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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

komaalrani

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छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

भाग ११३ हल्दी-चुमावन की रस्म पृष्ठ ११७०

अपडेट पोस्टेड, कृपया पढ़ें, लाइक करें और कमेंट अवश्य करें
 
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komaalrani

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Behna Ka khyal me rakhunga.


Is story Ka koi pata ho kisiko to please share kare
Search men jaa ke try kariye ya google pe dekhiye shaayd kuch pata chale
 

komaalrani

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motaalund

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महुआ और आम के बौर की महक ही बौरा देती है, इसलिए इस प्रसंग के लिए मैंने यह जगह चुनी, बाकी लोगो से अलग, सिर्फ तीन, रेनू, कमल और जिसने रेनू कमल की गाँठ जुड़वायी,
इन प्रसंगों और उनके स्थान के चुनाव के पीछे भी कुछ भाव छुपा है...
सुन समझ के दिल मचल उठता है...
 

motaalund

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उन के घर में सुख शान्ति के लिए भी जरूरी था, जिस तरह से कमल की माँ ने कहा था ,

ललिया ने कैसे रेनू और कमल के बीच अम्बुजा सीमेंट वाली दीवाल खड़ी की थी फेविकोल का जोड़ लगा के जिसे खली भी न तोड़ सके ( पोस्ट ६९२३, दीवाल भाई बहिन के बीच में भाग ७१, पृष्ठ ६९३ ),

और जिस तरह से वो बोलीं,

" लेकिन एक बार फिर वो उदास हो गयी थीं, बहुत धीमी आवाज में बोली

लेकिन तोहरे देवर की किस्मत तो बिगड़ी गयी न, अइसन सोना अस देह सांड़ अस ताकत,.. और महीना दो महीना में कउनो काम वाली, घास वाली , कभी वो भी नहीं, .... हरदम उदास रहता या गुस्से में,.... बहुत चिंता है।

रेनू की चाची ने बताया फिर एकदम चुप, चेहरा झांवा,... बस रो नहीं रही थीं।फिर बहुत धीरे धीरे बोलीं, रेनुआ वो अब एकदम चुप्प, कतो गाना रतजगा होता है तो वहां भी नहीं जाती, मैं सोचती हूँ सादी बियाह होगा गौना होगा तो वहां भी कैसे, ऐसी हदसी डरी घबड़ायी रहेगी तो कैसे और कमल की भी हालात, अइसन सोना अस देह, जांगर ताकत लेकिन हम लोगन तो तो पूरे घर पे जैसे गरहन ,


तो उस पोस्ट के संदर्भ में तो अब पूरा परिवार खुश रहेगा
खास कर रेनुआ की माँ...
जिससे कोमल वादा कर चुकी थी...
अब तो आशीष पर आशीष...
 

motaalund

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मैंने कहा था न एक बार में एक ही घटनास्थल पर और उस से जुडी घटनाओं पर फोकस रहेगा, और बाकी घटनाएं बाद में

अरविन्द, गीता, छुटकी, गीता की सहेलियां इन सबके किस्से भी आएंगे बाद में, कबड्डी से ही गीता छुटकी गीता के साथ चली गयी थी और ये बता के की तीन चार दिन के लिए, वो उसे अपने भाई से मिलवाने के लिए तो क्या हुआ ये सब विस्तार से आएगा


अभी पहले साजन ने क्या किया अपनी सगी बहन मेरी ननद के साथ, घर की कहानी

फिर सुगना भौजी और उनके ससुर की दास्तान,

पठानटोली वालियां

फिर छुटकी और

अभी इसमें कुछ काटने बेराने ऐसा नहीं लग रहा है।
अरे नहीं...
आपने तो फरमाइश पूरी करके काटने का नहीं बल्कि कुछ जोड़ के हीं पेश किया है...
तो इतनी मेरी हिम्मत नहीं हो सकती...
केवल संशय था .. तो वो दूर करने के लिए प्रश्न कर लिया...
 

motaalund

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एकदम गाँव का पूरा खाका खींच दिया और डाक्टर वाली बात पर रेनू जी का मैला आँचल याद आ गया
जो कहीं न कहीं जीवन से जुड़ी हुई थी...
 

motaalund

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मस्ती के इस सागर मे क्या क्या लू और क्या छोड़ू. मै सायद पूरा बता भी नहीं पाऊँगी.

