शमशेर बहादुर सिंह की एक मशहूर कविता की पंक्तिया याद आ गयीं,
बात बोलेगी, हम नहीं।
भेद खोलेगी ,बात ही।
तो आप ऐसे मूर्धन्य, प्रखर लेखक/पाठक और रचना के बीच मैं नहीं पड़ने वाली। गुड्डी कौन है, आनंद कौन, क्या रिश्ता और भी बातें, यह कहानी खुद आप से बैठ के बतियायेगी, अभी आप ने जो पढ़ा है वो कुछ झलकियां है। आप ने यह बात एकदम सही कहा की कलेवर इसका उपन्यास का ही है, और सिर्फ बनारस ही नहीं और शहर भी इसमें घटना स्थल ही नहीं पात्र भी हैं।
इक्लेयर वाली चॉकलेट होती हैं तो बस, ऊपर हो सकता है कभी हार्ड कोर इरोटिका दिखे, कभी थ्रिलर, लेकिन अंदर छिपा हुआ रोमांस का स्वाद भी रससिद्ध पाठको को मिलता रहेगा और रोमांस वो, जो जिजीविषा भी है, संघर्ष भी और एक जिद्द भी है। लेकिन ये सब बातें कहानी खुद कहे तो ज्यादा अच्छा।
मैं और मेरी कहानी धन्य है आपके आने से इस कथा के आंगन में। बस उम्मीद करुँगी की जीवन की आपाधापी में, व्यस्तताओं में आप गुड्डी, आनंद और बाकी पात्रों का साथ देंगे, और अपनी बात कहेंगे।
हाँ, मुझसे या कहानी से सीखने की बात बस आपका बड़प्पन कह सकती हूँ।
एक बार फिर से आभार नमन।