. मैंने उन्हें अभी-अभी चाची के साथ हुई घटना के बारे में बताया… !

वो मुस्कराते हुए बोली- हम्म्म… तो जैसा मैंने सोचा था, वही हुआ.

मैं झुँझलाकर बोला – अरे क्या हुआ, और आपने क्या सोचा था? मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा..?

भाभी – अभी तुम्हें कुछ समझने की ज़रूरत नहीं है, लाओ इसे मुझे दो मैं कुछ करती हूँ इसका… और उन्होंने मेरे लंड को अपने हाथों में लेकर सहलाया, उसके पी होल को अपने नाखून से कुरेदने लगी.

मेरी तो सिसकी ही निकल गयी और अपनी आँखें बंद करके आनंद सागर में तैरने लगा. फिर भाभी ने उसे अपने मुँह में लेकर चूसना शुरू किया. भाभी ने अपने अंदाज से मेरे लंड को चूस कर उसका जहर निकाल दिया जिसे उन्होंने बड़े चाव से पी लिया.

उसके बाद वो बोली - अब जाओ और जाकर अपनी पढ़ाई करो, पता हैं ना इस बार बोर्ड का एग्जाम है..!

मैं खाना खाकर पढ़ने बैठ गया… सारा काम निपटाकर भाभी मेरे लिए बादाम का दूध लेकर आई और मुझे दूध देते हुए बोली – लो पहले इसे खतम करो, फिर पढ़ लेना.

मैंने उनके हाथ से दूध का ग्लास लिया और पीने लगा.

तभी भाभी बोली – देखो अंकुश… चाची के साथ आज जो हुआ है, उसे इसके आगे मत होने देना..!

मैंने दूध खतम करके खाली ग्लास टेबल पर रखा और उनकी तरफ देखते हुए कहा - भाभी अब मैं बड़ा हो गया हूँ, अब मुझसे ये सब और ज़्यादा कंट्रोल नहीं हो पाता. ऊपर से आप ना जाने मेरे साथ क्या खेल खेल रही हो. ऐसा ना हो कि किसी दिन मेरे ना चाहते हुए वो सब हो जाए जो आप नहीं चाहती..! मैंने खुले शब्दों में एक तरह से अपने मन की बात कह दी थी.

वो कुछ देर तक मेरे चेहरे की तरफ देखती रही, अनायास ही उनके चेहरे पर गुस्से जैसे भाव आ गये. और वो ठंडे लहजे में बोली – जान ले लूँगी तुम्हारी अगर ऐसा वैसा कुछ किया भी तुमने तो.

मैं भी बिफर पड़ा और झुँझलाकर बोला – आखिर आप चाहती क्या हैं?

भाभी भड़कते हुए एक झटके में बोल पड़ी – अपना हक़..!

मैं – मतलब?? कौन सा हक़..? और कैसा हक़..?

गुस्से में बोले हुए अपने शब्दों का जब उन्हें एहसास हुआ तो उनकी नज़र स्वतः ही झुक गयी… और भाभी आगे कुछ बोल नहीं पाई…! जब अपने सवाल का कोई जवाब मुझे ना मिला तो मैंने उनके कंधे पकड़ कर झकझोरते हुए पूछा - बताइए ना भाभी… आप कौन से हक़ की बात कर रही थी…?

उन्होंने नज़र नीची किए हुए अपने नीचे के होंठ को चबाते हुए कहा – तुम्हारे कुंवारेपन को पाने का हक़ सबसे पहले मेरा है.

कुछ देर तक तो उनकी बात मेरी समझ में ही नहीं आई, लेकिन जैसे ही मुझे समझ आई. मैं उनके गले से लग गया और बोला – सच भाभी…! आप मेरे साथ…वो…वो.. सब… करेंगी.. बोलिए..!

भाभी मुझसे बिना नज़र मिलाए ही बोली – हां अंकुश, पर समय आने पर.., याद है मैंने पहले भी कहा था कि समय पर तुम्हें हर वो चीज़ मिलेगी जिसकी तुम इच्छा रखते हो.

मैं - ओह्ह्ह्ह… थॅंक यू भाभी! आइ लव यू..! आप सच में बहुत अच्छी हैं… पर वो समय कब आएगा भाभी..?

