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Incest Sagar (Completed)

king cobra

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Hum pahli story aur jabardast hai qatil kaun hai yahi point hai meko sak hai lekin dekhta hun sahi hota hai ya noi.story ek number hai kauno sak noi han sex padhna ab pasand noi hamko to usko ingnor kar deta hun to update bahut fast padh raha hun.bina comment ke chala jaun ye mujhe pasand noi hai.bahut badhiya story hai dost
 
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king cobra

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Update 28.

मैं उठकर अपने पैरों पर खड़ा हुआ और अपने कांपते हाथों से एक सिगरेट सुलगाने लगा ।

तब कोठारी का रिवाल्वर वाला हाथ नीचे झुका ।

" मैंने इसे वार्न किया था " - कोठारी बोला -" लेकिन यह मेरे पर गोली चलाने को पुरी तरह से आमादा था ।"

" आप यहां कैसे पहुच गए ? " - मैं फंसे स्वर में बोला ।

" अपने आपको खुशकिस्मत समझो कि मैं यहां पहुंच गया ।"

" लेकिन कैसे ?"

" तुम्हारी ही वजह से । सुबह मनीष जैन के कमरे से बाहर निकल कर जब तुमने अपनी बहन से बातें की थीं तब सारी बातें मैंने सुन ली थी । जिस तरह से तुम खंजर वाली बात की लिपापोती कर रहे थे तो मुझे तुम पर डाउट हो गया था । जब तुम वहां से निकले तभी मैंने तुम्हारे पीछे एक आदमी लगा दिया था । वो तुम्हारे पीछे शुरू से लगा हुआ था । जब उसने मुझे बताया कि तुम रमाकांत के फ्लैट में चले गए हो तो मुझे यह बात बुरी तरह खटकी । लिहाजा मैं सब काम छोड़कर सीधा यहां पहुंच गया जो कि मैंने बहुत अच्छा किया ।"

" आपने कुछ सुना ?"

" हां , सुना । मैं बाहर की होल से कान सटाए रहा था जब तक की तुम्हें बाहर को मार्च करने का हुक्म नहीं मिला ।"

" ओह ! कोठारी सर , मेरी जान बचाने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया ।"

वह मुस्कराया । वह संतुष्ट था कि इतना बड़ा केस हल हो गया था ।

" खंजर और तस्वीर कहां है ?"

मैंने तत्काल खंजर और तस्वीर उसे सौंप दी ।

" अब तुम यहां से निकलो । यहां अब पुलिस का काम है ।"

मैंने तत्काल आदेश का पालन किया ।

जानकी देवी को धोखाधड़ी में शरीक होने , नाजायज और गैरकानूनी तरीके से अपने पति की मौत के बाद किसी और शख्स को अपना पति बनाकर और ट्रस्ट के साथ लगातार फ्राड करते रहने और अमर एवं मनीष जैन के हत्या में रमाकांत का साथ देने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया ।

जानकी देवी ने जेल जाने के बाद एक अच्छा काम किया । उसने अपनी सारी चल और अचल संपत्ति वीणा के नाम कर दिया । बाद में जेल में उससे मिलने वीणा और अनुष्का गई थी जो कि मुझे वीणा से पता चला ।

तीन दिन बाद ----

रीतु जयपुर से वापस आ गई थी । उसके साथ काजल भी अपने फेमिली के साथ आ गई थी ।

दोपहर का समय था । मैं अपने कमरे में आराम कर रहा था कि माॅम ने कहा कि कोई कुरियर वाला आया है । मैं नीचे गया । कुरियर वाले ने एक लिफाफा दिया । लिफाफा मेरे नाम पर था । एक दिन पहले के डेट में केदारनाथ से भेजा गया था । मैं अपने कमरे में चला आया और लिफाफा खोला । लिफाफे के अन्दर एक चिट्ठी थी जिसे अमर की मां ने मुझे भेजा था ।

मैंने पढ़ना शुरू किया ।

सागर बेटा !
भगवान तुम्हें सदैव खुश रखें और लम्बी उम्र दें ।
मैं ये चिट्ठी यहां के एक धर्मशाला में बैठकर लिख रही हूं । अभी दो घंटे पहले मुझे अखबार से पता चला कि मेरे बेटे अमर का क़ातिल अपने गुनाहों का फल पा चुका है । मैंने इस की तस्दीक वहां के वकील सोहन लाल भार्गव से भी कर ली है । अब जाकर मेरे दिल को चैन मिला । अब कहीं जाकर मेरे बेटे अमर के आत्मा को शांति मिली होगी ।
मुझे तुम पर नाज है बेटा । तुमने मेरे बेटे के क़ातिल को ढूंढने के लिए बहुत मेहनत की । तुम्हारे चलते ही मेरे बेटे की आत्मा को शांति मिला है । भगवान तुम्हें हमेशा खुश रखे । बाबा केदारनाथ मेरी उम्र भी तुझे दे दें ।
मुझे ये भी पता चला कि अमर के जीवन में एक लड़की थी । वो वीणा नाम की एक लड़की से प्यार करता था । पागल कहीं का ! अगर मुझे बताता कि वो उससे शादी करना चाहता है कि क्या मैं उसकी शादी नहीं करवाती ? उसे अपनी बेटी बनाकर रखती । क्या हुआ जो वो क्लब में नाचती थी । मैं उसे अपने माथे पर बिठाए रखती । इसी लड़की के लिए उसने उस रमाकांत से दुश्मनी कर ली थी । शायद उसे उस लड़की का कष्ट नहीं देखा गया । वो जो कुछ किया उस लड़की के दुखों को देखकर किया । वो दिल का बुरा लड़का नहीं था । ये तुमसे अच्छा कौन जान सकता है । वो तो तुम्हारा सबसे करीबी दोस्त था न ! क्या तुम्हें लगता है कि वो ये सब पैसों के लिए किया होगा ? तुम तो जानते हो कि उसे रूपए पैसों की कभी भी तंगी नहीं थी ।
बेटा ! एक आखिरी बात कहनी थी क्योंकि थोड़ी देर बाद मैं भी अपने बेटे अमर के पास पहुंच चुकी होंगी । अपने बेटे के अस्थि कलश को लिए गंगा मैया में समाधी ले लुंगी । क्या करूंगी जीकर ! किसके लिए जिऊं ! मैं तो अब तक अपनी सांसें इसीलिए ढो रही थी कि उस हत्यारे को फांसी पर चढ़ते देख सकुं । मेरा बेटा वहां अकेले हैं ! वो मुझे पुकार रहा है ! वो मेरे बगैर कहीं भी रहा ही नहीं !
बेटा ! उसके पापा मरे थे तो वो पांच साल का था ! बहुत छोटा सा ! हमेशा मेरी पल्लू से ही बंधा रहता था ! तब से लेकर हमेशा ऐसा ही रहा ! दो महिने पहले तक भी वो कुछ नहीं करता था । सब कुछ मैं ही करती थी । बेटा.... बेटा.. वो अकेले कैसे करेगा ? मुझे जाना ही होगा । मुझे पता है वो बहुत परेशान हैं । वो जैसा बचपन में था वैसा ही आज भी है । मैं जा रही हूं अपने जिगर के टुकड़े के पास । "

