नहीं नहीं ऐसा कुछ भी नहीं है , आपने शायद गलत समझा,
लिखने वालों से पढ़ने वाले ज्यादा जरूरी होते हैं, कोई लाख कलम घसीटे,... मंच पर खड़ा होकर गाये, अभिनय करे, कविता पाठ करे,... अगर श्रोता न हों, दर्शक न हों,
मान तो पाठक बढ़ाते हैं और आप ऐसे रससिद्ध, विज्ञ उत्साहवर्धन करने वाले पाठक हों तो फिर कहना ही क्या,...
मज़बूरी मेरी कहानी की थी, ... कुछ कहानियां या कहानियों के प्रसंग ऐसे होते हैं की उनके साथ उनके विपरीत मनस्थिति वाले प्रसंगों पर लिखना कठिन हो जाता है, मैं एक उदाहरण देती हूँ , फागुन के दिन चार लम्बी कहानी या उपन्यासिका में , एक प्रसंग था, मुम्बई में रेलवे स्टेशन पर आतंकी हमले का,... और वह दृश्य इतना कारुणिक था,... एक माँ अपनी बेटी को हॉस्पिटल में , शवगृहों में , जगह जगह ढूंढती है, और उसी कहानी का वो प्रसंग जहाँ, रीत के माता पिता दोनों बॉम्ब ब्लास्ट में मारे जाते हैं , उसका बाल सखा भी,... लोग कहते हैं की स्टेशन पर हुए बॉम्ब ब्लास्ट में मारा गया, उसके भी माता पिता और वो , दोनों परिवारों में अकेली बची,... यंत्रवत,... सबके शवों का अग्निदाह करती हो, ... कई पाठकों ने कहा उनके आँखों में आंसू आ गए,... और मेरी हालत भी,... तो उस समय, ...मैंने श्रृंगारजन्य कहानियां जो उस फोरम में चल रही थीं, उन्हें रोक दिया क्योंकि उन्हें विजुलाइज कर पाना कठिन होता है।
मोहे रंग दे भी एक इंटेस स्टोरी थी ख़ास तौर से शुरू के भागों में , इरोटिका, रोमांस और बीच में विछोह साथ में आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस , कन्वर्जेंस ऐसी बातों का मानवीय प्रभाव और उन पर गहन चर्चा तो उस के साथ भी इस कहानी को सुमेलित कर पाना मेरे लिए दुष्कर था.
और जोरू का गुलाम और सोलहवां सावन चल ही रही थीं।
तो मोहे रंग दे को ख़तम करने के बाद मैंने इसे शुरू किया क्योंकि दोनों की भाव भूमि एकदम अलग है
अभी भी मैंने एक छोटी कहानी, होली के रंग जो शुरू की है , वो एकदम नागरी परिवेश की है , पर वह होली की एक छोटी कहानी है,
यह कहानी भी मैं कोशिश करुँगी छोटी ही रहे,...
तो आभार आपका इस सूत्र पर पधारने के लिए,... एक तो मैं देवनागरी लिपि में लिखती हूँ, दूसरे स्टोरी के डेवलप करने में बहुत टाइम लगता है, और कहानी घटना प्रधान भी नहीं होती, ... तो पढ़ने वालों की संख्या कम होना स्वाभाविक है , पर मैंने इस फोरम के मित्रों का आभार करती हूँ की इस कहानी को उन्होंने बहुत चाव से सराहा,
और आप आ गए तो,...