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फागुन के दिन चार भाग २७
मैं, गुड्डी और होटल
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मैं, गुड्डी और होटल
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लेकिन ये तो चौथा रिश्ता हुआ...रिश्तों की झुरमुट
“मैंने सुना है की कुछ लोगों को आज एक नया देवर और किसी को नई सेक्सी भाभी मिल गई…” भाभी ने पहले रीत और फिर मुझे देखते हुए हँसकर कहा।
“एकदम…” हँसकर रीत बोली और कहा- “मैं वही कह रही थी की भाभी का हक देवर पे सबसे पहले होता है…”
“अरे वो तो है ही। उसमें कुछ पूछने की बात है। फिर अभी तो इसकी शादी नहीं हुई है इसलिए भाभी का तो पूरा हक है और तुम्हारी भी शादी नहीं हुई है। इसलिए इसका भी हक बटाने वाला कोई नहीं है। लेकिन तुम्हारा इसका एक और रिश्ता है…”चंदा भाभी बोली
रीत हंस के बोली, मालूम है और अब वही रिश्ता पक्का, गुड्डी मेरी छोटी बहन तो उस रिश्ते से, मैं साली, भले ही बड़ी सही, पर साली तो साली और होली में जीजा की रगड़ाई करने का साली का पूरा हक़ है, मैं बड़ी साली और गुंजा छोटी साली, हम दोनों पहले चेक वेक करके देख लेंगे,जम के मजे ले लेंगे, एक एक बूँद रस निचोड़ लेंगे फिर इस बेचारी का नंबर आएगा,
गुड्डी को चिढ़ाती वो खंजननयन बोली
साली वाला रिश्ता मुझे भी सुहाता था, इसलिए नहीं की साली के ताले में ताली लगाने का मौका मिलेगा, वो बात तो थी ही, लेकिन उससे भी बड़ी बात, उससे मेरे और गुड्डी के ' उस रिश्ते' पे मुहर लगती थी, जिसके लिए मैं कुछ भी कर सकता था, पक्का वाला, जिंदगी भर का। उसकी डांट खाने का मौक़ा ।
और चंदा भाभी ने एकदम सपोर्ट किया, " एकदम, सलहज तो बहुत हैं, अब दो साली भी हो गयीं तो आज तो जबरदस्त रगड़ाई होगी इनकी, लेकिन मैं एक और रिश्ते की बात कर रही थी। "
मेरे कान भी खड़े हो गए
रीत के चेहरे पे प्रश्नवाचक चिन्ह बन आया।
“अरे ये बिन्नो का देवर है…” चन्दा भाभी बोली।
रीत ने कहा- “वो तो मुझे मालूम है उनसे कित्ती बार मिली हूँ। मेरी बड़ी दीदी की तरह हैं इसलिए तो ये मेरे देवर हुए…”
“हाँ लेकिन एक बात और मुझे कल पता चली…” चन्दा भाभी बोली।
मेरे भी समझ में नहीं आया की चंदा भाभी क्या इशारा कर रही है।
“क्या?” रीत और गुड्डी साथ-साथ बोली।
“अरे बिन्नो की एक ननद है, गुड्डी के साथ की। “ चन्दा भाभी बोली।
” ग्यारहवे में हैं “ बिना सोचे समझे मैं बोला।
“देखा। कैसे प्यार से याद कर रहे हैं उसे? ये। तुम्हारे देवर कम जीजा ज्यादा …” चंदा भाभी रीत से बोली।
फिर बात आगे बढ़ाई-
“कैसे बोलूं? वो इनसे, बल्की ये उससे फँसे हैं। अब ये बिचारे सीधे साधे। कोई इस उम्र की, जोबन की, तो कोई कैसे मना करेगा। है न?”