मैं घुटनों के बल बैठ गया और फुट फुट कर रोने लगा ।



दो साल बाद ।

वीणा आज मेरी पत्नी है । अच्छी खासी नौकरी भी है ।
माॅम के लिए जो बुरे खयालात थे उससे मैंने कब का तौबा कर लिया ।
रीतु तो मेरी जान है । वो अभी भी वैसे ही अपने हरकतों से मुझे कभी हंसाती है तो कभी मेरी फजीहत कर देती है ।
काजल से अभी भी उसी तरह बातें करते रहता हूं । लेकिन सिर्फ बातें ही होती है ।
श्वेता दी और जीजू ने अपने फ्लैट को बेचकर दिल्ली में ही एक जगह फ्लैट खरीद लिया ।
श्वेता दी से भी सेक्सुअल सम्बन्ध खतम हो गया है । वो अपने फेमिली में व्यस्त हो गई है ।
अनुष्का और उसके हसबैंड की लाइफ भी ठीक ही चल रही है ।

संजय जी से एक बार बातों के दौरान पता चला कि आगरा में उन्हीं के कर्मचारी ने उन्हें मारने की कोशिश की थी । वो फिलहाल जेल में हैं । कुछ मालिक नौकर का प्रोब्लम था ।
मधुमिता की भी शादी हो गई है और वो बहुत खुश है ।


समाप्त ।

_______________________________________________

माफ कीजिएगा । ये कहानी यहीं समाप्त हो रही है ।
कुछ कमी है मुझमें जो मैं समय का मैनेजमेंट नहीं कर पा रहा ।
मुझे बहुत खुशी है कि एक ऐसे आदमी की कहानी को पसंद किया गया जिसने कभी कोई कविता तक नहीं लिखा हो ।
मैं उन सभी लोगों को शुक्रिया कहता हूं जिन्होंने मुझे इतना बर्दाश्त किया ।
और खास तौर पर फ़ायरफ़ॉक्स भाई का । यदि ये नहीं होते तो मैं शायद बहुत पहले लिखना छोड़ देता ।

थोड़ा सा इमोशनल हूं लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मैं स्टोरी पढ़ना छोडूंगा या कमेंट नहीं करूंगा ।

बहुत बहुत धन्यवाद ।
Badhiya story waise kuch update aur badh sakte the usse muthmaron ka kuch aur halka ho jata lekin hamare hisaab se sab badhiya raha nice ending bhai ji
 
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Dear Sanju ji
आप की लेखनीय काफ़ी हद तक मशहूर लेखक सूरे्न्द्र मोहन पाठक के किरदार सुधीर दि लक्की बास्टर्ड से प्रेरित है
मै भी उनका पंखा ( Fan ) हू
भाई , मेरी लेखनी मे ही नही बल्कि रिव्यू मे भी पाठक साहब की ही छवि नजर आएगी। मै बहुत बड़ा प्रशंसक हूं पाठक साहब का। बहुत सारे सीन्स उन्होने ऐसे लिखे है कि दिमाग मे छप से गए है। :D
 
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Badhiya story waise kuch update aur badh sakte the usse muthmaron ka kuch aur halka ho jata lekin hamare hisaab se sab badhiya raha nice ending bhai ji
लाॅक डाउन का वक्त था और मेरा समय कट नही रहा था। इसलिए वगैर सोचे समझे एक हाॅट इन्सेस्ट कहानी लिखना प्रारंभ किया । वैसे थ्रिलर और सस्पेंस मेरा फेवरेट सब्जेक्ट रहा शुरू से इसलिए यह सीन्स भी डाल दिया।
पहली बार कुछ लिखा तो स्वभाविक था गलतियाँ होगी ही। इस स्टोरी मे बहुत सारी गलतियाँ हुई है।
जब काम का प्रेशर पड़ा तो जल्दबाजी मे इसे खतम करना पड़ा ।
बहुत बहुत धन्यावाद राहुल भाई। :hug:
 
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लाॅक डाउन का वक्त था और मेरा समय कट नही रहा था। इसलिए वगैर सोचे समझे एक हाॅट इन्सेस्ट कहानी लिखना प्रारंभ किया । वैसे थ्रिलर और सस्पेंस मेरा फेवरेट सब्जेक्ट रहा शुरू से इसलिए यह सीन्स भी डाल दिया।
पहली बार कुछ लिखा तो स्वभाविक था गलतियाँ होगी ही। इस स्टोरी मे बहुत सारी गलतियाँ हुई है।
जब काम का प्रेशर पड़ा तो जल्दबाजी मे इसे खतम करना पड़ा ।
बहुत बहुत धन्यावाद राहुल भाई। :hug:
Aapki story me jisne mujhe suru se akhir tak padhne par majboor kiya wo tha suspense mere bhai.ab inna umar ho gayi hai ki sex me bahut kam interest hai upar se faimly wala sab achcha nai lagta hai bilkul bhi lekin aap writer the upar se story inna jabardast thi ki ek baar suru kiya to end par hi ruka.ummid hai aage bhi koi achchi story dikhegi hame aapki aur han index daal dena is baar
 
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लाजवाब लेखनी । अदांज सू.मे.पाठक जैसा । मगर थोड़ा हटके अपनी शैली भी दिखाई । सबसे बढीया बात , जहां ज़रूरी है वहा सेक्स दिखाया हर जगह नहीं,ये बात औरों से अलग करती है
 
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Update 25. Continue.

" तुम सोच रहे होगे कि मैं अमर को कैसे जानती हूं " - वो बोली ।

मैं सोफे पर बैठा अचरज से उसे देखे जा रहा था ।

वो अपनी चाय की कप टेबल पर रख कर खड़ी हुई और धीरे धीरे चलते हुए थोड़ी दुरी पर खिड़की के पास खड़ी हो गई । वो खिड़की की कपाट खोलकर बाहर आसमान की ओर उपर देखने लगी ।

मैं चुपचाप बैठे उसके बोलने की प्रतीक्षा कर रहा था ।

" हम छः महीने से रिलेशनशिप में थे । वो तुम्हारे और अपने मां की अक्सर चर्चा किया करता था । जब श्रेया ने तुम्हारा नाम लिया तभी मैं समझ गई थी कि तुम अमर के दोस्त सागर हो ।"

" लेकिन अमर ने तुम्हारे बारे में हमसे कभी जिक्र नहीं किया ।"

" मैंने ही मना किया था ।"

" लेकिन क्यों ?"

