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Wah komalji wah. Erotic lady cuckold ehsas to aap hi deti ho. Jo muje kisi bhi kahani me nahi milta. Aur to ye me khud ki story me bhi likhne ki bahot kosis kar chuki hu. Par ye likhna mere bhi bas ki nahi hai. Kabhi kabhi me ye likhne ke lie aap ki story se kuchh ehsas chura leti hu. Chhutki ki kahani ka train vala seen aaj tak nahi bhuli.खुसखबरी
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मेरी भी आँख लग गयी,
एक घडी मैं सोई होउंगी मुश्किल से और जब नींद खुली तो रात ने अपने कदम समेटने शुरू कर दिए थे।
आसमान जो गाढ़ी नीली स्याही से पुता लगता था अब स्लेटी हो गया था, पेड़ जो सिर्फ छाया लग रहे थे वो थोड़ा बहुत दिखने लगे थे, लेकिन भोर होने में अभी भी टाइम था,
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तभी कुछ आहट सी हुयी, दरवाजा खुलने बंद होने की, और मुझे याद आया आज भोर होने के पहले करीब चार बजे ही इन्हे खेत पे जाना था, गेंहू की कटनी की तैयारी के लिए अभी हफ्ता दस दिन बाकी था कटनी शुरू होने में और कटनी तो एक पहर रात रहते शुरू हो जाती,
मैंने निकल के दरवाजा बंद किया और सीधे ननद के कमरे में।
ननद थेथर पड़ी थी।
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हिलने को कौन कहे, आँख खोलने की ताकत नहीं लग रही थी, मेरे मर्द ने आज अपनी बहिनिया को कुचल के रख दिया था, जाँघों पर, मेरे मरद के वीर्य के थक्के पड़े थे, बुर से अभी भी बूँद बूँद कर मलाई रिस रही थी।
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मैंने उनका हाथ पकड़ के सहारा देकर उठाया, उनकी मुस्कराती आँखों ने मेरे बिन पूछे सवाल को समझ लिया था, बुदबुदाते बोलीं,
' पूरे पांच बार, हिला नहीं जा रहा है "
नीचे पड़ी साडी उठा के बस अपने बदन पे उन्होंने डाल लिया, लेकिन अबकी उन्होंने जो अपनी दीये जैसे बड़ी बड़ी आँखों को उठा के देखा मैं उनका डर समझ गयी, बस हाथ दबा के, अपनी ओर दुबका के मैंने बिस्वास दिलाया, बिन कहे,
' होलिका माई की बात याद रखिये बस'
कुछ देर में हम लोग कच्चे आंगन में जहाँ पांच दिन पहले रात में मैंने ननद ने बच्चे वाली पट्टी से चेक किया था, साथ साथ मूत के, दोनों की एक लाइन, न मैं गाभिन न वो। आज फिर उकडू मुकड़ू हम दोनों बैठ गए, जाँघे फैला के, ननद के जाँघों के बीच मैंने गुदगुदी लगाई, और छेड़ा,
" अरे मूता कस के, रोकी काहें हो "
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पहले तो एक दो बूँद, फिर तेज धार, अब ननद चाह के भी रोक नहीं सकती थीं,
बस मैंने उस जांच वाली पट्टी को, जैसे आशा बहु ने समझाया था सीधे मूत की धार में, और फिर हटा लिया, और मैं भी ननद के साथ
जब हम दोनों उठे, तो बड़ी देर तक मैं वो जांच पट्टी हाथ में लिए देवता पित्तर, होलिका माई की दुहाई, फिर खोल के देखा, दो लाइन लग तो रही थी,
ननद परेशान का हुआ, लेकिन आंगन के उस कोने में अँधेरा सा था, जिधर रौशनी थी, हम दोनों उधर आये,
भोर बस हुआ चाहती थी, हलकी सफेदी सी लग रही थी, एकाध चिड़िया चिंगुर बोलने लगे थे,
ननद को मैंने दूर कर दिया और अब साफ़ साफ़ देखा,
पक्का दो लाइन,
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मेरी मुस्कान से ही वो समझ गयीं, एक बार पूरब मुंह हो के मैंने हाथ जोड़ा और दौड़ के ननद को बाँहों में भर लिया और वो मारे ख़ुशी के चिल्लाई,
" भौजी, हमार भौजी.... "
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ख़ुशी के मारे न मुझसे बोला जा रहा था न मेरी ननद से, जैसे छोटे छोटे बच्चे आंगन में बादल आने पर गोल गोल घूमते हैं हाथ फैला के, गोल गोल चक्कर काटते हुए बस हम दोनों ननद भौजाई, उसी तरह
फिर मैंने अपनी ननद को बाहों में भर लिया, क्या कोई मर्द किसी औरत को दबोचता होगा, और कस कस के उनको चूमते, होंठों को चूसते बोली,
" मिठाई खाउंगी, पेट भर, "
" एकदम खियाइब लेकिन तबतक नमकीन खारा ही, "