दोनों समझ गई थी की भाभी मुझे खींच रही हैं, और दोनों ने एक साथ हुंकारी भरी- “एकदम सही…”
चंदा भाभी ने फिर रीत से पूछा- “तो वो अगर बिन्नो की ननद लगी तो तुम्हारी भी तो ननद लगेगी…”
“एकदम…” वो बोली और मुझे देखकर मुश्कुरा दी।
“और ये, जो तुम्हारी ननद के यार, बोलो…” चंदा भाभी ने रीत को उकसाया।
“नंदोई…” वो शैतान बोली।
“और तुम क्या लगोगी इनकी…” चंदा भाभी ने फिर टेस्ट लिया।
लेकिन रीत भी रिश्ते जोड़ने में दक्ष हो गई थी, कहा-
“मैं, उस रिश्ते से तो इनकी सलहज लगूंगी। ये मेरे नंदोई और मैं इनकी सलहज और वो रिश्ता तो भाभी से भी ज्यादा। और जीजा साली भी फिर तो ट्रिपल धमाका…” रीत हँसते हुए बोली।
रीत ने अपनी कटीली मुस्कान से जुबना उभार के और जोड़ा,
" तो ये देवर, कम जीजा कम नन्दोई को तो तीन तीन कोट रंग हर जगह लगाना पडेगा, एक बार साली की तरह, एक बार भाभी की तरह और एक बार सलहज की तरह, और इस बात पर तो एक दहीबड़ा और बनता है "
अब तक मैं दहीबड़े का असर देख चुका था लेकिन गुड्डी ने हड़काया " हे मेरी दी दे रही हैं और तुम लेने में सोच रहे हो " और गुड्डी की बात, दहीबड़ा मेरे मुंह में
अब वो रिश्ते जोड़ने में एक्सपर्ट हो गई थी खास तौर से अगर रिश्ता रंगीन हो- “लेकिन एक खास बात और। गुड्डी जा रही है ना इसके साथ आज। तो वो गुड्डी की भी तो अब…” बात चन्दा भाभी ने शुरू की थी, लेकिन पूरी रीत ने की।
रीत- “हाँ। मुझे मालूम पड़ गया है। वो तो अब इसकी भी ननद लगेगी…” रीत चिढ़ाने का मौका क्यों चूकती।
ससुराल का असली मजा तो आनंद बाबू हीं ले रहे हैं...आनंद की बहना बिके कोई ले लो,
गुड्डी कुछ शर्माई, कुछ झिझकी, कुछ खुश हुई। लेकिन बात अब भी मेरे समझ में नहीं आ रही थी।
“तो गुड्डी लौटेगी तो उसको भी साथ ले आएगी। अब उसके भैया कम यार तो ट्रेनिग पे चले जायेंगे। वहां वो बिचारी कहाँ ढूँढ़ेगी। और मन तो करेगा ही जब उसको एक बार स्वाद लग जाएगा…” चन्दा भाभी अब फुल फार्म पे थी।
“तभी तो। गर्मी की छुट्टी भी है। एक महीने रह लेगी, नहीं होगा तो गाँव भी ले चलेंगे उसको…” गुड्डी भी मेरे खिलाफ गैंग में जवाइन हो गई थी।
भाभी- “एकदम आम के बगीचे, अरहर और गन्ने के खेत का मजा और जानती हो रीत वो बिचारी बड़ी सीधी है। किसी को मना नहीं करती, सबके सामने खोलने को तैयार। तो फिर जित्ते तुम्हारे भाई हों या और जो भी हों सबको अभी से बता दो…”
“ये तो बहुत अच्छी बात बताई आप ने भाभी। थोड़ी बिलेटेड होली मना लेंगे वो। उसका भी स्वाद बदल जाएगा। वेरायटी भी रहेगा…वैसे माल है कैसा, इस स्साले का, "
रीत ने गुड्डी को उकसाया और गुड्डी को मौका मिल गया,
" एकदम मस्त, टनाटन, रसभरी जलेबी ऐसी, बड़ी बड़ी आँखे, चिकने चिकने गाल, रसीले होंठ और सबसे बड़ी बात बहुत सीधी है किसी को मना नहीं करती"
" अच्छा अब याद आया, वही न जिसकी तारीफ़ कल आप लोग कर रही थीं, आनंद की बहना बिके कोई ले लो, नीचे तक सुनाई पड़ रहा था, भाभी आप ने सही कहा जब उसपे सारे बनारस वाले चढ़ेंगे तो ये तो फिर स्साले ही हुए "