" अपने किस्मत पे एतबार नहीं था ।"

" मैं समझा नहीं ।"

" श्रेया बोली थी कि तुम मेरी बहन को जानते हो ?" - वो पलट कर मुझे देखते हुए बोली ।

उसने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया ।

" एकाध बार मिला था ।"

" कैसी है ?"

" तुम्हें नहीं पता ?"

" जब से अमेठी छोड़कर गई तब से नहीं ।"

" मतलब इतने सालों से तुम दोनों मिली नहीं ?"

मुझे बहुत आश्चर्य हुआ ।

" मिलना तो दूर बात तक नहीं हुई ।"

" कोई फोन वगैरह भी नहीं ?"

" मुश्किल से तो दो वक्त के अनाज का जुगाड होता था तो भला फोन कहां से आता " - वो फिकी मुस्कान करती हुई बोली ।

" अनुष्का एक करोड़पति की पत्नी बन चुकी है । मजे में है ।"

" चलो अच्छा है , कम से कम उसकी लाइफ तो सेट हुई " - वो वापस खिड़की की तरफ पलटते हुए बोली -" अमर के क़ातिल का पता चला ?"

" अभी तक तो नहीं । उसी सिलसिले में तो तुम से बातें करना चाहता था ।"

" मुझे अखबार के जरिए पता चला था । मुझे तो अभी भी विश्वास नहीं हो रहा है कि वो अब इस दुनिया में नहीं है ।"

" तुम्हें किसी पर शक है ?"

" हमने अपने रिलेशन को सभी से छुपा कर रखा था । मैं किस पर शक करूंगी ?"

" जिस वक्त अमर का खून हुआ था उसी समय तुम्हारी बहन अनुष्का मौका-ए-वारदात पर पाई गई थी ।"

" क्या ?" - वो चौंक कर फिर पलटी ।

मैंने उसे अमर के केस से संबंधित सभी चीजें बताई ।

उसके हाव भाव से यही लगता था कि वो इन सारी बातों से अनजान हैं ।

" एंटरटेनमेंट के धंधे में कैसे आ गई ?"

" अनुष्का के जाने के बाद मैं अकेली पड़ गई । मैं ज्यादा पढ़ी लिखी भी तो नहीं थी कि कहीं काम करके दो वक्त की रोटी जुगाड कर सकूं । अनुष्का पढ़ने में तेज थी तो वो छोटे छोटे बच्चों को कोचिंग , ट्यूशन करके दो पैसे कमा लेती थी जिससे किसी भी तरह हो जिंदगी कट ही जा रही थी । लेकिन उसके जाने के बाद मैं क्या करती ? थोड़ी बहुत डांस जानती थी तो शादी ब्याहों में शो करने वाले एक ग्रुप में बतौर डांसर शामिल हो गई । फिर जो सफर वहां से शुरू हुई तो आकर गोल्डन नाईट क्लब में खतम हुई ।"

" क्या अमर से मुलाकात गोल्डन क्लब में हुई थी ?

" नहीं । उससे पहली बार मुलाकात इतफाकन हुईं थी । मेरी एक्सीडेंट हो गई थी । एक कार वाले ने धक्का दे दिया था । उसी ने मुझे हाॅस्पिटल पहुंचाया और इलाज भी करवाया था । फिर वो मुझे देखने हाॅस्पिटल रोज आने लगा । इसी तरह मिलते-जुलते हमारी भावनाएं कब उबलने लगी पता ही नहीं चला ।"

मुझे ताज्जुब हो रहा था कि इतनी बड़ी बात अमर ने मुझसे छुपाई थी ।

" तुमने अमर को अपने रिलेशनशिप के बारे में हमें बताने के लिए इसलिए मना किया था न कि हम तुम्हारे जाॅब को पसन्द नहीं करेंगे । तुम्हें अच्छी लड़की नहीं समझेंगे ?"

" जो काम मैं कर रही हूं उसे सभ्य समाज में अच्छा नहीं माना जाता । है तो ये बदनाम धंधा ही न । हमारी सोसायटी में कैबरे डांसर और काॅल गर्ल मे उन्नीस बीस का ही तो फर्क माना जाता है न ।"

" लेकिन आखिर में तुम दोनों को अपनी शादी के बारे में बताना तो पड़ता ही ?"

" मेरी एक साल की एग्रीमेंट अक्टूबर में खतम हो रही थी । उससे पहले मैं जाॅब नहीं छोड़ सकती थी । जाॅब छोड़ते ही हम बता देते ।"

मैं कुछ देर तक चुपचाप उसे निहारता रहा ।

" मैंने सुना है तुम्हारी एक मौसी भी है ?"

" लगता है अनुष्का ने एकाध मुलाकात में बहुत ही कुछ बता दिया तुम्हें " - वो कटाक्ष करते हुए बोली ।

मैं चुप रहा ।

" हां । एक मौसी है लेकिन हमें तो उसका चेहरा भी याद नहीं है ।"

" मैंने ये भी सुना है वो भी किसी करोड़पति से ब्याही गई थी ।"

" उनके बारे में जो भी हमने सुना था वो मां से ही सुना था । वो मां से बड़ी थी । अनुष्का की तरह उन्होंने भी शादी के बाद फिर कभी अपने मायके में कदम नहीं रखा । मां बोलती थी कि उसने प्रेम विवाह किया था और उसका पति अपने माता-पिता का एकलौता पुत्र था ।"

" तुम्हारे परिवार की आर्थिक स्थिति कैसी थी ?"

" जब तक मां बाप जिंदा थे किसी तरह की दिक्कत नहीं थी । पिता जी एक मील में काम करते थे लेकिन इतना पैसा कमा ही लेते थे कि चारों का गुजारा अच्छे से हो जाता था । जब दोनों की मृत्यु हुई उस वक्त मैं दस साल की और अनुष्का चौदह साल की थी । अनुष्का ने दसवीं कक्षा पास कर ली थी लेकिन मां बाप के मरने के बाद हमारी पढ़ाई बंद हो गई । कोई कमाने वाला नहीं था । मां बाप सम्पत्ति के नाम पर एक छोटा सा टाली का घर और थोड़ी गहने ही छोड़ गए थे , इससे हम क्या कर सकते थे ?"

" उसी गहने को बेचकर अनुष्का दिल्ली चली गई ?"