सच में पक्की बदमाश ननद, और मेरा सर खींच के अपनी जाँघों के बीच, जहां अभी भी, लेकिन कौन भौजाई ननद क रसमलाई छोड़ती है, जो मैं छोड़ती, बस बिना ये सोचे की वहां अभी,
कस कस के चूसने चाटने लगी, और फिर दोनों फांको को फैला के ननद की चूत से बोली,
" अरे चूत महरानी, आपकी जय हो, जउन बढ़िया खबर आप दिहु, जउने चूत में हमरे मरद क लंड गपागप गया, जेकर मलाई खाऊ, ओहि चूत में से नौ महीने के बाद अँजोरिया अस गोर गोर बिटिया हो, खूब सुन्दर "
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नन्द मेरी बात सुन के खिलखिला रही थीं, हंस रही थीं, लेकिन हँसते खिलखिलाते आगे की बात मेरी ननद ने ही पूरी की,
" और ओह बिटिया की चूत में हमरे भाई क,हमरे भौजाई के मरद क लंड गपागप सटासट जाए "
और मैंने नन्द को अँकवार में लेटे लेटे ही भेंट लिया।
थोड़ी देर में हम दोनों बोलने लायक हुए तो उसी हालत में लथर पथर,... सास के सामने हम दोनों,
हम दोनों को देख के वो समझ गयीं खुशखबरी, उनके चेहरे की चमक मुस्कान रुक नहीं रही थी, उन्होंने हाथ बढ़ाया और मेरी ननद उनकी बाहों में
देर तक माँ बेटी भेंटती रही, न बेटी बोली न माँ, बस माँ कभी बेटी के खुले बालों पे हाथ फेरतीं, कभी पीठ सहलातीं, फिर उन्होंने मेरी ओर हाथ बढ़ाया,
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लेकिन मैंने मना कर दिया, " आज आपकी बात नहीं मानूंगी "
उन्होंने मेरे गौने उतरने के अगले दिन ही मना कर दिया था की मैं उनके गोड़ न छूउ, वो मुझे बेटी की तरह ले आयी हैं।
घूंघट माथे से नीचे लाकर, दोनों हाथों से आँचल पकड़ के माथे को सास के दोनों पैरों पर लगाकर पांच बार मैंने सास के पैर छुए और बस यही मन में मांग रही थी,
" मेरी ननद खुश रहे, नौ महीने में बिटिया ठीक से हो अच्छे से हो, किसी की नजर न लगे हमरे ननद के सुख पे "
Bilkul sahi. Ab sidha holika mai ko pujna bhi jaruri hai. Unke ashirwad se hi to nandiya chhinar chudakad bitiya janegi. Tabhi to marad bahen chod se bhanji/beti chod banega.होलिका माई का स्थान,
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सास ने मुझे पकड़ के उठाया और गले लगाया, फिर हम दोनों को हड़काते समझाते बोलीं,
" अच्छा अब चलो, जल्दी से ननद भौजाई नहा धो के तैयार हो के, भोरे मुंह, पहले होलिका माई के स्थान पे, फिर सत्ती माई क चौरा और दोपहरिया क जाके देवी माई के यहाँ मिठाई चढ़ा के, और सांझी के हम बरम बाबा के हलवा पूड़ी चढ़ा के आइब "
हम ननद भौजाई हँसते बिहँसते जैसे ही कमरे से बाहर ही निकल रहे थे की सास ने फिर टोका,
" और एक बात, आज से ही सोहर जिन गावे लगा "( सोहर - बच्चे के जन्म पर गाये जाना वाला गीत )
ननद मेरी खूब तैयार हो के, लाल रंग की चूनर, पैरों में कड़ा छडा हजार घूंघर वाली पाजेब, हंसती बिहँसती, और उनकी ख़ुशी में सब चिड़िया ऐसे चहचहा रही थीं, पेड़ ऐसे झूम रहे थे, जैसे सास ने हम दोनों को तो अभी से सोहर गाने को मना किया था,... पर प्रकृति पर किसकी पाबंदी चलती है।
भोर बस हुआ चाहती थी।
रात की काली चादर हटा के उषा भी जल्दी जल्दी अपने पैरों में महावर लगा के, पायल झमकाती, आसमान के आंगन में उतरने की तैयारी कर रही थी।
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और हम ननद भौजाई तेज कदम बढ़ाते, हम दोनों के कदम आज जमीन पर पड़ नहीं रहे थे, ननद ऐसी खुश की जैसे दुनिया की पहली औरत हों जो गाभिन हुयी हो, और उनकी ख़ुशी छलक के मुझे भी भीगा रही थी।
और उस ख़ुशी कब हम दोनों घर से निकले कब होलिका माई के स्थान पहुँच गए, पता ही नहीं चला।
एकदम घना, खूब बड़ा पुराना आम का एक पेड़ उसके नीचे जैसे अपने मिटटी इकट्ठी हो के थोड़ी ऊँची जगह, जहाँ बैठ के होलिका माई, बरस फल बताती थीं, आशीष देती थीं। आम के पुराने पेड़ के बगल में जैसे यार दोस्त हों पुराने महुआ और पाकड़ के पेड़, थोड़ी ही देर पर एक खूब बुजुर्ग बरगद का पेड़, और हम दोनों बस उकंडु मुकड़ू बैठ गए, ननद हंसती बिहँसती।
यहाँ कभी कुछ चढ़ाया नहीं जाता, माई के घर कोई मिठाई ले के जाता है क्या ?
