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फागुन के दिन चार भाग २७
मैं, गुड्डी और होटल
३,६०, ७४६
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गुड्डी फिर दूर खड़ी हो गई और वहीं से हुक्म दिया- “शर्ट उतारो…”
मैं एक मिनट सोचता रहा फिर बोला- “अरे यार मूड हो रहा है तो बेडरूम में चलते हैं ना। यहाँ कहाँ?”
गुड्डी मुश्कुरायी और बिना रुके पहले तो आराम से शर्ट के सारे बटन खोले और फिर उतारकर सीधे हुक पे, अगला नम्बर बनियान का था।
अब मैं पूरी तरह टापलेश था। गुड्डी ने पहले मुझे सामने से ध्यान से देखा, एकाध जगह हल्की खरोंच सी थी।
वहां हल्के से उसने उंगली के टिप से सहलाया और फिर पीछे जाकर, एक जगह शायद हल्का सा लाल था, वहां उसने दबाया, तो मेरी धीमी सी चीख निकल गई।
खड़े रहना…” गुड्डी बोली और बाहर जाकर फ्रिज से बर्फ एक टिशू पेपर में रैप करके ले आई और उस जगह लगा दिया। एक-दो जगह और शायद कुछ घूंसे लगे थे या गिरते पड़ते टेबल का कोना, वहां भी उसने बर्फ लगाकर हल्का-हल्का दबाया।
“पैंट उतारो…” मैडम जी ने हुकुम सुनाया।
पीछे से फिर बोली- “मैं ही बेवकूफ हूँ। तुम आलसी से अपने हाथ से कुछ करने की उम्मीद करना बेकार है…”
और मुझे पीछे से पकड़े-पकड़े मेरी बेल्ट खोल दी, और पैंट भी हुक पे शर्ट के ऊपर, और अब वो अपने घुटनों के बल बैठ गई थी। एक क्लोज इंस्पेक्शन मेरी टांगों का। फिर पीछे से घुटनों के पास एक बड़ी खरोंच थी। वाश बेसिन पे होटल वालों ने जो आफ्टर शेव दिया था उसे हाथ में लेकर उसने ढेर सारा घुटने पे लगा दिया।
“उईईई…” मैं बड़ी जोर से चीखा।
गुड्डी चिढ़ाते हुए बोली “ज्यादा चीखोगे। तो इसे खोलकर लगा दूंगी…”
मुश्कुराते हुए उसने अपनी लम्बी उंगलियों से चड्ढी के ऊपर से ‘उसे’ दबा दिया।
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दर्द, डर और मजे में बदल गया।
गुड्डी- “चड्ढी उतारोगे या मैं उतार दूँ? वैसे अन्दर वाला कई बार देख चुकी हूँ। आज इसलिए ज्यादा शर्माने की जरूरत नहीं है…”
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“नहीं मैं वो उतार दूंगा…” और मैंने झट से नीचे सरका दिया।
गुड्डी- “देखा। चड्ढी उतारने में कोई देरी नहीं…” मुश्कुराते हुए वो बोली। फिर पीछे से उसने देखा, एक हाथ में उसके बर्फ के क्यूब थे। मैं जो डर रहा था वही हुआ। वो बोली- “झुको…”
मैं झुक गया।
गुड्डी- टांगें फैलाओ।
मैंने फैला दी।
और बर्फ का क्यूब सीधे मेरे बाल्स पे और वहां से हटाने के बाद मेरे पिछवाड़े के छेद पे।
और असर वही जो होना था, वही हुआ। 90° डिग्री।
गुड्डी सामने आई खिलखिलाती और बोली- “मुँह धो लो या वो भी मैं करूँ?”
“नहीं नहीं…” कहकर मैंने वाश बेसिन पे रखे लिक्विड फेस सोप से मुँह अच्छी तरह धोया, सिर नीचे करके बाल भी।
तब तक वो गुनगुने पानी से भिगा के बाथ तौलिया ले आई थी और मेरी पूर देह उसने रगड़-रगड़कर पोंछ दी और टंगी बाथ गाउन उतारकर दे दिया की अभी यही पहन लो।
मैं एकदम से फ्रेश हो गया और हम लोग बाहर जाकर खाने की मेज पे ही सीधे बैठ गए। उसने रिमोट उठाकर टीवी आन कर दिया। एक कोई म्यूजिक चैनल आन हो गया।
गुड्डी- ठसके से मेरे बगल में आकर बैठ गई और बोली- “हे ये डी॰बी॰ कौन है?”