" हां । उसे पढ़ने का बहुत शौक था । उसकी महत्त्वाकांक्षाएं बहुत बड़ी थी । वो मुझसे छुपा कर गहने बेची थी और दिल्ली चली गई । उसने कहा था कि पढ़ाई पुरी करके जाॅब मिलते ही मुझे बुला लेगी । लेकिन एक बार क्या वो निकली कि फिर.....।"

मुझे अनुष्का पर सच में बहुत गुस्सा आ रहा था ।

" तुम्हारे मौसाजी और मौसी की कोई फोटो है क्या ?"

" एक फोटो थी लेकिन वो मिल नहीं रही है ?"

" ओह ।"

" वैसे एक हमारी फेमिली फोटो है लेकिन उसमें मौसाजी नहीं है "- बोलकर वो अपने कमरे में चली गई ।

थोड़ी देर बाद वो एक पुरानी सी फोटो जो गंदी भी हो गई थी ले आई ।

पांच लोगों का एक फेमिली ग्रुप फोटो था । दोनों बहनें बहुत छोटी थी । वे अपने माता-पिता के गोद में बैठी हुई थी और एक उनकी मौसी थी ।

मौसी की पिक्चर देखते ही मुझे लगा कि इसे मैंने कहीं देखा है । थोड़ी देर देखकर मैंने फोटो उसे वापस कर दिया । वो फोटो लेकर अपने कमरे की तरफ जाने लगी कि मैंने पूछा -
" यहां अकेली रहती हो ?"

" नहीं । एक लड़की के साथ रहती हूं , वो भी मेरे साथ ही काम करती है " - वो जाते जाते बोली ।

मेरे दिमाग में बार बार उसके मौसी की तसबीर आ रही थी । इसे मैंने कहीं देखा तो जरूर है ।

वो कमरे से बाहर आई तो मैं भी खड़ा हो गया ।

" जाने से पहले एक बात पुछना चाहता हूं ?"

" क्या ?"

" अब क्या करोगी ? जाॅब करती रहोगी या छोड़ दोगी ?"

वो फिर से खिड़की के पास चली गई और बाहर की ओर देखने लगी । बहुत देर तक वो वैसे ही खड़ी रही । मुझे लगा वो जबाव नहीं देना चाहती है इसलिए मैं दरवाजे की तरफ बढ़ा ।

दरवाजे पे खड़े होकर उसकी और निगाह डाली। वहां से उसकी शक्ल दिखाई दे रही थी । उसकी आंखें बंद थी और आंखो से दो बूंद आंसू छलक कर गालों पे पड़े हुए थे ।

मैं दरवाजे पर खड़ा हो गया ।

" मां बाप ने बचपन में ही साथ छोड़ दिया " - वो बहुत ही धीमी आवाज में बोल रही थी -" बड़ी बहन ने अपनी मंदबुद्धि बहन को गांव में अकेली छोड़ दिया । छः महीने में पहली बार अमर के रूप में खुशियां मेरी दामन में आई थी लेकिन उसने भी साथ छोड़ दिया । अब ये डांस वाली नौकरी ही तो आखिरी सहारा है......इसे छोड़ कहां जाउंगी ।"

उसकी बातें सुनकर मेरा मन दुःख और वेदना से भर गया । मेरी आंखें बोझिल हो गई ।

मैं उसके पास गया और उसे पकड़ कर अपनी ओर घुमाया ।

वो सिर झुकाए चुपचाप खड़ी रही । मैंने उसके आंसुओं को अपने हथेली से पोंछा ।

" तुम एक बहादुर लड़की हो वीणा । जिस तरह से विपरीत परिस्थितियों में तुमने अपने को संभाला है उससे मेरे दिल में तुम्हारे प्रति बहुत इज्जत है । मैं तुम्हें दिल से नमन करता हूं । तुम्हारे दिन भी पलटेंगे.... और बहुत जल्द पलटेंगे....मेरा पूरा विश्वास है ।"

मैं वहां से भारी मन और दिल में टिश लिए विदा हुआ ।
ये जो प्रकरण आपने लिखा वो ईतना ईमोनशनल बहूत कम पढ़ा है सू.मे.पाठक की नोवेल से । आपने मन जीत लिया
 
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उड़ते पंछी का ठिकाना, मेरा न कोई जहां...
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बेटा , तुझसे एक बात और कहनी थी ।"

" हां आंटी बोलिए ।"

" कल तुम्हारे जीजा और बहन आ रही है तो मैं चाहती हूं कि इस बीच मैं चारों धाम दर्शन करके आ जाऊं ।"

" चारों धाम ! कौन सी चारों धाम ?" - मैं चौंक कर बोला ।

" बद्रीनाथ , केदारनाथ , गंगोत्री और यमुनोत्री ।"

" ओह ! कब जाएंगी ?"

" वो लोग कल यहां आ रहे हैं तो तु परसों की टीकट करवा दे ।"

" ठीक है आंटी.... मैं अब चलता हूं । वैसे आप को कुछ सामान वगैरह मंगवाना है ?"

" हां । कल आना , बता दुंगी ।"

मैं वहां से बाहर निकल गया ।
मुझे तो यही सबसे अजीब लगा अब तक
 
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Update 25. Continue.

" तुम सोच रहे होगे कि मैं अमर को कैसे जानती हूं " - वो बोली ।

मैं सोफे पर बैठा अचरज से उसे देखे जा रहा था ।

वो अपनी चाय की कप टेबल पर रख कर खड़ी हुई और धीरे धीरे चलते हुए थोड़ी दुरी पर खिड़की के पास खड़ी हो गई । वो खिड़की की कपाट खोलकर बाहर आसमान की ओर उपर देखने लगी ।

मैं चुपचाप बैठे उसके बोलने की प्रतीक्षा कर रहा था ।

" हम छः महीने से रिलेशनशिप में थे । वो तुम्हारे और अपने मां की अक्सर चर्चा किया करता था । जब श्रेया ने तुम्हारा नाम लिया तभी मैं समझ गई थी कि तुम अमर के दोस्त सागर हो ।"

" लेकिन अमर ने तुम्हारे बारे में हमसे कभी जिक्र नहीं किया ।"

" मैंने ही मना किया था ।"

" लेकिन क्यों ?"

" अपने किस्मत पे एतबार नहीं था ।"

" मैं समझा नहीं ।"

" श्रेया बोली थी कि तुम मेरी बहन को जानते हो ?" - वो पलट कर मुझे देखते हुए बोली ।

उसने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया ।

" एकाध बार मिला था ।"

" कैसी है ?"

" तुम्हें नहीं पता ?"

" जब से अमेठी छोड़कर गई तब से नहीं ।"

" मतलब इतने सालों से तुम दोनों मिली नहीं ?"