बस मनभर बतिया लो, दुःख सुख कह लो, वो भी अक्सर बिना बोले। माई के आगे बिटिया को, खास तौर से ससुरातिन बिटिया को कुछ बोलना नहीं पड़ता, माई चेहरा देख के सुख दुःख समझ जाती है।
ननद तो गाँव की बिटिया, माई क दुलारी, उस दिन ही गोद में बैठा के माई ने कैसे उनको दुलराया था, गाल सहलाया था, कोख पे हाथ रख के बता दिया था जल्द ही भरेगी ये,
इसलिए मेरी सास ने बोला था सबसे पहले होलिका माई का स्थान,
लेकिन मैं आज एकदम गाँव की बहू, हल्का सा घूँघट, और अंचरा हाथ में लेके बार बार माई का गोड़ छू रही थी, मेरी इच्छा आँख से आंसू बनकर निकल रही थी, माई के गोड़ धो रही थी,
' हमरे ननद को कुछ न हो, उसकी कोख हरदम हरी रहे, उसकी कोख को कुछ न हो, नौवें महीने सोहर हो, घर परिवार उनका बढे, खुस रहे'
हम जब उठे, तो भरहरा कर आम के बौर, गिरने लगे उसी पेड़ से और बिहँसती ननद ने अंचरा फैला के रोप लिया, एक एक बौर,।
उस पेड़ के बौर गाँव में सबसे पहले लगते हैं सबसे देर तक रहते हैं, लेकिन मजाल है की कभी कोई गिरे, हाँ जिस दिन होलिका माई आती हैं उस दिन की बात अलग है, पर आज, होलिका माई का आसीर्बाद, संदेस,
मैं हूँ न, कुछ नहीं होगा मेरी बिटिया को,
और ननद से ज्यादा मैं मुस्करा रही थी उन बौरों के मतलब का अंदाजा लगा के,
कोख हरदम हरी रहे, मतलब एक बिटिया निकले और दूसरी का नंबर लगे,
सत्ती माई
सत्ती माई का चौरा थोड़ा दूर था, गाँव के सिवान के पास, जहाँ पठानटोला शुरू होता था एकदम वहीं, वहां भी एक छोटी सी बगिया थी उसी के बीच,
हमारी सास बताती हैं, उनके गौने उतरने के बहुत पहले की बात, उनकी सास ने बताया था, हमारी सास के अजिया ससुर और सुगना के ससुर, बाबू सूरजबली सिंह के बाप, गाँव वाले बोले की माई का चौरा कच्चा है उसको पक्का करवाने को, सूरजबली सिंह के पिता जी और बड़े सैय्यद, हिना के बाबा में बड़ी दोस्ती थी। बात सिर्फ इतनी थी की वो बगिया और जमीन पठानटोला में पड़ती थी, बड़े सैयद की,
वो दोनो लोग गए, बड़े सैयद, हिना के बाबा के पास, की गाँव के लोग चाहते हैं ये दोनों लोग करवा देंगे, बस जमीन बड़े सैय्यद की है इसलिए उनकी इजाजत,
" नहीं देंगे, ऊ का बोले, इजाजत, का कर लोगे, पठान क लाठी देखो हो, दोस्ती न होती, कोई और बोलता तो मार गोजी, मार गोजी, "
मारे गुस्से के बड़े सैयद का चेहरा लाल, और उनके गुस्से के आगे तो जिले का अंग्रेज कलेक्टर भी,
" क्यों दें, इजाजत " बड़ी मुश्किल से उनके मुंह से निकला फिर वो अपनी बोली में आ गए, ज्यादा देर खड़ी बोली में बात करने से मुंह दर्द करने लगता था,
" तू दोनों से पहले पैदा हुए है, यहाँ गाँव क मट्टी हम जानते हैं, माना हम तो पैदायसी बुरबक है तो तुंहु दोनों क माथा खराब है, सत्ती माई खाली तोहार हैं का,... हम पहले पैदा हुए तोहसे, तो तोहसे पहले हमार हैं, अरे ये सोचा गाँव में ताउन पड़े, प्लेग हैजा हो तो खाली एक पट्टी में होगा दूसरी में नहीं होगा, सूखा पड़ेगा तो हमार खेत नहीं झुरायेगा, ....बचाता कौन है, माई न ? "
