ननद भौजाई
नाश्ता करते समय नन्दोई जी न ननद से पुछा तबियत कैसी है अब,
"बस अब एकदम ठीक है, कल रात भर खूब आराम से,... अभी उठी हूँ ," मुस्करा के वो बोलीं।
लेकिन तभी ननदोई जी का फोन बजा, उन्होंने बोला एक मिनट हस्पताल से है ,
मैंने चिढ़ाया,
"उसी नर्स का होगा, ...रात में कल इंजेक्शन नहीं लगा होगा, ...क्यों नन्दोई जी आप भी तो उसको सिस्टर बोलते होंगे,"
" आप भी न, अच्छा चलिए आप नहीं मानती तो स्पीकर फोन आन कर देता हूँ "वो बोले
हस्पताल से मेसेज था की उनके दोस्त जो आज डिस्चार्ज होने वाले थे, वो आज नहीं डिस्चार्ज हो पाएंगे, एक कंसल्टेंट आये थे, उन्होंने कुछ और टेस्ट के लिए बोला है और कल तक ऑब्जर्वेशन में रखने को कहा है। शाम को फिर से स्कैन होगा, तब उनकी जरूरत पड़ेगी। तो वो चार बजे तक आ जाएँ .
" तो आज भी रात को शायद आप को हॉस्पिटल में रहना पडेगा, "
ननद ने बड़े उदास हो के पूछा और जोड़ा, कल मेरी भी तबियत खराबहो गयी थी और,.... आज फिर "
छिनालपने में मेरी ननद से पार पाना मुश्किल था। सारी रात अपने सगे भैया के आगे टाँगे फैलाये रही, चूतड़ उठा उठा के घोंट रही थी भैया का और अब, लेकिन कभी कभी छिनलपना जरूरी हो जाता है। नन्दोई को कतई पता नहीं चलना चाहिए था हम ननद भौजाई का प्लान की हम दोनों चाहते थे की आज की रात भी नन्दोई की हॉस्पिटल में ही बीते। आज की रात पांचवी रात थी और पांच दिन में ही होलिका माई का आसीर्बाद पूरा हो जाना था।
" एक दिन बिना भतार के नहीं रहा जाता, ससुराल में नन्दोई पे पहला हक़ सलहज का है ,... जाइयेगा उनके मायके तो वहां तो वैसे दिन रात कबड्डी होगी, घबड़ाइये मत, मेरे ननदोई सूद समेत वसूल लेंगे। "
मैंने ननद जी के गाल पे चिकोटी काटते कहा।
" नहीं नहीं हो सकता है लौट आऊं , बल्कि आ ही जाऊँगा, कल सुबह हम लोग निकल चलेंगे, माँ का कल भी फोन आया था "
नन्दोई जी ने जब ये बोला तो मेरा तो चेहरा एकदम राख, कल सुबह, कल सुबह ही तो असली।
लेकिन एक और फोन आया पुलिस थाने से,
नन्दोई जी को शाम को बुलाया था। केस तो बंद हो गया था लेकिन कुछ कागजों पे उनकी साइन चाहिए थी और फिर उनकी मोटरसाइकल जो अबतक केस प्रापर्टी में थी वो भी रिलीज होना था और उनका, उनके दोस्त का ड्राइविंग लायसन्स भी। अब पक्का था ननदोई जी रात को हॉस्पिटल में ही रुकेंगे, देर शाम तक उनको मोटरसाकिल छुड़ाने में, फिर वो नर्सिया उनको रोकने का कोई जुगाड़ लाएगी और उनके दोस्त, तो आज रात की परेशानी तो सुलझ गयी
मैं बहुत जोर से मुस्करायी। नन्दोई जी की आदत थी स्पीकर फोन ऑन कर के बात करने की और मुझे दोनों ओर की बात सुनाई भी पड़ रही थी समझ में आ रही थी।
मैं समझ गयी, ये उस स्साले पक्के बहनचोद, जल्द ही होने वाले मादरचोद मेरे मरद का काम है।
मैं उनको ढूंढते अपने कमरे में गयी, लेकिन वो नहीं थे। बस पलंग पर बैठ के सोच रही थी, अब तो दोनों चीजें पक्की, मेरी ननद चोदी भी जाएंगी आज रात फिर से इसी पलंग पे और आज पांचवी रात है तो होलिका माई की बात पक्की, कल मेरी ननद गाभिन।
तब तक मेरी ननद दिख गयीं, हंसती बिहसंती, उछलती कूदती, लग रहा था नन्दोई जी के कमरे से आ रही थी और उन्हें भी पता चल गया था आज भी नन्दोई जो को रुकना पड़ेगा और वो भी शहर में, तो आज की परेशानी खतम, मायके में आके लड़की की जो भी उमर हो, वापस वो गुड़िया खेलने वाली, धींगामुश्ती करने वाली लड़की हो जाती है, धींगा मुश्ती करने वाले किशोरी, तो बस ननद एकदम उसी तरह, उमर की सीढियाँ वापस लांघकर अपने कैशोर्य में,