मुझे बहुत आश्चर्य हुआ ।

" मिलना तो दूर बात तक नहीं हुई ।"

" कोई फोन वगैरह भी नहीं ?"

" मुश्किल से तो दो वक्त के अनाज का जुगाड होता था तो भला फोन कहां से आता " - वो फिकी मुस्कान करती हुई बोली ।

" अनुष्का एक करोड़पति की पत्नी बन चुकी है । मजे में है ।"

" चलो अच्छा है , कम से कम उसकी लाइफ तो सेट हुई " - वो वापस खिड़की की तरफ पलटते हुए बोली -" अमर के क़ातिल का पता चला ?"

" अभी तक तो नहीं । उसी सिलसिले में तो तुम से बातें करना चाहता था ।"

" मुझे अखबार के जरिए पता चला था । मुझे तो अभी भी विश्वास नहीं हो रहा है कि वो अब इस दुनिया में नहीं है ।"

" तुम्हें किसी पर शक है ?"

" हमने अपने रिलेशन को सभी से छुपा कर रखा था । मैं किस पर शक करूंगी ?"

" जिस वक्त अमर का खून हुआ था उसी समय तुम्हारी बहन अनुष्का मौका-ए-वारदात पर पाई गई थी ।"

" क्या ?" - वो चौंक कर फिर पलटी ।

मैंने उसे अमर के केस से संबंधित सभी चीजें बताई ।

उसके हाव भाव से यही लगता था कि वो इन सारी बातों से अनजान हैं ।

" एंटरटेनमेंट के धंधे में कैसे आ गई ?"

" अनुष्का के जाने के बाद मैं अकेली पड़ गई । मैं ज्यादा पढ़ी लिखी भी तो नहीं थी कि कहीं काम करके दो वक्त की रोटी जुगाड कर सकूं । अनुष्का पढ़ने में तेज थी तो वो छोटे छोटे बच्चों को कोचिंग , ट्यूशन करके दो पैसे कमा लेती थी जिससे किसी भी तरह हो जिंदगी कट ही जा रही थी । लेकिन उसके जाने के बाद मैं क्या करती ? थोड़ी बहुत डांस जानती थी तो शादी ब्याहों में शो करने वाले एक ग्रुप में बतौर डांसर शामिल हो गई । फिर जो सफर वहां से शुरू हुई तो आकर गोल्डन नाईट क्लब में खतम हुई ।"

" क्या अमर से मुलाकात गोल्डन क्लब में हुई थी ?

" नहीं । उससे पहली बार मुलाकात इतफाकन हुईं थी । मेरी एक्सीडेंट हो गई थी । एक कार वाले ने धक्का दे दिया था । उसी ने मुझे हाॅस्पिटल पहुंचाया और इलाज भी करवाया था । फिर वो मुझे देखने हाॅस्पिटल रोज आने लगा । इसी तरह मिलते-जुलते हमारी भावनाएं कब उबलने लगी पता ही नहीं चला ।"

मुझे ताज्जुब हो रहा था कि इतनी बड़ी बात अमर ने मुझसे छुपाई थी ।

" तुमने अमर को अपने रिलेशनशिप के बारे में हमें बताने के लिए इसलिए मना किया था न कि हम तुम्हारे जाॅब को पसन्द नहीं करेंगे । तुम्हें अच्छी लड़की नहीं समझेंगे ?"

" जो काम मैं कर रही हूं उसे सभ्य समाज में अच्छा नहीं माना जाता । है तो ये बदनाम धंधा ही न । हमारी सोसायटी में कैबरे डांसर और काॅल गर्ल मे उन्नीस बीस का ही तो फर्क माना जाता है न ।"

" लेकिन आखिर में तुम दोनों को अपनी शादी के बारे में बताना तो पड़ता ही ?"

" मेरी एक साल की एग्रीमेंट अक्टूबर में खतम हो रही थी । उससे पहले मैं जाॅब नहीं छोड़ सकती थी । जाॅब छोड़ते ही हम बता देते ।"

मैं कुछ देर तक चुपचाप उसे निहारता रहा ।

" मैंने सुना है तुम्हारी एक मौसी भी है ?"

" लगता है अनुष्का ने एकाध मुलाकात में बहुत ही कुछ बता दिया तुम्हें " - वो कटाक्ष करते हुए बोली ।

मैं चुप रहा ।

" हां । एक मौसी है लेकिन हमें तो उसका चेहरा भी याद नहीं है ।"

" मैंने ये भी सुना है वो भी किसी करोड़पति से ब्याही गई थी ।"

" उनके बारे में जो भी हमने सुना था वो मां से ही सुना था । वो मां से बड़ी थी । अनुष्का की तरह उन्होंने भी शादी के बाद फिर कभी अपने मायके में कदम नहीं रखा । मां बोलती थी कि उसने प्रेम विवाह किया था और उसका पति अपने माता-पिता का एकलौता पुत्र था ।"

" तुम्हारे परिवार की आर्थिक स्थिति कैसी थी ?"

" जब तक मां बाप जिंदा थे किसी तरह की दिक्कत नहीं थी । पिता जी एक मील में काम करते थे लेकिन इतना पैसा कमा ही लेते थे कि चारों का गुजारा अच्छे से हो जाता था । जब दोनों की मृत्यु हुई उस वक्त मैं दस साल की और अनुष्का चौदह साल की थी । अनुष्का ने दसवीं कक्षा पास कर ली थी लेकिन मां बाप के मरने के बाद हमारी पढ़ाई बंद हो गई । कोई कमाने वाला नहीं था । मां बाप सम्पत्ति के नाम पर एक छोटा सा टाली का घर और थोड़ी गहने ही छोड़ गए थे , इससे हम क्या कर सकते थे ?"

" उसी गहने को बेचकर अनुष्का दिल्ली चली गई ?"

" हां । उसे पढ़ने का बहुत शौक था । उसकी महत्त्वाकांक्षाएं बहुत बड़ी थी । वो मुझसे छुपा कर गहने बेची थी और दिल्ली चली गई । उसने कहा था कि पढ़ाई पुरी करके जाॅब मिलते ही मुझे बुला लेगी । लेकिन एक बार क्या वो निकली कि फिर.....।"

मुझे अनुष्का पर सच में बहुत गुस्सा आ रहा था ।

" तुम्हारे मौसाजी और मौसी की कोई फोटो है क्या ?"

" एक फोटो थी लेकिन वो मिल नहीं रही है ?"