1) प्रेम भरे वो शब्द जो सजनी बोलते ही गद गदा जाती है.


2) पर उसके तुरंत ही बाद आगे की लाइन मे शारारत और वासना से भरी लाइन. जिसे पढ़ते हसीं और बहोत कुछ महसूस हुआ. जो बताया नहीं जाएगा.

3) अब अपने साजन की और क्या तारीफ करें. वो तो हे ही.

मे उनकी तारीफ ऐसे कैसे छोड़ दू. इस लाइन के लिए मुजे फिर back होना पड़ा.

4)

अब ये तो भौजी धरम है. उसे कैसे छोड़ा जा सकता हे. पाप लगेगा एक भी ससुराल वाली बची तो. क्यों मायके वलियो को समर्पित नहीं किया. उनकी सेवा मे.

5) अब नांदिया हो तो ऐसी ही हो. जिला टॉप जल्दी बनेगी. फर्क नहीं करेंगी के भईया उसका है. या उसकी भौजी का.


6) वह डूबे भौजी. मान गए. साजन जगे रात भर और गचक के नांदिया की.


बहोत कुछ बताना था. पर भूल भी गई.

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साजन सजनी के मिलन में हर तरह की भावनाओं का सम्मिश्रण होता है...
और कुछ बिना बोले हीं...
 

motaalund

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वाह क्या नांदिया छिनार है. और साजन मरदवा तो उस से भी बढ़कर. क्या शारारत से भरा इरोटिक सीन दिया है. ऐसा लग ही नहीं रहा की नांदिया को फसाया है. बल्कि प्रेम और मस्ती भरा माझा आ गया.

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बड़ी बहना...
लेटी रहना...
देती रहना...
 

motaalund

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देखिये इस कमेंट का दो असर तो हुआ

एक तो आपने कमेंट कर दिया, और मुझे इस बात का विश्वास हुआ की कुछ लोग तो हैं ऐसे, जो पोस्ट्स का इन्तजार करते हैं,

दूसरे आपके कमेंट के बाद, पहला कमेंट पोस्ट के पोस्ट होने के करीब दो दिन बाद, मेरी मित्र लेखिका का आया, जो मेरे सूत्रों की अभिन्नं अंग है।

हाँ, अगर इस पुड़िया का असर ऐसा है जैसा आपने कहा तो मुझे उत्पादन और वितरण में सुधार करना चाहिए और मैंने आज जोरू का गुलाम में भी पुड़िया दे दी है और कोशिश करुँगी की फागुन के दिन चार में भी कल पोस्ट कर दूँ।

एक बार फिर से धन्यवाद, आप ऐसे थोड़े भी पाठक हों तो लिखना सार्थक हो जाता है जो एक एक लाइन पढ़ें और उसपर प्रतिक्रया दें

आभार।
अब पुड़िया से काम नहीं चलने वाला...
पूरा भरपूर डोज की जरूरत है....
 

motaalund

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बहुत - बहुत धन्यवाद कोमल जी







अब आपने एक - एक लाइन की बात कर ही दी है तो ये लाइनें मैने सबसे पहले आपकी कालजयी रचना "मोहे रंग दे" में पढ़ी थी।

इसे स्मगलिंग (इधर का माल उधर ) भी कह सकते हैं। :tongue: :tongue: :tongue:

आपको छेड़ने का हक हमारा भी हैं।

ऐसे ही स्नेह बनाए रखें।

सादर
छेड़ने पर धारा भी लगाया जा सकता है...😉😉😉😉😊😊
 
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