फिर बड़े सैयद ने अपना फैसला सुना दिया,
चौरा पक्का होगा, जैसा वो लोग चाहते हैं एकदम वैसा बल्कि उससे भी अच्छा, लेकिन बनायेंगे बड़े सैय्यद।
और तबसे सावन क पहली कढ़ाही, पठानटोले की औरतें चढाती हैं।
और मोहर्रम भी, दस दिन तक पूरे बाईसपुरवा में कोई शुभ काम, गाना बजाना सिंगार पटार, सब बंद, मैंने अपनी सास से पूछा भी तो थोड़ा प्यार से झिड़कते, थोड़ा समझाते बोलीं, " अरे घरे में मेहरारुन कुल सोग किये हों, बगल में,... गाना बजाना अच्छा लगता है का। "
सुबह हो रही थी, आसमान एकदम लाल था, सिंदूरी मेरी ननद के मांग ऐसा, बगल में पतली सी चांदी की हँसुली ऐसी नदी, वहां से साफ़ साफ़ दिखती थी। और झप्प से लाल लाल गोल सूरज नदी में से जैसे नहा के, जैसे कोई लड़का गेंद जोर से उछाल के फेंक दे, सूरज सीधे आसमान में,
हम दोनों ननद भौजाई ने अंचरा पकड़ के सूरज देवता को हाथ जोड़ा।
सुबह हो गयी थी।
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सत्ती माई का चौरा, खूब लीपा पोता, हम दोनों लोगो ने गोड़ छुआ, वहां भी ढेर सारे पेड़ों का झुरमुट, खूब घना , जगह जगह ईंटो के चूल्हे, कहीं कहीं चूल्हे की राख, कड़ाही चढाने के निशान,
मैंने अंचरा फैला कर, अपनी ओर ननद दोनों की ओर से मनौती मानी,
" माई नौवें महीना खुशबरी होई, सुन्नर सुन्नर बिटिया होई तो बरही के दिन पहले यही कड़ाही चढ़ाउंगी "
और जब मैंने सर ऊपर उठाया, तो उन पेड़ो से भी पुरानी, एक बूढी माई, बाल सारे सफ़ेद, भौंहों तक के, देह थोड़ी झुकी, कृशकाय, और दूध सी मुस्कान,
ननद के सर पर वो खूब दुलार से हाथ फेर रही थी, मुझे देख कर मुस्करायीं, तो मैंने फिर एक बार घूघंट थोड़ा सा नीचे खींचा, अंचरा से दोनों हाथ से उनके दोनों गोड़ पांच बार छुए, आँखे मेरी बंद लेकिन मुझे बहुत हल्की हलकी आवाज सुनाई दे रही थी
" कउनो परेशानी नहीं होगी, जउन किहु, एकदम ठीक, घरे क परेशानी से बचाने की पहली जिम्मेदारी बहू की, जउने दिन चौखट लांघी, बहू ही घर की चौखट, कउनो परेशानी घुसने नहीं देगी, हम हैं न "
लेकिन जब मैंने आँखे खोली तो वो एकदम नहीं बोल रही थी, खाली उनका हाथ मेरे सर को सहला रहा था।
फिर उन्होंने एक काला धागा निकाला, और बाँध वो ननद के गोरे गोरे हाथ पर रही थीं, लेकिन बोल मुझसे रही थीं,
" नौ महीने तक ये धागा ऐसे ही, कभी भी उतरना नहीं चाहिए, खाली तू , भौजाई इसको खोल सकती हो। बरही में जब कढ़ाही चढाने आना तो हमार धागा, हमें दे देना, कउनो परेशानी झांक भी नहीं सकती जब तक ये धागा बंधा रहेगा। "
मेरे मन में अभी भी ननद की सास की, साधू के आश्रम का डर था, हिम्मत कर के मेरे मुंह से बोल फूटे,
" लेकिन कोई जबरदस्ती करके,..”