" ओह ।"

" वैसे एक हमारी फेमिली फोटो है लेकिन उसमें मौसाजी नहीं है "- बोलकर वो अपने कमरे में चली गई ।

थोड़ी देर बाद वो एक पुरानी सी फोटो जो गंदी भी हो गई थी ले आई ।

पांच लोगों का एक फेमिली ग्रुप फोटो था । दोनों बहनें बहुत छोटी थी । वे अपने माता-पिता के गोद में बैठी हुई थी और एक उनकी मौसी थी ।

मौसी की पिक्चर देखते ही मुझे लगा कि इसे मैंने कहीं देखा है । थोड़ी देर देखकर मैंने फोटो उसे वापस कर दिया । वो फोटो लेकर अपने कमरे की तरफ जाने लगी कि मैंने पूछा -
" यहां अकेली रहती हो ?"

" नहीं । एक लड़की के साथ रहती हूं , वो भी मेरे साथ ही काम करती है " - वो जाते जाते बोली ।

मेरे दिमाग में बार बार उसके मौसी की तसबीर आ रही थी । इसे मैंने कहीं देखा तो जरूर है ।

वो कमरे से बाहर आई तो मैं भी खड़ा हो गया ।

" जाने से पहले एक बात पुछना चाहता हूं ?"

" क्या ?"

" अब क्या करोगी ? जाॅब करती रहोगी या छोड़ दोगी ?"

वो फिर से खिड़की के पास चली गई और बाहर की ओर देखने लगी । बहुत देर तक वो वैसे ही खड़ी रही । मुझे लगा वो जबाव नहीं देना चाहती है इसलिए मैं दरवाजे की तरफ बढ़ा ।

दरवाजे पे खड़े होकर उसकी और निगाह डाली। वहां से उसकी शक्ल दिखाई दे रही थी । उसकी आंखें बंद थी और आंखो से दो बूंद आंसू छलक कर गालों पे पड़े हुए थे ।

मैं दरवाजे पर खड़ा हो गया ।

" मां बाप ने बचपन में ही साथ छोड़ दिया " - वो बहुत ही धीमी आवाज में बोल रही थी -" बड़ी बहन ने अपनी मंदबुद्धि बहन को गांव में अकेली छोड़ दिया । छः महीने में पहली बार अमर के रूप में खुशियां मेरी दामन में आई थी लेकिन उसने भी साथ छोड़ दिया । अब ये डांस वाली नौकरी ही तो आखिरी सहारा है......इसे छोड़ कहां जाउंगी ।"

उसकी बातें सुनकर मेरा मन दुःख और वेदना से भर गया । मेरी आंखें बोझिल हो गई ।

मैं उसके पास गया और उसे पकड़ कर अपनी ओर घुमाया ।

वो सिर झुकाए चुपचाप खड़ी रही । मैंने उसके आंसुओं को अपने हथेली से पोंछा ।

" तुम एक बहादुर लड़की हो वीणा । जिस तरह से विपरीत परिस्थितियों में तुमने अपने को संभाला है उससे मेरे दिल में तुम्हारे प्रति बहुत इज्जत है । मैं तुम्हें दिल से नमन करता हूं । तुम्हारे दिन भी पलटेंगे.... और बहुत जल्द पलटेंगे....मेरा पूरा विश्वास है ।"

मैं वहां से भारी मन और दिल में टिश लिए विदा हुआ ।
ये अमेठी नाम कैसे दिमाग में आ गया? 😂😂
 
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Update 8.


दोपहर बाद जब मैं घर पहुंचा तो माॅम ने खाना लगाया । रीतु अपनी सहेली काजल से मिलने गयी थी । मैं अपने कमरे में गया । कुछ देर आराम करने करने के बाद पैराडाइज क्लब चला गया । आज कुलभूषण खन्ना नहीं आया था । वहां ड्यूटी देने के बाद मैंने कुलभूषण खन्ना के असिस्टेंट से एक दिन की छुट्टी लेकर घर आ गया । आठ बज गए थे लेकिन अभी तक रीतु आईं नहीं थी । माॅम से पूछा तो उन्होंने कहा वो नौ बजे तक लौटोगे । माॅम ने खाने के लिए पुछा तो मैंने रीतु के आने तक इन्तजार करने के लिए कहा ।


मैं अपने कमरे में गया । कपड़े बदले और छत पर टहलने लगा । तभी मुझे याद आया कि मैंने अपने ब्लेजर और पैंट तो लांड्रिंग में दिए हैं, वो तो मैं लाना ही भूल गया । मैंने रीतु को फोन लगाया और उससे पूछा वो अभी काजल के पास ही है या वहां से निकल गई है तो उसने कहा आधे घंटे में निकल रही है । मैंने उससे कहा कि आते समय रास्ते में ही जो लाउंड्री है और उससे मेरी बात करा देना और मेरी कपड़े लेती आना ।

पहले तो बड़ी आना कानी करी कि वो लांड्रिंग वाला उसके आते वक्त रास्ते में नहीं पड़ेगा , वो जगह दुर है , वो बस से नहीं आयेगी , बस से आने से कपड़े खराब हो जायेंगे , गर्मी से मेरी पोलिस उत्तर जायेगी , कैब से आयेगी , कैब के भाड़े के पैसे नहीं हैं , तब मैंने बड़ी मुश्किल से उसे कपड़े लेकर आने के लिए तैयार किया ।

रीतु को किसी बात के लिए convince कराना बड़ी टेड़ी खीर है । ये शर्तिया अपने हसबैंड को नाकों चने चबवा देगी । मैं जा कर अपने बेड पर लेट गया और पिछले दिनों के बारे में सोचने लगा ।

करीब एक आध घंटे बाद रीतु आईं और मेरे आयरन किए हुए कपड़े सलिके से बिस्तर पर रख दी । मैंने उसे देखा वो इस वक्त एक हरे रंग का सलवार सूट पहनी थी । उसके शरीर से आती वही जानी पहचानी खुशबू । हमेशा की तरह जगमग जगमग ।

" बस में तुम्हारी पालिश तो ‌नही उतरी ।" मैंने कहा ।

" नहीं उतरी ।" वो खड़े खड़े ही बोली ।

" अंदेशा तो बहुत था तुम्हें ।"

" हां । अलबत्ता उससे ज्यादा बुरी बात हो गई ।"

" क्या ?" मैं सशंकित स्वर में बोला ।

" बस में कुछ लफंगे सवार थे ।"

" ओहो !" - मैं हमदर्दी भरे स्वर में बोला - " उन्होंने तुम्हें छेड़ा होगा , गन्दे इशारे किए होंगे , फब्तियां कसी होंगी ।"

" इससे भी बुरा किया कमीनों ने ।"

" अच्छा !" क्या किया उन्होंने ?"