भाभी – तुम्हारे बोर्ड एग्जाम के रिज़ल्ट के बाद, तुम्हारे बर्थडे पर… तब तक तुम इस बारे में कोई बात नहीं करोगे…! और हां! रिज़ल्ट मुझे फर्स्ट डिवीज़न में चाहिए.

इतना कह कर वो उठकर अपने रूम में चली गयी. मैं बस उन्हें जाते हुए देखता रहा. और फिर अपनी पढ़ाई में जुट गया. अब मेरे दिमाग़ से सारे फितूर निकल चुके थे. उस दिन के बाद भाभी कुछ सीरीयस हो गयी और में भी. उनकी भावना को समझ चुका था, वो जो भी कर रही थी, मेरी खातिर ही कर रही थी. मैं दिन-रात एक करके पढ़ाई में जुट गया था. पिताजी मुझे सीरियस्ली पढ़ते हुए देखकर अति-प्रसन्न थे, और उन्हें आशा थी कि मैं अच्छे नंबरों से ये बोर्ड की परीक्षा पास कर लूँगा. आखिरकार मेरे एग्जाम भी आ गये, और मैंने पूरे कॉन्सेंट्रेशन के साथ सारे पेपर दिए.

जब सारे पेपर ख़तम हो गये और मैं लास्ट पेपर देकर आया, तो भाभी ने मुझे अपनी छाती से किसी बच्चे की तरह लगा लिया और सुबकते हुए बोली - मुझे माफ़ कर देना मेरे बच्चे, मैंने ये सब तुम्हारी भलाई के लिए ही किया है..! अब तुम अपने रिज़ल्ट तक आज़ाद हो, जैसे चाहे मज़े ले सकते हो, लेकिन एक लिमिट में.

मैं – लेकिन अपना वादा तो याद है ना आपको?

भाभी – वो मैं कैसे भूल सकती हूँ…! जिसका मैंने इतने वर्ष इंतजार किया है.

मैं – आप सच कह रही हैं..! क्या आप पहले से ये सब डिसाइड कर चुकी थी?

भाभी – हां… जब मैंने पहली बार तुम्हें उस तकलीफ़ से निकालने के लिए वो सब किया था, तभी मैंने ये डिसाइड कर लिया था, कि तुम्हारी वर्जिनिटी में ही तुड़वाऊंगी.

मेरे रिज़ल्ट के ठीक एक हफ्ते बाद ही मेरा बर्थडे था, अब हम दोनों ही बड़ी बेसब्री से उस दिन का इंतजार कर रहे थे. लेकिन अब में किसी के साथ भी कैसे भी मज़ा कर सकता था, सिवाय सेक्स के. मेरे चचेरे भाई सोनू और मोनू भी छुट्टियों में घर आए हुए थे, सोनू मेरे से दो साल बड़ा था, और मोनू मेरे बराबर का ही था. हम तीनों मिलकर सारे दिन धमाल करते रहते, और एक दूसरे से हर तरह की बातें भी कर लेते थे. वो दोनों भाई तो आपस में बिल्कुल खुले हुए थे.

बातों-बातों में उन्होंने बताया कि वो अपने मामी और उसकी एक बेटी जो सोनू के बराबर की थी, उनके साथ मज़े भी कर चुके हैं. मैं ये सुनकर बड़ा सर्प्राइज़ हुआ कि वो दोनों साले अपनी मामी के साथ भी जो उसकी माँ से भी बड़ी थी मज़े ले चुके थे. पता नहीं क्यों, छोटी चाची इन दोनों भाइयों को बिल्कुल पसंद नहीं करती थी, तो ये दोनों भी उनके घर कभी नहीं जाते थे.

एक दिन हम तीनों ने मिलकर घर पर वीडियो सीडी प्लेयर ला कर फिल्म देखने का प्रोग्राम बनाया. ये बात सुन कर घर के सभी लोग बड़े खुश हुए. टाउन से हमने पूरी रात के लिए वीडियो सीडी प्लेयर किराए से लिया और 3-4 मूवी ले आए, जिनमें 2 फैमिली ड्रामा, एक एक्शन मूवी और 1 डबल एक्स सॉफ्टकोर पॉर्न मूवी की सीडी थी, जो सोनू ने ही सेलेक्ट की, मुझे तो इन सब का कोई नालेज नहीं था.