"हाथ टूट जाएगा, ....भस्म हो जाएगा, ....अब चिंता जिन करा, नौ महीना बाद सोहर गावे क तैयारी करा, कउनो बाधा, बिघन नहीं पडेगा। "
मैंने और ननद जी दोनों ने आँख बंद कर के हाथ जोड़ लिया, और आँख खोला तो वहां कोई नहीं था, सिर्फ ननद रानी की गोरी गोरी बाहों पे वो काला धागा बंधा था,
जिधर पेड़ हिल रहे थे, जहाँ लग रहा था वहां से कोई गुजरा होगा, उधर हाथ फिर मैंने जोड़ लिए।
Komalji pahele to JKG ka number tha. Aap ne Fagun ke update de die??![]()
Erotica - फागुन के दिन चार
फागुन के दिन चार भाग २९ गुड्डी का प्लान ३,८२,842 कागज आया और तीन-चार फोन भी। गुड्डी प्लान बनाने में बिजी हो गयी और डीबी फोन में आखिरी फोन शायद एस॰टी॰एफ॰ के हेड का। डी॰बी॰ का चेहरा टेंस हो गया और आवाज भी तल्ख़ थी। वो सर सर तो बोल रहे थे, लेकिन टोन साफ था की उसे ये पसंद नहीं आ रहा था।...exforum.live
फागुन के दिन चार भाग २९ गुड्डी का प्लान पृष्ठ ३४३
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Wah pathan tola. Pahele padha to muje kuchh aur hi laga. Magar bat purana kissa.
Sasurji aur hina ke baba purane dost hai. Saiyad sab ko manana mushkil hai. Lekin fir bhi tiyar ho gae. Aur feshla suna diya. Saiyad sab ki taraf se pakka karwaya. Tab se pathan tole ki aurate sabse pahele pujti hai. Bhai chare ka shandar namuna. Amezing love it.
Kudarat ki lalimaa ho ya nandiya ke yovan ka varanan aap shadar karti ho. Maza aata hai ye sab padhne me. Mai se zoli felae ashiravad mang li. Aur maza aa gaya. Matlab bad ki aas pahele se. Pahele hi betiya man li.
माई नौवें महीना खुशबरी होई, सुन्नर सुन्नर बिटिया होई तो बरही के दिन पहले यही कड़ाही चढ़ाउंगी "
Budhi mai ki to nandiya bitiya lagegi na. Ashirvad raha. Wah. Amezing. Kala dhaga sath. Najar na lage. Buri bala se bachae. Kya feelings hai. Bahot maza aa raha hai. Love it.
Ha in sab me vo asram to bhul hi gai thi. Ab dar nahi. Jake nadiya ki nagin sas ko batana padega. Ab to 9 mahilne bad bas sohar ke geet hi gae jaenge.
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a dice
Wah pathan tola. Pahele padha to muje kuchh aur hi laga. Magar bat purana kissa.
Sasurji aur hina ke baba purane dost hai. Saiyad sab ko manana mushkil hai. Lekin fir bhi tiyar ho gae. Aur feshla suna diya. Saiyad sab ki taraf se pakka karwaya. Tab se pathan tole ki aurate sabse pahele pujti hai. Bhai chare ka shandar namuna. Amezing love it.
Kudarat ki lalimaa ho ya nandiya ke yovan ka varanan aap shadar karti ho. Maza aata hai ye sab padhne me. Mai se zoli felae ashiravad mang li. Aur maza aa gaya. Matlab bad ki aas pahele se. Pahele hi betiya man li.
माई नौवें महीना खुशबरी होई, सुन्नर सुन्नर बिटिया होई तो बरही के दिन पहले यही कड़ाही चढ़ाउंगी "
Budhi mai ki to nandiya bitiya lagegi na. Ashirvad raha. Wah. Amezing. Kala dhaga sath. Najar na lage. Buri bala se bachae. Kya feelings hai. Bahot maza aa raha hai. Love it.
Ha in sab me vo asram to bhul hi gai thi. Ab dar nahi. Jake nadiya ki nagin sas ko batana padega. Ab to 9 mahilne bad bas sohar ke geet hi gae jaenge.