" उन्होंने मुझे हर तरह से नजर अंदाज कर दिया , मेरी तरफ झांका भी नहीं , पीठ फेर ली मेरी तरफ से ।"

" यह तो वाकई बुरा किया कमीनों ने ।"

" हां न । आप यदि मुझे कैब से आने को बोले होते तो क्या होती मेरी इतनी बेइज्जती ।" " आप ..........."

उसकी बक बक शुरू हो गई थी और मैं चुपचाप उसे देखे जा रहा था । मैं जानता था कि वो कैब से ही आयी होगी लेकिन उसे तो मुझसे अपनी बक बक करनी थी । मुझे तो उसकी बक बक भी बहुत प्यारी और सेक्सी लगती थी । उसके बोलने का अंदाज , उसके लबों का हिलना, उसके हाथों का झटकना, बोलते वक्त उसके लटो का उसके गालों को चूमना । मैं तो जैसे कहीं खो गया था ।

" लगता है अभी तक आपने डीनर नहीं किया ।"

" क.. क्या कहा ? " मैं जैसे होश में आया ।

" मैंने कहा लगता है अभी तक आपने डीनर नहीं किया ।"

" कैसे जाना ?" मैं हकबकाया ।

" आंखों ही आंखों में मुझे निगल जाने की कोशिश जो कर रहे हो ।"

" सिर्फ कोशिश कर रहा हूं ।" - मैंने नकली आह भरी - " कोशिशें तो मैं और भी बहुत करता हूं लेकिन कामयाब कहां हो पाता हूं ।"

" कयी बार कोशिश में कामयाबी से ज्यादा मजा आता है ।"

" वो कैसे ?"

" कोशिश इनसान बार बार करता है । कामयाबी के बाद वो कहानी खतम हो जाती है ।"

" क्या बात है , आज तो बड़ी काबिलियत भरी बातें कर रही है ।"

" मैं अक्सर काबिलियत भरी बातें करती हूं , खास तौर से सूर्य अस्त होने के बाद ।"

" गुड । अब अपनी प्रवचन बन्द कर मुझे जोरों से भुख लगी है ।"

" तो मैंने आपको खाने से रोका है कब से खुद ही बक बक किये जा रहे हो ।" वो अपनी आंखें तरेरती हुई बोली ।


फिर खाना खाने के बाद मैं अपने कमरे में आ गया और आगरा जाने के लिए अपने बैग तैयार किया और फिर बिस्तर के हवाले हो गया ।



सुबह साढ़े आठ बजे होंगे जब मैं गाजियाबाद श्वेता दी के फ्लेट पहुंचा । जीजा अपने कमरे में आराम कर रहा था । श्वेता दी तैयार हो गई थी । उन्होंने पीले रंग की साड़ी पहनी हुई थी । बिना आस्तीन का ब्लाउज जिसमें उनके गोरी माशल भुजाएं काफी आकर्षित लग रही थी । ब्लाउज का गला v आकार का था जिसमें से उनकी cleavage कुछ हद तक नुमाइश हो रही थी । गले में मंगलसूत्र के अलावा बदन पर कुछ और भी गहने पहन रखी थी । उनका गदराया हुआ यौवन किसी भी इन्सान को घायल करने के लिए पर्याप्त था ।

मैंने नाश्ता वहीं किया फिर जीजा से इजाजत लेकर हम दोनों कार लेकर वहां से निकल गये । मैं ड्राइव कर रहा था और वो आगे वाली सीट पर मेरे बगल बैठी थी । कुछ दुर तक हम शान्त ही रहे । जब कार भीड़ भाड़ वाले एरिया से बाहर निकल मेन रोड पर आई तब श्वेता दी ने कहा ।

" अब बताओ क्या बात है "

" कैसी बात ? " मैंने नजरें स्क्रीन से हटाकर उनकी तरफ देखा ।

" जब तुम राजीव से प्रायवेट बात करने को बोल कर मुझे वहां से हटने के लिए बोले थे।"

" ओह ! वो । " मैं वापस नजरें स्क्रीन पर रखते हुए कहा - " " बता दुंगा , थोड़ी धीरज रखो ।"

" नहीं । अभी बताओ ।"

" वो काफी लम्बी कहानी है , इस वक्त कार ड्राइव करते हुए कैसे बोल सकता हूं । एक काम करते हैं वहां पहुंच कर बताता हूं । वहां अकेले में हमें काफी समय मिलेगा ।"

" ओके ।" बोलकर वो चुप हो गई । कुछ देर बाद वो एक्साइटेड हो कर बोली - " आज कितने दिनों के बाद न हम किसी पार्टी में शामिल हो रही हैं , कितना मजा आयेगा । है ना ।"

" हां । तुम्हारे शादी के बाद पहली बार ।" - मैंने मुस्कराते हुए कहा ।

" हां । जब हम छोटे थे कितने मस्ती करते थे , कितने झगड़ते थे । "- वो कहीं खोई खोई सी बोली । - " और अब जैसे लगता है मैं अपना बचपन भुल गयी हूं ।"

" अच्छा तो है , अब शादी शुदा जिंदगी की लुत्फ उठा रही हो । इतना अच्छा प्यार करने वाला पति मिला है । वैसे भी जिन्दगी का चक्र तो हमेशा बदलते रहता है ।"

" हां । " वो चुपचाप सी हो गई ।

" सब ठीक है ना ? "

" हां । सब ठीक ठाक है ।" - वो अचानक से अलग रंग में आते हुए बोली - " छोड़ो वो सब , कोई गाना वाना लगाओ । किशोर कुमार के मस्त गाने ।"

करीब एक घंटे बाद वो गाने से बोर होने लगी तो मैंने कहा अगर नींद आ रही हो तो सो जाओ । मगर उसनेे मना कर दिया । और खुद ही तरन्नुम में शायरी करने लगी -

" फिर मुझे दीदा - ए - तर याद आया ,
दिल जिगर तश्रना ए फरियाद आया ,
दम लिया था ना कयामत ने हनोज ,
फिर तेरा वक्त ए सफ़र याद आया । "

" वाह ! वाह । शायरी की तुकबंदी तो बहुत अच्छी है लेकिन मुझे समझ नहीं आया ।" मैंने उनको शाबाशी देते हुए कहा ।

वो हंसते हुए बोली - " मुझे उर्वशी ने सुनाया था पर सच कहूं तो मुझे भी इसका अर्थ नही पता ।"

" उर्वशी ऐसी भी शायरी करती है मगर मुझे तो ..." मैं अचरज से बोला ।

" क्या मुझे तो ? " वो प्रश्न सूचक दृष्टि डाली ।

" नहीं , कुछ नहीं ।"

" तुम कुछ छुपा रहे हो , मेरी कसम बोलो ।"