रीत ने और जले पर नमक छिड़का, आयोडीन युक्त , रीत दुष्ट।
लेकिन गुड्डी उससे भी एक हाथ आगे। गुड्डी बोली- “अरे राकी भी तो है अपना, वो भी तो भाई की तरह है…”
“और क्या चौपाया है तो क्या हुआ। है कितना तगड़ा, जोरदार…और हम लोगो की रक्षा करता है तो इस लिहाज से भाई ही तो हुआ”
रीत आँख नचाकर मुझे देखती बोली।
तब मेरी समझ में आया की दूबे भाभी का एक लाब्राडोर कुत्ता। कल शाम को भी उसका नाम लगाकर चन्दा भाभी ने एक से एक जबरदस्त गालियां सुनाई थी।
“लेकिन वो ना माने तो, नखड़ा करे तो?” गुड्डी ने शंका जताई।
“अरे तो हम लोग किस मर्ज की दवा हैं। अपने भाई से नैन मटक्का और हम्मरे भाइयों से छिनालपना? साली को जबरदस्ती झुका देंगे घुटनों के बल। हाथ पैर बाँध देंगे और पीछे से राकी। एक-दो बार हाथ पैर पटकेगी। लेकिन जहाँ तीन-चार दिन लगातार। आदत पड़ जायेगी उसको…और ये कातिक वातिक वाली बात मत बोलना की कैसे, ...अगर कातिक में कुतिया गर्माती हैं, तेरा माल तो बारहो महीना गरमाया रहेगा, और हमारे रॉकी को दिन महीना का फरक नहीं है, एकदम टनाटन, ... वो तेरा माल घोंट लेगी न सीधे से या जबरदस्ती, गाँठ बन गयी तो खुदे, ”
रीत ने समझाया।
“और क्या पूरे 8” इंच का है उसका और एक बार जब अन्दर घुसाके मोटी गाँठ पड़ जायेगी अन्दर। हाथ पैर खोल भी दोगी, लाख चूतड़ पटकेगी, निकलेगा थोड़ी। दो-चार बार के बाद तो राकी को खुद ही आदत लग जायेगी। जहां उसको निहुराया। आगे वो खुद सम्हाल लेगा…”
चंदा भाभी फगुना रही थी।
एक का जवाब देना मुश्किल था, यहाँ तो तीनों एक साथ। मैं चुपचाप मुश्कुराता रहा।
रीत को तो मौका मिल गया था मुझे छेड़ने, रगड़ने का, मेरी ठुड्डी छू के मेरा चेहरा उठाते हुए बोली,
" जिज्जू कम स्साले ज्यादा, एकदम मत घबड़ाना अपनी जानेमन के लिए, मैं रहूंगी न, वैसे भी रॉकी को मैं ही देखती हूँ, अरे कितने लोग आते हैं अपनी अपनी कुतीया को ले कर, बस मैं, आँगन में एक चुल्ला लगा है, उसी में कुतीया की चेन बाँध देती हूँ, थोड़ी देर तो उछल कूद करेगी, भौजी कल आप लोग इनके माल का क्या नाम लगा के गुणगान कर रही थीं,
" एलवल वाली " चंदा भाभी और गुड्डी दोनों साथ साथ बोली, उस के मोहल्ले का नाम,
और रीत चालू हो गयी,
" हाँ तो उसी तरह से निहुरा के, सीधे से नंही मानेगी तो मैं और गुंजा रहेंगी न, जबरदस्ती, एकदम कुतीया की तरह, उसी चेन से बाँध देंगी बस। और जो कुतिया आती हैं थोड़ी देर तो खूब उछल कूद करती हैं लेकिन संमझ जाती हैं की अब ये चेन छूटने वाली नहीं, और फिर रॉकीआता है, थोड़ी देर पीछे से चाटता है तो एकदम गरमा जाती हैं। तो उस एलवल वाली को, तेरे माल को, उसी तरह चाट चूट के गरम कर देगा , देखना तेरी वो बहना, खुद टाँगे फैला देगी, फिर मैं रॉकी को एक बार चढ़ा दूंगी, और एक बार घुस गया तो बस सटासट, सटासट, और असली मजा तो तब आएगा जब गाँठ बन जाएगी अंदर, तुम्हारी मुट्ठी से भी मोटी,"
