चैप्टर -1 ठाकुर कि शादी, अपडेट -13
सबकी योजना तैयार थी.....
ठाकुर ज़ालिम सिंह भी अपने गांव विष रूप पहुंच चुके थे, उनके गांव मे उत्सव का माहौल था.
ठाकुर :- भूरी काकी शादी कि तैयारी करो, रिश्ता तय कर आया हूँ, अब हवेली कि रौनक फिर लौट आएगी.
बहुत ख़ुश थे ठाकुर साहेब.....
भूरी :- कैसी है कामवती?
ठाकुर :- बहुत सुन्दर
वो तीनो नामुराद कहाँ मर गये है जब से दिख नहीं रहे
भूरी उन तीनो का जिक्र सुनते ही घन घना जाती है, रात भर का सारा दृश्य एक बार मे ही जहाँ मे दौड़ जाता है,भूरी कि चुत पनियाने लगती है.
ठाकुर :- कहाँ खो गई काकी? तबियत तो ठीक है ना?
कहाँ है वो तीनो हरामी
तभी तीनो पीछे से एक साथ आते है
कालू :- ज़ी ठाकुर साहेब आदेश दीजिये?
ठाकुर :- कहाँ मर गये थे तुम लोग? सालो सिर्फ मुफ्त कि खाते हो.
बिल्लू :- मालिक वो... वो.... कल रात काकी ने बहुत मेहनत करवाई तो सुबह देर से उठे.
बिल्लू डर से जो मुँह मे आया बोल देता है.
भूरी चौक जाती है
ठाकुर :- कैसी मेहनत?
कालू :-ज़ी ठाकुर साहेब वो कल रात बारिश बहुत तेज़ थी हवेली मे पानी जमा हो गया था तो रात भर पानी ही निकलते रहे. क्यों भूरी काकी? कालू बात संभाल लेता है.
भूरी :- ज़ी ज़ी... ठाकुर साहेब तीनो ने अच्छे से पानी निकाला.
ठाकुर :- अच्छा अच्छा ठीक है जाओ काम पे लगो अब.
गांव के पंडित को बुलावा भेज दो, हलवाई को बुला लाओ.
ओर हवेली कि साज सज्जा का प्रोग्राम करो.
डॉ. असलम 2दिन मे आ जायेंगे तो बाकि का प्रबंध वो देख लेंगे.
चलो दफा हो लो अब हरामी साले....
शादी कि तैयारी जारी थी.
इन सब के बीच हवेली के तहखने मे एक शख्स ये सब बाते सुन रहा था, उसके कान बहुत तेज़ थे.... वो कामवती का नाम सुन के तन तना जाता है.
"कही कही... ये वही कामवती तो नहीं जिसका मै हज़ारो सालो से इंतज़ार कर रहा हूँ? यही वो कामवती तो नहीं जो मेरी नय्या प्यार लगाएगी "
मुझे भी ठाकुर कि शादी मे जाना होगा. मंगलवार का इंतज़ार है बस...
ये शख्स कौन था जो कामवती को जनता था?
कामवती कैसे नय्या पार लगाएगी?
वक़्त बताएगा
इधर गांव कामगंज मे
बाजार मे खूब रौनक थी कामवती ओर रतीवती कि मौजूदगी से, सभी कि नजर माँ बेटी पे ही थी उनकी दोनों कि खूबसूरती के बीच डॉ. असलम जैसे कुरूप को कोई देख ही नहीं पा रहा था, कहाँ असलन नाटा काल ओर कहाँ रतीवती कामवती सुन्दर सुडोल लम्बी.
असलम ने दिल खोल के खर्चा किया, ठाकुर साहेब के कहे अनुसार शादी मे कोई कमी नहीं रहनी चाहिए थी.
कामवती भी असलम से काफ़ी घुलमिल गई थी.
लेकिन असलम रतीवती के साथ अभी तक असहज थे.
वो दो बार रतीवती के संपर्क से निकल. चुके भी फिर भी ना जाने क्यों उनको रतीवती के साथ होने से खलबली मच जाती थी,रतीवती का हाथ कभी छू जाता तो सीधा करंट लंड पे जा के ही रुकता, फिर भी बाजार मे होने के कारण उसे अपने ऊपर काबू रखना था.
खेर इस खींचा तानी मौज मस्ती मे खरीददारी होती रही.
रतीवती ने एक लाल चटक सारी ली
रतीवती :- असलम ज़ी कैसी है ये साड़ी?
असलम : अ... अ.... अच्छी है रतीवती ज़ी
रतीवती :- कब तक शर्माएंगे असलम ज़ी आप, आप के लिए ही ले रही हूँ, आखिर अपने ही कद्र कि है मेरी.
ऐसा कह के मुस्कुरा देती है. असलम फिर से लजा जाये है.
दिन भर कि मेहनत के बाद तीनो शाम होने पे घर लौट पड़ते है, अंधेरा घिर चूका था..
घर पहुंच जाते है, रामनिवास अभी तक घर नहींआया था रतीवती को चिंता सताने लगी थी
कामवती अपने कमरे मे सामान रखने चली जाती है.