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Waah Didi Waah Aap Ka Dimmag Tk Chacha Chaudhary se bhee tez chalta hai ..ननद
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और दूसरा डर था क्या होगा खेत बाड़ी का बंस का। आश्रम की जान पहचान से उनकी सास धीरे धीरे और भी धंधे, लेकिन बाद में कौन देखेगा, अगर बंश ही नहीं चला तो।
लेकिन मम्मला सिर्फ सास का ही नहीं था , नन्दोई जी ने जो बताया था अपनी माँ और आश्रम के बारे में उनके कहे बिना मैं समझ गयी थी की मामला क्या हैं।
मामला था ननद का सोने ऐसा रंग और गदराया जोबन। देख के जिस का न खड़ा होता उस का भी खड़ा हो जाए, गालों में हंसती तो गड्ढे पड़ते, ठुड्डी पे तिल, चम्पई रंग, बड़ी बड़ी आखे और पूरी देह में काम रस छलकता रहता, देख के लगता एकदम चुदने के लिए तैयार हैं।
नन्दोई जी ने बताया था, " एक बार आपकी ननद माई के साथ गयीं भी आश्रम, वहां एक थीं उन्होंने देखा भी, फिर गुरु जी ने माई से कहा की बहू को दो चार दिन के लिए आश्रम छोड़ दो, "
" फिर ननद जी गयीं क्या " जानते हुए भी मैंने पूछा।
" नहीं, माई ने लाख कहा, लेकिन ननद आपकी बस एक जिद मैं अकेले कभी कहीं नहीं रही, जबतक सास जी रहेंगी तक लेकिन उन्ही के साथ लौट आएँगी, आपकी ननद में सब बात अच्छी है लेकिन, अब माई, ठीक है मानता हूँ जबान की कड़वी हैं लेकिन शुरू से हैं और हम सबके साथ है और उनकी बात कहने से पहले पूरी हो जाए ये उनकी आदत है, और आज से थोड़ी। लेकिन चाहती तो भला ही हैं न, पाल के बड़ा किया, गुरु जी को बोल के आयी थीं मैं अपनी बहू को खुद ले के आउंगी और छोड़ के जाउंगी, फिर जब तक इलाज न हो जाए दो दिन चार दिन सात दिन रखिये, अब ये जाने को तैयार नहीं " माँ की बात खाली जाना नन्दोई को भी अच्छा नहीं लग रहा,
और असली बात थी जो मैं समझ गयी ननद के रूप और जोबन को देख के उस गुरु का टनटना गया होगा और एक बार गुरु के भोग लेने के बाद बाकी आश्रम वालों को भी छक के चखने का मौका मिलता और एक बार बस फिल्म बनने की देर थी, फिर तो, और जो मुख्य सेविका थी वो जान रही थी बिजनेस पोटेंशियल, एक बार ननद हत्थे चढ़ जाती फिर तो दर्जनों मर्दो के नीचे वो सुलाती
गुरु जी, उनके चेले और प्रमुझ सेविका सब मेरी ननद के ऊपर मोहाये थे लेकिन उनका आश्रम न जाना, तो इसलिए अब बात झांगड़ वाली
मतलब गुरु जी ने मेरी सास को समझा दिया होगा,
अभी नहीं तो कभी नहीं, और वो नहीं आने को तैयार हैं सीधे से तो जबरदस्ती, और इसलिए सास बहाना बना के पहले नन्दोई जी को फुटा रही थीं, लखनऊ, की उनके सामने ज्यादा जोर जबरदस्ती नहीं हो पाएगी। और एक बार झांगड़ में चढ़ गयीं या किसी तरह गंगा डोली करके टांग के उन चेलियों ने पटक दिया फिर तो ननद की,...
और वो कहने को हफ्ते भर था, पता नहीं कब तक, जब तक वो अच्छी तरह टूट नहीं जातीं
मुझे किसी ने बताया था झांगड़ वाली बात तो मैंने विशवास नहीं किया था लेकिन अब तो ननद की सास ने खुद अपने मुंह से झागंड़ वाली बात बोली,
मेरी रूह काँप गयी, अगर जो मैंने सुना था अगर उसका एक हिस्सा भी सच होगा तो, वो झांगड़ वाली प्रधान सेविका, एक तरीका था उसका,
" स्साली को न मूतने दो, न सोने दो " ज्यादातर लड़कियां २४ घंटे में टूट जाती हैं और दो दिन तक कोई नहीं टिकता, उसके बाद जो कुछ कहो,
एक पिंजड़े ऐसे कमरे में मुश्किल से ४ X ४ के , बस दोनों हाथों को पकड़ के ऊपर से टांग देते, दोनों पैरों के अंगूठे मुश्किल से फर्श को छूते रहते। और न खाना न पानी न सोना, तेज लाइट सीधे चेहरे पे फोकस और बिना किसी पैटर्न के तेज म्यूजिक कान में लगे हेड फोन में, दोनों पैरों के बीच में एक चार फ़ीट लम्बा डंडा डिवाइडर की तरह, जिससे दोनों टाँगे हरदम फैली रहेंगी। १२ घंटे बाद पांच छह लीटर पानी सीधे मुंह में एक कीप से,