रीत से भी ज्यादा मजा चंदा भाभी ले रही थीं, बोलीं
" और क्या एक बार गांठ बन गयी, फिर तो चेन छोड़ भी देंगी तो निकाल नहीं पाएगी खुल के, रीत एकदम सही कह रही है, तेरी असली साली है, तेरे साथ तेरी बहन का भी फायदा सोच रही है। "
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रीत को तो मौका चाहिए था उसने चंदा भाभी की बात को आगे बढ़ाया,
" अरे फायदे तो बहुत होंगे तेरी उस एलवल वाली को, देख एक तो डॉगी पोज की प्रैक्टिस हो जाएगी, तुम्हारा भी फायदा जब मन करे बहन को निहुरा के, दूसरा एक बार उसकी चम्पा चमेली को गाँठ की आदत पड़ जायेगी, फिर तो कितना भी मोटा होगा, आराम से निगल लेगी न तेल क खर्चा न वेस्लीन की जरूरत।
“लेकिन मैं ये कह रही थी की जब इसकी बहन पे तुम्हारे सारे भाई चढ़ेंगे। तो ये क्या लगेगा तुम्हारा…” चन्दा भाभी ने बात पूरी की।
दोनों बड़े जोर से खिलखिलायी, रीत मुझे देखकर हँसकर बोली- “साले. बहनचो…”
बात और शायद बढ़ती लेकिन चंदा भाभी ने पहली बार मेरे चेहरे को ध्यान से देखा और बड़े जोर से मुश्कुरायीं। मेरे पास आकर उन्होंने अपनी उंगली से मेरी ठुड्डी पे रखकर मेरा चेहरा उठाया और गौर से देखने लगी। हाथ फेरकर गाल पे उनकी उंगली मेरी नाक के नीचे भी गई और मुश्कुराकर वो बोली-
“चिकनी चमेली…”
गुड्डी की ओर उन्होंने प्रशंशा भरी नजरों से देखा। उसका भी चेहरा दमक उठा। भाभी ने नीचे मेरे बर्मुडा की ओर देखा, फिर गुड्डी की ओर। गुड्डी ने बड़ी जोर से हामी में सिर हिलाया। चंदा भाभी ने मेरे गालों पे एक बार फिर से हाथ फिराया, प्यार से सहलाया,
और रीत की ओर देखा,
रीत और गुड्डी की जुगलबंदी में तो शुरुआत हुई है...खेलूंगी मैं रस की होली,
रीत समझ गयी बोली, भाभी अब आगे का काम हम दोनों का, ऐसा सुन्दर सिंगार करेंगे इस दुलहिनिया का,
और चंदा भाभी किचन में, छत पर सिर्फ हम तीनो, लेकिन रीत ने गुड्डी से अपने मन का डर बताया,
" ये स्साला, जिसकी बहन पे हमारा रॉकी चढ़ेगा, ज्यादा उछल कूद करे तो, "
और उसका हल गुड्डी के पास था।
“वो जिम्मेदारी मेरी…”
गुड्डी अधिकार पूर्वक बोली और जोर से कहा स्टैचू।
ये गेम हम पहले खेलते थे और दूसरा हिल नहीं सकता था। अब मेरी मजबूरी। गुड्डी का हुकुम। मैं सपने में भी नहीं सोच सकता था हिलने को। मैं मूर्ति बनकर खड़ा हो गया। पीछे से गुड्डी ने अपने नाजुक हाथों से मेरी कलाई पकड़ ली। कभी कच्चे धागे हथकड़ियों से भी मजबूत हो जाते हैं।
उधर रीत मुझे दिखाती हुई, हँसती हुई तरह-तरह की पेंट की ट्यूब उसने निकाली और अपनी गोरी-गोरी हथेली पे मिलाने लगी। पहले बैगनी, फिर काही, फिर स्लेटी। एक से एक गाढ़े रंग। फिर वो मेरे कान में गुनगुनाई-
“बहुत हुई अब आँख मिचौली…”
मेरे पूरे बदन में सिहरन दौड़ गई। रीत का बदन मेरी पीठ को पीछे से सहला रहा था। मेरी पूरी देह में एक सुरसुरी सी होने लगी। उसके उभार कसकर मुझे पीछे से दबा रहे थे। एक आग सी लग गई। ‘वो’ भी अब 90° डिग्री पे आ गया।