हमारा आँगन काफ़ी लंबा चौड़ा था, सो एक साइड में टीवी और वीडियो सीडी प्लेयर लगा कर हमने ज़मीन पर ही गद्दे डाल लिए, चारों परिवार के सभी सद्स्य आज काफ़ी दिनों के बाद एक साथ बैठ कर रात एंजाय करने वाले थे.

रेखा दीदी भी आजकल आई हुई थी, जो अब एक बच्चे की माँ थी, उनका बेटा भी लगभग मेरी भतीजी रूचि के साथ ही पैदा हुआ था. रेखा दीदी का बदन अब काफ़ी भर चुका था, हाइट कम होने की वजह से वो कुछ ज़्यादा ही चौड़ी सी दिखती थी, उनके स्तन तो छोटी चाची से भी बड़े हो गये थे.

घर के काम-काज निपटाते 9 बज गये, सब लोग आकर ज़मीन पर पड़े गद्दों पर अपनी सुविधानुसार आकर बैठ गये. शुरुआत में सोनू ने फैमिली ड्रामा ही लगाई, सब मूवी एंजाय कर रहे थे, दोनों बड़ी चाचियाँ और चाचा आगे बैठे थे. चाचा और बड़ी चाचियाँ तो दूसरी मूवी के शुरू होते ही ऊंघने लगे और एक-एक करके वो उठकर जाने लगे. दूसरी मूवी के ख़तम होते-होते भाभी समेत सभी बड़े लोग सोने चले गये.

अब हम बस तीन भाई और तीनों बहनें ही बैठे रह गये.

तीसरी सोनू ने एक्शन वाली फिल्म लगा दी. मैं सबसे लास्ट मैं बैठा था, और मेरे बगल में रेखा दीदी थी, जो बीच-बीच में मुझे छेड़ देती थी, लेकिन मैं उनके लिए कोई ऐसी वैसी बात मन में अभी तक नहीं लाया था. हमारे आगे रमा और आशा दीदी थी, और उन दोनों के आजू बाजू सोनू और मोनू बैठे थे, मोनू रमा दीदी की तरफ और सोनू आशा दीदी की तरफ.

जब बैठे-बैठे बोर हो जाते तो कोई किसी की जाँघ पर सर रख कर लेट जाता. तीसरी मूवी के शुरू होने के कुछ देर बाद ही रेखा दीदी बोली – सोनू ये तूने क्या बकवास मूवी लगा दी है, कोई और नहीं है?

सोनू – है तो सही दीदी लेकिन… वो आप लोगों के लायक नहीं है.

रेखा दीदी – क्यों? ऐसा क्या है उसमें?

सोनू – अरे दीदी! समझा करो यार! डबल एक्स मूवी है आप क्या करोगी देख कर.

रेखा दीदी – अच्छा तो तेरे देखने लायक है, हमारे नही.. लगा तू.. देखें तो सही कैसी डबल एक्स है..?

मजबूर होकर उसने वो सीडी लगा दी. ये एक अंग्रेजी भाषा की सॉफ्टकोर पॉर्न मूवी थी, जिसमें एक लड़का और लड़की आधे अधूरे कपड़ों में जंगल में भटक रहे होते हैं. अपना मन बहलाने के लिए कभी-कभी वो एक दूसरे के साथ छेड़-छाड़ करने लगते हैं, एक दूसरे को किस करने लगते है. कपड़ों के ऊपर से जो केवल नाम मात्र के लिए थे उनके शरीरों पर एक दूसरे के नाज़ुक अंगों को सहलाने-पकड़ने लगते हैं. जैसे-जैसे मूवी में सेक्स बढ़ता जा रहा था, वहाँ पर बैठे सभी लोग उत्तेजित होते जा रहे थे, और ना चाहते हुए ही एक दूसरे के साथ खेलने लगते हैं.