कामवती :- माँ मै सामान रख के आती हूँ फिर खाना बना लेती हूँ आप आराम कीजिये.
असलम भी अपने कमरे कि ओर निकल जाता है.
रतीवती अपने कमरे मे जाते ही लाल साड़ी पहन के देखने लगती है, सारे कपडे उतार के बिल्कुल नंगी हो जाती है.उसे जल्दी से तैयार हो के असलम को अपना रूप दिखाना था.
वो असलम आश्चर्य चकित चेहरे को देखना चाहती थी.
क्या मादक शरीर था रतीवती का बिल्कुल नक्कसी किया हुआ गोरा बदन
वो अपनी कमर के चारो तरफ साड़ी लपेट लेती है, ओर जैसे ही वो ब्लाउज उठाती है पहनने के लिए बाहर धममम.... से किसी के गिरने कि आवाज़ अति है.
रतीवती सब भूल के जल्दी से उसी अवस्था मे सिर्फ साड़ी लपेटे ही बाहर को भागती है.
बाहर आ के देखती है कि रामनिवास मुँह के बल गिरा पड़ा था.
रतीवती :- इस हरामी को दारू से ही फुर्सत नहीं आज बेवड़ा ज्यादा पी आया.
भागती हुई रामनिवास को उठाने जाती है... उतने मे असलम भी आवाज़ सुन के कमरे से बाहर आता है ओर जैसे ही दरवाजे कि ओर देखता है दंग रह जाता है.
या अल्लाह.... ये क्या हो रहा है मेरे साथ? कैसे कैसे नज़ारे लिख दिए तूने मेरे जीवन मे. शुक्रिया
असलम देखता है कि रतीवती झुकी हुई रामनिवास को उठाने कि कोशिश कर रही है इस कोशिश मे उसकी गांड पूरी बाहर को निकली हिल रही थी साड़ी का कुछ हिस्सा गांड कि बीच दरार मे घुस गया था.
आह्हः.... क्या गांड है रतीवती कि अपने लंड को मसलते रतीवती कि कामुक गांड को ही निहारते रहते है.
जैसे ही उनकी नजर आगे को बढ़ती है उनका मुँह से हलकी सिसकारी निकल पड़ती है.... ब्लाउज ना पहनने कि वजह से रतीवती के स्तन बाहर को निकल पड़े थे साड़ी तो कबका हट चुकी थी.
हलकी सिसकरी सुन रतीवती पीछे देखती है तो असलम मुँह खोले हाथ मे लंड पकडे मन्त्र मुग्ध खड़ा था.
रतीवती :-अरे असलम ज़ी मदद कीजिये? रतीवती मुस्कुरा देते है उसे असलम कि इसी हालत पे तो मजा आता था.
असलम रतीवती के पास आता है ओर रामनिवास को उठाने मे मदद करता है
इस मदद मे दोनों के शरीर रगड़ खा जाते है, रतीवती तो थी ही कामुक औरत हमेशा उत्तेजना से भरी रहती है, निप्पल कड़क हो जाते है असलम कि रगड़ से.
रतीवती :- असलम से अच्छे से उठाइये, ये तो इनका रोज़ का काम है
असलम अब समझ चूका था कि क्यों रतीवती इतनी कामुक ओर हमेशा गरम क्यों रहती है, उसकी चुत हमेशा क्यों पानी छोड़ती है, जिसका पति ऐसा हो उसकी औरत ओर क्या करे...
किस्मत ने ही मुझे रतीवती से मिलाया है. उनके दिल मे रतीवती के लिए हमदर्दी जगती है क्युकी वो खुद भी बरसो से सम्भोग नहीं कर पाया था, रतीवती ही थी जिसने उसका इस सुख से परिचय करवाया.
असलम मन ही मन रतीवती को धन्यवाद देता है.
अब तक असलम रतीवती मिल कर रामनिवास को कमरे मे ला के बिस्तर पे पटक चुके थे...
रतीवती सीधी खड़ी हो जाती है उसकी साड़ी स्तन से पूरी हट चुकी थी,बस उसके बाल ही बमुश्किल स्तन ढके हुए थे. नीचे सपाट पेट, गहरी नाभि, माथे पे बिंदी
गजब कि काया पाई है रतीवती ने
आह्हः.... कितनी खूबसूरत है रतीवती असलम बहुत कुछ कहना चाहते थे.
परन्तु कामवती रसोई से आवाज़ लगा देती है, माँ खाना बन गया है आ जाओ, ओर असलम काका को भी बोल दो.
असलम कि तंद्रा टूटती है, वो बाहर को जाने लगता है
रतीवती :- धन्यवाद असलम ज़ी आपकी वजह से है सब हो पाया
असलम समझ नहीं पाता कि किस बात का धन्यवाद
आंखे बड़ी किये प्रश्नभरी निगाहो से रतीवती कि तरफ देखता है.
रतीवती :- आज रात इंतज़ार रहेगा आपका ओर मुस्कुरा देती है...