न कोई बात करेगा, न बोलेगा, न दिखेगा, चेहरा के अलावा बाकी पिजड़ा अँधेरे में और एक बार जब वो टूट गयी तो बस किसी जबरदस्त मर्द के पास हचक के चोदेगा, और फिर कमरे में लेकिन अकेले कभी नहीं, कोई लेडी बाउंसर साथ में जो उसे बैठने नहीं देगी, खाना, पीना, मूतना सोना हैं तो खुद जा के किसी मरद से बोलना होगा, आश्रम के चोदने के लिए।
और दो तीन दिन में जब घमंड टूट जाएगा, औकात में आ जायेगी तो बाकी सेविकाओं की तरह नहला धुला के आसव् पिला के पहले गुरु जी के पास, फिर बाकी चेलों के पास, फिर उसी तरह ब्ल्यू फिल्म। फरक यही होगा की अबकी ब्ल्यू फिल्म चोरी छुपे नहीं खुले आम बनेगी और उसे जो रोल बताया जाएगा वो करना होगा, और दो चार दिन बाद, अमावस्या या पूर्णिमा से ग्राहक के पास और साथ में ड्रग की भी आदत
और जो ननद ताल पोखरे की बात कर रही थीं वो भी नहीं हो सकती थी क्योंकि दिन रात गाभिन होने के बाद दस पंद्रह दिन आश्रम की एक सेविका परछाई की तरह साथ रहती,
अकेली औरत तो सोच सकती हैं लेकिन जब पेट में बच्चा आ जाता हैं तो जिम्मेदारी बढ़ जाती हैं, डर बढ़ जाता हैं
तरह तरह के ख्याल आ रहे थे मेरे मन में
बेचारी मेरी ननद, बस आज की रात बस किसी तरह आज मेरी ननद जरूर गाभिन हो जाये
एक बार ससुराल पहुँच गयीं तो अब उनकी सास को कोई रोक नहीं सकता था, नन्दोई को पहले ही हटाने का ननद की सास ने प्लान बना लिया था और ननद को आश्रम भेजने का भी । अबकी ननद से न कहा जाता न पूछा जाता बस जबरदस्ती और एक बार झागंड़ में घुस गयी फिर तो
बस किसी तरह, आज की रात ये और मेरे मरद के पास रह जाये
मुझे अपने मरद के बीज पर पूरा भरोसा था और होलिका माई के आशीर्वाद पर ,
बस आज की रात,
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मुझे ननद का बुझा चेहरा याद आ रहा था,
"भौजी अगर मैं उस आश्रम में गयी तो,... इस बार की मुलाकात आपकी मेरी आखिरी मुलाक़ात होगी, ....याद करियेगा अपनी इस ननद को"
Komal Di Komal Diखुसखबरी
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मेरी भी आँख लग गयी,
एक घडी मैं सोई होउंगी मुश्किल से और जब नींद खुली तो रात ने अपने कदम समेटने शुरू कर दिए थे।
आसमान जो गाढ़ी नीली स्याही से पुता लगता था अब स्लेटी हो गया था, पेड़ जो सिर्फ छाया लग रहे थे वो थोड़ा बहुत दिखने लगे थे, लेकिन भोर होने में अभी भी टाइम था,
![]()
तभी कुछ आहट सी हुयी, दरवाजा खुलने बंद होने की, और मुझे याद आया आज भोर होने के पहले करीब चार बजे ही इन्हे खेत पे जाना था, गेंहू की कटनी की तैयारी के लिए अभी हफ्ता दस दिन बाकी था कटनी शुरू होने में और कटनी तो एक पहर रात रहते शुरू हो जाती,
मैंने निकल के दरवाजा बंद किया और सीधे ननद के कमरे में।
ननद थेथर पड़ी थी।
![]()
हिलने को कौन कहे, आँख खोलने की ताकत नहीं लग रही थी, मेरे मर्द ने आज अपनी बहिनिया को कुचल के रख दिया था, जाँघों पर, मेरे मरद के वीर्य के थक्के पड़े थे, बुर से अभी भी बूँद बूँद कर मलाई रिस रही थी।
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मैंने उनका हाथ पकड़ के सहारा देकर उठाया, उनकी मुस्कराती आँखों ने मेरे बिन पूछे सवाल को समझ लिया था, बुदबुदाते बोलीं,
' पूरे पांच बार, हिला नहीं जा रहा है "
नीचे पड़ी साडी उठा के बस अपने बदन पे उन्होंने डाल लिया, लेकिन अबकी उन्होंने जो अपनी दीये जैसे बड़ी बड़ी आँखों को उठा के देखा मैं उनका डर समझ गयी, बस हाथ दबा के, अपनी ओर दुबका के मैंने बिस्वास दिलाया, बिन कहे,
' होलिका माई की बात याद रखिये बस'
कुछ देर में हम लोग कच्चे आंगन में जहाँ पांच दिन पहले रात में मैंने ननद ने बच्चे वाली पट्टी से चेक किया था, साथ साथ मूत के, दोनों की एक लाइन, न मैं गाभिन न वो। आज फिर उकडू मुकड़ू हम दोनों बैठ गए, जाँघे फैला के, ननद के जाँघों के बीच मैंने गुदगुदी लगाई, और छेड़ा,