और मुझे देख के मुस्कराती मेरे कमरे में आ गयीं।
न वो कुछ बोलीं, न कुछ मैं हम दोनों समझ रहे थे हम दोनों खुश थे और ख़ुशी में भौजाई ननद के साथ जो कराती है वही मैंने किया, पहले तो नन्द को चुम्मा लिया, मेरे मरद का स्वाद अभी भी वहां लगा था
और हलके से धक्के से पलंग पे और उसी के साथ ननद का पेटीकोट ऊपर, चुनमुनिया खुल गयी। मेरे मरद की मलाई की दो बूँद बाहर छलक गयी। मैंने उस ओर मुंह लगाने की कोशिश की तो ननद ने मजाक में मुझे धक्का देके हटाते हुए कहा
" हट भौजी, ....रात भर इनका मर्द चढ़ा रहता है और दिन में भौजाई " और मुझे बाहों में भर के चूम लिया।

लेकिन जैसे पूनम के चाँद पर अचानक बादल घिर आये, वो एकदम से उदास, चेहरा ख़ाक हो गया मेरी ननद का। उन्होंने कस के मुझे भींच लिया और जैसे डरे सहमे बच्चे माँ के आँचल में सर छिपा लेते हैं की बड़ी से बड़ी परेशानी अब उनको नहीं छू सकती, एकदम से उसी तरह मेरे पेट में सर घुसा के डर से सहमते हुए धीरे से करीब करीब सुबकते हुए बोलीं,
" भौजी, हमको आश्रम नहीं जाना है, कुछ भी हो जाय, मैं उस साधू के यहाँ पैर भी नहीं रखूंगी , अगर गयी तो फिर, "
मैंने झट से उनके मुंह पे हाथ रख दिया, घर की बिटिया, कहीं मुंह से उलटा सीधा, अशकुन और सर सहलाती रही।
हम दोनों चुप चाप बैठे रहे, धीमे से मेरी ननद बोलीं " हम सुने थे की मायका माई से होता है लेकिन हमार मायका तो भौजी से है "
मुझे देख रही थीं और उनकी बड़ी बड़ी आँखे डबडबा रही थीं, मैंने चूम के उन पलकों को बंद कर दिया। बोलना मैं भी बहुत कुछ चाहती थी बहुत कुछ वो भी पर कई बादल उमड़ घुमड़ के रह जाते हैं बिना बरसे,

तबतक मेरी सास की आवाज आई रसोई में से ननद को बुलाती, किसी काम में हेल्प के लिए। ननद रसोई में चली गयी और मैं भी निकली तो ननदोई जी के कमरे के बाहर
ननद अपनी माँ के पास रसोई में और मैं भी ,
तभी ननदोई जी के कमरे से फोन की आवाज आयी।नन्दोई जी और ननद की सास की बात, बात तो टेलीफोन पे हो रही थी, वही स्पीकर फोन आन था और दोनों ओर की बात सुनाई पड़ रही थी
मैं ठिठक गयी, कान पार के सुनने लगी।
मेरे पैरों के नीचे से जमीन सरक गयी। आँखों के आगे अँधेरा छा गया, किसी तरह दीवाल पकड़ के खड़ी हो गयी।
उधर से ननद की सास की चीखने, चिल्लाने की आवाज आ रही थी। मैं सुन सब रही थी, बस समझ नहीं पा रही थी, बार बार मेरे सामने मेरी ननद की सूरत आ रही थी। अभी पल भर पहले कितनी खुश आ रही थी,.... और यहाँ उनकी सास, क्या क्या प्लान,
बेचारी मेरी ननद।
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जहाँ चाह.. वहाँ राह..
जब दिल ने ठान लिया तो .. सारी कायनात उसे पूरा करने में लग जाती है...
पुलिस और हॉस्पिटल वाले तो बस जरिया हैं...
मतलब अब बात पक्की...
सास भी खुश और ननद भी खुश...
लेकिन ये क्या .. ये कैसी काली बदली...
जब उजियारा फैलने को था तो...
आप भी न बस वहीँ छोडती हैं.. जहाँ बेचैनी अपने चरम पर...
और अगले अपडेट का इंतजार...