उसने फिर मेरे कान में गाया, गुनगुनाया और उसके गुलाबी रसीले होंठ मेरे इअर लोब्स से छू गए। बहुत हुई अब आँख मिचौली। जीभ की टिप कान को छेड़ रही थी। उन्चासो पवन चलने लगे। काम मेरी देह को मथ रहा था और जब उसकी मादक उंगलियां मेरे गालों पे आई। बस लग रहा था मेरे पीछे कैट ही खड़ी है।
बहुत हुई अब आँख मिचौली, खेलूंगी मैं रस की होली,
खेलूंगी मैं रस की होली, रस की होली, रस की होली।
उसकी उंगलियां मुझे रस में भिगो रही थी। रस में घोल रही थी देह की होली, तन की होली, मन की होली। मैं सिहर रहा था भीग रहा था, बस लग रहा था कटरीना की वो प्यारी उंगलियां। पहले तो हल्के-हल्के फिर कसकर मेरा गाल रगड़ने लगी।
मैंने आँखें खोलने की कोशिश की तो बड़ी जोर से डांट पड़ी- “आँखें बंद करो ना…”
फिर तो उंगलियों ने पहले पलकों के ही ऊपर और फिर कस-कसकर गालों को मसलना, रगड़ना। हाँ वो एक ओर ही लगा रही थी और होंठों को भी बख्श दिया था। शायद उसे मेरे सवाल का अहसास हो गया था। कान में बोली-
“दूसरा गाल तेरे उसके लिए।"
दोनों हाथों का रंग एक ही गाल पे। कम से कम पांच-छ कोट और एक हाथ जो गाल से फिसला तो सीधे मेरे सीने पे। मेरे निपलों को पिंच करता हुआ।
मेरे मुँह से सिसकी निकल गई।
रीत- “अभी से सिसक रहे ही। अभी तो ढंग से शुरूआत भी नहीं हुई…”
और ये कहकर मेरे टिट्स उसने कसकर पिंच कर दिए और मुझे गुड्डी को आफर कर दिया-
“ले गुड्डी अब तेरा शिकार…” और ये कहकर उसने मेरे गाल पर से हाथ हटा लिया।
मैंने आँखें खोलकर शीशे में देखा- “उफफ्फ। ये शैतान। कौन कौन से पेंट। काही, स्लेटी। चेहरा एकदम काला सा लग रहा था और दूसरी ओर अब गुड्डी अपने हाथ में पेंट मल रही थी। एक वार्निश के डिब्बे से सीधे। सिलवर कलर का। चमकदार।
गुड्डी रीत से बोली- “हे मैंने कसकर पकड़ रखा था जब आप लगा रही थी तो अब आप का नंबर है। कसकर पकड़ियेगा जरा भी हिलने मत दीजिएगा…”
“एकदम…” रीत ने पीछे से मेरे दोनों हाथ पकड़ लिए। लेकिन वो गुड्डी से दो हाथ आगे थी। उसने हाथ पकड़कर सीधे अपनी पाजामी के सेंटर पे ‘वहीं’ लगा दिए और अपने दोनों पैरों के बीच मेरे पैरों को फँसा दिया।
गुड्डी ने अपने प्यारे हाथों से मेरे गाल पे सफेद सिल्वर कलर का पेंट लगाना शुरू कर दिया और मैं भी प्यार से लगवा रहा था। उसने पहले हल्के से फिर कस-कसकर रगड़ना शुरू कर दिया।
मैं गुड्डी के स्पर्श में डूबा था।
उधर रीत ने मेरी दोनों हथेलियों को अपनी पाजामी के अन्दर और जैसे ही मेरा हाथ ‘वहां’ पहुँचा। कसकर उसने अपनी गदराई गोरी-गोरी जांघों को भींच लिया। अब न तो मेरा हाथ छूट सकता था, और ना मैं उससे छुड़ाना चाहता था।
ये परस्पर का द्विअर्थी संवाद तो ...Ohh Komal ji aap chhoti chhoti baton itna erotic tarah se describe karti hain ki mazaa aa jata hai. Aisi baten har ghar me dikhai deti hain par kisi ki himmat nahin hoti khul kar bolne ki.