" अरे मूता कस के, रोकी काहें हो "
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पहले तो एक दो बूँद, फिर तेज धार, अब ननद चाह के भी रोक नहीं सकती थीं,
बस मैंने उस जांच वाली पट्टी को, जैसे आशा बहु ने समझाया था सीधे मूत की धार में, और फिर हटा लिया, और मैं भी ननद के साथ
जब हम दोनों उठे, तो बड़ी देर तक मैं वो जांच पट्टी हाथ में लिए देवता पित्तर, होलिका माई की दुहाई, फिर खोल के देखा, दो लाइन लग तो रही थी,
ननद परेशान का हुआ, लेकिन आंगन के उस कोने में अँधेरा सा था, जिधर रौशनी थी, हम दोनों उधर आये,
भोर बस हुआ चाहती थी, हलकी सफेदी सी लग रही थी, एकाध चिड़िया चिंगुर बोलने लगे थे,
ननद को मैंने दूर कर दिया और अब साफ़ साफ़ देखा,
पक्का दो लाइन,
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मेरी मुस्कान से ही वो समझ गयीं, एक बार पूरब मुंह हो के मैंने हाथ जोड़ा और दौड़ के ननद को बाँहों में भर लिया और वो मारे ख़ुशी के चिल्लाई,
" भौजी, हमार भौजी.... "
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ख़ुशी के मारे न मुझसे बोला जा रहा था न मेरी ननद से, जैसे छोटे छोटे बच्चे आंगन में बादल आने पर गोल गोल घूमते हैं हाथ फैला के, गोल गोल चक्कर काटते हुए बस हम दोनों ननद भौजाई, उसी तरह
फिर मैंने अपनी ननद को बाहों में भर लिया, क्या कोई मर्द किसी औरत को दबोचता होगा, और कस कस के उनको चूमते, होंठों को चूसते बोली,
" मिठाई खाउंगी, पेट भर, "
" एकदम खियाइब लेकिन तबतक नमकीन खारा ही, "
सच में पक्की बदमाश ननद, और मेरा सर खींच के अपनी जाँघों के बीच, जहां अभी भी, लेकिन कौन भौजाई ननद क रसमलाई छोड़ती है, जो मैं छोड़ती, बस बिना ये सोचे की वहां अभी,
कस कस के चूसने चाटने लगी, और फिर दोनों फांको को फैला के ननद की चूत से बोली,
" अरे चूत महरानी, आपकी जय हो, जउन बढ़िया खबर आप दिहु, जउने चूत में हमरे मरद क लंड गपागप गया, जेकर मलाई खाऊ, ओहि चूत में से नौ महीने के बाद अँजोरिया अस गोर गोर बिटिया हो, खूब सुन्दर "
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नन्द मेरी बात सुन के खिलखिला रही थीं, हंस रही थीं, लेकिन हँसते खिलखिलाते आगे की बात मेरी ननद ने ही पूरी की,
" और ओह बिटिया की चूत में हमरे भाई क,हमरे भौजाई के मरद क लंड गपागप सटासट जाए "
और मैंने नन्द को अँकवार में लेटे लेटे ही भेंट लिया।
थोड़ी देर में हम दोनों बोलने लायक हुए तो उसी हालत में लथर पथर,... सास के सामने हम दोनों,
हम दोनों को देख के वो समझ गयीं खुशखबरी, उनके चेहरे की चमक मुस्कान रुक नहीं रही थी, उन्होंने हाथ बढ़ाया और मेरी ननद उनकी बाहों में
देर तक माँ बेटी भेंटती रही, न बेटी बोली न माँ, बस माँ कभी बेटी के खुले बालों पे हाथ फेरतीं, कभी पीठ सहलातीं, फिर उन्होंने मेरी ओर हाथ बढ़ाया,
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लेकिन मैंने मना कर दिया, " आज आपकी बात नहीं मानूंगी "
उन्होंने मेरे गौने उतरने के अगले दिन ही मना कर दिया था की मैं उनके गोड़ न छूउ, वो मुझे बेटी की तरह ले आयी हैं।
घूंघट माथे से नीचे लाकर, दोनों हाथों से आँचल पकड़ के माथे को सास के दोनों पैरों पर लगाकर पांच बार मैंने सास के पैर छुए और बस यही मन में मांग रही थी,
" मेरी ननद खुश रहे, नौ महीने में बिटिया ठीक से हो अच्छे से हो, किसी की नजर न लगे हमरे ननद के सुख पे "
बहुत बहुत आभारकोमल मैम
इस कहानी के अपडेट के लिए हार्दिक आभार।
सच में आप जान जाती हैं कि किस कहानी के अपडेट का ज्यादा इंतजार हो रहा है। आप ये सब कैसे कर लेती हैं ??
इस खुशखबरी का तो हम भी इंतज़ार कर रहे थे। अब ननद की ननद की भी खुशखबरी का भी जल्द इंतजाम हो जाए तो क्या कहना।
सादर