रमा दीदी को ये ज़्यादा अच्छा नहीं लगा या वो ये सब नहीं करना चाहती होगी सबके सामने तो वो उठकर सोने चली गयी. सोनू आशा दीदी के साथ चिपका हुआ था, और अपने हाथ इधर-उधर डाल देता, जिसे वो कभी-कभी रोक देती जिससे वो अपनी सीमा में ही रहे. इधर रेखा दीदी ने मेरे ऊपर हल्ला ही बोल दिया था. वो मेरे ऊपर एक तरह से पसर ही गयी थी. उसके बड़े भारी भरकम चुचे मेरे साइड से दबे हुए थे. उत्तेजना से मेरा लंड अकड़ गया, जिसे उन्होंने अपने हाथ से सहलाना शुरू कर दिया, और मेरा हाथ पकड़ कर अपने मम्मे पर रख लिया. मेरी सहन शक्ति जवाब देती जा रही थी, धीरे-धीरे वो वाइल्ड होती जा रही थी, यहाँ तक की उन्होंने मेरा एक हाथ अपनी चूत के ऊपर रख दिया और उसे दबाने सहलाने लगी… उनकी पजामी गीली होती जा रही थी…

जब मुझसे और सहन नहीं हुआ तो मैं ये कहकर कि मुझे तो अब नींद आ रही है मैं उठ खड़ा हुआ.

दीदी प्यासी सी मेरी ओर देखने लगी और उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोली – अरे छोटू बैठ ना… दिन में नींद पूरी कर लेना.

मैं – नहीं दीदी, अब मेरा सर भारी होने लगा है.. अब मेरे से नहीं बैठा जाएगा..

वो तीनों तो मूवी में ही खोए हुए थे. इधर जब मैंने उनकी बात नहीं मानी तो रेखा दीदी ने मुझे ज़ोर का झटका देकर अपने ऊपर खींच लिया, जिससे मैं रेखा दीदी के ऊपर गिर पड़ा.

झटका अचानक इतना ज़ोर का था कि रेखा दीदी खुद भी गद्दे पर गिर पड़ी और मैं उनके उपर. उन्होंने मुझे अपनी बाँहों में कस लिया जिसके कारण उनके दोनों गद्दे जैसे चुचे मेरे सीने में दब गये, मेरा खड़ा लंड उनकी मोटी-मोटी जांघों के बीच फँस गया, जिसे उन्होंने अपनी जांघों को और जोर से भींच कर दबा दिया. वो मुझे किस करने ही वाली थी कि मैं उनके ऊपर से उठ खड़ा हुआ, और तेज़ी से वहाँ से निकल गया और सीधा बाथरूम में घुस गया.

मैंने बाथरूम में मुठ मारा और जाकर अपने बिस्तर पर सो गया, जो छत पर पड़ा हुआ था, मेरे बाजू में ही रमा दीदी का बिस्तर था. रमा दीदी इस समय अपने घुटने मोड़ कर करवट से गहरी नींद में थी, मैं भी जाकर उनकी बगल मैं लेट गया और जल्दी ही गहरी नींद में चला गया.

मैं उँचे और घने पेड़ों के बीच स्थित एक साफ पानी से भरे तालाब के किनारे खड़ा हुआ था, अचानक मेरी नज़र तालाब में नहाती हुई एक कमसिन लड़की पर पड़ती है. उसके बदन पर इस समय मात्र एक पतले कपड़े की चुनरी जैसी थी, जो वो अपने शरीर पर लपेटे हुए थी, पानी से गीली होने बाद उसके शरीर का वो कपड़ा उसके बदन को ढकने की जगह उसके शरीर के उभारों को प्रदर्शित कर रहा था. अचानक मुझे देख कर वो लड़की पानी में खड़ी हो जाती है, जिससे उसके कमर से ऊपर का भाग दिखाई पड़ने लगता है. पतले गीले कपड़े से उसके गोल–गोल ठोस बूब्स साफ-साफ दिखाई दे रहे थे, ब्राउन कलर के अंगूर के दाने जैसे उसके निप्पल पानी के ठंडे पानी से भीगने के बाद एकदम कड़े होकर उस कपड़े से बाहर निकलने के लिए जैसे व्याकुल हो उठे हों.