होली और वो साली के साथ...रीत , म्यूजिक और डांस --
रीत का सिंगल डांस हो या आनंद साहब के साथ डूवेट डांस , सभी मे उसने ऐसा जलवा बिखेरा कि आनंद भाई साहब तो क्या हम सब रीडर्स भी चारो खाने चित्त हो गए ।
अश्लीलता की दहलीज पर पहुंची अभिसार का वादा करती हुई वह नृत्य जिसे अगर बीवियों को आता होता तो ' वो ' को कोई दो कौड़ी को न पूछता ।
इस डांस के लिए एनर्जी का काम किया वोदका के साथ साथ भांग मिश्रित दही - बड़े ने । और नशे पर चिन्गारी डाला रीत की कामुक हुस्न ने ।
रीत ने अपने देवर - कम - ननदोई - कम - जीजा की होली वास्तव मे रस की होली बना दी ।
इधर चंदा भाभी ने भी अपने देवर की मर्दानगी को मजबूती देने के लिए हर्बल और जड़ी बुटी से युक्त लड्डू बनाकर दे दी । आनंद साहब को शर्तिया इस लड्डू की जरूरत पड़नी वाली है ।
गुड्डी तो गुड्डी ही है । लेकिन हमे अलवल वाली गुड्डी का भी बेसब्री से इंतजार है । इस गुड्डी ने भी बहुत पहले से अपने मन मंदिर मे आनंद साहब को बसा रखा है ।
बहुत खुबसूरत अपडेट कोमल जी ।
आउटस्टैंडिंग एंड अमेजिंग अपडेट।
चंदा भाभी को तो गुरुदक्षिणा भी दे दिया...बहुत ही शानदार और लाज़वाब अपडेट है
चंदा भाभी ने आनंद को अपनी नथ कैसे और किसने उतारी थी वो बता दिया है साथ ही उसने गुड्डी की दोनो बहनों की नथ उतारने के लिए गुरु ज्ञान भी दे दिया है चंदा भाभी ने आनंद को चुदाई का उपदेश देकर चुदाई क्षेत्र में चुदाई करने के लिए प्रेरित कर दिया है
ये क्या है??????उसने अपना पैर हमारे पैर पे रखा, हमने समझा मूड आया,
पकड़ के अपने मजबूत हाथो से, हमने उसको नीचे लिटाया,
वो बोली mc आई है, नही करो, हमने उसे गुस्से से देखा और अपना पुरा खड़ा लंड दिखाया,
वो बोली लाओ मुंह में दो ,तुम्हे ठंडा करदूं, उसकी पैंट के बटन खोल हमने उसे उल्टा लिटाया,
उसकी पैंट और पैंटी दोनो उतार पैरो में फसा दी , उसकी गोरी गोरी गांड पर हमने अपने हाथ फिराया,
हमने अपने लंड को आज़ाद किया, और, उसके दोनो पैरो को अपने पैरो के बीच फसाया,
अपने मोटे लंबे लंड को हमने, उसकी गांड के भूरे छेद पर टिकाया,
वो कुछ समझ पाती उससे पहले हमने, एक जोर का धक्का उसकी गांड पर लगाया
वो जोर से चीखी और रोने लगी, हमने उसके दर्द की परवाह नहीं को और एक और करारा धक्का लगाया,
हमारा मोटा लंबा लंड आधा उसकी कोरी और गोरी गांड में घूस गया , ओर एक धक्के के साथ ही लंड पुरा उसकी गांड में चला गया और उसकी चूत से मूत निकल आया,
बनारस में रस बना के निकालने की तैयारी हो रही है...बहुत ही शानदार और लाज़वाब अपडेट है
सुबह सुबह मॉर्निंग में kiss मिल गई kiss मिलते ही खिलाड़ी आनंद के और खुद में जोश आ गया है थोड़े थोड़े गुण चंदा भाभी के गुड्डी में भी आ रहे हैं लगता है गुंजा के साथ भी जल्दी हो होली खेली जाएगी साली जो है
अब खरबूजा चाकू पर गिरे या चाकू खरबूजे पर...आनंद बाबू तो गुड्डी और गुंजा से द्विअर्थी बातो के द्वारा मजा ले रहे हैं लेकिन आनंद को नही पता की अब उसकी मृग नयनी और साली उसका काटने वाली है
एक बार पढ़ना शुरू करेंगे...बहुत बहुत धन्यवाद मित्र!
क्षमा चाहता हूँ - पिछले दो दिनों में इतने सारे सन्देश मिले हैं, कि सभी का उत्तर देने में समय लग रहा है।
आपकी रचनाएँ भी पढ़ेंगे कभी -- बहुत सुना है