मैं, गुड्डी और होटल
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गुड्डी फिर दूर खड़ी हो गई और वहीं से हुक्म दिया- “शर्ट उतारो…”
मैं एक मिनट सोचता रहा फिर बोला- “अरे यार मूड हो रहा है तो बेडरूम में चलते हैं ना। यहाँ कहाँ?”
गुड्डी मुश्कुरायी और बिना रुके पहले तो आराम से शर्ट के सारे बटन खोले और फिर उतारकर सीधे हुक पे, अगला नम्बर बनियान का था।
अब मैं पूरी तरह टापलेश था। गुड्डी ने पहले मुझे सामने से ध्यान से देखा, एकाध जगह हल्की खरोंच सी थी।
वहां हल्के से उसने उंगली के टिप से सहलाया और फिर पीछे जाकर, एक जगह शायद हल्का सा लाल था, वहां उसने दबाया, तो मेरी धीमी सी चीख निकल गई।
खड़े रहना…” गुड्डी बोली और बाहर जाकर फ्रिज से बर्फ एक टिशू पेपर में रैप करके ले आई और उस जगह लगा दिया। एक-दो जगह और शायद कुछ घूंसे लगे थे या गिरते पड़ते टेबल का कोना, वहां भी उसने बर्फ लगाकर हल्का-हल्का दबाया।
“पैंट उतारो…” मैडम जी ने हुकुम सुनाया।
पीछे से फिर बोली- “मैं ही बेवकूफ हूँ। तुम आलसी से अपने हाथ से कुछ करने की उम्मीद करना बेकार है…”
और मुझे पीछे से पकड़े-पकड़े मेरी बेल्ट खोल दी, और पैंट भी हुक पे शर्ट के ऊपर, और अब वो अपने घुटनों के बल बैठ गई थी। एक क्लोज इंस्पेक्शन मेरी टांगों का। फिर पीछे से घुटनों के पास एक बड़ी खरोंच थी। वाश बेसिन पे होटल वालों ने जो आफ्टर शेव दिया था उसे हाथ में लेकर उसने ढेर सारा घुटने पे लगा दिया।
“उईईई…” मैं बड़ी जोर से चीखा।
गुड्डी चिढ़ाते हुए बोली “ज्यादा चीखोगे। तो इसे खोलकर लगा दूंगी…”
मुश्कुराते हुए उसने अपनी लम्बी उंगलियों से चड्ढी के ऊपर से ‘उसे’ दबा दिया।
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दर्द, डर और मजे में बदल गया।
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“नहीं मैं वो उतार दूंगा…” और मैंने झट से नीचे सरका दिया।
गुड्डी- “देखा। चड्ढी उतारने में कोई देरी नहीं…” मुश्कुराते हुए वो बोली। फिर पीछे से उसने देखा, एक हाथ में उसके बर्फ के क्यूब थे। मैं जो डर रहा था वही हुआ। वो बोली- “झुको…”
मैं झुक गया।
गुड्डी- टांगें फैलाओ।
मैंने फैला दी।
और बर्फ का क्यूब सीधे मेरे बाल्स पे और वहां से हटाने के बाद मेरे पिछवाड़े के छेद पे।
और असर वही जो होना था, वही हुआ। 90° डिग्री।
गुड्डी सामने आई खिलखिलाती और बोली- “मुँह धो लो या वो भी मैं करूँ?”
“नहीं नहीं…” कहकर मैंने वाश बेसिन पे रखे लिक्विड फेस सोप से मुँह अच्छी तरह धोया, सिर नीचे करके बाल भी।
तब तक वो गुनगुने पानी से भिगा के बाथ तौलिया ले आई थी और मेरी पूर देह उसने रगड़-रगड़कर पोंछ दी और टंगी बाथ गाउन उतारकर दे दिया की अभी यही पहन लो।
मैं एकदम से फ्रेश हो गया और हम लोग बाहर जाकर खाने की मेज पे ही सीधे बैठ गए। उसने रिमोट उठाकर टीवी आन कर दिया। एक कोई म्यूजिक चैनल आन हो गया।
गुड्डी- ठसके से मेरे बगल में आकर बैठ गई और बोली- “हे ये डी॰बी॰ कौन है?”
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