" मुझे तो बड़ी सिम्पल और अच्छी अच्छी शायरी भेजती हैं ।" मैंने धीरे से कहा ।

" क्या मतलब ? - वो अचरज से बोली - " उर्वशी तुम्हें शायरी मैसेज करती है ।"

" हां । इसमें अचरज की बात क्या है , तुम्हीं ने तो कराई थी हमारी जान पहचान , भुल गयी ? "

" नहीं ।" वो अभी भी शंकित नजरों से मुझे घुर रही थी - " वैसे वो क्या क्या मैसेज करती थी ? "

" अरे यार ! क्यों हलकान होती है , वहीं सिम्पल साधारण सी मैसेज ।"

" मुझे दिखाओ ।" मुझे घुरते हुए बोली ।

" ठीक है बाबा ! आगरा चल के देख लेना ।"

वो आश्वस्त नहीं हुई ।

" क्या अब भी , मेरा मतलब ‌शादी के बाद भी मैसेज करती है ? "

" हां । अभी भी करती है । परसों ही तो किया था ।" - मैंने उसे और छेड़ते हुए कहा ।

" और तुम ? क्या तुम भी करते हो ? "

" मैं भी करता हूं ।"

अब श्वेता दी के मन मन्दिर में उथल-पुथल मच गई थी । वो काफी देर तक चुप रही फिर बोली -

" अच्छा परसों वो क्या मैसेज की थी ? "

" अरे यार ! कितनी शकी हो । मैंने कहा न आगरे में बता दुंगा ।"

" नहीं । परसो वाली मैसेज बताओ बाकी वहां बता देना ।" उसने जीद पकड़ ली ।

मैं सोचता हुआ बोला - " मुझे पुरी तरह से याद नहीं आ रहा है ।"

" कुछ तो याद होगा वहीं बताओ ।"

" ठीक है , मुझे सोचने दो ।"

वो बैठे बैठे ही पहलु बदल रही थी और मैं ड्राइव करते हुए थोड़ी सोचने की मुद्रा में आ गया ।

" अभी याद नहीं आ रहा है ।" मैंने ललाट सहलाते हुए कहा ।

" चुपचाप सीधी तरह से बताओ नहीं तो अभी गाड़ी से ढकेल दुंगी ।" वो आंखें तरेरते हुए बोली ।

" हद है यार । ठीक है याद करने की कोशिश करता हूं ।" - थोड़ी देर बाद बोला - " हां , कुछ कुछ याद आया , बोलता हूं ।"

" सुनो ।"

वो मुझे अपलक देखती रही ।

" तेरी बु...."( मैं यहां बु बोलकर अटक गया जैसे कि मैं भुल गया हूं )

वो चौंकी ।

" तेरी बुटदार चु...." ( मैं अब चु पर अटक गया )

वो इस बार अपनी आंखें फैलाई । ये देख मैं जल्दी से बोला -

" तेरी बुटदार चुनर को देख कर मेरा झां....( अब मैं झां पर अटक गया )

अब उसके चेहरे के रंग बदलने लगे थे । उसके गुस्सा होने से पहले मैंने वाक्य पुरी की -

" तेरी बुटदार चुनर को देख कर मेरा झांझर सा दिल डोल उठा ।"

अब वो थोड़ी नोर्मल हुई तो फिर आगे का लाईन बोलना शुरू किया ।

" तेरी बुटदार चुनर को देख कर मेरा झांझर सा दिल डोल उठा ।
तेरी चु....( अब फिर मैं चु पर अटक गया और याद करने का नाटक करने लगा )

वो मुझे बिना पलक झुकाए मुझे देख रही थी । मैंने उसे देखा फिर आगे का लाईन बोलना शुरू किया -

" तेरी चुन-चुन करती पायल ने मेरा लन्ड....." ( इस बार मैं लन्ड पर अटक गया )

उसके चेहरे के हाव-भाव से लग रहा था कि अब ज्वालामुखी फटने ही वाला है इसलिए मैंने जल्दी से अगले लाईन को भी पुरा किया -

" मेरा लंडन जाना रोक दिया ।" - बोलकर मैंने उसे देखा और उसे शायराना अंदाज़ में पुरी शायरी एकसाथ कहा ।

" तेरी बुटदार चुनर को देख कर , मेरा झांझर सा दिल डोल उठा ।
तेरी चुन-चुन करती पायल ने , मेरा लंडन जाना रोक दिया । "

वो मुझे गुस्से से अपनी आंखें बड़ी बड़ी करके अपलक देखे जा रही थी ।

मैंने कहा - " ऐसे क्या देख रही हो ? मैंने तो पहले ही कहा था मुझे याद नहीं आ रहा है ।...... वैसे शायरी अच्छी थी न ? "

उसने एक जोरदार का पंच मेरे बांह पर मारा ।

" अरे ! क्या करती हो ? एक्सीडेंट हो जाएगा ।" - मैंने अपने हाथ सहलाते हुए कहा ।

" मैं सब समझती हूं । तुम न ! तुम्हे ना मैं वहां जाके आगरा के पागलखाने में भर्ती करवा दुंगी । तुम पहले पहुंचो वहां ।" - उसने मुझे घुरते हुए कहा ।

" मुझे एक और याद आ गया । सुनाऊं ? " मैंने उसे छेड़ते हुए कहा ।

" जरुरत नहीं है । चुपचाप गाड़ी चलाओ । - मुझे घुरते हुए ही बोली - " और रास्ते में कहीं होटल के सामने रुकना "

" क्यों ? भुख लगी है क्या ? अरे ! कितना खाती हो यार दो ढाई घंटे पहले ही तो खाया था, मोटी हो जाओगी । जानती हो , मोटापा न अपने आप में एक गम्भीर बिमारी है । तुम्हारी ये छरहरी काया ..."

" चुप रहो " - मुझे बीच में टोकते हुए बोली - " बकवास बंद करो । मुझे बाथरूम जाना है ।"

" बाथरूम ! ... बाथरूम क्यों ? घर में नहाई नहीं थी क्या या सिर्फ हाथ मुंह धोना है ।"

" तुम ! " - वो गुस्से से देखी - " टायलेट जाना है । अब ये मत पूछना कि टायलेट क्यों जाना है ।"

" ठीक है नहीं पूछूंगा । वैसे एक बात कहूं ? "

" क्या ?"

" मैं पुछने वाला था ।"

" तुम एक नम्बर के कमीने हो ।" - कहकर फिर मेरे बगल में घुसा मारा ।

कुछ दुर जाने के पश्चात एक होटल जो ठीक ठाक ही था मिला । हम कार से उतर कर होटल की तरफ चल दिए ।
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