मैं एकटक उसकी सुंदरता में खो गया, गोरी चिट्टी वो लड़की मेरी तरफ देख कर मंद-मंद मुस्करा रही थी. अचानक वो पानी से बाहर आने लगी, मैं जड़वत किसी पत्थर की मूरत की तरह वहीं खड़ा उसका इंतजार कर रहा था. वो बाहर निकल कर ठीक मेरे सामने आकर खड़ी हो गई और उसने अपने गीले कड़क बूब्स मेरे सीने में गढ़ा दिए और फिर अपने शरीर को उपर-नीचे करके अपने बूब्स को मेरे सीने से रगड़ने लगी. मेरी आँखों में झाँकते हुए उसने अपना हाथ नीचे ले जाकर मेरे लंड पर रख दिया और उसे सहलाने लगी. उत्तेजना मेरे सर चढ़ कर बोलने लगी थी, मैंने उसे अपनी बाँहों में कस लिया और उसके होंठों को चूसते हुए उसके बूब्स को मसलने लगा. वो ज़ोर-ज़ोर से मेरे लंड को मसले जा रही थी. अब उसने मेरा लंड अपनी चूत के ऊपर रगड़ना शुरू कर दिया. मात्र एक झीने से कपड़े और वो भी पूरी तरह पानी से गीला होने के कारण मेरा लंड उसकी चूत को अच्छे से फील कर रहा था. मैंने उसके गोल-मटोल कलश जैसे कूल्हों को अपने हाथों में कस लिया और अपनी कमर को एक झटका दिया. उस झीने कपड़े समेत मेरा लंड उसकी चूत में घुसने लगा. मैं अपनी कमर को और ज़्यादा उसकी तरफ पुश करने लगा… उसके चेहरे पर दर्द के भाव बढ़ते जा रहे थे… मुझे लगा जैसे मेरा लंड पानी छोड़ देगा, मैंने उसकी पीड़ा की परवाह ना करते हुए अपना लिंग और अंदर करना चाहा कि किसी ने मुझे झकझोर दिया.

हड़बड़ा कर मैंने अपनी आँखें खोली तो देखा दीदी मेरे ऊपर झुकी हुई मुझे ज़ोर-ज़ोर से हिला रही थी. छोटू उठ जा अब देख कितनी धूप तेज हो गयी है, पसीने से तर हो गया है.. फिर भी सो रहा है…

मैं उठकर बैठ गया… मुझे अभी भी ऐसा फील हो रहा था, जैसे ये सब सपना नहीं हक़ीकत में मेरे साथ हो रहा था. मेरा लंड पूरी तरह अकड़ कर शॉर्ट को फाडे दे रहा था, एक सेकेंड और मेरी आँख नहीं खुली होती तो वो पिचकारी छोड़ चुका होता.

दीदी की नज़र मेरे शॉर्ट पर ही थी, जब मैंने उसकी निगाहों का पीछा किया तब मुझे एहसास हुआ, और मैंने अपनी जांघे भींच कर उसे छुपाने की कोशिश की.

दीदी झेंप गयी और नज़र नीची करके मुस्कराते हुए वहाँ से भाग गयी और सीढ़ी के पास जाकर पलट कर बोली- अब सपने से बाहर आ गया हो तो नीचे आजा.. भाभी बुला रही हैं…!

मुझे बड़ी शर्म सी महसूस हुई, फिर कुछ देर बैठ कर अपने मन को इधर-उधर करने की कोशिश की लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ. फिर उठकर फर्स्ट फ्लोर पर बने बाथरूम में घुस गया और पेशाब की धार मारी तब जाकर कुछ शांति मिली.

चाय नाश्ता करने के बाद मैंने अपनी गुड़िया रानी को गोद में लिया और भाभी को बोलकर बड़ी चाची के घर की तरफ निकल गया. मैंने उनके घर के अंदर जैसे ही पैर रखा, सामने ही बरामदे में रेखा दीदी चारपाई पर बैठी अपने बेटे को दूध पिला रही थी, उनका पपीते जैसा एक स्तन, कुर्ते के बाहर निकला हुआ था और उसका कागज़ी बादाम जैसा निपल उनके बेटे के मुँह में लगा हुआ था, और वो उसे चूस रहा था. मेरे कदमों की आहट सुन कर उन्होंने उसे ढकना चाहा, लेकिन जैसे ही उनकी नज़र मेरे ऊपर पड़ी तो उन्होंने अपनी कमीज़ और ऊपर कर ली जिससे उनका पूरा पपीता मेरे सामने आ गया.

मैं – दीदी क्या हो रहा है? और उनके पास बैठ कर उनके बेटे के सर पर हाथ फिराया और उनके बेटे से बोला – अले-अले..मम्मा.. का दुद्दु पी रहा है मेरा भांजा.

दीदी ने जलती नज़रों से मुझे देखा लेकिन मेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया..

मैंने उनके पास बैठ के उनके बेटे के गाल पर किस किया और उसे खिलाने लगा…वो बार-बार मेरा ध्यान अपनी ओर करने के लिए सस्सिईइ….आअहह…काट मत… जैसी आवाज़ें करने लगी.. लेकिन मैं उनके बेटे से ही खेलता रहा. फिर जब उनकी एक तरफ की टंकी खाली हो गयी, तो उसे पलट कर दूसरे स्तन की तरफ किया और अपनी कमीज़ उठा कर उसको भी नंगा करके निप्पल उसके मुँह में दे दिया, लेकिन पहले वाले को ढकने की कोशिश भी नहीं की. अब उनकी कमीज़ उनके दोनों चुचियों के ऊपर टिकी हुई थी. मैं कनखियों से उनको देख रहा था, और उनके बेटे से खेलता रहा.

वो मन ही मन भुनभुना रही थी, फिर मैं बिना उनकी तरफ देखे ही बोला – दीदी घर में और कोई नहीं है? उन्होंने फिर भी मेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया और मुझे सुनकर अपने बेटे से बातें करने लगी.

ले बेटा पी ले पेट भर के. यहाँ और कोई नहीं है, जो तेरी भूख शांत करे. लेकिन बेटा तो दूध पीना बंद करके कब का सो चुका था. तो उसको दीदी ने साइड में सुला दिया और झटके से अपनी कमीज़ नीचे करके अपने बूब्स को ढक लिया.

मैं – चल बेटा.. अपना चलते हैं.. यहाँ तो कोई दिख नहीं रहा.. तो फिर अपन भी यहाँ बैठ के क्या करेंगे.

दीदी मेरी बात सुनकर और ज़्यादा खीज गयी और पीछे से मेरे गले को अपने एक बाजू से लपेट लिया… और बोली – कमीने तुझे मैं इतनी बड़ी यहाँ बैठी दिखाई नहीं दी.. जो कह रहा है कि यहाँ कोई नहीं है.

मैं – आप तो कोई जवाब ही नहीं दे रही तीन मेरी बात का.. तो मैं और किसके साथ बात करूँ?

दीदी – तू तो अब बड़ा आदमी हो गया है. हम जैसे छोटे लोगों के साथ तो बैठना भी अपनी बेइज़्ज़ती समझता है और ये कह कर उन्होंने अपने स्तनों को मेरी पीठ पर रगड़ दिया.

मैं – दीदी आपको ऐसा क्यों लगा कि मैं आपके साथ बैठ कर बात नहीं करना चाहता?

दीदी – तो फिर रात उठकर क्यों चला गया था, मैंने तुझे रुकने के लिया कितना बोला.

मैं – रात मुझे सच में बहुत नींद आ रही थी.

फिर दीदी ने पीछे से ही मेरे पास सोते बेटे को खिलाने लगी जिससे उनकी दोनों चुचियाँ मेरे शरीर में चुभ रही थी. बेटे के साथ खेलने के बहाने उनका हाथ मेरे लंड की तरफ बढ़ने लगा. मैंने मन ही मन सोचा. ये साली कितनी गरम है. अपने छोटे भाई का ही लौड़ा लेने के चक्कर में है. अगर मैंने भाभी से प्रॉमिस नहीं किया होता तो इसे यहीं पटक कर चोद डालता. लेकिन क्या करूँ??

कुछ देर जब मेरी सहन शक्ति जवाब देने लगी तो मैंने बहाना बनाया. दीदी अब मैं चलता हूँ. रूचि मुझे खेलने के लिए खोज रही होगी. और मैं चारपाई से खड़ा हो गया. वो मुँह लटका के बैठी रह गयी, एक बार फिर से मैं उसको केएलपीडी करके वहाँ से चला आया.
Bahut hi badhiya update. Mujhe meri massi ki yaad aa gai jab main unke ghar rahta tha padhai ke liye. Chhoti Mausi(Meri sagi mausi ki devrani) Bilkul Rekha didi ki tarah thi. Unki bhi ek chhoti beti thi aur usko doodh pilate hue apne boobs dikhati thi.
 
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